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बीच सफ़हे की लड़ाई

आप हजार हंसों के साथ हैं या हजार बमों के साथ

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/05/2008 09:00:00 PM

हिरोशिमा-नागासाकी को याद करने का अर्थ

कला कौशल

बहुत पहले संवाद शैली में एक कविता कहीं पढी थी, पूरी कविता और कवि का नाम याद नहीं. इसमें पुत्र पूछता है-पापा अमेरिका क्या होता है? पापा कहते हैं- बेटा, अमेरिका बम होता है! पुत्र फिर पूछता है- पापा, बम क्या होता है? पापा फिर कहते हैं-बम अमेरिका होता है, बेटा.
अमेरिका एक देश का नहीं, एक प्रकार की व्यवस्था का नाम है, जिसकी बागडोर कभी इंग्लैंड के हाथों में होती है, तो कभी जर्मनी के हाथों में. अभी उसकी बागडोर अमेरिका नाम के देश के हाथों में है. कमलेश्वर ने 'कितने पाकिस्तान' में कहा है-'पूंजीवाद इसी का दूसरा नाम है. साम्राज्यवाद तीसरा नाम है, उपनिवेशवाद और आज दस्तक देती हुई नयी सदी में इसका नाम है, बाजारवाद.'
हर
साल जब अगस्त का महीना आता है तो अमेरिकी साम्राज्यवाद का छुपा क्रुर और अमानवीय चेहरा दुनिया के सामने जाता है. 1945 के 6 और 9 अगस्त को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों में उसने एटम बम गिराया था. इस विनाशलीला में लगभग दो लाख लोग जल कर राख हो गये. जो चार लाख लोग बच गये, उन्हें खतरनाक बीमारियों ने घेरा. आज 53 वर्षों के बाद भी उस एटमी प्रहार का असर मानसिक और शारीरिक असंतुलन के रूप में देखा जा सकता है.
आज
हिरोशिमा के अस्पतालों में हिवाकुशा हैं. हिवाकुशा जापानी भाषा में उन चार लाख बदनसीबों को कहा जाता है, जो अमेरिकी एटमी बम से बच तो गये, लेकिन उसके बाद वे अपाहिज होकर जी रहे हैं. हिरोशिमा अब एक शांति संग्रहालय है, जिसमें उस अमेरिकी विनाशयज्ञ के चिह्न और दुष्परिणाम देखे जा सकते हैं. इस संग्रहालय के निदेशक हिवाकुशा हैं. उनका अस्तित्व अमेरिकी साम्राज्यवाद के चेहरे से कपडे हटाता है और विश्व शांति, संप्रभुता के संदेश देता है.
हिरोशिमा
शांति संग्रहालय में एक पार्क बना है, जहां मारे गये लोगों के स्मारक बने हैं. उनमें सदाको नाम की एक लडकी का भी स्मारक है. तब वह मात्र दो साल की बच्ची थी. उसके मां-बाप तो जल कर खाक हो गये, लेकिन वह बच गयी. हालांकि वह बम के दुष्प्रभाव से बच नहीं पायी. 1955 में, जब वह 12 वर्ष की थी, अचानक बीमार पड गयी. उसे अस्पताल में भरती कराना पडा. जापान में यह मान्यता है कि यदि व्यक्ति मन में कोई सदिच्छा लेकर कागज के एक हजार हंस बनाये तो उसकी मनोकामना पूरी होती है. सदाको स्वस्थ्य होने के लिए कागज के हंस बनाने लगी. लेकिन वह सात सौ के आस-पास हंस ही बना पायी थी कि अमेरिका प्रदत्त मौत ने उसे घेरा. आज उसकी प्रतिमा पर प्रत्येक दिन हजारों लोग हंस चढाते हैं. यहां आनेवाले लोग अपने साथ संकल्प लेकर लौटते हैं कि ऐसी त्रासदी दोबारा घटित नहीं होने देंगे. यहां के पत्थर पर अंकित हैं-'ये चिर निद्रा में सो रहे हैं, यह गलती दोबारा होगी.'
क्या
सचमुच दोबारा नहीं होगी? यह प्रश्न भी 53 वर्षों के बाद एकध्रुवीय दुनिया में सिर उठाने लगा है. सदाको को जार्ज बुश के बच्चों के समकक्ष रख कर देखिए. जब वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ था, तब बुश सपरिवार राजधानी से बाहर थे. उनके पीए एंड्रयू कार्ड ने चुपके से बुश के कान में इमारत के ध्वस्त होने की खबर सुनायी थी, ताकि उनके बच्चे उस भयानक ध्वंस सुन कर सहम जायें. बेगुनाह बाला सदाको को जब जख्म दिया गया था, दुनिया दोध्रुवीय थी. यानी तब अमेरिकी नापाक इरादों का मुंहतोड जवाब देने के लिए सोवियत रूस था. भारत जैसे देश सोवियत सहायता के बावजूद गुट निरपेक्ष थे. उनकी स्वतंत्र विदेश नीति थी. आज वह अमेरिकापक्षी हो गया है. सोवियत संघ टूट चुका है. अमेरिका का नंगा नृत्य इराक, पनामा, वियतनाम, क्यूबा सहित क्रमशः पूरी दुनिया में जारी है. जो बचे हैं, वे सोचते हैं कि यह तो उनका मामला नहीं है. अमेरिका उनके साथ ऐसा थोडे ही कर सकता है. अब वक्त गया है कि हमें तय करना चाहिए कि हम हजार हंसों के साथ हैं कि हजार बमों के साथ. आज हिरोशिमा-नागासाकी को याद करने का यही अर्थ है.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ आप हजार हंसों के साथ हैं या हजार बमों के साथ ”

  2. By Ek ziddi dhun on August 8, 2008 at 10:08 AM

    dukh hai ki log pagla gaye hain aur hamare neta dalali kar rahe hain. bam ke saath kya hasil hoga?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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