हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

विनायक सेन को रिहा किया जाए

Written by Reyaz-ul-haque on 5/14/2008 10:10:00 PM

डाक्टर एक साल से जेल में है। एक बेहद सीधा-सादा आदमी, अक्सर खामोश रहने वाला और अपनी लम्बी दाढी के कारण ध्यान खींचने वाला। उसने देश के गरीबों को दी गयी अपनी सेवाओं के लिए देश के संविधान और क़ानून के तहत कीमत चुकाई है-एक साल की लम्बी हिरासत के रूप में। और यह अभी न जाने कितने दिन और चलेगी। पूरी दुनिया से उसकी रिहाई की मांग में आवाजें उठने लगी हैं। नोबेल विजेता पत्र लिख रहे हैं, विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उस डाक्टर को अन्तर राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सम्मान दिए जा रहे हैं-यहाँ तक कि गांधीवादी सम्मान भी-जो एक नक्सली होने के आरोप में जेल में बंद है। क्या हम न्याय, संविधान, जनमत, मानवाधिकार आदि शब्दों को अपनी चमक और अर्थ खोते नहीं देख रहे हैं?
स्पेस , हमारे बोलने और जीने का हमसे छीना जा रहा हैं। यह हम पर निर्भर करता है, उन्हें हम बनाए रखने में कितना कामयाब रह पाते हैं. आईये, हम इन शब्दों को, अपने स्पेस को, अपने बोलने के अधिकार को, निरर्थक हो जाने से बचाएँ। अपना विरोध दर्ज कराएँ।

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बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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