हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

विदर्भ में कृषि क्षेत्र में आत्महत्याएँ शून्य हैं ?

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/30/2008 03:55:00 PM

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पी साईनाथ
तीसरी किस्त पहली दो किस्तें यहाँ पढ़ें
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िदर्भ में किसानों की आत्महत्याएँ अगस्त आते ही पूरी तरह रूक गईं, क्योंकि जुलाई में यह खबर आई कि प्रधानमंत्री उनसे मिलने आनेवाले हैं। इस तरह लोगों ने सोच-समझ कर आत्महत्या करना छोड़ दिया। अगस्त में विदर्भ में एक भी आत्महत्या नहीं हुई ! कम-से-कम सरकारी आँकड़े तो यही कहते हैं। उनको पता था कि प्रधनमंत्री आ रहे थे। सबों ने कहा, 'हम तब-तक आत्महत्या नहीं करेंगे जब तक वे रूके रहेंगे!'' यह एक ऐसा देश है, जो खुद को ठग रहा है। इससे आपको मदद नहीं मिलेगी। मैं किसी एक मुख्यमंत्री या एक पार्टी की सरकार की ओर इशारा करने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। यह एक राष्ट्रीय संकट है। हम खुद के प्रति जितना ईमानदार होंगे, इस संकट से बाहर निकलने में उतनी ही बेहतर स्थिति में होंगे।

यह आँकड़े वास्तव में क्या इंगित करते हैं ? अगर हम राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आँकड़ों को विस्तार देकर देखें तो पायेंगे कि 1997-2005 के बीच करीब डेढ़ लाख आत्महत्याएँ हुईं। इन आँकड़ों में आठ श्रेणियों में आने वाले लोग शामिल नहीं हैं। जैसे कि इन आंकड़ों में महिलाएं शामिल नहीं है। ऐसा इस कारण क्योंकि इस देश में आप कुछ भी करें, कोई भी नियम बना लें, हमारी मशीनरी महिलाओं को किसान नहीं मानती क्योंकि उनके नाम पर जमीन नहीं है और न ही उन्हें सम्पत्ति का अधिकार है।

कई आत्महत्याओं को कृषि आत्महत्याओं के रूप में दर्ज नहीं किया जाता

2001-02 में आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में कृषि क्षेत्र में आत्महत्याएँ करने वालों में 45 प्रतिशत महिला किसान थे। अनंतपुर के ग्रामीण इलाकों को कई घरों की मुखिया महिलाएँ हैं। क्योंकि पुरुष पलायन कर चुके हैं। संख्या कहीं ज्यादा बड़ी है। राष्ट्रीय स्तर पर भी 19 प्रतिशत या लगभग हर पाचवें घर की मुखिया महिलाएँ हैं। लेकिन हम महिलाओं की गिनती किसान के रूप में नहीं करते। हम उनकी गिनती किसान की पत्नियों के रूप में करते हैं। इस कारण इसे आत्महत्या के रूप में गिना तो जाता है, पर किसानों की आत्महत्या के रूप में नहीं। निश्चय ही खेतिहर मजदूरों के आत्महत्याओं की गिनती कभी इस श्रेणी में नहीं की जायेगी ताकि किसानों की आत्महत्याओं के आँकड़ों को कम करके बताया जा सके।

इतना ही नहीं, अनगिनत परिवारों के सबसे बड़े लड़के की आत्महत्या को भी किसानों की आत्महत्याओं की सूची में शामिल नहीं किया गया, क्योंकि हमारे पारंपरिक समाज में अगर पिता जीवित है, तो जमीन उसी के नाम रहती है, चाहे वो 75-80 साल का बूढ़ा ही क्यों न हो। इस कारण सबसे बड़ा पुत्र 50-51 का हो सकता है, वो ही खेती करनेवाला है, सब तरह के दवाब वही झेल रहा है और अंत में वह टूट कर खुद को मार डालता है। पर तहसीलदार कहता है कि मरनेवाला इंसान किसान नहीं है, क्योंकि उसके नाम कोई जमीन नहीं है। इन्हीं आधारों पर पिछले महीने यवतमाल जिले में छह सदस्यीय 'स्वतंत्र' समिति द्वारा आत्महत्या के हर एक दावे को खारिज कर दिया गया। इस समिति में जिले के उच्च सरकारी पदाधिकारियों के साथ-साथ सरकार द्वारा चुने गये दो गैर-सरकारी व्यक्ति भी शामिल थे!

इसी तरह कई मामलों को इस आधार पर खारिज कर दिया जाता है कि मरने वाले के नाम पे कोई जमीन नहीं होती। मरनेवाला घर का सबसे बड़ा लड़का था, वह परिवार चला रहा था और तीन परिवारों की देखभाल कर रहा था। पर जमीन का कोई टुकड़ा उसके नाम नहीं था। हम उसे किसान कैसे मान सकते हैं? इस तरह की कसौटी रखी गई है। मैं इस तरह की और भी बातें रख सकता हूँ। अगर आप मरते हैं और यह पाया जाता कि आप कर्ज में थे, तो वो कर्ज किसी बैंक से लिया होना चाहिए। अगर आपने किसी सूदखोर महाजन से पैसे लिए हैं तो इसे स्वीकार नहीं किया जायेगा। यवतमाल की समिति इसे स्वीकार नहीं करेगी। वे पूछेंगे कि इस बात का सबूत क्या है ? आपके पास कोई कागज दिखाने के लिए नहीं होता। इस तरह हजारों लोगों की मौत को आत्महत्या की सूची में तो रखा गया पर किसानों की आत्महत्या की सूची में नहीं रखा गया।

गलत वर्गीकरण भी हुआ है। पलायन कर गये किसानों की गिनती इस सूची में नहीं की जाती। जबकि लोग अपना गाँव छोड़ते हैं और शहरों को खुद को मार डालते हैं। मैं तो इस बात का अनुमान भी नहीं लगाना चाहता कि वास्तविक आँकड़ा क्या हो सकता है। व्यवहारिक रूप से यह करना असंभव है। दूसरा यह कि सरकारी आँकड़े कितने ही दोषपूर्ण क्यों न हो, मैं तो सोचता हूँ कि यह आँकड़े इतने भयावह हैं कि यह राष्ट्र को उद्वेलित कर सकते हैं। इसे राष्ट्र को उद्वेलित करना भी चाहिए। अगर हमारे पास सिर्फ सरकारी आँकड़े भी हैं तो मैं विश्वास कर उन्हें स्वीकार करने को तैयार हूँ। अगर आप भी इसे एक दिल दहला देने वाले आँकड़े के रूप में स्वीकार करते हैं तो हम राष्ट्र को भविष्य की ओर ले जा सकते हैं।

हर क्षेत्र में समान कारक हैं

जिन क्षेत्रों में यह संकट है, वहाँ पर क्या समानताएं हैं ? नकदी फसल, जल की भरी कमी, राष्ट्रीय औसत से भी काफी ऊंचे स्तर पर किसानों का कर्ज में होना। अगर आपके पास भारत में कर्ज में डूबे किसानों का मानचित्र हो और इन सभी आत्महत्याओं के इलाके का मानचित्र हो तो आप पायेंगे कि एक के ऊपर रखे जाने के बाद ये मानचित्र पूरी तरह एक से हो जाते हैं। देश में कर्ज में दबे सबसे ज्यादा घरों का प्रतिशत आंध्र प्रदेश में है, जो कि 82 प्रतिशत पर है, केरल में 64 प्रतिशत और कर्नाटक में 62 प्रतिशत खेतिहर-घर कर्ज के बोझ तले दबे हैं। यह सूची अंतहीन हैं। आप देख सकते हैं कि आत्महत्या का मानचित्र कर्ज के मानचित्र के साथ किस तरह मेल खाता है, जो कि इन आत्महत्याओं को सबसे बड़ा कारण है।

मैं यह बताना चाहूँगा कि लगभग हर आत्महत्या के पीछे एक नहीं कई कारण होेते हैं। हम उन सभी कारणों को इकट्ठा करने की कोशिश करने के बजाए अंतिम कारण को रिकार्ड करते हैं। मैं कर्ज में हूँ। मेरे लड़के का कॉलेज छूट जाता है। मैं अपनी बेटी की शादी करने में असमर्थ हूँ और हर रोज मैं जब बाजार जाता हूँ, सूदखोर महाजन मुझे बेइज्जत करता है। मेरी फसल नष्ट हो गई और बैंक मुझे कर्ज देने से मना कर देता है। मैं नशे में घर लौटता हूँ। मैं अपनी पत्नी से झगड़ता हूँ और फिर आत्महत्या कर लेता हूँ। अगले दिन मेरी आत्महत्या का यह कारण दर्ज किया जाता है कि मैंने अपनी पत्नी के साथ झगड़ा किया और इस कारण खुद को मार डाला। अंतिम कारण को रिकार्ड किया जाता है। यह स्वाभाविक है और हमारा ढाँचा भी इसी तरह का बना है। पर यह जितनी बातें सामने लाता है, उससे कहीं ज्यादा छुपा लेता है।

जिन क्षेत्रों में आत्महत्याएँ हो रही हैं, वहाँ बैंक ऋण की वापसी इन आत्महत्याओं का एक अन्य समान कारण है। कृषि इन क्षेत्रों में ज्यादा अव्यवस्थित है, जैसा कि विदर्भ और महाराष्ट्र के अन्य इलाकों में है। खेती की लागत काफी ज्यादा है और यह समस्या सभी क्षेत्रों में हैं। 1991 में विदर्भ इलाके में एक एकड़ खेत में कपास की खेती पर 2500 रुपये का खर्च बैठता था। आज के दिन में नये बीटी ब्रांड बीजों से खेती करने में 13,000 रूपये से ज्यादा का खर्च आता है। इस तरह हम पाते हैं कि प्रति एकड़ खेती की लागत में 500 प्रतिशत की वृद्धि है। यह जानलेवा है। इसका बोझ नहीं उठाया जा सकता।

अगर आप जानना चाहते हैं कि खेती में प्रयुक्त चीजों की लागत में कितनी भारी वृद्धि है, अगर आप समझना चाहते हैं कि बीजों का उद्योग कितना बड़ा है जिसे नियंत्रित करने और लूटने की खुली छूट हमने कुछ कार्पोरेसंस को दे दी है तो हमें यह देखना होगा कि आन्ध्रप्रदेश में क्या हो रहा है। आप समझ जायेंगे कि हम कितनी बड़ी कीमत चुका रहे हैं।

मेरे गृह राज्य आंध्रप्रदेश को अपने साफ्टवेयर निर्यात पर बड़ा गर्व है। लेकिन बीज और खेती में काम आने वाले चीजों का उद्योग आंध्रप्रदेश के साफ्टवेयर निर्यात से कहीं बड़ा है। इस तरह हम समझ सकते हैं कि बीज उद्योग कितना विशाल है। आंध्रप्रदेश अपने साफ्टवेयर निर्यात से जितना कमाता है, इस देश में लोग बीज पर उससे कहीं ज्यादा खर्च करते हैं।

यह ठीक है कि हम विदेशी साफ्टवेयर बाजार की ओर भाग रहे हैं, पर साथ ही साथ हम बीज के बाजार को पूरी तरह कुछ कंपनियों के हाथों में सौंपते जा रहे हैं। यह किसी भी स्थिति में अच्छी बात नहीं है। यह सब वही कारण है जिसके आधार पर मैंने कहा कि हम इस स्तर पर कॉरपोरेट खेती की ओर बढ़ रहे हैं।
जारी

देश बिक रहा है देश के भीतर

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/22/2008 10:00:00 PM

और उसकी रक्षा के नाम पर हम यहाँ मर रहे हैं

कुर्स्क के कैप्टन की चिट्ठी

याद है, आठ साल पहले कुर्स्क का डूबना? रूस की यह पनडुब्बी 12 अगस्त, 2000 को डूब गयी थी, जिसमें 100 से ज्यादा लोग डूब गएइस पनडुब्बी के कैप्टन की जेब से एक चिट्ठी मिली थी, जो उसने अपनी पत्नी को लिखी थी सिर्फ़ एक पति की अपनी पत्नी को लिखी गयी चिट्ठी भर नहीं है, इसमें कई समकालीन सवालों के संकेत भी मिलते हैं। कुर्स्क के कैप्टन द्वारा अपने जीवन के अंतिम क्षणों में लिखी गयी यह चिट्ठी सिर्फ़ सोवियत संघ के विघटन, उसके समाजवादी साम्राज्यवाद में बदल जाने की प्रक्रिया, इसके लिए जिम्मेदार लोगों के चेहरों को एक बार फिर हमारे सामने साफ कराने की कोशिश और सबसे बड़ी बात कि समाजवाद और मानव सभ्यता को स्तालिन के योगदानों को फिर से याद दिलाती हैयह सिर्फ़ यह याद दिलाती है कि सोवियत संघ के विघटन के लिए गोर्बाचेव-येल्तसिन ही जिम्मेदार नहीं थे, बल्कि यह भी कि इसकी प्रक्रिया ख्रुश्चेव ने शुरू की और यह सब इसलिए हुआ कि सोवियत पार्टी मार्क्सवाद- लेनिनवाद के रास्तों से हट गयी और उसने स्तालिन द्वारा शुरू की गयी योजनाओं को तिलांजलि दे दी थीहम इन सारी बातों के सूत्र इस चिट्ठी में पाते हैं, जिसे उस आदमी ने लिखा था, जिससे मौत कुछ पल दूर ही खड़ी थीयह चिट्ठी उस वक्त, गहरे पानी में, मौत से साए में लिखी जा रही थी, जब ख्रुश्चेव के संशोधान्वाद और स्तालिन को लेकर पूरी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों में बहसें चल रही थींस्तालिन को तानाशाह कहा जा रहा था और ऐसे में रूस की एक डूब चुकी पनडुब्बी में बैठा उसका कैप्टन रूस में समाजवाद के 'पतन' की ख्रुश्चेवी तिक्रम को पहचानने की कोशिश कर रहा था और ख़ुद को स्तालिन के पक्ष में खडा पा रहा था
आइये
, हम भी इसे एक बार फिर पढ़ें.

ओल्गा ! मेरी ओल्गा
सागर की तलहटी के घुप्प अंधेरे में बैठा
मैं लिख रहा हूं ये शब्द
जिन्हें हृदय दुहरा रहा है बार-बार.
याद है ओल्गा, मेरी वह इकलौती कविता
जो मैंने तुम्हे दी थी
इस बार तुमसे जुदा होते समय?
और जब मरने का समय आता है
(हालांकि मैं दूर हटाता रहता हूं ऐसे ख्यालों को)
मैं वक्त चाहता हूं फुसफुसाने को एक बातः
मेरी जान, मैं तुम्हें प्यार करता हूं
...और आज मौत ने
मुझे इतना समय दे दिया है कृपापूर्वक
कि कह सकूं हजारों बारः
'मेरी जान, मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करता हूं.'

ओल्गा, इस समय जरूर तुम कुछ बेचैनी
महसूस कर रही होगी.
मेरे हृदय के तरंग संकेत
पहुंच रहे होंगे तुम्हारे हृदय तक
और तुम्हारे कानों में गूंज रही होगी
मेरी फुसफुसाहट
और तुम सोच रही होओगी कि
दिन इतना उदास और बेचैनी भरा क्यों है.

ओल्गा! मेरी प्रियतमा!
समय बहुत कम है मेरे पास,
शायद कुछ घंटे भरमात्र,
और अभी मुमकिन नही कि मैं
तुम्हारी यादों के साथ अकेला रह सकूं
अभी मुझे निभाने हैं
मौत से पहले
'कुर्स्क' के कैप्टन के सारे दायित्व.
इस समय हमारा जहाज
शायद जा बैठा है
वेरेंटस सागर की गाद भरी तलहटी में
अब भी रह-रह कर आ रही है
विस्फोट की आवाजें
पर ये उस पहले विस्फोट से काफी हल्की हैं
जिसने दुनिया की सबसे उन्नत आणविक
पनडुब्बियों में,
गिने जानेवाले कुर्स्क को
मृत्यु का रास्ता दिखाया.
हमारे कुल एक सौ अठारह लोगों में से कुछ,

शायद दो दर्जन, तो तभी मारे जा चुके थे
जब अगले हिस्से में विस्फोट हुआ.
पहले हिस्से के आपातकालीन द्वार से
बच निकलने की कोशिशें बेकार होने के बाद
हमारे बचे हुए लोग
(नब्बे के करीब संख्या है उनकी)
अब नौवें सेक्शन में इकट्ठे बैठे हैं
घुप्प अंधेरे में.
वहां कोई शोर नहीं है,
कुछ जलती सिगरेटों की सुलगती-चुभती रोशनी,
और बीच-बीच में जल उठते लाइटरों की कौंध में
बस मौत की सरसराहट है,
बीच-बीच में कुछ आवाजें,
कुछ लंबी सांसें, कुछ सिसकियां...
लो देखो, कोई पागल गाने लगा है वहां
और अब सभी सुर मिला रहे हैं
और फिर सन्नाटा...
कोई चीख उठा है अचानक,
'हम क्यों मर रहे हैं यहां?'
हमारे लोग
पनडुब्बी के सख्त नियमों के खिलाफ
एक सेक्शन में इकट्ठे बैठे हैं.
अब वे सब भाई हैं, एक-दूसरे के
मौत के साथी.
सिर्फ मैं हूं अब भी
कैप्टन का दायित्व निभाता हुआ.
अपनी कलाई घड़ी की मद्धिम रोशनी में
तैयार कर रहा हूं आखिरी रिपोर्ट
और थोड़ा-सा समय चुरा कर
तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूं.
ऐसा लग रहा है कि मैं तुम्हें
आखिरी बार याद नहीं कर रहा हूं
पहली बार प्यार कर रहा हूं.
प्यारी ओल्गा,
मुझे डर है कि यह पत्र
कभी बरामद भी हो सही-सलामत
मेरी सड़ी-गली लाश या कंकाल की
चिथड़ी वरदी की जेब से
तो 'राजनीतिक रूप से संवेदनशील' होने के नाते
शायद तुम तक न पहुंचे
फिर भी यह बात तुमसे कहे बिना
नहीं रह पा रहा हूं कि मेरा दिल भी
चीख-चीख कर पूछ रहा है इस समयः
'हम क्यों मर रहे हैं यहां
अपनी मातृभूमि से दूर
क्यों जिंदा दफन हो रहे हैं
एक अनजान सागर की तलहटी में?
सुदूर महासागरों में
क्या हम मातृभूमि की रक्षा के लिए
गश्त लगाते हैं?
क्या चेचेन्या में
अपने ही लोगों का कत्लेआम किया गया है
देश की रक्षा के लिए?
कल तक समाजवाद के नाम पर
हमारी फौजें कवायद करती रहीं
चेकोस्लोवाकिया से अफ़्रीकी महाद्वीप और
अफगानिस्तान तक
और हमारे जहाजी बेड़े
धरती का ओर-छोर नापते रहे.
आज हम क्यों बेच रहे हैं हथियार?
हम क्यों झुक रहे हैं पश्चिम के सामने?
मास्को की सड़कों पर इतना अंधेरा,
इतनी ठंड, इतना सन्नाटा क्यों है
वहां गर्म गोश्त का जो सौदा हो रहा है
विदेशी सैलानियों के हाथों
वह क्या देश का बिकना नहीं है?
सोचो तो, कितनी अजीब बात है.
देश बिक रहा है देश के भीतर
और उसकी रक्षा के नाम पर
हम यहां मर रहे हैं
बिना किसी युद्ध के,
बेरेंटस सागर की तलहटी में
सोचता हूं ओल्गा,
हमारा यह भारी-भरकम 'कुर्स्क'
कुछ उसी तरह डूबा
जैसे टूटा था 1990 में सोवियत संघ का ढांचा.
जिसे प्यार करना सिखाया गया था
हमें बचपन से,
उसे नहीं, अब हमें
सिर्फ रूस से प्यार करना था.
'कुर्स्क' भी बाहरी शक्तिमता के बावजूद
अंदर-अंदर जर्जर हो रहा था
सोवियत संघ की ही तरह.
आज सोचता हूं कि क्यों मेरे पिता
अपनी मेज पर हमेशा
स्तालिन की तसवीर रखते थे
और उस दिन मास्को के जन प्रदर्शन में शामिल
कुछ रिटायर्ड फौजी बूढ़े क्यों कह रहे थे कि
समाजवाद को गोर्बाचेव-येल्तसिन ने नहीं
बल्कि ख्रुश्चेव ने ही तबाह कर डाला था
पैंतालीस वर्षों पहले
क्यों कहा करते थे पिता कि
इस समाजवाद का बेड़ा गर्क होकर रहेगा
एक दिन! -आज मैं सोच रहा हूं
सुना है, मौत से पहले अचानक
चीजें काफी साफ दिखने लगती हैं.

ओल्गा, मेरी जान
मैंने तुम्हें क्या दिया
इतने दिनों के साथ में
फिर सोचता हूं कितना कुछ दिया
हमने एक दूसरे को...
क्या ये स्मृतियां कभी निःशेष हो सकेंगी
तुम्हारे लिए?
मुझे तो आज भी याद है
पहले चुंबन के बाद तुम्हारे
गरम, अधखुले, अकबकाये होंठ
वह पहली बार मेरी अंगुलियों के नीचे
थरथराती तुम्हारी नग्नता,
तुम्हारी शरारतें, तुम्हारी जिद,
तुम्हारी संजीदगी, तुम्हारे तमाम स्कार्फ और कोट,
तुम्हारे कैक्टस, नृत्य में थिरकते तुम्हारे पैर
और याद है पिछली गरमियों में
सागर तट पर तुम्हारा
दूर तक भागते चले जाना निर्वस्त्र,
एक मासूम पवित्र बच्ची की तरह...
सब कुछ ओल्गा, सब कुछ
और यह भी याद आता है मुझे
दिल पर चलते तीखे नश्तर की तरह
कि हम सोच रहे थे अभी पिछली ही बार
अपने होनेवाले बच्चे के बारे में
कि उसे अब होना ही चाहिए.
सोचो तो,
हमारा साथ कितना छोटा रहा
पर कितना छक कर जीते थे हम
अपनी छुट्टियों को.
हमने बेहद कठिन दिनों में
प्यार किया एक-दूसरे को इस तरह
और हर सच्चे प्रेमी की तरह
महसूस किया कि हम ही दुनिया में सबसे अधिक
प्यार करते हैं एक-दूसरे को.
यहां जब मैं
अट्ठारह-उन्नीस साल के युवा नौसैनिकों को
देखता रहा हूं
तो पितृभाव-सा महसूस करता रहा हूं
और फिर सोचता रहा हूं कि हमारी जवानी
अब दूसरे सिरे की ओर ढल रही है.
मुझे हंसी आती रही है
और आश्चर्य होता रहा है ओल्गा
कि ऐसा भला कैसे हो सकता है
और ख्याल आता रहा है
कि अभी तक तुम्हें बहुत प्यार करना है,
बहुत-सी बातें करनी है तुमसे,
तुम्हे छूना है अभी बार-बार
निहारना है घंटों-घंटों.
मैं सोचता था ओल्गा कि
समय दबे पांव आकर हमारा उम्र हड़प रहा है
पर सोचा भी न था कि इस तरह
मौत आकर लील जायेगी हमारा समय.
फिर अचानक ख्याल आता है
अपने इन नौसैनिकों का,
जिनमें ज्यादातर अभी नौजवानी की दहलीज पर
कदम ही रख रहे हैं.
इनके दिलों में प्यार की बेचैन तड़प भरी
चाहत तो होगी
पर शायद इनमें से ज्यादातर अभागे
वंचित होंगे अभी तक
किन्हीं होठों की गरमाहट से और
प्यार भरी बेतुकी अंतहीन बातों से
अछूते होंगे इनके कान.
फिलहाल मुझे ये बच्चों जैसे लग रहे हैं
और मैं सोचता हूं इनकी मांओं के बारे में
बड़ी बेचैनी के साथ.
बहरहाल, अब बीत चुका है,
हमारा समय
और मैं पूरा कर रहा हूं अपनी आखिरी चाहत
और फुसाफुसा रहा हूं: मैं तुम्हें
प्यार करता हूं मेरी जान!
मेरी ओल्गा,
तुम सुन रही हो न.

(अंतरराष्टीय राहत दल के सदस्यों को 'कुर्स्क' के कैप्टन के शव की चिथड़ी वरदी की जेब से आखिरी रिपोर्ट के साथ ही पत्नी ओल्गा के नाम एक पत्रा भी मिला. बाद में पत्नी ओल्गा ने पत्रकारों को यह जारी किया.)
यह कविता हिन्दी में हंस में छपी थी और संभवतः इसका अनुवाद कात्यायनी ने किया है

विनायक सेन और अजय टीजी को रिहा किया जाये

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/19/2008 01:57:00 PM

रविभूषण
विनायक सेन अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बाल चिकित्सक हैं, जिन्होंने अपना जीवन निर्धनतम लोगों, विशेषतः छत्तीसगढ के खदानकर्मियों और जनजातियों की सेवा में समर्पित कर दिया है. वे मानवाधिकार के प्रबल-सक्रिय समर्थक रहे हैं. पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्य सचिव के रूप में भी उनकी भूमिका विशेष रही है.14 मई, 2007 को उन्हें छत्तीसगढ की पुलिस ने 1937 के गैरकानूनी गतिविधि अधिनियम और 2005 के छत्तीसगढ राज्य विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया और वे अभी तक जेल में हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जमानत की अर्जी खारिज कर दी है.
डॉ विनायक सेन पर मुख्य आरोप यह है कि वे जेल में प्रमुख माओवादी नेता नारायण सान्याल से 33 बार मिले थे और उनके पास से इस माओवादी नेता के तीन पत्र पाये गये हैं. इस प्रकार वे खतरनाक नक्सली के रूप में चिह्नित किये गये हैं. उन पर आरोप है कि वे राज्य के विरुद्ध सक्रिय हैं और प्रतिबंधित संगठन को सहयोग प्रदान करते हैं. डॉ सेन को माओवादियों का समर्थक और सहयोगी मान लिया गया है. जेल में वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. उनकी गिरफ्तारी से देश-विदेश का बौद्धिक तबका क्षुब्ध है. उनकी गिरफ्तारी (14 मई) के एक वर्ष पर देश के विविध हिस्सों में सेमिनार, धरना और प्रदर्शन हुए हैं तथा अखबारों ने वस्तुस्थिति से सबको परिचित कराया है. 14 मई के कई अखबारों में विनायक सेन संपादकीय से लेकर आलेख तक में उपस्थित हैं. हसन सरूर ने 'ग्लोबल कैंपेन फॉर सेन रिलीज पिक्स अप' (14 मई, 2008, हिंदू) में लंदन में भारतीय उच्च आयोग के समक्ष विनायक सेन की रिहाई को लेकर विरोध-प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, छत्तीसगढ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भेजे गये पत्र की जानकारी दी है, जिसमें सेन की महती भूमिका के बारे में बताया गया है. हस्ताक्षरकर्ताओं में दक्षिण एशिया, सॉलिडैरिटी ग्रुप, वेल्लोर अलुमनी एसोसिएशन की ब्रिटेन शाखा, दक्षिण एशिया एलायंस और 1857 समिति के प्रतिनिधि हैं. ब्रिटिश सांसदों का एक ग्रुप भी अपनी सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित कर रहा है. विरोध प्रदर्शन के आयोजकों ने डॉ सेन के विरुद्ध लगाये गये अभियोग को राजनीति प्रेरित माना है और छत्तीसगढ सरकार को अभियुक्त ठहराया है. अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा है कि विनायक सेन ने जेल में माओवादी नेता से मुलाकात पीयूसीएल के उपाध्यक्ष की हैसियत से की थी. रायपुर के सेंट्रल जेल में विनायक सेन नारायण सान्याल को चिकित्सा और कानूनी सहयोग देने गये थे.

विनायक सेन का वास्तविक अपराध क्या है? गरीबों के साथ और उनके पक्ष में खडा होना, मुखर और सक्रिय होना तथा छत्तीसगढ में हिंसा से जूझ रहे बेदखल किये गये लोगों के पक्ष में बोलना. वे जेल में बंद माओवादी नेता से जेल नियमों के तहत ही मिलने गये थे. जेल अधिकारियों ने उन्हें नारायण सान्याल से मिलने की अनुमति दी थी और यह अनुमति कई बार दी गयी थी. माओवादियों से मिलना माओवादी होना नहीं है. पीयूसीएल के पूर्व अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर ने कहा है कि आतंकवादियों से लडने में राज्य स्वयं आतंकवादी नहीं हो सकता. वे विनायक सेन के मुद्दे को देखने और इस पर विचार करने को केंद्र सरकार से कह चुके हैं. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को प्रेषित पत्र में यह भी कहा गया है कि मानवाधिकार की रक्षा में विनायक सेन के कार्यकलापों को दोषयुक्त ठहराना किसी वकील को अपने मुवक्किल की रक्षा में किये गये कार्यकलापों को दोषयुक्त ठहराने की तरह है.
विनायक सेन की गिरफ्तारी और अब तक उन्हें जमानत न मिलने से कुछ बडे प्रश्र्न उपस्थित हुए हैं. भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों को जो मौलिक अधिकार दिये गये हैं, क्या राज्य उन अधिकारों की सदैव रक्षा करता हैङ्क्ष नागरिक को असहमति व्यक्त करने, विरोध प्रकट करने, किसी आंदोलन में भाग लेने का अधिकार है या नहींङ्क्ष क्या राज्य अपने कार्य और दायित्व का सुचारू रूप से निर्वाह कर रहा है? जब चिकित्सा भी एक पेशा है, किसी चिकित्सक को गरीबों के साथ रह कर उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए? माओवादियों की संख्या बढ क्यों रही है? क्या विनायक सेन की गिरफ्तारी से समस्याएं सुलझ जायेंगी? विष्णु खरे ने सलवा जुडूम पर लिखी कविता 'कानून और व्यवस्था का उप मुख्य सलाहकार सचिव चिंतित प्रमुख मंत्री को परामर्श दे रहा है' का समापन इन पंक्तियों से किया है- 'मैं कहूंगा सर आप सेंट्रल लेबल पर एक पहल करें, ताकि हर जगह अपनी नींद से जागे और एक्टिव होकर हर किस्म की ऐसी बगावत को, नेस्तनाबूद करने को लामबंद हो, असली नेशनल सलवा जुडूम.' (पहल- 86)
छत्तीसगढ सरकार की आलोचना जारी है. नोबेल लॉरेट, नोम चोम्स्की, महाश्वेता देवी, अरुंधति राय- सभी विनायक सेन के पक्ष में क्यों हैं? क्या माओवादियों के आतंक का समाधान राज्य के आतंक से संभव है? इसी 29 मई को वाशिंगटन में विनायक सेन को विश्व स्वास्थ्य और मानवाधिकार के लिए जोनाथन मान अवार्ड से सम्मानित किया जायेगा और हिंदू के संपादकीय-'सेट विनायक फ्री' (15 मई, 2008) में विनायक सेन को सम्मान लेने के लिए रिहा करने को कहा गया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विनायक सेन के पक्ष में वक्तव्य दिये जा रहे हैं और आंदोलन भी चलाया जा रहा है.
रायपुर के पत्रकार और फिल्मकार अजय टीजी की 5 मई को हुई गिरफ्तारी भी सुर्खियों में है. उन पर यह आरोप है कि वे प्रतिबंधित संगठन के संपर्क में है. पिछले लोकसभा चुनाव (2004)में छत्तीसगढ के दांतेबाडा क्षेत्र के सुदूर पिछडे गांवों में अजय तथ्य प्राप्ति टीम के साथ थे. यह टीम माओवादियों द्वारा दिये गये चुनाव बहिष्कार के आह्वान के सिलसिले में ग्रामीणों की प्रतिक्रिया जानने के लिए गयी थी. अजय टीजी ने फोटो खींचना शुरू किया तो युवा माओवादियों ने उन्हें घेरा, पुलिस एजेंट समझ कर उन्हें कई घंटे रोका. बाद में वे छोडे गये, पर उनका कैमरा जब्त कर लिया गया. बाद में अजय ने माओवादी प्रवक्ता को 2004 में जब्त किया गया अपना कैमरा लौटाने को लिखा. पुलिस ने तहकीकात में अजय का कंप्यूटर रख लिया और उससे पत्र के संबंध में पूछा. अजय ने पत्र लिखना स्वीकारा. कंप्यूटर वापसी के लिए अजय स्थानीय अदालतों में गये. अजय के साथ विचित्र स्थिति उत्पन्न हुई. एक ओर वे माओवादियों के अपराध का शिकार हुए, माओवादियों ने उन्हें पुलिस एजेंट समझा और अब पुलिस उन्हें माओवादियों का समर्थक समझ रही है.
पीयूसीएल से विनायक सेन और अजय टीजी का संबंध है. पीयूसीएल के कार्यकर्ताओं पर भी राज्य सरकार की कडी निगाह है. छत्तीसगढ में पीयूसीएल, माकपा तथा निर्मला देशपांडे के साथ लंबे समय तक रहे गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार के वनवासी चेतना आश्रम तथा अन्य सलवा जुडूम की कुरूप वास्तविकता उजागर करने में लगे हुए हैं. 10 मई, 2008 को अजय टीजी के केस की सुनवाई थी, पर उन्हें पांच दिन पहले गिरफ्तार कर लिया गया.
पत्रकार, मीडियाकर्मी, बुद्धिजीवी, कवि-लेखक और संस्कृतिकर्मी किसी भी गतिशील समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं. वे संवाद और बहस करते हैं, जो लोकतंत्र में जरूरी है. तर्क के सिद्धांत और दमन के सिद्धांत में अंतर है. वे संवादों से, तर्कों और तथ्यों से राज्य को सुदृढ करते हैं. लोकतंत्र में प्रत्येक विचार के लिए जगह है. इसी से लोकतंत्र विकसित होता है. विरोधियों को शत्रु और दुश्मन मानने का चलन कुछ समय से बढा है. लोकतंत्र में सहमति से अधिक असहमति का स्थान है. विनायक सेन के मामले में अभी तक मानवाधिकार आयोग भी चुप है! मानवाधिकार सक्रियतावादी और पीयूसीएल के लोग जनतंत्र के रक्षक हैं. इन दोनों संगठनों से जुडाव के कारण ही किसी पर संदेह नहीं किया जा सकता. सबसे बडा प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार का भारत निर्मित कर रहे हैं. विनायक सेन और अजय टीजी की गिरफ्तारी से छत्तीसगढ की सरकार पर प्रश्न उठे हैं और विश्व भर में इस पर प्रतिक्रियाएं हो रही हैं. डॉ सेन को झूठे इलजाम में गिरफ्तार किये जाने से एक तरह से पूरी व्यवस्था संदेह के घेरे में आ गयी है.

डा विनायक सेन की रिहाई की मांग करते हुए अपील भेजें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के नाम

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/15/2008 12:49:00 AM

डा विनायक सेन की रिहाई की मांग की एक अपील राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और छत्तीसगढ के मुख्य सचिव को भेजने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें.

डा विनायक सेन को रिहा किया जाये.

विनायक सेन को रिहा किया जाए

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/14/2008 10:10:00 PM

डाक्टर एक साल से जेल में है। एक बेहद सीधा-सादा आदमी, अक्सर खामोश रहने वाला और अपनी लम्बी दाढी के कारण ध्यान खींचने वाला। उसने देश के गरीबों को दी गयी अपनी सेवाओं के लिए देश के संविधान और क़ानून के तहत कीमत चुकाई है-एक साल की लम्बी हिरासत के रूप में। और यह अभी न जाने कितने दिन और चलेगी। पूरी दुनिया से उसकी रिहाई की मांग में आवाजें उठने लगी हैं। नोबेल विजेता पत्र लिख रहे हैं, विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उस डाक्टर को अन्तर राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सम्मान दिए जा रहे हैं-यहाँ तक कि गांधीवादी सम्मान भी-जो एक नक्सली होने के आरोप में जेल में बंद है। क्या हम न्याय, संविधान, जनमत, मानवाधिकार आदि शब्दों को अपनी चमक और अर्थ खोते नहीं देख रहे हैं?
स्पेस , हमारे बोलने और जीने का हमसे छीना जा रहा हैं। यह हम पर निर्भर करता है, उन्हें हम बनाए रखने में कितना कामयाब रह पाते हैं. आईये, हम इन शब्दों को, अपने स्पेस को, अपने बोलने के अधिकार को, निरर्थक हो जाने से बचाएँ। अपना विरोध दर्ज कराएँ।

कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया गया : पढिये रविवार पर

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/11/2008 05:33:00 PM

संजय का

हालत यह हो गयी है कि आप कश्मीर पर बात करें तो पहला सवाल आता है कि कश्मीरी पंडितों पर क्या कहेंगे? फिल्म बनी तब से यही सवाल उठता रहा है कि आपने कश्मीरी पंडितों को क्यों नहीं और समय दिया. मेरा कहना है कि कश्मीर के मुद्दे को हिंदुस्तान में समझने के लिए कश्मीरी पंडितों को इस तरह इस्तेमाल किया गया है जैसे वे ही कवच हों और सबसे बडा सवाल हों.
आपने कश्मीर का नाम लिया ही कि आ गया सवाल कि- बोलिए पंडितों के साथ क्या हुआ?

मेरा कहना है कि पहले आप सबसे बड़े और पहले सवाल को देखें कि कश्मीर में क्या हुआ। इसके बाद ही तो कश्मीरी पंडित निकले न। कश्मीरी पंडितों का मामला कश्मीर समस्या के साथ जुड़ा हुआ है. आप पहले उसका हल करें. फिर इसके बाद ही बात होनी चाहिए. कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया गया. जो निकले-भागे बरबाद हुए, वे तो हुए ही, मगर जो जम्मू में कैंपों में रह रहे हैं, उनकी समस्या को कोई भी सरकार चुटकी में सुलझा सकती थी. लेकिन उन्हें बनाये रखना था सरकार को ताकि वे उनका इस्तेमाल कर सकें. जो पढे-लिखे पंडित थे, वे तो दिल्ली आ गये, पर जो छोटे और अनपढ किसान थे, वे बेचारे जम्मू और दूसरे कैंपों में रह रहे हैं. कश्मीरी पंडितों को अहम रोल दिया गया है, ताकि उनका इस्तेमाल हो सके और कश्मीर समस्या पर बात को अटकाया जा सके.

रविवार के अगले और नए अंक में हिम मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उडीसा से ख़ास रिपोर्टें। साथ में है अनुपम मिश्र की किताब साफ माथे का समाज का एक अंश, फिल्मों के रीमेक पर कृष्ण राघव का आलेख, जानेमाने डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता संजय काक से एक लम्बी बातचीत और इतिहासकार डी एन झा की एक टिप्पणी.

इसके अलावा है रविवार के इस नए अंक में और भी बहुत कुछ। तओ बस नीचे की इमेज पर क्लिक करें.



सभी ब्लॉगर साथियों से एक अपील

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/07/2008 10:41:00 PM

साथियों
प्रशांत राही पर की गयी पोस्ट में एक टिप्पणी आयी है कि उनकी रिहाई के लिए हम सभी ब्लॉगर अपने अपने ब्लागों पर लिखें और सामूहिक मेल करें।


swapandarshi said...
This is very unfortunate and undemocratic.
Can you write another article about mr Prashant Raahi, to introduce his work and him more. May be Aflatoon ji can write if he has been a long time friend of mr Raahi.

and many bloggers can have that appeal on their pages
as well a collective email appeal can be initiated...

मुझे भी लगता है कि ऐसा किया जाए। आप सबके सामने यह प्रस्ताव रख रहा हूँ।
इसके अलावा अफलातून जी से मेरा भी निवेदन है कि प्रशांत राही के बारे में एक पोस्ट लिखें।

...अंतत: माओवादियों का हाथ थामना होगा ! : प्रशांत भूषण

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/07/2008 10:15:00 PM

देश को जिस और ले जाया जा रहा है, वह वास्तव में चिंताजनक हैदेशी-विदेशी पूंजी सता के साथ मिल कर देश की जनता को विस्थापित करे, उन्हें जीने के हक़ से भी वंचित करे और जो उनके हक़ में आवाज़ उठाएं, उन्हें चुप कराने के लिए उन्हें माओवादी या उग्रवादी कह दिया जाएक्या यह वाकई एक लोकतंत्र है? तओ फिर क्या हुआ उन वादों का, जिनके बारे में संविधान हमसे करता है? या क्या वे किए ही नहीं गए? या कि वह सिर्फ़ एक शब्दजाल है? क्या हत्याएं जारी रहें और लोग चुप रहें? लोग विस्थापित कर दिए जाएं, उन्हें खाने भर तक को मिले, (इज्ज़त की ज़िंदगी तओ छोड़ ही दीजिये) और वे बोलें भी नहीं? अगर ऐसी हालत रही तओ कोई भी बाकी नहीं रह जायेगा, जो बोलना, लिखना, गीत गाना, गरीबों का इलाज करना चाहता हो (आप संघर्ष की तओ बात ही छोड़ दीजिये)। तओ क्या अब हम भी अपनी गिरफ्तारियों का इंतज़ार करें? तहलका हिन्दी से एक रिपोर्ट साभार।

सहानुभूति के खिलाफ युद्ध

शोभिता नैथानी

20 दिसंबर 2007 को आंतरिक सुरक्षा विषय पर आयोजित मुख्यमंत्रियों के एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक नाटकीय बयान दिया, "नक्सली देश के महत्वपूर्ण आर्थिक ढांचे को निशाना बना रहे हैं। उनका मकसद यातायात और दूसरी सुविधाओं को तहस नहस करना और साथ ही विकास की गति को धीमा करना है। वो स्थानीय स्तर के झगड़ों जैसे ज़मीन का मसला या फिर दूसरे छोटे मोटे विवादों में भी हस्तक्षेप कर रहे हैं। मैंने पूर्व में भी कई बार कहा है कि वामपंथी उग्रवाद संभवत: भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसा अभी भी है और हम तब तक शांति से नहीं बैठ सकते जब तक कि ये विषाणु पूरी तरह से समाप्त नहीं हो जाता।" इसके बाद उन्होंने राज्यों को इस बात का विश्वास भी दिलाया कि नक्सलवादी ताकतों को पंगु बनाने के लिए सुरक्षा बलों के आधुनिकीकरण पर और ज्यादा निवेश किया जाएगा।

प्रधानमंत्री का बयान ऐसे समय में आया था, जब तमाम राज्यों में पुलिस लगातार ऐसे किसी भी व्यक्ति से निपटने के अभियान में जुटी हुई थी, जो अति वामपंथी विचारधारा से किसी भी तरह की सहानुभूति रखने वाला प्रतीत हो रहा था। इस काम के लिए पुलिस के पास कई घातक हथियार थे--ग़ैरक़ानूनी गतिविधि नियंत्रण एक्ट 1967, छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट 2005, आंध्र प्रदेश पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट 1992, ऐसे क़ानून जो सरकार को ये अधिकार देते हैं कि जो विचारधारा या राजनीति उसे पसंद नहीं है उनसे जुड़े किसी भी व्यक्ति को वो गिरफ्तार कर सकती है और संविधान में मौजूद नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के साथ खिलवाड़ कर सकती है.
गोविंदन कुट्टी, प्रफुल्ल झा, पित्ताला श्रीशैलम और लचित बारदलोई- ये सारे पत्रकार (या पूर्व पत्रकार) या फिर मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। इन्हें नक्सली होने या उनसे सहानुभूति रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। केवल बारदोलोई इनमें अपवाद हैं, जिनके ऊपर उल्फा से संबंध रखने का भी आरोप है। गिरफ्तारियों की ये बाढ़ चिंता में डालती है। इनमें से ज्यादातर मामलों में किसी तरह की हिंसा या फिर किसी तरह के अपराध के कोई आरोप नहीं रहे। इनके ऊपर सिर्फ उग्रवादी गुटों से सहमति रखने या फिर इस तरह के लोगों से संबंध रखने के आरोप हैं। इसलिए ये गिरफ्तारियां सरकार की बढ़ती असहिष्णुता की गवाही देती हैं जिसके तहत सरकार के समर्थक न होने और वर्तमान आर्थिक नीतियों के खिलाफ चलनेवाली किसी भी राजनीतिक विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है।
नीचे कुछ मामलों का संक्षेप में विवरण है--
प्रशांत राही

48 साल का ये मानवाधिकार कार्यकर्ता "द स्टेट्समैन" का उत्तराखंड में संवाददाता था। इन्हें 22 दिसंबर, 2007 को उत्तराखंड में हंसपुर खट्टा के जंगलों से गिरफ्तार किया गया था। इनके ऊपर प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) समूह का ज़ोनल कमांडर होने का आरोप है। राही पर भारतीय दंड संहिता की तमाम धाराएं थोपी गई हैं इसमें 'ग़ैरक़ानूनी गतिविधि नियंत्रण एक्ट' भी शामिल है। इस संबंध में रुद्रपुर के एसएसपी पीवीके प्रसाद से पूछे जाने पर उनका जवाब था-- "जाइए जेल में खुद उन्ही से पूछ लीजिए। जिस तरह की गतिविधियों में वो लिप्त था उसकी मैं चर्चा भी नहीं कर सकता।" राही की बेटी शिखा जो कि मुंबई में रहती हैं उनसे 25 दिसंबर, 2007 को ऊधमसिंह नगर ज़िले के नानकमत्था थाने में मिली थीं। शिखा उनसे हुई बातचीत के बारे में बताती हैं-- "उन्हें 17 दिसंबर, 2007 को देहरादून से गिरफ्तार किया गया था। अगले दिन उन्हें हरिद्वार ले जाया गया, जहां उन लोगों ने उन्हें पीटा और उनकी गुदा में मिट्टी का तेल डाल देने की धमकी दी। पुलिस वालों ने उनसे ये भी कहा कि वो उन्हें अपने सामने मेरा बलात्कार करने के लिए मजबूर कर देंगे। अंतत: 22 दिसंबर, 2007 को पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी दिखाई।"
"राही की गिरफ्तारी का समय प्रधानमंत्री के बयान से बिल्कुल मेल खाता है जिसमें उन्होंने माओवादी उग्रवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। राज्य के मुख्यमंत्री ने इस सम्मेलन में पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए केंद्र से 208 करोड़ रूपए की मांग की थी", राही के पूर्व सहयोगी और स्वतंत्र पत्रकार हरदीप कहते हैं। उनके एक औऱ मित्र और 'गढ़वाल पोस्ट' के संपादक अशोक मिश्रा मानते हैं कि राही को सिर्फ उनकी राजनीतिक विचारधारा की वजह से परेशान किया जा रहा है। "वो वामपंथी विचारधारा के हैं और तमाम जन आंदोलनों में शामिल रहे हैं, जिनमें नए राज्य का निर्माण और टिहरी बांध के विरोध का आंदोलन भी शामिल है। उन्होंने राही को इसलिए गिरफ्तार किया है क्योंकि वो ऊधमसिंह नगर में ज़मीन, शराब और बिल्डिंग माफिया के खिलाफ लोगों को गोलबंद करने में लगे हुए थे। मुझे सिर्फ इसी बात की खुशी है कि पुलिस ने उनके साथ एके-47 नहीं दिखाई या फिर उन्हें फर्जी एनकाउंटर में मार नहीं गिराया।"
पित्ताला श्रीसैलम
ऑनलाइन टेलिविज़न मुसी टीवी में एडिटर और तेलंगाना जर्नलिस्ट फोरम(टीजेएफ) के सह संयोजक, 35 वर्षीय श्रीशैलम को उनके मुताबिक 4 दिसंबर 2007 को गिरफ्तार किया गया था। लेकिन पुलिस के दस्तावेजों की मानें तो उन्हें 5 दिसंबर को आंध्र प्रदेश के प्रकाशम ज़िले से गिरफ्तार किया गया था। उनके ऊपर माओवादियों का संदेशवाहक होने का आरोप लगाया गया था। "मैं एक माओवादी नेता का साक्षात्कार करने गया था और पुलिस ने मेरे ऊपर माओवादियों की मदद करने के फर्जी आरोप जड़ दिए," श्रीशैलम बताते हैं। उन्हें 13 दिसंबर को छोड़ दिया गया। मुसी टीवी और तेलंगाना जर्नलिस्ट फोरम दोनो ही अलग तेलंगाना राज्य के समर्थकों में से हैं।
उनके सहयोगी और टीजेएफ के संयोजक अल्लम नारायण इसके पीछे सरकार का विरोध करने वालों को कुचलने की साज़िश देखते हैं। "श्रीशैलम की गिरफ्तारी के बाद सरकार ने ये कहना शुरू किया कि टीजेएफ के भी माओवादियों से संबंध हैं। लेकिन हम पत्रकार हैं औऱ हमें अपनी सीमाएं मालूम हैं। हमारा एकमात्र लक्ष्य है पृथक तेलंगाना राज्य और इसे हम संसदीय व्यवस्था के तहत हासिल करेंगे।" श्रीशैलम स्पष्ट करते हैं कि किसी पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता के लिए गरीबों और जंगलों में रह रहे दबे कुचलों से मिलना कोई आसामान्य बात नहीं है, किसी मौके पर माओवादियों से भी मुलाक़ात हो सकती है। वो सफाई देते हैं- "लेकिन इससे कोई माओवादी नहीं बन जाता।"
गोविंदन कुट्टी
पीपुल्स मार्च के तेज़ तर्रार संपादक गोविंदन कुट्टी को केरल पुलिस ने 19 दिसंबर, 2007 को गिरफ्तार किया था। उनके ऊपर प्रतिबंधित माओवादी संगठनों से अवैध संबंध रखने का आरोप था। ग़ैरक़ानूनी गतिविधि नियंत्रण एक्ट (1967) के तहत गिरफ्तार किए गए कुट्टी 24 फरवरी, 2008 को ज़मानत पर रिहा हुए हैं। वापस लौटते ही उन्हें अपने घर पर एर्नाकुलम के ज़िला मजिस्ट्रेट का आदेश चिपका मिला। इसमें कहा गया था कि पीपुल्स मार्च का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया है। इसमें प्रकाशित सामग्री "बगावती है जो कि माओवादी विचारधारा के जरिए भारत सरकार के प्रति अपमान और घृणा की भावना फैलाती है।"
लेकिन इसका प्रकाशन शुरू होने के सात सालों बाद अब ऐसा क्यों? " इसके लेख भारतीय राष्ट्र की भावना के विरोध करनेवाले हैं। पुलिस काफी पहले ही पत्रिका पर प्रतिबंध लगाना चाहती थी लेकिन इस पर सबका ध्यान कुट्टी की गिरफ्तारी के बाद ही गया", एर्नाकुलम के डीएम एपीएम मोहम्मद हनीश कहते हैं। बहरहाल कुट्टी मानते हैं कि सरकारी नीतियों से विरोध रखने वाले किसी भी व्यक्ति पर माओवादी ठप्पा लगाना उससे निपटने का सबसे आसान तरीका बन गया है। वो दृढ़ता से कहते हैं अगर किसी विचारधारा का समर्थन करना उन्हें माओवादी बना देता है तो वो खुद को माओवादी कहलाने के लिए तैयार हैं। "चार तरफ हिंसा ही हिंसा फैली हुई है। भ्रष्टाचार हिंसा है, वैश्यावृत्ति हिंसा है, न्यूनतम मेहनाता नहीं देना हिंसा है, बालश्रम हिंसा है, जातिगत भेदभाव हिंसा है," वो आगे जोड़ते हैं, "मैं क़ानून का पालन करने वाला नागरिक हूं।"
प्रफुल्ल झा
छत्तीसगढ़ में पीयूसीएल के अध्यक्ष राजेंद्र सेल के शब्दों में-- "प्रफुल्ल झा छत्तीसगढ़ के दस सर्वश्रेष्ठ मानवविज्ञानियों में हैं। वो एक ऐसे पत्रकार हैं जिनके विश्लेषण तमाम राष्ट्रीय समाचार चैनलों में अक्सर शामिल किए जाते हैं।" 60 वर्षीय दैनिक भाष्कर के इस पूर्व ब्यूरो प्रमुख को 22 जनवरी, 2008 को गिरफ्तार किया गया था। उनके ऊपर रायपुर पुलिस द्वारा पकड़े गए हथियारों के एक ज़खीरे से संबंध होने का आरोप है। "उन्हें और उनके बेटे को नक्सलियों ने कार खरीदने के लिए पैसे दिए ताकि वो नक्सली नेताओं और हथियारों को इधर से उधर भेज सकें। वो नक्सली साहित्य का हिंदी में अनुवाद भी किया करते थे", कहना है छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन झा का। वो आगे कहते हैं, "कृपया उन्हें पत्रकार मत कहिए।"
डेली छत्तीसगढ़ के संपादक सुनील कुमार अपनी बात वहीं से शुरू करते हैं जहां डीजीपी साहब अपनी बात खत्म करते हैं। "उनके मामले का मीडिया उसकी आज़ादी के हनन से कुछ भी लेना-देना नहीं है। वो नक्सलियों के एक सक्रिय और वेतनभोगी कार्यकर्ता थे।" कुमार बताते हैं कि झा को इससे पहले भी एक पब्लिकेशन कंपनी ने पैसों के गबन के आरोप में बाहर निकाल फेंका था। लेकिन सेल मानते हैं कि चाहे डा. बिनायक सेन हो या झा इनकी गिरफ्तारी का मकसद सरकारी नीतियों के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को दबाना ही है। उनके मुताबिक, "ये मेरा विश्वास है कि झा नक्सली नहीं हैं। ये कहना सही नहीं होगा कि वो पत्रकार नहीं हैं।"
लछित बारदोलोई
मानवाधिकार कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार लछित, सरकार और उल्फा के बीच बातचीत में लंबे समय से मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें 11 जनवरी, 2008 को असम के मोरनहाट से गिरफ्तार किया गया। आरोप लगे कि वे उल्फा के साथ मिलकर गुवाहाटी हवाई अड्डे से एक जहाज को अपहरण करने की योजना से रिश्ता रखते थे। इस हाईजैकिंग की योजना का मकसद असम के रंगिया कस्बे में पुलिस द्वारा 2007 में जब्त किए गए हथियारों को छुड़वाना और उल्फा के लिए धन इकट्ठा करना था। आरोपों के बारे में गुवाहाटी के एसएसपी वी के रामीसेट्टी कहते हैं, "अपहरण के मामले में, हमें उल्फा के एक गिरफ्तार आतंकी ने बयान दिया है जिसमें उसने खुद के और बारदोलोई के शामिल होने की बात कही है।"
मानवाधिकार संस्था मानव अधिकार संग्राम समिति (एमएएसएस) , जिसके बारदोलोई महासचिव हैं-- के अध्यक्ष बुबुमनी गोस्वामी पुलिस के आरोप को पूरी तरह से नकार देते हैं। । गोस्वामी बताते हैं, "कुछ सरकारी अधिकारी और पुलिस वाले उल्फा समस्या को हल ही नहीं होने देना चाहते। केंद्र हमेशा विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए मोटी रकम जारी करता है। अगर वर्तमान हालत जारी रहेंगे तो उनका फायदा भी जारी रहेगा।" बारदोलोई के वकील बिजन महाजन अपने मुवक्किल के रंगिया मामले में शामिल होने के आरोपों को सिरे से नकार देते हैं। "अगर ये बात सच थी तो जांच एजेंसियों को उन्हें तुरंत गिरफ्तार करना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। ये सीधे सीधे पिक एंड चूज़ की राजनीति है जिसमें राज्य शामिल है।"
इन पांचो गिरफ्तारियों का समय और प्रकृति, क्या प्रधानमंत्री के मुताबिक देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती के प्रति बढ़ती सरकार की बेचैनी की ओर इशारा नहीं करते? तथ्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत आंतरिक सुरक्षा के मद में सरकार ने 2500 करोड़ रूपए का प्रावधान किया है। इसमें केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों के उपकरणों का सुधार भी शामिल है। ये 10वीं योजना में जारी की गई रकम से करीब करीब चार गुना ज्यादा है। पुलिस आधुनिकीकरण योजना के तहत साल 2005 के बाद से देश के नक्सल प्रभावित 76 ज़िलों में पुलिस के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए हर साल दो-दो करोड़ रूपए मिलते हैं।
सरकार का नक्सलियों से निपटने का तरीका पूरी तरह क़ानून व्यवस्था की समस्या से निपटने वाला है। इसकी सामाजिक-आर्थिक जड़ों की अनदेखी की अक्सर कड़ी आलोचना होती रहती है। "सरकार उन सभी वामपंथी कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है जो नक्सलवादियों और माओवादियों के प्रति सरकारी नीतियों को उजागर कर रहे हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा ज़मीन अधिग्रहण गतिविधियों का विरोध करने वालों को भी निशाना बनाया जा रहा है", कहना है नागरिक अधिकारों के वकील प्रशांत भूषण का। वो आगे कहते हैं, "शांतिप्रिय कार्यकर्ताओं को निशाना बनाकर देश में नक्सलवाद को बढ़ावा ही मिलेगा क्योंकि इससे उन्हें मजबूरन भूमिगत होना पड़ेगा और अंतत: माओवादियों का हाथ थामना होगा।"


प्रशांत राही को रिहा किया जाए

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/06/2008 10:03:00 PM

Aflatoon said...

प्रशान्त मेरे छात्र जीवन के परिचित हैं और 'पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता'कम एक निष्ठावान समर्पित राजनैतिक कार्यकर्ता ज्यादा हैं । खण्डूरी से अपील है कि हिटलरी चाल से बाज आएं और प्रशान्त को अविलम्ब रिहा करें । इस पोस्ट पर उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ई-पते और फैक्स दिए जाएं ।

manjula said...

सच में इस देश में तो इंसान की तरह जीना भी दुश्‍वार होता जा रहा है. पहले अनसुइया सेन और अब शिखा राही. पता नहीं कहां जाकर रूकेगा ये

काकेश said...

यदि यह आरोप सही हैं तो पुलिस के इस कुकृत्य की घोर भर्त्सना करनी चाहिये. इस तरह तो सचमुच देश में रहना मुश्किल होता जा रहा है.

vijay gaur said...

स्टेट्स्मैन से पहले प्रशांत देहरादून से निकलने वाले दैनिक "हिमाचल टाइम्स" में नौकरी करता था. देहरादून से निकलने वाली मासिक पत्रिका "युगवाणी" के एक अंक में पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा ने अपने इस मित्र पर अच्छे से लिखा है.

manish said...

एक तरफ़ तओ सरबजीत कि रिहाई के लिए एक तरह से मीडिया और अन्धाराष्ट्रवादियों ने अभियान छेड़ रखा है, पर अपने ही देश में जनता कि आवाज़ उठानेवाले प्रशांत राही, विनायक सेन, जीतन मरांडी जैसे लोग काले कानूनों के नाम पर जेलों में बंद हैं। और इनके लिए कहीं भी कुछ खास लोगों को छोड़ जनता सड़क पर नहीं उतरी है। पूंजीपतियों द्वारा मीडिया भी उनकी रिहाई के लिए कोई मीडिया ट्रायल नहीं चला रहा है। अगर हम सब इसी तरह चुप रहे तओ अगली बारी हमारी है।


ये टिप्पणियाँ प्रशांत राही की रिहाई के लिए उनकी बेटी शिखा राही द्वारा की गयी अपील पर आयी हैं। इनमें जो चिंता जतायी गयी है, वह एक, दो तीन या पाँच लोगों की ही चिंता नहीं है। यह हमारी समकालीन चिंताओं में से है। जब हमें बोलने, लिखने, पढ़ने, नाटक कराने नहीं दिया जायेगा-तओ फिर इस आज़ादी और लोकतंत्र का क्या मतलब है?
लोकतंत्र का ढोल पीटने वाली सरकारें इस तरह से पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को हमेशा से तंग करती आई हैं. बात केवल प्रशांत तक ही सीमित नहीं है, इस तरह के स्टेट टेररिज्म कि चपेट में कोई भी सकता है, इसलिए हरेक जागरूक नागरिक को इस घटना का पुरजोर विरोध करना चाहिए
इसके अलावा बात उन सबकी भी है, जो भारत की जेलों में बंद हैं-इस या उस विचारधारा के मानने वाले के नाम पर। हम, इस पोस्ट के ज़रिये उन सबकी रिहाई की अपील भी करते है। वे चाहें जिस भी सिद्धांत के मानने वाले हों, उन्हें लिखने, पढ़ने, बोलने और हर वह काम कराने की आज़ादी मिलनी चाहिए, जो संविधान ने उन्हें दे रखी है।

रेयाज़-उल-हक़
संदीप


अफलातून जी के सुझाव पर इस पोस्ट में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का फैक्स नं और मेल आईडी तथामानवाधिकार आयोग का सम्पर्क भी दिया जा रहा है

भुवनचंद्र खंडूरी (मुख्यमंत्री, उत्तराखंड)
मेल : cm-ua@nic.in
bckhanduri@nic.in

फैक्स : 0135- 2665722
0135- 2755102
0135- 2712527

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
श्री अखिल कुमार जैन
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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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