हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अमेरिकी अर्थव्यवस्था को निमोनिया हो गया है

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/22/2008 05:10:00 PM

दुनिया के आर्थिक बाज़ारों में हलचल मची हुई हैंशेयर बाज़ार के चढाने और उतरने की खबरें आजकल काफी चर्चा में हैंइसके साथ ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संकट की चर्चा भे काफी जोरों पर हैंआख़िर यह संकट क्या हैं? इसकी वजह क्या हैं? और आम जनता और गरीब देशो के लिए इसका क्या मतलब हैं? पूरा सन्दर्भ तीन किश्तों में बता रही हैं सुष्मिता।

आज यह बात सर्वमान्य रूप से स्वीकार की जा रही है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार हो चुकी है। अमेरिकी श्रम विभाग द्वारा जारी आंकड़ों पर नजर डालें तो निजी क्षेत्राों में अकेले मार्च महीने में ८३,००० नौकरियां चली गयीं। पिछले तीन महीनों में यह आंकड़ा कुल २,३२,००० तक पहुंच गया है। रोजगार का यह संकट महामंदी के बाद सबसे अध्कि है। नवंबर, २००७ से अब तक निजी क्षेत्राों में कार्यरत ३,००,००० लोगों ने अपनी नौकरियां गवां दीं। मार्च में बेरोजगारी की दर ४.८ प्रतिशत से बढ़ कर ५.१ प्रतिशत हो गयी है। अमेरिका में तमाम स्टॉक पर खरीद बिव्रफी में पफरवरी से पिछले पांच महीनों से भी कम में लगभग तीस खरब डॉलर का नुकसान हुआ है।

नौकरियों के जाने से सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह मॉरगेट्ज, व्रेफडिट कार्ड एवं दूसरे अन्य उपभोक्ता कर्जों पर और ज्यादा ÷डिपफाल्टर' होने के दौर को आगे बढ़ायेगी एवं पिछले ८ महीने से जारी सब प्राइम मॉरगेट्ज के संकट को और बढ़ा देगी। एक अनुमान के अनुसार मॉरगेट्ज संकट से बैंकों को लगभग ४०० अरब डॉलर का नुकसान होगा, हालांकि एक अन्य सर्वेक्षण इसके ६०० अरब डॉलर तक पहूंचने की भविष्यवाणी करता है। अब तक बैंकों ने मात्रा १२० अरब डॉलर के कर्जों को ही 'राइट ऑपफ' किया है, जबकि बाकी के २८० या फिर ४८० अरब डॉलर के नुकसान का अब भी हिसाब बाकी है। कॉमर्स डिपार्टमेंट की सुनें तो जनवरी में कारखानों को मिलनेवाले ऑर्डर में २.५ प्रतिशत की गिरावट हुई है, वहीं ड्यूरेबल गुड््‌स (अध्कि समय तक चलनेवाले जैसे-फर्नीचर) की मांग ५० प्रतिशत तक गिर गयी है। इस संकट से निबटने के लिए जॉर्ज बुश ने १५० बिलियन डॉलर के एक पैकेज की घोषणा की है, जिसमें व्यक्तियों एवं व्यवसायों के लिए कर रियायतें दी गयी हैं। जॉर्ज बुश ने अपनी जनता से यह भी आग्रह किया कि इन रियायतों को पाने के बाद वे इसे उपभोक्ता सामग्री पर खर्च करें। हालांकि सर्वेक्षण कहते हैं कि लोग उपभोक्ता सामग्री पर खर्च करने के बजाय इन रियायतों का इस्तेमाल सबसे पहले बकायों का भुगतान करने में करेंगे। फाइनेंसियल टाइम्स के अनुसार २००८-०९ में उपभोक्ता खर्चों में लगभग ३६० अरब डॉलर की गिरावट होगी।
वित्तीय उथल-पुथल को नियंत्रिात करने के लिए फेडरल रिजर्व ने व्रेफडिट बाजार में करोड़ों डॉलर लगाने, मॉरगेट््‌ज समर्थित सिक्योरिटी को अपने बैलेंस सीट में लेने जैसे कई कदम उठाये हैं, लेकिन इसका उलटा ही प्रभाव हुआ है और लोगों का अर्थव्यवस्था में विश्वास डावांडोल हो रहा है। दिवालियेपन की कगार पर पहुंच गये बियर स्टर्नस के जेपी मॉर्गन चेज द्वारा अध्ग्रिहण में पेफडरल द्वारा दी गयी गारंटी में हम इसकी झलक सकते हैं। हालांकि बियर स्टनर्स पिछले साल सिक्योरिटीज को छोड़नेवाला 18 वां बड़ा बैंक था। मतलब यह तो बस दिवालियेपन की शुरुआत भर है। भारी पैमाने पर नौकरियों का नुकसान इस चव्रफीय संकट को और तेज कर देगा। कारण यह होगा कि नौकरियों के जाने से बाजार में खरीददारों की संख्या और घटेगी एवं िफर इसका उलटा प्रभाव पड़ेगा।
9 अप्रैल को प्रकाशित 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' में आइएमएफ ने इस साल एवं अगले साल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में वृद्धि के अपने पूर्वानुमानों में कमी की है। अब यह इस साल की हरेक तिमाही में जीडीपी के सिकुड़ने की भविष्यवाणी करता है और चौथी तिमाही में अर्थव्यवस्था के पिछले साल की तुलना में ०.7 प्रतिशत सिकुड़ने की बात कहता है। ;केवल तीन महीने पहले इसने ०.9 प्रतिशत वृद्धि की बात कही थी(१)। हाल का संकट कापफी व्यापक है। इसके कई कारण हैं। इस संकट का केंद्र खुद अमेरिका है। इसके अलावा सब प्राइम बाजार के संकट ने पूरे अमेरिकी पूंजी बाजार को ग्रसित कर लिया है। इस प्रकार इसके परिणाम कापफी भयावह हैं। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि सटट्ेबाजी के जरिये भारी मुनाफा कमाने की प्रक्रिया से आय असमानता में काफी वृद्धि हुई है। इंटरनल रेवेन्यू सर्विस (आइआरएस) के आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे अमीर 1 प्रतिशत अमेरिकियों के पास २००६ में कुल आय का २२ प्रतिशत था। मंदी के भयानक दौर, १९२८ में यह आंकड़ा ठीक यही था। बहुमत अमेरिकियों के आय में या तो ठहराव है या िफर गिरावट है। नीचे के 50 प्रतिशत अमेरिकियों की आय में हिस्सेदारी 2004 में 13.4 प्रतिशत थी, जो गिर कर 2005 में 12.8 प्रतिशत पहुंच गयी। इस आय के अमीरों के हाथों में केंद्रीकरण की बड़ी वजह निगमों एवं अमीरों को दिये जानेवाले करों में छूट तथा भारी पैमाने पर सट ट्ठेबाजी है। बुश के पहले कार्यकाल में लगभग 40 खरब डॉलर की करों में कटौती की गयी, जिसका 80 प्रतिशत हिस्सा अमीर घरानों और निगमों को मिला। दूसरे कार्यकाल में भी लगभग 10 खरब डॉलर की कर रियायतें दी गयीं। रोजगार में लगातार कटौती जारी है। पूर्णकालिक एवं स्थायी रोजगार अब अंशकालिक एवं अस्थायी रोजगार में बदले जा रहे हैं । लाखों की संख्या में उच्च वेतनवाले पद समाप्त किये जा रहे हैं। 'निजी क्षेत्राों में इस साल मार्च तक मजदूरी में वृद्धि दर 3.6 प्रतिशत थी, वहीं इसी दौर में मुद्रास्पफीति 4 प्रतिशत है। अर्थात बहुमत जनता की आय में गिरावट है'।() सब प्राइम संकट रोजगार के इस संकट को और बढ़ा देगा।
अमीरों के पास आय के केंद्रीकरण ने सट ट्ठेबाजी की पूरी प्रव्रिफया में भारी वृद्धि कर दी। ज्यादा से ज्यादा निवेश सटट्ेबाजी की तरपफ चला गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के पहले दौर में, जहां निर्माण उद्योग प्रभावी था, वहीं दूसरे आध्े दौर में तमाम क्षेत्राों का भारी मात्रा में सट ट्ठेबाजीकरण हो गया है। इस प्रकार पूरी अर्थव्यवस्था ताश के पतों के महल के समान खड़ी है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भारी रूप से लकवाग्रस्त हो गयी है एवं इसके परिणाम कापफी दूरगामी हैं। डॉलर की लगातार अन्य मुद्राओं की तुलना में गिरावट न केवल मुद्रास्फीति को बढ़ा रहा है, बल्कि अमेरिकी वित्तीय बाजार को बनाये रखने के लिए आवश्यक 2 अरब डॉलर प्रतिदिन के विदेशी पूंजी के आगमन को भी प्रभावित कर रहा है। इस प्रकार अमेरिकी अर्थव्यवस्था चौतरफा बुरी तरह फंस गयी है।
हालांकि यह संकट कोई अप्रत्याशित नहीं है। सच तो यह है कि 1930 की मंदी कभी समाप्त ही नहीं हुई थी, बल्कि उसे युद्ध अर्थव्यवस्था और एक हद तक कीन्सीय नुस्खों के जरिये कुछ साल के लिए टाल दिया गया था। लेकिन हरेक आनेवाला संकट पिछले टाले गये संकट से अध्कि जटिल और भयावह होता है। 1970 से िफर यह संकट मुखर होने लगा, जिसको टालने के लिए रोज नये नुस्खे तलाशे जाते रहे। 1990 के दशक में दुनिया का बड़ा बाजार हासिल करने के बाद भी इसके संकटों का कोई अंत नहीं था। 1998-2008 के बीच पेफडरल रिजर्व ने सटट्ेबाजी बुलबुले के फटने के बाद िफर नया बुलबुला शुरू किया। एलेन ग्रीनस्पेन ( फेड गवर्नरद्) के नेतृत्व में फेडरल रिजर्व ने तरलता संकट और व्रेफडिट अनुपलब्ध्ता को समाप्त करने के लिए पूंजी बाजार में ध्न लगा कर बुलबुलों की श्रृंखला स्थापित की। 1998 में पूर्वी एशियाई देशों के संकट के बाद पेफडरल रिजर्व ने अपने ब्याज दरों में भारी कटौती कर इंटरनेट बुलबुला खड़ा किया। 2001 में इसके ध्राशायी होने के बाद िफर इसको टालने के लिए हाउसिंग बुलबुला शुरू किया गया, जो पुनः 2007 में ध्राशायी हो गया। आइएमएपफ के अनुसार इस बात की 25 प्रतिशत संभावना है कि विश्व की अर्थव्यवस्था 2008-09 के बीच 3 प्रतिशत से कम दर से आगे बढ़ेगी। यह मंदी के लगभग समतुल्य है।(३)
'भारी पैमाने पर गैर आवासीय स्थायी निजी निवेशों (सैनिक संबंध्ी खर्चे शामिल) ने १९६० के दशक में गोल्डेन एज' को निर्मित किया व बनाये रखा। इन निवेशों में कमी (जीडीपी के प्रतिशत के रूप में) से ७० के शुरुआती दशक में (७० के दशक के अंतिम छोटे भाग, ८० के शुरुआती व ९० के दशक के उतरार्ध् में) यह साफ हो गया कि अर्थव्यवस्था अब खुद के उत्पादित निवेश योग्य अतिरिक्त को खपा पाने में अयोग्य है एवं इस प्रकार इसने माल व सेवाओं की वास्तविक अर्थव्यवस्था में गहराते ठहराव को स्पष्ट कर दिया।'(४) एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अपनी वृद्धि दर को निरंतर बनाये रखने के लिए अपने अतिरिक्त उत्पादन की मांग के लिए नये स्रोतों को तलाशना होता है। एक समय ऐसा आता है, जब नये उत्पादित अतिरिक्त के निवेश के लिए मुनाफे की स्थिति नहीं रह जाती। ऐसे में वह मुनाफे के लिए निवेश के नये क्षेत्र तलाशता है। इसमें वह नये बाजारों तक अपनी पहुंच बनाता है, लेकिन एक हद के बाद इसमें होड़ तथा और अध्कि अतिरेक के कारण अब और ज्यादा क्षेत्राों की जरूरत पड़ती है। इन्हीं मुनाफाकारी क्षेत्राों की तलाश के बतौर बाजार का भयानक स्तर पर वित्तीयकरण किया गया। इसे 1970 के दशक में आये ठहराव के हल के बतौर इस्तेमाल किया गया, चूंकि अब उत्पादक गतिविध्यिों को और ज्यादा बढ़ाना संभव नहीं था। मतलब निर्माण उद्योग अपनी क्षमता का ही पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था, इसलिए अब इसमें निवेश करना खास मुनाफाकारी नहीं रह गया था। '१९७२-२००७ के दौर में निर्माण उद्योग अपनी क्षमता का महज ७९.८ प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पा रहा है। (१९६०-६९ के बीच यह ८५ प्रतिशत था)।'(५) हाल के वषोर्ं में अर्थव्यवस्था के 'वित्तीयकरण के अलावा सैनिक खचोर्ं ने अर्थव्यवस्था को मुख्य रूप से प्रोत्साहित किया। वित्तीय वर्ष, २००८ के लिए सुरक्षा विभाग के योजनागत खर्चे तमाम दूसरे राष्ट्रों के कुल सैनिक बजट से अध्कि हैें। इसके अलावा आध्किारिक सुरक्षा बजट से अलग इराक व अपफगानिस्तान में जारी युद्ध के भुगतान के लिए पूरक बजट रूस व चीन के संयुक्त सैनिक बजट के बराबर है। वित्तीय वर्ष, २००८ में सुरक्षा से संबंध्ति खर्चे इतिहास में पहली बार १० खरब डॉलर को पार कर जायेंगे।' (६ )
दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था के साथ यह संकट जुड़ी हुई है, जिसकी चर्चा मार्क्स ने की है। बेरोक-टोक उत्पादन एवं मुनापेफ की भूख पूरी उत्पादन प्रक्रिया को ज्यादा से ज्यादा अस्थिर बना देती है। इसके अलावा पूंजीवाद में उत्पादन की सामूहिक प्रव्रिफया एवं व्यक्तिगत मालिकाने के बीच अंतर्विरोध् इसके संकट को और लगातार बढ़ाता जाता है। इसका कारण यह है कि बहुमत जनता की आय में कमी एवं शोषण से मांग में लगातार गिरावट होती है एवं पूरे आर्थिक तंत्र को चलाना मुश्किल हो जाता है। मतलब कि बाजार में मांग में और कमी होती है एवं यह संकट को और गहराता जाता है। इसके साथ ही औद्योगिक उत्पादन के विकास में कमी से अब यह उतना मुनाफाकारी नहीं रह जाता, इसलिए शेयर बाजार, ऋण बाजार एवं अन्य ऐसे ही क्षेत्रों में भारी राशि का जोखिम भरे और सटट्ेबाज वित्तीय पूंजी के रूप में निवेश होता है। असली उत्पादन प्रक्रिया कम है, जबकि सटट्ेबाज को भारी मुनाफा मिलता है, इसलिए एक समय के बाद सटट्ेबाजी का यह पूरा बाजार ढह जाता है और िफर यह वास्तविक अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचाता है। इसी संकट से अमेरिका ग्रसित है।

कल पढिये भारतीय अर्थव्यवस्था भी छूत की बीमारी से ग्रसित है

स्रोत व संदर्भ
१. द इकोनॉमिस्ट, अप्रैल, २००८
२. वही
३. वही
४. मंथली रिव्यू, अप्रैल, २००८
५. वही
६. वही

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को निमोनिया हो गया है ”

  2. By प्रभाकर पाण्डेय on April 22, 2008 at 5:42 PM

    अच्छी जानकारी। साधुवाद।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें