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बीच सफ़हे की लड़ाई

क्या थे गांधी के वे परिवर्तित-परिमार्जित विचार

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/20/2008 06:25:00 PM

भाई अतुल,

जाति-वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में आपने गांधी के बदलते विचारों की बात की है. लेकिन क्या थे वे परिवर्तित-परिमार्जित विचार? गांधी में जातियों-वर्णों की मौजूदगी, उनकी उत्पत्ति और भविष्य में उनकी भूमिका को लेकर क्या बदलाव आए? जाति या समुदाय दलित है, वंचित है और यहां तक कि अछूत है तो क्या इसका ऐतिहासिक कारण यह नहीं है कि उसका उत्पादन के किसी साधन पर कोई अधिकार नहीं है? कि एक खास जाति (/जातियों) को ही पूंजी और उत्पादन के साधनों पर अधिकार रखने का अधिकार है और उनके लिए बहुत हद तक श्रम करना भी निषिद्ध है? और उनके जीने के लिए जरूरी श्रम भी वे जातियां करती हैं, जिन्हें उत्पादन के साधनों पर कोई अधिकार नहीं करने दिया जाता है और उन्हें वंचित रखा जाता है?
गांधी ने उत्पादन के इन साधनों के दलितों-वंचितों के हाथों में जाने के बारे में अपने नज़रिये को कितना परिमार्जित किया था? जब वे वर्ण और जाति व्यवस्था को निर्मित करनेवाले समाज की इतनी तारीफ करते हैं तो उसका क्या आधार है? क्या इस पर कभी उनका परिवर्तित विचार और योजना सामने आयी?
गांधी ने अछूतों के मंदिर प्रवेश तक की कोशिशों पर कुटिलता की हद तक जाकर इसका विरोध किया है और बार-बार झूठ बोला है (सत्य के महान प्रयोगकर्ता ! )।

मंत्री बनानेवाली घटना में गांधी की पंक्तियां एकदम स्पष्ट हैं और उसकी मूल दृष्टि अगर कोई और है तो यह गांधी को चाहिए था कि वे अपनी भाषा को अपनी मूल दृष्टि के निकट रखते.


आपने गांधी पर और भी कई बातें कही हैं. थोडा उन पर भी. अहिंसा अगर आपको कामयाब दिखती है तो मुझे नहीं पता कि आप चीजों को कैसे देखते हैं. आप सिर्फ एक उदाहरण बता दीजिए, जिसमें अहिंसा ने किसी भी निरंकुश सत्ता का मुकाबला किया हो और अपने उद्देश्यों में सफल रही हो. और आप जिसे सारी दुनिया कह रहे हैं, उसमें माफ कीजिएगा, दुनिया की एक बेहद छोटी आबादी शामिल है. बल्कि सारी दुनिया की उत्पीडित जनता अपनी निरंकुश (नहीं, उनका मुकाबला निरंकुश सत्ताओं से नहीं है, बल्कि सत्ताओं से ही है, क्योंकि वे शोषण को कानूनी आधार प्रदान करती हैं और शोषकों के हित में जनता का दमन करती हैं) सत्ताओं से लड रही है और इसमें वे हर वह तरीका इस्तेमाल कर रही हैं, जो उनके इस संघर्ष में उन्हें विजय दिला सके. ऐसे में, जबकि दुनिया में हर कहीं शासक वर्ग लगातार और अधिक सैन्यीकृत और मजबूत होता जा रहा है, सिर्फ अहिंसा की बातें करने का मतलब एकमात्र यही हो सकता है कि आप किसी न किसी रूप में यथास्थिति बनाये रखना चाहते हैं, शोषण को जारी रखना चाहते हैं और यह नहीं चाहते कि इस शोषण का खात्मा कर दिया जाये जो दुनिया में विपन्नता और गरीबी का एकमात्र कारण है. आप असल में यह चाहते हैं कि हिंसा करने का अधिकार सिर्फ समाज के 20 प्रतिशत लोगों को हो और 80 प्रतिशत लोग, हर तरह का दुख झेलें लेकिन हिंसा न करें.

हिंसा-अहिंसा की बहस असल में वे लोग करते हैं, जो संघर्षों को मूल मुद्दे से भटकाने की मंशा रखते हैं. जो लोग संघर्ष के खिलाफ लड रहे हैं, वे इस बहस में पडते ही नहीं है, बल्कि वे लडते है और हर संभव तरीके से लडते हैं.
आप देखिए कि गांधी का नाम सबसे अधिक कौन ले रहा है। संयुक्त राष्ट्र जैसी साम्राज्यवाद की जेबी संस्था, जो बाजार की तलाश में निकले साम्राज्यवादी देशों द्वारा गरीब मुल्कों पर हमलों को या तो वैध ठहराने के लिए है या उन पर सीधे हमला करने के लिए या ऐसी ही कार्रवाइयों के लिए. गांधी की तारीफ में सबसे अधिक वे ही लोग लगे हैं जो सबसे अधिक हिंसा कर रहे हैं.

आपने गांधी के सोच को वैज्ञानिक कहा हैं। पता नहीं, समाज के विकास चक्र को पीछे ले जाना, एक तरह से अतीत में ले जाने की योजना किस तरह वैज्ञानिक हो सकती हैं। और ब्रह्मचारी के प्रयोग और दूसरे ऐसे ही आडम्बरों से भरे प्रयोगों में पता नहीं कौन सा विज्ञान छिपा हुआ था।
लेनिन ने कहा था कि जनता जब तक व्यक्तियों, बातों और घटनाओं का वर्ग हित नहीं पहचानना सीखती, तब तक ठगी जायेगी (उनकी पंक्तियां ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन कहने का उनका मतलब यही था). हर अच्छी और शानदार लगनेवाली चीज हमारे हित में ही हो, जरूरी नहीं. गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह जैसी बातें शानदार भले लगती हों, वे व्यापक जनता के वर्गीय हित के विरुद्ध हैं. वे काफी हद तक उन्हें भटकाने के लिए भी हैं. ऐसे में गांधी के प्रति 'घृणा की आग में जलना' ऐसी बात नहीं है कि इस पर शर्म किया जाये.


और अंत में
कम्युनिस्टों के साथ संघियों को रख कर आपने सिर्फ यह साबित किया है कि आप न तो कम्युनिज्म की कोई समझ रखते हैं और न संघ की.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ क्या थे गांधी के वे परिवर्तित-परिमार्जित विचार ”

  2. By चन्द्रिका on April 20, 2008 at 8:35 PM

    गांधी को लेकर धेर सारे प्रश्न है?और उनकी लोगों ने अपने तरह से व्याख्या भी की है .पर मूलतः हमे जब किसी को देखते है किसी का मूल्यांकन करते है तो एक स्म्पूर्णता में करते है उसके पूरे जीवन काल को देखते है ? चाहे वह तुलसी का हो गांधी का हो या फिर अम्बेड्कर का या भगत सिंह का .इस नजरिये के साथ गांधी का मूल्यांकन किया जाना चाहिये.और जो सबसे महत्वपूर्ण बात मुझे लगती है वह यह है कि किसी का मूल्यांकन ही हम क्यों करते है यानि किसी व्यक्ति का या किसी समय का जिसे इतिहास कहा जाता है शायद इसलिये कि हम उससे कुच्ह सीख सकें.और भविष्य निर्माण में उसका समायोजन करें . इस नजरिये से देखे तो गांधी आज किसके साथ है क्या उस आखिरी आदमी के साथ जिसकी वे वकालत करते थे .पंक्ति का आखिरी आदमी कह कर या फिर उनके साथ जो पहले से गांधी के साथ थे और जिन्हे गांधी की आजादी का मुकाम पता था यानि बजाज और देश के तमाम पूजी पति गाधी को हर पल इसलिये कंधे पर नही बैठाये रहते थे कि गांधी देश को आजाद करेगे और देश की पंक्ति का आखिरी आदमी आजाद हो जायेगा.उन्हे पता था कि गांधी की आजादी ही बज़ाज़ की आजादी है बिडला की आज़ादी है जैसा आज हो रहा है गांधी ने यद्यपि किसी मुकम्मल व्यवस्था का सिद्धान्त नहीं दिया पर गांधी के ट्र्स्टी शिप को ले जो आज पूर्णतः (एन.जी.ऒ.)यानि साम्राज्यवादी व्यवस्था के कवच के रूप में काम कर रहा है वाकई में रेयाज के शब्दों में कहे तो यथास्थिति को बनाये रखने में गांधी का अश्त्र आज सबसे कार्गर तरीका है शायद यही कारण है कि गांधी को आज दुनिया के लेबल पर उछाला जा रहा है मै महत्मा गांधी अन्तर्राष्टीय हिन्दी विश्व विद्यालय का छात्र हूं मै देखता हू कि गांधी के नाम पर पता नही किस किस देश के लोग आते रहते है और हम लोगो को बताते है कि आज एक मात्र रास्ता गांधीवाद ही है और मै भी मानता हूं पर वह किसके लिये एक मात्र है उन लूट्ने ब्वालों के लिये जो दुनिया में लूट रहे है और यथा स्थिति बना कर और दिनों तक लूट्ना चाहते हैं. और अतुल जी जब सत्ता किसी व्यक्ति को महिमामंडित कर रही हो उसको ज्यादा प्रासंगिक बना रही हो तो समझ लीजिये कि कुछ गड्बडी जरूर है . और जब बात अहिंसा की होती है तो मुझे गांधी की अहिंसा बडी उल्टी पुल्टी लगती है उसकी व्याख्या मुझे नहीं मिली है अगर रेयाज़ को या अतुल को मिले तो मुझ तक पहुचाये बडी खुशी होगी .क्योंकि गाधी के नजर में हिंसा का अर्थ क्या रक्त बहने से था....वर्ना ट्र्स्टी शिप अपने गहरायी में हिंसा के द्वारा कमायी पूंजी का ही एक सिद्धान्त है जगह कम है और लिखने की स्पीड धीमी नहीं तो मै जरूर विस्तार से लिखता .....फिर जो गीता गांधी के लिये शुरू से अंत तक प्रिय रही (इसमे विचरों का परिमार्जन नहीं हुआ है) वह मूलतः हिंसा पर आधारित है यानि क्रिश्न कुछ भी कहते है सही या गलत तो इसलिये कि अर्जुन तुम अपने भाईयों का बध करो यानि हिंसा करो. अब अगर गांधी इसके अलग-अलग श्लोक को अलग अलग रूप में लेते है तो शयद उनके रचना पढ्ने की कमजोरी हो वर्ना सम्पूर्णता में गीता हिंसा के कराने के लिये और एक बडी हिंसा कराने के लिये लिखी गयी किताब है.खन्ड खन्ड में हम किसी चीज को जब देखते है तो बडा घालमेल होता है .जितने बापू है वे कहते है जनता का कल्याण हो सभी सत्य बोलो पर ये सब कह कर जो एक क्रन्तिकारी बात है सत्य बोलना भी ,वे हमे ले कहां जाना चाहते है धर्म में किसी दवा पानी के रोजगार में......गांधी के बिचार हमारे लिये जरूरी हैं गांधी क्या थे यह भी जरूरी है ऎतिहासिक नजरिये से पर वह ले कहा जा रहा है यह भी देखना जरूरी है क्या आम जन की उसमें मुक्ति है?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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