हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जाति प्रश्न के समाधान के लिए मार्क्स जरूरी हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2008 08:58:00 PM

कुछ दिनों पहले एक मित्र से जाति व्यवस्था और मार्क्सवाद पर बातें हो रही थीं. उनका मानना था कि मार्क्सवाद दुनिया में हर जगह के लिए प्रासंगिक हो सकता है, भारत के लिए नहीं क्योंकि वह जाति प्रश्न के बारे में कुछ नहीं कहता या कम से कम जाति प्रश्न मार्क्सवाद के दायरे से बाहर की बात है. इसके अलावा उन्होंने भाकपा-माकपा के ब्राह्मण सवर्ण नेताओं द्वारा ब्राह्मणवादी एजेंडे के लिए कम्युनिस्ट आंदोलन को हाइजैक कर लेने की बात भी कही. उन्होंने अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों (माले माओवादी) द्वारा इस प्रश्न पर पर्याप्त ध्यान देने पर अपना असंतोष जताया. हम यहां उनके इस दावे पर विचार करेंगे कि जाति प्रश्न मार्क्सवाद के दायरे से बाहर की बात है, कि यह इस प्रश्न का समाधान नहीं कर सकता, कि मार्क्सवाद भारत में सफल नहीं हो सकता. जैसा कि रंगनायकम्मा के इस लेख में हम देखेंगे कि वे यह बात कहनेवाले पहले व्यक्ति नहीं हैं और आखिरी. 1939 में जन्मीं रंगनायकम्मा तेलुगु की जानी-मानी लेखिका हैं. उन्होंने 15 उपन्यास और 70 कहानियां लिखी हैं. उनका अब तक का समग्र लेखन 60 खंडों में प्रकाशित हुआ है. उन्होंने मार्क्स की पूंजी का पांच खंडों में परिचय लिखा है. उनके द्वारा लिखा गया तीन खंडों में रामायण : विषवृक्ष काफी चर्चित रहा है. 2000 पन्नों की यह पुस्तक कुछ वर्षों पूर्व अंगरेजी में अनूदित हुई और जहां तक मुझे याद है, इस पर राजेंद्र यादव हंस में लिख चुके हैं. रंगनायकम्मा ने अपने उपन्यास बालिपीठम पर मिला आंध्रप्रदेश साहित्य अकादेमी सम्मान ठुकरा दिया था. उनकी एक और चर्चित किताब जाति प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफी नहीं, आंबेदकर भी काफी नहीं, मार्क्स जरूरी हैं, अभी एकदम हाल में हिंदी में (अनुवाद) प्रकाशित हुई है. प्रस्तुत लेख एक स्वतंत्र रचना है और इस पुस्तक का हिस्सा नहीं है.
रंगनायकम्मा
अनुवाद : रेयाज-उल-हक

मार्क्स ने जाति पर अलग से कोई निबंध नहीं लिखा, जैसाकि उन्होंने पूंजी ( 1, 2, 3 ) शीर्षक के अंतर्गत पूंजीवाद पर लिखा. फिर भी अपने लेखन में उन्होंने भारत में जाति व्यवस्था और दूसरे देशों में जाति संबंधी नियमों पर अध्ययन किया था. इन अध्ययनों के जरिये हमारे लिए जातियों की अवधारणा को समझना और इस सवाल से जुडा उनके द्वारा बताया गया समाधान संभव है.
भारत
में ऐसे लोग हैं, जो मार्क्स के सिद्धांत का विरोध करते हैं (चाहे जानबूझ कर या अनजाने में या अधकचरे ज्ञान के कारण), दुनिया के दूसरे लोगों की ही तरह. मार्क्स के ऐसे भारतीय विरोधी मार्क्स के सिद्धांत पर दो तरह के विचार प्रस्तुत करते हैं-एक यह कि मार्क्स का सिद्धांत 19वीं सदी के यूरोप के संबंध में था, लेकिन उन देशों तक में यह शुद्ध रूप में प्रासंगिक नहीं रहा. दूसरा यह कि मार्क्स का सिद्धांत दूसरे देशों के लिए प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन भारत के लिए बिल्कुल नहीं, क्योंकि यहां जाति व्यवस्था अस्तित्व में है और यह मार्क्स के सिद्धांत के दायरे में नहीं आती.
मार्क्स
का विरोध करते ये दो नजरिये हैं. फिर भी, दोनों पूरी तरह गलत हैं. चूंकि मार्क्स का सिद्धांत श्रम संबंधों के बारे में बात करता है, यह मानव समाज के हरेक हिस्से पर लागू होता है. यह हरेक संबंध पर लागू होता है. कोई भी देश या इसका समाज किसी भी काल में सिर्फ श्रम संबंधों की शर्तों के तहत ही जीवित रहता है. किसी समाज की प्रकृति इसके श्रम संबंधों की प्रकृति के अनुरूप ही होती है.
मार्क्स
ने उन श्रम संबंधों के बारे में बात की है. उन्होंने श्रम के शोषण के बारे में बात की है, जो कि श्रम संबंधों की जमीन पर सैकडों और हजारों सालों से चल रहा है. उन्होंने विभिन्न तरह की समस्याओं पर विचार किया है, जो श्रम के शोषण के दौरान उत्पन्न होती हैं. उन्होंने उन समस्याओं के समाधान के संकेत दिये हैं. इसलिए यह हमारी जिम्मेवारी है कि हम अपनी समस्याओं को समझें. पहला, हमें यह जानना है कि क्या भारत में श्रम का शोषण मौजूद है. हमें यह भी जानना है कि क्या जाति प्रश्न श्रम संबंधों के दायरे में आता है. यदि हम यह जान लेते हैं कि जातियों और श्रम के बीच संबंध है, तब हम निस्संदेह इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि मार्क्स का सिद्धांत भारत पर भी लागू हो सकता है. मानव समाज से जुडी कोई भी समस्या श्रम संबंधों से गुंथी हुई होती है. चूंकि जाति प्रश्न मनुष्य से जुडा हुआ है, यह भी उस सिद्धांत की सीमा में आयेगा जो श्रम संबंधों की बात करता है.
मार्क्स
का सिद्धांत भारत सहित सभी देशों पर, जो श्रम के शोषण और वर्ग विभेदों पर आधारित हैं, लागू होता है, इसलिए कि यह अकेला और सही सिद्धांत है, जिसने श्रम के शोषण की खोज की और उसकी व्याख्या की. आगे, यह सिद्धांत इसकी व्याख्या करता है कि क्यों मानव संबंध उपयोग मूल्य परिप्रेक्ष्य (use value perspective) द्वारा स्थापित होने चाहिए और तब किस तरह की समस्याएं पैदा होंगी जब इस परिप्रेक्ष्य का अभाव होगा. अतः, यह सिद्धांत समाज के संगठन में एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में उपयोगी है, भविष्य के लिए भी, जब श्रम का शोषण नहीं रहेगा.
हालांकि
जाति व्यवस्था भारत की एक विशिष्ट समस्या है, हम समझ सकते हैं कि कैसे मार्क्स का सिद्धांत इसके लिए प्रासंगिक है, यदि हम श्रम के साथ इसके संबंध को समझ लें. यदि हम जातियों को देखें-अगर सरसरी तरीके से भी-हम उनमें कुछ निश्चित और स्पष्ट विभेद पाते हैं, कि कुछ जातियां ऊंची हैं और कुछ नीची. हम इस ऊंच-नीच के अंतर को किस संबंध में पाते हैं? आमतौर पर कहा जाता है कि सभी ऊंची जातियां वे हैं जो भूमि, पूंजी और धन रखती हैं, जो प्रभुत्वशाली हैं और समाज के संगठन और प्रशासन में शामिल हैं. एक बार फिर, आम तौर पर कहा जाता है, सभी नीची जातियां वे हैं जो संपत्ति नहीं रखतीं, जीवनयापन के साधन भी नहीं. वे मजदूरों और नौकरों के रूप में रहती हैं. वे ऊंची जातियों के प्रभुत्व और शासन में रहती हैं और भयानक गरीबी और सामाजिक हीनता में रहती हैं.
ऊंची
जातियों में हम बिना श्रम की जीवन पद्धति पाते हैं. या यदि वे श्रम करती भी हैं तो वे मानसिक श्रम और स्वच्छ श्रम में लगती हैं. दूसरी तरफ, नीची जातियों की स्थिति पूरी तरह उल्टी है. बिना श्रम किये जीना नीची जातियों के लिए अकल्पनीय है. वे जिस तरह का श्रम करती हैं, वह निकृष्टतम शारीरिक श्रम होता है. सभी प्रकार का अस्वच्छ श्रम, जो कि पूरे समाज की सफाई के लिए जरूरी होता है, इन जातियों की जिम्मेवारी होता है.
अर्थशास्त्र
के नियमों के मुताबिक, मानसिक श्रम का ऊंचा मूल्य होता है और शारीरिक श्रम का निम्न. यह मूल्यों के निर्धारण के प्राकृतिक नियम पर आधारित है. अलग-अलग तरह के श्रमों का मूल्य अलग-अलग निर्धारित होता है, जो किसी श्रम को सीखने के लिए जरूरी संसाधनों पर निर्भर करता है. इसमें कुछ भी गलत नहीं है. क्योंकि मानसिक श्रम अधिक मूल्य धारण करता है और शारीरिक श्रम कम मूल्य. एक आदमी जो हमेशा शारीरिक श्रम करता है, कम आमदनी पाता है. शोषण पर आधारित समाज श्रम के विभिन्न प्रकारों के मूल्यों के बीच मौजूद प्राकृतिक अंतर को और बढा देता है. अतः ऐसे समाज और उनकी प्रथाएं मानसिक श्रम को उसके वास्तविक मूल्य से अधिक मूल्य प्रदान करती हैं और शारीरिक श्रम को उसके वास्तविक मूल्य से कम. श्रम के शोषण पर आधारिक समाज शारीरिक श्रम का और अधिक शोषण करते हैं, खास कर निम्नस्तर के शारीरिक श्रम का. यदि हम शोषण पर आधारित एक समाज में एक डॉक्टर और एक खेतिहर मजदूर को लें तो हम उनकी आय और उनके जीने के तरीके में एक अकल्पनीय अंतर पायेंगे, हालांकि वे दोनों श्रम करते हैं.
लंबे
अरसे से जो व्यवस्था चली रही है, जिससे एक वर्ग, जिसने उत्पादन के सभी साधनों को अपनी संपत्ति के रूप में हथिया लिया है, कोई भी श्रम किये बगैर, संपत्ति के अधिकार के नाम पर जमीन का किराया, ब्याज और पूंजी का मुनाफा निचोडने के द्वारा श्रम के शोषण पर जिंदा है. श्रम का विभाजन, जो कि शोषण के इन संबंधों में से पैदा होता है, हमेशा श्रम करनेवाले लोगों को केवल एक तरह के श्रम से बांधता है. एक व्यक्ति, जो शारीरिक श्रम करता है, अपने जीवन भर एक ही तरह का श्रम करते हुए खत्म हो जाता है. उस व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है कि वह थोडे मानसिक श्रम, ऐसे श्रम से जुडी शिक्षा या इससे होनेवाली आय की अपेक्षा रखे. मानसिक श्रम करनेवाले, जैसे डॉक्टरों, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को कभी शारीरिक श्रम करने की जरूरत नहीं पडती. उन्हें अपनी गंदगी साफ करने तक की जिम्मेवारी नहीं उठानी पडती.
यह
तथ्य कि किसी समाज की आबादी का कुछ हिस्सा बिना श्रम किये हुए जी रहा है, यह बताता है कि आबादी का बचा हुआ हिस्सा सारा श्रम ( अपने हिस्से के श्रम के अलावा उनके हिस्से का श्रम भी जो बिना श्रम कियेजी रहे हैं-अनुवादक) कर रहा है. यही वह चीज है जो चाहे भारत में हो या किसी भी दूसरे देश में, हो रही है. यह तथ्य कि भारत की ऊंची जातियां बिना शारीरिक श्रम और अस्वच्छ श्रम किये जी रही हैं, यह बताता है कि वे इसका बोझ नीची जातियों पर डाल रही हैं.
ये
सारी बातें श्रम के विभाजन से जुडी हुई हैं. यह श्रम के विभाजन का सवाल है, यदि एक वर्ग काम नहीं करता और दूसरों के श्रम पर जीता है. इसी के साथ, यह श्रम विभाजन का सवाल है यदि एक व्यक्ति हमेशा एक ही तरह के श्रम से बंधा रहता है. जातियों का संगठन ऐसी चीज नहीं है, जिसकी उत्पत्ति का श्रम और श्रम संबंधों से कोई जुडाव हो. जाति प्रश्न उन अनेक समस्याओं में से एक है, जो दोषपूर्ण सामाजिक संबंधों से पैदा हुईं. यह ऐसी समस्या है जो श्रम संबंधों की शोषणकारी प्रकृति से, मूल्य के इसके नियमों से, इसके श्रम विभाजन से और संपत्ति के इसके अधिकारों से गुंथी हुई है.
इसलिए
, सिर्फ ऐसी आर्थिक अवधारणात्मक श्रेणियों के जरिये, जिनका मार्क्सवाद उपयोग करता है-उपयोग मूल्य, विनिमय मूल्य, मानसिक श्रम, शारीरिक श्रम, श्रम का मूल्य, श्रमशक्ति का मूल्य, संपत्ति संबंध, स्वामित्व और गुलामी और अनेक ऐसी ही श्रेणियां-हम जाति प्रश्न को समझते हैं. मार्क्स ने (एंगेल्स के साथ) भारत में जातियों के बारे में पहली बार जर्मन दर्शन् (1845-46) में बात की. उन्होंने जातियों संबंधी विचार और टिप्पणियां पूंजी (1867) में छह या सात जगहों पर की हैं. इन टिप्पणियों और पूंजी के जरिये, जिसने मार्क्स के सिद्धांत की व्यापक रूप से व्याख्या की, हम जाति के सवाल को समझ सकते हैं और इसके समाधान तक पहुंच सकते हैं.
जारी

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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