हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

प्रशांत राही को रिहा किया जाए

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/06/2008 10:03:00 PM

Aflatoon said...

प्रशान्त मेरे छात्र जीवन के परिचित हैं और 'पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता'कम एक निष्ठावान समर्पित राजनैतिक कार्यकर्ता ज्यादा हैं । खण्डूरी से अपील है कि हिटलरी चाल से बाज आएं और प्रशान्त को अविलम्ब रिहा करें । इस पोस्ट पर उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ई-पते और फैक्स दिए जाएं ।

manjula said...

सच में इस देश में तो इंसान की तरह जीना भी दुश्‍वार होता जा रहा है. पहले अनसुइया सेन और अब शिखा राही. पता नहीं कहां जाकर रूकेगा ये

काकेश said...

यदि यह आरोप सही हैं तो पुलिस के इस कुकृत्य की घोर भर्त्सना करनी चाहिये. इस तरह तो सचमुच देश में रहना मुश्किल होता जा रहा है.

vijay gaur said...

स्टेट्स्मैन से पहले प्रशांत देहरादून से निकलने वाले दैनिक "हिमाचल टाइम्स" में नौकरी करता था. देहरादून से निकलने वाली मासिक पत्रिका "युगवाणी" के एक अंक में पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा ने अपने इस मित्र पर अच्छे से लिखा है.

manish said...

एक तरफ़ तओ सरबजीत कि रिहाई के लिए एक तरह से मीडिया और अन्धाराष्ट्रवादियों ने अभियान छेड़ रखा है, पर अपने ही देश में जनता कि आवाज़ उठानेवाले प्रशांत राही, विनायक सेन, जीतन मरांडी जैसे लोग काले कानूनों के नाम पर जेलों में बंद हैं। और इनके लिए कहीं भी कुछ खास लोगों को छोड़ जनता सड़क पर नहीं उतरी है। पूंजीपतियों द्वारा मीडिया भी उनकी रिहाई के लिए कोई मीडिया ट्रायल नहीं चला रहा है। अगर हम सब इसी तरह चुप रहे तओ अगली बारी हमारी है।


ये टिप्पणियाँ प्रशांत राही की रिहाई के लिए उनकी बेटी शिखा राही द्वारा की गयी अपील पर आयी हैं। इनमें जो चिंता जतायी गयी है, वह एक, दो तीन या पाँच लोगों की ही चिंता नहीं है। यह हमारी समकालीन चिंताओं में से है। जब हमें बोलने, लिखने, पढ़ने, नाटक कराने नहीं दिया जायेगा-तओ फिर इस आज़ादी और लोकतंत्र का क्या मतलब है?
लोकतंत्र का ढोल पीटने वाली सरकारें इस तरह से पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को हमेशा से तंग करती आई हैं. बात केवल प्रशांत तक ही सीमित नहीं है, इस तरह के स्टेट टेररिज्म कि चपेट में कोई भी सकता है, इसलिए हरेक जागरूक नागरिक को इस घटना का पुरजोर विरोध करना चाहिए
इसके अलावा बात उन सबकी भी है, जो भारत की जेलों में बंद हैं-इस या उस विचारधारा के मानने वाले के नाम पर। हम, इस पोस्ट के ज़रिये उन सबकी रिहाई की अपील भी करते है। वे चाहें जिस भी सिद्धांत के मानने वाले हों, उन्हें लिखने, पढ़ने, बोलने और हर वह काम कराने की आज़ादी मिलनी चाहिए, जो संविधान ने उन्हें दे रखी है।

रेयाज़-उल-हक़
संदीप


अफलातून जी के सुझाव पर इस पोस्ट में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का फैक्स नं और मेल आईडी तथामानवाधिकार आयोग का सम्पर्क भी दिया जा रहा है

भुवनचंद्र खंडूरी (मुख्यमंत्री, उत्तराखंड)
मेल : cm-ua@nic.in
bckhanduri@nic.in

फैक्स : 0135- 2665722
0135- 2755102
0135- 2712527

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
श्री अखिल कुमार जैन
मुख्य कार्यकारी अधिकारी
91-11-23384856 (O)

श्कायतें दर्ज कराने के लिए फैक्स
1. 91-11-23384863 (एडमिनिस्ट्रेशन)
2. 91-11-23386521 (ला डिविजन)
3. 91-11-23073876 (इन्वेस्टिगेशन)
-मेल
covdnhrc@nic.in

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ प्रशांत राही को रिहा किया जाए ”

  2. By दिनेशराय द्विवेदी on May 6, 2008 at 10:54 PM

    हमारी व्यवस्था का संकट इतना गहराने लगा है कि अब उस के पास सचाई और सक्रियता के साथ संघर्षशील जनतान्त्रिक लोगों पर तानाशाही का उपयोग करने के सिवाय कोई चारा नहीं रहा है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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