हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सच वही जो सत्ता मन भाये

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/17/2008 09:03:00 PM

अब पत्र-पत्रिकाएं पढने की फुरसत निकालनेवाले पाठकों के लिए नहीं छपतीं. आजकल आम पत्रिकाएं शीर्षक पढो, काम पर चलो्व टाइप पाठकों के लिए छपती हैं. फुरसतवालों के लिए अखबार में स्पेस नहीं रहा. अगर स्पेस निकालने में लगे रहे तो हो चुकी कमाई. इतने से जिन पाठकों को संतोष न हो तो लेखक एक उदाहरण देना चाहेगा. जैसे, आजकल महंगाई पर अखबारों में खूब छप रहा है. महंगाई की खबर प्राकृतिक आपदा की तरह पेश हो रही है. यह आर्थिक व्यवस्थाजनित खबर के रूप में सामने नहीं आती. उसकी राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि उद्घाटित नहीं होती. क्या अखबारों में आजकल जो कुछ छप रहा है, उससे महंगार्ई का, गरीबी का इतिहास, योजनाबद्ध विकास और विकास की आधुनिक अवधारणा से संबंधों की पहचान हो सकती है? आप में से कुछ लोग कहेंगे नहीं, लेकिन असली बात यह है, जो हर खबर के पीछे की खबर जैसी है कि इस तरह की पहचान से रू--रू कराना मीडिया का न लक्ष्य रहा और न आदर्श. महंगाई पर रंग-बिरंगे समाचार बिक रहे हैं और प्रेस निश्चिंत है, क्योंकि अपने पावर से उसने महंगाई के समाचार को बिकाऊ प्रोडक्ट के रूप में पेश कर यह प्रमाणित कर दिखाया कि जिस पीडा से आप परेशान हैं, उसे वह आप ही को बखूबी बेच सकता है.

आजकल के अखबारों के मालिकों का स्पष्ट लेकिन अघोषित निर्देश यह है कि जो छपे, कैप्सूल साइज में छपे. अगर सिर्फ शीर्षक छाप कर अखबार को बिकाऊ बना सकते, तो आज के मीडिया मालिक हर खबर या लेख को विज्ञापन के साइज में छापते और कैप्सूल साइज लेखन को भी टाटा-बाय-बाय्व कर देते.

हेमंत

यही बीते कल की बात हो गयी कि एक सवाल सिर्फ अखबार पढनेवालों को नहीं बल्कि अखबार में काम करनेवालों को भी चिंता या चुनौती के कांटे-सा चुभ जाता था- जिसको छपने योग्य माना गया, वह सचमुच में खबर थी अथवा नहीं? जो छपी, वह खबर होने लायक थी अथवा नहीं? फिलहाल आम पाठकों की एक शिकायत भर बाकी रह गयी है, लेकिन उम्मीद है कि जल्दी ही यह भी बेमानी हो जायेगी कि अखबारों में झूठ भी छपता है. अखबार में कामवालों में यह मान्यता भी, समझिए तो, अंतिम सांस की तरह जिंदा है कि सिर्फ झूठ छाप कर कोई समाचारपत्र (अखबार) जीवित नहीं रह सकता. इसलिए पाठकों की शिकायत का सर्वमान्य प्रकट आशय यह रह गया है कि आजकल के अखबार पूरा झूठ नहीं बोलते, लेकिन पूरा सच भी नहीं बोलते. हालांकि यह साफ दिखने लगा है कि कई पत्र-पत्रिकाएं सच की शक्ल में झूठ परोसने की कला में माहिर होने को ही अपनी कमाई की बुनियादी शर्त मानने लगी हैं और अपनी सत्ता्व की मारक क्षमता की असली कसौटी भी.

लेकिन एक समस्या है. वह यह कि तमाम पत्र-पत्रिकाओं, या कहें प्रे्रेस-मीडिया, को लोकतंत्र में जीना है. और, यह लोकतंत्र ऐसा है, जिसमें एक तरफ मीडिया को (हर क्षेत्र और हर तरह की सत्ता को भी) अपने वर्चस्व के लिए एकाधिकार अथवा डिक्टेटरी का स्पेस कायम करने का भरपूर स्कोप मिलता है और दूसरी तरफ मीडिया मालिकों के न चाहने के बावजूद एक आम सवाल को बेताल की तरह उनकी पीठ पर जब-तब चढ जाने का अवसर मिलता है कि क्या सत्य को उद्घाटित करने का पत्रकारिता का आदर्श महज एक दवा है, जो सामाजिक सरोकार के नाम पर बाजार में पाठकों को आकर्षित करने के लिए किया जाता है? आकर्षित करना माने? ठगना.

इसे हिंदी समाज (पिछडा!) की त्रासदी कहें या आदत कि वह आज भी मानता है कि अखबार समाज का दर्पण है. जैसा समाज होगा, अखबार में उसका छपा रूप वैसा ही दिखेगा. दर्पण माने? पारदर्शी शीशे की पीठ पर पारे का लेप लगा कर दर्पण तैयार किया जाता है, तभी उसमें कोई चेहरा, कोई प्रतिबिंब दिखता है. उसी तरह पत्रकारिता का लेप चढाने से अखबार आईना बनता है. वैसे, इस ट्रेजेडीनुमा आदत के बावजूद हिंदी समाज का आम पाठक इस फैक्ट का अर्थ समझने लगा है कि आजकल प्रेस जहां आईनारूपी अखबार का प्रोडक्शन होता है, स्टेट कहलाता है. स्टेट माने पावर. अब तो प्रेस होने का अर्थ ही पावर हो गया. उससे कुछ प्रोडक्शन हो और अक्षर व शब्दों के संयोजन से ऐसी सूचना या ज्ञान का प्रोडक्शन हो, जो अपने आप में कुछ पावरफुल होने का एहसास दिलाये, यह सब बेमानी हो गया. अब तो आदत के मारे या अपना हाजमा ठीक रखने के लिए रोज चंद मिनटों के लिए अखबार उलटने या टीवी के सामने बैठने को मजबूर पाठक-दर्शक भी यह कहने लगे हैं कि प्रेस (मीडिया) अब आईना नहीं गढता, बल्कि आईना दिखाता है. आजकल आईना बनाने से ज्यादा आईना दिखाना ही होता है. शिकायत सुनने का धैर्य हो तो यहां तक सुनने को मिलेगा कि धूल भरा आईना घुमाते दिखाते हैं, कुछ दिखता नहीं या जो दिखता है, वह अस्पष्ट और कहीं-कहीं उल्टा नजर आता है. पूछते हैं तो कहते हैं, अपना चेहरा ठीक करो. आजकल अखबार छापने और पत्रकारिता करने के नाम पर यही सब हो रहा है.

बेचारा पाठक! वह जानते हुए भी इसे ग्राह्य नहीं कर पा रहा कि आज परिणाम ही प्रक्रिया की गति दिशा तय कर रहा है. लोकतंत्र में तेज रफ्तार की आधुनिक टेक्नोलॉजी ने यह भी रेखांकित कर दिया है कि परिणाम से लक्ष्य बदल रहे हैं. सिद्धांत और आदर्श तो क्या, सच ही सनातन परिभाषा तक बदल रही है. बचपन में मास्टर साहब कान पकड कर यह मुहावरा रटवाते थे कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है. अब दिख यह रहा है कि मुहावरा ही उलट गया है. अब हर अविष्कार नयी आवश्यकताओं को जन्म देने लगा है. परिणाम के इस असर ने अखबार रचनेवाले पात्र यानी पत्रकार और उसको तेल-साबुन की तरह एक प्रोडक्ट के रूप में बाजार में बेचनेवाले व्यवसायी मालिक की भूमिका बदल दी है. इस मायने में पत्रकारिता समय की नब्ज पर हाथ रखने और उसकी धडकन की पहचान करते-करते उसको कंट्रोल करने की भूमिका में पहुंचने लगी है, पहुंच गयी है. राजनीतिक, धार्मिक, प्रशासनिक सत्ताधीशों की तरह.

हिंदी के प्रख्यात पत्रकार श्री राजकिशोर ने 20-25 साल पहले ही कह दिया था कि समाचारपत्रों में सच्व से फ्लर्ट किया जाता है. आज फ्लर्टेशन ही पत्रकारिता, खास कर व्यावसायिक पत्रकारिता का केंद्रीय मूल्य बन गयी है. वह सच्चाई, नैतिकता, आधुनिकता, कला, विज्ञान सभी के साथ फ्लर्ट कर सकती है, करती है. अब यह मूल्य मकसद बन गया है. इसे कोई भी देख सकता है और महसूस कर सकता है कि अपनी बेईमानी को छिपाने के लिए सच के साथ फ्लर्ट करने की अपनी कोशिश में पत्रकारिता झूठ के साथ भी फ्लर्ट करते हुए खुद को ईमानदार दिखाने की कोशिश करती है. पाठकों के सामने अपनी सार्वजनिक ईमानदार छवि बरकरार रखने के लिए यह पत्रकारिता अपने सामाजिक-सामूहिक, विवेक को अपनी अंतरात्मा (मीडियात्मा!) को खुद ही धोखा देते चलती है. (पाठकों के लिए यह एक दिलचस्प खबर हो सकती है कि आजकल हिंदी मीडिया अंगरेजी शब्द फ्लर्ट का हिंदी में सही और स्थिर अर्थ खोजने में लगा हुआ है. 20-25 साल पहले मीडिया में फ्लर्ट का सबसे सरल अर्थ झटका माना जाता था. बीच में उसका नया अर्थ खुला -चोंचलडाई. और ताजा अर्थ है- प्रेम का खिलवाड करना या दिखावटी प्रेम!)

क्या ऐसा देश के तमाम अखबार और पत्र-पत्रिकाएं करती हैं? यह सवाल किसी बिहारी पत्रकार से पूछिए, तो आपको जवाब मिलेगा हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में शायद नहीं और शायद हां भी. नहीं, इसलिए कि कई पत्र-पत्रिकाएं जान-बूझ कर ऐसा नहीं करती. हां इसलिए कि कुछ पत्रिकाएं जान-बूझ कर ऐसा करती हैं. जो पत्र-पत्रिकाएं अनजाने में ऐसा करती हैं, वे वस्तुतः ऐसा होते देखती हैं, करती नहीं. वे जिसे सच के रूप में पेश करती हैं, वह अक्सर सच से फ्लर्ट के रूप में पेश हो जाती है. इसके माने यह कि पाठक यह समझे कि संबंद्ध पत्र-पत्रिका ईमानदार है, लेकिन उसको बरतने में अक्षम है.

ऐसी पत्रिकाएं समझ नहीं पातीं कि ऐसा क्यों होता है. वे ऐसा होते देख कर सोच भी नहीं पातीं कि ऐसा हो जाने के बाद उनके पास पश्चाताप और प्रायश्चित का कोई रास्ता हो सकता है या होना चाहिए. हालांकि ऐसी पत्र-पत्रिकाओं से पाठकों की शिकायत का पॉजिटिव आशय यही होता है. ऐसी पत्रिकाएं आमतौर पर छोटी या लघु होती हैं और वे अनजाने में हुई भूल के लिए यह सफाई देने की मुद्रा में रहती हैं कि क्या करें हम गरीब्व हैं, सच तक पहुंचने के हमारे साधन सीमित हैं. साधन सीमित होने के कारण सच तक पहुंचने का हमारा कमिटमेंट अधूरा रह जाता है. वे ऐसी सफाई यों पेश करती हैं, मानो वे बडी और समृद्ध होतीं तो सच-को-सच के रूप में पेश कर देतीं या सच पातीं तो उसमें कटौती नहीं करतीं या सच को फ्लर्ट रूप में पेश होने देने की किसी अदृश्य प्रक्रिया को रोक देतीं. ऐसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकट रूप हिंदी के सामान्य से सामान्य पाठक तक को यह समझने को विवश करता है कि इनके संचालक-संपादक बेचारे हैं. ये पत्र-पत्रिकाएं बुनियादी रूप से ईमानदार हैं, रहना चाहती हैं, लेकिन इसके लिए अपने अंदर बेईमानी के कीडे पसरने के खतरे या बाहर से होनेवाले बेईमानी के हमले के खिलाफ सजग होकर खडे होने में असमर्थ हैं. अपनी ईमानदारी को जिंदा रखने के लिए ऐसी पत्र-पत्रिकाएं बेईमानी के कीडों या शक्तियों से समझौता करती हैं कि तुम भी चलो हम भी चलें, चलती रहें जिदंगी...

इसके रू--रू आम अनुभव यह भी है कि जो पत्र-पत्रिका जितनी बडी होती है, वह उतना ही जान-बूझ कर सच के साथ फ्लर्ट करती है. वस्तुतः वे ऐसा इसलिए करती हैं कि वे यह मान कर चलती हैं कि वे इसी के जरिये जिंदा रह सकती है. फल-फूल सकती हैं. ऐसी पत्र-पत्रिकाओं से गुजरते हुए हिंदी पाठक यह महसूस करता है कि ये पत्र-पत्रिकाएं जान-बूझ कर फ्लर्ट करती हैं और फिर खुल कर यह कहने को अपनी ईमानदारी साबित करती है कि भई, हम बेईमानी बरतते हैं ईमानदारी से. तब पाठक के पास इस तरह की आह भरने के सिवा कोर्ई चारा नहीं रह जाता-इस सादगी पर कौन न मर जाये या खुदा.

तो ऑन द होल, लगभग तमाम धाकड कहे जानेवाले रंग-बिरंगे समाचारपत्र ऐसे ही दृश्यों के दोरंगे कोलाज नजर आते हैं. बिहार जैसे कथित पिछडे राज्य में यों आज भी अकादमिक स्तर पर कहा जाता है कि हर घटना का एक अर्थ होता है, इसकी स्पष्टता के बिना तथ्य भ्रम फैलाते हैं, अखबारों से इस समझ को बरते जाने की उपेक्षा की जाती है कि तथ्य अपने आप में सच्चाई नहीं है, सच्चाई -पूरी सच्चाई के बिना तथ्य ही अधूरी शक्ल में सामने आते हैं, इससे भी भ्रम फैलता है, पाठकों को सही और गलत के चुनाव का असर नहीं मिलता. और कि किसी तथ्य की सच्चाई का अनुमान अन्य तथ्यों के फ्रेम में रख कर किये जाने की बात धरी की धरी रह जाती है.

अंत में एक निवेदन. खास कर उन पाठकों से, जो फुरसत निकाल कर इस आलेख को शुरू से अंत तक पढ गये. ये पाठक शायद यह सवाल ठोंकना चाहेंगे कि लेखक अगर सच से फ्लर्ट करने के खिलाफ है, तो वह ठोस उदाहरण देकर अपनी बात साबित करने का साहस क्यों नहीं करता? तो इसके लिए प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या्व कहते हुए यह सूचना देना प्रासंगिक होगा, जो आज तक खबर नहीं बनी कि अब पत्र-पत्रिकाएं पढने की फुरसत निकालनेवाले पाठकों के लिए नहीं छपतीं. आजकल आम पत्रिकाएं शीर्षक पढो, काम पर चलो्व टाइप पाठकों के लिए छपती हैं. फुरसतवालों के लिए अखबार में स्पेस नहीं रहा. अगर स्पेस निकालने में लगे रहे तो हो चुकी कमाई. इतने से जिन पाठकों को संतोष न हो तो लेखक एक उदाहरण देना चाहेगा. जैसे, आजकल महंगाई पर अखबारों में खूब छप रहा है. महंगाई की खबर प्राकृतिक आपदा की तरह पेश हो रही है. यह आर्थिक व्यवस्थाजनित खबर के रूप में सामने नहीं आती. उसकी राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि उद्घाटित नहीं होती. क्या अखबारों में आजकल जो कुछ छप रहा है, उससे महंगार्ई का, गरीबी का इतिहास, योजनाबद्ध विकास और विकास की आधुनिक अवधारणा से संबंधों की पहचान हो सकती है? आप में से कुछ लोग कहेंगे नहीं, लेकिन असली बात यह है, जो हर खबर के पीछे की खबर जैसी है कि इस तरह की पहचान से रू--रू कराना मीडिया का न लक्ष्य रहा और न आदर्श. महंगाई पर रंग-बिरंगे समाचार बिक रहे हैं और प्रेस निश्चिंत है, क्योंकि अपने पावर से उसने महंगाई के समाचार को बिकाऊ प्रोडक्ट के रूप में पेश कर यह प्रमाणित कर दिखाया कि जिस पीडा से आप परेशान हैं, उसे वह आप ही को बखूबी बेच सकता है.

अगर यह उदाहरण आप पढ पायें और हां या न कहने के लिए प्रेरित हों, तो इस आलेख को छापनेवाले संपादक को धन्यवाद के दो शब्द लिखने को फुरसत जरूर निकालें, क्योंकि आजकल के अखबारों के मालिकों का स्पष्ट लेकिन अघोषित निर्देश यह है कि जो छपे, कैप्सूल साइज में छपे. अगर सिर्फ शीर्षक छाप कर अखबार को बिकाऊ बना सकते, तो आज के मीडिया मालिक हर खबर या लेख को विज्ञापन के साइज में छापते और कैप्सूल साइज लेखन को भी टाटा-बाय-बाय कर देते.

बतकही बिहार की वाले हेमंत जी जानेमाने पत्रकार हैंप्रभात ख़बर के बिहार विशेषांक के लिए उनहोंने यह लेखा लिखा था, जो प्रकाशित भी हुआयहाँ साभार प्रस्तुति.

पंचायती राज संस्थाएं : हिफाजत अविकास की राजनीति की

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/09/2008 08:52:00 PM


खेतिहर अर्थव्यवस्था में मौलिक संरचनात्मक बदलाव के अभाव में पंचायती राज संस्थाएं विकास के किसी भी जनपक्षीय ढांचे की सोच आगे रख पायेंगी, इसकी उम्मीद नहीं है. मौजूदा स्वरूप में बहुुसंख्य ग्रामीण जनता की विकास संबंधी आकांक्षाओं और जरूरतों को मुखर ढंग से स्थापित करने में ये अक्षम हैं. सतही विकेंद्रीकरण ने बाजार के माध्यम से शोषण की स्थापित संरचना को बल ही प्रदान किया है. इस सतही विक्रेंदीकरण ने सत्ता के पक्ष में एक और अहम काम किया है. पहले जहां पिछडेपन और शोषण की मार झेल रही जनता का आक्रोश सरकारों और अफसरशाही के खिलाफ होता था, आज उसी असंतोष को उन्हीं तबकों के एक हिस्से के खिलाफ कर दिया गया है, जो पंचायतों में चुन कर आते हैं. शोषकों-अफसरशाही की वही जमात अपनी जनविरोधी कारगुजारियों का ठीकरा निचले स्तर के जनप्रतिनिधियों की अक्षमता पर फोडती है और उन्हें ही सारी परेशानियों की जड माना जाता है. ऐसे में बढते-फैलते बाजार की पहुंच के माध्यम से सामराजी लूट व्यवस्था साफ बच निकलती है. अब कोई यह कहे कि पंचायती राज व्यवस्थाएं विकास की चुनौतियों पर खरी उतर सत्ता की अविकास की राजनीति की ही हिफाजत कर रही हैं, तो इसमें गलत क्या है?



राकेश रंजन

भारत में पंचायती राज संस्थाओं का विकास देश के आर्थिक विकास के साथ जोड कर देखा जाता रहा है. आर्थिक विकास के लिए जरूरी संरचनाओं में पंचायती राज संस्थाओं को एक अहम कडी के रूप में माना गया. अतः संस्थाओं के रूप में उनका विकास भी आर्थिक विकास के मेनजर जरूरी समझा गया. इस जरूरत के पीछे महज सरकारी मशीनरी से नाकामयाबी ही नहीं, जो विकास के सबसे निचले पायदान पर स्थित गांवों की जरूरतों और उन्हें पूरा करने के उपायों को समझ पाने में दिखी. यह कमी तो देश के आर्थिक प्रशासन में दिखती ही रही है. पंचायती राज संस्थाओं के पीछे एक दूसरी अहम वजह भी मानी गयी. यह उस सोच से ताल्लुक रखती थी, जिसमें यह माना जाता है कि अगर गांवों में लोगों के हाथों में अपने फैसले लेने का अधिकार हो तो विकास के मामले में उनकी पहलकदमी बढ जाती है. टिकाऊ विकास के संदर्भ में यह बात और भी मायने रखती है कि अगर लोगों के हाथों में उनके सामूहिक विकास की जिम्मेदारी और इसके लिए आवश्यक संसाधन सौंप दिये जायें तो वे ऐसी संरचनाओं-अधिसंरचनाओं के विकास में अपनी भागीदारी को निश्चित करेंगे, जो उसे इन्हें फायदा पहुंचायें. यह भागीदारी संरचनाओं-अधिसरंचनाओं के विकास से पैदा हुए लाभों पर उनके अधिकार से संबंधित होगी.
इस तरह पंचायती राज संस्थाएं बहुसंख्य आबादी की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए लोकतांत्रिक माहौल की जरूरत को भी रेखांकित करती है. कुल मिला कर ये विकास की दोहरी जरूरतों को पूरा करती है. विकेंद्रीकरण के माध्यम से सूचनाओं और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और लोकतांत्रिक माहौल के माध्यम से ऐसा करने के लिए जरूर पहलकदमी. ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसमें से किसी एक का अभाव दूसरे की सफलता के आडे सकता है. उदाहरणस्वरूप सिर्फ विकेंद्रीकरण लोकतांत्रिक संस्थाओं के अभाव में इच्छित परिणाम नहीं दे सकता. विकेंद्रीकरण इस अर्थ में विकास की एक जरूरी शर्त तो हो सकती है, पर यह काफी नहीं. इस तरह से विकास की दोहरी चुनौतियों से निपटने में पंचायती राज संस्थाओं का मूल्यांकन इस आधार पर किया जा सकता है कि वह किस हद तक विकेंद्रीकरण और जनवादीकरण की प्रक्रिया को आगे बढाने में सहायक रही है.
१९५०
के बाद दुनिया के कई अन्य पिछडे देशों की तरह भारत ने भी आर्थिक नियोजन का रास्ता अपनाया. खेती पर निर्भरता को देखते हुए ग्रामीण विकास में पंचायतों की भूमिका को नजरअंदाज करना मुश्किल था. पर खास कर दूसरी पंचवर्षीय योजना से ही भारतीय नियोजन पर एक दूसरा ही सोच हावी रहा. इसके तहत सरकारी नियंत्रणवाले भारी उद्योगों पर जोर दिया गया. दावा यह था कि ओद्योगिक रूप से पिछडी भारतीय अर्थव्यवस्था की विकसित देशों पर निर्भरता कम करने के लिए यह जरूरी है कि यह पूंजीगत उद्योगों और भारी मशीनरी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने. ये उद्योग अपेक्षाकृत श्रमगहन तकनीक का इस्तेमाल करते हुए देश को बेकारी के चंगुल से भी निकालने में मदद करेंगे.
एक
ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसमें बहुसंख्य कामगार खेती से जुडे हों, कृषि विकास को लघु उद्योगों के साथ इस तरह से जोडा जा सकता था, जिसमें बहुसंख्य आबादी की जरूरतों को एक एकीकृत विकास दृष्टि के तहत पूरा किया जाये. ऐसे में पंचायती राज संस्थाओं की एक वृहत्तर भूमिका हो सकती थी, जहां वे बहुसंख्य आबादी की विकास संबंधी आकांक्षाओं और जरूरतों को मूर्त रूप दे सकें. तमाम दावों के बावजूद औद्योगिक आत्मनिर्भरता भी कागजों पर ही रही. भारी औद्योगिक आधार का विकास भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता को कम नहीं कर पाया. इस दौर में स्थापित भारी संयत्रों की स्थापना शर्तों, विदेशी मदद और कर्जों पर ध्यान देने से यह बात साफ हो जाती है. अत्यंत पूंजीगहन ये भारी मशीनरी उद्योग सीमांत तकनीकों के विकास में नाकाम ही रहे. गौरतलब है कि उस दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था पर विकसित देशों के बहुराष्ट्रीय निगमों का बढता वर्चस्व अग्रिम पंक्ति की तकनीक पर उनके स्वामित्व और नियंत्रण पर ही आधारित था.
भारतीय नियोजकों के इस टॉप डाउन दृष्टिकोण में विकास के किसी जनवादी सोच की कोई खास गुंजाईश नहीं थी. ऐसे में कृषि आधारित ग्रामीण विकास की ज्यादा से ज्यादा एक पूरक भूमिका ही हो सकती थी. कृषि विकास के सारे लक्ष्य इस बात से तय होते थे कि नियोजित औद्योगिक वृद्धि दर के लिए आवश्यक खाद्य सामग्री और औद्योगिक कच्चे माल का उत्पादन किस दर से हो. ऐसे में पंचायती राज विकास संबंधी सोच में अनुपस्थित ही रहा. विकास का यह ढांचा, जो तो विकेंद्रित था और ही जनवादी, विरले ही पंचायतों को कोई निर्णायक भूमिका दे पाता.
70
का दशक खत्म होते-होते औद्योगिक ढांचे में बढते असंतुलन के साथ ही आय वितरण की विषमता भी बढ चुकी थी. विकास के इस ढांचे की सबसे बडी कमजोरी रही देश में कृषि विकास के लिए जरूरी संरचनात्मक सुधारों में नाकामी. 60 के दशक के उतरार्ध में देश के उत्तर-पश्चिमी राज्यों में लायी गयी हरित क्रांति अब अपना जोर खो चुकी थी. खेती में रोजगार के बढने की रफ्तार और फसल ऊपज दर में ठहराव चुका था. इस परिप्रेक्ष्य में औद्योगिक ठहराव का ठीकरा फोडा गया राज्य नियंत्रित नीतियों पर. यह माना गया कि अत्यधिक नियंत्रण और केंद्रीकरण इसके जिम्मेदार हैं. 80 के दशक से अर्थव्यवस्था को नियंत्रण से मुक्त करने की प्रक्रिया शुरू हुई. हालांकि यह ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्र में ही देखी गयी, राज्य नियंत्रण और बाजार के बीच का तनाव 80 के दशक के दौरान बना रहा. पर 20वीं सदी के आखिरी दशक में यह मुक्त बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के पक्ष में निर्णायक कदम उठाने के साथ खत्म हुआ. निर्यातोन्मुखी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास परस्पर प्रतियोगिता के परिणाम के रूप में अपेक्षित किया गया. आर्थिक संरचनाओं का विकेंद्रीकरण इस नये माहौल में एक नयी शर्त बनी. किसी भी बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में केंद्रीकृत निर्णय पद्धति एक अवरोध ही होती है. इसके साथ ही राज्यों द्वारा बाजारों पर नियंत्रण और उनका विभेदीकरण भी बाजारी सिद्धांतों के खिलाफ जाता है. ग्रामीण विकास भी इस नये प्रतिस्पर्धात्मक युग में बाजारों के माध्यम से आता दिखाया गया. ग्रामीण इलाकों के पिछडेपन का एक स्वरूप बाजारों के अल्पविकास अनुपस्थिति या विकृति में भी देखा गया. इसके साथ ही सरकारी मशीनरी की सीधी पहुंच भी अपेक्षित रंग से नहीं पायी गयी. ऐसे में पंचायती राज संस्थाओं के रूप में एक बेहतर विकल्प देखा गया. ग्रामीण इलाकों में बाजारों की पहुंच बढाने में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका अहम बनी. तेजी से सडकों का विकास इसका सबसे अहम लक्ष्य बना. इसके साथ ही सरकारी पैसे की सीधी पहुंच ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बाजारों के विकास में योगदान दिया. ऐसी अवस्था में सवाल पर उठता है कि अपेक्षाकृत ज्यादा विकेंद्रीकृत माहौल में पंचायती राज संस्थाएं विकास का अपेक्षित माध्यम बन पायी हैं या नहीं.
इस
सवाल के जवाब के लिए हमें दो चीजों पर गौर करना होगा. ग्रामीण विकास की जरूरतें किस तरह की हैं और पंचायती राज संस्थाओं का चरित्र क्या है और विकास की जरूरतों को पूरा करने में वे सक्षम हैं या नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि की केंद्रीय भूमिका को देखते हुए यह कहा जा सकता है किसी भी दूरगामी विकास के लिए कृषि उत्पादकता और कृषि पर निर्भर कामगारों-परिवारों की आय में टिकाऊ वृद्धि जरूरी है. विकास के तमाम दावों के बावजूद देश के दो तिहाई कामगार आज भी किसी--किसी तरह से खेती पर निर्भर है. बिहार जैसे प्रांत में यह तीन चौथाई के करीब है. बगैर खेती की उत्पादकता बढाये और रोजगार के वैकल्पिक क्षेत्रों का विकास किये किसी भी किस्म के गुणात्मक परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है.
बिहार जैसे प्रांत में खेती की उत्पादकता अब भी पंजाब-हरियाणा जैसे प्रांतों से कम है. हालांकि पंजाब-हरियाणा भी इस लिहाज से मानक नहीं हो सकते, क्योंकि वहां भी खेती की उत्पादकता लंबे समय से स्थिर है और खेतिहर संकट काफी गहरा चुका है. बगैर श्रमगहन औद्योगिकीकरण के रोजगार सृजन की भी संभावनाएं सीमित हैं. पंचायतों के माध्यम से होनेवाले कामों का हल यह है कि एक तो यहां लंबे समय तक रोजगार मुहैया करना कठिन है. ऊपर से बेरोजगारी का आलम यह है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) भी फिसड्डी साबित हो रही है.
मगध
क्षेत्र की एक पंचायत में अपने अध्ययन में हमने पाया कि यहां तकरीबन 800 परिवारों के जॉब कार्ड बनाये गये. अगर प्रति कार्ड सिर्फ दो कामगारों को भी लिया जाये, तो 1600 कामगारों को 100 दिन का काम उपलब्ध कराने में न्यूनतम मजदूरी की दर से प्रति वर्ष इस पंचायत को करीब सवा करोड रुपये सिर्फ मजदूरी के मद में प्राप्त होना चाहिए. अगर इसमें अन्य खर्चों जैसे ईंट, बालू, सीमेंट, छड आदि सामग्री का खर्च जोडा जाये तो यह करीब पौने दो करोड रुपये होगा. पंचायत प्रतिनिधियों के अनुसार इतने आवंटन की उम्मीद सपने में भी नहीं होनी चाहिए. इस योजना के तहत केंद्र सरकार के पूरे आवंटन को देखें तो यह लक्ष्य महज मखौल दिखता है.
केंद्र
सरकार सहित राज्य सरकारों के भी लगातार घटते विकास, रोजगार सृजन संबंधी खर्चों (आनुपातिक रूप में) ने समस्या को बढाया ही है. विकास को बाजार के हवाले कर सरकारों ने लोक कल्याणकारी खर्चों से वित्तीय घाटे की आड में अपने हाथ खींच लिये हैं.
बाजार
के इस अनुशासन के दबाव में पंचायती राज संस्थाएं किस तरह से काम कर रही हैं? जाहिर है इस दबाव में एक विक्रेंद्रीकृत बाजार व्यवस्था का विकास तो हो रहा है, पर बहुसंख्य ग्रामीण आबादी की वास्तविक आय में बढोतरी के बराबर है. सरकार के लोक कल्याणकारी खर्चों के एक हिस्से को अगर ग्रामीण कामगारों को मिलनेवाली सामाजिक मजदूरी्व भी मान लें, तो शिक्षा-स्वास्थ्य के मदों में होनेवाली कटौती इनकी आमदनी के वास्तविक स्तर को गिराने का ही काम करती है. इस तरह से देखें तो आर्थिक नियोजन के शुरुआती दौर का टॉप डाउन्व दृष्टिकोण आज भी यथावत है. फर्क है तो सिर्फ इतना कि तब यह सरकारी मशीनरी के माध्यम से सीधे पहुंचता था और अब उसी केंद्रीकृत फैसले को बाजार एक विकेंद्रीकृत माध्यम से पहुंचा रहा है.
इसका
अर्थ यह है कि पंचायती राज संस्थाएं विकास के लिए जरूरी संरचनाओं में मौलिक परिवर्तन में अक्षम रही हैं. विकास के एक सशक्त माध्यम के रूप में वे दोहरी चुनौतियों- विकेंद्रीकरण और जनवादीकरण में असफल साबित हो रही हैं.
तमाम
तरह के आरक्षणों और चुनावों के बावजूद पंचायतों की संरचना इस तरह की है कि वह विकास संबंधी जरूरतों और उनसे निबटने के लिए जरूरी उपायों का निर्र्धारण जनवादी तरीके से नहीं कर सकतीं. जिस तरह से चुनावों के माध्यम से निर्वाचित विधायक-सांसद सर्वोच्च केंद्रीय सत्ता पर काबिज होने के बावजूद जनहित सुनिश्चित करनेवाले विकास के ढांचे को अपनाने में अक्षम हैं, उसी प्रकार पंचायत स्तर के भी निर्वाचित प्रतिनिधि जन आकांक्षाओं को मूर्त रूप में देने में असफल हैं. महज आरक्षण से वंचित तबके का भला नहीं हो सकता. पंचायतों में आरक्षित सीटों पर चुनी गयी गयी महिलाओं की जगह उनके पति (या पिता, भाई, देवर आदि) ही कार्य करते हैं. इसी प्रकार दलित-पिछडी जातियों के प्रतिनिधि भी निर्वाचित होने के बावजूद पुरानी सामंती संरचना के आगे या तो बेबस होते हैं या उसी संरचना में अपने वर्ग हितों के विपरीत समाहित हो जाते हैं.
वर्षों से जिस राजनीतिक तबके ने अफसरशाही के साथ मिल कर आम जन के पैसों को हडपा है, उसने इस लूट में ग्रामीण इलाकों में विकास की राह जोहते वंचितों में से कुछ को शामिल कर लिया है. पंचायती राज व्यवस्था में विकास के नाम पर खर्च होनेवाले इस धन का एक हिस्सा इसी तबके को खिला कर पुरानी व्यवस्था को साफ बचा लिया गया है. दशकों से जिस तबके ने सामंती सामराजी अफसरशाही शोषण सहा है, उसी के मुखर विरोध को निस्तेज करने का यह गंदा तरीका रहा है.
असल
में पंचायती राज संस्थाओं के सामने अपने वर्तमान स्वरूप में विकास का जनपक्षीय ढांचा तैयार करने के रास्ते में दोहरा अवरोध है. एक तो यह कि विकास के मानक, लक्ष्य और तरीके अब भी अत्यंत केंद्रीकृत संरचना में तय होते हैं, जहां पंचायतें पूरी तरह से अशक्त हैं. दूसरा ज्यादा अहम पक्ष यह कि अपनी वास्तविक संरचना में पंचायती राज संस्थाएं निहायत ही अलोकतांत्रिक हैं. असल में चुनावों में ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था का ही शक्ति संतुलन दिखाई देता है. ग्रामीण समाज, जो मूल रूप से खेतिहर समाज ही है, बगैर किसी गुणात्मक विकास के एक लंबे ठहराव के दौर से गुजर रही है. विकास के लिए जरूरी जिस विकेंद्रीकृत जनवादी ढांचे की दरकार है, कृषि विकास ने कभी उसे तैयार नहीं किया. खेती के विकास के लिए जरूरी संरचनात्मक सुधारों का रास्ता छोड कर हमेशा तकनीक आधारित विकास का दामन थामा गया. ६० के दशक में हरित क्रांति्व संरचनात्मक सुधारों से मुंह चुराने का ही परिणाम थी. तकनीक आधारित विकास का यह दौर बहुत जल्दी अपनी हद तक पहुंच गया. इसके बाद भी कृषि उत्पादकता में ठहराव और गहराते खेतिहर संकट का समाधान संरचनात्मक सुधारों के बजाय दूसरी हरित क्रांति में ढूंढा जा रहा है. आज के परिप्रेक्ष्य में तकनीकी विकास बहुत ही खर्चीला और विशाल बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा संचालित होगा. ऐसे में जहां 80 फीसदी किसान छोटे और सीमांत भूमिहीन श्रेणी के हैं, तकनीकी विकास का यह रास्ता उनके लिए उपलब्ध नहीं होगा. पर बाजार की व्यवस्था में अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का सुझाव भी यही है. बकौल प्रधानमंत्री, जब तक जैव प्रौद्योगिकी आधारित बीजों, कीटनाशकों का भारी पैमाने पर इस्तेमाल नहीं शुरू होगा, खेतिहर संकट से मुक्ति पाना नामुुमकिन है. ऐसे में इन तकनीकों के मालिक बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए छोटे-सीमांत किसानों की जमीन को नियंत्रण में लेना होगा. सरकारी प्रयासों से यह बात सामने भी रही है. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के नाम पर सरकार द्वारा किसानों की जमीन इन निगमों को उपलब्ध कराने का विचार है. ऐसे में पंचायती राज संस्थाओं के ही माध्यम से यह हो तो कोई आश्चर्य नहीं.
खेतिहर
अर्थव्यवस्था में मौलिक संरचनात्मक बदलाव के अभाव में पंचायती राज संस्थाएं विकास के किसी भी जनपक्षीय ढांचे की सोच आगे रख पायेंगी, इसकी उम्मीद नहीं है. मौजूदा स्वरूप में बहुसंख्य ग्रामीण जनता की विकास संबंधी आकांक्षाओं और जरूरतों को मुखर ढंग से स्थापित करने में ये अक्षम हैं. सतही विकेंद्रीकरण ने बाजार के माध्यम से शोषण की स्थापित संरचना को बल ही प्रदान किया है. इस सतही विक्रेंदीकरण ने सत्ता के पक्ष में एक और अहम काम किया है. पहले जहां पिछडेपन और शोषण की मार झेल रही जनता का आक्रोश सरकारों और अफसरशाही के खिलाफ होता था, आज उसी असंतोष को उन्हीं तबकों के एक हिस्से के खिलाफ कर दिया गया है, जो पंचायतों में चुन कर आते हैं. शोषकों-अफसरशाही की वही जमात अपनी जनविरोधी कारगुजारियों का ठीकरा निचले स्तर के जनप्रतिनिधियों की अक्षमता पर फोडती है और उन्हें ही सारी परेशानियों की जड माना जाता है. ऐसे में बढते-फैलते बाजार की पहुंच के माध्यम से सामराजी लूट व्यवस्था साफ बच निकलती है. अब कोई यह कहे कि पंचायती राज व्यवस्थाएं विकास की चुनौतियों पर खरी उतर सत्ता की अविकास की राजनीति की ही हिफाजत कर रही हैं, तो इसमें गलत क्या हैं?
लेखक कृषि अर्थशास्त्र के शोधार्थी हैं. यह लेख उन्होंने मगध क्षेत्र के गांवों की अपनी पडताल के दौरान लिखा है. वे दिल्ली विवि के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में अध्यापन से जुडे रहे हैं.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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