हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

ज्ञान संघर्ष से पैदा होता हैं : प्रचंड

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/24/2008 06:48:00 PM

नेपाल आज हर तरह के राजनीतिक विचारोंवाले लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन गया हैं। वहाँ संविधान सभा में माओवादियों की निर्णायक विजय ने सबका ध्यान खींचा हैं-उनका भी जो इसके विरोधी हैं और उनका भी जो समर्थक हैं। हाशिया पर हम इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं कि नेपाल के हालिया घटनाक्रम के निहितार्थ क्या हैं और आज सामने दिख रही घटनाएँ किन प्रक्रियाओं से होकर यहाँ तक पहुँची हैं। इस सिलसिले में पोस्ट की जा रही सारी सामग्री से हाशिया का सहमत होना ज़रूरी नहीं हैं। ये पोस्टें यहाँ सिर्फ़ एक वैज्ञानिक और तथ्यपरकअध्ययन सम्भव बनाने के उद्देश्य से की जा रही हैं। आगे और भी पोस्टें की जाएँगीं। आज पढ़ते हैं नेपाल में सैद्धांतिक संघर्ष के सवाल पर प्रचंड का आलेख। यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया हैं और अनूदित हैं।

लोकयुद्ध द्वारा उभारा गया सैद्धान्तिक संघर्ष का सवाल

प्रचंड
क्रा
न्तिकारी
आंदोलन के भीतर सैद्धांतिक संघर्ष को चला कर लोकयुद्ध की शुरूआत की प्रक्रिया और इसके निरन्तर विकास ने एक नया संघर्ष शुरू कर दिया है । सुधारवादी और संसदीय हलके जो कम्युनिस्ट आंदोलन पर हावी थे, उन्हें तोड़ दिया गया और आज बहस की एक नई प्रक्रिया और रूपान्तरण आगे आया है । महान लेनिन ने कहा था, 'बर्फ तोड़ दी गई है, रास्ता साफ हो गया है, राह दिखाई जा चुकी है और जगमगा रही है, अब इतिहास रेलवे इंजन की भान्ति दौड़ रहा है।' पार्टी तथा आंदोलन में पुराने अन्तर्विरोध् हल कर दिये गये हैं और नये अन्तर्विरोधें ने जन्म ले लिया है । वास्तव में, पार्टी और आंदोलन में कुछ हद तक नेपाली समाज के पुराने आधर पर बनाई एकता तोड़ी जा चुकी है । विचारधरात्मक राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में बहस, ध््रुवीकरण और एकता का नया दौर शुरू हो गया है । लोकयुद्ध के आरम्भ करने और जारी रखने के सार तत्त्व में यह एक अत्यन्त महत््वपूर्ण ऐतिहासिक उपलब्ध्ि है ।
सर्वहारा वर्ग के अपराजेय उसूल, मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद ने हमें सिखाया है कि सैद्धांतिक संघर्ष वर्ग-संघर्ष का प्रतिबिम्ब होता है और इसका संश्लेषणात्मक रूप भौतिक शक्ति में रूपान्तरित होता जाता है । जब से वर्गीय समाज अस्तित्व में आया है, वर्गीय टकराव विचारधरात्मक टकराव में व्यक्त होता है और सैद्धांतिक टकराव, वर्ग संघर्ष के एक नये स्तर पर अभिव्यक्त होता है । यह टकराव समाज को आगे बढ़ने में गति देता है । अनुभववादियों के साथ संघर्ष के दौरान मार्क्स ने दावे के साथ इस तथ्य को पेश किया था कि अनभिज्ञता कभी लोगों के काम नहीं आती और न कभी आ सकी है । अगर ऐसा है तो लोगों की सेवा के लिये आवश्यक ज्ञान कहां से आता है ? मार्क्सवादी विज्ञान के अनुसार यह संघर्ष से आता है । माओ ने ज्ञान के स्रोत के तौर पर वर्ग संघर्ष, उत्पादन के लिये संघर्ष और वैज्ञानिक तजुर्बे की ठोस स्थापना की है । नेपाली लोकयुद्ध, वर्ग-संघर्ष, उत्पादन के लिये संघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग की ठोस अभिव्यक्ति है ।
कुछ लोग यह सोचते हैं कि लोकयुद्ध द्वारा आगे आने पर अब लोकयुद्ध के ऊपर ध्यान देना चाहिये न कि वैचारिक संघर्ष पर । यह बात किसी भी कोण से आए, ऐसी सोच मार्क्सवादी विज्ञान के खिलाफ है और साथ ही लोकयुद्ध के भी खिलाफ है । वास्तविकता यह है कि लोकयुद्ध खुद
सैद्धांतिक युद्ध की पैदावार है और लोकयुद्ध अपने विकास के लिये खुद बारीकी से, तेज, सख्त और विस्तृत सैद्धांतिक संघर्ष का तकाजा करता है । लोकयुद्ध सैद्धांतिक संघर्ष को रोकने की मांग नहीं करता, बल्कि अध्कि सक्रियता से इसमें शामिल होने की मांग करता है । मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद ने सर्वहारा क्रान्तिकारियों को प्रेरित किया है कि इस सच्चाई पर डटे रहें कि सैद्धांतिक संघर्ष से जितनी ज्यादा स्पष्टता आएगी तो उसी आयाम में लोकयुद्ध में ज्यादा विकास होगा ।
हमारे संदर्भ में यह सच है कि इस समय
सैद्धांतिक संघर्ष और अन्तर्विरोध् का प्रभाव उस स्तर पर नहीं जो लोकयुद्ध के पूर्व था । लेकिन लोकयुद्ध ने खुद नई और उच्चतर प्रकृति के अन्तर्विरोधें को जन्म दिया है । इनके समाधन के लिये उच्चतर स्तर का लोकयुद्ध संघर्ष अनिवार्य है ।
कुछ लोग
लोकयुद्ध द्वारा पैदा किये गये अन्तर्विरोधें को पहचानने की जरूरत को नहीं समझते और उनके हल के लिये नये स्तर की पहलकदमी लेना नहीं समझते । वे पुरानी बातों पर ही अड़े रहते हैं । ऐसा लगता है कि निरन्तर प्रयास पुराने अन्तर्विरोध्, समीकरण निकटस्थता आदि पर आधरित हैं, लोक युद्ध एक गुणात्मक छलांग है । इसने पुराने अन्तर्विरोधें, समीकरण, निकटस्थता और दूरी को नष्ट कर दिया है । एक प्रकार की सोच महान वास्तविकता को आत्मसात करने की उनकी अक्षमता से प्रकट होती है कि एक नई एकता लोक युद्ध के प्रति घनिष्टता और विश्वास के आधर पर हासिल हुई है । वास्तविकता यह है कि वे लोग जो अपने आपको क्रान्तिकारी के तौर पर पेश करते थे और शान्ति के समय हमारे निकट थे लोक युद्ध के शुरू होने के बाद उनका अवसरवाद सामने आ गया । लेकिन हजारों की संख्या में क्रान्तिकारी, जो हमारे खाते में नहीं थे और विगत के शान्तिपूर्ण दौर के राजनीतिक परिदृश्य में कम महत्त्व के लगते थे, लेकिन आज वास्तविक चरित्रा की भूमिका निभा रहे हैं । लोक युद्ध की लहर द्वारा विगत की टोलियों और समीकरणों को छिन्न-भिन्न कर दिया । आज नेपाली क्रान्तिकारियों से इतिहास ने यह आभास कराया है कि लोक युद्ध की नई बुनियाद और पृष्ठभूमि ने एक नई एकता को विकसित कर दिय है ।
इस स्थिति में जो लोग पुराने गुटों और समीकरण के आधर की सोच पर आगे बढ़ने की सोचते हैं, वह एक प्रतिगामी सोच है । क्रान्तिकारियों को चाहिये कि वे इस प्रतिगामी सोच के विरुद्ध दृढ़ता से संघर्ष करें, क्योंकि यह लोक युद्ध की महान उपलब्ध्यिों के खिलापफ है । यहां सिर्फ क्रान्तिकारियों और अवसरवादियों के बीच अन्तर का ही सवाल नहीं, यह लोक युद्ध द्वारा विकसित नई स्थिति के आधर पर क्रान्तिकारियों के बीच सम्बन्ध् का नवीकरण करने के लिये आवश्यक है । अगर दो क्रान्तिकारियों में से एक अपने आपको लोक युद्ध की जरूरत और परिणाम के अनुसार नहीं बदल सकता या अस्वीकार करता है तो सम्बन्ध् टूट जाता है, और अगर क्रान्तिकारी पुरानी निकटता के आधर पर सम्बन्ध् को कायम रखने के अनावश्यक प्रयास जारी रखता है तो भी वह क्रान्तिकारी नहीं रहता । चीजें नई गति और परिवर्तन की लहर में हैं । पुराने क्रान्तिकारी गति और बदलाव की लहर को पकड़ने के लिये अध्कि मेहनत से काम करें और बहुत बार नये क्रान्तिकारियों से भी अध्कि मेहनत से काम करें । अगर कोई अपने विगत के अच्छे कामों का लाभ उठाना चाहता है तो वह क्रान्ति और लोक युद्ध के लिये सहन करने वाली चीज नहीं होगी । युद्ध की जरूरत यह है कि पुरानों को नये कामरेडों की भावना को पकड़ने के प्रयास करने चाहिये और नये कामरेडों को पुरानों के अनुभवों से सीखना चाहिये । कुल मिला कर हर क्रान्तिकारी को नई एकता को नये स्तर पर कायम रखने के लिये निरन्तर सावधान रहना चाहिये । इसके लिये यह आवश्यक है कि सभी तरह के संकीर्णवादी, कठमुल्लावादी और सोच के अनुभववादी रूझानों के खिलापफ सैद्धांतिक संघर्ष को और बढ़ाया जाए ।

लोक युद्ध क्रान्तिकारी विचारों के तेज करने और उन्हें ठीक करने के वस्तुगत वातावरण को पैदा कर रहा है, मगर वह सोच जो लोक युद्ध खुद और अपने आप क्रान्तिकारी विचारों को विकसित करता है, वह द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी सोच होने के बजाय यन्त्रावत भौतिकवादी होती है । इस प्रकार की यन्त्रावत सोच कुछ लोगों में देखी जाती है । यह निश्चित है कि बड़ा बदलाव जो आज हमारी पार्टी में हो रहा है वह लोक युद्ध के बिना सम्भव नहीं । मगर इसका यह बिलकुल मतलब नहीं कि बिना सतर्क प्रयास से विचार ठीक किये जा सकते हैं । इसके साथ ही लोक युद्ध सैद्धांतिक प्रगति के लिये अध्कि चेतन प्रयासों का तकाजा करता है । यह एक इतिहास द्वारा प्रमाणित तथ्य है कि पार्टी, आंदोलन और सारे समाज में व्याप्त सामन्ती, पूंजीवादी और टटपूंजिया प्रवृत्तियों तथा परम्पराओं के खिलाफ संघर्ष लम्बा और गहरा होता जा रहा है । लोक युद्ध इस दिशा में पहला कदम है । लोक युद्ध को शुरू करने के दौर में हमने प्रयास किया था कि मार्क्स, लेनिन और माओ की विशेष महत्त्व की उन युक्तियों को स्थापित करें, जिनमें क्रान्तिकारी युद्ध के महत्त्व पर इसे सिर्फ दुश्मन से लड़ने और सत्ता छीनने के हथियार के तौर पर समझने पर जोर दिया गया है बल्कि भीतर से गंदगी बाहर करने के माध्यम के तौर पर भी । अगर लोक युद्ध को सिर्फ दुश्मन से लड़ने और सत्ता छीनने के उपकरण के तौर पर ही समझा जाता है तो हमारे अन्दर की गंदगी हटाई नहीं जाएगी । इस दशा में पहले तो दुश्मन को हराना और सत्ता छीनना मुमकिन नहीं, अगर किसी प्रकार राज्यसत्ता पर कब्जा कर लिया जाता है तो बाहरी दुश्मन के ऊपर जीत हासिल करने के पूर्व ही भीतरी के गंदगी पहले ही दुश्मन में विकसित हो गई होती है । जिन देशों में, जिनमें रूस चीन भी शामिल हैं प्रतिक्रान्ति की घटनाएँ घटी हैं, उन्होंने आज के क्रान्तिकारियों पर और अध्कि गम्भीर जिम्मेवारी डाल दी है । जिस किस्म के बीज हम आज बोतें हैं कल उसी तरह की फसल पाऐंगे ।

वर्ग संघर्ष की ऊंची अभिव्यक्ति के रूप में लोक युद्ध का विकसित होना सही है, मगर इसके साथ ही अगर पार्टी, आंदोलन और लोगों में मौजूद गंदगी को दूर करने के लिये एक वैज्ञानिक तरीका सतर्कता और युक्ति से आगे नहीं लाया जाता तो यह अध्ूरा ही होगा । इसका तरीका क्या है ? यह तरीका आन्तरिक संघर्ष का है जिसमें, विचार, विमर्श, आलोचना और आत्मालोचना शामिल है । दूसरे शब्दों में यह समस्त प्रकार की गैर-सर्वहारा प्रवृत्तियों के खिलापफ सैद्धांतिक संघर्ष निरन्तर चलाने का तरीका है ।

इस सम्बन्ध् में हमारी पार्टी समस्त क्रान्तिकारियों पर जोर देती आ रही है कि महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के संदेश को अपनी सोच और गतिविध्यिों का आरम्भिक बिंदू बनाये । यह इस ध्रती को शोषण विहीन और अत्याचार रहित बनाने और एक विकसित, वैज्ञानिक और आदर्श समाज बनाने की दिशा में मानव द्वारा सर्वहारा के नेतृत्त्व में हासिल एक बड़ा करिश्मा है । आज की दुनिया में इस करिश्में को ध्यान से देखे बिना क्रान्तिकारी आंदोलन की दिशा में एक कदम बढ़ना भी सम्भव नहीं । बहरहाल, रणनीति और कार्यनीति के दायरे की जरूरत है कि दुश्मन के खिलापफ लड़ाई लड़ने में एक क्रान्तिकारी को आज सांस्कृतिक क्रान्ति की जागरूकता को दृढ़ता से आत्मसात करना चाहिये और इसके भी आगे जाने के प्रयास करने चाहिये । देर या सवेर पार्टी और आंदोलन पर सर्वहारा प्रवृत्तियों की सोच हावी हो जाएगी, अगर आत्म-संघर्ष की प्रक्रिया निरन्तर बढ़ाने में नाकामी होती है । लोक युद्ध के द्वारा अपने आपको बदलने की उनकी कोशिशों से क्रान्तिकारियों को किस प्रकार क्रान्तिकारी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये ? इस सवाल पर गम्भीरता से सोचने की जरूरत है ।

सभी ऐतिहासिक शिक्षाओं से सांस्कृतिक क्रान्ति की महत्त्वपूर्ण शिक्षा यह है कि अपने व्यक्तिगत हित के खिलाफ लड़ो और संशोध्नवाद को कुचल दो । पार्टी तथा आंदोलन में संशोध्नवाद का मूल, व्यक्तिगत हित पर आधरित होता है । व्यक्तिगत हितों के असंख्य रूपों के खिलापफ निष्ठुर संघर्ष किये बिना संशोध्नवाद को कुचलना असम्भव है । अगर लोकयुद्ध के साथ-साथ भीतर का संघर्ष व्यक्तिगत हितों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के खिलाफ निरन्तर नहीं बढ़ाया जाता तो अन्त में पार्टी के यूएमएल की भान्ति बदलने के खतरे का पैदा होना जरूरी है । अगर एक जगह पर लोगों की छोड़ी हुई चिन्ता हमें परेशान करती है जिसमें हम शामिल हैं और अगर अध्कि चिन्ता व्यक्तिगत आत्म सम्मान की ओर जाती है और अगर यह सोच कि किसी के आये बिना ध्रती घूमना बंद कर देगी तो यही संशोध्नवाद है । यह सोचना गलत है कि लोक युद्ध में शामिल होने के बाद ऐसी सोच अपने आप खत्म हो जाएगी तो यह गलत है । इसके लिये एक निरन्तर सतर्कता से संघर्ष की लहर लाना अनिवार्य है । लोक युद्ध ने निश्चित तौर पर ऐसी वस्तुगत स्थिति बनाई हैं ।

वर्ग संघर्ष के दौर में यह होता रहा है कि नेतृत्त्व और सत्ता वैज्ञानिक, जनवादी, स्वतन्त्रा चिन्तक और प्रवर्तक के तौर पर कार्यकर्त्ताओं और लोगों को विकसित करने के बजाय, हजारों वर्षों से खामोश अनुयायी और दास विकसित करती आ रही है । सैद्धांतिक पर इसका विरोध् करने के बावजूद इसका प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर हमारी पार्टी के भीतर भी हो गया है । यहां बहुत सी मिसालें हैं जहां पार्टी और आंदोलन ने अपना रंग बदल दिया ज्योंही अवसरवाद नेतृत्त्व स्तर पर प्रकट हुआ । मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद और मुख्यतः महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति ने एक वैज्ञानिक समझ दे कर इस पेचीदगी को हल किया और नारा दिया फ्मुख्यालयों पर बम्बारीय् करो, और फ्लाल मोहरय् इसकी अभिव्यक्ति है । सांस्कृतिक क्रान्ति की महानता इसमें है कि क्रान्ति को जारी रखने के लिये एक वैज्ञानिक तरीका प्रदान किया ताकि राज्य और नेतृत्व पर नियन्त्राण रखने के लिये एक सक्षम शक्ति के तौर पर पूरी जनता और कार्यकर्त्ताओं को विकसित किया जाए । हमें चाहिये कि अपनी पार्टी, आंदोलन को लोक युद्ध के द्वारा विकसित करने पर जोर दें, क्षमता हो कि मुख्यालयों पर बम्बारी करें, राज्य सत्ता में समस्त जनता की स्वतन्त्रा और सक्रिय भागीदारी को बढ़ाएं, सारे कार्यकर्त्ताओं (कैडर) में गम्भीर और क्रान्तिकारी चेतना विकसित करें ताकि स्वतन्त्रा तौर पर नेतृत्त्व, में उभरने वाले अवसरवाद की लड़ाई लड़ें । पार्टी की मूल भावना के पीछे हमारा कहना है कि सांस्कृतिक क्रान्ति को आरम्भिक बिंदू बना कर हमें आगे बढ़ना चाहिये । नेता भले ही मर जाएं, नेता भले ही पतित हो जाएं, मगर यहां अगर क्रान्तिकारी उत्तराध्किारी विकसित करने की प्रक्रिया है तो क्रान्तिकारी आंदोलन आगे बढ़ेगा । यह भी सांस्कृतिक क्रान्ति का सारतत््व है ।

नेता, पार्टी और जनता के सम्बन्ध् में समस्त प्रतिक्रियावादी और संशोध्नवादी विचार के खिलाफ लड़ाई लड़ कर सर्वहारा में जागरूकता विकसित करने का सवाल
सैद्धांतिक संघर्ष का सवाल है । इस संदर्भ में यह आवश्यक है कि एक तरफ तानाशाही की, नौकरशाही की और दासता की मानसिकता के खिलापफ लड़ाई लड़ी जाए और दूसरी तरफ यह उतना ही आवश्यक है कि नेतृत्त्व और राज्य के महत्त्व और आवश्यकता को कमजोर बनाने की अराजकतावादी प्रवृत्ति से लड़ा जाए । यह जरूरी है कि नेता, पार्टी और जनता से सम्बन्ध्ति माओ के निम्नलिखित संश्लेषण को गहराई से समझा जाए-'मार्क्सवाद-लेनिनवाद इसे स्वीकार करता है कि इतिहास में नेता महान भूमिका निभाते हैं । लोगों और पार्टियों को नेताओं की जरूरत होती है । वे जो जनता के हित और आकांक्षा की अगुवाई करते हैं और ऐतिहासिक संघर्ष के आगे खड़े होते हैं वे लोगों की सेवा करने में सक्षम नेता हैं । मगर जब कोई पार्टी और राज्य का नेता जनता और पार्टी के ऊपर एक सदस्य के तौर पर अपने को समझना शुरू कर देता है तो वह अपने आप को जनता से दूर कर देता है और ज्ञान से अपने को वंचित कर देता है ।' इस स्थिति में, अगर कार्यकर्त्ताओं और लोगों की चेतना विकसित नहीं होती तो एक स्थिति आ जाती है जब पार्टी और आंदोलन को भारी हानि उठानी पड़ती है । इस सवाल पर क्रान्तिकारियों को आज से ही सतर्क होने की जरूरत है ।
संक्षेप में लोकयुद्ध दुश्मन के खिलाफ जीवन-मरण का संघर्ष है । लोक युद्ध को अपनी अन्तिम विजय तक सफलता से पहुंचाने और पार्टी को अपना रंग न बदलने की अनुमति देने, और इसके बाद क्रान्तिकारियों को आज से ही गम्भीरता से पहलकदमी उठानी चाहिये । इसके लिये उन्हें मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के वैज्ञानिक सिद्धांतों का गहराई से और अध्ययन करके उसे आत्मसात करना चाहिये और इसके लिये इस ज्ञान को वर्ग संघर्ष में व्यवहार में लाना चाहिये ।
सैद्धांतिक तौर पर कठमुल्लावाद और अनुभववाद के खिलाफ संघर्ष और अध्कि बारीकी और व्यापकता से चलाना चाहिये । जैसा कि माओ ने कहा है कि क्रान्तिकारियों को चाहिये कि वे पार्टी और क्रान्ति में जहरीले जीवाणुओं को ढूण्डने में तेज हों और मार्क्सवाद-लेनिनवाद को खुर्दबीन के तौर पर प्रयोग करके उनका नाश करें । लोक युद्ध की विजय अपरिहार्य है ।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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