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बीच सफ़हे की लड़ाई

पिता की रिहाई के लिए एक बेटी की अपील

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/05/2008 10:43:00 PM

अगर आप तारे जमीन पर देखते हुए दर्शील सफारी के अभिनय पर अपने को रोने से नहीं रोक पाये थे, तो उस अभिनय में और फिल्म के हर फ्रेम में जिस टीम की कला और कौशल दिखता है, उसमें से एक हैं शिखा राही. वे तारे जमीन पर की असिस्टेंट डायरेक्टर हैं. लेकिन जिस दिन तारे जमीन पर पूरे देश में रिलीज हो रही थी, उस दिन इस फिल्म की असिस्टेंट डायरेक्टर के पिता-प्रशांत राही-अपनी बेहोशी में तीन दिनों की अवैध हिरासत और उन यातनाओं को, जो उन्हें इस दौरान दी गयीं को बरदाश्त करने की कोशिश कर रहे थे. जैसा कि इस विवरण में हम देखेंगे, उन्हें इसके दो दिनों के बाद (मतलब पांच दिनों की अवैध हिरासत के बाद) ही मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया. वे अब भी झूठे आरोपों में जेल में बंद हैं. एक पत्रकार. एक सामाजिक कार्यकर्ता. उनकी रिहाई की अपील के साथ, उनकी बेटी शिखा राही की यह टिप्पणी, जो कॉबैट लॉ में प्रकाशित हुई है. अनुवाद : रेयाज-उल-हक


एक बेटी की अपील

शिखा राही

त्तराखंड में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मुख्यमंत्री के आंतरिक सुरक्षा को लेकर 20 दिसंबर, 2007 को हुए अधिवेशन तक राज्य में किसी भी तरह की नक्सली गतिविधि की एक भी खबर के बारे में मुझे याद नहीं. मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा-मैं पहले कह चुका हूं कि वाम चरमपंथ संभवतः भारतीय राज्य के लिए अकेली सबसे बडी चुनौती है. यह निरंतर बढ रहा है और हम चैन से तब तक नहीं रह सकते जब तक कि इस विषाणु का उन्मूलन न कर दें.' राज्य को आंतरिक सुरक्षा बेहतर करने के लिए मदद देने का आश्वासन देते हुए उन्होंने कहा-अपने सभी माध्यमों के जरिये हमें नक्सली शक्तियों की पकड को छिन्न-भिन्न कर देने की जरूरत है.'
इस अधिवेशन से मुझे यह जानकारी मिली कि उत्तराखंड भी अब उन राज्यों में से एक है, जो लाल आतंक का सामना कर रहे हैं, जैसा कि राज्य के मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी ने उन सशस्त्र व्यक्तियों के बारे में कहा-जिन पर माओवादी होने का संदेह था-जो उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में देखे गये थे. खंडूरी के अनुसार, चूंकि उत्तराखंड नेपाल सीमा पर पडता है, यह सीमा पार कर आ रहे माओवादियों की ओर से बडे खतरे का सामना कर रहा है. आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के क्रम में और 'माओवादी शैतानों' की धमकियों से बचाव के लिए खंडूरी ने केंद्र से 208 करोड रुपयों की मांग की.
दिलचस्प है कि 21 दिसंबर, 2007 को अमर उजाला अखबार में छपी एक खबर ने खंडूरी की इस सूचना की पुष्टि की. इसने सूचना दी कि एक दर्जन सशस्त्र व्यक्ति-जिन पर माओवादी होने का संदेह है-उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के हंसपुर खट्टा, सेनापानी और चोरगलिया में देखे गये हैं. इस खबर के बाद खबर सीपीआइ (माओवादी) के तथाकथित जोनल कमांडर प्रशांत राही की हंसपुर खट्टा के जंगल में गिरफ्तारी की खबरें आयीं, जो नैनीताल जिले के स्थानीय अखबारों में छपीं, और जिन्होंने आंतरिक सुरक्षा के लिए फंड की जरूरत को न्यायोचित ठहराया. अखबार की खबर के अनुसार, 22 दिसंबर, 2007 को राही पांच दूसरे लोगों के साथ एक नदी के किनारे बैठे हुए थे, जब उन्हें गिरफ्तार किया गया. जबकि दूसरे लोग भागने में सफल रहे. कोई राज्य और इसकी पुलिस को इस तरह की उच्च स्तरीय योजना और समन्वय-जो उन्होंने हासिल किया-के लिए श्रेय जरूर दे सकता है. जिस गति से ये सारी घटनाएं एक के बाद एक सामने आयीं, उस पर विश्वास करना कठिन है. पहली बार जब उत्तराखंड में संदिग्ध माओवादी देखे गये और उस दिन में जब उनका जोनल कमांडर गिरफ्तार किया गया, मुश्किल से सिर्फ दो दिनों का फर्क है. इससे भी अधिक, जिस क्रम में ये घटनाएं आंतरिक सुरक्षा पर अधिवेशन के तत्काल बाद सामने आयीं, वह सुनियोजित दिखती है.
जबकि, असली कहानी, जो प्रशांत राही, मेरे पिता ने मेरे सामने रखी, जब मैं उनसे 25 दिसंबर, 2007 को ऊधम सिंह नगर जिले के नानकमत्ता पुलिस स्टेशन में मिली, वह उससे बिल्कुल अलग थी, जो प्रेस में आयी थी. जब मैं उनसे मिली, मैंने रोने का फैसला नहीं किया, इसलिए मैं उनसे लिपट गयी और कहा-'हरेक चीज ठीक है. चिंता मत करो.' हालांकि मैं उनकी आंखों में थकान देख सकती थी, मेरे पिता ने मुझे एक चौडी मुस्कान दी. जब मैं बातें करने के लिए उनके साथ बैठी, उन्होंने अपनी गिरफ्तारी का एकदम अलग ब्योरा दिया- देहरादून में 17दिसंबर, 2007 की नौ बजे सुबह मैं अपने एक दोस्त के घर पैदल जा रहा था, जब मुझ पर अचानक चार या पांच लोगों ने (जो वरदी में नहीं थे) हमला कर दिया. उन्होंने मुझे एक कार में धकेला, आंखों पर पट्टी बांध दी और पूरे रास्ते मुझे पीटते रहे. लगभग डेढ घंटे लंबी यात्रा के बाद एक जंगली इलाके में वे मुझे कार से बाहर खींच लाये, जहां उन्होंने मुझे फिर से पीटना शुरू किया. उन्होंने मुझे हर जगह चोट पहुंचायी'-मेरे पिता ने कहा.
मैं धैर्यपूर्वक उन्हें सुन रही थी, बिना उस नृशंसता से खुद को प्रभावित किये, जिससे वे गुजरे थे. मेरे पिता ने कहना जारी रखा-'18 दिसंबर, 2007 की शाम वे लोग मुझे हरिद्वार लाये, जहां प्रोविंसियल आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी (पैक) का अधिवेशन हो रहा था. यहां, उन्होंने मुझे टॉर्चर करना जारी रखा. उन्होंने निर्दयतापूर्वक मेरे शरीर के प्रत्येक हिस्से पर, गुप्तांगों सहित, मारा. अधिकारियों ने भी मुझे मेरे गुदा मार्ग में केरोसिन डालने और बर्फ की सिल्ली से बांध देने की धमकी दी.' इससे बदतर क्या हो सकता है कि पुलिस ने मुझे मुंबई से बुलाने और (जहां मैं रह रही थी और काम कर रही थी) अपनी मौजदूगी में मेरे पिता को मुझसे बलात्कार करने पर मजबूर करने की धमकी दी.
20 दिसंबर, 2007 अधिकारी मेरे पिता को ऊधमसिंह नगर के नानकमत्ता पुलिस थाना लाये. उन्हें शुरू के तीन दिनों तक लगातार पिटाई और और पूछताछ के कारण दर्द और निश्चेतना थी. हालांकि पूछताछ जारी रही, पुलिस ने उन्हें फिर से थोडा ठीक होने का इंतजार किया और तब दो दिनों के बाद 22 दिसंबर, 2007 को उन्होंने उनकी गिरफ्तारी दर्ज की, जो कि पूरी तरह निराधार और मनगढंत है. मेरे पिता के अनुसार, अधिकारियों ने, जिन्होंने उन्हें टॉर्चर किया, अपनी पहचान उन्हें नहीं बतायी और न ही वे पांच दिनों की उस अवैध हिरासत के बाद फिर कभी दिखे.
प्रशांत राही गिरफ्तारी के 24 घंटों के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत नहीं किये गये, संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन. वे मजिस्ट्रेट के सामने 23 दिसंबर को ही प्रस्तुत किये गये. उन्हें वकील, संबंधी या किसी दोस्त से गिरफ्तारी के बाद संपर्क करने की अनुमति नहीं दी गयी. पांच दिनों तक मानसिक और शारीरिक तौर पर यातना देने के बाद वे भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120बी, 121, 121 ए, 124 ए और 153 बी तथा गैरकानूनी गतिविधि (निषेध) अधिनियम की धाराओं 10 और 20 के तहत झूठे तौर पर फंसाये गये.
महाराष्ट्र मूल के मेरे पिता ने बनारस हिंदू विवि से एम टेक किया, लेकिन उन्होंने एक पत्रकार बनना चुना. पहले द स्टेट्समेन (दिल्ली) के संवाददाता रह चुके मेरे पिता अब उत्तराखंड में पिछले कई वर्षों से एक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे थे. पुलिस ने प्रशांत राही के मामले में जिन मौलिक अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का ऐसे खुलेआम उल्लंघन किया है, उनकी भारत के सभी नागरिकों को गारंटी की गयी है, इसमें अंतर किये बगैर कि वे कैसी राजनीतिक या विचारधारात्मक दृष्टि रखते हैं और उन पर किस तरह के अपराध करने का आरोप लगाया गया है. पुलिस द्वारा अधिकारों का इस तरह का भारी उल्लंघन माफ नहीं किया जा सकता. यदि एसी घटना प्रशांत राही के साथ घट सकती है, जो उच्च शिक्षित हैं और यथोचित तौर पर संपर्क में रहनेवाले व्यक्ति हैं, तब पुलिस के हाथों में पडे थोडे कमनसीब व्यक्ति की नियति के बारे में सोचते हुए सोचते हुए रोंगटे खडे हो जाते हैं.

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  1. 8 टिप्पणियां: Responses to “ पिता की रिहाई के लिए एक बेटी की अपील ”

  2. By Aflatoon on May 6, 2008 at 10:48 AM

    प्रशान्त मेरे छात्र जीवन के परिचित हैं और 'पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता'कम एक निष्ठावान समर्पित राजनैतिक कार्यकर्ता ज्यादा हैं । खण्डूरी से अपील है कि हिटलरी चाल से बाज आएं और प्रशान्त को अविलम्ब रिहा करें । इस पोस्ट पर उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ई-पते और फैक्स दिए जाएं ।

  3. By manjula on May 6, 2008 at 2:06 PM

    सच में इस देश में तो इंसान की तरह जीना भी दुश्‍वार होता जा रहा है. पहले अनसुइया सेन और अब शिखा राही. पता नहीं कहां जाकर रूकेगा ये

  4. By काकेश on May 6, 2008 at 2:43 PM

    यदि यह आरोप सही हैं तो पुलिस के इस कुकृत्य की घोर भर्त्सना करनी चाहिये. इस तरह तो सचमुच देश में रहना मुश्किल होता जा रहा है.

    *नानक माता को नानकमत्ता कर लें. यह सिख धर्म के अनुयाइयों का प्रमुख धार्मिक स्थल है.

  5. By vijay gaur on May 6, 2008 at 7:15 PM

    स्टेट्स्मैन से पहले प्रशांत देहरादून से निकलने वाले दैनिक "हिमाचल टाइम्स" में नौकरी करता था. देहरादून से निकलने वाली मासिक पत्रिका "युगवाणी" के एक अंक में पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा ने अपने इस मित्र पर अच्छे से लिखा है.

  6. By manish on May 6, 2008 at 7:45 PM

    ek taraf to sarabjeet ki rihayi ke liye ek tarah se Media aur Andhrashtrawadiyon ne Abhiyan chher rakha hai, par apne hi desh men janta ki awaz uthane wale Prashant Rahi, Vinayak sen, Jitan marandi jaise log kale kanoonon ke nam par jailon men band hain. aur inke liye kahin bhi kuchh khas logon ko chhor janta sadak par nahin utri hai. poonjipatiyon dawara Media bhi unki rihayi ke liye koi Media Trail nahin chala raha hai. Agar hum sab isi tarah chup rahe to agli bari humari hai.

  7. By Reyaz-ul-haque on May 6, 2008 at 10:48 PM

    shukriya sathiyon, aap sabka.

    kakesh ji, galatee sudhaar dee gayee hai. dhanyavad.

  8. By swapandarshi on May 7, 2008 at 4:36 AM

    This is very unfortunate and undemocratic.
    Can you write another article about mr Prashant Raahi, to introduce his work and him more. May be Aflatoon ji can write if he has been a long time friend of mr Raahi.

    and many bloggers can have that appeal on their pages
    as well a collective email appeal can be initiated.

  9. By गुस्ताखी माफ on May 7, 2008 at 6:13 AM

    हम खंडूरी को निम्न पते पर लिख/फैक्स कर सकते है
    Jai Durga Niwas, 12, Vikas Marg,
    Pauri Garhwal- 246 001(Uttarakhand)
    (01368) 222600

    Vidhan Bhawan, Haridwar Road, Dehradun - 248 001.
    Tel 2665090,2665100, Fax 2665722


    इसके अलावा राज्य के मुख्य सचिव को निम्न पते पर लिखा/फैक्स किया जा सकता है
    S K Das
    Phone 0135-2712100 , 2712200
    FAX- 0135-2712500

    मैं तो लिख रहा हूं, क्या आप लिखेंगे?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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