हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

पंकज सिंह की कवितायेँ : मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/30/2008 09:49:00 PM

पंकज सिंह हिन्दी के जाने माने कवि, जिन्हें इस साल का शमशेर सम्मान कुछ ही दिनों पहले पटना में प्रदान किया गयाउनसे हुई एक लंबी बातचीत में उन्होने देश और दुनिया की घटनाओं पर काफी दिलचस्प बातें कहीं हैंजल्दी ही वह बातचीत हाशिया पर होगीअभी हम उनकी दो कवितायें पढ़ते हैं

















गाडिये

दरकता है कलेजा मुंह को आता है तो भी
हम जुगा कर रखते हैं अभिमान के दमकते हीरे
हम कलपते-रोते नहीं
गाते हैं सात सुरों में धुपैला गर्दीला जीवन

गाछ बिरिछ से बरखा से आंधियों से लू से
हमारा जन्मों का नाता है
वे हमें जानते हैं हम उन्हें
ज्यों बदलती ऋतुओं के पखेरू

पैदल चलनेवाले हमें जानते हैं
वे पहचानते हैं हमारी गाडियां उन पर उकेरी फूल पत्तियां
हमारी औरतों की मजबूत बांहों के चमकते काले गोदने
हम कुछ दिन गुजार कर चले जायेंगे
थोडी मोहलत दें हम चले जायेंगे
बहुत देर होने से पहले
छाती के बाहर भीतर पकते फोडों के लिए
हम चले जायेंगे

हम लोहा पीटते हैं
जहां भी होते हैं अपनी चिनगारियों से तपा कर
हम लोहा पीटते हैं
इस्तेमाल की चीजें बनाते हैं
घर का फाटक, रसोई के बरतन, फावडे, हल की फालें
हम आग में गलते जलते मनुख मानुखी बच्चे
अचरज से देखते हैं आपकी दुनिया
हमें अपना सुख गढने दुख पढने नहीं आया
हमें कला नहीं आती
लेकिन आता है चिंदियों से सुंदर पोशाकें बनाना बनाना
बनाना देखे हुए की मूरतें मूरतों में मान
सिंगार का सामान
चूडियां, बाजूबंद, हंसली, कनफूल

गरीबी है सो हैगी हारी बीमारी हैगी
रोशनी में भी दिखते हैं हमारे बच्चों के मुंह धुंधले
औरतों की छाती में सिर्फ आस रहती है पनीली

हम चले जायेंगे
नहीं होगी कोई भूल हम चले जायेंगे
जहां पहुंचेंगे तहां से भी
सारे ठौर तुम्हारे मापों बांटों कीनो छीनो
पृथ्वी बहुत बडी है सदियों सदियों भटकने के लिए
सो हम भटके हैं भटकेंगे चले जायेंगे

पर जरा मुश्किल है यही कि हम लोैट-लौट आते हेैं ओ शंकित-आशंकित लोगों
लौट-लौट आयेंगे हम इस गोल पृथ्वी पर आग लोहे औजार हथियार
मेहनत की कथा रचते दिन-प्रतिदिन

ज'मी पांव, सीझे कलेजे निचुडे बचपनवाली
ंिजंदगियों को
नक्काशीदार गाडियों पर ठेलते
बुझते रंगों की चिंदियों को
पाग और लहंगों पर सजाये
हम लौट-लौट आते हैं
सदियों से हमने देखे हेैं आवाजाही में
दृश्य बदल जाते हैं बदल जाते हैं सारे तुम्हारे
तमगे बल्लम बरछे ध्वजा जयकार
दहाड-दहाड कर मिट जाते हैं दरबार
अपनी गाडियों पर टप्परों की छाया में
लादे गैरों अपनों के जीवन का सामान
भटकनों की थकान पुराने गीत और अपनापन
हम लौट आते हैं
हम लौट लौट आयेंगे

* राजस्थान के गाडिये लुहार, जो सदियों से बेघर-बार खानाबदोशों की तरह जी रहे हैं.


मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा

मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा
बडी चीज है साफ जिंदगी बडी चीज है साफगोई
आतंक की आंखों में आंखें डाल सादगी से कहना अपनी बात
फरमाइश पर नाचते गाते विदूषकों की
आत्मतुष्ट भीड में प्रचंड कोलाहल में
विदा लेती शताब्दी की विचित्र प्रतियोगिताओं में
बिना घबडाये हुए
सजल स्मृतियों से अभिषिक्त मस्तक को ऊंचा उठाये
सहज गति से चलता हुआ मैं जाऊंगा
पाप और अपराध के स्मारकों को पीछे छोडता
एक थरथराते हुए
आकार लेते स्वप्न में शामिल होने
जिसे प्रकट होना है हारती मनुष्यता के पक्ष में

मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा
न अपनी अव्यावहारिक इच्छाएं, न आंसू
मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा
छिपाते हैं षडयंत्रकारी छिपाते हैं चोर
छिपाते हैं लालची और क'ूर शासक, उनके कारकुन
ईर्ष्या और प्रतिशोध के जहर में उफनते लोग
पतक्षड में बादामी होती घास और जंगली फूलों की
बेपनाह महक से भरी हवा में
परछाइयों की हिलती थिगलियों भरी धूप में
जिंदगी और मौत की आवाजाही के पार
मैं करूंगा प्यार

प्यार करता हूं करता रहूंगा भरपूर
अपने साथियों से जो हर चीज का अर्थ बन उपस्थित रहे हैं
बरसों से मेरे बेतरतीब सफर में
अपनी स्त्री से, वर्णमाला में प्रवेश करते बच्चों से मैं प्यार करूंगा और अपने लोगों को अंधकार के बारे में बताऊंगा
मैं उनको अपने ज'म दिखाऊंगा
हमलावरों के बारे में बताऊंगा
मैं उन्हें कुछ फायदेमंद हिदायतें दूंगा

अधिकार नष्ट किये जा रहे हैं
छीनी जा रही हैं स्वाधीनताएं
संसद में सत्तावाले और प्रतिपक्ष मिल कर हंसते हैं डरावनी हंसी
चुपचाप अपना काम करने में भी
बढती जा रही हैं दुश्वारियां
अभूतपूर्व संकटों के इस दौर में विजयी हैं भ'ांतियां
ऐसा बार-बार कहे जाने के बावजूद
मैं बताऊंगा इन दिनों सहमे हुए स्वप्नों के बारे में
मैं बताऊंगा
पाशविकता के आगे अच्छाइयां कितनी कमजोर
हुई हैं पिछले दिनों अनेक बार
चारों तरफ बिखरी हैं इसकी मिसालें
अखबारों में हर सुबह कितनी खबरें
नैतिकता और नेकी के मुंह पर थूकती
कितने अकल्पनीय कितने जघन्य हैं
मनुष्यों के साथ कुछ मनुष्यों के कृत्य

मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा
न अपमान
न आरे सरीखे फाडतें दुखों की कथाएं
न पश्चाताप
न अपने इरादे जो खासे खतरनाक हैं
बडे सौदागरों, राजनेताओं, और शोहदों की
नशे में डूबी सतरंगी रातों के धुएं और राल में
लगातार झरती राख और अजनबी संगीत के जहर में
तांबई अंगरेजी झागदर फ'ांसीसी बोलती लडकियों
के मायालोक में सारी उम्मीदों के सिमट जाने के बावजूद
मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा

सफेद को नहीं कहूंगा स्याह
सही सही नामों से जिक' करूंगा चीजों का
हृदय में बचाये रखूंगा प्रकाशित जल से भरी नदियां सदानीरा
उन आकारों और रंगों को दुहराऊंगा आत्मीय तटों पर
जिनके स्पर्श से संपन्न हैं मेरे हाथ
मैं असं'य सुबहों और दिन-रातों के वृतांत कहूंगा
सिर्फ अन्याय की कथा और पीडा में नष्ट जिंदगियों के बारे में नहीं
मैं मुक्ति की रणनीति और बाहर भीतर के विराट संग'ाम के बारे में बताऊंगा
मै कुछ नहीं छिपाऊंगा।

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  1. 5 टिप्पणियां: Responses to “ पंकज सिंह की कवितायेँ : मैं कुछ नहीं छिपाऊंगा ”

  2. By Mired Mirage on January 31, 2008 at 1:44 AM

    हम्म ! बहुत सुन्दर !
    घुघूती बासूती

  3. By अजित वडनेरकर on February 2, 2008 at 11:34 AM

    सुंदर कविता है।
    पंकज जी गाड़िया लुहारों की फिर वापसी की बात क्यों कर रहे हैं ? क्यों इन्हें वापस आना चाहिये, क्यों धूप आग में तपना चाहिए...

  4. By Saurabh on February 4, 2008 at 12:00 AM

    Gaadia Luhar: Most wonderful poem I have read in past few years.

  5. By Arun Aditya on February 5, 2008 at 1:15 PM

    गज़ब।पाश की पंक्तियाँ 'हमें सब कुछ साफ साफ चाहिए' याद आ गयीं. शमशेर सम्मान के लिए पंकज जी को बधाई।

  6. By Kavi Kulwant on February 15, 2008 at 12:59 PM

    बहुत खूबसूरत..
    http://kavikulwant.blogspot.com
    कवि कुलवंत सिंह

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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