हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नदिया बिकती जाए

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2008 08:40:00 PM

नदिया बिक गई पानी के मोल- 5

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आलोक प्रकाश पुतुल
पाँचवीं किस्त पहले की चार किस्तें यहाँ पढ़ें
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नदिया बिकती जाए

लेकिन दुनिया में नदी के निजीकरण की यह पहली कहानी यहीं खत्म नहीं होती. छत्तीसगढ़ में शिवनाथ के निजीकरण के बाद तो नदियों के निजीकरण का एक सिलसिला शुरु हो गया. केलो, कुरकुट, शबरी, खारुन, मांड....! एक-एक कर इन सभी नदियों को निजी हाथों में सौंप दिया गया. हजारों किसान और मज़दूरों की आवाज अनसुनी रह गई. नदी को बचाने की लड़ाई में लोगों ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया. अपनी जान तक.

अब केलो नदी का ही मामला लें. रायगढ़ से गुजरने वाली 95 किलोमीटर लंबी केलो रायगढ़ की जीवनदायिनी नदी है. 1991 के आसपास रायगढ़ में जब जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड ने पांच लाख टन प्रति वर्ष उत्पादन क्षमता वाले स्पांज आयरन के उद्यम की शुरुवात की तभी से केलो को कब्जे में लेने की कवायद शुरु हो गई. बाद में जिंदल ने अपना विस्तार शुरु किया और पावर प्लांट आदि की स्थापना की. 1996 में जिंदल ने जब केलो नदी से पानी लेने का प्रस्ताव दिया तो सरकार ने यह प्रस्ताव यह कहते हुए ठुकरा दिया कि इससे आम जनता के पेयजल का संकट शुरु हो जाएगा. लेकिन सरकारी अफसरों की यह जनपक्षधरता साल भर में ही बदल गई और जिंदल को इस नदी से न केवल पानी लेने की इजाजत दी गई, बल्की 35,400 क्यूबीक मीटर पानी प्रतिदिन लेने के लिए जिंदल द्वारा स्टॉप डैम बनाने के प्रस्ताव को भी सरकार ने मंजूरी दे दी.
केलो के किनारे बसे बोंदा टिकरा समेत कई गांवों के सामने पानी का संकट गहराता हुआ जब नजर आया तो गांव के लोग सामने आए. बोंदा टिकरा, गुड़गहन के किसान केलो नदी का पानी जिंदल समूह को सौंपे जाने के खिलाफ इसलिए भी थे क्योंकि एक दूसरी सिंचाई योजना के नाम पर उनकी जमीने पहले ही बंधक रखी जा चुकी थीं. ऐसे में अगर किसानों को केलो से खेतों की सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलता तो उनके सामने भूखों मरने या पलायन के सिवाय कोई दूसरा चारा नहीं था.

अंततः किसानों ने मोर्चाबंदी की और जिंदल के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरु की. धरना, प्रदर्शन के बाद बात नहीं बनी तो आदिवासी किसान आमरण अनशन पर आ गए और अंततः नदियों के निजीकरण के खिलाफ लड़ते हुए सत्यभामा सौंरा नामक आदिवासी महिला 26 जनवरी 1998 को भूख से मर गई.

सत्यभामा के बेटे कृष्णा कहते हैं- “ हमें लगा कि मेरी मां का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. अंततः केलो के पानी पर जिंदल का कब्जा हो गया.”

केलो के बाद कुरकुट की बारी आई.


कहानी कुरकुट की
2004 में रायगढ़ के ही कुरकुट में जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड ने अपने एक हजार मेगावाट पावर प्लांट और जिंदल स्टील एंड पॉवर प्लांट के विस्तार के लिये करीब 143 एकड़ में संयंत्र लगाने अतिरिक्त भूमि के अधिग्रहण का काम शुरु किया तो लोग सड़क पर आ गए. हालांकि जिंदल ने कुरकुट के आसपास के कई गांवों में लोगों की जमीन पर पहले से ही सड़क बनवा दी थी और 1995 से ही इस इलाके में उसने सर्वे का काम भी शुरु कर दिया था. लगभग 10 साल बाद जब यहां डैम बनाने की घोषणा हुई तो लोग घबरा गए.लेकिन सरकार गांव वालों को आश्वस्त करती रही.

पहले तो सरकार ने इस 1729 मीटर लंबे और 18 मीटर की ऊंचाई वाले डैम से किसी के प्रभावित होने या डूब में आने को ही नकारने की कोशिश की. यह भी कहा गया कि इस डैम का इस्तेमाल सरकार किसानों के लिए करेगी लेकिन सरकारी सच एक-एक कर सामने आता गया. 15 गांवों के छह हजार से अधिक परिवारों को जब लगा कि वे किसी न किसी तरह इस डैम के कारण प्रभावित होंगे तो उन्होंने प्रस्तावित डैम के आसपास के इलाके में नाकेबंदी कर दी.

रायगढ़ में नदियों और प्रदूषण के मामले में सक्रिय जनचेतना के रमेश अग्रवाल कहते हैं- “ लगभग 355 हेक्टेयर वन भूमि और हजार हेक्टेयर सिंचित भूमि के इस डैम की जद में आने की आशंका के कारण गांव वाले बेहद आक्रोशित थे. आखिर यह उनके जीवन-मरन का प्रश्न था.”

थर्मल पावर प्लांट से प्रभावित होने वाले पतरापाली, सरईपाली, चिराईपानी, किरोड़ीमलनगर, गोरखा, भगवानपुर, धनागर, , जोरापाली, ननसियां, उर्दना, डोंगीतराई, कुसमुरा, उच्चभिट्ठी, कोसमपाली, खैरपुर, टीपाखोल, डूमरपाली, गेजामुड़ा, कांशीचुआं, बंधनपुर, बनहर, जामपाली, उसरौठ, बरमुड़ा जैसे लगभग 2 दर्जन से भी अधिक गांवों में रहने वालों को जिंदल की इस विस्तार परियोजना का तब पता चला, जब जिंदल समूह ने उन्हें गांव खाली करने के निर्देश दिए.

बाद में जिले के आला सरकारी अधिकारी भी जिंदल की पैरवी में गांव वालों को गांव खाली करने की चेतावनी देने पहुंचने लगे. अंतत: राबो जैसे गांव के लोगों ने तय किया कि किसी भी कीमत पर बांध के लिए गांव का बलिदान स्वीकार नहीं करेंगे. गांव वालों ने इस कार्य को रोकने के लिए कटे हुए पेड़ का बेरियर बनाकर काम रोकने व विरोध का बैनर लगा दिया. रात-रात भर गांव के प्रवेश द्वार पर पहरेदारी होती रही.

लेकिन जिंदल ने विरोध और विविध सरकारी सहमतियों की चिंता किए बगैर अपना निर्माण कार्य जारी रखा. अंततः जन विरोध के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर बांध का काम बंद कर दिया गया. ग्राम सभाओं में यह स्पष्ट किया गया कि ग्राम सभा कुरकुट पर बांध के खिलाफ है. लेकिन जिंदल ने मुख्यमंत्री के निर्देश और ग्राम सभा के प्रस्ताव को हफ्ते भर बाद ही किनारे लगा कर बांध का काम शुरु कर दिया.

राबो गांव के एक नौजवान वेणुधर कहते हैं- “इस राज्य में केवल जिंदल की चलती है.”

कुछ ही दिनों बाद सरकारी अधिकारी खुल कर जिंदल के पक्ष में काम करने लगे.

कलेक्टर से लेकर एसपी तक पूरी ताकत से जिंदल के पक्ष में गांव वालों को प्रलोभन देने और धमकाने का काम करने लगे. कलेक्टर ने गांव वालों की बैठक बुलाकर कहा कि जो भी बांध का विरोध करेगा, उसे जेल में डाल दिया जाएगा. एसपी ने कहा- प्रेम से नहीं दोगे तो झगड़ा होगा. एसडीएम ने कहा- जमीन सरकार की होती है, तभी तो ग्रामीण लगान देते हैं.
ऐन-केन प्रकारेण लोगों का भरमाने और धमकाने की पूरी कोशिश हुई.

फिर शुरु हुई कथित जनसुनवाई.

भारी भीड़ के कारण पहले तो सरकार की ओर से जनसुनवाई ही टलती रही, बाद में जब जनसुनवाई हुई तो हजारों आपत्तियां दर्ज कराई गईं. लेकिन यह सारी कागजी कार्रवाई बेकार गई.

जिंदल के सरकार ने जो अनुबंध कर रखा है, उसमें दर्ज है कि सरकार जिंदल को दूसरी तमाम मदद के अलावा राज्य और केंद्र के स्तर पर अनुमोदन और अनुमति दिलाने में भी मदद करेगी.
सरकार ने यही किया.

अब कुरकुट के पानी पर जिंदल का कब्जा है।
जारी

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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