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बीच सफ़हे की लड़ाई

जाति प्रश्न : प्रत्येक व्यक्ति अनिर्वायतः श्रम करे

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/14/2008 09:17:00 PM

जाति प्रश्न के समाधान के लिए मार्क्स जरूरी हैं -2
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रंगनायाकम्मा
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मार्क्स के सिद्धांत के अनुसार, मानव इतिहास के विकास के लिए भौतिक कारण होना चाहिए. यदि यह एक सही जवाब है, तब वह कारण कोई ऐसी चीज है जो श्रम संबंधों से पैदा होती है. हालांकि, विगत समयों में, दार्शनिकों के बीच इतिहास के विकास को लेकर आदर्शवादी धारणा हावी रही है. यह अवधारणा मानती है कि मानव इतिहास ईश्वर अथवा राजा जो कि ईश्वर का अवतार होता है अथवा धार्मिक नेताओं अथवा कुछ पारलौकिक शक्तियों की इच्छा के आधार पर विकसित होता है.

यह आदर्शवाद है, यदि यह किसी समस्या के भौतिक आधार को देखने में विफल रहता है. इतिहास की प्रक्रिया से जुडी गलत अवधारणाओं पर आमतौर से और जर्मनी में हेगेल के बाद के दार्शनिकों की आदर्शवादी अवधारणाओं की खासतौर से आलोचना करते हुए मार्क्स ने जाति पर जर्मन दर्शन में यह टिप्पणी की-
जब श्रम विभाजन का अपरिपक्व स्वरूप, जो कि भारतीयों और मिस्रियों में पाया जाता है, उनके राज्य और धर्म में जाति व्यवस्था को आगे ले जाता है, (इसके उलट-अनु) इतिहासकार यह मानते हैं कि जाति व्यवस्था वह शक्ति है जो इस अपरिपक्व सामाजिक स्वरूप को जन्म देती है.
यह
एक सवाल है कि क्या श्रम विभाजन जातियों को जन्म देता है या जातियां श्रम विभाजन को जन्म देती हैं. मार्क्स के अनुसार, श्रम विभाजन प्राथमिक है. बाद के समय में यही चीज जातिगत पेशों में बदल जाती है. इस वास्तविक स्थिति के उलट, इतिहासकार जातियों को प्राथमिक मानते हैं जो श्रम विभाजन को जन्म देती हैं. इसलिए मार्क्स ऐसे इतिहासकारों की आलोचना करते हैं.

कैसे शुरू में जातियां समाज में जन्म लेती हैं? यदि वे इस तरह जन्म लेती हैं, इसका कोई कारण जरूर होगा. यदि कोई कारण था, तो ऐसा कारण बुनियादी बिंदु होगा.

मानव को जीने के लिए विभिन्न तरह का श्रम जरूरी है. जब विभिन्न तरह का श्रम जन्म लेता है और जारी रहता है, उसमें कुछ विभाजन पैदा होते हैं. यदि हम साथ में यह सवाल रखें कि कैसे एक श्रम विभाजन बाद के दिनों में रूपांतरित होता है, तो शुरुआती आधार श्रम विभाजन की मौजूदगी ही होगा. जब हम यह देखते हैं कि जातियां क्या करती हैं, हम पाते हैं कि विभिन्न जातियां विभिन्न तरह के श्रम करती हैं. प्राचीन समय से अब तक, जातियों और विभिन्न तरह के श्रम के बीच संबंध रहा है. तार्किक ढंग से सोचते हुए, हम पाते हैं कि विभिन्न तरह के श्रम के बीच विभाजन खुद क्रमिक रूप में जातियों में रूपांतरित हो जाता है. हालांकि विभिन्न तरह के श्रम और श्रम विभाजन सभी देशों और सभी समाजों में मौजूद रहे हैं. फिर भी सिर्फ भारत में ही श्रम विभाजन जातियों में क्यों रूपांतरित हुआ?

जिन्होंने उल्लेखनीय शोध किये वे भी अभी तक इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पाये हैं. कोई भी शोधकर्ता इस टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं कह सकता-जातियां हर जगह नहीं पायी जातीं. वे सिर्फ भारत में पायी जाती हैं.

इसलिए हमारे सामने जाति प्रश्न के समाधान ढूंढने का कार्यभार बचा रह जाता है. समाधान निकालने के क्रम में, हमें इस बिंदु का पता लगाना है कि क्या श्रम के विभाजन ने जातियों को जन्म दिया या जातियों ने श्रम विभाजन को. जब तक हम इस बिंदु का पता नहीं लगा लेते, हम समाधान की तरफ एक कदम भी आगे नहीं बढ सकते.
हम देख चुके हैं कि, मार्क्स के अनुसार, श्रम विभाजन प्राथमिक है. यही चीज जाति व्यवस्था में
परिलक्षित होती है. इसलिए जाति व्यवस्था का समाधान उस श्रम विभाजन को रूपांतरित करना है, जिसने समस्या को जन्म दिया है.
पहला बदलाव यह लाया जाना है : वर्ग को खींच कर-जो कोई भी श्रम नहीं करता और शोषण पर जीवित रहता है-श्रम की प्रक्रिया में लाना है. श्रमिक वर्ग (आगे से मजदूर वर्ग) जो कि शोषण का शिकार है, ही यह संघर्ष निश्चित तौर पर छेडता है. यह वर्ग संघर्ष दास युग से ही शुरू हो चुका है.

निचली जातियों की पूरी आबादी, जो शारीरिक श्रम करती है, मजदूर वर्ग का हिस्सा है. यह वर्ग निश्चित तौर पर यह जानता है कि श्रम के शोषणकारी संबंधों से मुक्ति ही उसका लक्ष्य है. साथ ही, इसे निश्चित तौर पर अपने संघर्ष के क्रम में श्रम विभाजन को बदलने का कार्य भी पूरा करना है. बदलाव ऐसा होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति कुछ निश्चित प्रकार के मानसिक श्रम तथा इसी प्रकार शारीरिक श्रम दोनों करे, न कि एक व्यक्ति हमेशा सिर्फ शारीरिक श्रम ही करता रहे और दूसरा सिर्फ मानसिक श्रम.

प्रत्येक व्यक्ति अनिर्वायतः श्रम करे.

प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्यतः विभिन्न प्रकार के श्रम करे. हमें इस तरह के नये श्रम संबंधों को क्रमिक तौर अपने अनुभवों को जरिये स्थापित करना और कायम रखना है। यह निचली जातियों के लिए मुक्ति का अकेला रास्ता है, जो शारीरिक श्रम और अनेक हजार वर्षों की दासता का असह्य जीवन जी रहे हैं। यह रास्ता सिर्फ वर्ग संघर्ष के जरिये ही संभव है।

(हिन्दी अनुवाद मूल तेलुगु से आर बापूजी द्वारा किए गए अंगरेजी अनुवाद से )
जारी

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ जाति प्रश्न : प्रत्येक व्यक्ति अनिर्वायतः श्रम करे ”

  2. By अतुल on April 14, 2008 at 10:14 PM

    गीता के उस श्लोक के बारे में आपका क्या कहना है जिसका अनुवाद गांधी को पसद था कि बिनु श्रम खाए चोर कहाए.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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