बेंगानियों और जयंतों के लिए एक कश्मीरी पंडित
Posted by Reyaz-ul-haque on 4/30/2009 07:04:00 PMअसगर अली इंजीनियर की बातों से बेंगानियों, जयंतों और वगैरहों को मिर्ची लगी है। सच हमेशा मिर्चीदार होता ही है। वे कश्मीर के मुद्दे के भीतर से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुद्दा उठा लाये हैं, अमरनाथ का मुद्दा उठा लाये हैं और 'मुसलामन बादशाहों के ज़ुल्म' का मुद्दा उठा लाये हैं। हम भी उठा लाये हैं एक कश्मीर पंडित संजय काक से एक बातचीत के कुछ हिस्से और जानते हैं कश्मीर जिन हालत से गुजर रहा है उनमे इस मसले और कश्मीरी पंडित वाले मसले की क्या स्थिति है. संजय काक ने कश्मीर के हालत पर जश्न-ए-आजादी नामक एक शानदार फ़िल्म बनायी है. रविवार से साभार.
आपने अपनी फिल्म में कश्मीर के लोगों की जो इच्छाओं को सामने लाने की कोशिश की है. क्या है वह इच्छा, क्या आप उसे पूरे तौर पर सामने ला पाये हैं?
लोगों की इच्छा क्या है, यह जानना मुश्किल है। हालात वहां इतने बुरे हैं कि मुझे ही नहीं, लोग आपस में भी उनके बारे में बिल्कुल बात नहीं करते हैं. पब्लिक सिमट कर बैठी हुई है. जो लीडर हैं वहां, वे सब भावनाओं की ही राजनीति करते हैं. भावना के स्तर पर वहां के लोग अव्वल तो भारत की फौज को दूर देखना चाहते हैं.
नंबर दो, वे आजादी चाहते हैं. अब आजादी का मतलब उनका क्या है, इस पर हम पाते हैं कि कोई कंसेंसस नहीं है. लेकिन हमें यह कंसेंसस नहीं दिखता, इसका मतलब यह नहीं है कि वह है ही नहीं. बल्कि असल में हम यह नहीं जानते कि वह क्या है. क्योंकि आपको जहां पर किसी भी तरह की आजादी नहीं है, जहां पर कोई सार्वजनिक सभा नहीं कर सकते, जहां आप फिल्म नहीं बना सकते, जहां आप लिख नहीं सकते आजादी के साथ, वहां हम कैसे जान पायेंगे कि लोग वास्तव में क्या चाहते हैं लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि जब कोई वारदात होती है, और आप यह इस फिल्म में भी देखेंगे कि कोई मिलिटेंट कमांडर मारा जाता है, तब जो माहौल होता है, उससे आपको कुछ आइडिया हो जायेगा. जिस तरह वहां हजारों की तादाद में लोग आते हैं, जिस तरह नारे लगाये जाते हैं, जिस तरह उस दिन सुरक्षा बल गायब हो जाते हैं, यह सब कुछ आपको बहुत कुछ कह देता है. यह एक अजीब परंपरा है कश्मीर में.
वहां चप्पे-चप्पे पर फौजी हैं। वहां आर्मी को सलाम किये बिना आप आगे नहीं बढ सकते. लेकिन जिस दिन कोई मिलिटेंट कमांडर मारा जाता है और उसका जनाजा उठता है, तो तीन-चार किमी तक कोई फौजी नहीं दिखेगा आपको. क्योंकि उन्हें मालूम होता कि उस दिन उन्होंने कुछ किया तो फिर उन्हें एक-दो आदमियों को नहीं, हजार-दो हजार लोगों को मारना पडेगा। तो ऐसे अननेचुरल सिचुएशन में आपको पता लगता है कि कश्मीर में लोगों की भावनाएं क्या हैं. आप जब फिल्म देखेंगे तो यह समझ जायेंगे कि मैं यह क्या कह रहा हूं.
आपकी फिल्म के बारे में कहा गया है कि इसमें कश्मीरी पंडितों के बारे में बहुत अधिक नहीं दिखाया गया है. क्या आप उनकी समस्या को कम करके देखते हैं, खास कर पलायन?
ऐसा नहीं था कि उनका पलायन पहले नहीं हुआ था. हम जिस पलायन की बात कर रहे हैं वह हुआ 1991-92 में. लेकिन उस मुद्दे का इस्तेमाल 1993-94 में होना शुरू हुआ. तो मुश्किल हो गया लोगों के लिए कहना कि वहां आजादी की तहरीक जायज है, क्योंकि सरकार ने इसे सांप्रदायिक साबित कर दिया. कहा जाने लगा कि इन्होंने पंडितों को निकाल दिया वहां से.
आज हालत यह हो गयी है कि आप कश्मीर पर बात करें तो पहला सवाल आता है कि कश्मीरी पंडितों पर क्या कहेंगे? फिल्म बनी तब से यही सवाल उठता रहा है कि आपने कश्मीरी पंडितों को क्यों नहीं और समय दिया. मेरा कहना है कि कश्मीर के मुद्दे को हिंदुस्तान में समझने के लिए कश्मीरी पंडितों को इस तरह इस्तेमाल किया गया है जैसे वे ही कवच हों और सबसे बडा सवाल हों.
आपने कश्मीर का नाम लिया ही कि आ गया सवाल कि- बोलिए पंडितों के साथ क्या हुआ?
मेरा कहना है कि पहले आप सबसे बड़े और पहले सवाल को देखें कि कश्मीर में क्या हुआ. इसके बाद ही तो कश्मीरी पंडित निकले न. कश्मीरी पंडितों का मामला कश्मीर समस्या के साथ जुड़ा हुआ है. आप पहले उसका हल करें. फिर इसके बाद ही बात होनी चाहिए. कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया गया. जो निकले-भागे बरबाद हुए, वे तो हुए ही, मगर जो जम्मू में कैंपों में रह रहे हैं, उनकी समस्या को कोई भी सरकार चुटकी में सुलझा सकती थी. लेकिन उन्हें बनाये रखना था सरकार को ताकि वे उनका इस्तेमाल कर सकें. जो पढे-लिखे पंडित थे, वे तो दिल्ली आ गये, पर जो छोटे और अनपढ किसान थे, वे बेचारे जम्मू और दूसरे कैंपों में रह रहे हैं. कश्मीरी पंडितों को अहम रोल दिया गया है, ताकि उनका इस्तेमाल हो सके और कश्मीर समस्या पर बात को अटकाया जा सके.
पंजाब में मैंने एक फ़िल्म बनायी थी दूरदर्शन के लिए, 1986 में. पंजाब में एक अच्छा खासा आंतरिक पलायन हुआ था पंजाबी हिंदुओं का, लेकिन पंजाब सरकार में उन्हें सीमा से बाहर नहीं जाने दिया. उन्हें पठानकोट, अमृतसर में शिविरों में रखा गया.
मैंने उन्हें शूट किया है फ़िल्म में. वे वहां छह महीने साल भर रहे और वापस चले गये. कश्मीर सरकार ने ऐसी कोशिश कभी नहीं की. दूसरी तरफ़ कश्मीर में अभी भी 5-6 हज़ार कश्मीरी पंडित हैं. वे कश्मीर छोड़ कर कभी नहीं गये. वे भी जी रहे हैं. कैसे जी रहे हैं, यह कोई नहीं जानता. सरकार की ओर से तो उन्हें थप्पड़ ही मिलते हैं कि तुम यहां क्या कर रहे हो, निकलो यहां से।
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5 टिप्पणियां: Responses to “ बेंगानियों और जयंतों के लिए एक कश्मीरी पंडित ”
By Kapil on April 30, 2009 7:46 PM
सही और खरा जवाब रेयाज भाई। खोज-खोज कर ऐसी जानकारी लाते रहिए। वैसे तो इन लोगों के लिए तर्कों का कोई मतलब नहीं है पर इनकी चिल्लपों का मुंहतोड़ जवाब देना ही होगा।
By Ravi Singh on April 30, 2009 8:04 PM
वाह रेयाज भाई, वाह, क्या खूब कहा है
महाराज, आपको इन बैंगानियों और जयन्तों से क्या काम..., इन्हें मिर्ची लगे सो लगने दीजिये, आप तो अपनी दुकान चलाईये और इन्शा अल्लाह खूब चल रही है..., चलाते रहिये अपनी दुकान...
आपने संजक काक का इन्टरव्यू दिखाया, कसम से बहुत मज़ा आया, बहुत दिनों बाद कोई बेशर्म आदमी देखने को मिला.... मैंने तो एसे एसे देशद्रोहियों, मक्कारों, मीरजाफरों को देखा है कि हमारे संजक काक भाई तो उनके बहुत कम बेशर्म है..., दिखाते रहिये..., हमें तो बेशर्मों और बेईमानों को देखने की आदत हो गई है,
अंग्रेज हमारे देश पर इतने साल राज यूही नहीं कर गये...
अगर किसी की मौत पर खुशी का माहौल देखना है तो हमारे छत्तीसगढ़ में जब नक्सलवादी आतंकवादी मरते हैं... तब उस माहौल को देखना..., अल्ला कसम. इन घाटी के माहौल को शर्तिया भूल जाओगे
आप क्या सोच रहे हो आपकी ये दुकानदारी हमेशा यूहीं चलती रहेगी?
बैंगानियों और जयन्तों की राष्ट्रवादिता यूहीं गालियां खातीं रहेगी?
अगर हां तो तुम बस मुंगेरीलाल हो...
By Ravi Singh on April 30, 2009 8:14 PM
रियाज भाई, विनायक सेन के क्या हाल है? आप न बता सकें तो कपिल भाई से ही पूछ कर बता दीजिये...
By अनुनाद सिंह on April 30, 2009 8:17 PM
वाह 'भाई' वाह !
इस इंटरब्यू में प्रश्नो के उत्तर कहाँ हैं? मैं तो ढ़ूंढ़ते रह गया।
By Bryce on August 28, 2009 7:43 AM
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