हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार में जनसंहार के दस्तावेज़ -1

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/03/2008 08:52:00 PM

कोसी की इस बाढ़ में जो लोग मारे गए, उन्हें कोसी ने नहीं मारावे एक संवेदनहीन तंत्र के हाथों कत्ल किए गए, उजाड़े गएउनका सब कुछ ख़त्म हो गया-घर, खेत, परिवार, मवेशी और पूरा परिवेशअब वहां सिर्फ़ कोसी का पानी हैआती होगी इसके पहले, कोसी बिना बताये, इस बार कोसी ने हफ्तों पहले बताना शुरू किया था की वह बेसंभाल होती जा रही हैपढने वालों ने कोसी की इस भाषा को पढ़ा भी, लेकिन उसे सुना किसने? क्या इसे बिहार के उस मुख्यमंत्री ने सुना, जिसे सुशासन मुख्यमंत्री कहलाने का शौक है? कोई मंत्री? कोई समर्थ अधिकारी? कोई दूसरा?...गांवों से मित्र लगातार बता रहे हैं की हर जगह लाशें दिख रही हैं, १०-२०-५० की संख्य मेंइनकी हत्याओं का जिम्मेदार कौन है? जो उजाड़ गए, उनका जिम्मेदार कौन है? हम इसके क्रमवार पड़ताल करेंगे। पहला आलेख प्रभात कुमार शाण्डिल्य का

कोसी का पानी कुसहा के एफ्लक्स टूटने के पंद्रहवें दिन पूरे सहरसा और पूर्णिया प्रमंडलों में तबाही फैलाने के बाद कुरसेला में गंगा नदी में मिलना शुरू हो गया. लाखों की आबादी को डुबाता, मारता, बेघर करता, शरणार्थी बनने को मजबूर करता, परिवारों को बिखेरता, सडकों-मकानों, पुल-पुलियों, मार्गों, नहरों, तटबंधों को तोडता, स्कूल-कॉलेज, सामुदायिक भवनों, कार्यालयों, अस्पतालों, बिजली आपूर्ति व्यवस्था को डुबो कर छिन्न-भिन्न करता, अनाज भंडारों को सडाता, खेत में लगी फसलों को गलाता, आज जब गंगा में मिलने लगा, तो लोगों ने राहत की पहली सांस ली है.

वैसे तो जलजमाव की स्थिति तो अगले तीन-चार महीनों तक बरकरार रहने की आशंका है, लेकिन कोसी को फिर से भीमनगर बराज में कैद कर रखना, टूटे एफ्लक्स बांध की मरम्मत करना तथा इसके द्वारा पिछले 15 दिनों में किये गये विध्वंस की भरपाई अगले 50 वर्षों में भी संभव नहीं लगती. बाढ का पानी उतरने पर स्पष्ट हो जायेगा कि आजादी के 60 वर्षों में जो भी निर्माण कार्य हुआ था, उसे अब पुनर्जीवित करना कितना दुष्कर कार्य है. सडकें, रेल, अस्पताल, पुल-पुलिया, नहर व्यवस्था बाढ नियंत्रण के तटबंध, पक्के मकान, बिजली आपूर्ति केंद्र, प्रखंड कार्यालय, थाना भवन, टेलीफोन व्यवस्था, मोबाइल कंपनियों के टावर, पनबिजली उत्पादन केंद्र, पावर ग्रिड, अस्पताल, सामुदायिक भवन सबों को नये सिरे बनाना होगा.
इस
त्रासदी को किसी ने प्रलय, किसी ने सामूहिक नरसंहार, किसी ने जबरिया जल समाधि की संज्ञा दी है. किसी ने षड्यंत्र का परिणाम, किसी ने अधिकारियों के निकम्मेपन, किसी ने नेता-अधिकारी-अभियंता-ठेकेदार गंठजोड के प्रभावी हो जाने का परिणाम बताया है. इधर जो तथ्य प्रकाश में आये हैं. उनसे स्पष्ट हो रहा है कि अधिकारियों के निकम्मेपन के कारण कोसी ने बिहारवासियों पर यह कहर ढाया है.
बिहार
सरकार के मुख्य अभियंता सत्यनारायण भीमनगर बैराज के नजदीक वीरपुर स्थित कोसी बहुेशीय परियोजना के मुख्यालय में पदस्थापित हैं. उन्होंने नौ अगस्त, 2008 को ही यह सूचना भेजी थी कि नेपाल में कुसहा के पास एफ्लक्स बांध में तेजी से कटाव हो रहा है और त्वरित कार्रवाई नहीं की गयी तो बांध पर टूट का खतरा है, जिसके भयावह परिणाम होंगे. यह त्राहिमाम संदेश पत्र, फैक्स एवं बेतार संवाद के तौर पर काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास में पदस्थापित कोसी परियोजना के बिहार सरकार के लायजन अधिकारी अरुण कुमार सिंह को भेजा. इसी तरह का संदेश बिहार के जल संसाधन सचिव, मुख्य अभियंता, बाढ पर्यवेक्षक (पटना), बाढ पर्यवेक्षक (वीरपुर), प्रमंडलीय आयुक्त (सहरसा), जिलाधिकारी (सुपौल), अधीक्षण अभियंता (बाढ नियंत्रण एवं अनुश्रवण), अधीक्षण अभियंता (वीरपुर), कार्यपालक अभियंता (पूर्वी तटबंध, वीरपुर), एक्सचेंजर (राहत कार्य, वीरपुर), लायजन अफसर (विराट नगर) सहित कुल 1 अधिकारियों को भेजा, किंतु सब चुपचाप बैठे रहे और बिहार सरकार का जल संसाधन विभाग 17 अगस्त तक प्रतिदिन प्रेस विज्ञप्ति जारी करता रहा कि राज्य भर के सभी बांध, बैराज और तटबंध पूरी तरह सुरक्षित हैं.
सत्यनारायण
ने अपने त्राहिमाम संदेश में यह कहा था कि कुसहा के बनटप्पू इलाके में जो नेपाल के सुनसरी जिले का भाग है, नदी एफ्लक्स बांध को भयानक रूप से काट रही है और नेपाल के कस्टम विभाग के अधिकारी भारत की ओर से जा रही निर्माण सामग्री से भरे वाहनों को बेवजह काफी देर तक रोक रहे हैं, जिससे मरम्मत संभव नहीं हो पा रहा. साथ ही यह भी शिकायत की थी कि स्थानीय मजदूरों को कटाव की मरम्मत में लगने से रोका जा रहा है और भगाया जा रहा है. इसलिए इसमें भारत और नेपाल सरकार के उच्चाधिकारियों का तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक है, ताकि एफ्लक्स को टूटने से बचाया जा सके. काठमांडू स्थित लायजन अफसर अरुण कुमार सिंह से अपेक्षित था कि वे काठमांडू में भारतीय राजदूत तथा नेपाल के विदेश मंत्रालय को इन तथ्यों से अवगत कराते, किंतु वे 18 अगस्त तक छुट्टी पर थे और इन त्राहिमाम संदेशों की सुधि लेनेवाला कोई नहीं था.
इसी बीच सत्यनारायण ने 14 और 15 अगस्त को त्राहिमाम संदेश दोहराया, तिहराया. बिहार के मुख्यमंत्री ने दिल्ली में विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी से 17 को भेंट की और बाधाओं की चर्चा की, परंतु नेपाल में तब नये प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहाल उर्फ प्रचंड के शपथ ग्रहण की तैयारियां चल रही थीं. इधर बिहार के सिंचाई मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने स्वीकार किया कि केंद्रीय सरकार को विपदा की चेतावनी से अवगत नहीं कराया जा सका. काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के आधिकारिक प्रवक्ता गोपाल वागले ने कहा कि भारतीय दूतावास को बाढ की आशंका की जानकारी 17 अगस्त को फैक्स से मिली. वागले और सिंह दोनों सत्यनारायण से संदेश मिलने की बात से इनकार करते हैं.
यह
भी जानकारी मिली है कोसी परियोजना के एक सहायक अभियंता दुखी यादव वीरपुर स्थित अपने कार्यालय में बैठ कर कनीय अभियंता और लेखापाल के साथ मापी पुस्तिका एवं अन्य अभिलेखों में हेराफेरी करने में 17 अगस्त को मशगूल थे तथा एक प्राइवेट जीप पर कार्यालय से आवास और बाजार की सैर कर रहे थे. सभी अभियंता कोसी परियोजना कॉलोनी, वीरपुर में आराम करते रहे. किसी ने वास्तविक कार्यस्थल पर जाने की जहमत नहीं उठायी.
स्थानीय
नेपाली मजदूर बतलाते हैं कि भारतीय ठेकेदार सरकार से 89 भारतीय रुपये पाते हैं, मजदूरी के मद में और नेपाली मजदूरों से 20 नेपाली रुपये में मजदूरी करवाना चाहते हैं. इसीलिए नेपाली मजदूर काम करने को तैयार नहीं हैं. ठेकेदारों और अभियंताओं को मार-पीट कर भगाने की बात से वे इनकार करते हैं और आगे कहते हैं कि उनलोगों ने नहीं, उनलोगों के साथ भारतीय अभियंताओं और ठेकेदारों ने बुरा बरताव किया है. लोग मानते हैं कि यह सब नेता-इंजीनियर-ठेकेदार अफसर गिरोह की करतूत है. इस आशय की खबरें नेपाल के एक प्रमुख दैनिक कांतिपुर टाइम्स में छपी हैं.
नेपाल
के विदेश मंत्री उपेंद्र यादव त्रिपक्षीय बातचीत के मसले पर राजी हैं और नेपाल सरकार, भारत सरकार और बिहार सरकार के बीच एक बात फिर बातचीत कर समन्वय के पक्षधर हैं.
बिहार
से राजद की ओर से राज्यसभा सदस्य प्रोफेसर जाबिर हुसैन ने इस पूरे प्रकरण पर सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि कोसी की तबाही से जुडे जो तथ्य प्रकाश में आये हैं, उनसे लगता है कि राज्य के प्रशासन तंत्र में इस विकराल स्थिति से निबटने का सामर्थ्य नहीं बचा है. ऐसी स्थिति में, केंद्रीय सरकार को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकार अधिनियम के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए बचाव एवं राहत की और अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए. साथ ही उन्हें अपनी टीम को अगले कुछ महीनों तक प्रभावित इलाकों में ठहर कर काम करने का निर्देश देना चाहिए. बाढ की विभीषिका भले ही कम हो रही है, किंतु पुनर्वास और राहत का काम उस विभीषिका से बचाव के काम से कम दुष्कर नहीं है. यहां तंत्र विफल हुआ है, सबसे गंभीर चिंता का विषय यही है

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ बिहार में जनसंहार के दस्तावेज़ -1 ”

  2. By Udan Tashtari on September 4, 2008 at 8:07 AM

    ५ दिन की लास वेगस और ग्रेन्ड केनियन की यात्रा के बाद आज ब्लॉगजगत में लौटा हूँ. कल से नियमिल लेखन पठन का प्रयास करुँगा. सादर अभिवादन.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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