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बीच सफ़हे की लड़ाई

... फिर गांधी जी चोरों के इतने हिमायती क्यों थे अतुल जी

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/16/2008 08:28:00 PM

अतुल said...

गीता के उस श्लोक के बारे में आपका क्या कहना है जिसका अनुवाद गांधी को पसद था कि बिनु श्रम खाए चोर कहाए.


भाई अतुल,
बहुत खुशी होती अगर गांधी वास्तव में यही मानते होते. लेकिन उन्होंने समय-समय पर जो लिखा उससे यह साबित नहीं होता. वे न सिर्फ इस जाति व्यवस्था (वास्तव में वर्ण व्यवस्था, जो कि इस जाति व्यवस्था का मूलाधार है) को बनाये रखने के पक्षधर थे, बल्कि इसे और मजबूत करना चाहते थे. और यह जाति व्यवस्था, और कुछ नहीं है सिवाय इसके कि इसमें कुछ लोगों को अपनी जीविका के लिए कुछ भी नहीं करना होता-जीवित रहने के लिए जरूरी श्रम भी नहीं, बल्कि वे तो ग्रंथों में उनके लिए निषिद्ध तक हैं-और शेष लोगों को जीवन भर श्रम करना पडता है, अपने हिस्से का भी और उनके हिस्से का भी जो कोई श्रम नहीं करते. और उनके हिस्से का यह श्रम सिर्फ जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने भर का ही नहीं होता, बल्कि जो श्रम नहीं कर रहे होते हैं उनके लिए विलासिता की सामग्री जुटाने के लिए भी होता है, संचय के लिए भी होता है. यह सीधे तौर पर श्रम का शोषण है और निस्संदेह गांधी इसके हिमायती थे. इसी के साथ, उन्होंने अनेक बार उन सुधारात्मक कार्यों की भी खुले तौर पर-और कई बात घृणास्पद रूप में छुपे तौर पर, षडंत्रपूर्ण तरीके से-मुखालिफत की. आंबेडकर ने अपनी रचनाओं में इसे बार-बार दर्ज किया है. यहां प्रस्तुत हैं, गांधी के ऐसे ही कुछ उद्धरण, जिन्हें आंबेडकर ने उद्धृत किया है. ये रंगनायकम्मा की पुस्तक 'जाति प्रश्न के समाधान के लिए...मार्क्स जरूरी हैं' से दिये जा रहे हैं. ये उद्धरण रंगनायकम्मा ने आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न खंडों में प्रकाशित आंबेडकर की संकलित रचनाओं के तेलुगु संस्करण से लिये हैं। गीता पर दूसरी बार। वैसे तब तक के लिए यह देखा जा सकता हैं कि महान गीता की रचना का उद्देश्य क्या था.

गांधी उवाच

मेरा यह विश्वास है कि अगर हिंदू समाज टिका रहने में समर्थ हो सका है तो इसलिए कि यह जाति व्यवस्था पर आधारित है... विभिन्न जातियां सैन्य मंडल की अलग-अलग टुकडियों की तरह हैं, हर मंडल सबके हित के लिए कार्य कर रहा है...जो समाज जाति व्यवस्था निर्मित कर सकता हो उसे यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उस समाज में अनोखी संगठन क्षमता है. मुझे विश्वास है कि राष्ट्रीय एकता सुदृढ करने के लिए अंतरजातीय विवाह अथवा सहभोज आवश्यक नहीं हैं.

(गांधी, नवजीवन, 1922)
आंबेडकर द्वारा संकलित रचनाएं खंड-9, पृष्ठ २७५-२७६ पर उद्धृत.

यह कहना कि अंतरजातीय सहभोज से मित्रता बढेगी, अनुभव के विपरीत है. यदि इसमें सच्चाई होती तो यूरोप में युद्ध न होते. सहभोज उसी प्रकार गंदा है, जैसे कि मलमूत्र विसर्जित करना. अंतर इतना है कि मलमूत्र त्यागने के बाद हमें चैन मिलता है और खाने के बाद परेशानी अनुभव करते हैं.

आंबेडकर, खंड-9, पृष्ठ 276 पर उद्धृत

मैं उन सभी का विरोधी हूं, जो जाति व्यवस्था को बरबाद करने पर उतारू हैं... सबसे अच्छा उपाय यह है कि छोटी जातियां स्वयं मिल कर एक बडी जाति हो जायें. ऐसी चार बडी जातियां होनी चाहिए, ताकि चार वर्णों की पुरानी व्यवस्था को दोबारा बनाया जा सके.

-वही-

१९४२ में कई अछूत कांग्रेस के जरिये विधानसभा में गये, लेकिन उनमें से किसी को भी कभी मंत्री नहीं बनाया गया. कांग्रेस के एक अछूत ने गांधी के सामने पांच सवाल रखे. उनमें से एक यह थाः
क्या आप कांग्रेस और प्रांतों के विधानमंडलों में विभिन्न बहुसंख्यक पार्टियों के नेताओं को उन अनुसूचित जाति के विधानमंडल सदस्यों में से मंत्रिमंडल सदस्य नामित करने की सलाह देंगे, जिन्हें अनुसूचित जाति के सदस्यों का बहुमत हासिल हैं?

गांधी का उत्तर थाः
मैं नहीं दे सकता. यह सिद्धांत खतरनाक है. उपेक्षित वर्गों की सुरक्षा इस हद तक नहीं की जानी चाहिए जो उनका और देश का नुकसान कर दे. मंत्रिमंडल का सदस्य आत्मविश्वास से भरा सर्वोच्च व्यक्ति होना चाहिए.
वही, पृष्ठ-99

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ ... फिर गांधी जी चोरों के इतने हिमायती क्यों थे अतुल जी ”

  2. By भुवनेश शर्मा on April 16, 2008 at 11:15 PM

    आपकी पोस्‍ट तो नहीं पढ़ी पर साइडबार में इराक और फिलिस्‍तीन के बारे में जरूर देखा ?
    तिब्‍बत नाम की भी एक जगह इस धरती पर है

  3. By Reyaz-ul-haque on April 17, 2008 at 9:14 PM

    Tibet hi nahin, Kashmir, palastine, Chechenya,Vidarbh, North east, Guantanamo bay, Kalingnagar, Nandigram, Khairlanji...sab isi Duniya men hain aur hum inko alag alag kar ke nahin dekhte.

    post ke baare men bhi kuchh kahte to humara gyanwardhan hota. (waise usey to apne padha hi nahin. shayad achhoot aur shoodra is duniya men nahin rahte honge. Tibet ne unhen dhakiya diya hai shayad.)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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