हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया गया : पढिये रविवार पर

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/11/2008 05:33:00 PM

संजय का

हालत यह हो गयी है कि आप कश्मीर पर बात करें तो पहला सवाल आता है कि कश्मीरी पंडितों पर क्या कहेंगे? फिल्म बनी तब से यही सवाल उठता रहा है कि आपने कश्मीरी पंडितों को क्यों नहीं और समय दिया. मेरा कहना है कि कश्मीर के मुद्दे को हिंदुस्तान में समझने के लिए कश्मीरी पंडितों को इस तरह इस्तेमाल किया गया है जैसे वे ही कवच हों और सबसे बडा सवाल हों.
आपने कश्मीर का नाम लिया ही कि आ गया सवाल कि- बोलिए पंडितों के साथ क्या हुआ?

मेरा कहना है कि पहले आप सबसे बड़े और पहले सवाल को देखें कि कश्मीर में क्या हुआ। इसके बाद ही तो कश्मीरी पंडित निकले न। कश्मीरी पंडितों का मामला कश्मीर समस्या के साथ जुड़ा हुआ है. आप पहले उसका हल करें. फिर इसके बाद ही बात होनी चाहिए. कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया गया. जो निकले-भागे बरबाद हुए, वे तो हुए ही, मगर जो जम्मू में कैंपों में रह रहे हैं, उनकी समस्या को कोई भी सरकार चुटकी में सुलझा सकती थी. लेकिन उन्हें बनाये रखना था सरकार को ताकि वे उनका इस्तेमाल कर सकें. जो पढे-लिखे पंडित थे, वे तो दिल्ली आ गये, पर जो छोटे और अनपढ किसान थे, वे बेचारे जम्मू और दूसरे कैंपों में रह रहे हैं. कश्मीरी पंडितों को अहम रोल दिया गया है, ताकि उनका इस्तेमाल हो सके और कश्मीर समस्या पर बात को अटकाया जा सके.

रविवार के अगले और नए अंक में हिम मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उडीसा से ख़ास रिपोर्टें। साथ में है अनुपम मिश्र की किताब साफ माथे का समाज का एक अंश, फिल्मों के रीमेक पर कृष्ण राघव का आलेख, जानेमाने डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता संजय काक से एक लम्बी बातचीत और इतिहासकार डी एन झा की एक टिप्पणी.

इसके अलावा है रविवार के इस नए अंक में और भी बहुत कुछ। तओ बस नीचे की इमेज पर क्लिक करें.



Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया गया : पढिये रविवार पर ”

  2. By प्रभाकर पाण्डेय on May 11, 2008 at 7:20 PM

    सच्ची बात कही है आपने। बढ़िया और यथार्थ समाचार।

  3. By deepak gaur on June 5, 2008 at 1:03 AM

    मान्यवर संदीप जी आपकी हौसलाअफजाई का धन्यवाद...
    आपके मागदश$न का आतुर

    लेकिन कृप्या बताएं कि क्या आने वाले समय में देश कुछ बड़ी कंपनियों के इद$ गिद$ धूमता नजर नहीं आएगा ? मैं आपसे पूछता हुआ कि क्या कुछ कंपनियां आज देश को हिलाने में स&म हैं कि नहीं । शेयर बाजारों में बनावटी मांग व आपूति$ क्या है । मान्यवर शायद ऐसा लग रहा है कि आने वाले समय में मुकेश अंबानी प्रधानमं^ी होंगे और शायद कोई और आपने प्रदेश का मुख्य मं^ी । जब बाहुबली संसद में बैठकर पैसों का खेल कर रहे हैं तो क्या मैं -शायद आप- या हम आम आदमियों में इतना दम है कि वो विरोध करें ।

    any way thax for ur comment...n hope same from ur side.

    deepak gaur
    bhaiwah.blogspot.com

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें