हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यह एक डॉटर के मरने की खबर भर नहीं है!

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/22/2008 10:48:00 PM

अजय कुमार

यह सिर्फ एक डॉक्टर के मरने की खबर भर नहीं है. डॉ चंद्रकांत पाटील महाराष्ट्र से अपने पांच साथियों के साथ यहां आये थे. बाढपीडितों के बीच काम करने. चार डॉक्टरों और एक तकनीशियन की यह टीम सप्ताह भर पहले यहां सुपौल के इलाके में काम करने आयी थी. रविवार की रात इस टीम के एक सदस्य डॉ चंद्रकांत पाटील की ठनका गिरने से मौत हो गयी. वे अपने मां-बाप के इकलौते थे.
डॉ पाटील के असामयिक निधन के बाद उनकी टीम के सदस्यों ने फैसला किया कि वे मुंबई नहीं लौटेंगे. वे बाढपीडितों के बीच ही काम करेंगे. यह जज्बा, यह सेवा-भाव अद्भुत है. यह भावना उन लोगों के लिए जवाब भी है, जो बिहारी और हिंदीभाषियों के प्रति जहर उगलते हैं. भाषा और भूगोल से परे मनुष्यता की सेवा का धर्म डॉ पाटील और उनकी टीम के सदस्यों ने निभाया. महाराष्ट्र सहित दूसरे राज्यों के अनाम-अनजान चेहरे पीडित मानवता की सेवा में लगे हुए हैं. उनके इस जज्बे को सलाम!

२५ वर्ष के डॉ चंद्रकांत पाटील महाराष्ट्र के धूले गांव के निवासी थे. फिलहाल वे मुंबई मेडिकल कॉलेज में पीएसएम विभाग में एमडी की पढाई कर रहे थे.सुपौल के राघोपुर में २२ आरडी में फिल्म निदेशक प्रकाश झा की ओर से चलनेवाले राहत शिविर में डॉक्टरों की यह टीम काम कर रही थी.

बिहार में बाढ नहीं, प्रलय आया. सैकडों शिविर लगे. पटना से सरकारी डॉक्टरों को भेजा गया. पर वे उलटे पैर शिविर से भाग खडे हुए. डॉक्टरों की शिकायत थी कि शिविरों में उनके रहने लायक कोई सुविधा नहीं है. शायद डॉ पाटील सुविधा्व लेकर सेवा्व करना नहीं जानते थे. इसलिए हमारे बीच नहीं रहे. हमारे बीच रहनेवाले डॉक्टर, हमारा बिहारी समाज और बिहारी मानस क्या डॉ पाटील के प्राण उत्सर्ग से कुछ सीखने को तैयार होगा?

हम तो जात और गोत्र में फंसे हुए हैं. कोसी ने सब कुछ लील लिया. भौतिक रूप से जो कुछ था, उसे बहा लिया. पर मन में बैठा पाप नहीं घुल रहा. खबर आ रही है कि दबंग लोग राहत में भी दलितों के साथ भेदभाव कर रहे हैं. सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता सुधा वर्गीज ने हाल ही में इस भेदभाव की जानकारी सार्वजनिक रूप से दी. इसके पहले मेधा पाटकर की राहत सामग्री के साथ तिरस्कार हुआ. आखिर ऐसे आचरण से हम बिहार के माथे पर कलंक का धब्बा नहीं चिपका रहे?

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  1. 10 टिप्पणियां: Responses to “ यह एक डॉटर के मरने की खबर भर नहीं है! ”

  2. By राज भाटिय़ा on September 23, 2008 at 1:40 AM

    डॉ चंद्रकांत पाटील को प्राण्म काश सभी डा० ऎसे होते, लेकिन यह मेरे देश की बद्किस्मती हे की आज डा० भी अपना फ़्र्ज भुल गाये हे,
    आप का धन्यवाद

  3. By रंजन राजन on September 23, 2008 at 2:20 AM

    यह जज्बा, यह सेवा-भाव अद्भुत है. भाषा और भूगोल से परे मनुष्यता की सेवा का धर्म डॉ पाटील और उनकी टीम के सदस्यों ने निभाया.

  4. By Aflatoon on September 23, 2008 at 8:47 AM

    डॉ. पाटील के स्वजनों के साथ हम भी दुखी हैं ।

  5. By दिनेशराय द्विवेदी on September 23, 2008 at 5:57 PM

    डाक्टर पाटील एक शहीद हैं। जो समाज के प्रति कर्तव्य करते हुए शहीद हुए। उन्हें हार्दिक श्रंद्धांजलि।

  6. By Zakir Ali 'Rajneesh' on September 24, 2008 at 4:26 PM

    हम तो जात और गोत्र में फंसे हुए हैं. कोसी ने सब कुछ लील लिया. भौतिक रूप से जो कुछ था, उसे बहा लिया. पर मन में बैठा पाप नहीं घुल रहा.

    काश, हम भारतवासियों को इससे निजात मिल पाती।

  7. By shan e awadh on September 27, 2008 at 1:30 AM

    DR. Patil lo abhi aur jeena tha per afsoos.
    sirf doctors hee nahi pure desh ko Dr. patil ka amusaran karna chaiheya. rahi baat जात और गोत्र se निजात kee kee to zaldi hum is se निजात मिल jayagee.
    girjesh

  8. By Ek ziddi dhun on October 28, 2008 at 11:50 AM

    कोसी से भी खतरनाक है जात-गौत्र की बाढ़। कोसी की बाढ़ उतर जाएगी पर जात-गौत्र की बाढ़ उफान पर ही रहती है। एक डाक्टर का जज्बा आज कितना अवश्वसनीय लगता है। उसे सलाम

  9. By संदीप on November 27, 2008 at 7:55 PM

    साथी बहुत दिनों से आपने ब्‍लॉग पर कुछ नहीं लिखा है, चुप्‍पी को तो‍ड़ि‍ए...

    हालांकि, मैंने भी कुछ नहीं लिखा है अपने ब्‍लॉग पर, लेकिन यह आपके साथ स्‍वयं को भी सावधान कर रहा हूं...

  10. By Santhosh on February 12, 2009 at 10:23 AM

    really touching..hope all the Docs...will follow their ethics...it will be a good to live here...

    want to share that, was searching for user friendly Hindi typing tool...and found 'quillpad'..do u use the same...?

  11. By Santhosh on April 2, 2009 at 12:11 PM

    ये बहुत डुक की बात हे...

    मे कुछ जान ना चाहता हूँ वो ये हे की...रीसेंट्ली मे यूज़र फ्रेंड्ली टूल केलिए डुंड रहा ता और मूज़े मिला "क्विलपॅड".....आप भी इसीका इस्तीमाल करते हे काया...?

    सुना हे की "क्विलपॅड" मे रिच टेक्स्ट एडिटर हे और वो 9 भाषा मे उपलाभया हे...! आप चाहो तो ट्राइ करलीजीएगा...

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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