हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

क्यों, कोई कुछ भी बोल जाता है?

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/21/2009 07:47:00 PM


वरुण गाँधी इसी संसदीय व्यवस्था की उपज हैं-हम इस मुद्दे को इसी तरह देखते हैं. यहाँ पार्टियों के बीच कोई अन्तर नहीं है। सज्जन, टाइटलर, बुद्धदेव, मोदी, संजय गांधी, आडवाणी...इनमें पार्टियों का भेद कहाँ है? सब एक से हैं और उन्हें यह तंत्र स्पेस देता है। हत्यारे, अपराधी, घोटालेबाज, मोनाफखोर, अय्याश, तस्कर, दलाल, गुंडे, बलात्कारी...सब चुनावों की गंगा में नहा कर 'पवित्र' होते हैं और देश का 'भविष्य तय करते' हैं। और यही गंगानहान चल रहा है। वरुण गांधी नहान के तैयारियों में अपनी गलाज़त के उल्टी कर चुके। यह हमारा नज़रिया है...
एक नज़रिया एक वरिष्ठ कानूनविद एजी नूरानी का भी है।

क्यों, कोई कुछ भी बोल जाता है?


एजी नूरानी

रुण गांधी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 के तहत कारावास की सजा दी गयी. इस विवेकपूर्ण और राजनीतिक जजमेंट को लेकर अलग-अलग अवधारणाएं हो सकती हैं. नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगडिया ने अब तक जो भी भाषण दिये हैं, उसकी तुलना में वरुण का भाषण ज्यादा भडकाऊ और सोचा-समझा था. यह बात अपने में बहुत कुछ कह रहा है. उनकी शिक्षा विदेश में हुई. उनकी कोई विचारधारा नहीं है और न ही वे कोई वैचारिक कार्यकर्ता हैं, जिन्हें ऐसी गलती के लिए माफ कर देना चाहिए. उनका भाषण हिंसात्मक था, जिसे सांप्रदायिक घृणा के साथ जोड दिया गया.
जनता पार्टी सरकार ने ऐसे मामलों को रोकने के लिए एक कारावास संबंधित कानून पास करने का प्रयास किया था. इस कानून के सबसे बडे पैरोकार तत्कालीन गृह मंत्री चरण सिंह और कानून मंत्री शांतिभूषण थे. वहीं शांतिभूषण, जो भाजपा में कुछ दिन राजनीति करने के बाद आजकल मानवाधिकार के संरक्षक बने हुए हैं. इस बिल पर राम जेठमलानी ने विरोध जताया. उनके विरोध ने बवाल खडा कर दिया. इसी संदर्भ में मीसा पर दुबारा सुनवाई की गयी, लेकिन कारावास संबंधी कानून पास नहीं हो पाया. आपराधिक प्रक्रियाओं को रोकने के लिए चौधरी चरण सिंह और शांतिभूषण का कानून हमेशा के लिए कानून बनना था. भारत ऐसे कानूनों के बगैर भी रह सकता है.
इंदिरा गांधी 1980 में सत्ता में आयीं. उन्होंने रासुका, 1980 को पास किया. उस वक्त मेनका गांधी राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों अर्थों में उसी इंदिरा परिवार की सदस्य थी. पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां रासुका जैसे कानूनों के अंतर्गत कारावास का प्रावधान है. संविधान सभा में बीआर आंबेडकर इस कानून को पेश कर रहे थे. उस वक्त महावीर त्यागी ने उन्हें चेताया था, ऐसा न हो कि एक दिन आपको भी जेल जाना पडे. लेकिन हमें मीसा और रासुका के संरक्षकों पर फब्तियां नहीं कसनी चाहिए. इस विषय को सिद्धांतों के सवाल के साथ जोड कर देखा जाना चाहिए. रासुका, 1980 केंद्र और राज्य सरकारों को यह अधिकार देता है कि अगर कोई व्यक्ति सामाजिक सौहार्द के साथ खिलवाड करता है, तो उसे रोकने के लिए जेल भेजा जा सकता है. सरकार को यह कदम उठाने से पहले सुनिश्चित कर लेना होता है कि ऐसा करना जरूरी है. गिरफ्तारी के पीछे आधार क्या है, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए. इसके लिए गठित एक एडवाइजरी बोर्ड इसकी जांच करेगी. बंदी चाहे तो सजा के खिलाफ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है. वरुण ऐसे भाषण एक बार से ज्यादा न दें, इसके लिए उन्हें जेल में डालना जरूरी था. अगर स्वतंत्र छोड दिया जाता, तो क्या वे सामाजिक सौहार्द को नहीं बिगाडते?

रासुका का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट के अधीन है, जिसमें राज्य सरकार को अपने आरोपों के सहयोग में कागजात पेश करने हैं. लेकिन इससे संबंधित बहुत सारे सवाल हैं, जिनका विवरण पेश किया जाना चाहिए. समाज में घृणा न फैले, इसके लिए राज्य सरकार को ऐसे आपत्तिजनक कानून क्यों लागू करने पडे? इसका जवाब आसान है. कानून की दृष्टि से देखें, तो यह कानून सक्षम है. लेकिन सरकार की अक्षमता और कानून अनुपालन में पक्षपात के रवैये ने इसे निष्प्रभावी बना दिया है. यही वजह है, जिसके कारण बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे लोग स्वतंत्र घूम रहे हैं. राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ जो विषवमन किया, वह किसी भी सांप्रदायिक घृणा से कम नहीं था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट भी उतना ही दोषी है. आधुनिक समाज के सभी लोग इस बात से वाकिफ हैं कि हिंदुत्व शब्द का ईजाद वीडी सावरकर ने 1924 में किया था. उसका हिंदू-वाद से कोई लेना-देना नहीं था. हिंदू-वाद की बात उस आदमी ने उठायी, जो एक नास्तिक था. ऐसे ही चुनावी अभियान से जुडा एक हिंदुत्व का मामला 1995 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था. इसमें जस्टिस जेएस वर्मा ने एक चौंकाने वाला जजमेंट दिया था. उनका कहना था कि साधारण रूप में हिंदुत्व को जिंदगी का एक रास्ता समझ लिया जाता है. गहराई से सोच कर इसे हिंदूवादी कट्टरता के साथ नहीं जोडा जाना चाहिए. 1993 में जेएस वर्मा ने सेकुलरवाद को संविधान की आधारभूत विशेषता मानने से इंकार कर दिया. रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951 की धारा 123(3) के अनुसार वैसे प्रत्याशियों को चुनाव से रोका जा सकता है, जो धर्म के आधार पर वोट मांगते हों. इसके अधीन कार्रवाई हो सकती है या नहीं, यह मामला 13 सालों से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. कोर्ट के पास इस पर बहस करने का समय नहीं है. 28 जुलाई 1993 को संसद में धर्म को राजनीति से दूर रखने संबंधी में दो बिल लाये गये. इन दोनों बिल का विरोध करने में जॉर्ज फर्नांडिस सबसे आगे थे, जो आगे चल कर भाजपा के साथ हो लिये. वह प्रयास सफल नहीं हो पाया. लेकिन आज जो कानून है, वह भी प्रभाव दिखाने में सक्षम है. आज ऐसा कानून है, जो ऐसे संगठनों, जो कि गैर कानूनी कार्यों में संलग्न हैं, उन पर पाबंदी लगाता है. इसे हम 1967 के गैर कानूनी गतिविधियों के रोकथाम करनेवाले कानून के रूप में जानते हैं और इसे अलगाववाद पर रोक लगानेवाले कानून के रूप में भी जाना जाता है. लेकिन बाद में इसे क्रिमिनल लॉ एक्ट, 1972 के द्वारा संशोधित कर दिया गया. इसके अंतर्गत किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा अगर कोई सांप्रदायिक दुष्प्रचार फैलाया जाता है, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जायेगी. ऐसा ही प्रावधान आइपीसी की धारा 153-ए और 153-बी में दिया गया. धारा 153-ए को 1969 में आपराधिक एवं चुनाव कानून को भी भारतीय संहिता में सुधार करते हुए जोडा गया. इसके अनुसार धर्म, जन्मस्थान, आवास, भाषा, जाति या संप्रदाय के नाम पर समाज में विभिन्न धर्मों के बीच किसी भी प्रकार की घृणा या अनेकता की बात फैलाना एक अपराध है. धारा 153-बी अनलॉफुल एक्टिविटिज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1967 के अनुसार अगर कोई संगठन आइपीसी की धारा 153-ए और 153-बी का उल्लंघन करता है, तो उसे प्रतिबंधित किया जा सकता है. जिस व्यक्ति पर इस कानून के तहत आरोप लगता है, उसे गिरफ्तार भी किया जा सकता है. अमेरिका और ब्रिटेन के समाजों में वंशानुगत पूर्वाग्रहों के बावजूद भडकाऊ भाषण देने पर सख्त पाबंदी है. 1952 में वहां के कोर्ट ने एक धार्मिक संगठन के खिलाफ आपराधिक सजा सुनाई थी. इस सुनवाई के दौरान जज ने कहा था कि एक संगठन या प्रतिनिधि के रूप में ऐसे भाषण का उपयोग करना जो जातिगत या धार्मिक उन्माद फैला सकता है, एक बहुत बडे अपराध को जन्म देता है. एक जनप्रतिनिधि अगर लोगों के समक्ष ऐसे भाषण का उपयोग करता है, जिन लोगों पर उसका प्रभाव ज्यादा है, तो इससे बडा अपराध कुछ हो ही नहीं सकता. किसी काले व्यक्ति द्वारा नस्ल संबंधी फब्ती कसने पर त्वरित कार्रवाई का प्रावधान किया गया. ऐसा कानून अमेरिका में है. लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं, तभी तो वरुण गांधी और उनके जैसे लोग कुछ भी बोलने के लिए स्वतंत्र है.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ क्यों, कोई कुछ भी बोल जाता है? ”

  2. By Ravi on April 21, 2009 at 9:00 PM

    एजी नूरानी के एकपक्षीय और दुर्भावनापूर्ण नजरिये को पढ़कर मैं भी यही कह रहा हूं

    "क्यों, कोई कुछ भी बोल जाता है?"

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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