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बीच सफ़हे की लड़ाई

मैं अब किसानों से आंख मिलाने से बचता हूं : पी साइनाथ

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/13/2008 03:57:00 PM

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पी साईनाथ
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घरों की दयनीय स्थिति
मैं इन प्रभावित घरों से प्राप्त तीन व्यक्तिगत घटनाएँ आपको बताना चाहूँगा. मेरे लिए यह सबसे ज्यादा पीड़ादायक है कि एक ही घर में दूसरी या तीसरी आत्महत्याएँ हो रही हैं. पिछले कुछ वर्षों में जिन 700 आत्महत्या का दंश झेल रहे परिवारों में मैं गया हूँ और उनको देखा है, मुझे सबसे ज्यादा कष्ट इस बात से पहुंचता है कि जब आप उस घर से जानेवाले होते हैं, जब आप उस घर की गृहिणी या बड़ी बेटी से आँख मिलाते हैं तो आपको यह पता चल जाता है कि वो भी अपनी जान देने के बारे में सोच रहे हैं, अब आप मुझसे यह न पूछें कि मैं यह कैसे समझ लेता हूँ. आप जानते हैं कि कलम और प्रेस की ताकत के गर्व के बावजूद, मैं उनकी आत्महत्याएँ रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकता, क्योंकि आज हम एक समाज के रूप में ऐसे ही हैं. यह मेरे लिए सबसे ज्यादा पीड़ाकारी है, मैंने आंख मिलाने से बचने की कोशिशें शुरू कर दी हैं, क्योंकि मैं उस व्यक्ति की आँखों में नही झाँकना चाहता जो कि आत्महत्या करने जा रही हो. जब एक जवान विधवा आत्महत्या करती है तो वो संभवतः अपनी बेटी को भी मार डालती है, क्योंकि वह नहीं चाहती कि उसके बच्चे को वेश्यावृत्ति में धकेला जाये.

पिछले साल जब प्रधानमंत्री आये, वहाँ पूरी तरह से अव्यवस्था थी, क्योंकि हर व्यक्ति उनकी नजर में रहना चाहता था. यह इस कारण क्योंकि जो कुछ घट रहा था, उससे प्रधानमंत्री सही मायनों में चिंतित थे. उन्होंने एक ऐसी यात्रा की, जो वास्तव में पूर्व नियोजित नहीं थी. उनकी यात्रा के एक महीने पहले, मैं गोसावी पवार के घर में था. वह एक दूसरे तरह का पवार था, एक कम विशेष सुविधा प्राप्त पवार, एक आदिवासी पवार और आप उसे संभ्रांत पवारों के साथ जोड़ने की गलती न करें. गोसावी पवार एक बंजारा परिवार से था, जो कि काफी गरीब जाति है.

इत्तेफाक से, जब मैं उसके घर में बैठा हुआ था तब मैंने 6 करोड़ डॉलर या पाउंड के शाही खर्च पर भारत के सबसे अमीर व्यक्ति लक्ष्मी मित्तल के बेटी की शादी की खबर भी पढ़ी. इस राशि का आप जिस भी मुद्रा में हिसाब लगायें, यह काफी फूहड़ प्रतीत होती है. बेचारे गरीब मि मित्तल, उन्हें पेरिस में कोई वेडिंग हॉल नहीं मिल सका. इस मौसम में वहाँ कोई हॉल मिलना काफी मुश्किल है, इस कारण उन्होंने वेसैल्स के महल को ही भाड़े पर ले लिया और अपनी बेटी की शादी वहीं की. लेकिन गोसावी पवार के घर में, जो कि एक काफी गरीब परिवार है, शादी के लिए देश के काफी दूर-दूर के इलाकों से लोग आये थे और उन्होंने एक साथ तीन शादियॉं संपन्न कराने का फैसला लिया था, ताकि वे मिल-जुल कर उसका बोझ उठा सकें. देश के कई इलाकों व राज्यों से लोग वहाँ जमा हुए. उस परिवार का कर्त्ता-धर्त्ता गोसावी पवार, इन शादियों के लिए जरूरी साडियों कि लिए पैसों की व्यवस्था करने में असमर्थ रहा. महाजन, बैंक मैनेजर व अन्य लोगों के द्वारा अपमानित किये जाने के कारण गोसावी पवार ने आत्महत्या कर ली.

मैंने दो बातें महसूस कीं. एक ने मुझे बहुत ही ज्यादा उदास कर दिया और एक ने मुझे इस देश के गरीबों के लिए प्रेरित किया. एक जिस बात ने मुझे बहुत ही ज्यादा उदास कर दिया था, वह यह कि उस गरीब घर में एक ही दिन तीन शादियाँ भी हुईं और उसी घर से एक अर्थी भी उठी. यह दोंनो एक ही दिन एक साथ हुआ क्योंकि वे शादी रोकने की स्थिति में नहीं थे. ऐसा करना उस परिवार को दिवालिया कर सकता था, जो राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक और न जाने कहाँ-कहाँ से लौट कर वापस घर आया था. इस कारण उन्होंने शादी होने दी. दुल्हे और दुल्हनें रोईं. सबसे ज्यादा मार्मिक क्षण वह था, जब बारात निकली और उसकी मुलाकात हाइवे पर जनाजे से हुई. डा स्वामीनाथन जी याद करेंगे कि जब वे यवतमाल आये थे, उन्हें भी ऐसी ही परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ा था. एक तरफ अस्पताल में आत्महत्या करनेवालों को लाया जा रहा था और फिर भी राष्ट्रीय किसान आयोग (एनएफसी) की टीम सरकारी अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श में ही मशगूल थी. इस तरह गोसावी पवार के जनाने के साथ बारात का आमना-सामना हुआ. तब अर्थी को काँधा दे रहे लोग मैदान की ओर भागे और छिप गये ताकि वो बारात के लिए अपशकुन न बनें.
लेकिन कुछ ऐसा भी हुआ जो काफी प्रेरणादायी था. इस पृथ्वी पर रहनेवाले कुछ सबसे गरीब लोगों ने इन शादियों को संभव बनाया. सबने 5 रूपये, एक पाव गेहूँ, आधा किलो चावल, केले, एक नारियल और जो भी उनसे बन पड़ता था, देकर सहायता की. उन्होंने विवाह संपन्न कराया. उनके पास ऐसा करने लायक साधन नहीं था. लेकिन उन्होंने समुदाय की ताकत से, जनता की ताकत से ये विवाह संपन्न कराया. मुझे उस क्षण काफी गौरव का अनुभव हुआ कि हमारे लोगों ने उस भलमानसता व स्वाभिमान का प्रदर्शन किया है जिसे आज कुलीन व संभ्रांत लोग पूरी तरह भुला चुके हैं.
अगली पोस्ट में अन्तिम किस्त

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ मैं अब किसानों से आंख मिलाने से बचता हूं : पी साइनाथ ”

  2. By jasvir saurana on June 13, 2008 at 6:46 PM

    aapne bilkul sahi likha hai.or bhi is tarha ki baaton ko likate rahiye.

  3. By Vaibhav on June 16, 2008 at 4:18 PM

    In my opinion, the main cause of all problems is illiteracy; I understand that a farmer who can't feed his child properly can't even think about teaching his child so those who can do something on this should come forward as I am planning for a school in my native place. Once a farmer will be able to think better about himself, there is no need any other change.

  4. By अशोक पाण्डेय on June 20, 2008 at 5:26 PM

    यह सब पढ़ने के बाद आंखों में पानी आ जाता है और हृदय में ज्‍वाला-सी धधकने लगती है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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