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बीच सफ़हे की लड़ाई

फिर से हिंद स्वराज

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/28/2009 04:46:00 PM

हिंद स्वराज ने अपने 100 वर्ष पूरे किये. इस छोटी सी पुस्तक पर कनक तिवारी ने एक किताब लिखी है. प्रस्तुत हैं इसके कुछ अंश. हिंद स्वराज पर एक व्यापक बहस की शुरुआत हम इस पोस्ट से कर रहे हैं.

कनक तिवारी


'हिन्द स्वराज' की भाषा में नैतिक स्पंदन होने के कारण उसमें वह वस्तुपरक तर्कमयता तो नहीं है जो इस तरह के राजनीतिक ड्राट में होनी चाहिए थी। गांधी ने सामाजिक विज्ञान की प्रचलित और उपलब्ध मान्यताओं को संषोधित, तिरस्कृत या स्वीकृत करते हुए कोई समाजशास्त्रीय दस्तावेज इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। उसका नैतिक, दार्षनिक और धार्मिक पक्ष एक प्रबल तर्क के रूप में गूंजता रहता है। अलग अलग परिस्थितियों और अलग अलग बानगियों के बावजूद अपने देष में राजनीतिक क्रांति करने के मकसद से 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' में भी ऐसी ही अजान दी गई थी, भले ही कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो को बेहतर वैज्ञानिक वृत्ति का तार्किक दस्तावेज समझा जाए। दोनों ऐतिहासिक दस्तावेजों को परिपक्व बुद्धि के सक्रिय मस्तिष्कों ने लिखा था। दोनों ने ऐसी दुनिया का खाका खींचा था कि यदि उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जाए तो वह तो बरबाद होने पर तुली थी। मार्क्स के लिए पूंजीवादी व्यवस्था अभियुक्त थी, इतिहास न्यायाधीश था और उनसे पीड़ित मुअक्किल सर्वहारा वर्ग। गांधी के लिए भौतिकता की तृष्णा अभियुक्त थी, उससे मुक्त होने वाला व्यक्ति निर्णायक था और मुअक्किल नैतिक विधिशास्त्र था। गांधी आधुनिक सभ्यता की बीमारी का कारण तॉल्स्तॉय की तरह नैतिकता का अभाव समझते थे और मार्क्स की तरह उन्होंने उसके पतन की भविष्यवाणी की थी। उनके लेखे आधुनिक सभ्यता मनुष्य के नैतिक विकास के रास्ते का रोड़ा है। इसके बावजूद गांधी का दृढ़ विष्वास था कि यह सभ्यता लाइलाज नहीं है क्योंकि लोग अब भी निर्मल हृदय के हैं और उन सबका चिंतन अनैतिक नहीं है। यह सभ्यता भले ही आत्महंता हो लेकिन समाज में ऐसे साहसी और संवेदनशील व्यक्तियों के होने पर यदि इस सभ्यता के दुर्गुणों को बीन कर अलग किया जाए तो मनुष्य के विकास की एक नई कथा लिखी जा सकती है।

प्रथम विश्वयुद्ध के पहले ब्रिटेन अपने राजनीतिक उत्कर्ष पर था। तब गांधी वहां कानून के विद्यार्थी की हैसियत से पढ़ रहे थे। बाद में उन्हें दक्षिण अफ्रीका अर्थात भारत की तरह ही एक गुलाम देश में जिंदगी की जद्दोजहद शुरू करनी पड़ी। ब्रिटेन की औद्योगिक, व्यापारिक, सैन्य और सांस्कृतिक शक्ति को आधुनिक सभ्यता का न्यूक्लियस समझ लिया गया था। जब खामोष अदालत जारी है की तर्ज पर गांधी पानी के जहाज पर बैठे अठारह दिनी महाभारत की तरह 'हिन्द स्वराज' के अध्याय दर अध्याय लिखे चले जा रहे थे, तब पश्चिमी सभ्यता का प्रतीक ब्रिटेन पूरी दुनिया के इतिहास के अहसास के रैम्प पर एक शाश्वत मॉडल बना इठला और इतरा रहा था। उसे इस बात का गर्व था कि न केवल उसका सूरज पूरी दुनिया में नहीं डूबता है बल्कि वह सभी तरह की बौद्धिक समझ के समुच्चय का विश्वविद्यालय भी बन चुका है। पदार्थिक सभ्यता को इतना बड़ा घमंड शायद इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। यह इंग्लैंड था जिसके विचार, रहन सहन, सलीका, ज्ञान-विज्ञान, फौजें, सेवाएं और उत्पाद सारी दुनिया में ठुंसे हुए थे। इस पूरे जगमग माहौल में लगभग चालीस वर्ष का एक भारतीय नवयुवक ऐसा पलीता लगा रहा था कि वह पूरा तथाकथित सभ्य महल एक जीर्ण शीर्ण जलसा घर की तरह उसकी दिव्य दृष्टि को दिखाई देने लगा था। 'किल्डोनन कैसल' नाम के जहाज पर बैठे उस नवयुवक वकील की आत्मा तक को आधुनिक सभ्यता का दंश क्षत विक्षत कर रहा था। इसके बावजूद उसने उस पूरी सभ्यता का तिरस्कार करने के साथ साथ नैतिक समझ का एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करने के अपने ऐतिहासिक दाय से मुंह नहीं चुराया। आशीष नंदी के शब्दों में गांधी ने अपने 'आत्मीय शत्रु' से स्वयं को मुक्त कर लिया था। वह उन सभी शिक्षित भारतीयों से बिल्कुल अलग था जिन्हें यह भ्रम था कि औपनिवेशिक आधुनिकता उन सबके जेहन में उन्हें उपकृत करने के लिए बैठ गई है। इन कथित शिक्षित भारतीयों में गांधी के घोषित गुरु गोपाल कृष्ण गोखले और उनके शिष्य जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। उन दोनों की दृष्टि में गांधी की यह कृति लगभग बकवास और अचानक काल कवलित होने की स्थिति में थी। गोखले तो पहले ही काल कवलित हो गए लेकिन नेहरू की बेटी के प्रधानमंत्री काल में जब जवाहरलाल की नीतियों का दरकना यानी काल कवलित होना षुरू हुआ तब गांधी के 'हिन्द स्वराज' की प्रासंगिकता और स्वीकार्यता भारतीय इतिहास में उभर उभर आई।
'हिन्द स्वराज' का मूल पाठक वर्ग कई तरह के समाजों में विभक्त रहा है। ऊपरी तौर पर यह पुस्तक इंग्लैंड में ही निर्वासित भारतीयों को संबोधित है जो आतंकवाद और हिंसा में विष्वास करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम और नरम दल घटकों को भी एक साथ संबोधित है और साथ साथ बल्कि ज्यादा पूरी अंग्रेज कौम और पश्चिमी सभ्यता को। भारतीय राष्ट्र की गांधी की समझ उन सभी के सन्दर्भ में रही है जो किसी भी धर्म, भाषा, क्षेत्र या मत मतांतर के रहे हों। इसके अतिरिक्त डॉक्टरों, इंजीनियरों, उद्योगपतियों और वकीलों वगैरह का जो (उच्च) मध्यवर्ग पनप रहा था, वह भी गांधी की जिज्ञासा के केन्द्र में रहा है। 'अंगरेज' शब्द से उनका आशय उन सभी अंगरेजों से रहा है जो इंग्लैंड या भारत में सत्ता प्रतिष्ठान के अंग के रूप में रह रहे हों। जैसे चूल्हे की आग पर बटलोही में अदहन चुरता है, उसी तरह गांधी के मस्तिष्क में कई मुद्दे वर्षों से खदबदा रहे थे। इस पुस्तक के लिखने के एक महीने पहले गांधी ने अपने मित्र हेनरी पोलक को लिखा था-'इसलिए मैं महसूस करता हूं कि मैं आपसे यह बिल्कुल नहीं छिपाऊं कि मैंने मानसिक तौर पर कौन से प्रगतिशील कदमों को उठाने का संकल्प किया है...हालांकि वे सभी विचार नए नहीं हैं लेकिन इन विचारों ने अब एक नया रूप लेकर मेरे मस्तिष्क पर जबरिया कब्जा कर लिया है।' प्रस्तावना में भी गांधी ने हड़बड़ी में लिखी इस कृति को लेकर यही खुलासा किया है- 'मैंने यह किताब इसलिए लिखी क्योंकि मैं अपने आपको रोक ही नहीं सकता था।' वर्षों बाद भी गांधी ने दुबारा यही बात कही- जिस तरह कोई व्यक्ति उन बातों को बताए बिना नहीं रह सकता जो उसके हृदय में भर गई हों, इसी तरह मैं भी इस पुस्तक को लिखे बिना नहीं रह सका क्योंकि वे बातें मेरे हृदय में लबालब भर गई थीं।

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ फिर से हिंद स्वराज ”

  2. By BHARTIYA on June 2, 2009 at 4:35 PM

    Kanak tiwari ji ka email mil sakta hai kya

  3. By सोनू on January 13, 2010 at 3:46 PM

    हिंद स्वराज किताब इधर है--

    http://www.bhartiyapaksha.com/?cat=259

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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