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बीच सफ़हे की लड़ाई

नदिया बिक गई पानी के मोल-1

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/20/2008 09:18:00 PM

नदिया बिक गई पानी के मोल
आलोक प्रकाश पुतुल

कहते हैं सूरज की रोशनी, नदियों का पानी और हवा पर सबका हक़ है। लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसा नहीं है. छत्तीसगढ़ की कई नदियों पर निजी कंपनियों का कब्जा है. दुनिया में सबसे पहले नदियों के निजीकरण का जो सिलसिला छत्तीसगढ़ में शुरु हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा. छत्तीसगढ़ की इन नदियों में आम जनता नहा नहीं सकती, पीने का पानी नहीं ले सकती, मछली नहीं मार सकती. सेंटर फॉर साइंस एंड इनवारनमेंट की मीडिया फेलोशीप के तहत पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल द्वारा किए गए अध्ययन का यह हिस्सा आंख खोल देने वाला है. आइये पढ़ते हैं, क्रमवार रूप से यह पूरी रिपोर्ट।


पानी का मोल कितना होता है ?
स सवाल
का जवाब शायद छत्तीसगढ़ में रायगढ़ के बोंदा टिकरा गांव में रहने वाले गोपीनाथ सौंरा और कृष्ण कुमार से बेहतर कोई नहीं समझ सकता.
26 जनवरी, 1998 से पहले गोपीनाथ सौंरा और कृष्ण कुमार को भी यह बात कहां मालूम थी.

तब छत्तीसगढ़ नहीं बना था और रायगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा था. मध्यप्रदेश के इसी रायगढ़ में जब जिंदल स्टील्स ने अपनी फैक्टरी के पानी के लिए इस जिले में बहने वाली केलो नदी से पानी लेना शुरु किया तो गाँव के गाँव सूखने लगे. तालाबों का पानी कम होने लगा. जलस्तर तेजी से गिरने लगा. नदी का पानी जिंदल की फैक्ट्रीयों में जाकर खत्म होने लगा. लोगों के हलक सूखने लगे.

फिर शुरु हुई पानी को लेकर गाँव और फैक्ट्री की अंतहीन लड़ाई. गाँव के आदिवासी हवा, पानी के नैसर्गिक आपूर्ति को निजी मिल्कियत बनाने और उस पर कब्जा जमाने वाली जिंदल स्टील्स के खिलाफ उठ खड़े हुए. गाँववालों ने पानी पर गाँव का हक बताते हुए धरना शुरु किया. रायगढ़ से लेकर भोपाल तक सरकार से गुहार लगाई, चिठ्ठियाँ लिखीं, प्रर्दशन किए. लेकिन ये सब कुछ बेकार गया. अंततः आदिवासियों ने अपने पानी पर अपना हक के लिए आमरण अनशन शुरु किया.

बोंदा टिकरा के गोपीनाथ सौंरा कहते हैं - "मेरी पत्नी सत्यभामा ने जब भूख हड़ताल शुरु की तो मुझे उम्मीद थी कि शासन मामले की गंभीरता समझेगा और केलो नदी से जिंदल को पानी देने का निर्णय वापस लिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ "

भूख हड़ताल पर बैठी सत्यभामा सौंरा की आवाज़ अनसुनी रह गई. लगातार सात दिनों से अन्न-जल त्याग देने के कारण सत्यभामा सौंरा की हालत बिगड़ती चली गई और 26 जनवरी 1998 को जब सारा देश लोकतांत्रिक भारत का 48वां गणतंत्र दिवस मना रहा था, पानी की इस लड़ाई में सत्यभामा की भूख से मौत हो गई.

सत्यभामा के बेटे कृष्ण कुमार बताते हैं- “इस मामले में मेरी मां की मौत के ज़िम्मेवार जिंदल और प्रशासन के लोगों पर मुकदमा चलना था लेकिन सरकार ने उलटे केलो नदी को निजी हाथ में सौंपने के खिलाफ मेरी मां के साथ आंदोलन कर रहे लोगों को ही जेल में डाल दिया. ”

इस बात को लगभग दस साल होने को आए.

इन दस सालों में सैकड़ों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियाँ रायगढ़ की छाती पर उग आईं हैं. पूरा इलाका काले धुएं और धूल का पर्याय बन गया है. सितारा होटलें रायगढ़ में खिलखिला रही हैं. आदिवासियों के विकास के नाम पर अलग छत्तीसगढ़ राज्य भी बन गया है. कुल मिला कर ये कि आज रायगढ़ और उसका इलाका पूरी तरह बदल गया है.

नहीं बदली है तो बस नदी की कहानी.


क्रमशः

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ नदिया बिक गई पानी के मोल-1 ”

  2. By Sanjeet Tripathi on February 20, 2008 at 11:22 PM

    राज तो बना पर राज तो वही करते हैं जो जननेता कहलाते है और सब कुछ बेचने का ध्येय लेकर राज करते हैं।

    शिवनाथ नदी के बिक जाने की खबर सबसे पहले शायद जनसत्ता में 2002 में पढ़ी थी एक स्वतंत्र पत्रकार ने एक पेज की स्टोरी की थी इस मुद्दे पर, राज्य बनने से पहले हुए इस समझौते को फिर राज्य बन जाने के बाद तत्कालीन जोगी सरकार ने निरस्त किए जाने और दोषियों को सजा देने की घोषणा की थी और तब के विपक्ष भाजपा जो कि आज सरकार चला रही है ने खूब हल्ला मचाया था। अब इसी भाजपा सरकार का पांच साला राज खतम होने को है और हल्ला मचाने वाली भाजपा अपनी सरकार बनने के बाद से ही उन दोषियों पर कारवाई नही कर सकी है!!
    क्या कहें इसे!!

  3. By himanshu on February 21, 2008 at 1:28 AM

    आलोक भाई, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद. आपकी इस रिपोर्ट को मैंने अंग्रेजी में कई दोस्तों को भिजवाया है. आपकी इस तरह की गहन लेखनी से छत्तीसगढ़ का मान बढ़ा है.
    संजीत त्रिपाठी जी की जानकारी में लाना चाहूंगा कि शिवनाथ नदी के बिकने की सबसे पहली खबर दैनिक देशबंधु में सन 2000 में पहले पन्ने पर कई किश्त में छपी थी और आलोक भाई तब रायपुर में थे. बाद में आलोक भाई बिलासपुर देशबन्धु के संपादक बन कर वहां चले गए.

  4. By Sanjeet Tripathi on February 21, 2008 at 2:08 AM

    शुक्रिया हिमांशु जी, इसीलिए मैने उपर "शायद" लिखा था क्योंकि मै लिखते समय संशय की स्थिति में था!!
    शुक्रिया मेरे ज्ञानवर्धन के लिए!!!

  5. By Samrendra Sharma on February 21, 2008 at 7:57 AM

    आलोकजी गनपत को खूब मजा आया। अगली किश्त का इन्त्जार है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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