हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

पानी पर सत्ता के खेल

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/28/2008 04:34:00 PM

नदिया बिक गई पानी के मोल- 4

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आलोक प्रकाश पुतुल
चौथी किस्त पहले की तीन किस्तें यहाँ पढ़ें
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पानी पर सत्ता के खेल
नांनदोलनों से जब सरकार की नींद खुली तो छत्तीसगढ़ राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने 2 अप्रेल 2003 को घोषणा कि - “ रेडियस के साथ किया गया अनुबंध समाप्त किया जाएगा.पूरे मामले की जांच करवाई जाएगी और इसमें जो भी दोषी होगा, उस पर कार्रवाई होगी.”

लेकिन नहीं, यह सब केवल राजनीतिक बयान भर रह गया.

रेडियस वाटर पर कार्रवाई के बजाय रेडियस ने ही उल्टे आंदोलन करने वाले लोगों और इसकी खबर छापने वाले पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना शुरु कर दिया. जनता की लड़ाई चलती रही.

इसके बाद 2003 में अगली सरकार भाजपा की बनी और उसने भी इस मामले में जल्दी कार्रवाई का आश्वासन दिया. लेकिन सत्ता का चरित्र एक जैसा होता है. हालत ये है कि इस पूरे मामले की जांच के लिए बनाई गई छत्तीसगढ़ विधान सभा की लोक लेखा समिति की रिपोर्ट को भी सरकार ने ठंढ़े बस्ते में डाल दिया.

लोक लेखा समिति ने 16 मार्च 2007 को राज्य विधानसभा में अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए सिफारिश की थी कि रेडियस वाटर लिमिटेड के साथ मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड रायपुर (वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम) के मध्य निष्पादित अनुबंध एवं लीज़-डीड को प्रतिवेदन सभा में प्रस्तुत करने के एक सप्ताह की अवधि में निरस्त करते हुए समस्त परिसम्पत्तियां एवं जल प्रदाय योजना का आधिपत्य छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकाल निगम द्वारा वापस ले लिया जाए.

सिफारिश में कहा गया था कि मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड एवं मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड, रायपुर के तत्कालीन प्रबंध संचालकों एवं मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक निगम लिमिटेड के मुख्य अभियंता के विरुद्ध षड़यंत्रपूर्वक शासन को हानि पहुँचाने, शासकीय सम्पत्तियों को अविधिमान्य रूप से दस्तावेजों की कूटरचना करते हुए एवं हेराफेरी करके निजी संस्था को सौंपे जाने के आरोप में प्रथम सूचना प्रतिवेदन कर उनके विरुद्ध अभियोजन की कार्यवाही संस्थापित की जाए और इस आपराधिक षडयंत्र में सहयोग करने और छलपूर्वक शासन को क्षति पहुँचाते हुए लाभ प्राप्त करने के आधार पर रेडियस वॉटर लिमिटेड के मुख्य पदाधिकारी के विरुद्ध भी अपराध दर्ज कराया जाए.

सिफारिश में कहा गया था कि मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड, रायपुर एवं जल संसाधन विभाग के तत्कालीन अधिकारी जिनकी संलिप्तता इस सम्पूर्ण षडयंत्र में परिलक्षित हो, इस संबंध में भी विवेचना कर उनके विरुद्ध भी कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही एक माह की अवधि में आरंभ की जाए.

लोक लेख समिति ने यह भी कहा कि समिति द्वारा अनुशंसित सम्पूर्ण कार्यवाही सम्पादित करने की जिम्मेदारी सचिव स्तर के अधिकारी को सौंपते हुए शासन का हित रक्षण करने के लिए उत्कृष्ट विधिक सेवा प्राप्त करते हुए आवश्यकतानुसार न्यायालयीन प्रकियाओं में विधिक प्रतिरक्षण हेतु भी प्रयाप्त एवं समुचित कार्यवाही सुनिश्चित की जाए ताकि विधिक प्रतिरक्षण के अभाव में अथवा कमज़ोर विधिक प्रतिरक्षण के कारण शासन को अनावश्यक रूप से अलाभकारी स्थिति में न रहना पड़े.
लेकिन एक सप्ताह में रेडियस वाटर लिमिटेड और मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड रायपुर के समझौते को रद्द करने की कौन कहे, इस पूरे मामले में दिसंबर 2007 तक संबंधित सिफारिश के मामले में विधिक विमर्श की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हो सकी.

लोकलेखा समिति के सदस्य और पानी के मामलों के जानकार विधायक रामचंद्र सिंहदेव कहते हैं- “यह संविधान का मजाक है. इससे भयावह कुछ नहीं हो सकता कि लोकलेखा समिति की रिपोर्ट को ठंढ़े बस्ते में डाल दिया जाए.”

शिवनाथ अब भी कब्जे में है. गाहे-बगाहे आंदोलन करने वाले लोग अपनी आवाज़ उठाते हैं और फिर उनकी आवाज़ पूंजी और भ्रष्टाचार के दरवाजों से होते हुए सत्ता के गलियारे में गुम हो जाती है.

होली के खिलाफ एक पर्चा

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/20/2008 07:54:00 PM



रंग अच्छे लगते तो हैं, लेकिन तब जब वे आंखों के सामने हों. अगर वे आंखों में डाल दिये जायें तो चुभने लगते हैं. होली में जिस तरह औरतों को लेकर निम्नस्तरीय और अपमानजनक टिप्पणियां की जाती हैं, गीत गाये जाते हैं-वे शर्मशार करते हैं. स्त्रियों की इस तरह इज्जात उतारने का उत्सव किसी और सभ्यता-संस्कृति में शायद ही होता हो, जिसमें पूरा समाज भाग लेता हो. समाज की जो हाइरार्की है-हर कमजोर को, दलित को, औरतों को लक्षित करके जिस तरह होली मनायी जाती है-वह असहनीय है. होली सामंती समाज का त्योहार है और कम से कम वे लोग, जो इस समाज को खारिज करते हैं, उसे खत्म करना चाहते हैं-उन्हें इसके खिलाफ आना चाहिए कि होली की यादों में उभ-चुभ करना चाहिए. कुमार अनिल की रिपोर्ट, एक गांव से लौट कर.


कुमार अनिल
िहार के दलित टोलों में होली किसी बुरे सपने की तरह रही है. दबंग लोगों के लिए होली हमेशा से उत्पीडन का बहाना रही है. पुलिस अथवा सामंती ताकतों द्वारा जनसंहार झेल चुके दर्जन भर गांवों के दौरे के बाद लेखक ने होली को हर गांव में उत्पीडन का जरिया ही पाया.
आज से 20 साल पहले दलित टोलों में होली नहीं खेली जाती थी. लोग सहमे- सहमे रहते थे. गांव के बडे लोगों का होली गाता हुजूम हर दलित टोलों में घूमता था. भूमिहीन परिवारों की बहू-बेटियों के नाम लेकर अश्लील गीत गाये जाते थे. एक ही टोली एक ही समय में सास बहू और मां बेटी के नाम लेकर अश्लील गीत गाती थी. औरतों के कोमल अंगों का जोर-जोर से उल्लेख किया जाता था. दलित नौजवान मन मसोस कर रह जाते थे. रतनी फरीदपुर प्रखंड का नोआवां गांव भी यही कहानी कहता है. पता नहीं यह परंपरा कब से चली रही थी.
इस गांव में सबसे पहले कहार जाति के युवा कैलाश राम ने इस अश्लीलता का विरोध किया. इस गांव में कहार जाति के महज 20 घर हैं, पर रविदासों के 50, मुसहरों के 30, पासवानों के 10 डोमों के आठ घर हैं.
बात 1984 की है. कैलाश ने पूरे दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व किया. उसे अश्लील गीतों के विरोध का खामियाजा भुगतना पडा. दबंगों ने उसे बुरी तरह पीट दिया. उसे मरा हुआ जान कर छोड दिया गया. पिटाई तो कैलाश राम की हुई, पर पूरा दलित टोला घायल हुआ. घटना के बाद सभी में जबरदस्त एकता बन गयी. उसके बाद दलितों सामंती ताकतों के बीच लंबी लडाई चली. एक ही गांव जैसे दो दुश्मन देश बन गये. एक टोले के लोग दूसरे टोले में अकेले जाने की हिम्मत नहीं कर सकते थे. अनेकों गांवों में होली के अवसर पर दलितों के जनसंहार भी हुए हैं. रणवीर सेना होली को जनसंहार दिवस के रूप में मनाती रही है. समय बदला उत्पीडन का स्वरूप भी बदला. शक्ति संतुलन बदलने के कारण अब दलित टोलों में भी युवा होली खेलने लगे हैं. दुर्भाग्य से आज के दलित युवा भी होली की अश्लीलता से अछूते नहीं हैं. उन्होंने दबंगों की अश्लीलता को अपना लिया. हालांकि यह वैसा नहीं है, जैसा पहले के जमाने में होता था. समय के साथ उत्पीडन के हथियार भी बदल गये हैं.

फलस्तीनी क्रांति की चेतना : जॉर्ज हब्बाश

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/07/2008 01:25:00 AM












फलस्तीनी क्रांति की चेतना

जॉर्ज हब्बाश

02 अगस्त, 1926-26 जनवरी, 2008


रेयाज-उल-हक


सभी क्रांतिकारियों को निश्चित तौर पर मार्क्सवादी होना चाहिए, क्योंकि माक्सर्वाद मजदूर वर्ग की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति है.
-जॉर्ज हब्बाश

लस्तीनियों के बेवतन होने के 50 वें साल में उनके हकीम ने उन्हें अलविदा कह दिया. यह पूरी दुनिया के जनसंघर्षों, छापामार योद्धाओं और मार्क्सवादी-लेनिनवादी क्रांतिकारियों के लिए एक उदास कर देनेवाली खबर थी. यह हर तरह के शोषण के खात्मे और बराबरी का सपना देखनेवाले लोगों के लिए आंसुओं से भरी हुई खबर थी-आंसुओं, खून और पसीने से भरी हुई, जो जॉर्ज हब्बाश उर्फ हकीम के जीवन का हिस्सा रहे. जॉर्ज हब्बाश नहीं रहे. 82 साल की उम्र में जब उन्होंने अपनी आंखें बंद कीं, उनके वतन के 40 लाख लोग-एक पूरा का पूरा देश-अपनी अनेक पीढियों के शोक, पीडा और अपराजेय लडाइयों के साथ अब भी निर्वासित, बेघरबार और बेजमीन बने हुए हैं. वे एक ऐसे देश के बाशिंदे हैं, जिसकी अपनी कोई जमीन नहीं रही. उनकी जमीन उनसे छीन कर एक दूसरे देश को दे दी गयी और वह दूसरा्व देश लगातार अपनी घेराबंदी उनके चारों ओर कसता जा रहा है.
हब्बाश
2 अगस्त, 1926 को लिड्डा में जन्मे थे. उनका परिवार एक यूनानी ऑर्थोडॉक्स ईसाई परिवार था. उनका परिवार व्यापार करता था और काफी संपन्न था. जब हब्बाश 10 वर्ष के थे, 1936 में विद्रोह और क्रांतिकारी संघर्ष से उनका पहला परिचय हुआ. यह महान फलस्तीनी विद्रोह के फूट पडने का दौर था. बाद में, अभी से लगभग 10 साल पहले एक इंटरव्यू के दौरान हब्बाश ने उन दिनों को याद किया. उन्होंने याद किया कि किस तरह फलस्तीनी राष्ट्रवादी आंदोलनकारी ब्रिटेन के खिलाफ बडे विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया करते थे. उन्होंने उन शिक्षकों को याद किया, जिन्होंने उन सबमें संघर्ष की भावना भरी थी और अपने छात्रों को अपनी मातृभूमि के लिए संघर्ष को प्रोत्साहित किया था. हब्बाश ने उन्हें भी याद किया था, जिन्होंने दुनिया के इस सबसे लंबे युद्ध में अपनी जमीन और अपने लोगों के लिए महान शहादतें दीं.

जॉर्ज हब्बाश उन्हीं शहादतों, उन्हीं संघर्षों, उन्हीं लडाइयों और मुक्ति के उन्हीं सपनों की उपज थे. 1948 में हब्बाश अपने परिवार के साथ एक शरणार्थी बन गये, जब इस्राइल की स्थापना की गयी और फलस्तीन में जायनिस्ट हमलावर घुस आये. लाखों फलस्तीनी अपने घरों से जबरन खदेड दिये गये. फलस्तीनियों के जेहन में यह घटना अल नकबा के नाम से याद है।
हब्बाश के परिवार को लेबनान में शरण लेनी पडी. वहां रहते हुए हब्बाश का नामांकन बेरूत स्थित अमेरिका विश्वविद्यालय में हो गया, जहां उन्होंने मेडिकल की पढाई की. एक बातचीत में हब्बाश ने तबके लेबनानी राष्ट्रपति डॉ बायर्ड डोडगे की बातों को याद किया है-वे हमसे कहते कि हमें अमेरिका के बारे में बताओ जो कि इंसाफ, आजादी और मानवतावादी उसूलों के लिए खडा है. लेकिन हम उनकी बातों में, जो वे अमेरिका के बारे में कह रहे होते और अमेरिका जो कर रहा होता-इस्राइल और यहूदीवाद का समर्थन-में विरोधाभास देखते.
हब्बाश ने 1951 में मेडिकल की अपनी पढाई पूरी की. उन्होंने कुछ समय तक प्रैक्टिस भी की.
उन्होंने उन दिनों अपनी जन्मभूमि लिड्डा की यात्रा की, जब वह एक जायनिस्ट हत्यारे गिरोह के कब्जे में थी. शहर पर इस्राइली सुरक्षा बलों द्वारा चलाये जा रहे हगाना नामक गिरोह की मदद से शासन कर रहे उक्त जायनिस्ट गिरोह ने शहर को लगभग श्मशान में तबदील कर दिया था. शहर के 20 हजार बाशिंदों का सफाया कर दिया गया. अब हम इस घटना को लिड्डा डेथ मार्च्व के नाम से जानते हैं. इस्राइली इतिहासकारों के अनुसार इसमें सिर्फ 335 आदमी, औरतें और बच्चे मारे गये, जबकि अन्य स्रोत इससे कहीं अधिक की संख्या बताते हैं. इस घटना के पहले 426 लोगों की हत्या जायनिस्ट बलों ने कर दी थी. विस्थापित फलस्तीनी जॉर्डन में शरण ले रहे थे. हब्बाश जॉर्डन स्थित इन शरणार्थी शिविरों में डॉक्टर के रूप में काम कर रहे थे. यहां रोज उनका सामना निर्वासन के कठोर जीवन और इस्राइली क्रूरता से होता. धीरे-धीरे वे मिस्र के राष्ट्रपति कमाल अब्दुल नासिर के अखिल अरब राष्ट्रवाद्व के करीब आये.
1957 में उन्हें जॉर्डन छोडने पर मजबूर होना पडा, क्योंकि तत्कालीन सरकार ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. इसके लगभग एक साल बाद, 1958 में अमेरिका विवि, बेरूत के पूर्व छात्रों को लेकर हब्बाश ने अरब नेशनलिस्ट मूवमेंट शुरू किया. जो कि अम्मान और जॉर्डन में सक्रिय था. उनकी कोशिश थी कि इस्राइल के विरुद्ध सारा अरब जगत एक हो जाये.

1967 में इस्राइल-अरब के बीच छह दिवसीय युद्ध हुआ, जिसने मध्यपूर्व के भावी इतिहास की दिशा तय की. इस युद्ध में अरबों की पराजय हुई और इस्राइल ने पूर्वी येरुशेलम, पश्चिमी तट और गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया.

इलाके में बढते इस्राइली प्रभाव, मध्यपूर्व में अमेरिकी हस्तक्षेप, इस्राइल को खुली अमेरिकी मदद और अरब जगत पर विभिन्न रूपों में जायनिस्ट हमलों ने हब्बाश के लिए यह साफ कर दिया कि शांतिपूर्ण और समझौतावादी संघर्षों से कुछ नहीं होनेवाला. उन्होंने फलस्तीन की मुक्ति के लिए नये तरह के युद्ध की जरूरत समझी और पॉपुलर फ्रंट फॉर लिबरेशन ऑफ पैलेस्टाइन्व (पीएफएलपी) नामक मशहूर संगठन की बुनियाद रखी।





हब्बाश
के लिए अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की समझ और घटनाओं के आपसी अंतर्संबंध इतने साफ थे कि वे मध्यपूर्व में साम्राज्यवाद के अस्तित्व, उसके स्वरूपों, उसके उत्पीडन और उसके खिलाफ निर्णायक युद्ध की जरूरत को मध्यपूर्व के किसी भी नेता से अधिक समझ रहे थे. इसलिए उन्होंने सिर्फ फलस्तीन की मुक्ति तक ही अपने को सीमित नहीं रखा. वे यह जानते थे कि उनका देश साम्राज्यवाद के मंसूबों के तहत उत्पीडन का शिकार है और इसके पतन के बगैर फलस्तीन आजाद नहीं हो सकता. इसके लिए पूरे अरब जगत और पूरी दुनिया में साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ संघर्षों की जरूरत और उनसे फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष की एकता के महत्व को उन्होंने समझा.
यही वजह रही कि हब्बाश के पीएफएलपी ने पीएलओ के एक और घटक फतह से बिल्कुल भिन्न रास्ता अपनाया. फतह ने अपने को फलस्तीनी चरित्र दिया और उसने अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही सशस्त्र संघर्ष का सहारा लिया और इसके साथ-साथ कूटनीतिक कार्रवाइयां जारी रखीं. इसके उलट पीएफएलपी ने आरंभ से ही क्रांतिकारी कार्रवाइयों को अपनाया.
हब्बाश ने अपने को वैचारिक तौर पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद से समृद्ध किया. उन्होंने अपने उेश्यों के लिए क्रांतिकारी हिंसा का रास्ता चुना, जिसके बारे में उन्होंने 1967 में पीएफएलपी के उद्धाटन वक्तव्य में कहा-क्रांतिकारी हिंसा एकमात्र भाषा है, जिसे दुश्मन समझता है.
पीएफएलपी ने जायनिस्ट दुश्मन के खिलाफ संघर्ष को ऐतिहासिक कार्यभार घोषित किया और उनके द्वारा कब्जा की हुई भूमि को नरक में बदल देने का आह्वान किया. 1969 में पीएफएलपी ने खुद को एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी आंदोलन घोषित किया और यह एलान किया कि वह साम्राज्यवाद और अरब प्रतिक्रियावाद के खिलाफ लडेगा. पीएफएलपी ने फलस्तीन को मुक्त करने के संघर्ष को व्यापक राजनीतिक-सामाजिक क्रांति के एक हिस्से के तौर पर देखा.
हब्बाश का कहना था कि फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष सिर्फ फलस्तीन को यहूदीवादियों से मुक्त कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उेश्य अरब जगत को पश्चिमी औपनिवेशिक ताकतों से मुक्त कराना भी है. इसके अलावा उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि इस्राइल पर विजय तभी हासिल हो सकती है जब पारंपरिक अरब सरकारें क्रांतिकारी शासन द्वारा हटा दी जायें.

60 का दशक दुनिया की उत्पीडित जनता के लिए सबसे सौभाग्यशाली दशकों में से था. यह वह दौर था जब दुनिया के अनेक देशों में उत्पीडित जनता साम्राज्यवादी, सामंती और उत्पीडक शासकों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्षों के नये-नये रूप तलाश रही थी और नये मोरचों पर अपने दुश्मनों को मात दे रही थी. भारत में नक्सलबाडी के रूप में एक सुव्यवस्थित क्रांतिकारी आंदोलन जन्म ले रहा था, चीन माओ के नेतृत्व में सांस्कृतिक क्रांति के दौर से गुजर रहा था और वियतनाम में उसकी बहादुर जनता के अपराजेय प्रतिरोध के कारण अमेरिका अपने इतिहास के सबसे अपमानजनक पराजय की ओर बढ रहा था. पेरिस में भी छात्रों का आंदोलन उभर रहा था. जॉर्ज हब्बाश के नेतृत्व में पीएफएलपी इन संघर्षों की उत्तेजना और तकनीक से कटा हुआ नहीं था. वह उनसे सीख रहा था और समृद्ध हो रहा था. इसी दौर में पीएफएलपी ने चीन और वियतनाम के गुरिल्ला युद्ध से गुरिल्ला तकनीक अपनायी और फलस्तीन-अरब मुक्ति संघर्ष में एक नये दौर की शुरुआत हुई.
हब्बाश का मानना था कि फलस्तीन की मुक्ति के लिए चीन और वियतनाम के रास्ते उपयुक्त हैं.
हालांकि एक समय हब्बाश फिदायीन हमलों के बडे विरोधी रहे थे. लेकिन नयी परिस्थितियों में उन्होंने पाया कि गुरिल्ला युद्ध एक अनिवार्यता हो गया है. इस कारण से हो रही हिंसा के बारे में पूछने पर वे कहते-हमें दोष मत दो, दोष इस्राइलियों को दो जो हमारे युद्ध के स्वरूप को बिगाडने की कोशिश करते हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ सहित दुनिया की बडी ताकतों ने इस्राइल की स्थापना करने के बाद फलस्तीनियों को भुला दिया था. उनके लिए मानो फलस्तीनियों की व्यथा और उनका नारकीय-गुलामीभरा जीवन था ही नहीं. उनके संघर्षों की ओर और उनकी पीडा की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता था. 1970 में पीएफएलपी ने दुनिया का ध्यान फलस्तीन संघर्ष की ओर आकर्षित करने के लिए उग्र रणनीति अपनायी. उसके योद्धाओं ने दो वायुयानों को हाइजैक किया और नष्ट कर दिया.
हब्बाश का कहना था कि जब हम एक हवाई जहाज हाइजैक करते हैं तो यह सौ इस्राइलियों को युद्ध में मारने से ज्यादा प्रभावकारी होता है...दशकों से विश्व जनमत न तो फलस्तीन के पक्ष में और न इसके खिलाफ रहा है. उन्होंने सामान्यतः हमें नजरअंदाज किया है. कम से कम अब दुनिया हमारे बारे में बात तो करती है.
वे कहते-इस्राइली बिना अमेरिकी समर्थन के कुछ भी नहीं कर सकते हैं. वे उस सबके जिम्मेवार हैं, जो हमारे शिविरों में हो रहा है. फलस्तीनी शरणार्थी शिविर यहूदियों के लिए बने नाजी यातना शिविरों से थोडे बेहतर हैं. हालांकि बाद में पीएफएलपी ने पश्चिमी सरकारों पर हमलों की रणनीति को त्याग दिया लेकिन उसने इस्राइली आक्रमणकारियों पर ऐसे हमले जारी रखे.फलस्तीननियों1980 में हब्बाश को दिल का एक दौरा पडा और उन्हें मजबूरी में कामकाज से अलग होना पडा. 1990 में वे सीरिया और जॉर्डन में रहे. 1993 में जब यासर अराफात ने ओस्लो समझौता किया तो पीएफएलपी ने अराफात पर आरोप लगाया कि वे फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष को बेच आये हैं. इस समझौते के तहत पीएलओ ने उन इलाकों में जिन पर इस्राइल ने 1967 के बाद से अधिकार कर लिया था, फलस्तीनी प्राधिकार के गठन के साथ सीमित शासन को स्वीकार कर लिया. यह फलस्तीनी मुक्ति आंदोलन के पारंपरिक उेश्य-फलस्तीन से एक इस्राइली यहूदी राज्य की जगह एक लोकतांत्रिक, धर्मनरिपेक्ष राज्य के गठन जिसमें सभी धर्मों-मूलों को लोग समानता के साथ रह सकें-से पीछे हटना था. इस समझौते में उन फलस्तीनियों को लिए कोई चिंता नहीं दिखती थी, जो दूसरे देशों में निर्वासित जीवन जी रहे थे. उनके लौटने का कोई प्रावधान इसमें नहीं था और न ही यह इस्राइल पर किसी भी तरह बाध्यकारी था कि वह फलस्तीनियों को उनके अधिकार सौंपे. वे इस बात को समझते थे कि ओस्लो समझौते के बाद पीएलओ अरबों का समर्थन खो देगा, क्योंकि इस समझौते में अरब-इस्राइल विवाद के केंद्र में नहीं रखा गया है और मामले के केवल फलस्तीन तक सीमति रखा गया है. वे इससे चिंतित थे कि यह समझौता फलस्तीनी एकता को खत्म कर देगा. ओस्लो समझौते के विरोध के लिए पीएफएलपी ने ब्लॉक-10 नामक समूह बनाया, जिसमें इसके अलावा हमास और इस्लामिक जेहाद समेत नौ और संगठन थे. फलस्तीनी प्राधिकार के गठन के बाद भी हब्बाश ने कभी भी उसे मान्यता नहीं दी और न उसके अधिकार क्षेत्र में आनेवाली भूमि पर कदम रखे.
1998 में एक साक्षात्कार में हब्बाश ने कहा था- इस्राइलियों के साथ काम करने की कूटनीति के लिए कोई जगह नहीं है.हब्बाश यासर अराफात से कभी भी सहमत नहीं रहे. उन्होंने अराफात पर आरोप लगाया कि अराफात ने यहूदीवाद के असली चरित्र को भुला दिया है और ओस्लो समझौते के परिणाम फलस्तीनी लोगों के लिए त्रासद रहेंगे.
हब्बाश उन संगठनों के नजदीक थे जो सशस्त्र संघर्ष में यकीन रखते थे. उनका कहना था- हम हमास से जुडे हुए हैं. हरेक फलस्तीनी को अपने घर, अपनी जमीन, अपने परिवार और अपने सम्मान के लिए लडने का अधिकार है-ये उसके अधिकार हैं. अंत-अंत तक उन्होंने इसके कोई संकेत नहीं दिये कि उनका फ्रंट सैन्य कार्रवाइयों को स्थगित करने का इरादा रखता है. वे कहते-सशस्त्र संघर्ष विवाद की प्रकृति पर निर्भर करता है-जो कि दुश्मन की प्रकृति द्वारा तय होता है.
अपने अंतिम दिनों में हब्बाश ने युद्धरत फलस्तीनी धडों की एकता और गाजा की दीवारबंदी के खिलाफ युद्ध के लिए आह्वान किया. हब्बाश कहते थे-अरब राष्ट्रवाद और स्थानीय सक्रियता के बीच जुडाव जरूरी है.

आज हब्बाश अम्मान के एक कब्रिस्तान में गहरी नींद सो रहे हैं. उनके सम्मान में फलस्तीनी राष्ट्रीय झंडा झुका रहा और फलस्तीनियों ने शोक मनाया. वे जीवनपर्यंत फलस्तीन की क्रांति के नायक रहे. यहां तक कि वे लोग भी, जो हब्बाश से असहमत थे, वे हब्बाश को फलस्तीनी क्रांति की चेतना कहते थे. वे एक ईसाई थे और उनका संघर्ष फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को रेखांकित करता है.
जॉर्ज हब्बाश अपने फलस्तीन को कभी मुक्त हुआ नहीं देख सके, लेकिन उन्होंने फलस्तीनी जनता में और उसकी संघर्षचेतना में कभी यकीन भी नहीं खोया. फलस्तीन कासपना, आजादी और बराबरी का सपना, प्रतिरोध और संघर्ष की परंपरा जब तक जिंदा रहेगी, जॉर्ज हब्बाश उर्फ हकीम जिंदा रहेंगे...और दुनिया उस तरह मुक्त होगी, जिस तरह उन्होंने चाहा था-मार्क्सवाद-लेनिनवाद के रास्ते पर, मजदूरों, किसानों और व्यापक जनता के निर्णायक संघर्षों के जरिये।

नया राज्य और नदी के नए जागीरदार

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/02/2008 07:59:00 PM

नदिया बिक गई पानी के मोल- 3

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आलोक प्रकाश पुतुल
तीसरी किस्त पहले की दो किस्तें यहाँ पढ़ें
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ब शिवनाथ पर एनिकट बनाने और पानी आपूर्ति का जिम्मा रेडियस वाटर लिमिटेड पर था. इस पूरी प्रक्रिया के संपन्न होने तक शिवनाथ नदी मध्य प्रदेश के बजाय नए राज्य छत्तीसगढ़ का हिस्सा बन चुकी थी और अब शिवनाथ पर रेडियस वाटर लिमिटेड का कब्जा था. औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर अब छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन (सीएसआईडीसी) में तब्दील हो चुका था.
रेडियस ने देखते ही देखते शिवनाथ नदी के 22.7 किलोमीटर हिस्से पर घेराबंदी शुरु कर दी. नदी किनारे की 176 एकड़ जमीन के अलावा हजारो वर्गफीट जमीन पर रेडियस वाटर लिमिटेड ने अपना साम्राज्य जमा लिया था.

औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर के बोरई स्थित सारे संसाधनों पर एक रुपए में कब्जा जमा कर उसी संसाधन से रेडियस वाटर लिमिटेड ने पहले महीने से ही औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर यानी
छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन (सीएसआईडीसी) से 4 एमएलडी पानी की कीमत 15 लाख 12 हजार रुपए वसुलना शुरु किया. यानी बिना एक रुपए की पूंजी लगाए रेडियस ने राज्य सरकार से पहले ही साल एक करोड़ 81 लाख 44 हजार रुपए का भुगतान प्राप्त कर लिया.

बाद के सालों में जब अनुबंध के अनुसार रेडियस ने प्रति हजार लिटर पानी के लिए 15.02 रुपए छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन (सीएसआईडीसी) से वसुलना शुरु किया तो इस अनुबंध के भ्रष्टाचार खुल कर सामने आने लगे. बोरई में केवल दो उद्योग थे और उन्हें 2.4 एमएलडी से अधिक पानी की आवश्यकता कभी होनी ही नहीं थी, जबकि छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन को 4 एमएलडी पानी का भुगतान अनिवार्य था. इसके अलावा छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन जिन उद्योगों को पानी की आपूर्ति कर रहा था, उनसे प्रति हजार लिटर पानी के लिए केवल 12 रुपए ही लेने का अनुबंध था. यानी रेडियस से पानी लेने और उद्योगों को पानी देने में प्रति हजार लीटर पानी में 3.02 रुपए का घाटा छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन को भुगतना अनिवार्य था.

शिवनाथ के आसपास बसे अधिकांश गांवों के लिए पानी का मुख्य स्रोत नदी ही रही है. लेकिन इस नदी पर रेडियस वाटर लिमिटेड के कब्जे के बाद शिवनाथ के किनारे बसे गांवों को नदी के इस्तेमाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया. जिस नदी का अब तक कोई भी निःशुल्क इस्तेमाल कर सकता था, उसमें नहाने या उसके पानी से सिंचाई करने पर रोक लगा दी गई. कई पीढ़ियों से इस नदी में मछली मारने वाले सैकड़ों मछुवारों को इस इलाके से भगा दिया गया. पालतु पशुओं के लिए पानी का संकट पैदा हो गया. यहां तक कि नदी किनारे की चारागाह के रुप में इस्तेमाल होने वाली जमीन भी एनिकट के लिए पानी रोके जाने के कारण डूब क्षेत्र में आ गई. गांव के लोगों को रेत भी दूसरे इलाकों से मंगाने की नौबत आ गई. नदी किनारे बोर्ड लगा दिया गया- “ नदी में नहाना और मछली पकड़ना सख्त मना है. इससे जान को खतरा हो सकता है.”

गांव के हजारों किसान हतप्रभ रह गए. कल तक जो नदी सबकी थी, अब उस पर एक निजी कंपनी के अधिकार ने चौंका दिया. नदी किनारे बसे मोहलाई के सरपंच बठवांराम टंडन आक्रोश के साथ कहते हैं-“ यह कैसा पंचायती राज्य है, जहां गांव वालों से पूछे बिना नदियां तक बेच दी गईं. कल को ये सरकारें सूरज की रोशनी और हवा भी बेच देंगी तो हमें अचरज नहीं होगा.”

नदी और पानी को बेचने की इस साजिश के खिलाफ इस इलाके में लगातार सक्रिय नदी घाटी मोर्चा के संयोजक गौतम बंदोपाध्याय कहते हैं- “ रेडियस ने गांवों में हैंडपंप का इस्तेमाल करने और नए कुएं खोदे जाने पर भी पाबंदी लगा दी. कंपनी के कारिंदे गांव में घुम-घुम कर गांव वालों को डराने लगे. सिंचाई करने वाले किसानों के पंप रेडियस ने जप्त कर लिए.”

मोहलाई, खपरी, रसमरा, सिलोदा, महमरा जैसे गांवों का एक जैसा हाल हुआ. लेकिन इससे भी बुरा हाल उन गांवों का था, जो बोरई एनिकट के नीचे वाले हिस्से में बसे थे. चिरबली, नगपुरा, मालूद, झेरनी, पीपरछेड़ी, बेलोदी के किसानों का संकट ये था कि बांध के कारण सारा पानी ऊपर ही रुक जा रहा था और शिवनाथ के नीचे का पूरा हिस्सा सूख गया.

गरमी के दिनों में जब हाहाकार मचा तो गांव के लोग संगठित होने लगे. नदी घाटी मोर्चा ने दुर्ग से रायपुर और दिल्ली तक आंदोलन शुरु किया. धरना, जुलूस, सड़क जाम, प्रदर्शन और घेराव की रणनीति बनाई गई।
जारी

...और बजट का इंतजार कौन करता है

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/01/2008 01:15:00 AM

सुष्मिता

ह साफ दिखता है कि पी चिदंबरम ने विदेशी पूंजी के लिए जो रास्ते खोल कर रखे हैं, यह बजट उसी रास्ते पर आगे बढनेवाला है. आर्थिक सर्वेक्षण का कहना है कि वृद्धि दर को बरकरार रखना एक बडी चुनौती है, क्योंकि पहले से यह बात कही जा रही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सुनहरे दिन अपने आधार पर खडे होने के बजाय विदेशी कारकों पर ज्यादा निर्भर हैं. पिछले साल भी वृद्धि दर का सबसे अधिक फायदा कारपोरेट सेक्टर को मिला था, लेकिन सरकार ने इस सेक्टर को इस बार भी कर वृद्धि से मुक्त रखा है.

इस बार तो सरकार के लिए वृद्धि दर को बनाये रखना ही सबसे बडी चुनौती है, और इसलिए वह कारपोरेट टैक्स नहीं बढा रही है, क्योंकि इसी की बुनियाद पर वृद्धि दर को इस स्तर पर बनाया रखा जा सकता है.

देश
में व्याप्त कृषि संकट मुख्यतः विदेशी पूंजी के साथ स्पर्धा और रियायतों के खात्मे की वजह से पैदा हुआ है. इसलिए अगर कृषि को संकट से निकालना है तो किसानों को तात्कालिक राहत के बतौर समर्थन मूल्य ज्यादा दिया जाना चाहिए था. अल्पकाल में किसानों की समस्याओं का समाधान यह सरकार नहीं कर सकती है, क्योंकि यह खुद वैश्वीकरण की पैरोकार है, जो किसानों के संकट का मूल कारण है. ग्रामीण अधिसंरचना में खर्च का जो प्रावधान है, वह किसानों को राहत देने के लिए कम और गांवों को बाजार में बदल देने के लिए ज्यादा है, ताकि कारपोरेट घरानों की पहुंच में हरेक गांव आ जाये.
किसानों
की कर्जमाफी का फायदा मूल रूप से बडे किसानों को ही मिलना है, क्योंकि छोटे और मध्यम किसान कर्जों के लिए आज भी गैर संस्थागत स्रोतों पर ही सबसे ज्यादा निर्भर हैं. अकेले कर्ज माफी की प्रक्रिया किसानों को संकट से बाहर नहीं निकाल सकती है, क्योंकि सरकार ने पहले ही खाद्यान्नों की उपज के बजाय हॉर्टिकल्चर को प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया था, ताकि किसान कारपोरेट जगत के लिए कच्चा माल तैयार कर सकें.
राष्ट्रीय
रोजगार गारंटी योजना से जिस अनुपात में नये जिले जोडे गये हैं, उस अनुपात में आवंटन अपर्याप्त है. वैसे भी रोजगार गारंटी अधिनियम किसानों को बेहतर जीवन देने के बजाय डिमांड ड्राइव बनाये रखनेवाला है. इस योजना के तहत दी जानेवाली न्यूनतम बढायी जानी चाहिए. कृषि को संकट से निकालने के लिए किसानों को सिंचाई की सुविधा, अधिक समर्थन मूल्य, सस्ते आयातित कृषि उत्पादों के साथ स्पर्धा में बाजार में टिके रहने के लिए संरक्षण और बडे किसानों पर टैक्स आदि के कदम जरूरी हैं.
देश
भर में बेरोजगारी का संकट बढ रहा है. कारपोरेट कल्चर बेरोजगारी बढायेगा ही. देश में क्षेत्रीय तौर पर असमान औद्योगिक विकास के कारण रोजगार के अवसर कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित हैं. इसके कारण क्षेत्रीय दुर्भावना बढेगी और कुल मिला कर इससे अर्थव्यवस्था को नुकसान ही होगा.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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