हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

पुड़िया भीतर पुड़िया ; भारत भारद्वाज और राजकिशोर

Posted by note pad on 4/08/2008 08:50:00 AM

मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथा का पहला भाग लिखा और प्रकाशित करवाया - "कस्तूरी कुंडल बसै" ठीक है । कोई बात नही । आ रही हैं बहुत सी आत्मकथाएँ । दूसरा भाग इसी पुस्तक मेले मे आया आया "गुड़िया भीतर गुड़िया" । पर अब चुप बैठने की बात नही है । राककिशोर जी ने 16 मार्च के जनसत्ता मे उसकी समीक्षा लिखी और उसे अच्छी आत्मकथा बताया ।मैने नही पढी "गुड़िया भीतर गुड़िया " । पर लगता है अब पढना ही होगा । भारत भारद्वाज और राजकिशोर दोनो के लेख इस रविवार की जनसत्ता में सम्पादकीय पेज पर आमने सामने खड़े हैं आप कैसे अनदेखा करोगे ।भारत भारद्वाज ने पहले तो राजकिशोर की समीक्षा की धज्जी उड़ाने की कोशिश की और फिर मैत्रेयी पुष्पा की आतमकथा की ।उनकी कोशिश हालाँकि बहुत दमदार है पर उसमे कुछ बातें बहुत ब्रिलिएंट है ,तर्क एकदम अनूठे हैं और मारक क्षमता से लैस हैं ।{हालाँकि इनसे मरने वाल कौन है यह एक बड़ा सवाल है} मुझे अचानक से कुछ दिन पहले चोखेर बाली पर घटित पतनशीलता प्रकरण की याद दिला गयीं। स्त्री के लेखन में हमेशा कुछ सेनसेशनल ढूंढने की चाहत कितनी कुत्सित है ?
बकौल भारत जी राजकिशोर ने "इस आत्मकथा की ठेकेदारी हासिल कर ली है{कीमत का अनुमान पाठक ही लगा सकते हैं }" भारत जी को मैत्रेयी की यह तुच्छ आत्मकथा पढने का दुर्भाग्य प्राप्त हुआ राजेन्द्र जी की बाबत । और उनके अनुसार "मैत्रेयी ने न अपने प्रेम प्रसंगों को ठीक से खोला है न हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों से अपने सम्बन्धों को क्या आत्मकथा में एक लेखिका के झूठ का यह विपर्यय नही है ? है और खुल्लम्खुल्ला है । आत्मकथा के नाम पर कोई झूठ कथा लिखने का संकल्प कर ले तो आप कुछ नही कर सकते । बस चुप लगा सकते हैं "{जो कि भारत भारद्वाज जी से लगाई नही गयी }
आगे वे जिस सत्य का उद्घाटन करते हैं उसने तो मेरी रूह कँपा दी है । किस मुँह से अजित जी के यहाँ बकलम्खुद लिखने जायेंगे हम लोग । ऐसा कोई जीवनानुभव तो बटोरा ही नही है । भारत जी कहते हैं "जिस तरह पुरुष का सबसे बड़ा सच स्त्री है,उसी तरह स्त्री का सबसे बड़ा सच पुरुष होता है यानी जीवन की समरसता के बीच आत्मकथा में इस सम्बन्ध के सच का बेबाक उद्घाटन। ताकि पाठक आपकी आत्मकथा को विश्वसनीय माने ,उसे सन्दिग्ध न समझे ।.............आत्मकथा साहित्य का फैशन नही है जैसा कि आज हिन्दी में दलितों और लेखिकाओं ने समझ लिया है।जिसके पास सचमुच कुछ कहने लायक नही है वही आत्मकथा लिखने पर उतारू है। जैसे तैयार पाठक उसे लपकने को प्रतीक्षित हैं ।"
आगे वे कुछ महान आत्मकथाओं के उदाहरण देते है कि नैतिक साह्स और सच्ची आत्मकथा ऐसी होती हैं ।पहला उदाहरण , राजनीतिक लेखक रूसो के जीवन से ।उन्होने लिखा-"सच्चा जांबाज़ बनने के लिए मुझे प्रेरणा की ज़रूरत थी जो मुझे एक की बजाय दो औरतों से मिली ........अपनी आत्मकथा ""आत्मस्वीकृतियाँ "" के पहले ही खण्ड में उन्होने अपने सामने अपने एक मित्र द्वारा हस्त मैथुन किए जाने का भी वर्णन किया है और पूरी बेबाकी से स्त्रियों के साथ अपने सम्बन्ध और सम्भोग का ...................."
दूसरा उदाहरण -रसेल की आत्मकथा -
रसेल लिखते हैं "मेरे बेटे को जो ट्यूटर पढता था वह कुरूप काला और असुन्दर था इसी कारण कोई लड़की या स्त्री उसके प्रति आकृष्ट नही हुई ।स्वभावत: उसके भीतर सेक्स की एक कुण्ठा थी। एक रोज़ मेरी पत्नी ने कहा-यह ट्यूटर मुझे यौन सम्बन्धों की भूख से कुंठित लगता है।मुझे डर है इसकी छाया मेरे बेटे पर न पड़े। यदि तुम कहो तो इसके साथ सम्भोग कर के इसकी सेक्स कुण्ठा दूर कर दूँ। और रसेल ने सहर्ष अनुमति दी-यस । यह आत्मकथा की ऊँचाई है ।"
तीसरा उदाहरण -गान्धीजी की आत्मकथा से -केवल एक प्रसंग
"मरते हुए पिता के समय के बीच पत्नी से सम्भोग "
इस आधार पर तो हमे मानना होगा कि गान्धीजी की आत्मकथा तुलनीय दृष्टि से रसेल और रूसो से बहुत हलकि और कम प्रामाणिक है ।
आगे भारत जी सार्त्र सीमोन वॉन गॉग आदि के उदाहरण भी उल्लिखित करते हैं और लिखते हैं {थकते नही }"आत्मकथा लिखने का बड़ा मतलब होता है अपने नैतिक साहस के पार चले जाना। दैहिक सम्बन्धों की ईमानदारी,जो मैत्रेयी की आत्मकथा में कहीं नही है"
"मैत्रेयी पुष्पा की जिस तथाकथित आत्मकथा की प्रशंसा में राजकिशोर ने अपने लम्बे पत्रकारिता जीवन के अनुभव से अर्जित भाषा में कसीदे काढते चार चान्द लगाए है,वह अविश्वसनीय ही नही सन्दिग्ध भी लगता है। क्यो? इस पर विचार करने की ज़रूरत है । पहली बात तो यह कि मैत्रेयी हिन्दी के कोई महत्वपूर्ण लेखिका नही हैं । फिर इस पुस्तक मे ऐसा क्या है कि राजकिशोर इस आत्मकथा पर लुटे जा रहे हैं"
आगे और भी कहते चले जाते हैं भारत जी । इस कहन का शायद मूल कारण यह था कि इस आत्मकथा में भारत भारद्वाज को राजेन्द्र यादव का चमचा बताया गया है ।इस बात का भी उल्लेख उन्होने स्वयम ही इस लेख मे किया है । लिंक जोड़ने की आदत है सो हमने भी जोड़ दिया है ।
पर बड़ी बात है कि , बल्कि सवाल है कि क्या आत्मकथाओं के श्रेष्ठता की कसौटी यौन प्रसंगों के खुले उद्घाटन पर निर्भर करती है ?इस आधार पर चलें तो क्या हम अपने बच्चों को महान जीवनियाँ और आत्मकथाएँ पढने को दे पायेंगे ?क्या वाकई औरत का सबसे बड़ा सच आदमी और आदमी का सबसे बड़ा सच औरत है ?क्य आत्मकथाओं की औथेंटिसिटी सेक्स प्रसंगों से ही मिलेगी ?
या राजकिशोर जी के जवाब की तरह यह कहा जाए कि -
"पुरुष और स्त्री की सार्थकता इसमें है कि वे दोनो मिलकर कुछ बड़ी सच्चाइयों की ओर सहयात्रा करें।इसी से उनके बीच सच्चा साथीपेन विकसित हो सकता है बाकि सब तो खीर-पूरी है जिसके दाल-रोटी में बदल जाने में ज़्यादा समय नही लगता।विवाहेतर प्रेम या विवाहेतर सेक्स 'स्त्री पुरुष सम्बन्ध का सच'नही बल्कि उस सच का भटकाव है।"
और यह भी कि
"मैं यह भी मानता हूँ कि कोई व्यक्ति अपने बारे मे जितना बताता है उससे अधिक जानने का अधिकार हमे नही है। किसी को किसी के चरित्रे की जासूसी नही करनी चाहिये। दूसरों के निजी जीवन के बारे मे जानने की सीमहीन ललक मानसिक रोग है। हमारी अपनी नग्नताएँ ही इतनी ज़्यादा होती हैं कि दूसरों पर आँख उठाने का साहस कहाँ से लाएँ ।...भा.भा. को अगर लगता है कि मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा को एक किहास किस्म के सच से लबालब भरा होना चाहिये,नहीं तो हिन्दी के सथ गहरा अन्याय हो जाएगा तो उन्हें 'गुड़िया भीतर गुड़िया'" के जवाब में एक स्वतंत्र पुस्तक लिखनी चाहिये 'पुड़िया भीतर पुड़िया ',जैसे उनके प्रिय लेखक भगवती चरण वर्मा के उपन्यास 'टेढे मेढे रास्ते' के जवाब में उनके एक अन्य प्रिय लेखक रांगेय राघव ने'सीधा सादा रास्ता'नामक उपन्यास लिखा था ।.....दूसरा बेहतर विकल्प यह है कि भा.भा. स्वयम अपनी आत्मकथा लिख कर अन्य लेखक लेखिकाओं के समक्ष उदाहरण पेश करें।उपदेश देने की तुलना में उदाहरण पेश करना हमेशा श्रेश्ठतर होता है "

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  1. 7 टिप्पणियां: Responses to “ पुड़िया भीतर पुड़िया ; भारत भारद्वाज और राजकिशोर ”

  2. By राजकिशोर on April 8, 2008 at 12:20 PM

    बहुत आनंद आया पढ़ कर। मुझे अपना लिखना सार्थक लगा। धन्यवाद।

  3. By चंद्रभूषण on April 8, 2008 at 1:10 PM

    वाकई अच्छा लिखा।

  4. By Neelima on April 8, 2008 at 1:54 PM

    एक सशक्त प्रतीत होती स्त्री , पितृसत्ता को चुनौती देती स्त्री कितना डराती है न ? स्त्री लेखिका की आत्मकथा में वो "रंग 'नहीं जो 'तुम" देखना चाह रहे हो ! वाह एक लेखिका को एक आलोचक की कितनी मर्मिक समीक्षा नसीब हुई.....हे स्त्री तुम और कितना डराओगी ??

  5. By आशीष on April 8, 2008 at 1:55 PM

    भला हो हिंदी के उस लेखकों को जिन्‍हें आत्‍म कथा में कुछ और चाहिए

  6. By Priyankar on April 10, 2008 at 1:00 PM

    भारत भारद्वाज के छिछले लेखन का बहुत करारा जवाब दिया है राजकिशोर ने . इसकी ज़रूरत थी .

  7. By अंशुमाली रस्तोगी on April 11, 2008 at 3:40 PM

    मैं भारत भारद्वाज को लेखक मानता ही नहीं। उनके पास न भाषा है न तमीज। जब कुछ न बन पड़ा तो गालियां देने लगे। पहले कालीया की चाकरी करी अब यादव की फिर से कर रहे हैं।

  8. By Reyaz-ul-haque on April 13, 2008 at 8:45 PM

    bahut achchha sujata ji. main Jansatta dekh nahin paya tha. apke post se pata laga. shukriya.
    isi bahane is par bhi baat ho ki Bharat bhardwaj jaise log kinke liye likhte hain aur unhen kaun padhta hai. Is tarah ka galeez lekhan, jaisa Bharat ji karte rahe hain akhir kis ke liye upyogi hai?

    ek baar phir dhanyavad.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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