हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सच वही जो सत्ता मन भाये

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/17/2008 09:03:00 PM

अब पत्र-पत्रिकाएं पढने की फुरसत निकालनेवाले पाठकों के लिए नहीं छपतीं. आजकल आम पत्रिकाएं शीर्षक पढो, काम पर चलो्व टाइप पाठकों के लिए छपती हैं. फुरसतवालों के लिए अखबार में स्पेस नहीं रहा. अगर स्पेस निकालने में लगे रहे तो हो चुकी कमाई. इतने से जिन पाठकों को संतोष न हो तो लेखक एक उदाहरण देना चाहेगा. जैसे, आजकल महंगाई पर अखबारों में खूब छप रहा है. महंगाई की खबर प्राकृतिक आपदा की तरह पेश हो रही है. यह आर्थिक व्यवस्थाजनित खबर के रूप में सामने नहीं आती. उसकी राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि उद्घाटित नहीं होती. क्या अखबारों में आजकल जो कुछ छप रहा है, उससे महंगार्ई का, गरीबी का इतिहास, योजनाबद्ध विकास और विकास की आधुनिक अवधारणा से संबंधों की पहचान हो सकती है? आप में से कुछ लोग कहेंगे नहीं, लेकिन असली बात यह है, जो हर खबर के पीछे की खबर जैसी है कि इस तरह की पहचान से रू--रू कराना मीडिया का न लक्ष्य रहा और न आदर्श. महंगाई पर रंग-बिरंगे समाचार बिक रहे हैं और प्रेस निश्चिंत है, क्योंकि अपने पावर से उसने महंगाई के समाचार को बिकाऊ प्रोडक्ट के रूप में पेश कर यह प्रमाणित कर दिखाया कि जिस पीडा से आप परेशान हैं, उसे वह आप ही को बखूबी बेच सकता है.

आजकल के अखबारों के मालिकों का स्पष्ट लेकिन अघोषित निर्देश यह है कि जो छपे, कैप्सूल साइज में छपे. अगर सिर्फ शीर्षक छाप कर अखबार को बिकाऊ बना सकते, तो आज के मीडिया मालिक हर खबर या लेख को विज्ञापन के साइज में छापते और कैप्सूल साइज लेखन को भी टाटा-बाय-बाय्व कर देते.

हेमंत

यही बीते कल की बात हो गयी कि एक सवाल सिर्फ अखबार पढनेवालों को नहीं बल्कि अखबार में काम करनेवालों को भी चिंता या चुनौती के कांटे-सा चुभ जाता था- जिसको छपने योग्य माना गया, वह सचमुच में खबर थी अथवा नहीं? जो छपी, वह खबर होने लायक थी अथवा नहीं? फिलहाल आम पाठकों की एक शिकायत भर बाकी रह गयी है, लेकिन उम्मीद है कि जल्दी ही यह भी बेमानी हो जायेगी कि अखबारों में झूठ भी छपता है. अखबार में कामवालों में यह मान्यता भी, समझिए तो, अंतिम सांस की तरह जिंदा है कि सिर्फ झूठ छाप कर कोई समाचारपत्र (अखबार) जीवित नहीं रह सकता. इसलिए पाठकों की शिकायत का सर्वमान्य प्रकट आशय यह रह गया है कि आजकल के अखबार पूरा झूठ नहीं बोलते, लेकिन पूरा सच भी नहीं बोलते. हालांकि यह साफ दिखने लगा है कि कई पत्र-पत्रिकाएं सच की शक्ल में झूठ परोसने की कला में माहिर होने को ही अपनी कमाई की बुनियादी शर्त मानने लगी हैं और अपनी सत्ता्व की मारक क्षमता की असली कसौटी भी.

लेकिन एक समस्या है. वह यह कि तमाम पत्र-पत्रिकाओं, या कहें प्रे्रेस-मीडिया, को लोकतंत्र में जीना है. और, यह लोकतंत्र ऐसा है, जिसमें एक तरफ मीडिया को (हर क्षेत्र और हर तरह की सत्ता को भी) अपने वर्चस्व के लिए एकाधिकार अथवा डिक्टेटरी का स्पेस कायम करने का भरपूर स्कोप मिलता है और दूसरी तरफ मीडिया मालिकों के न चाहने के बावजूद एक आम सवाल को बेताल की तरह उनकी पीठ पर जब-तब चढ जाने का अवसर मिलता है कि क्या सत्य को उद्घाटित करने का पत्रकारिता का आदर्श महज एक दवा है, जो सामाजिक सरोकार के नाम पर बाजार में पाठकों को आकर्षित करने के लिए किया जाता है? आकर्षित करना माने? ठगना.

इसे हिंदी समाज (पिछडा!) की त्रासदी कहें या आदत कि वह आज भी मानता है कि अखबार समाज का दर्पण है. जैसा समाज होगा, अखबार में उसका छपा रूप वैसा ही दिखेगा. दर्पण माने? पारदर्शी शीशे की पीठ पर पारे का लेप लगा कर दर्पण तैयार किया जाता है, तभी उसमें कोई चेहरा, कोई प्रतिबिंब दिखता है. उसी तरह पत्रकारिता का लेप चढाने से अखबार आईना बनता है. वैसे, इस ट्रेजेडीनुमा आदत के बावजूद हिंदी समाज का आम पाठक इस फैक्ट का अर्थ समझने लगा है कि आजकल प्रेस जहां आईनारूपी अखबार का प्रोडक्शन होता है, स्टेट कहलाता है. स्टेट माने पावर. अब तो प्रेस होने का अर्थ ही पावर हो गया. उससे कुछ प्रोडक्शन हो और अक्षर व शब्दों के संयोजन से ऐसी सूचना या ज्ञान का प्रोडक्शन हो, जो अपने आप में कुछ पावरफुल होने का एहसास दिलाये, यह सब बेमानी हो गया. अब तो आदत के मारे या अपना हाजमा ठीक रखने के लिए रोज चंद मिनटों के लिए अखबार उलटने या टीवी के सामने बैठने को मजबूर पाठक-दर्शक भी यह कहने लगे हैं कि प्रेस (मीडिया) अब आईना नहीं गढता, बल्कि आईना दिखाता है. आजकल आईना बनाने से ज्यादा आईना दिखाना ही होता है. शिकायत सुनने का धैर्य हो तो यहां तक सुनने को मिलेगा कि धूल भरा आईना घुमाते दिखाते हैं, कुछ दिखता नहीं या जो दिखता है, वह अस्पष्ट और कहीं-कहीं उल्टा नजर आता है. पूछते हैं तो कहते हैं, अपना चेहरा ठीक करो. आजकल अखबार छापने और पत्रकारिता करने के नाम पर यही सब हो रहा है.

बेचारा पाठक! वह जानते हुए भी इसे ग्राह्य नहीं कर पा रहा कि आज परिणाम ही प्रक्रिया की गति दिशा तय कर रहा है. लोकतंत्र में तेज रफ्तार की आधुनिक टेक्नोलॉजी ने यह भी रेखांकित कर दिया है कि परिणाम से लक्ष्य बदल रहे हैं. सिद्धांत और आदर्श तो क्या, सच ही सनातन परिभाषा तक बदल रही है. बचपन में मास्टर साहब कान पकड कर यह मुहावरा रटवाते थे कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है. अब दिख यह रहा है कि मुहावरा ही उलट गया है. अब हर अविष्कार नयी आवश्यकताओं को जन्म देने लगा है. परिणाम के इस असर ने अखबार रचनेवाले पात्र यानी पत्रकार और उसको तेल-साबुन की तरह एक प्रोडक्ट के रूप में बाजार में बेचनेवाले व्यवसायी मालिक की भूमिका बदल दी है. इस मायने में पत्रकारिता समय की नब्ज पर हाथ रखने और उसकी धडकन की पहचान करते-करते उसको कंट्रोल करने की भूमिका में पहुंचने लगी है, पहुंच गयी है. राजनीतिक, धार्मिक, प्रशासनिक सत्ताधीशों की तरह.

हिंदी के प्रख्यात पत्रकार श्री राजकिशोर ने 20-25 साल पहले ही कह दिया था कि समाचारपत्रों में सच्व से फ्लर्ट किया जाता है. आज फ्लर्टेशन ही पत्रकारिता, खास कर व्यावसायिक पत्रकारिता का केंद्रीय मूल्य बन गयी है. वह सच्चाई, नैतिकता, आधुनिकता, कला, विज्ञान सभी के साथ फ्लर्ट कर सकती है, करती है. अब यह मूल्य मकसद बन गया है. इसे कोई भी देख सकता है और महसूस कर सकता है कि अपनी बेईमानी को छिपाने के लिए सच के साथ फ्लर्ट करने की अपनी कोशिश में पत्रकारिता झूठ के साथ भी फ्लर्ट करते हुए खुद को ईमानदार दिखाने की कोशिश करती है. पाठकों के सामने अपनी सार्वजनिक ईमानदार छवि बरकरार रखने के लिए यह पत्रकारिता अपने सामाजिक-सामूहिक, विवेक को अपनी अंतरात्मा (मीडियात्मा!) को खुद ही धोखा देते चलती है. (पाठकों के लिए यह एक दिलचस्प खबर हो सकती है कि आजकल हिंदी मीडिया अंगरेजी शब्द फ्लर्ट का हिंदी में सही और स्थिर अर्थ खोजने में लगा हुआ है. 20-25 साल पहले मीडिया में फ्लर्ट का सबसे सरल अर्थ झटका माना जाता था. बीच में उसका नया अर्थ खुला -चोंचलडाई. और ताजा अर्थ है- प्रेम का खिलवाड करना या दिखावटी प्रेम!)

क्या ऐसा देश के तमाम अखबार और पत्र-पत्रिकाएं करती हैं? यह सवाल किसी बिहारी पत्रकार से पूछिए, तो आपको जवाब मिलेगा हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में शायद नहीं और शायद हां भी. नहीं, इसलिए कि कई पत्र-पत्रिकाएं जान-बूझ कर ऐसा नहीं करती. हां इसलिए कि कुछ पत्रिकाएं जान-बूझ कर ऐसा करती हैं. जो पत्र-पत्रिकाएं अनजाने में ऐसा करती हैं, वे वस्तुतः ऐसा होते देखती हैं, करती नहीं. वे जिसे सच के रूप में पेश करती हैं, वह अक्सर सच से फ्लर्ट के रूप में पेश हो जाती है. इसके माने यह कि पाठक यह समझे कि संबंद्ध पत्र-पत्रिका ईमानदार है, लेकिन उसको बरतने में अक्षम है.

ऐसी पत्रिकाएं समझ नहीं पातीं कि ऐसा क्यों होता है. वे ऐसा होते देख कर सोच भी नहीं पातीं कि ऐसा हो जाने के बाद उनके पास पश्चाताप और प्रायश्चित का कोई रास्ता हो सकता है या होना चाहिए. हालांकि ऐसी पत्र-पत्रिकाओं से पाठकों की शिकायत का पॉजिटिव आशय यही होता है. ऐसी पत्रिकाएं आमतौर पर छोटी या लघु होती हैं और वे अनजाने में हुई भूल के लिए यह सफाई देने की मुद्रा में रहती हैं कि क्या करें हम गरीब्व हैं, सच तक पहुंचने के हमारे साधन सीमित हैं. साधन सीमित होने के कारण सच तक पहुंचने का हमारा कमिटमेंट अधूरा रह जाता है. वे ऐसी सफाई यों पेश करती हैं, मानो वे बडी और समृद्ध होतीं तो सच-को-सच के रूप में पेश कर देतीं या सच पातीं तो उसमें कटौती नहीं करतीं या सच को फ्लर्ट रूप में पेश होने देने की किसी अदृश्य प्रक्रिया को रोक देतीं. ऐसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकट रूप हिंदी के सामान्य से सामान्य पाठक तक को यह समझने को विवश करता है कि इनके संचालक-संपादक बेचारे हैं. ये पत्र-पत्रिकाएं बुनियादी रूप से ईमानदार हैं, रहना चाहती हैं, लेकिन इसके लिए अपने अंदर बेईमानी के कीडे पसरने के खतरे या बाहर से होनेवाले बेईमानी के हमले के खिलाफ सजग होकर खडे होने में असमर्थ हैं. अपनी ईमानदारी को जिंदा रखने के लिए ऐसी पत्र-पत्रिकाएं बेईमानी के कीडों या शक्तियों से समझौता करती हैं कि तुम भी चलो हम भी चलें, चलती रहें जिदंगी...

इसके रू--रू आम अनुभव यह भी है कि जो पत्र-पत्रिका जितनी बडी होती है, वह उतना ही जान-बूझ कर सच के साथ फ्लर्ट करती है. वस्तुतः वे ऐसा इसलिए करती हैं कि वे यह मान कर चलती हैं कि वे इसी के जरिये जिंदा रह सकती है. फल-फूल सकती हैं. ऐसी पत्र-पत्रिकाओं से गुजरते हुए हिंदी पाठक यह महसूस करता है कि ये पत्र-पत्रिकाएं जान-बूझ कर फ्लर्ट करती हैं और फिर खुल कर यह कहने को अपनी ईमानदारी साबित करती है कि भई, हम बेईमानी बरतते हैं ईमानदारी से. तब पाठक के पास इस तरह की आह भरने के सिवा कोर्ई चारा नहीं रह जाता-इस सादगी पर कौन न मर जाये या खुदा.

तो ऑन द होल, लगभग तमाम धाकड कहे जानेवाले रंग-बिरंगे समाचारपत्र ऐसे ही दृश्यों के दोरंगे कोलाज नजर आते हैं. बिहार जैसे कथित पिछडे राज्य में यों आज भी अकादमिक स्तर पर कहा जाता है कि हर घटना का एक अर्थ होता है, इसकी स्पष्टता के बिना तथ्य भ्रम फैलाते हैं, अखबारों से इस समझ को बरते जाने की उपेक्षा की जाती है कि तथ्य अपने आप में सच्चाई नहीं है, सच्चाई -पूरी सच्चाई के बिना तथ्य ही अधूरी शक्ल में सामने आते हैं, इससे भी भ्रम फैलता है, पाठकों को सही और गलत के चुनाव का असर नहीं मिलता. और कि किसी तथ्य की सच्चाई का अनुमान अन्य तथ्यों के फ्रेम में रख कर किये जाने की बात धरी की धरी रह जाती है.

अंत में एक निवेदन. खास कर उन पाठकों से, जो फुरसत निकाल कर इस आलेख को शुरू से अंत तक पढ गये. ये पाठक शायद यह सवाल ठोंकना चाहेंगे कि लेखक अगर सच से फ्लर्ट करने के खिलाफ है, तो वह ठोस उदाहरण देकर अपनी बात साबित करने का साहस क्यों नहीं करता? तो इसके लिए प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या्व कहते हुए यह सूचना देना प्रासंगिक होगा, जो आज तक खबर नहीं बनी कि अब पत्र-पत्रिकाएं पढने की फुरसत निकालनेवाले पाठकों के लिए नहीं छपतीं. आजकल आम पत्रिकाएं शीर्षक पढो, काम पर चलो्व टाइप पाठकों के लिए छपती हैं. फुरसतवालों के लिए अखबार में स्पेस नहीं रहा. अगर स्पेस निकालने में लगे रहे तो हो चुकी कमाई. इतने से जिन पाठकों को संतोष न हो तो लेखक एक उदाहरण देना चाहेगा. जैसे, आजकल महंगाई पर अखबारों में खूब छप रहा है. महंगाई की खबर प्राकृतिक आपदा की तरह पेश हो रही है. यह आर्थिक व्यवस्थाजनित खबर के रूप में सामने नहीं आती. उसकी राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि उद्घाटित नहीं होती. क्या अखबारों में आजकल जो कुछ छप रहा है, उससे महंगार्ई का, गरीबी का इतिहास, योजनाबद्ध विकास और विकास की आधुनिक अवधारणा से संबंधों की पहचान हो सकती है? आप में से कुछ लोग कहेंगे नहीं, लेकिन असली बात यह है, जो हर खबर के पीछे की खबर जैसी है कि इस तरह की पहचान से रू--रू कराना मीडिया का न लक्ष्य रहा और न आदर्श. महंगाई पर रंग-बिरंगे समाचार बिक रहे हैं और प्रेस निश्चिंत है, क्योंकि अपने पावर से उसने महंगाई के समाचार को बिकाऊ प्रोडक्ट के रूप में पेश कर यह प्रमाणित कर दिखाया कि जिस पीडा से आप परेशान हैं, उसे वह आप ही को बखूबी बेच सकता है.

अगर यह उदाहरण आप पढ पायें और हां या न कहने के लिए प्रेरित हों, तो इस आलेख को छापनेवाले संपादक को धन्यवाद के दो शब्द लिखने को फुरसत जरूर निकालें, क्योंकि आजकल के अखबारों के मालिकों का स्पष्ट लेकिन अघोषित निर्देश यह है कि जो छपे, कैप्सूल साइज में छपे. अगर सिर्फ शीर्षक छाप कर अखबार को बिकाऊ बना सकते, तो आज के मीडिया मालिक हर खबर या लेख को विज्ञापन के साइज में छापते और कैप्सूल साइज लेखन को भी टाटा-बाय-बाय कर देते.

बतकही बिहार की वाले हेमंत जी जानेमाने पत्रकार हैंप्रभात ख़बर के बिहार विशेषांक के लिए उनहोंने यह लेखा लिखा था, जो प्रकाशित भी हुआयहाँ साभार प्रस्तुति.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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