हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भागीदारी नहीं, व्यवस्था परिवर्तन में है मुक्ति

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/24/2009 07:42:00 PM

कुछ दलित विचारक डाइवर्सिटी के अमेरिकी सिद्धांत की बात करते हैं तथा निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग करनेवाले कुछ दलित नेता अमेरिका की प्रसंशा में लगे हुए है. चंद्रभान जैसे तथाकथित दलित विचारक पूंजीवादी व्यवस्था में ही दलितों का उत्थान देखते हैं. उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि देश में साम्राज्यवादी वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की जो प्रक्रिया चल रही है , वह सही है और उसे रोकने की जरूरत नहीं है. वे केवल इतना ही चाहते हैं कि इस नयी व्यवस्था में कुछ हिस्सा दलितों को भी मिल जाये. निस्संदेह यह हिस्सा 25 करोड दलितों के लिए नहीं, बल्कि उन दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए है , जो भ्रष्ट साधनों से धन कुबेर बन गये हैं. ये दलित धन कुबेर ही निजी कंपनियों में ठेके प्राप्त कर सकते हैं और ये ही इन कंपनियों में नौकरी पाने लायक उच्चतम शिक्षा अपने बच्चों को दिलाने की क्षमता रखते है. इस व्यवस्था में 95 प्रतिशत गरीब दलित कहां आते हैं , जो रोज कमाते और खाते हैं तथा एक पूर्ण नागरिक का हक पाने के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं और जूझ रहे हैं.
आज की इस दिग्भ्रमित दलित राजनीति और दलित चिंतन के खतरनाक भटकाव में यह विचार करना लाजिमी लगता है कि दलित समाज का हित सिर्फ जातिवाद पर आधारित भागीदारी आंदोलन में नहीं, और न सिर्फ आरक्षण में है, बल्कि समग्र दलित समाज का हित शोषण पर आधारित, इस व्यवस्था को बदलने में है.



डॉ रमाशंकर आर्य

जादी के बाद दलित उत्थान के लिए लगातार कठोर कानून बनाये गये और उनके आर्थिक विकास के लिए कई योजनाएं भी बनायी गयीं. दलितों को शीघ्र न्याय मिल सके, इसके लिए भी विशेष न्यायालय तक गठित किये गये, जिनमें गवाहों के आने-जाने तथा उनकी दैनिक मजदूरी की क्षतिपूर्ति की भी व्यवस्था की गयी, लेकिन इन तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद दलितों का पर्याप्त उत्थान या विकास नहीं हो पाया . उन्हें समाज की मुख्यधारा से भी नहीं जोडा जा सका. उनका शोषण होता रहा. उन पर दमन और अत्याचार भी होते रहे.
देश की दलित समस्या को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों के चिंतकों, विचारकों तथा समाजशस्त्रियों की अलग-अलग राय जरूर देखी जाती है, लेकिन संपूर्णता में विचार करने पर यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है कि दलित समस्या केवल राजनीतिक या प्रशासनिक कदम उठाने से ही हल होनेवाली नहीं है. यह समस्या मूलतः एक सामाजिक समस्या है. इसे सामाजिक सुधार के द्वारा ही सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए. देश का कोई भी कानून किसी सवर्ण को किसी दलित के साथ बैठ कर खाना खाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. यह सब वैचारिक परिवर्तन या सामाजिक बदलाव से ही संभव है, जिसके लिए आजादी के बाद शायद ही प्रयास किया गया. समाज में व्याप्त जातिवाद की जडता, ब्राह्मणवादी और वर्चस्ववादी सामंती सोच या फिर लोगों में व्याप्त श्रेष्ठ या नीच का बोध सामाजिक परिर्वतन को रोकता रहा है. फलतः सदियों से चली आ रही वर्ण एवं जाति व्यवस्था की सामाजिक बीमारी जीवित है, जिसे बहुत पहले ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए था. इस सामाजिक बीमारी के चलते समाज में समानता , स्वतंत्रता, बंधुता, प्रेम, दया और भाईचारे की भावना का विकास नहीं हो पाया. ये सारे मानवीय मूल्य अपने देश में केवल कागजी बन कर रह गये.

महात्मा फुले, पेरियार और डॉ आंबेडकर ने देश की इस समस्या को ठीक से समझा था और भारतीय समाज को इस बीमारी से मुक्ति दिलाने के लिए ये तीनों सामाजिक विचारक सामाजिक समता की लडाई आजीवन लडते रहे. निस्संदेह इन तीनों विचारकों ने वर्ण और जाति का दंश झेला था, इसलिए अपने समाज को इससे मुक्ति दिलाने के लिए ये आजीवन प्रयत्नशील रहे. डॉ आंबेडकर के जीवन की पहली पुस्तक जाति प्रथा का उन्मूलन में जातिवाद के जहर को समाप्त करने तथा सामाजिक विषमता दूर करने के लिए जिन तर्कों को प्रस्तुत किया है, उनके सामने बडे जातिवादी भी निरुत्तर हो जाते हैं. जातिवाद से लाभ उठानेवाले देश के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग अक्सर जातिवाद उन्मूलन के मामले पर चुप हो जाते हैं, लेकिन बुद्धिजीवी होने के नाते उनसे यह अपेक्षा जरूर की जाती है कि वे निष्पक्ष हो कर समाज को सही दिशा देने के लिए आगे आयें और जातिवाद जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठायें, लेकिन हमारे देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने शायद ही इस दिशा में ईमानदार पहल की. डॉ आंबेडकर ने देश के बुद्धिजीवियों की इस भूमिका पर आश्चर्य व्यक्त किया था और कहा भी था कि हमारे देश के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग अंदर से निष्पक्ष और ईमानदार नहीं है. उनके अनुसार दुर्भाग्य की बात है कि देश में आजादी के पहले सामाजिक सुधार के जो थोडे आंदोलन चल रहे थे, आजादी मिलने के साथ ही वे सभी आंदोलन या तो समाप्त हो गये (या कर दिये गये) या फिर उनकी दिशा ही बदल दी गयी. फलतः समाज सुधार का काम देश में अधूरा रह गया और सामाजिक विसंगतियां अपनी जगह पर जस-की- तक बनी रह गयीं. देश की राजनीतिक आजादी का मतलब यहां के देश संचालकों ने सभी तरह की समस्याओं से मुक्ति पाना मान लिया था.

आजादी के बाद प्रजातंत्रिक व्यवस्था में विश्वास करनेवाली कोई भी सरकार अपने नागरिकों के लिए कल्याणकारी योजना घोषित करती है. ऐसी घोषणा उसकी राजनीतिक मजबूरी हुआ करती है. चूंकि प्रजातंत्र में प्रत्येक आदमी के वोट की कीमत बराबर है , इसलिए ऐसा करना लाजिमी है. आजादी के बाद देश में जिस तरह की राजनीतिक व्यवस्था कायम हुई, उसमें सभी राजनीतिज्ञ सत्ता की ओर देखते रहे. वोट खींचने की जुगत भिडाते रहे. उन्हें सामाजिक परिवर्तन या किसी तरह के सामाजिक बदलाव से कोई मतलब नहीं था. फुले, पेरियार और डॉ आंबेडकर जैसे नेताओं के सामाजिक परिवर्तन की लडाई को एक तरह से नकार दिया गया. इनकी जगह दलित वर्ग से ही सत्ता सुख भोगनेवाले कुछ लोगों को खडा कर दिया गया, जिनका लक्ष्य दलित नेतृत्व के नाम पर सत्ता सुख भोगना तथा सत्ता सुखवादियों का साथ देना था. इनके कुटिल वाग्जाल में लंबे समय तक दलित वर्ग उलझा रहा और अपनी भौतिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा करता रहा. मगर दलित समाज की यह प्रतीक्षा एक अंतहीन मृग मरीचिका ही साबित हुई. समाज में दलितों का दोहन, शोषण एवं अत्याचार बदस्तूर जारी रहा और सामाजिक भेद-भाव भी पूर्ववत चलते रहे.

आजादी के बाद साठ-सत्तर के दशक में दलितों के बीच राजनीतिक चेतना का उभार देखा जाता है. निस्संदेह शिक्षा और संवैधानिक सुविधाओं ने इस चेतना के उभार में सकारात्मक भूमिका निभायी थी. निश्चित रूप से इसमें दलितों के लिए दिया गया आरक्षण भी शामिल था. दलितों को लुभाने, तथा उनके वोट बैंक पर कब्जा जमाये रखने के एक मजबूत हथियार के रूप में आरक्षण को कांग्रेसी सहित कई पार्टियों ने इस्तेमाल किया और आरक्षण के नाम पर दलितों का वोट अपने पक्ष में करते रहे. दलित समाज में पर्याप्त शिक्षा न होने के चलते लंबे समय तक यह आरक्षण लगभग बेमानी बना रहा और आज भी लगभग वही स्थिति है.

देश के नागरिकों को शिक्षित करने सहित दलितों को शिक्षित करने के नाम पर सरकारी स्कूल जरूर खोले गये , मगर उसी के समकक्ष गैरसरकारी (प्राइवेट) स्कूलों की भी लंबी कतार खडी की जाती रही. देश में स्पष्ट और समान शिक्षा नीति न होने के कारण यहां दो तरह के नागरिक बनाये जाते रहे. अमीर के बच्चे अलग नागरिक, तो गरीब के बच्चे अलग. गैर सरकारी स्कूलों से पढनेवाले संभ्रांत और कुलीन परिवार के बच्चों के साथ दलित और कमजोर वर्ग के सरकारी स्कूलों से पढे-लिखे बच्चों की तुलना और मेधा स्पर्धा की बात भी की जाती रही. यह दोहरा सोच और दोहरी शिक्षा व्यवस्था आज भी चल रही है, बल्कि पहले की अपेक्षा और अधिक बढ गयी है. इस तरह की शिक्षा व्यवस्था में हम कैसे समानता, एकता और भाईचारे की बात कर सकते हैं. पुनः सुनियोजित तरीके से शिक्षा व्यवस्था को प्राइवेट और महंगा बना कर दलित व कमजोर वर्ग को इससे वंचित रखने की साजिश की जा रही है. इस बात को आज स्पष्ट रूप से कई समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों तथा मीडियावालों ने भी चिह्नित करने का काम किया है, लेकिन समाज का सत्ताधारी वर्ग इन्हें एकदम अनसुना करता रहा है.

आजादी के बाद अस्सी और नब्बे के दशकों में देश अंदर दलितों की राजनीति तीन रूपों में अपनी पहचान बनाती नजर आती है. दलित राजनीति की एक धारा संघर्ष करती हुई दिखती है, तो दूसरी धारा समझौतावादी रास्ता अख्तियार कर दलित हित की वकालत करती है. तीसरी धारा है राजनीतिक सौदेबाजी की . पहली धारा का नेतृत्व वाम मार्गियों द्वारा किया जाता रहा है , तो दूसरी धार में कांग्रेस, भाजपा, लोजपा, सपा सहित दक्षिण भारत की अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियां रही हैं. तीसरी धारा की राजनीति करनेवाली एक मात्र पार्टी बहुजन समाज पार्टी है , जिसने शुरुआत तो बहुत अच्छी की थी, लेकिन सत्ता की सौदेबाजी करने के चलते लगातार अपनी सैद्धांतिक विश्वसनीयता खोती जा रही है. मान्यवर कांशी राम जी की अथक मेहनत से तैयार की गयी राजनीतिक जमीन की फसल काटनेवाली दलित नेता मायावती जी को नोयडा, लखनऊ, गाजीयाबाद और दिल्ली में लगभग एक अरब की संपत्ति खडी करने में और लखनऊ में ही परिवर्तन चौक सहित आंबेडकर उद्यान बनाने में उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य के कोष से अरबों रुपये फूंक देने में ही दलित उत्थान नजर आता है. इस दलित महिला ने एक बार भी नहीं सोचा कि इतनी जमीन पर यदि उद्यान की जगह कोई कॉलेज, हॉस्पीटल या टेक्नीकल संस्थान बना दिया जाता और उसमें दलित छात्रों के लिए 50 प्रतिशत निःशुल्क सीटें आरक्षित कर दी जातीं, तो देश के दलितों का बहुत कितना बडा उपकार होता. ऐसा करके बहन मायावती जी सही अर्थों में डॉ आंबेडकर के सपनों को साकार कर पातीं, लेकिन ऐसा न करके उन्होंने दलित राजनीति को भटकाया है और दलित समाज को निराश ही किया है.
आज यह सभी स्वीकार करते हैं कि डॉ आंबेडकर के ईमानदार नेतृत्व ने दलित संघर्ष को सफल बनाया था. दलितों के दुश्मन के रूप में उन्होंने ब्राह्मणवाद तथा पूंजीवाद को चिह्नित किया था, लेकिन दुर्भाग्य है कि मायावती जैसी दलित राजनीतिज्ञ ने दलितों के उन्हीं शत्रुओं के हित में काम करना शुरू कर दिया . डॉ आंबेडकर ने यह जरूर प्रयास किया था कि दलित समाज एक राजनीतिक शाक्ति रूप में उभरे और समान विचार रखनेवालों से मिल कर सामाजिक एवं राजनीतिक लडाई लडे. उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों से मिल कर अपनी राजनीतिक महत्वकांझा पूरी करनेवालों से दूरी बनाये रखने की भी बात कही थी, लेकिन आज मायावती सरीखी राजनीतिज्ञ आंबेडकर की इस बात को भूल कर देश की जनता को और दलित जनसमुदाय को धोखा दे रही हैं. प्रसिद्ध दलित चिंतक श्री कवंल भारती के अनुसार डॉ आंबेडकर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद का खात्मा चाहते थे, सामंती अवशेषों का उन्मूलन चाहते थे और अन्याय पर आधारित व्यवस्था की जगह न्याय पर आधारित व्यवस्था चाहते थे. वे शोषक वर्ग के खिलाफ शोषित वर्ग का संघर्ष चाहते थे. इसीलिए वे चाहते थे कि देश का नेतृत्व श्रमिक वर्ग करे, लेकिन दलितों में जो मध्य वर्ग विकसति हुआ, वह अवसरवादी साबित हुआ. उसने अपने लाभ के लिए डॉ आंबेडकर के सिद्धांतों को ही उलट-पलट दिया. उसने अपने हिसाब से डॉ आंबेडकर के दर्शन गढे, जिनमें वे समाजवाद-विरोधी और जातिवादी नजर आते हैं. इन मध्यवर्गीय दलित बुद्धिजीवियों ने डॉ आंबेडकर को संसार का महान विद्वान, संविधान निर्माता और बोधिसत्व के विशेषणों तक सीमित कर दिया. व्यवस्था-परिवर्तन की उनकी क्रांति चेतना को इन नये चिंतकों ने दफन कर दिया. अब इनमें कई नेता भागीदारी आंदोलन चला रहे हैं और अपनी-अपनी जाति का नेता बने हुए हैं. कोई विश्व हिंदू परिषद की तरह पूरे भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के तर्ज पर बौद्ध राष्ट्र बनाने के लिए दीक्षा-कार्यक्रम करा रहा है , तो कोई अमेरिका का गुणगान कर डाइवर्सिटी की वकालत कर रहा है और भारत में उसे लागू करने की मांग कर रहा है. कोई इसी के आधार पर निजी क्षेत्र में आरक्षण मांग रहा है. कोई सत्ता परिर्वतन से ज्यादा दलित -मुसलिम एकता को समझ रहा है. यह है मौजूदा दलित चेतना की स्थिति, जो अपनी ढपली , अपन राग पर आधारित है.

हाल के वर्षों में दलित नेताओं द्वारा भागीदारी आंदोलन चला कर आंबेडकरवाद को एक तरह से दफनाने की साजिश चल रही है. आज बिहार में जितनी दलित जातियां है, उतनी ही भागीदारी आंदोलन चल रहे हैं. आंदोलन ने बिहार में दलित और महादलित को जन्म दिया है . कोई यह कह रहा है कि मेहतर, मुसहर, और भंगी समाज को भागीदारी नहीं दी जा रही है. कोई यह कह रहा है कि सत्ता में पासियों की उपेक्षा हो रही है. कोई धोबी समाज की भागीदार मांग रहा है, तो कोई चमार और दुसाध समाज की भागीदारी के लिए संघर्ष कर रहा है. जितनी जिनकी संख्या भारी है, उतनी वह हिस्सेदारी की बात कर रहा है. इस तरह डॉ आंबेडकर की जाति उन्मूलन की सोच तथा स्वस्थ समाज के निर्माण की कल्पना इस भागीदारी विमर्श में अंतिम सांस ले रही है. आज यह समझना मुश्किल है कि जाति का विनाश व्यवस्था परिवर्तन में है या जाति आधारित भागीदारी की व्यवस्था में है. उपरोक्त भागीदारी आंदोलन का अर्थ है गरीब को लडाना और लूट की संस्कृति को विकसित करना. मेहतर समाज सोच रहा है कि आरक्षण का सारा सुख चमार, दुसाध और धाबी भोग रहे हैं. आरक्षण का लाभ मेहतर और मुसहर समाज को मिलना चाहिए. इस भागीदारी आंदोलन ने दलित जातियों को एक - दूसरे के विरुद्ध खडा करने का काम किया है. वास्तविक लडाई गौण हो गयी है. गैरजरूरी और अनावश्यक मुे उछाले जा रहे हैं. शोषक के खिलाफ शोषण की लडाई ठंडी पड गयी है और गरीब से गरीब की लडाई शुरू हो गयी है. निस्संदेह यह भटकाव की स्थिति है और दलित आंदोलन को निष्क्रिय एवं निष्प्रभावी बनाने की राजनीति है.

कुछ दलित विचारक डाइवर्सिटी के अमेरिकी सिद्धांत की बात करते हैं तथा निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग करनेवाले कुछ दलित नेता अमेरिका की प्रसंशा में लगे हुए है. चंद्रभान जैसे तथाकथित दलित विचारक पूंजीवादी व्यवस्था में ही दलितों का उत्थान देखते हैं. उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि देश में साम्राज्यवादी वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की जो प्रक्रिया चल रही है , वह सही है और उसे रोकने की जरूरत नहीं है. वे केवल इतना ही चाहते हैं कि इस नयी व्यवस्था में कुछ हिस्सा दलितों को भी मिल जाये. निस्संदेह यह हिस्सा 25 करोड दलितों के लिए नहीं, बल्कि उन दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए है , जो भ्रष्ट साधनों से धन कुबेर बन गये हैं. ये दलित धन कुबेर ही निजी कंपनियों में ठेके प्राप्त कर सकते हैं और ये ही इन कंपनियों में नौकरी पाने लायक उच्चतम शिक्षा अपने बच्चों को दिलाने की क्षमता रखते है. इस व्यवस्था में 95 प्रतिशत गरीब दलित कहां आते हैं , जो रोज कमाते और खाते हैं तथा एक पूर्ण नागरिक का हक पाने के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं और जूझ रहे हैं.

आज की इस दिग्भ्रमित दलित राजनीति और दलित चिंतन के खतरनाक भटकाव में यह विचार करना लाजिमी लगता है कि दलित समाज का हित सिर्फ जातिवाद पर आधारित भागीदारी आंदोलन में नहीं, और न सिर्फ आरक्षण में है, बल्कि समग्र दलित समाज का हित शोषण पर आधारित इस व्यवस्था को बदलने में है.
लेखक पटना विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य से जुडे हैं और दर्शन एवं समाजशास्त्र में के विशेषज्ञ हैं.
लेखक पटना विवि में प्राध्यापक हैं.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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