हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारतीय अर्थव्यवस्था को छूत की बीमारी है

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/23/2008 08:53:00 PM

दुनिया के आर्थिक बाज़ारों में हलचल मची हुई हैंशेयर बाज़ार के चढाने और उतरने की खबरें आजकल काफी चर्चा में हैंइसके साथ ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संकट की चर्चा भे काफी जोरों पर हैंआख़िर यह संकट क्या हैं? इसकी वजह क्या हैं? और आम जनता और गरीब देशो के लिए इसका क्या मतलब हैं? सुष्मिता के आलेख की तीसरी और अन्तिम किस्त


हा जाता है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जब सर्दी लगती है तो एशियाई अर्थव्यवस्था को निमोनिया हो जाता है, लेकिन यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही निमोनिया हो जाये, तब हम एशियाई अर्थव्यवस्था की हालत का अनुमान भर लगा सकते हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में हलचल के बाद से ही भारतीय स्टॉक बाजार बुरी तरह परेशान है। शेयर बाजार में गिरने के रोज नये रिकॉर्ड बन रहे हैं। पहले से ही कहा जाता रहा है कि भारतीय शेयर बाजार की उछाल पूरी तरह बाहरी कारकों पर निर्भर है। बाहरी शेयर बाजारों में कम ब्याज दर एवं अपेक्षाकृत कम मुनापेफ ने विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारतीय शेयर बाजार की तरपफ आकर्षित किया। सब प्राइम बाजार के संकट ने भी इसमें मदद की। अकेले 22 से 27 सितंबर के पांच दिनों में 3.66 अरब डॉलर का रिकॉर्ड ध्न संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में लगाया। अक्तूबर महीने में भी 5 अरब डॉलर लगाये गये। इन सबने मिल कर भारतीय शेयर बाजार को गगनचुंबी बना दिया। 1992 से (इसी साल विदेशी संस्थागत निवेशकों को निवेश की अनुमति दी गयी। भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने लगभग 60 अरब डॉलर भारतीय शेयर बाजार में लगाये। इस तरह से ये विशालकाय विदेशी मुनाफाखोर शेयर बाजार की पूरी गतिविध्ि को नियंत्रिात कर रहे हैं।


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डॉलर के काफी कमजोर होने से रुपया डॉलर की तुलना में मजबूत हुआ है। इसके कारण निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। भारत के निर्यात का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका को जाता है। 2006-07 में भारत के कुल व्यापारिक निर्यात का 40 प्रतिशत सॉफ्रटवेयर एवं व्यापारिक सेवाएं थीं। इसका लगभग दो तिहाई अमेरिका को निर्यात किया जाता है। 2007 की तीसरी तिमाही में पिछले साल इसी दौर की तुलना में टेक्सटाइल उद्योग की
वृद्धि 33.5 प्रतिशत से गिर कर 1.2 प्रतिशत हो गयी। हैंडीक्राप्ट उद्योग इसी दौर में 5.2 प्रतिशत की वृद्धि से नकारात्मक 14.5 प्रतिशत तक गिर गया (1)। इसके अलावा व्यापार राज्यमंत्राी जयराम नरेश की सुनें तो डॉलर की तुलना में रुपये के मजबूत होने से निर्यात में कमी के कारण 20 लाख रोजगारों पर संकट आ गया है।
इसके अलावा दूसरी चिंता यह भी है कि महंगाई चरम पर है। मुद्रास्पफीति को नियंत्रिात करने के भारी उपायों के बावजूद यह साढ़े सात प्रतिशत तक पहुंच गयी है और इसमें और
वृद्धि की पर्याप्त गुंजाइश है। कृषि भयानक रूप से संकटग्रस्त है। एक तरफ जॉर्ज बुश अपनी अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए जनता को उपभोक्ता सामग्री पर खर्च करने की सलाह दे रहे हैं, वहीं चिदंबरम भारतीय जनता को अब महंगाई से निजात पाने के लिए दाल उगाने की सलाह दे रहे हैं। जाहिर तौर पर भारत के इस संकट का एक बड़ा कारण कृषि को नजरअंदाज किया जाना है। सरकार ने अपनी प्राथमिकताएं एग्रीकल्चर से हॉर्टिकल्चर में शिफ्रट कर ली हैं। इसके परिणामस्वरूप भारी पैमाने पर अनाजों के आयात में वृद्धि हुई है। विदेशी बाजारों में मंदी की वजह से इस बात की पर्याप्त गुंजाइश है कि उन बाजारों में घटती मांग की वजह से पिछड़े देशों के बाजारों को आयातित वस्तुओं से पाट दिया जाये। निर्यात में कमी और आयात में वृद्धि का उल्टा प्रभाव भी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसके अलावा दूसरा बड़ा संकट यह है कि 'स्टैगफ्रलेशन' के दौर में मुद्रास्फीति से निबटना भी बहुत जटिल होता है। यह एक ऐसी स्थिति होती है, जब बाजार में मुद्रास्फीति एवं ठहराव दोनों साथ-साथ मौजूद रहते हैं। पारंपरिक तरीके से अपनाये जानेवाले औजारों के जरिये रोजगार बचाने की प्रक्रिया, जहां मुद्रास्फीति बढ़ाती है, वहीं मुद्रास्फीति को नियंत्रिात करने की प्रक्रिया रोजगार को नुकसान पहुंचाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था भी इन जटिल परिस्थितियों में उलझी हुई है।
भयानक पैमाने पर विदेशी पूंजी ने तमाम क्षेत्राों को लगभग विदेशी हाथों में सौंप दिया है। भारत के कई बड़े बैंक विदेशी नियंत्राण में हैं। नव उदारवादी नीतियों के तहत कर रियायतों ने आय असमानता में भारी
वृद्धि की है। एशिया में सबसे ज्यादा अरबपतियों की संख्या भारत में है। इस हद तक बाहरी हाथों में भारतीय अर्थव्यवस्था के नियंत्राण से यह बाहरी उथल-पुथल से बुरी तरह प्रभावित होगी। हालांकि यह भी सच है कि भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के बने रहने की गुंजाइश है। इसका कारण यह है कि विदेशी बाजारों में अब अतिरेक के लिए मुनाफाकारी बाजार की कमी के कारण अब भी भारतीय शेयर बाजार अपेक्षाकृत मुनाफाकारी है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की लूट में और वृद्धि करेगी।

आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है?
'नुकसान का बोझ अंततः छोटे निवेशकर्ताओं, मजदूरों एवं उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। व्यवस्था के इतिहास में ऐसे घटनाक्रमों का अंततः पटाक्षेप राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर आर्थिक एवं वित्तीय संकेंद्रण के
वृद्धि के रूप में सामने आयेगा'। (2) दुनिया की अर्थव्यवस्था का यह संकट भयावह है, लेकिन इसका कष्ट भी व्यापक हद तक गरीब देशों को ही उठाना पड़ता है। वैश्वीकरण के इस दौर में अपने बाजार के लिए मुनाफाकारी जमीन की अनुपस्थिति में यह भयानक तरीके से गरीब देशों में लूट मचाता है। अमेरिका में इतने ज्यादा संकट के बावजूद सबसे ज्यादा अरबपतियों की संख्या है। गरीब देशों में बढ़ती साम्राज्यवादी लूट व घटते सार्वजनिक खर्चों से आम जनता की जिंदगी और ज्यादा दयनीय होती जायेगी। भयानक पैमाने पर छंटनी का दौर चलेगा। इससे बाजार में मांग में और कमी होगी एवं यह पूरे अर्थतंत्रा को और झकझोर देगा। इससे निकलने के लिए साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा युद्ध खचोर्ं में और वृद्धि की जायेगी एवं बड़े पैमाने पर जनसंहार अभियान चलाये जायेंगे। इस संकट के दौर में बढ़ते जनसंघषोर्ं को कुचलने के लिए राजसत्ता और बर्बर होगी तथा ज्यादा से ज्यादा फासीवादी तरीकों का इस्तेमाल किया जायेगा। लेकिन हमें अक्सर यह ध्यान रखना चाहिए कि यह संकट निरपेक्ष भी नहीं है जैसा कि लेनिन ने 1920 में कोमिंटर्न के दूसरे अध्विेशन में संकेत किया था-
'एक निरपेक्ष निराशाजनक स्थिति जैसा कुछ नहीं है। पूंजीपति उस घमंडी लुटेरे की तरह व्यवहार कर रहा है, जिसके पास अपना सिर न हो, वह गलती पर गलती किये जा रहा है तथा स्थिति को और अध्कि तीव्र तथा अपने विनाश को और अध्कि तेज कर रहा है। यह सब सत्य है। परंतु यह 'साबित' नहीं किया जा सकता है कि शोषितों के छोटे हिस्से को किसी प्रकार की कटौतियां देकर उनका मुंह बंद करने का या शोषितों तथा दलितों के एक या दूसरे हिस्से के किसी आंदोलन या उभार को दबाने का कोई मौका नहीं है। पहले से यह साबित करने का यह प्रयत्न करना कि स्थिति 'निरपेक्ष' रूप से निराशाजनक है, निरा ज्ञान बघारना होगा या धरणाओं और आम प्रयोग में आनेवाली उक्तियों के साथ खेलना होगा। इसमें और इसी तरह के सवालों में एकमात्रा वास्तविक 'सबूत' व्यवहार है। विश्व भर में पूंजीवादी तंत्र एक अत्यध्कि गहरे क्रांतिकारी संकट का सामना कर रहा है। क्रांतिकारी पार्टियों को अपनी व्यावहारिक कार्रवाइयों द्वारा अब यह 'साबित' करना चाहिए कि वे काफी
बुद्धिमान और काफी संगठित व शोषित जनता के संपर्क में हैं, वे पर्याप्त इरादे के पक्के निपुण हैं ताकि इस संकट का सफल व विजयी क्रांति के लिए इस्तेमाल कर सकें।'(3)
मतलब स्पष्ट है कि साम्राज्यवाद के पास संकट को टालने के कई रास्ते हैं। इसलिए क्रांतिकारी ताकतों को सचेतन रूप से जनता को तैयार करने व पहलकदमी लेने की तैयारी करनी चाहिए। आज साम्राज्यवाद महामंदी के बाद के सबसे गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। जनता भयानक विषम परिस्थितियों में जीते हुए भी इससे निकलने के लिए विकल्प की तलाश करती है और भारी पैमाने पर संघषोर्ं में गोलबंद होती है। लेनिन के शब्दों में, जरूरत इस बात की है कि क्रांतिकारी ताकतें अपनी
बुद्धिमानी से जनता को सचेतन रूप से दुर्ग द्वार पर दस्तक देने के लिए तैयार करें, चूंकि अंततः साम्राज्यवाद एक कागजी बाघ ही है। यह मरणासन्न है, जबकि जनता दीर्घजीवी है।

स्रोत व संदर्भ
1. आर्थिक सर्वेक्षण, 2007-08
2. मंथली रिव्यू, अप्रैल, 2008
3. संकलित रचनाएं, लेनिन, खंड-25

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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