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बीच सफ़हे की लड़ाई

भारत और नेपाल के माओवादी अलग-अलग हैं : वरवर राव

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/23/2008 09:33:00 PM

नेपाल में माओवादियों द्वारा संविधान सभा का चुनाव जीतने के बाद भारत में माओवादियों पर इसके प्रभाव बारे में भी लोगों की जिज्ञासाएं बढ़ गयी हैंइसके बारे में क्रांतिकारी कवि वरवर राव से तहलका की हरिंदर बावेजा ने बात कीयहाँ हम यह बातचीत तहलका से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं

नेपाल में माओवादियों की हैरतअंगेज विजय से भारत के माओवादियों को क्या सबक हासिल करना चाहिए?
ये दोनों अलग-अलग हैं. नेपाल की माओवादी पार्टी का नारा था कि राजतंत्र ध्वस्त होना चाहिए. भारत की क्रांतिकारी पार्टियों का यह एजेंडा नहीं है. असल में, वर्तमान में नेपाल की माओवादी पार्टी एक नवजनवादी क्रांति के बारे में बात नहीं कर रही है. वह संविधान की बात कर रही है, जिसमें कोई राजा नहीं रहेगा. यहां (भारत में-अनु.) एजेंडा है कि सत्ता जनता के हाथ में हो. यह खेतिहर के लिए जमीन का एजेंडा है, कारखाने पर मजदूर के स्वामित्व का एजेंडा है. यह करीब-करीब वैकल्पिक राजनीति जैसा है.
माओवादी विजय पर टिप्पणी करते हुए सीताराम येचुरी ने कहा है कि यदि आप लोकतंत्र के रास्ते पर डटे रहे तो आप सत्ता तक पहुंच सकते हैं.
सीताराम येचुरी लोकतंत्र को किस तरह परिभाषित करते हैं? यदि वे यह सोचते हैं कि संसदीय लोकतंत्र ही लोकतंत्र है, तब क्यों उनकी पार्टी लोक जनवाद का नारा ढो रही है? इसका मतलब यह हुआ कि संसदीय लोकतंत्र और लोक जनवाद में फर्क है. क्यों सीपीएम लोक जनवाद का उपयोग करती है? चूंकि वे संसदीय राजनीति से जुड गये हैं, येचुरी कुछ भी कह सकते हैं. अब कांग्रेस, भाजपा और सीपीएम में कोई फर्क नहीं रहा, खास कर नंदीग्राम और सिंगूर के बाद.
लेकिन इस व्यापक बिंदु पर आपका क्या कहना है कि आप बिना हिंसा और बंदूकों के इस्तेमाल के भी सत्ता में सकते हैं?
यह हिंसा का सवाल नहीं है. यह राज्य है, जो हिंसा का उपयोग करता है. क्रांतिकारी तो उस हिंसा का प्रतिरोध करते हैं.
लेकिन वे खुद सशस्त्र हैं...
लोग हथियारबंद होंगे, क्योंकि जब तक आपके पास हथियार नहीं होंगे, आप किसी भी हिंसा का प्रतिरोध नहीं कर सकेंगे. जब राज्य हथियार के बल पर उत्पीडन और दमन करता है, जनता भी हथियार उठा लेती है.
लेकिन यह सिर्फ प्रतिरोध का मामला नहीं है. निर्दोष भी निशाना बने हैं.
वे बहुत छोटा हिस्सा हैं.
लेकिन यह महत्वपूर्ण हिस्सा है.
उत्पीडित कभी भी बिना शक्ति के सत्ता में नहीं आये हैं. चुनाव हिंसा और अहिंसा के सवाल पर नहीं लडे जाते. नेपाल में इस बडे सवाल पर चुनाव लडा गया कि क्या वहां राजा को रहना चाहिए कि नहीं. मैं स्वीकार करता हूं कि वह वोट एक लोकप्रिय वोट है, लेकिन वह राजा के खिलाफ था.
लेकिन वे अब नीतियां बदलने की स्थिति में हैं.
हमें इंतजार करना और देखना होगा कि जनवादी क्रांतिकारी योजना का क्या होता है. क्या नेपाल की नयी सत्ता सामंतविरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी होगी? उदाहरण के लिए, क्या यह उस तरह सामंतवाद विरोधी होगी, जिस तरह सीताराम येचुरी बंगाल के बारे में दावा करते हैं.
येचुरी ने कहा कि जब नेपाल में माओवादियों ने हथियार डाल दिये हैं, भारत में उनके समकक्ष हत्याएं जारी रखे हुए हैं.
मैं सोचता हूं कि प्रचंड इसे स्वीकार नहीं करेंगे, जब येचुरी कहते हैं कि उन्होंने हथियार डाल दिये हैं. हथियार संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में रखे गये हैं. नौ साल पहले, उन्होंने उसे नव जनवादी क्रांति संपन्न करने के लिए उठाया था. जब तक वह हासिल नहीं हो जाती, क्रांति वापस नहीं ली जा सकती. और समकक्ष जैसी शब्दावलियां मार्क्सवादी शब्दावलियां नहीं हैं. नेपाल की माओवादी पार्टी भारत की माओवादी पार्टी से अलग है.
तो आप यह महसूस करते हैं कि यहां के माओवादियों की जरूरत सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने की है ?
मैं कहता हूं कि भारतीय माओवादी राज्य की हिंसा का प्रतिरोध करेंगे. राज्य की हिंसा अब साम्राज्यवादी हिंसा द्वारा समर्थित है. इसलिए इसकी और अधिक जरूरत है. कल तक, यह सिर्फ जमींदारों और पूंजीपतियों के खिलाफ था. लेकिन इराक और अफगानिस्तान के बाद, हम साम्राज्यवाद की दखलंदाजियां देखते हैं. छत्तीसगढ में क्या हो रहा है? भारतीय राजसत्ता किसके हित में लड रहीहै. यह बहुराष्ट्रीय निगमों और अमेरिकी साम्राज्यवाद के हित में लड रही है. इसने सलवा जुडूम को खडा किया और लोगों की हत्याएं कीं. तब आदिवासी क्या करेंगे? केवल संघर्ष ही परिणाम लायेगा.
अनुवाद : रेयाज-उल-हक

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ भारत और नेपाल के माओवादी अलग-अलग हैं : वरवर राव ”

  2. By vijayshankar on April 24, 2008 at 4:10 PM

    वर वर राव लगभग सही कह रहे हैं कि अब भारत में माकपा, कांग्रेस तथा भाजपा में ज्यादा फ़र्क नहीं रह गया है. लेकिन मेरे विचार से माकपा और कांग्रेस के बीच का फ़र्क लगभग मिटता जा रहा है. भाजपा का बुनियादी फ़र्क तो मैजूद है और रहेगा. वह खुल कर साम्प्रदायिक हो सकती है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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