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बीच सफ़हे की लड़ाई

मधुकर सिंह व शैवाल के लिए कब टूटेगी चुप्पी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/01/2008 03:22:00 PM

मधुकर जी काफी समय से आरा में बीमार पड़े हैं। उनके इलाज के लिए कोई आगे नहीं आया है-न कोई लेखक संगठन और न ही सरकार। पिछले दिनों एक और ख़बर आई-गया में कथाकार शैवाल को उनके परिवारवालों के साथ कुछ लोगों ने पीट दिया। प्रशाशन निर्दोष युवकों में तो माओवादियों को ढूंढ लेती है-लेकिन शिकायत करने और पहचान होने के बावजूद दोषियों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं करती। यह घटनाएँ संवेदनहीन होते समय और समाज की शिनाख्त करती हैं। प्रभात ख़बर के संपादक अजय कुमार की टिपण्णी।

अजय कुमार
गेसर मुसहर है. वह चुनाव जीत कर पहली बार अपने गांव आता है. मुसहर टोली में अपार खुशी है. खाने के लिए सूअर का गोश्त और भात बना हुआ होता है. लेकिन जगेसर पहले गांव के उत्तर टोला जाता है और वहां से आता है अपने टोला. उसके अपने लोग उसे खाने के लिए कहते हैं. पर जगेसर उनके साथ खाने से इनकार कर देता है. वह अपना 'जनेऊ' दिखाते हुए कहता है कि उसने तो पूजा-पाठ शुरू कर दिया है. मुसहर टोली के लोगों को काटो तो खून नहीं. वे भारी सदमे में होते हैं. जगेसर बिना खाये वहां से चला जाता है. उसकी जमात के लोग बताते हैं कि जगेसर अब अपना नहीं रहा. यह बिहार के चर्चित लेखक मधुकर सिंह की कहानी 'दुश्मन' का संक्षिप्त भाव है. यह कहानी बताती है कि आम आदमी का विधायक, सांसद या मंत्री बनने के बाद किस तरह उसका वर्गीय रूपांतरण हो जाता है. वह अपने वर्ग से अलग हो जाता है. उसका चरित्र बदल जाता है. वास्तव में यह व्यवस्था ही ऐसी है जो उसका अंग बनता है, वह उसका हो जाता है. यानी व्यवस्था उसे पचा लेती है.
दृष्टिसंपन्न लेखक-कथाकार मधुकर सिंह ने ऐसी दर्जनों कहानियां लिखीं. कई उपन्यास लिखे. पिछले दो महीने से भी अधिक समय से यह लेखक बीमार है. ठीक से उनका उपचार भी नहीं हो पा रहा है. पैसे की तंगी है. उनकी देखभाल करीबी मित्र कर रहे हैं. समाज और शासन की भूमिका निष्क्रिय है.

कथाकार शैवाल, उनके बेटे और पत्नी को बदमिजाज लोग पीट देते हैं. थाने में प्राथमिकी दर्ज होती है. थानेदार का कहना होता हैः शैवाल जी, अभियुक्त अगर दिखें, तो फौरन खबर करें. उन्हें हम पकडेंगे. शैवाल तिलमिला कर रह जाते हैं. एक लेखक और कर भी क्या सकता है? तीन दिन बीत जाने के बाद भी अभियुक्त पकड से बाहर हैं. लेकिन मामला अभियुक्तों की गिरफ्तारी से अधिक उन स्थितियों पर गौर करने का है, जब मधुकर सिंह और शैवाल जैसे लेखकों की इस स्थिति के खिलाफ कोई हलचल नहीं होती. संवेदनहीनता के इस दौर में सृजनधर्मियों का हाल कौन जानेगा? आज हाल उन लोगों का जाना जाता है,जो अंधेरे का साम्राज्य कायम करने में लगे हुए हैं. आज कोई दलाल बीमार होता, तो अखबारों में मेडिकल बुलेटिन छपते, किसी राजनीतिज्ञ पर हमला होता, तो धरना-जुलूस निकलना शुरू हो गया रहता.संयोग से आज (31 जुलाई ) हम कलम के सिपाही प्रेमचंद की जयंती मना रहे हैं. उन्हें याद करने के लिए दर्जनों कार्यक्रम हुए. प्रेमचंद के बहाने रचनाकर्म, समाज, प्रतिशोध, विद्रोह, प्रेमचंद की परंपरा और न जाने किन-किन पहलुओं पर चर्चा हुई. लेकिन ऐसा नहीं लगता कि उन्हें याद करने की रस्म पूरी की जा रही है? क्योंकि उन्होंने साहित्य को राजनीति से आगे चलनेवाली मशाल बताया था. और आज इस मशाल को जलाये रखनेवालों के प्रति हम बिरत हैं. क्या प्रेमचंद को अधूरे मन से याद करने के हम दोषी नहीं हैं?

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ मधुकर सिंह व शैवाल के लिए कब टूटेगी चुप्पी ”

  2. By ajit on August 1, 2008 at 4:20 PM

    This comment has been removed by the author.

  3. By ajit on August 1, 2008 at 4:21 PM

    bahut dukhad hai. apne sahi likha hai-ab premchand isliye yaad kiye jate hain kyonki we bazar men bik sakte hain. jo nahin bikta wah ab yaad bhi nahin kiya jata.

    Ajit

  4. By Bijen Salam on August 2, 2008 at 11:14 PM

    aaj ke samaj me log khali hans kar phal khate hei. phal de rahe us per ko lagane wala nahin jante. yah pakriti ki niyat hei.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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