हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आइये, प्रचंड से जानिए माओवाद के बारे में

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/22/2008 08:32:00 PM

नेपाल में अपनी धमाकेदार विजय के बाद नेपाल का माओवाद अभी बहुत चर्चा में हैं इसी के साथ भारत में यह तो लगभग हमेशा ही चर्चा में रहता हैं आइये ख़ुद प्रचंड से ही जानते हैं कि क्या हैं यह माओवाद. प्रचंड का यह आलेख जून, 1990 में प्रकाशित हुआ था
मार्क्सवाद - लेनिनवाद - माओवाद अथवा संशोधनवाद
प्रचंड
सामाजिक विकास के वैज्ञानिक अनुसंधन द्वारा मार्क्सवाद ने अखण्डनीय तथ्यों से साबित कर दिया है कि इतिहास के क्रान्तिकारी और अन्तिम वर्ग सर्वहारा के सख्त और कटु संघर्ष की प्रक्रिया द्वारा समाजवाद को स्थापित और सुदृढ़ बना कर आध्ुनिक पूंजीवाद के खात्मे पर कम्युनिज्म का विकास होगा वैज्ञानिक समाजवाद की यह सोच मजदूर वर्ग के संघर्ष के अपराजेय शक्तिशाली हथियार से लैस है इस सोच और इसके कार्यान्वयन ने पूंजीवादी वर्ग के स्वर्ग को हिला के रख दिया मार्क्सवाद की इस खोज ने तथा मजदूर वर्ग के संघर्ष ने पूंजीवादी वर्ग और उसके पिट्ट्ठुओं और विभिन्न रूपों और गैर-सर्वहारा वर्ग की प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ जीवन-मरण की लड़ाई की है पूंजीवादी वर्ग और इसके पिट्ठुओं ने मार्क्सवाद को भीतर और बाहिर से उखाड़ने के लिये सर्वहारा वर्ग के आंदोलन के खिलाफ बहुत से षडयन्त्र, साजिशें, तोड़-फोड़, उत्पीड़न और घुसपैठ करके अपनी लूट के स्वर्ग को बचाने की भरसक कोशिश की है उन्होंने क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग को निराश और हतोत्साहित करने के लिये हजारों बार घोषणा की है और करते रहे हैं कि मार्क्सवाद 'पुराना' पड़ गया है और निरर्थक साबित हो गया है हर बार उनके ऐसा करने के बाद, विश्व इतिहास का यह तथ्य है कि मार्क्सवाद और सर्वहारा वर्ग का आंदोलन अत्याध्कि शक्तिशाली बना और उनके सिर पर जोरदार वार किया मार्क्सवाद - लेनिनवाद - माओवाद के विकास की यह ठोस गवाही है
जब
मार्क्सवाद - लेनिनवाद - माओवाद ने उसूलों से दुनिया में विजय पाई तो पूंजीवाद और साम्राज्यवाद मार्क्सवाद का समर्थन करने के लिये मजबूर हो गया, हालांकि निष्ठा से नहीं, और सर्वहारा वर्ग और उत्पीड़ित लोगों से विश्वासघात किया इस संदर्भ में लेनिन का कथन है कि द्वन्द्ववाद का इतिहास कुछ ऐसा रहा है कि मार्क्सवाद की वैचारिक जीत ने दुश्मनों को विवश कर दिया कि मार्क्सवाद की नकाब ओड़ लें जो कि काफी चिन्तनीय है लेनिन ने पर्याप्त प्रमाणों से इसे साबित किया कि साम्राज्यवाद के विकास के साथ-साथ संशोध्नवाद भी राष्ट्रीय सीमा को तोड़ कर अन्तर्राष्ट्रीय में बदल गया है आज साम्राज्यवाद ने करोड़ों मजदूरों की कुर्बानियों से निर्मित समाजवादी व्यवस्था के नेतृत्व पर कब्जा कर लिया है और एक बार पिफर घोषणा कर दी है कि मार्क्सवाद नाकाम हो गया है और खुशियां मना रहे हैं मगर यह खुशियां उस मरणासन्न आदमी की भान्ति मन को शान्त करने के लिये हैं जो मौत के बिस्तर पर पड़ा है और यह इतिहास के तथ्यों से साबित किया जा रहा है तथा विश्व व्यापी संघर्षों का बवण्डर मचा है जो दुनिया को हिला सकता है और विश्व व्यापी आर्थिक संकट बढ़ रहा है इन्हीं तथ्यों पर यह आधारित है कि साम्राज्यवाद की घोषणा कि मार्क्सवाद पुराना पड़ गया है, इसने इसे गलत साबित कर दिया है इतिहास ने एक बार पिफर सर्वहारा यो(ाओं के कंधों पर जिम्मेवारी डाल दी है कि आध्ुनिक संशोध्नवाद के भ्रमजाल को तोड़ दें और विश्व व्यापी विजय अभियान के प्रति आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहे हैं इसके लिये क्रान्तिकारी मार्क्सवादियों के लिये अत्याध्कि महत्त्व का काम हो गया है, और मनोगत तैयारी के तौर पर संशोध्नवाद और साम्राज्यवाद का पर्दापफाश करें और उत्पीड़ित लोगों को इसका असली चेहरा दिखायें और उन्हें सच्चाई से अवगत करायें
संशोध्नवाद
क्या है ? मार्क्सवाद में सुधर करना जो सर्वहारा के वर्ग संघर्ष के लक्ष्य के साथ एकताब( है और गैर-सर्वहारा हितों के अनुरूप इसको ढालना ही संशोध्नवाद है संशोधनवाद की जरूरत आध्ुनिक समाज में इसके वर्ग आधर से फूटती है किसी जगह गैर-सर्वहारा, विशेषकर टटपूंजिया वर्ग की संख्या का अध्कि होना, संशोध्नवाद का बड़ा सम्पन्न आधर होता है वास्तव में संशोधनवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद है जो मजदूर आंदोलन में घुस गया है इसलिये, संशोध्नवाद के खिलापफ संघर्ष को कमजोर करने का कोई भी प्रयास किसी भी बहाने का हो, वह खुद ही संशोध्नवाद है इस छोटे से लेख में संशोध्नवाद का व्यापक विश्लेषण और उसके खिलापफ क्रान्तिकारी मार्क्सवादियों के संघर्ष को पेश करना सम्भव नहीं यहां एक प्रयास किया जा रहा है कि क्रान्तिकारी मार्क्सवाद के कुछ विशेष मुद्दों को पहचाना जाए और संशोध्न के तरीकों को संक्षेप में व्यक्त किया जाए
1. वर्ग संघर्ष
मार्क्सवाद
की एक भरी ईजाद वर्ग-संघर्ष की भूमिका को इतिहास की चालक शक्ति स्वीकार करना है मार्क्स, एंगेल्स से लेनिन, स्टालिन, माओ तक सभी क्रान्तिकारियों ने अपनी गतिविध्यिों और दृष्टिकोण के अनुक्रम में वर्ग-संघर्ष के उद्देश्य को लिया है मार्क्स-एंगेल्स कहते हैं कि वे ४० वर्ष पूंजीवादी वर्ग और सर्वहारा वर्ग के बीच इतिहास की चालक शक्ति के तौर पर वर्ग-संघर्ष पर जोर देते रहे हैं, अतः विशेषकर आधुनिक सामाजिक क्रान्ति के महान संगठनकर्त्ता के तौर पर, लोगों की सहायता करना सम्भव नहीं जो वर्ग-संघर्ष को आंदोलन से बाहिर ले जाना चाहते हैं लेनिन का कथन है कि नियम और कानून को खोज पाने के लिये वर्ग-संघर्ष एक कुंजी है यह कुंजी वर्ग-संघर्ष का सि(ान्त है इसी तरह माओ ने वर्ग-संघर्ष को कुंजी के तौर पर लेने पर जोर दिया
संशोध्नवाद
का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि यह विभिन्न बहानों से वर्ग-संघर्ष को छोड़ देता है, कमजोर करता अथवा कुंद कर देता है जैसा कि लेनिन का कथन है कि राजनीति के क्षेत्रा में संशोध्नवाद, मार्क्सवाद के आधरों अथवा वर्ग-संघर्ष में सुधर करने की कोशिश करता है विगत में दूसरे इण्टरनेशनल के भगोड़े कौत्स्की ने तकनीक और हथियारों में वृ(ि होने के खतरे को दिखाते हुए वर्ग-संघर्ष को रद्द कर दिया था इसी प्रकार ख्रोतश्चोव और गोर्बाचोव ने बदले हुए विश्व हालात के बहाने से सर्वहारा की तानाशाही की जगह पफासीवादी तानाशाही को लागू करना शुरू कर दिया था और शान्तिपूर्ण संक्रमण, शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व और शान्तिपूर्ण स्पर्( की घोषणा की थी चीन में तेंग गुट ने घोषणा की कि वर्ग-संघर्ष खत्म हो गया है, और पूंजीवादी आर्थिक उसूलों को लागू करके फासीवादी तानाशाही चलाता रहा इस प्रकार यह सार्वभौमिक तौर पर स्पष्ट है कि संशोध्नवादी वर्ग-संघर्ष को छोड़ देते हैं अथवा कमजोर कर देते हैं और वर्ग-तालमेल के झण्डे तले बुर्जुआ तानाशाही लागू कर देते हैं हमारे देश में भी बहुत से संशोध्नवादी गुट जिनमें झापा टोली भी शामिल है, जिसे यू. एम. एल. कहा जाता है, वही ख्रोश्चोव, गोर्बाचोव और तेंग गुटों का समर्थन करते रहे हैं और वर्ग-संघर्ष को कमजोर करता रहा है और पंचायत प्रणाली में शामिल होकर शान्तिपूर्ण और कानूनी आंदोलन पर लगातार जोर डालता रहा और जुझारु संघर्ष को भविष्य के लिये टाल कर लोगों को गुमराह करता रहा, एकता और गठजोड़ पर जोर देकर पूंजीवाद तथा अन्य प्रतिक्रियावादियों और भ्रष्ट तत्त्वों के साथ चलता रहा
2
. पार्टी
कम्युनिस्ट
पार्टी क्या है और यह कैसी होनी चाहिये ? मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन और माओ जैसे क्रान्तिकारी मार्क्सवादी सर्वहारा की एक जुझारु, अनुशासित और वर्ग-चेतन अग्रणी के रूप में देखते थे और इसके अनुसार व्यवहार किया क्रान्तिकारी मार्क्सवाद ने सदा ही इस तथ्य पर जोर दिया है कि इस प्रकार की पार्टी को हर प्रकार की गैर-सर्वहारा प्रवृत्तियों और चरित्राों के खिलापफ सै(ान्तिक, राजनीतिक और व्यवहारिक संघर्ष चलाना चाहिये इस संदर्भ में मार्क्स-एंगेल्स कहते हैं कि : अगर विभिन्न वर्गों के लोग पार्टी में शामिल होना चाहें तो पहली शर्त उनके लिये यह है कि अपने साथ पूंजीवादी और निम्न पूंजीवादी (टटपूंजिया) पूर्वाग्रहों को लेकर आएं बल्कि, दिल से और निष्ठा से सर्वहारा के दृष्टिकोण से आत्मसात हों वे कहते रहे हैं कि : अगर पार्टी का नेतृत्त्व इन लोगों के हाथों में किसी प्रकार से जाता है तो पार्टी प्रत्यक्ष तौर पर नपुंसक बन जाती है और इसकी सर्वहारा भावना खत्म हो जाती है लेनिन ने सर्वहारा की पार्टी के लिये एक व्यापक, गम्भीर और ठोस सि(ान्त स्थापित किया है लेनिन ने अपनी पार्टी के अन्दर अवसरवादियों के खिलापफ निष्ठुर, अटल और जिंदगी मौत का संघर्ष चलाया जो सर्वहारा की जुझारु और अनुशासित तौर पर पार्टी की स्थापना में रूकावट खड़ी करते थे माओ ने हमेशा ही कहा है कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण के लिये मार्क्सवादी-लेनिनवादी उसूलों और नीति द्वारा मार्गदर्शित क्रान्तिकारी कार्यशैली आधर हो
संशोध्नवादी
यहां तक कि विभिन्न प्रकार के गैर सर्वहारा तत्त्वों के गठजोड़ द्वारा ढीली-ढाली और विशाल पार्टी निर्माण पर जोर देते रहे हैं जो कि सर्वहारा वर्ग के अगुआ के तौर पर पार्टी की भूमिका का अन्त कर देते हैं इस संदर्भ में ख्रोश्चोव और गोर्बाचोव का ÷सभी लोगों की पार्टी' का सि(ान्त विचारणीय है संशोधनवादी पार्टी को सि(ान्त विहीन और स्वार्थी तत्त्वों की भीड़ में विकसित करने का प्रयास करते हैं ऐसा करके एक तरपफ ये सर्वहारा के उद्देश्य के खिलापफ गद्दारी करते हैं और दूसरी तरपफ मक्कार नेता लोगों को गुमराह करके अपने व्यक्तिगत निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये उन्हें अपनी सीढ़ी बनाते हैं चूंकि इन संशोधनवादी तत्त्वों को बड़ी संख्या में भीड़ अथवा संसद के लिये मतदाताओं की जरूरत रहती है इसलिये, ये लापरवाही से उसूलों के साथ सौदेबाजी करके तथाकथित पार्टी को टूटने नहीं देते, जबकि क्रान्तिकारी मार्क्सवादी अगर उसूलों की रक्षा के लिये जरूरत पड़े तो सदा और बहुत बार विभाजन के लिये तैयार रहते हैं बहरहाल, इसका यह भाव नहीं कि विभाजन अथवा पफूट सही है, लेकिन ऐसे तत्त्वों, जो सर्वहारा के उद्देश्यों से गद्दारी करते हैं और उनके खिलापफ विद्रोह करते हैं, इन तत्त्वों के खिलापफ अटल संघर्ष करना अगर जरूरी हो तो सही है इस सम्बन्ध् में लेनिन के विचार पर गम्भीरता से ध्यान देना चाहिये दुनिया में कोई सामाजिक जनवादी पार्टी, विशेषकर पूंजीवादी क्रान्ति के दौरान पूंजीवादी नीति समर्थकों के खिलापफ किसी निष्ठुर संघर्ष के बिना कभी चल नहीं पाई है
इस
तथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है कि क्रान्तिकारी मार्क्सवादी पार्टी सर्वहारा की अग्रणी के तौर पर पार्टी को विकसित करने के लिये हर प्रकार की गैर सर्वहारा प्रवृत्तियों के खिलापफ कठोर संघर्ष चलाने पर महत्त्व देती हैं, जबकि संशोध्नवादी विभिन्न प्रकार की गैर सर्वहारा प्रवृत्तियों का एक साझा मंच बनाने के तौर पर इसे विकसित करने पर जोर देते हैं क्रान्तिकारी मार्क्सवादी दो नीतियों के संघर्ष को पार्टी में इसकी गतिशीलता और इसकी रीढ़ का ड्डोत समझते हैं जबकि संशोध्नवादी असै(ान्तिक समझौते के माध्यम से इसे अस्थाई तौर पर तय कर लेते हैं और एक गतिहीन और निर्जीव भीड़ की पार्टी के तौर पर विकसित करते हैं पार्टी के विकास में क्रान्तिकारी मार्क्सवादी द्वन्द्वात्मक दृष्टिकोण पर निर्भर करते हैं, जबकि संशोध्नवादी अध्यात्मवादी दृष्टिकोण अपनाते हैं इस तरह क्रान्तिकारी मार्क्सवादी सर्वहारा के उद्देश्य की सेवा करते हैं जबकि संशोधनवादी पूंजीवादी और साम्राज्यवादी तत्त्वों की सेवा करते हैं
3. संघर्ष के रूप

बुनियादी तौर पर संघर्ष के तरीकों पर भी क्रान्तिकारी मार्क्सवादियों और संशोध्नवादियों के बीच दृष्टिकोण में अन्तर है मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद इस तथ्य पर बल देता हैं कि लोगों के बीच क्रान्ति के सार्वभौमिक नियम के तौर पर हिंसापूर्ण क्रान्ति के लिये निरन्तर प्रचार-प्रसार की जरूरत है और किसी भी कीमत पर इसका परित्याग नहीं होना चाहिये सही क्रान्तिकारी लोगों को क्रान्ति के लिये तैयार करने के लिये व्याप्त नियमों और प्रणाली के उल्लंघन के खिलापफ संघर्ष करने पर बल देते हैं लेनिन का कथन है कि, फ्लोगों के बीच में इसी हिंसापूर्ण क्रान्ति की सोच का संगठित प्रचार-प्रसार, मार्क्स-एंगेल्स की सभी शिक्षाओं का सार-तत्त्व है ।य् लेनिन ने उन तत्त्वों के खिलापफ निरन्तर संघर्ष चलाने पर जोर दिया है कि जो लोगों के बीच मार्क्स-एंगेल्स की सभी शिक्षाओं के सार तत्त्वऋ हिंसापूर्ण क्रान्ति के प्रचार-प्रसार को रोकते हैं स्तालिन ने कहा है, फ्अगर कोई सोचता है कि इस प्रकार की क्रान्ति बुर्जुआ जनतन्त्रा के भीतर बुर्जुआ कानून के अनुरूप शान्तिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो सकती है तो वह मानसिक तौर पर दिवालिया हो चुका है और आम मानव बु(ि खो चुका है अथवा उसने सर्वहारा क्रान्ति का परित्याग पूरे तौर पर और स्पष्ट रूप में कर दिया है ।य् माओ ने इस सम्बन्ध् में कहा है, फ्साम्राज्यवादी युग में वर्ग-संघर्ष के अनुभवों से हमने शिक्षा ली है कि यह सिपर्फ मजदूर वर्ग और दबे कुचले लोगों की बंदूक की ताकत ही है जो सशस्त्रा पूंजीपतियों और सामन्तों को हटा सकती है ।य् इसलिये हम कह सकते हैं कि समस्त विश्व, सिपर्फ बंदूकों से ही बदला जा सकता है इस तरह यह बिल्कुल स्पष्ट है कि क्रान्तिकारी मार्क्सवादी शुरू से ही लोगों को विद्रोह के लिये तैयार करने के लक्ष्य से क्रान्तिकारी रूप के संघर्ष को प्राथमिकता देते हैं
लेकिन
जहां तक संशोध्नवादियों का सम्बन्ध् है तो वे शान्तिपूर्ण और कानूनी रूप के संघर्ष पर जोर देते हैं आध्ुनिक संशोध्नवादी जो मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के सार्वभौमिक सच्चाई से परिचित हैं वे बाहिरी तौर पर हिंसापूर्ण क्रान्ति के जरूरत को भविष्य के लिये अथवा रणनीतिक तौर पर स्वीकार कर चुके हैं, मगर कार्यनीति के तौर पर इसे अस्वीकार करते हैं तत्कालिक तौर पर संशोध्नवादी शान्तिपूर्ण और कानूनी आंदोलन को किसी भी हालत में छोड़ने को तैयार नहीं हैं, मगर ऐसा दिखावा करते हैं कि मानो वे भविष्य के लिये हिंसापूर्ण क्रान्ति की जरूरत को स्वीकार करते हैं नेपाल में संशोध्नवादी जिनमें यू. एम. एल. भी शामिल हैं, यही तरीका चला रहे हैं
एक
बिंदू को बड़ी गम्भीरता से लेना है कि इस युग में, जो कि सर्वहारा क्रान्ति का युग है, मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद हमें सिखाता है कि सर्वहारा क्रान्तिकारियों को चाहिये कि वे लोगों को जुझारु भावाना से निरन्तर शिक्षित और प्रशिक्षित करें ताकि बुर्जुआ, साम्राज्यवादियों के आक्रमण के समय निहत्थे रह जाएँ इसके लिये, अपनी ताकत और स्थिति के अनुसार क्रान्तिकारी रूप के संघर्ष पर जोर देना अनिवार्य है, जो कि वर्तमान शासन-व्यवस्था पर सीध प्रहार है, व्याप्त कानूनों और प्रणाली के उल्लंघन द्वारा आगे बढ़ने में सहायता देता है तथा भविष्य में एक अनुकूल स्थिति में देहाती क्षेत्रा में आधर बना सकता है ठीक इसके विपरीत हमारे देश के संशोध्नवादी कानूनी और शान्तिपूर्ण संघर्ष में लोगों को पफंसा कर प्रतिक्रियावादियों की सेवा करते हैं और उन्हें जरूरत के समय निहत्था रहने देते हैं

(टाइपिंग की कई गलतियाँ रह गयी हैं। सुधार कर जल्दी ही दोबारा पोस्ट किया जायेगा, तब तक इसे ही पढा जाए।

कल पढिये नेपाल पर वरवर राव की टिप्पणी

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ आइये, प्रचंड से जानिए माओवाद के बारे में ”

  2. By संजय तिवारी on April 23, 2008 at 12:13 AM

    खूंटा उखाड़ लिया लेकिन पगहा लिए भागे जा रहे हैं.

  3. By Massagem on April 23, 2008 at 3:29 AM

    Hello. This post is likeable, and your blog is very interesting, congratulations :-). I will add in my blogroll =). If possible gives a last there on my blog, it is about the Massagem, I hope you enjoy. The address is http://massagem-brasil.blogspot.com. A hug.

  4. By जेपी नारायण on April 23, 2008 at 9:24 AM

    प्रचंड ने जो बताया-कहा है, सो तो ठीक। देखिए, आने वाले दिनो में उनकी कथनी के रंग करनी में कैसे दिखते हैं? नाई भाई कितने बाल, सब आपके आगे आते हैं हुजूर!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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