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बीच सफ़हे की लड़ाई

यह किसकी भूख है मि बुश

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/03/2008 10:18:00 PM

मेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने हमें यह बताया है कि भारत का 35 करोड का मध्यवर्ग इतना समृद्ध हो गया है कि उसने अपने खाने की आदतों के कारण दुनिया में खाद्यान्न संकट पैदा कर दिया है.

जब वे यह कह रहे हैं, उन्हें बताने की जरूरत है कि इस संकट के लिए सिर्फ एक देश की नीतियां जिम्मेदार हैं. यह वही देश है, जिसके वे राष्ट्रपति हैं.
पूरी दुनिया एक भयावह खाद्यान्न संकट से गुजर रही है. दुनिया का रिजर्व खाद्यान्न भंडार पिछले 22 सालों के सबसे निचले स्तर पर आ गया है. यह अभी जितना है, उससे दुनिया की सिर्फ 26 दिनों की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं. 1961 में यह रिजर्व भंडार इतना हुआ करता था कि ९५ दिनों की आपूर्ति के लिए पर्याप्त था. इसी दौरान उत्तरी कोरिया में गेहूं और चावल के उत्पादन में 1.6 मिलियन टन की गिरावट के अनुमानों के बीच एक बडे अकाल की आशंका जतायी जा रही है. मिस्र 12.1 प'तिशत मुद'ास्फीति के बीच 'ब'ेड क'ाइसिस' से गुजर रहा है और वहां डेयरी उत्पादों के मूल्य में 20 प'तिशत की वृद्धि हुई है. ब'ाजील ने, जो दुनिया में चावल के सबसे बडे उत्पादकों में से है, अफ'ीकी देशों की पांच लाख टन चावल की मांग को अस्वीकार कर दिया है. वह खुद खाद्यान्न संकट से जूझ रहा है. आइवरी कोस्ट में गेहूं की कीमतों में दोगुना बढोत्तरी के बाद भडके दंगों ने कई जानें ली हैं. हैती में भी दंगे शुरू हो चुके हैं. सूडान और युगांडा में 15 लाख लोगों को सहायता एजेंसियों ने अपनी सहायता सूची से बाहर कर दिया है.

पूरी दुनिया में खाद्यान्न उत्पादन घटा है, खाद्यान्न उपजानेवाली भूमि में कमी आयी है। अकेले चीन में चावल की खेतीवाली भूमि 1983 के 33 मिलियन हेक्टेयर के मुकाबले 2006 में 29 मिलियन हेक्टेयर रह गयी है.
और
यह संकट अचानक नहीं आया है। पिछले साल अक्टूबर में ही चेतावनी दी गयी थी कि दुनिया में कुल अन्न उत्पादन में 10 तक की कमी आ सकती है।
इसके बावजूद कोई उपाय नहीं किया गया।
हम इन सभी परिघटनाओं में अमेरिकी हितों की गूंज सुन सकते हैं. दुनिया के देशों की जनता को नियंत्रित करने के लिए हेनरी किसिंजर के सुझाव पर चलते हुए अमेरिका विश्व खाद्यान्न बाजार पर नियंत्रण की कोशिशें काफी समय से करता रहा है. नेशनल सेक्यूरिटी मेमोरेंडम-200 नामक प'ोजेक्ट के तहत बने वर्ल्ड पोपुलेशन प्लान फॉर एक्शन में उन सब तरीकों का ज़िक्र है, जिनके जरिये खाद्यान्न बाजार को नियंत्रित करना है. इसमें आम नरसंहारों के साथ-साथ एग'ो बिजनेस कंपनियों के संचालन में भूमंडलीकृत खाद्यान्न बाजार निर्मित करना शामिल है. पिछले तीन दशकों से ये एग'ो बिजनेस कंपनियां कृषि कार्य से जुडी लगभग हर गतिविधि को संचालित-नियंत्रित करती रही हैं. वे शोध पर खर्च करती हैं, बीजों का प'संस्करण करती हैं, उन्हें किसानों को बेचती हैं, किसानों से ठेके पर खेती करवाती हैं, उन्हें दवा मुहैया करती हैं और उपज को भी खुद ही खरीद लेती हैं. इसके अलावा खाद्यान्न की उपज और आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए जैव ईंधन तथा हॉर्टीकल्चर की खेती शुरू करायी गयी, जिसमें किसानों को तात्कालिक तौर पर मुनाफा तो दिखता है, लेकिन दीर्घकालिक तौर पर यह खाद्य सुरक्षा के लिए घातक है और जिसका नतीजा अब देखने को मिल रहा है. खाद्यान्न उपजानेवाली जमीन को जैव ईंधन के लिए उपयोग में लाया जाने लगा. इन सब वजहों से एक तरफ अमेरिकी कंपनियों और निगमों का मुनाफा बढा और उनका खाद्यान्न बाजार पर नियंत्रण कायम हुआ वहीं दूसरी ओर पूरी दुनिया में कृषि उत्पादन में कमी आयी. तीसरी दुनिया के देशों में डब्ल्यूटीओ और अमेरिकी दबावों के कारण कृषि में सार्वजनिक निवेश और रियायतें घटी हैं और कृषि घाटे का सौदा बन गयी है. इसके अलावा सस्ते विदेशी अनाज के लिए सीमाएं खोलने के कारण भी किसानों को घाटा उठाना पडा है. इन सबके चलते कृषि उपज घटी है और वह बढती जनसं'या की जरूरतों को पूरा कर पाने में असमर्थ है.

इसके अलावा अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संकट, सब प'ाइम क'ाइसिस और डॉलर की घटती कीमतों के कारण वहां की सट्टेबाज पूंजी अब खाद्यान्न बाजार से मुनाफा तलाश रही है.

जहां तक भारत की आबादी द्वारा अधिक भोजन हडप लेने की बात है, उससे झूठ और कुछ नहीं हो सकता। आज एक औसत भारतीय ग'ामीण परिवार दस साल पहले तक एक साल में जितना अन्न खाता था, उससे 100 किग'ा कम खाता है. नवउदारवादी नीतियां लागू होने के बाद प'तिव्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता भी घटी है. यह जरूर है कि खाद्यान्न की मांग, बढती आबादी के कारण बढी है, लेकिन यह संकट खाद्यान्न की सिर्फ बढती मांग के कारण नहीं पैदा हुआ है, बल्कि यह घटते उत्पादन और कृषि उपज पर बहुराष्ट्रीय निगमों के नियंत्रण से पैदा हुआ है. यह जमीन को खाद्यान्न उत्पादन के काम से हटा कर जैव ईंधन और फूलों की खेती में लगा देने के कारण पैदा हुआ है और यह भारत के लोगों की वास्तविक भूख नहीं है जो खाद्यान्न संकट पैदा कर रही है, बल्कि यह अमेरिकी निगमों की मुनाफे की भूख है जो लोगों को मुंह से निवाला छीन रही है।

-साथ में सुष्मिता भी

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ यह किसकी भूख है मि बुश ”

  2. By राजीव रंजन प्रसाद on May 5, 2008 at 4:55 PM

    एक कहानी पढी थी, जिसमें रानी नें एक गरीब को देख कर कहा था "कि घर में खाने को चावल नहीं हैं तो ये गरीब लोग डबलरोटी क्यों नहीं खाते..."

    जार्ज बुश साहब का भी यही हाल है...सावन के अंधे हैं ताजा ताजा अमेरिका में सूखा पडा है :)

    ***राजीव रंजन प्रसाद

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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