हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार एक जनसंहार से गुजर रहा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/02/2008 06:53:00 PM

बिहार में एक जनसंहार रचा गया हैपहले से रिपोर्टें और सूचनाएं होने के बावजू कोसी बराज पर बने एफ्लाक्स को टूटने दिया गयाऔर फिर जो हुआ-वह सबके सामने हैकई ऐसी खबरें भी हैं-जो धीरे-धीरे सबके सामने आयेंगीं और हम इसे जनसंहार क्यों कह रहे हैं, यह पुष्ट करेंगीफिलहाल कुछ समय पहले लिखा गया यह लेखअभी सी बाढ़ के समय फिर से हाई डैम की बात की जा रही है, इसलिए इसे प्रस्तुत किया जा रहा है.


बहाना है नेपाल में हाइडैम

अरविंद सिन्हा

िहार लगातार कभी बाढ, तो कभी सूखे की मार का सामना करने को अभिशप्त रहा है, लेकिन जब इस सवाल के समाधान की बात होती है , तो अलग-अलग योजनाएं बनती हैं. 1956, जबसे बाढ नियंत्रण की योजना बननी शुरू हुई है, तब से आज तक कभी भी इस समस्या के समाधान का समेकित प्रयास नहीं हुआ है, जबकि जरूरत समेकित प्रयास की है. समेकित प्रयास का अर्थ है कि पानी को आफत की जगह वरदान मानते हुए इसके उचित प्रबंधन की व्यवस्था की जाये, जिससे बाढ, सुखाड, बिजली की कमी जैसी समस्याओं का समाधान एक साथ हो सके

बाढ़ के इलाके से कुछ रिपोर्टें यहाँ पढ़ें

परंतु वर्तमान पुरानी सरकारें इस पुराने नजरिये का शिकार रही हैं कि पानी रूपी बला को मजबूत तटबंध से घेर कर जल्द-से-जल्द बंगाल की खाडी में ठेल दिया जाये, पर बाढ की लगातार पैदा होती विभीषिका इसकी साक्षी है कि तटबंध के निर्माण ने बाढ से उत्पन्न समस्या को विकराल ही किया है. 1950 में, जहां तटबंध की कुल लंबाई मात्र 160 किमी थी, वह आज बढ कर 3438 किमी हो गयी है, लेकिन बाढ के दौरान डूब क्षेत्र तिगुना बढ कर 1954 के 25 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 2007 में 75 लाख हेक्टेयर हो गया है. इन आंकडों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि बिहार में बाढ अब आती नहीं, बुलायी जाती है. बाढ अब एक मानव निर्मित आपदा है. बाढ के बढते प्रकोप से लगा कि वर्तमान सरकार को कुछ-कुछ इस बात का एहसास है कि अब तक चलायी गयी बाढ नियंत्रण की नीतियों में कुछ गंभीर खामियां हैं, जिनकी तलाश कर उनका समाधान आवश्यक है.
इस
दिशा में सरकार ने एन सान्याल की अध्यक्षता में बिहार की बाढ पर एक तकनीकी समिति का निर्माण भी किया. इस कमेटी को जिस दिशा में कार्य करने को कहा गया था और जैसा कि इसकी रिपोर्ट से स्पष्ट भी होता है कि इसने वर्तमान तटबंध तथा अन्य बाढ नियंत्रण संरचनाओं एवं व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ बांध टूट जाने या किसी अन्य कारण से आकस्मिक बाढ आने से उसके नियंत्रण की वकालत की है. इसने बांध, जलाशय तथा तटबंध निर्माण जैसी पुरानी तकनीकी का हवाला दिया है. कोई नयी दृष्टि प्रस्तुत नहीं की है. पिछले 60 वर्षों का अनुभव यह बताया है कि तटबंधों के बढने से बाढ का खतरा बढा है. वास्तविकता यह है कि बिहार में नेता, सरकारी पदाधिकारी ठेकेदारों का नापाक गंठजोड का मकसद जनता को बाढ-सुखाड से निजात दिलाना नहीं, बल्कि इस गंभीर समस्या को बरकरार रखना है. वे तटबंध निर्माण, उनके रख-रखाव, राहत सामग्री के वितरण के नाम दशकों से मिलते रहे अरबों रुपयों में कमाई के स्रोत को सूखने देना नहीं चाहते हैं.
बिहार में जब भी बाढ अपनी विनाशलीला दिखाती है, यहां के नेता एक सुर में इस समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार को नेपाल सरकार से बातचीत करने को कहते हैं, परंतु ऐसा कर भी नेतागण कई सारी सच्चाइयों और तथ्यों को छुपा जाते हैं. पहली बात तो यह है कि केंद्र सरकार ने नेपाल सरकार से कई बार बातचीत की है, पर नेपाल आर्थिक पर्यावरण सहित कई अन्य कारणों से अब तक अपने यहां हाइ डैम बनाने से इनकार करता रहा है. भारत-नेपाल संयुक्त कार्यदल को अक्तूबर, 2006 तक विस्तृत योजना रिपोर्ट प्रस्तुत करती थी, पर यह कार्यदल अब तक कोई रिपोर्ट बनाने में नाकाम रहा है और वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में इन परियोजनाओं का लागू होना संभव नहीं दीखता. नेपाल में हाइ डैम का निर्माण इसकी सुरक्षा की दृष्टि से भी अव्यवाहिरक है. हिमालय अभी अपेक्षाकृत एक नया पहाड है. हर साल इसकी ऊंचाई कुछ इंच बढ रही है एवं इस क्षेत्र में भूकंप आने का खतरा हमेशा बना रहता है. क्षेत्र में हाइ डैम का निर्माण भविष्य में महाविनाश को न्योता देने जैसा होगा.
इसके
साथ-ही-साथ बिहार में राजनेता यह बात कभी सामने ही नहीं आने देना चाहते कि बिहार के अंदर भी बिना नेपाल में हाइडैम बने बाढ का समाधान निकाला जा सकता है. पिछले साल बाढ में सबसे ज्यादा तबाही बूढी गंडक ने मचायी थी, जो बिहार की नदी है और सोमेश्वर की पहाडियों से निकलती है. बेगूसराय के बसही में इसी नदी के पानी ने दो मंजिले मकान को डूबो दिया था. बिहार सरकार को यह बताना चाहिए कि क्या इस नदी को नियंत्रित करने के लिए भी नेपाल सरकार से इजाजत की आवश्यकता है? इतना ही नहीं, अब तो सरकारी तंत्र बाढ के समाधान के रूप में नदियों को आपस में जोडने का तर्क प्रस्तुत करता है, पर यह बिल्कुल अव्यवहारिक और प्रकृति विरुद्ध योजना है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि नदी प्रकृति बनाती है और इसके साथ छेडछाड गंभीर परिणाम सामने लायेगा. वास्तविकता तो यह है कि साम्राज्यवाद पूंजीवादी शक्तियों के पैरोकार और सलाहकार ऐसी नीतियां बनाते हैं, इन योजनाओं को लागू करा कर इसमें पैसा लगा कर भारी मुनाफा कमाते हैं. इस मुनाफे का जूठन यहां के सामंती और दबंग लोगों को मिलता है, जिसका नेतृत्व यहां के नेतागण और ठेकेदार करते हैं.
इतना
ही नहीं बिहार के लोगों को यह भी समझना चाहिए कि हमारे पास पानी है कहां? गंगा के पानी का बहुत बडा हिस्सा उत्तर प्रदेश उपयोग कर लेता है. बरसात छोड अन्य मौसमों में गंगा सहित अन्य नदियों में पानी रहता ही नहीं है. बिहार में बारिश भी कोई बहुत ज्यादा नहीं होती है. बिहार में औसत बारिश प्रति वर्ष 1205 मिलीमीटर है, जो राष्ट्रीय औसत से मात्र 35 मिलीमीटर ज्यादा है. राज्य में मात्र 16 लाख हेक्टेयर में नहरों द्वारा सिंचाई की व्यवस्था हो पाती है. ऐसी सच्चाइयों के मेनजर हमें पानी के उचित प्रबंधन का मुकम्मल इंतजाम करना चाहिए. असली सवाल जल संरक्षण का है, जलनिकासी का नहीं. इस संरक्षित पानी से सिंचाई होगी, तो पीने के लिए प्रचुर मात्रा में पानी मिलेगा और बिहार की आवश्यकता के हिसाब से छोटे-छोटे केंद्रों पर स्थानीय जरूरत के लायक बिजली का उत्पादन संभव होगा. वर्तमान में बडे उद्योगों को बडे पैमाने पर बिजली की आवश्यकता होती है. इसके लिए वे बडे बांधों की वकालत करते हैं.
इस
प्रकार बिहार में बाढ, सूखा एवं बिजली की कमी के समाधान के लिए हमें बडे डैम एवं तटबंधों की सरकारी नीति को त्यागना होगा. मध्यम एवं छोटी क्षमतावाले डैम निर्माण के साथ-साथ बिहार में बडी संख्या में पाये जानेवाले चौर, प्राकृतिक झील, निम्नस्तरीय भूखंड पर सर्फेस डिटेंशन रिजरवायर का निर्माण किया जाना चाहिए. ऐसे प्राकृतिक स्थानों के चारों ओर तटबंध बना कर तथा उसे और गहरा कर उसकी क्षमता में काफी इजाफा किया जा सकता है. बारिश के दिनों में इनमें जल संग्रह कर बाढ के खतरे को बडे पैमाने पर कम किया जा सकता है. सूखे के समय खेतों में सिंचाई की जा सकती है और बिजली का उत्पादन भी हो सकता है. इससे भूजल का स्तर भी ऊंचा रहेगा. वर्तमान में चलाये जा रहे ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत ऐसे निर्माण कार्य कराये जाने चाहिए. मिर्जापुर जिले में सामाजिक पहल पर ऐसे 750 छोटे डैम तथा जलाशयों का निर्माण कर सूखाग्र्रस्त ग्रामीण इलाकों में पानी-बिजली लाना संभव हुआ है.
हमें
यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार का विकास एवं बाढ सूखे का जनपक्षीय समाधान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है. यहां कृषि उत्पादन खेतों तक पानी पहुंचा कर और डूबने से बचा कर ही सही मायनों में विकास की ओर बढा जा सकता है. बिहार में कृषि के विकास में जरिये ही सामाजिक जीवन को उन्नत और खुशहाल बनाया जा सकता है. आज सिंचाई बिजली की सुविधा के अभाव और बाढ की विभीषिका के कारण किसानों के बेइंतहा श्रम के बावजूद कृषि उत्पादन बढ नहीं पाता है. आज जरूरत भ्रष्ट गंठजोड के खिलाफ संघर्ष करने की है. बाढ के समाधान लिए जनपक्षीय योजना तैयार करने के लिए इसे एक सामाजिक राजनीतिक मुा बना कर जन आंदोलन खडा करने की है

लेखक सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक हैं.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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