हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नेपाल : क्रांति का प्रचंड पथ !

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/21/2008 09:39:00 PM

नेपाल में जो कुछ भी हो रहा हैं, हम उसे समझने की कोशिश कर रहे हैं नेपाल किन हालात से गुजर रहा हैं? वहाँ माओवादियों ने जो हासिल किया हैं, वह कौन सी क्रांति हैं? क्या यह नव जनवादी क्रांति हैं? कैसे? हाशिया पर भी हम इसे अपने तरीके से समझने की कोशिश करेंगे इस कड़ी में आज पहली पोस्ट, नेपाली माओवादी आन्दोलन की अच्छी समझ रखनेवाले पत्रकार आनंदस्वरूप वर्मा का यह नजरिया

च्चे अर्थों में नेपाल में लोकतंत्र की जीत हुई है. आखिर लोकतंत्र है क्या? समाज का वैसा तबका, जो दलित है, उत्पीडित है, उपेक्षित पिछडे हैं, उनको अगर सत्ता में भागीदारी मिल रही है, तो मैं समझता हक्तं कि यह सही मायने में एक वास्तविक लोकतंत्र की जीत है. मुख्यधारा में अगर समाज के हाशिये पर पडे लोगों को जगह मिल रही है, तो इससे बडी लोकतांत्रिक हिस्सेदारी क्या होगी? नेपाल एक ऐसे लोकतंत्र का इतिहास गढ रहा है, जिसमें हर वर्ग, उपेक्षित, वांछित, उत्पीडित, वंचित आदि सभी को समान अवसर मिल रहा है. महिलाओं की भागीदारी बडे पैमाने पर हो रही है. जन मुक्ति सेना में 50 फीसदी महिलाओं की हिस्सेदारी इसी बात का सबूत है. चुनाव में 42 माओवादी महिलाओं की जीत सही मायने में एक सार्थक लोकतंत्र की तरफ इशारा करती है. एक महिला हिसला मायी जीतीं, जो कि मध्यम वर्ग से थी. महिलाओं की इतनी बडी भागीदारी इस बात का शुभ संकेत है कि नेपाल में एक टिकाऊ और मजबूत लोकतंत्र स्थापित हो चुका है.

जो लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि नेपाल में माओवादी के हाथों में सत्ता आने पर वे सत्ता को लोकतांत्रिक तरीके से चला नहीं पायेंगे, उन्हें माओवादियों के स्वरूप और कार्यप्रणाली पर अध्ययन करना चाहिए. पिछले 10 सालों से माओवादी अपने क्षेत्र में जिस तरह से स्वायत्त समांतर शासन चला रहे हैं, वह सही अर्थों में अध्ययन का विषय है. समाजशास्त्रियों, राजनीतिक विश्लेषकों, मनोवैज्ञानिकों को इस पर शोध करना चाहिए. माओवादी विभिन्न समितियों के तहत चुनाव आयोजित करते हैं. लोगों के जनसमर्थन के बाद ही प्रशासक की नियुक्ति की जाती है. दूसरी तरफ जो लोग नेपाल कांग्रेस या राजतंत्र द्वारा संचालित शासन की सराहना कर रहे हैं, उन्हें नेपाल के पिछले 13 साल की शासन व्यवस्था पर गौर फरमाना चाहिए. यह प्रासंगिक है कि वर्ष 1991 में बहुदलीय व्यवस्था लागू हुई तथा वर्ष 2004 में संसद भंग किया गया. इन 13 वर्षों में 13 बार सरकारें बदली गयीं, गिरिजा प्रसाद कोईराला, सूर्य कांत थापा, माधवराव जैसे प्रधानमंत्री बदले गये. क्या इसे वास्तविक लोकतंत्र का परिचायक कहेंगे? इसे व्यापक पैमाने पर समझने की जरूरत है.

प्रचंड
के बयान को तूल देने से पहले उनके कहने का अर्थ समझिए. प्रचंड ने यह कहा था कि यदि माओवादी हार भी जाते हैं, तो भी वे अपनी लडाई जारी रखेंगे. दरअसल, यह हालिया चुनाव सरकार बनाने की नहीं है. यह संसदीय चुनाव नहीं है. यह खासतौर पर संविधानसभा का चुनाव है. इन चुनावों के तहत मतदाता एक ऐसी एसेंबली का चुनाव करेंगे, जो देश के लिए एक नया संविधान तैयार करेगी. फिर दुबारा चुनाव होगा. सरकार बनाने की पूरी प्रक्रिया में दो साल का वक्त लगेगा. सरकार वहीं बनायेंगे, जिन्हें बहुमत होगा.

जहां तक भारत में सक्रिय नक्सलियों के प्रोत्साहित होने का सवाल है, तो प्रेरणा लेने प्रोत्साहन पाने के लिए कोई भौगोलिक सीमाएं नहीं होती. वे नेपाल में माओवादियों के इस सफलता से निश्चित तौर पर प्रेरणा लेंगे. यदि माओवादी वेनेजुएला, कोलंबिया में भी जीत हासिल करते, तो उसकी सफलता से भी इन्हें प्रेरणा मिलती. विचारों से प्रेरणा दुनिया के किसी हिस्से से कोई भी ले सकता है. भारत में सक्रिय नक्सलियों के संरक्षण समर्थन देने की बात है, तो नेपाली माओवादी नेतृत्व पहले से ही कहता रहा है कि हमारा भारत के नक्सलियों के साथ सिर्फ वैचारिक संबंध है. भारत के नक्सलियों को नेपाली माओवादी मदद पहुंचायेंगे, यह बात निर्मूल है.

माओवादी
अपने हिंसात्मक तौर तरीकों को छोडेंगे या नहीं, यह मूलतः परिस्थितिजन्य स्थितियों पर निर्भर करेगा. हिंसात्मक बर्ताव या गतिविधि के पीछे कोई कोई उेश्य होता है. अगर उेश्य नहीं है, तो वे क्यों हिंसा पर उतरेंगे? नक्सलियों के हिंसात्मक गतिविधियों का उेश्य मूलतः जडे जमा चुकी सामंतवादी व्यवस्था के उन्मूलन का था. 80 के दशक में वे काफी कमजोर हुआ करते थे. उनके विरोध को सरकारी दमन का सामना करना पडता था. हजारों लोग सरकारी दमन में मारे गये. धीरे-धीरे माओवादी समृद्ध शक्तिशाली होते गये. वर्ष 2006 में शुरू हुआ आंदोलन, जिसे जनआंदोलन-2 भी कहा जाता है, से वे शहरी क्षेत्र की तरफ बढे. उन्होंने एक रोड मैप बनाया. क्योंकि वे शक्तिशाली हो गये थे, सरकार राजशाही ताकतों से सीधे लोहा लेने में सक्षम थे. यहां वे हिंसा छोडकर चुनावी प्रक्रिया में शामिल हुए. माओवादियों के जनसमर्थन की बानगी को हालिया चुनाव परिणामों से दुनिया देख रही है. संविधान सभा के चुनाव का निरीक्षण करने के लिए दुनियाभर के 60 हजार अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक मौजूद थे. सभी ने अपनी रिपोर्ट में इसकी सराहना की है.

इतना
तो तय है कि ज्ञानेंद्र हटेंगे. संविधान सभा की पहली बैठक में ही ज्ञानेंद्र को हटा दिया जायेगा. यदि वे ऐसा नहीं भी करते हैं, तो जनता घसीट कर उन्हें निकाल देगी. 25-26 मार्च को नेपाल के रामलीला मैदान में प्रचंड ने सार्वजनिक रूप से इस बात के संकेत भी दिये हैं. ज्ञानेंद्र खुद हटे या हटे उनको हटना तय है. ज्ञानेंद्र भारत में रहते हैं या कहीं और, यह खुद ज्ञानेंद्र तय करेंगे. ज्ञानेंद्र को भारत अपने यहां शरण देंगे या नहीं यह भारत सरकार को तय करना है, माओवादियों को इससे कोई मतलब नहीं है.

मधेसी
की बात करें, माओवादियों के रुख मधेसी को लेकर उनकी राय पर मधेसी जन अधिकार फोरम के प्रमुख उपेद्र यादव ने एक किताब लिखी थी. वर्ष 2005 में इसका दूसरा संस्करण आया था. इसमें उपेंद्र यादव ने लिखा है कि मधेसी की आवाज को सही ढंग से माओवादी ही संबोधित करते हैं. दरअसल, पूर्व में माओवादियों के साथ ही उनका आंदोलन शुरू हुआ. निकाले जाने पर प्रतिक्रियावादी तत्वों से उनकी निकटता बढ गयी. भारत के ही कुछ सत्ताधारी वर्ग के कट्टरपंथी हिस्सा, दरबार समर्थक, हिंदू अधिकार समर्थकों के बहकावे में आकर वे मधेसी के वास्तविक मांगों से भटक गये. कुछ लोग राजतंत्र को बचाने के प्रयास में लगे रहे, जिन्होंने मधेसी आंदोलन को भडकाया. अमेरिका को भी उम्मीद थी कि इन्हें भारी बहुमत मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बात की मुझे पूरी उम्मीद है कि माओवादी मधेसी के वास्तविक हित को ध्यान में रखकर कार्य करेंगे.

जहां
तक चीन की बात है, तो यह देश पूर्ण रूप से अवसरवादी है. चीन हमेशा से राजतंत्र का समर्थक रहा है. माओवादियों के बारे में उनकी टिप्पणी थी कि यह माओत्से का अपमान कर रहे हैं. ज्ञानेंद्र ने जब इमरजेंसी लगाई, तब भी उन्होंने समर्थन किया. जब माओवादी शक्तिसंपन्न और मजबूत होते गये, तब वे माओवादियों के पक्ष में बोलने लगे. चीन की यह अवसरवादी प्रवृत्ति हमेशा से रही है. उधर नेपाल में माओवादी की बढत से सबसे ज्यादा परेशानी अमेरिका को है. अमेरिका ने माओवादियों को आतंकवादियों की सूची में डाल रखा है. यदि अमेरिका के राजदूत माओवादी प्रशासक से मिलने जाते हैं, तो क्या यह बात नहीं कही जायेगी कि एक आतंकवादी से मिलने जा रहे हैं. अमेरिका के सामने दो विकल्प हैं या तो नेपाल से संबंध खत्म कर ले अथवा आतंकी सूची से माओवादी को हटाये. वियतनाम युद्ध के बाद अमेरिका की डिप्लोमेसी को पहली बार चुनौती मिली है.

नेपाल
की सत्ता पर माओत्से तुंग जाये या लेनिन, यदि नेपाली जनता का हित देखना है, तो भारत के साथ रिश्तों पर कोई आंच नहीं आने दी जायेगी. कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि भारत के साथ शत्रुता को बढावा मिले. नेपाल की भौगोलिक स्थितियां तीन तरफ से भारत से मिलती हैं. जहां तक 1950 की संधि में संशोधन या करने की बात है, तो इसे नेपाली परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है. यह संधि तब हुई जब नेपाल में राणाशाही था. पिछले 60 साल में परिस्थितियाँ
बदली
हैं. संधि समानता की बात करती है, जिसमें 10 फीसदी नेपाली भारत में बस सकते हैं और 10 फीसदी भारत की वहां. अगर सचमुच भारत का 10 फीसदी नेपाल में जाकर बसने लगे तो परिस्थितियां क्या होंगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है. इसे भारत विरोधी मानना ठीक नहीं होगा. मेरे विचार से दोनों देशों के कुशल राजनीतिक प्रतिनिधि एक टेबल पर बैठ विचार करें तो इसका हल निकाला जा सकता है
बातचीत : संजय कुमार (प्रभात ख़बर से साभार)। तसवीर ली आनेस्तो की ।
कल पढिये नेपाल पर कुछ और सामग्री

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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