हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

विनायक सेन और अजय टीजी को रिहा किया जाये

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/19/2008 01:57:00 PM

रविभूषण
विनायक सेन अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बाल चिकित्सक हैं, जिन्होंने अपना जीवन निर्धनतम लोगों, विशेषतः छत्तीसगढ के खदानकर्मियों और जनजातियों की सेवा में समर्पित कर दिया है. वे मानवाधिकार के प्रबल-सक्रिय समर्थक रहे हैं. पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्य सचिव के रूप में भी उनकी भूमिका विशेष रही है.14 मई, 2007 को उन्हें छत्तीसगढ की पुलिस ने 1937 के गैरकानूनी गतिविधि अधिनियम और 2005 के छत्तीसगढ राज्य विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया और वे अभी तक जेल में हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जमानत की अर्जी खारिज कर दी है.
डॉ विनायक सेन पर मुख्य आरोप यह है कि वे जेल में प्रमुख माओवादी नेता नारायण सान्याल से 33 बार मिले थे और उनके पास से इस माओवादी नेता के तीन पत्र पाये गये हैं. इस प्रकार वे खतरनाक नक्सली के रूप में चिह्नित किये गये हैं. उन पर आरोप है कि वे राज्य के विरुद्ध सक्रिय हैं और प्रतिबंधित संगठन को सहयोग प्रदान करते हैं. डॉ सेन को माओवादियों का समर्थक और सहयोगी मान लिया गया है. जेल में वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. उनकी गिरफ्तारी से देश-विदेश का बौद्धिक तबका क्षुब्ध है. उनकी गिरफ्तारी (14 मई) के एक वर्ष पर देश के विविध हिस्सों में सेमिनार, धरना और प्रदर्शन हुए हैं तथा अखबारों ने वस्तुस्थिति से सबको परिचित कराया है. 14 मई के कई अखबारों में विनायक सेन संपादकीय से लेकर आलेख तक में उपस्थित हैं. हसन सरूर ने 'ग्लोबल कैंपेन फॉर सेन रिलीज पिक्स अप' (14 मई, 2008, हिंदू) में लंदन में भारतीय उच्च आयोग के समक्ष विनायक सेन की रिहाई को लेकर विरोध-प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, छत्तीसगढ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भेजे गये पत्र की जानकारी दी है, जिसमें सेन की महती भूमिका के बारे में बताया गया है. हस्ताक्षरकर्ताओं में दक्षिण एशिया, सॉलिडैरिटी ग्रुप, वेल्लोर अलुमनी एसोसिएशन की ब्रिटेन शाखा, दक्षिण एशिया एलायंस और 1857 समिति के प्रतिनिधि हैं. ब्रिटिश सांसदों का एक ग्रुप भी अपनी सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित कर रहा है. विरोध प्रदर्शन के आयोजकों ने डॉ सेन के विरुद्ध लगाये गये अभियोग को राजनीति प्रेरित माना है और छत्तीसगढ सरकार को अभियुक्त ठहराया है. अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा है कि विनायक सेन ने जेल में माओवादी नेता से मुलाकात पीयूसीएल के उपाध्यक्ष की हैसियत से की थी. रायपुर के सेंट्रल जेल में विनायक सेन नारायण सान्याल को चिकित्सा और कानूनी सहयोग देने गये थे.

विनायक सेन का वास्तविक अपराध क्या है? गरीबों के साथ और उनके पक्ष में खडा होना, मुखर और सक्रिय होना तथा छत्तीसगढ में हिंसा से जूझ रहे बेदखल किये गये लोगों के पक्ष में बोलना. वे जेल में बंद माओवादी नेता से जेल नियमों के तहत ही मिलने गये थे. जेल अधिकारियों ने उन्हें नारायण सान्याल से मिलने की अनुमति दी थी और यह अनुमति कई बार दी गयी थी. माओवादियों से मिलना माओवादी होना नहीं है. पीयूसीएल के पूर्व अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर ने कहा है कि आतंकवादियों से लडने में राज्य स्वयं आतंकवादी नहीं हो सकता. वे विनायक सेन के मुद्दे को देखने और इस पर विचार करने को केंद्र सरकार से कह चुके हैं. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को प्रेषित पत्र में यह भी कहा गया है कि मानवाधिकार की रक्षा में विनायक सेन के कार्यकलापों को दोषयुक्त ठहराना किसी वकील को अपने मुवक्किल की रक्षा में किये गये कार्यकलापों को दोषयुक्त ठहराने की तरह है.
विनायक सेन की गिरफ्तारी और अब तक उन्हें जमानत न मिलने से कुछ बडे प्रश्र्न उपस्थित हुए हैं. भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों को जो मौलिक अधिकार दिये गये हैं, क्या राज्य उन अधिकारों की सदैव रक्षा करता हैङ्क्ष नागरिक को असहमति व्यक्त करने, विरोध प्रकट करने, किसी आंदोलन में भाग लेने का अधिकार है या नहींङ्क्ष क्या राज्य अपने कार्य और दायित्व का सुचारू रूप से निर्वाह कर रहा है? जब चिकित्सा भी एक पेशा है, किसी चिकित्सक को गरीबों के साथ रह कर उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए? माओवादियों की संख्या बढ क्यों रही है? क्या विनायक सेन की गिरफ्तारी से समस्याएं सुलझ जायेंगी? विष्णु खरे ने सलवा जुडूम पर लिखी कविता 'कानून और व्यवस्था का उप मुख्य सलाहकार सचिव चिंतित प्रमुख मंत्री को परामर्श दे रहा है' का समापन इन पंक्तियों से किया है- 'मैं कहूंगा सर आप सेंट्रल लेबल पर एक पहल करें, ताकि हर जगह अपनी नींद से जागे और एक्टिव होकर हर किस्म की ऐसी बगावत को, नेस्तनाबूद करने को लामबंद हो, असली नेशनल सलवा जुडूम.' (पहल- 86)
छत्तीसगढ सरकार की आलोचना जारी है. नोबेल लॉरेट, नोम चोम्स्की, महाश्वेता देवी, अरुंधति राय- सभी विनायक सेन के पक्ष में क्यों हैं? क्या माओवादियों के आतंक का समाधान राज्य के आतंक से संभव है? इसी 29 मई को वाशिंगटन में विनायक सेन को विश्व स्वास्थ्य और मानवाधिकार के लिए जोनाथन मान अवार्ड से सम्मानित किया जायेगा और हिंदू के संपादकीय-'सेट विनायक फ्री' (15 मई, 2008) में विनायक सेन को सम्मान लेने के लिए रिहा करने को कहा गया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विनायक सेन के पक्ष में वक्तव्य दिये जा रहे हैं और आंदोलन भी चलाया जा रहा है.
रायपुर के पत्रकार और फिल्मकार अजय टीजी की 5 मई को हुई गिरफ्तारी भी सुर्खियों में है. उन पर यह आरोप है कि वे प्रतिबंधित संगठन के संपर्क में है. पिछले लोकसभा चुनाव (2004)में छत्तीसगढ के दांतेबाडा क्षेत्र के सुदूर पिछडे गांवों में अजय तथ्य प्राप्ति टीम के साथ थे. यह टीम माओवादियों द्वारा दिये गये चुनाव बहिष्कार के आह्वान के सिलसिले में ग्रामीणों की प्रतिक्रिया जानने के लिए गयी थी. अजय टीजी ने फोटो खींचना शुरू किया तो युवा माओवादियों ने उन्हें घेरा, पुलिस एजेंट समझ कर उन्हें कई घंटे रोका. बाद में वे छोडे गये, पर उनका कैमरा जब्त कर लिया गया. बाद में अजय ने माओवादी प्रवक्ता को 2004 में जब्त किया गया अपना कैमरा लौटाने को लिखा. पुलिस ने तहकीकात में अजय का कंप्यूटर रख लिया और उससे पत्र के संबंध में पूछा. अजय ने पत्र लिखना स्वीकारा. कंप्यूटर वापसी के लिए अजय स्थानीय अदालतों में गये. अजय के साथ विचित्र स्थिति उत्पन्न हुई. एक ओर वे माओवादियों के अपराध का शिकार हुए, माओवादियों ने उन्हें पुलिस एजेंट समझा और अब पुलिस उन्हें माओवादियों का समर्थक समझ रही है.
पीयूसीएल से विनायक सेन और अजय टीजी का संबंध है. पीयूसीएल के कार्यकर्ताओं पर भी राज्य सरकार की कडी निगाह है. छत्तीसगढ में पीयूसीएल, माकपा तथा निर्मला देशपांडे के साथ लंबे समय तक रहे गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार के वनवासी चेतना आश्रम तथा अन्य सलवा जुडूम की कुरूप वास्तविकता उजागर करने में लगे हुए हैं. 10 मई, 2008 को अजय टीजी के केस की सुनवाई थी, पर उन्हें पांच दिन पहले गिरफ्तार कर लिया गया.
पत्रकार, मीडियाकर्मी, बुद्धिजीवी, कवि-लेखक और संस्कृतिकर्मी किसी भी गतिशील समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं. वे संवाद और बहस करते हैं, जो लोकतंत्र में जरूरी है. तर्क के सिद्धांत और दमन के सिद्धांत में अंतर है. वे संवादों से, तर्कों और तथ्यों से राज्य को सुदृढ करते हैं. लोकतंत्र में प्रत्येक विचार के लिए जगह है. इसी से लोकतंत्र विकसित होता है. विरोधियों को शत्रु और दुश्मन मानने का चलन कुछ समय से बढा है. लोकतंत्र में सहमति से अधिक असहमति का स्थान है. विनायक सेन के मामले में अभी तक मानवाधिकार आयोग भी चुप है! मानवाधिकार सक्रियतावादी और पीयूसीएल के लोग जनतंत्र के रक्षक हैं. इन दोनों संगठनों से जुडाव के कारण ही किसी पर संदेह नहीं किया जा सकता. सबसे बडा प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार का भारत निर्मित कर रहे हैं. विनायक सेन और अजय टीजी की गिरफ्तारी से छत्तीसगढ की सरकार पर प्रश्न उठे हैं और विश्व भर में इस पर प्रतिक्रियाएं हो रही हैं. डॉ सेन को झूठे इलजाम में गिरफ्तार किये जाने से एक तरह से पूरी व्यवस्था संदेह के घेरे में आ गयी है.

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ विनायक सेन और अजय टीजी को रिहा किया जाये ”

  2. By दिनेशराय द्विवेदी on May 19, 2008 at 5:59 PM

    विनायक सेन और अजय टीजी के इन उदाहरणों और जयपुर में हुई घटना के तुरंत बाद बीजेपी के शीर्ष नेताओं और राजस्थान की मुख्यमंत्री के द्वारा पोटा का नया संस्करण लाने की वकालत करने से स्पष्ट हो गया है कि छत्तीसगढ़ में तो लोकतन्त्र का गला घोंटा ही जा चुका है। राजस्थान में उस की तैयारी है अगर बीजेपी वापस लौटी तो इस बार देश को गैस चैम्बर में तब्दील कर डालने की तैयारी करेगी।
    इस का जवाब मिमियाना नहीं जनतांन्त्रिक संघर्ष को तीव्र कर देना ही है। जननेताओं पर हमले के बाद अगला हमला जनता पर ही होना है।

  3. By ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ on May 21, 2008 at 11:08 AM

    विनायक सेन जैसे लोगों की गिर फतारी चिंता का सबब है। इसके खिलाफ लोगों को एकजुट होना चाहिए।

  4. By पूर्णिमा वर्मन on June 18, 2008 at 8:57 AM

    संदीप जी,
    मेरी कविता को आपने पढ़ा और उस पर संदेश रखा यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। आपने अपना ईमेल शायद छुपाया हुआ है सो मुझे समझ में नहीं आया कि आपको उत्तर कहाँ दूँ। पर इस बहाने मैंने आपके तीनों चिट्ठे देखे और पसंद किए। मुझे लगा कि आप विकिपीडिया में भी सहयोग दे सकते हैं। क्या आप समय निकाल सकेंगे? उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी। अनेक शुभकामनाएँ।

  5. By Kapil on April 19, 2009 at 6:30 PM

    डा. विनायक सेन की रिहाई के लिए जस्टिस कृष्‍णा अय्यर की 17 अप्रैल 2009 को प्रधानमंत्री के नाम एक अपील जारी हुई है। हिन्‍दू में इस अपील का मुख्‍य अंश छपा था। इसका मैंने हिन्‍दी में अनुवाद करके अपने ब्‍लॉग (http://andarkeebaat.blogspot.com) पर डाला है। आप देखें और चाहे तो नेट पर डाल सकते हैं।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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