हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कोसी कांड कीखतरनाक मानसिकता

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/03/2008 09:45:00 PM


अनिल चमडिया

भोपाल के यूनियन कारबाइड में गैस कांड होने की आशंका पहले जाहिर की गयी थी, लेकिन उस जहरीले रिसाव को रोकने की कोई कोशिश नहीं की गयी. हजारों लोग तो जीवित पीढियों के मारे गये.हजारों के पांव, हाथ, आंख, नाक, पैर में से शरीर का कोई कोई अंग प्रभावित हुआ.गैस कांड के पूर्व प्रभावितों में अधिकत्तर लोग मनुष्य की तरह रहते नहीं थे लेकिन कम से कम बस्तयों में प्राकृतिक तौर पर पूर्ण दिखते थे. ढेर सारे खाट और खाल में बदल गए. लेकिन अमेरिकी कंपनी की रसायनिक गैस हिरोशिमा नागासाकी की तरह किसी एक पीढी के लिए जहर लेकर नहीं निकली थी. वहां कई पीढियों के लिए जहर छोड गई. क्या भोपाल कांड के संदर्भ में यह कभी समझने की कोशिश की गई कि वह कैसी अमानवीय और हैवानियत से लैस मानसिकता है जो पीढियों की बर्बादी की परवाह नहीं करती है? जीवन का मूल्य ही जिसके पास नहीं है।अपनी कहलाने वाली सरकार ने तो अमानवीयता दिखलाने वाले को विदेशी कहकर अपनी चिकनी खाल बचा ली।

बिहार की कोसी नदी की धारा की चपेट में उत्तरी बिहार के लगभग तीस लाख लोगों का आना लगभग वैसी ही घटना है.यह तुलना ज्यादा लगती है तो खुद को टटोलने की जरूरत हैं.भाषा का खेल बहुत बारीक होता है.वह सच को चतुराई से छिपा लेता है. कोसी नदी और उसके कारण जो प्रबंधन निर्मित संकट पैदा हुआ है लगभग उसके साथ भी ऐसा ही किया जा रहा है.कोसी नदी ने अपनी धारा बदल ली. भयानक बाढ आई हैं. ये वाक्य इस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे यह प्राकृतिक हो.जबकि कोसी के बारे में पता है कि इस नदी की प्राकृतिक धारा को मोडकर इसे बांधा गया था.लेकिन बांध और तटबंध का प्रबंधन नहीं किया जा सका.कोशी जैसे नदी की धारा को तो नियंत्रित करने के लिए बांध पर खास ऐहतियात की जरूरत होती है।लेकिन लाखों क्यूसेक पानी की धारा को रोकनेवाला तटबंध को थोडे ने पानी ने कट डाला। कोसी के तटबंधों की सुरक्षा नहीं की जा सकी तो कोसी अपनी धारा में बहने लगी और उत्तरी बिहार के छह जिलों को तो पूरी तरह से अपने चपेट में ले लिया। पीढियां लगी इन जिले के लोगों को खुद को बनाने और बचकर रहने के हालात बनाने में लेकिन उनके भरोसे को सरकार सुरक्षित नहीं रख पायी. कोसी के घावों का दर्द पीढियां महसूस करेंगी.

क्या
भोपाल गैस कांड और उत्तरी बिहार के जिलों के कोसी कांड में फर्क है? मरने वालों की संख्या में अंतर क्या फर्क का आधार हो सकता है?गैस और पानी का फर्क महत्वपूर्ण है? सरकार द्वारा एक को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने और दूसरे को औधोगिक दुर्धटना घोषित करना हो सकता है? हर साल एक पर हजार करोड की राहत और दूसरे पर कई सालों में कई हजार करोड का वर्षों तक राहत? कोसी के इलाके में भी वर्षों से लोग मर रहे हैं और मौत की संख्या राहत के रूपयों में बदलती रही है।सवाल विचारों का है? प्रबंधन के विचारों के स्तर पर क्या फर्क है? कोसी नदी के तटबंधों के बारे में पता था कि कटाव हो रहा है. तटबंध टूट गया तो पीढियों के लिए तबाही ले आएगा.लेकिन क्या लोगों और वहां के जीवन को बचाया जा सका? कम से कम कोशिश भी तो दिखती। मौतों से आशंकित मन कहां भोपाल और बिहार में समान रूप से दिखता है? इससे ज्यादा शर्मनाक बात नहीं हो सकती है कि अपने भीतर बैठे अमानवीय चेहरे को फिर विदेशी से ढंकने की कोशिश की जा रही है.राष्ट्रवाद की मानसिकता का ये कितना खतरनाक रूप हैं. नेपाल की तरफ बांध के मरम्मत वर्षों से बिहार सरकार के प्रबंधन के जिम्मे हैं. लेकिन अब कोसी का पानी लाखों घरों को बहा ले गया तो ये बहानेबाजी?गंभीर बात तो ये है कि ऐसे कांडों के बाद भी उस विचार को बचाने की कोशिश होती है जो लगातार ऐसे कांडों के लिए जिम्मेदार होते हैं.तकनीकि भाषा सरकारी ढांचे की उलझनों से तो किसी को बचा सकती है लेकिन तय है कि कोसी कांड को दोबारा होने से नहीं रोका जा सकता है.

बिहार
में इस तरह के कांड के प्रति सचेत होने की मानसिकता कहां से तैयार होती है उसे समझना जरूरी है. वर्षों से इस इलाके में बाढ ने एक ऐसे वर्ग का विकास किया है जिसे तांडव देखने में मजा आता है.बाढ खेती का रूप ले चुकी है. वह बाढ की फसल का इंतजार करता है. जरा सोचा जाए कि इस तरह के इंतजार की क्या हिंसक मानसिकता होगी. उस मानसिकता में जो प्रबंधन तैयार होगा वो कैसा होगा. आपदा के प्रबंधन में अपना अपना हिस्सा तय हो रहा होगा तो दूसरी तरफ हजारों के विलखने, महिलाओं के अस्मत के लूटते देखने की तैयारी से लेकर बाों की लाशों के बहने की परवाह नहीं करने की भी मानसिक तैयारी होती रही है. इसके बाद जरा इस बात की भी थाह लें कि वर्षों से जब ऐसी मानसिकता विकसित हो रही है तो किसी तटबंध के टूटने और उसे एक बडे कांड में तब्दील होने की आशंका से पूरा प्रबंधन कितना बेपरवाह खुद को कर रहा होगा.यहां प्रबंधन के दो हिस्से दिखते है.एक तो राजनीतिक प्रबंधन जो ऐसे कांडों की आशंकाओं को मौज मस्ती में उडा देता है और दूसरा ढांचा जो ऐसे कांडों के बाद के लिए खुद के नाखून तैयार रखता है. भोपाल कांड और कोसी कांड के विचारों के बारे में जरा सोचने के लिए इस बात की कल्पना करें कि क्या यहां और वहां राहत लूटेरे एक जैसे नहीं होते हैं. कोसी के बाद नेता उपर मंडराने लगते हैं तो भोपाल से उडकर हिरोसिमा नागासाकी की तरह के मरघट का पता पूछने के लिए अमेरिका के लिए उडने लगते हैं.

कोसी
कांड पर बातचीत केवल जानमाल के नुकसान के आंकडे, आपदा प्रबंधन की मौजूदा सूरत , वर्तमान और पिछली सरकार की तुलना, केन्द्र और राज्य सरकार के तिकडमों और एक दूसरे से ज्यादा लोगों के हमदर्द दिखने तक सीमित नहीं हो सकती है। ये उस राजनीति पर बातचीत करने का ' है जो भोपाल और कोसी कांड को पचा लेती है.जीवन को अपना खेल समझती है. अपनी व्यवस्था में लोगों को पूर्णतः सुरक्षित होने का भरोसा कैसे पैदा होगा?लापरवाही और मानवीय भूल एक बिल्कुल अलग बात है और प्रबंधन का अमानवीयकरण एक विचार की व्यवस्थत योजना होती है.बिहार में गरीब गुरबों को पीट पीट कर मार डालने और सामूहिक तौर पर काटकर फेंक दिये जाने के विचार और मानसिकता वहां के प्रबंधन में दिखती है. राजनीति उसे पराश्रय देती है. कोसी कांड चुनाव की तैयारी के बीच हुआ.मानव सभ्यता में परंरपराओं का बहुत महत्व हैं. परंपराएं सामाजिक नियम जैसी होती है जो चेतना का हिस्सा बन जाती है.अभी तक ये स्थति रही है कि सामंतवादी विचारों के आधार पर विकसित होने वाली पूंजीवादी राजनीतिक व्यवस्था ने सामाजिक नियमों को पूरी तरह धवस्त नहीं किया है.बाढ ग्रस्त इलाकों में लोगों को परंपराओं के कारण बचे और जीते रहने के अवसर मिलते रहे हैं.लेकिन चुनाव की तैयारी ने बाढ के प्रबंधन और राहत के कामकाज के पारंपरिक हिस्से को भी ध्वस्त कर दिया.
परंपराएं
एक मिश्रण होती हैं. परंपरा को एक ईकाई माने तो उसका एक हिस्सा उस चेतना का होता है जिसे आधुनिकतम करनी होती है. जैसे ग्लोबल वार्मिंग के दौर में बांधों की मरम्मत और रखरखाव परंपरावादी तरीके से नहीं हो सकतें. लेकिन वह चेतना तभी बची रहती है, जब वह परंपरावादीजीवी के रूप तबदील होने से खुद को रोकने की क्षमता विकसित करती है. वरना वह रूठियों में तबदील हो जाती है. राजनीति उसमें सहायक होती रही है. कोसी में ये चेतना रूठियों की शिकार हुई.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ कोसी कांड कीखतरनाक मानसिकता ”

  2. By Udan Tashtari on September 4, 2008 at 8:05 AM

    ५ दिन की लास वेगस और ग्रेन्ड केनियन की यात्रा के बाद आज ब्लॉगजगत में लौटा हूँ. कल से नियमिल लेखन पठन का प्रयास करुँगा. सादर अभिवादन.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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