हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मुसलमानों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/29/2009 03:28:00 PM

इस्लामिक विषयों के विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर से रेयाज उल हक की बातचीत

‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म’ के अध्यक्ष और इस्लामिक विषयों के विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर की पहचान मजहबी कट्टरवाद के खिलाफ लगातार लड़ने वाले शख्स के रुप में है. असगर अली इंजीनियर मानते हैं कि जहां-जहां इस्लाम पर जुल्म हुआ है, वहां के लोग लड़ाई के लिए खड़े हुए हैं. वे मानते हैं कि कट्टरपंथ मजहब से नहीं, सोसायटी से पैदा होता है. इनकी राय में भारतीय मुसलमान इसलिए अतीतजीवी है क्योंकि यहां के 90 प्रतिशत मुसलमान पिछड़े हैं और उनका सारा संघर्ष दो जून की रोटी के लिए है. इसलिए उनके भीतर भविष्य को लेकर कोई ललक नहीं है. यहां प्रस्तुत है, डॉ. असगर अली इंजीनियर से की गई बातचीत के अंश.

असगर अली इंजीनियर
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अगर धर्म के आधार पर देखा जाये तो दुनिया भर में अमरिकी प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष में इसलामी राष्ट्रों के लोग ही सबसे अगली कतारों में हैं. इसके क्या कारण देखते हैं आप ?


विश्व के जिन हिस्सों पर जुल्म हो रहा है, वे सारे वही हिस्से हैं, जहां मुसलमान हैं. आज अमरिकी हमला वियतनाम, कोरिया या चीन पर नहीं हो रहा है. तो वहां के लोग क्यों लडेंगे अमेरिका के खिलाफ ? फलस्तीन में या इराक में जो कुछ हो रहा है, उसे भुगतनेवाले तो मुसलमान ही हैं न ? तो लडनेवाले भी मुसलमान ही होंगे.


• इसके क्या कारण हो सकते हैं कि मुसलमानों को ही टारगेट बनाया जा रहा है?

• • इसलिए कि अमेरिका मध्यपूर्व पर अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहता है. वहां तेल का भंडार है, जिस पर वह अपना कब्जा जमाना चाहता है. वहां जो भी जुल्म होता है, उसमें वह इस्राइल की हिमायत करता है. इसके जरिये वह अरबों को दबा कर रखना चाहता है. इस्राइल अमेरिका की पुलिस चौकी है, जिसके जरिये अमरिकी अरबों पर कंट्रोल रखना चाहते हैं. जब इस पुलिस चौकी द्वारा फलस्तीन के लोगों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं उनके खिलाफ. इसी तरह अमेरिका इराक पर कब्जा करता है क्योंकि वहां बेशुमार तेल है. सऊदी अरब के बाद वहां सबसे ज्यादा तेल है. इसलिए वह वहां अपना कब्जा जमाये रखना चाहता है. तो बदले की कार्रवाई तो होगी ही.

• भारत और शेष विश्व के मुसलिम समाज में एक फर्क दिखता है. पूरी दुनिया के मुसलिम समाज में ऐसे साम्राज्यवादी जुल्म के खिलाफ हर तरह के संघर्ष चल रहे हैं. लेकिन भारत के मुसलमान इस साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में दूर-दूर तक नहीं दिखते या बहुत कम. वे विरोध जताने के लिए एक साधारण-सा जुलूस तक नहीं निकाल पाते हैं. ऐसा क्यों ?

• • इसलिए कि किसी जमाने में जब विरोध किया तो उसका रद्दे अमल सख्त हुआ. जैसे इस्राइल का येरुशेलम पर हमला हुआ था 1968 में, तो मुसलमानों ने बहुत बडा जुलूस निकाला. उसका बहुत ही बुरा रद्दे अमल हुआ. उस समय जनसंघ ने काफी प्रोपेगेंडा किया कि मुसलमानों की वफादारी भारत के साथ नहीं है बल्कि मक्का-मदीना के साथ है, बैतुल मुकस (येरूशेलम) के साथ है. इसका लोगों पर बहुत खराब असर पडा.

इसके अलावा हिंदुस्तान में उस जमाने के मुकाबले में इतनी तबदीलियां आयी हैं कि मुसलमान खुद दुनिया के भविष्य के बारे में सोचने से ज्यादा यह महसूस करता है कि उसके अपने भविष्य का क्या होगा. इसलिए वह कश्मीर के भी आंदोलन का खुल कर समर्थन नहीं करता. आप देखेंगे कि कश्मीर की हिमायत में भी दूसरे राज्यों के मुसलमान कोई जुलूस नहीं निकालते. अब वे यह समझते हैं कि उनके हक उनके इलाके से जुडे हुए हैं और उन्हें अपना भविष्य देखना है. इसलिए उनकी वफादारी भी किसी एक पार्टी से खत्म हो गयी. किसी जमाने में उनकी वफादारी सिर्फ कांग्रेस के साथ थी, लेकिन अब हालत यह है कि यहां बिहार में कांग्रेस चुनाव लडती भी है तो वह राजद को वोट देता है. केरल में कम्युनिस्टों को वोट देता है. आंध्र प्रदेश में तेलुगुदेशम को वोट देता है. जो क्षेत्रीय हित हैं, वे भी इसमें काम करते हैं.


असगर अली इंजीनियर से पूरी बातचीत रविवार पर पढ़ें।





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  1. 13 टिप्पणियां: Responses to “ मुसलमानों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं ”

  2. By संजय बेंगाणी on April 29, 2009 at 6:25 PM

    असगर साहब से सहमत नहीं हुआ जा सकता. वास्तव में आज दुनिया इस्लामी आतंक को झेल रही है. मूम्बई के लोग कौन से मुसलमानों को परेशान करने गए थे. फिर वे क्यों मारे गए? उल्टा यहाँ तो हत्यारे कसाब की खातीरदारी हो रही है.

    पाकिस्तान में सिख कौन सा अत्याचार कर रहे थे जो उन्हे जजिया भरना पड़ रहा है.

    इस विषय पर तो हजारों पन्ने लिखे जा सकते है....

  3. By Reyaz-ul-haque on April 29, 2009 at 8:02 PM

    ऐसे मामलों के वृहत्तर परिप्रेक्ष्य होते हैं बेंगानी जी और उन्हें इस तरह किसी एक घटना या संदर्भ से जोड़ कर देखना उचित नहीं है. यहाँ एक ट्रेंड के बारे में बात हो रही है और वह भी एक खास देश के संदर्भ में, जो की अपने चरित्र में साम्राज्यवादी है. इसे मुंबई हमलों से जोड़ने का मतलब है की या तो आप जवाब को समझ नहीं पाए या उसे समझने की आपको कोइ ज़रुरत नहीं है क्योंकी आप लोगों को तथ्यों-सन्दर्भों से कुछ लेना देना तो होता नहीं है

    बेशक. हजारों ही नहीं लाखों पन्ने लिखे जायेंगे और लिखे जा रहे हैं...होलोकास्ट की परत दर परत उधड रही है, हर जगह ज़र्मनी हो, गोधरा हो, मालेगांव हो, गुजरात हो या दुनिया का कोई भी अँधेरा कोना हो...

  4. By ghughuti on April 29, 2009 at 9:01 PM

    This comment has been removed by the author.

  5. By Mired Mirage on April 29, 2009 at 9:05 PM

    समझ की कमी को पहले से ही स्वीकारते हुए :
    कश्मीर के लिए क्या इसलिए जलूस निकाले जाएँ कि वह मुस्लिम बहुल है सो उसे अलग हो जाने दिए जाना चाहिए? या कि वहाँ से पंडितों को बेघरबार कर दिया गया सो उसके विरोध में या उसके पक्ष में? या क्या पंडितो के साथ अन्याय अन्याय ही नहीं माना जा सकता ? या कि उन्हें चुपचाप से सही धर्म अपना लेना चाहिए था? या इसलिए कि ए के राइफ़ल वालों पर अन्याय हो रहा है?
    जब तक किसी क्षेत्र में मुस्लिम आबादी अल्पसंख्यक हो तो वहाँ धर्म निर्पेक्षता सही ही है किन्तु यदि मुस्लिम बहुल हो जाए तो उसे मुस्लिम राज्य मानकर अलग होकर मुस्लिम कानून लागू होने चाहिए।
    कभी कभी अपने धर्म में हो रहे गलत कामों व उनके द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का भी विरोध हो तो विरोध की कीमत बढ जाती है। अन्यथा लगता है कि अन्याय करना सही है किन्तु सहना गलत। जरा अपने सिवाय अन्य पर अन्याय के विरुद्ध भी बोलिए। देखिए बहुत से लोग साथ हो लेंगे तब भी जब अन्याय आपके साथ हो।
    घुघूती बासूती

  6. By Reyaz-ul-haque on April 29, 2009 at 9:33 PM

    सवाल सिर्फ कश्मीर की आज़ादी के लिए जुलूस निकालने का नहीं है. राष्ट्रीय-वैश्विक मामलों में आगे बढ़ कर हस्तक्षेप कारी, रचनात्मक प्रतिरोध जताने का है. कश्मीर की 'आजादी' या 'नहीं आज़ादी' का सवाल सहमति-असहमति की गुंजाइश छोड़ता है और होना भी चाहिए, लेकिन इस आंदोलन-जो बाद में लश्कर और जैश और इसी तरह के अन्य विध्वंसक गिरोहों के हाथ में चला गया है-को रोकने के नाम पर आम लोगों पर उत्पीडन को स्वीकार कैसे किया जा सकता है? पंडितों पर अन्याय को भी इसी तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह सवाल भी ऐसे ही प्रतिरोध की मांग करता है. लेकिन इसी के साथ के भी ज़रूरी है की पंडितों का मामला कश्मीर में आज़ादी की मांग से जुड़ा है और इसे उससे अलग कर के न तो बहस का विषय बनाया जा सकता है और न सुलझाया जा सकता है.
    धर्म को स्वीकार करना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता-और 'सही' धर्म किसे कहते हैं? कौन है यह? किसी भी धर्म के धर्म विधान के आधार पर शासन को स्वीकार नहीं किया जा सकता-और इसके खिलाफ आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी जानी चाहिए. कहीं भी.

    कभी कभी अपने धर्म में हो रहे गलत कामों व उनके द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का भी विरोध हो तो विरोध की कीमत बढ जाती है। अन्यथा लगता है कि अन्याय करना सही है किन्तु सहना गलत। जरा अपने सिवाय अन्य पर अन्याय के विरुद्ध भी बोलिए। देखिए बहुत से लोग साथ हो लेंगे तब भी जब अन्याय आपके साथ हो।

    असगर अली इंजिनियर के बारे में ये लाईने सही नहीं हैं. उनके जीवन का अतीत और वर्त्तमान अथक संघर्षों और इसकी प्रतिक्रया में उनके बहिष्कार के उदाहरणों से भरा पडा है. यहाँhttp://www.hinduonnet.com/fline/fl1705/17051030.htm भी नज़र डाल लें.

  7. By संदीप on April 29, 2009 at 10:58 PM

    संजय बेंगाणी जी को और कुछ बूझता नहीं, बस हर जगह ये आरएसएस की छेड़ी मुसलमानी धुन पर गाने लगते हैं।
    इन्‍होंने कहा कि सारी दुनिया इस्‍लामी आतंकवाद को झेल रही है, तो वियतनाम, अफगानिस्‍तान, इराक पर अमेरिकी हमलों, कब्‍जों को ये क्‍या कहेंगे, और रूस के जिस राजकीय पूंजीवादी कब्‍जे के खिलाफ अमेरिका ने ओसामा को डॉलर से लेकर हथियार तक की मदद की उसको क्‍या कहेंगे, अब वही ओसामा अमेरिका के सिर पर....लगा तो आतंकवाद आतंकवाद की चीख पुकार मच रही है। और बेंगाणी साहब को सेना द्वारा कश्‍मीर के आम लोगों पर किए जाने वाले जुल्‍मों की जानकारी तो होगी ही, उस पर चुप्‍पी क्‍यों। शायद उनको पता हो, इसके बारे में तमाम ब्‍लैकआउट के बाद भी मीडिया में कभी कभी खबरें आती रही हैं।

    सारी दुनिया इस्‍लामी आतंकवाद को झेल रही है, ऐसा बेंगाणी साहब कहते हैं, तो इससे यह ध्‍वनित होता है, कि मुसलमाम ही आतंकवादी होते हैं, तो जनाब लिट्टे में कौन से मुसलमान हैं, पूर्वोत्‍तर भारत में कौन से इस्‍लाम के नाम पर आतंक है, खालिस्‍तानी भी क्‍या इस्‍लामी आतंकवादी थे क्‍या, और गुजरात में जो नरसंहार हुआ वह किस मुसलमान ने किया था। छोड़ि‍ए जनाब, अब इस पर लिखा जाए तो वाकई हजारों नहीं लाखों पन्‍ने कम पड़ जाएंगे।

  8. By Jayant Chaudhary on April 30, 2009 at 9:25 AM

    जहां जहां लोगों पर जुलम हुया है वहाँ वहाँ लोगों ने विरोध किया है.
    अपर आतंकवाद से विरोध प्रदर्शन?? वोह कहाँ तक उचित है?
    मुंबई के अलावा भी तो सैकडों बोम्ब ब्लास्ट हुए हैं?
    उनमें जो निर्दोष बच्चे, बूढे, माताएं आदि मारे गए उनका क्या दोष था?

    और जो "Reyaz-ul-haque" साहेब कह रहें हैं, उसमे काश्मिरी हिन्दुओं को क्यों छोड़ दिया गया?
    अतीत के मुग़ल बादशाहों के जुल्मों को छोड़ भी दें, तो काश्मीर तो नया और हमारे सामने का ही मुद्दा है!!
    और हम क्यों भूल जाते हैं अमरनाथ विवाद को??

    आप लोग सिर्फ मुसलमानों की ही बातें क्यों करतें हैं?
    पाकिस्तान में भी हिन्दू थे (चाँद ही बचे हैं), उनमे से कोई किसी भी प्रमुख जगह नहीं पहुंचा.
    और हिन्दुस्तान में, मुसलमानों को हर जगह (राजनीति, खेल, सेना, फिल्में, गाने आदि) में स्थान मिला है..

    वोह आप लोग कितनी आसानी से भूल गए!!!!

    ~जयंत

  9. By Jayant Chaudhary on April 30, 2009 at 9:35 AM

    संदीप भाई,

    आपको सेना के बारे में खूबं पता है??
    आप उसमे थे क्या??

    पहले देह्स के लिए कुछ करो,
    काश्मीर में जान की बाजी लगाओ,
    फिर बोलना...

    सेना की ज्यादतिया??
    "और बेंगाणी साहब को सेना द्वारा कश्‍मीर के आम लोगों पर किए जाने वाले जुल्‍मों की जानकारी तो होगी ही, उस पर चुप्‍पी क्‍यों।"

    आप उन विस्थापित हिन्दुओं के बारे में कुछ नहीं कहते?
    मेरे मित्र जो कश्मीर से जान बचा कर भागे थे, मैं उनके हवाले से कह सकता हूँ क्या हुआ था..
    आप अपनी दिल्ली में छुपे बैठे रहिये..

    जहां तक पूर्वोत्तर और श्री-लंका की बात है... तो राजनीति बड़ा कारण रही है लोगों की उपेक्षा और आतंक के जनम का..
    और पूर्वोत्तर और पंजाब में जो हुआ उसमें पाकिस्तान का हाथ तगड़ा था.
    उससे आप नकार नहीं सकते..
    और यदि करते हैं तो साफ़ है की आपका झुकाव किस तरफ है.

    मैं यह नहीं कहता की मुसलमान खराब हैं या वोह धर्म आतंकवादी है.
    कैसे कहूँ यह? मेरे तो परम मित्र मुस्लिम हैं!!
    बहुत नेक और शरीफ परिवार हैं वोह..

    किन्तु यह भी तो सच है की इनके मौलवी और चंद स्वार्थी नेताओं ने बहुत जहर भरा है..
    इनके बीच..
    और आप जैसे लोग पहली उंगली आर एस एस पर उठाते हैं..

    ~जयंत

  10. By संदीप on April 30, 2009 at 10:35 AM

    जयंत भाई,


    आप इस इंटरव्‍यू को पूरा पढ़ कर इसका मर्म समझने का प्रयास करें।

    आपका यह पूछना कि मैं सेना में रहा था, बेहद हास्‍यास्‍पद प्रश्‍न है, आप पंजाब और पूर्वोत्‍तर में पाकिस्‍तान के हाथ की बात कर रहे हैं, तो क्‍या उसमें आप शामिल रहे थे.....मुझे यकीन है आप उसमें शामिल नहीं रहे होंगे, लेकिन यह आपके सवाल के जवाब था।

    कश्‍मीर के हिंदुओं पर हुए अन्‍याय को कोई भी संवेदनशील नागरिक जायज नहीं ठहरा सकता। लेकिन एक तरफ तो आप पूर्वोत्‍तर पंजाब में राजनीतिक कारणों को दोषी ठहरा रहे हैं, दूसरी तरफ प्रच्‍छन्‍न रूप से हिंदुओं के कश्‍मीर से उजड़ने का दोषी मुसलमानों को ठहरा रहे हैं। कम से कम अपने ही तर्क पर दृढ़ रहें।
    यह जानकर अच्‍छा लगा कि आपके प्रिय मित्र मुसलमान हैं और आप यह भी समझते हैं कि मुसलमानों को भड़काने का काम मुल्‍ला-मौलवी ही करते हैं। इस बात पर मैं आपसे सहमत हूं, दरअसल कट्टरपंथी चाहे हिंदू हों या मुसलमान, वे नहीं चाहते कि आतंकवाद और दंगों, गरीबी-बरोजगारी के असली कारणों को लोग समझें और उसे खत्‍म करने की दिशा में एकजुट होकर लड़ें।


    आप मध्‍ययुग के मुगल बादशाहों की बात करते हैं, तो आप ही के तर्क के अनुसार कई हिंदू राजा भी थे जिन्‍होंने हजारों बौद्ध और जैनियों को मौत के घाट उतार दिया था और उनके पूजा गृह नष्‍ट कर दिए थे। क्‍या उसका बदला आज सभी हिंदुओं को मार कर लिया जाना चाहिए। नहीं न....जयंत भाई मध्‍ययुग एक धर्मकेंद्रित समाज था और उसमें धर्म के बहाने कई तरह के अत्‍याचार हर शासक करता था, जिसे कत्‍तई जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन आज के समय में उनका बदला लेना कहां तक ठीक है।

    मैं हर तरह के कट्टरपंथ का विरोध करता हूं, उसमें संघ भी शामिल है। और न तो यह संभव हैं और न ही मैं जरूरी समझता हूं, कि जब भी आप हिंदू कट्टरपंथियों के खिलाफ कुछ कहें तो संतुलन के लिए मुसलिम कट्टरपंथियों के खिलाफ भी लिखें।

  11. By अनुनाद सिंह on April 30, 2009 at 12:39 PM

    मुझे तो इसी बात का कन्फ्यूजन हो रहा है कि असगर अली मुसलमान हैं या सेक्युलर? यदि मुसलमान हैं तो जो संस्था चलातेहैं उसमें "सेक्युलरिज्म' कैसे जुड़ा हुआ है (धोका देने के लिये?) यदि सेक्युलर हैं तो दुनिया हो "मुसलमान और काफिर" के दो समूहों के रूप में कैसे देख रहे हैं?

    रियाज-उल हक भाई! सबसे पहले मुसलमानोंको भारत के हित के लिये आन्दोलन करने के बारे में सवाल उठाना चाहिये था। वह आप कतई नहीं कर सके। इसमें आपका क्या दोष?

  12. By Aflatoon on April 30, 2009 at 1:59 PM

    असगर अली इंजीनियर साहब ने अपने सम्प्रदाय के भीतर उदारवादी धारा को मजबूत करने के आवाज बुलन्द की , कट्टरपंथियों के हमले और बहिष्कार सहा । असगर अली जैसा मुसलमान हमें पसन्द है और अनुनाद जैसा साम्प्रदायिक नहीं ।
    - अफ़लातून

  13. By PCG on April 30, 2009 at 2:58 PM

    असगर अली साहब,
    जो जुल्म मुसलमानों ने ७००-८०० साल तक इस देश पर किये, काश! हिन्दू या अन्य भी इसी लाईन पर चलते तो आज ...... ?!!!!

    खैर,
    एक हिन्दू होते हुए मैं तो कहूँगा कि असगर अली साहब की इस बात को इस तरह से लीजिये ( हिन्दुओ से कह रहा हूँ ) कि वह हमें यह सन्देश दे रहे है कि मुसलमान तुम्हारी तरह चुप नहीं बैठता जब तुम पर जुल्म हो तो लडो, शांति-शांति कहकर कुछ नहीं होने वाला, इसी शांति-शांति के चलते तो कसाब जैसे लोगो की इतनी हिम्मत हुई कि वह अपने छिड़कने के लिए इत्र मांग रहा है !

  14. By Reyaz-ul-haque on April 30, 2009 at 6:57 PM

    जयंत जी, आतंकवाद से विरोध का प्रदर्शन कौन कर रहा है? आतंकवाद को जन्म कौन दे रहा है? ओसामा को पैसे किसने दिए? इतनी बड़ी जो आतंकवाद की इंडस्ट्री खड़ी हो गयी है, उसे कहाँ से पैसे मिलते हैं? तालिबान और अल कायदा से रिश्तों के जाहिर होने के बावजूद पाकिस्तान को पैसे कौन दे रहा है? आखिर इस आतंकवाद के बने रहने और इसे बढ़ते जाने में किसका फायदा निहित है? आतंकवाद का इसलाम से अगर रिश्ता है तो गैर इसलामी देशों में जो आतंकवाद है और संगठन हैं, वे कैसे खड़े हुए हैं? कोरिया, पेरू, फिलिपीन, नेपाल, श्रीलंका यहाँ कौन मुसलमान है? जिन्हें भारत में सरकार और शासक वर्ग आतंकवादी कहते हैं-उन माओवादियों में कितने मुसलमान हैं?

    सही है, मुंबई में ही सिर्फ ब्लास्ट नहीं हुए हैं, मालेगांव और कानपूर और अजमेर और हैदराबाद में भी हुए हैं. और देखना है की किन किन जगहों के ब्लास्टों के तार भगवा खेमे से जुड़े हुए हैं-जुड़ते हैं.अपने ही देश में अपने ही लोगों पर-आम लोगों पर- बम फेंकने और उनकी जानें लेने की यह विचारधारा पता नहीं किस बेशर्मी से खुद को देशभक्त कहती है. ऐसी देशभक्ती से दूर से ही प्रणाम.

    कश्मीर, जी हाँ, यह मुद्दा है? और किसने बनाया है इसे मुद्दा? किसने रोका इसे हल करने से? कश्मीर में यह आतंकवाद क्या आदि काल से रहा है? यह तो हाल की घटना है, 1980 के दशक की. लेकिन कश्मीर का मुद्दा तो 1940 के दशक का है. तब से क्यों नहीं इसे हल किया गया? क्या इसे आतंकवाद के उभरने के लिए छोडा गया था? और पंडितों के विस्थापन का सवाल तो इसी से जुडा हुआ है. हालाँकि किसी भी तर्क से पंडितों पर विस्थापन को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन अगर कश्मीर समस्या हल कर दी जाती तो यह नौबत ही नहीं आती. अमरनाथ का प्रश्न भी भारत के इतिहास के शर्मनाक अध्यायों में से है. एक पूरे राज्य को घेर कर महीनों तक रखते हैं,उन पर ज़ुल्म करते हैं और उल्टे उन्हीं की शिकायत करते हैं? कुछ इतिहास-वर्त्तमान का पता भी है आपको?

    किसी एक या दो व्यक्ति के किसी बड़े पद पर पहुँच जाने को क्या पूरे समुदाय की उन्नति का पैमान माना जा सकता है?आप मानिए, आपको यह मुबारक हो. मैं इसे नहीं मानता और न यह कोई वैज्ञानिक तरीका ही है. इसके अलावा जिन क्षेत्रों का अपने ज़िक्र किया है, उनमे पहुँचानेवालों की पहचान एक मुसलमान होने तक सीमित कर देना हास्यास्पद है. साथ ही वे अपने प्रतिभा से वहां पहुंचे, किसी सरकार की मेहरबान से नहीं. दूसरे देशों में भे ऐसे अनेक उदहारण है (जिन देशों का आप ज़िक्र कर रहे हैं उनमें भी) जहाँ प्रतिभाएं किसी धर्म की जागीर नहीं रही हैं.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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