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बीच सफ़हे की लड़ाई

इतना खुश होने से पहले, अतुल जी...

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/22/2008 07:50:00 PM

तथ्यों को समझना सीखिए

अतुल भाई
मुझे इसमें बेहद खुशी होगी (एक बार फिर) कि हम गांधी के उन विचारों के बारें में जाने (उन 'बदले हुए' विचारों के बारे में) जिन्हें इस देश के जाति प्रश्न का समाधान करना था/हैं। दरअसल आपने जिन बदलाओं के बारे में बताया था वे इस मायने में अपर्याप्त हैं कि वे जाति प्रश्नों को संबोधित ही नहीं हैं। गांधी व्यक्तिगत रूप से कहाँ जाना और कहाँ नहीं जाना चाहते थे ओर किसे आशीर्वाद देना-न देना उन्हों ने बाद में तय कर लिया था, ये बातें जाति प्रश्न का समाधान नहीं देतीं। जाति प्रश्न क्या इस तरह के उपायों से हल हो सकता हैं

अब अगली बातें। आपने अपनी इस पोस्ट में जिस बात को लेकर इतनी खुशियाँ मनायी हैं और इस तरह अपने को सही 'साबित' किया हैं, वह सिरे से ही ग़लत हैं। किसी तथ्य को आधार बनाने से पहले एक बार उसकी जांच ज़रूर कर लिया कीजिए। चंद्रिका संघी हैं या नहीं यह बात स्पष्ट करने का अधिकार तो सिर्फ़ उसी को हैं, तब भी चूंकि आपने उसकी प्रोफाइल देखने को कहा हैं, उससे वह कहीं से भी संघी नहीं लगता बल्कि उसके ब्लॉग के पोस्ट तो उसे कुछ और ही दिखाते हैं। एक बार वहाँ भी झाँक आयें तो बेहतर।

आपने, जैसा कि रिवाज हैं, चलते चलते मार्क्सवाद पर भी एक धौल जमाई हैं। आप कह रहे हैं कि मार्क्सवाद भारत में प्रासंगिक नहीं हैं. कैसे भाई?

और जहाँ तक 'नरसंहारों' की बात हैं, आपने फिर तथ्यों की कोई परवाह नहीं की हैं।

संधि की बात आपने की हैं। स्तालिन ने किन हालत में संधि की थी और संधि में क्या था, यह आपने नज़र अंदाज कर दिया हैं।

और क्या यह भी बताना पडेगा कि उसी हिटलर की कब्र किसने तैयार की थी?
( आपने जिन 'महान समाजवादी' नेताओं के नाम लिए हैं, उनहोंने भारत की हिटलरई शक्तियों को सत्ता तक पहुँचाया और उन्हीं नेताओं के प्रताप का फल हैं कि भारत की फासिस्ट पार्टियां अब भी सत्ता तक पहुँच रही हैं। इसे क्यों भूल जाते हैं?)

तथ्यों को समझना सीखिए अतुल जी.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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