हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

होली के खिलाफ एक पर्चा

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/20/2008 07:54:00 PM



रंग अच्छे लगते तो हैं, लेकिन तब जब वे आंखों के सामने हों. अगर वे आंखों में डाल दिये जायें तो चुभने लगते हैं. होली में जिस तरह औरतों को लेकर निम्नस्तरीय और अपमानजनक टिप्पणियां की जाती हैं, गीत गाये जाते हैं-वे शर्मशार करते हैं. स्त्रियों की इस तरह इज्जात उतारने का उत्सव किसी और सभ्यता-संस्कृति में शायद ही होता हो, जिसमें पूरा समाज भाग लेता हो. समाज की जो हाइरार्की है-हर कमजोर को, दलित को, औरतों को लक्षित करके जिस तरह होली मनायी जाती है-वह असहनीय है. होली सामंती समाज का त्योहार है और कम से कम वे लोग, जो इस समाज को खारिज करते हैं, उसे खत्म करना चाहते हैं-उन्हें इसके खिलाफ आना चाहिए कि होली की यादों में उभ-चुभ करना चाहिए. कुमार अनिल की रिपोर्ट, एक गांव से लौट कर.


कुमार अनिल
िहार के दलित टोलों में होली किसी बुरे सपने की तरह रही है. दबंग लोगों के लिए होली हमेशा से उत्पीडन का बहाना रही है. पुलिस अथवा सामंती ताकतों द्वारा जनसंहार झेल चुके दर्जन भर गांवों के दौरे के बाद लेखक ने होली को हर गांव में उत्पीडन का जरिया ही पाया.
आज से 20 साल पहले दलित टोलों में होली नहीं खेली जाती थी. लोग सहमे- सहमे रहते थे. गांव के बडे लोगों का होली गाता हुजूम हर दलित टोलों में घूमता था. भूमिहीन परिवारों की बहू-बेटियों के नाम लेकर अश्लील गीत गाये जाते थे. एक ही टोली एक ही समय में सास बहू और मां बेटी के नाम लेकर अश्लील गीत गाती थी. औरतों के कोमल अंगों का जोर-जोर से उल्लेख किया जाता था. दलित नौजवान मन मसोस कर रह जाते थे. रतनी फरीदपुर प्रखंड का नोआवां गांव भी यही कहानी कहता है. पता नहीं यह परंपरा कब से चली रही थी.
इस गांव में सबसे पहले कहार जाति के युवा कैलाश राम ने इस अश्लीलता का विरोध किया. इस गांव में कहार जाति के महज 20 घर हैं, पर रविदासों के 50, मुसहरों के 30, पासवानों के 10 डोमों के आठ घर हैं.
बात 1984 की है. कैलाश ने पूरे दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व किया. उसे अश्लील गीतों के विरोध का खामियाजा भुगतना पडा. दबंगों ने उसे बुरी तरह पीट दिया. उसे मरा हुआ जान कर छोड दिया गया. पिटाई तो कैलाश राम की हुई, पर पूरा दलित टोला घायल हुआ. घटना के बाद सभी में जबरदस्त एकता बन गयी. उसके बाद दलितों सामंती ताकतों के बीच लंबी लडाई चली. एक ही गांव जैसे दो दुश्मन देश बन गये. एक टोले के लोग दूसरे टोले में अकेले जाने की हिम्मत नहीं कर सकते थे. अनेकों गांवों में होली के अवसर पर दलितों के जनसंहार भी हुए हैं. रणवीर सेना होली को जनसंहार दिवस के रूप में मनाती रही है. समय बदला उत्पीडन का स्वरूप भी बदला. शक्ति संतुलन बदलने के कारण अब दलित टोलों में भी युवा होली खेलने लगे हैं. दुर्भाग्य से आज के दलित युवा भी होली की अश्लीलता से अछूते नहीं हैं. उन्होंने दबंगों की अश्लीलता को अपना लिया. हालांकि यह वैसा नहीं है, जैसा पहले के जमाने में होता था. समय के साथ उत्पीडन के हथियार भी बदल गये हैं.

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  1. 5 टिप्पणियां: Responses to “ होली के खिलाफ एक पर्चा ”

  2. By Nalin Vilochan on March 20, 2008 at 10:17 PM

    आपके विचार को पढ कर, मन बहुत आहत हुआ । शायद आप उन लोगों की श्रेणी में आते है जो खुशीयों मे भी दुःख कुरेदते रहते हैं । अपके लेख को पढ कर ऐसा लगा की आप होली के नहीं खुशीयों के खिलाफ हैं । आपके द्रिष्टीकोण को अगर सही भी माने कि हुङदंगो के लिए यह अच्छा मौका होता है, तो क्या इन कुछ लोगों के कारण एक पर्व को जो लोगो को जोङने के लिए बना हो, निम्न अस्तर का कहना ुचीत होगा (मै आपके ओछे शब्दो को उपयोग नही करना चाहता)। मुझे तो यह एक कुंठीत मानसिकता को ही दर्शाता है । आपसे आग्रह है कि ऐसे कटु शब्दों का प्रयोग ना करें । आतंकियो और हुङदंगीयों को किसी पर्व या त्योहार कि जरुरत नहीं होती उने लिये होली और ईद दोनो एक होते है ।

    होली की शुभकामनाएँ
    निवेदक
    नलिन

  3. By राज भाटिय़ा on March 20, 2008 at 11:35 PM

    Reyaz-ul-haque भाई एक दम सच लिखा हे, लेकिन करे कया,हमारे तीज त्योहार खुशी मनाने के लिये ओर शान्ति बढाने के लिये मेलजोल बढाने के लिये होटे हे, लेकिन समय के साथ साथ इन सब मे बेहुदा पन ओर बत्मीजीया आरही हे

  4. By Vibha Rani on March 21, 2008 at 12:49 AM

    Maithili ki senior writer Lily Rey ka novel hai-PATAKSHEP, jisame vanchit tabka suvidha aur dhan pata hai to vah bhi samanti vyavhar karane lagata hai. jis vulgarity ko lekar jansanhar tak ho gaye, usai jati ke log bhi ab usi daldal mein ja fanse hai to unmein aur dabangon mein farq kya raha? vaise holi rangon ka tyohar hai, ise apane star se apni bhavana se khela jaye to sab achchha hota hai. aapki baat sahii hai, ek mahila ke nate ham sabne ise bahut dekha aur jhela bhi hai aur is hindustan ki koi bhi ladaki yah nahi kah sakti ki vah is ashlilata ya eve teasing ka shikar nahi hui hai. saval hai ki ham kab badlenge?

  5. By Ek ziddi dhun on March 26, 2008 at 12:06 AM

    अभी कई दिन पहले एक दोस्त ने पूछा था कि होली खेलते हो क्या? मैंने कहा, खेलता था पर कुछ वर्षों से अरुचि हो गई है. उसने वजह पूछी तो यही कहा कि मस्ती के नाम पर पुरूष बर्बरता का नंगा नाच होता है. बचपन से ही देखते रहे हैं हम तो कि होली पर कैसे लड़कों से लेकर बडों तक की निगाह शिकार की तलाश पर होती है. किस्से भी शान से सुनाये जाते है कि कैसे किसने किस लडकी या औरत के किस-किस हिस्से को मसल दिया. इस ट्रेनिंग में बड़े होते हुए यही लगता है कि पुरूष का काम यही है. और ऐसा करते घूमने वाले अपनी बहनों पर खूब निगाह रखते हैं कि वो होली सिर्फ़ लड़कियों के साथ खेले या खेले ही नहीं. ऐसा समाज जो लडकी के हिस्से के हर रंग को छीन लेता हो, अगर वो अपनी मर्जी दोस्ती करना चाहे, प्रेम करना चाहे तो बहुत बड़ा गुनाह लेकिन वो सहज ढंग से ही उल्लास दिखा दे तो भी लाख मतलब निकला जाए, वहां ऐसे उत्सवधर्मिता के ढोंग खूब होते हैं.बड़ी शान से कहा जाता है कि ये तो वर्जनाओं से छुटकारा पाने का जरूरी दिन है. बेशर्म जुमले हैं कि बूढे भी होली पर देवर हो जाते हैं.
    ये कोई भाई इस टिप्पणी पर बड़े दुखी हैं. ऐसे लोग हर ज़ुल्म से संतुष्ट किस्म का रिश्ता बनाकर खुश रहता हैं. वैसे भी अन्याय से इस किस्म का रिश्ता एक तबके को सूट करता है. मैं शामली (मुज़फ्फरनगर जिले का क़स्बा) से सहारनपुर जाने वाली सड़क पर एक राजपूत बहुल गाँव से गुज़र रहा था. वहां बवाल मचा हुआ था, हुआ सिर्फ़ यह था कि एक दलित बच्चे ने एक राजपूत पर रंग डालने की हिमाकत कर दी थी. ये त्यौहार जिस संस्कृति का हिस्सा है, स्त्री और दलितों से ऐसा घिनौना व्यव्हार उसी संस्कृति की खासियत हैं. अफ़सोस यही है कि सवर्ण बाड़े की औरत भी दलितों से बुरा बर्ताव करती हैं और लाख यातना सहने वाला दलित पुरूष भी औरत को ज़ुल्म का शिकार बनाता है

  6. By Ek ziddi dhun on March 29, 2008 at 12:10 AM

    Ghughuti..ke bkog par is post ki pratikriya mein post padhkar man khinn hua..
    asad zaidi ne 1857 par apni ek kavita mein in lines ka ullekh kiya hai (shayad unki hain, shayad muktibodh kee)---
    क्या अब दुनिया में कहीं भी नहीं है अन्याय
    या तुम्हें ही नहीं सूझता उसका कोई उपाय।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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