हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारतीय लोकतंत्र की शोभायात्रा : गुजरात से लेकर नंदीग्राम तक

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/18/2008 09:24:00 PM

अब तक गुजरात की जीत के बारे में जिस तरह से लिखा-कहा गया, मुझे लगता है कि वह सब न सिर्फ ऊपरी ढाँचे के बारे में सतही तौर पर कही गयी बातें थीं बल्कि, उनसे हम वाकई इस बात को समझाने में नाकाम रहे हैं कि आख़िर कैसे एक राज्य में इस तरह के नरसंहार करवाकर एक मुख्यमंत्री इस तरह जीत जाता है-वह भी डंके की चोट पर। और कैसे लोग उसके विकास के नारों की चपेट में आ जाते हैं? आख़िर इस विकास और इस फासीवाद का कोइ अंतर्संबंध भी है? क्या इसका कोइ सूत्र तलाशा जा सकता है? और क्यों एक खास क्रम में भारत में ऐसी घटनाओं में लगातार बढोतरी हुई है? आख़िर क्यों गुजरात में नरेन्द्र मोदीऔर नंदीग्राम में सीपीएम एक ही रास्ता अपनाते हैं? सुष्मिता ने इन सूत्रों की तलाश की है और ऐतिहासिक तौर पर उन कारणों की पड़ताल की है, जिनके ज़रिये हम अपने वक्त के घटनाक्रमों को बेहतर तरीके से समझ पायेंगे। यह थोडा लंबा भले है, मगर इसे पढा ज़रूर जाना चाहिए.

भारतीय लोकतंत्र की शोभायात्रा

गुजरात से लेकर नंदीग्राम तक


सुष्मिता
दि आप सत्ता से असहमति रखते हैं तो मार दिये जायेंगे. यदि आप हिंदू नहीं हैं तो मार दिये जायेंगे. अव्वल तो यह कि आप जीना चाहते हैं तो भी मार दिये जायेंगे. आपके मार दिये जाने के लिए इतनी वजह काफी है कि आप एक आदमी की तरह सोचते हैं एवं जिंदा हैं. क्या आपने भारतीय लोकतंत्र की शोभायात्रा का उद्धोष नहीं सुना? अब हम सब के जीने के अधिकारों का भी निर्धारण संसदीय राजनीति की थर्मामीटर से मापे जानेवाले 'बहुमत' से होगा? वित्तीय पूंजी की चाकरी में निकली यह शोभायात्रा करोडों उत्पीडित जनता को रौंदती हुई तेजी से आगे बढ रही है. मुख्यमंत्री अपने राज्य में नरसंहार करवाता है एवं तमाम विरोधों को यह कहते हुए चुनौती देता है कि वह बहुमत से चुना गया है. इतना ही नहीं, इसके सही या गलत होने के फैसले के लिए वह चुनाव में आने की चुनौती देता है. यदि नरेंद्र मोदी एवं भारतीय लोकतंत्र के अन्य पहरुओं की मानें तो गुजरात की जनता ने न केवल नरेंद्र मोदी द्वारा की गयी हत्याओं का अनुमोदन किया है बल्कि और ऐसे ही काम करने का लाइसेंस भी दिया है.

भारतीय लोकतंत्र का संकट और फासीवाद
नरेंद्र मोदी की सत्ता वापसी पर चर्चा का बाजार गर्म है. कई चर्चाओं में कांग्रेस व भाजपा के समीकरणों या फिर जातीय समीकरणों की बातें हो रही हैं. लेकिन इस सवाल के फलक तो कहीं ज्यादा व्यापक हैं. क्या नरेंद्र मोदी पहले शख्स हैं जो हत्याएं आयोजित करके फिर सत्ता में चुने गये हैं? इंदिरा गांधी ने भी देश में आपातकाल लागू किया. भयानक पैमाने पर पूरे देश में दमन हुआ, हत्याएं हुईं, लेकिन महज तीन सालों में फिर वे बहुमत से चुनी गयीं. ये तमाम तथ्य भारतीय लोकतंत्र पर उठाये जानेवाले सवालों को और मजबूत करते हैं. अर्धसामंतवाद एवं अर्धउपनिवेशवाद की बुनियाद पर खडा यह लोकतंत्र बढते आर्थिक संकट के साथ और ज्यादा प्रतिगामी होता गया है. यदि हम संसद के वर्तमान स्वरूप की भी चर्चा करें तो आज सत्ता का ज्यादा केंद्रीकरण कैबिनेट एवं उससे भी ज्यादा पूर्व निर्धारित स्टेंडिंग कमेटियों में हो गया है, जो कि आज मूल रूप से वित्तीय पूंजी की चाकरी करती हैं. अब तो मंत्रियों की भूमिका भी वित्तीय पूंजी ही निर्धारित कर रही है. भारतीय संसद की एक मुख्य विशेषता यह भी रही है कि यहां फासीवाद संसद से ही होकर निकला है. 1970 के दशक में आपातकाल लागू कर देश की जनता को र कर दिया गया. यह फैसला गैर लोकतांत्रिक हो सकता है, लेकिन संसदीय फ्रेमवर्क में यह गैर कानूनी नहीं है. इसको इतने अधिकार प्राप्त हैं कि एक कैबिनेट की बिना पर वह देश की अरबों जनता को र कर सकता है, यदि वह पूर्ण बहुमत में हो, क्योंकि कैबिनेट का ह्विप मानना सांसदों के लिए बाध्यता है. जाति, धर्म जैसे तमाम प्रतिगामी तरीकों का इस्तेमाल करने के बावजूद आज भारतीय संसद गहरे संकट से जूझ रही है. सामंती संस्थाएं एवं लोकतंत्र में अंतर्विरोध है. लोकतंत्र के बढने का मतलब है जाति, धर्म जैसी सामंती संस्थाओं की भूमिका का आम जीवन में क्रमशः कम होना, लेकिन हम देखते हैं कि जाति, धर्म जैसी संस्थाएं और ज्यादा मजबूत हुई हैं. बल्कि सच तो यह है कि भारतीय संसदीय राजनीति ने जाति एवं धर्म जैसी संस्थाओं को और मजबूत किया है. इसके अलावा इसके संकट का अंदाजा हम इस बात से लगा सकते हैं कि विभिन्न मतोंवाली कई पार्टियों के पक्ष एवं कई पार्टियों के विपक्ष में होने के बावजूद यह पांच साल तक सरकार नहीं चला पा रही है एवं अब भारतीय शासक वर्ग संविधान संशोधन की बात कर रहा है. वैसे भी आर्थिक एवं विदेशी मामलों में संसद बहस करने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकती है. संसद में आनेवाले बिलों की जगह अध्यादेशों ने ले ली है. आज सत्ता को प्राप्त तमाम आपातकालीन अधिकार ही शासन के सामान्य औजार बनते जा रहे हैं. इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र जनता के दमन के एक और औजार के बतौर इस्तेमाल किया जाता है. यह देश मे बढ रहे राजनीतिक संकट को स्पष्ट करता है.
आज
हम यदि देश के स्तर पर के संकेतों को पढें तो स्पष्ट है कि वित्तीय पूंजी की चाकरी में पूरी राजसत्ता मशगूल है. मेहनतकश जनता के तमाम संघर्षों एवं अधिकारों पर प्रतिबंध लगाये जा रहे हैं. न्यायपालिका भी पूरी तरह वित्तीय पूंजी की चाकरी में लगी है. कई मेहनतकश विरोधी, हडताल विरोधी एवं अन्य जनसंघर्ष विरोधी फैसलों में हम इसकी झलक पा सकते हैं. अरुंधति राय को नर्मदा के विस्थापित लोगों के पक्ष में खडा होने के लिए सजा भुगतनी पडती है, वहीं खून से सने हाथ लिये मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खुलेआम इस एलान से भी कि मानवता के दुश्मनों को सजा-ए-मौत दी जायेगी, जैसा कि सोहराबुीन के साथ किया गया, न्यायपालिका गौरवान्वित होती है. इन संकेतों से हम स्थिति को समझ सकते हैं. आज यह पूरे देश में जन संघर्षों के खिलाफ प्रतिक्रांतिकारी गिरोहों एवं जनता के ही एक हिस्से का इस्तेमाल कर रही है. तमाम शासकवर्गीय पार्टियां इसी नीति का अनुसरण कर रही हैं. गुजरात में हमने देखा कि नरेंद्र मोदी ने तमाम वर्गों एवं यहां तक कि दलितों एवं आदिवासियों को भी मुसलिमों के जनसंहार में उतारा. गुजरात के चुनाव परिणाम के तुरंत बाद उडीसा में चर्चों पर हमले जारी हैं. नंदीग्राम में सेज व उडीसा में पोस्को के खिलाफ संघर्षरत जनता के खिलाफ में सत्ता द्वारा उतारी गयी जनता में हम इसकी झलक देख सकते हैं. इसके अलावा छत्तीसगढ एवं अन्य नक्सली संघर्ष के इलाकों समेत राष्ट्रीयताओं के संघर्षों के खिलाफ भी 1990 के बाद से खडे किये गये निजी गिरोहों में हम इसका स्वरूप देख सकते हैं. सत्ता अपनी दमनकारी हरकतों के लिए जनता से समर्थन पाने के लिए जान-बूझ कर जनता में भयानक असुरक्षा और आतंक का माहौल बनाती है. बार-बार जनता को समझाया जाता है कि वे बारूद की ढेर पर बैठे हैं, जिसका रिमोट कहीं बांग्लादेश या पाकिस्तान में है. इसके आतंक का फायदा उठाते हुए भारत की जासूसी एजेंसियों एवं भारी-भरकम सुरक्षा खर्चे को जनता में जायज ठहराया जाता है. राजसत्ता जनता की इस असुरक्षा के भाव के जरिये जनता के दमन के लिए बनाये गये विभिन्न सरकारी कानूनी और गैर कानूनी जैसे छत्तीसगढ में सलवा जुडूम, आंध्र में ग्रेहाउंड्स कोबरा, झारखंड में नासुस, असम में सुल्फा इत्यादि गिरोहों और दमनकारी कानूनों को सही साबित करने की कोशिश करती है और जनता में अंतर्विरोध पैदा करती है.
इन तमाम संकेतों में यह सामान्य है कि शासक वर्ग (चाहे वह समाजवादी, वामपंथी या फिर दक्षिणपंथी हो) प्रतिक्रांतिकारी गिरोहों में आम जनता को संगठित कर देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जन संघर्षों के खिलाफ इस्तेमाल करता है. ये तमाम संकेत हमें फासीवाद की तरफ इशारा करते हैं, जिसकी जडें सीधे तौर पर राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था से जुडी हैं. दूसरा मुख्य संकेत यह भी है कि दंगे मूलतः उन्हीं इलाकों में होते हैं, जहां हाथ की कारीगरी मौजूद है. मसलन भागलपुर, जहां सिल्क का उद्योग है. अलीगढ, जहां ताले के उद्योग हैं. गुजरात, जहां भारी पैमाने पर छोटे-छोटे उद्योग हैं. साम्राज्यवाद का घरेलू तकनीक के साथ अंतर्विरोध होता है. वह घरेलू तकनीक को नष्ट करने लिए भी यह रास्ता अपनाता है. गुजरात के नरसंहार में भारी पैमाने पर उद्योगों को नष्ट किया गया था और इस पर तमाम औद्योगिक संस्थाओं ने चूं तक न की थी.
हालांकि देश में फासीवाद के लक्षण 1970 के दशक के दौरान से ही देखे जा सकते हैं. यह वही दौर है, जब दुनिया के स्तर पर फिर से मंदी के लक्षण स्पष्ट हो रहे थे. साम्राज्यवाद कीन्सीय औजारों के जरिये 1930 की जिस महामंदी से निकलने में सफल हुआ था, 1970 के दशक से वह फिर उसी दीर्घकालिक संकट में फंस गया. यही वह दौर है, जब भारत में आपातकाल लगाया गया. इंदिरा गांधी ने खुद ही अपने अंतिम दिनों में हिंदू अंधराष्ट्रवाद और गैर जनवादी औजारों को चरणबद्ध रूप से इस्तेमाल किया. इन तमाम तमाम फैसलों ने बढते राजनीतिक-आर्थिक संकट के दौर में एक प्रकार से फासीवाद के साथ भारतीय जनता का परिचय कराया. 1980 के दशक में ही आइएमएफ से पहली बार कर्ज लेकर ढांचागत समायोजन कार्यक्रम शुरू किया गया. राजीव गांधी के शासनकाल में गैर जनवादी नीतियां और हिंदू राष्ट्रवाद दोनों मजबूत हुए.

हिंदुत्व की फासीवादी ताकतों का राजनीतिक ताकत के रूप में उदय

यों तो भारत में हिंदुत्व की फासीवादी विचारधारा लगभग साढे सात दशकों से अस्तित्व में रही है, लेकिन सत्ता में इसकी वैसी कोई भूमिका नहीं रही. यह केवल पिछले ढाई दशकों में ही एक राजनीतिक ताकत के रूप में खडी हो सकी है. इसका सामाजिक आधार मूल रूप से ऊंची जातियों एवं हिंदू व्यापारी समुदायों के बीच था. 1980 के दशक में शासक वर्ग ने इसे फासीवादी विकल्प के रूप में विकसित करने का बीडा उठाया. आज इसने अपना आधार भी बढाया है एवं दलितों से लेकर पिछडी जातियों में अपनी पैठ बनायी है. इसने हिंदू राष्ट्रवाद का सवाल उठाया. तमाम शासकवर्गीय पार्टियों ने फासीवादी ताकतों के विकास में मजबूत भूमिका अदा की. संसदीय गठजोडों के लिए बनाये जानेवाले मोर्चों ने भी हिंदू फासीवाद को मजबूत किया है एवं उसे वैधता प्रदान की. कई क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मोर्चा बना कर इसने अपने नकाब को बरकरार रखा. भारतीय जनता पार्टी ने अपने शासनकाल में पहली बार बडे व्यावसायिक घरानों एवं उसके संगठनों-सीआइआइ, फिक्की, एसोचेम-को लेकर विभिन्न मंत्रालयों के साथ कई कमेटियों का निर्माण किया. यहां तक कि प्रधानमंत्री के कार्यालय के साथ भी संबंध स्थापित किये गये. लेकिन यह केवल ऐतिहासिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू है, जिसको हिंदुत्व की फासीवादी ताकतों ने अपने लाभ के लिए इस्तेमाल किया. हिंदू फासीवाद तो मूल रूप से एक राजनीतिक घटनाक्रम है, जो शासक वर्ग द्वारा लाया गया है, जिसके केंद्र में साम्राज्यवाद एवं देशी-विदेशी पूंजीपतियों एवं शासक वर्ग का बढता राजनीतिक-आर्थिक संकट है.
क्या फासीवाद का कोई खास सूत्रीकरण है? कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की विस्तारित कार्यकारिणी की 13वीं बैठक के अनुसार फासीवाद वित्तीय पूंजी के सबसे अधिकतर साम्राज्यवादी, अंधवादी और प्रतिक्रियावादी तत्वों की खुली आतंकवादी तानाशाही है. (1) दिमित्रोव हमें इस बात की भी चेतावनी देते हैं कि हमें हमेशा ही यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि आर्थिक एवं राजनीतिक दोनों संकट विद्यमान हों तो फासीवादी विचारधारा शासक वर्ग पैदा कर लेता है. अर्थात मूल सवाल राजनीतिक-आर्थिक संकट और वर्ग चरित्र का है. फासीवाद का विशेष चरित्र यह है कि फासीवाद प्रतिगामी शक्तियों द्वारा समर्थित होता है एवं इसका उपयोग वह अपनी कार्रवाइयों की वैधता के लिए करता है. इनके द्वारा खडे किये गये प्रतिगामी जनांदोलन सत्ता के साथ मिल कर खुली आतंकशाही और जनसंघर्षों पर दमन चलाते हैं. तोग्लियाती के अनुसार 'फासीवाद शब्द का इस्तेमाल तब किया जाना चाहिए, जब मजदूर वर्ग के खिलाफ संघर्ष शुरू हो और वह किसी जनाधार के सहारे चलाया जाये, जैसे निम्न पूंजीवाद पर आधारित होकर. यह विशेषता हमें जर्मनी, इटली, फ्रांस, इंग्लैंड इत्यादि उन सभी जगहों पर दिखायी देती है, जहां वास्तविक फासीवाद पाया जाता है (2). यदि हम देश के विभिन्न हिस्सों से आनेवाले संकेतों को पढें तो साफ-साफ मालूम होता है कि पूरी राजसत्ता फासीवादी बनती जा रही है. जाहिर तौर पर इसकी जडें साम्राज्यवाद के गहरे आर्थिक संकट से जुडी हैं, जो भयानक राजनीतिक संकट को भी बढा रहा है.

सांसें गिनता साम्राज्यवाद एवं बढता फासीवाद

फासीवाद का वित्तीय पूंजी के साथ सीधा संबंध है. 1930 की महामंदी के बाद साम्राज्यवाद ने कीन्सीय औजारों के जरिये कुछ समय के लिए और मोहलत हासिल की. इसके अलावा इसे थोडी और मोहलत इसलिए भी मिली क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सीधे औपनिवेशिक बंधनों से मुक्त हुए उत्पीडित देशों में पूंजीवाद या फिर राजकीय एकाधिकार पूंजीवाद की स्थापना ने इसे थोडे समय के लिए और जीवनदान दिया. लेकिन साम्राज्यवाद वास्तव में और ज्यादा मरता और सडता जा रहा है. इसकी सडांध तो और कहीं ज्यादा व्यापक थी. साम्राज्यवाद पुनः 1970 के दशक से दीर्घकालिक संकट में फंसता गया. 1970 के दशक तक सट्टेबाज पूंजी अपने लिए रास्ते तलाशती रही. इसका हल भी आइएमएफ, वर्ल्ड बैंक एवं भूमंडलीकरण के जरिये निकाल लिया गया. 1980 के दशक में तीसरी दुनिया के देशों को दिये जानेवाले कर्जे में इस बेकार पूंजी ने अपने लिए रास्ता ढूंढा. 1990 के बाद भूमंडलीकरण के जरिये इसने दुनिया के बाजारों को हासिल करके फिर थोडे समय के लिए संकट से बाहर आने की कोशिश की. लेकिन इसके बावजूद संकट का कोई अंत नहीं था. 2002 की शुरुआत में डॉट कॉम बुलबुला फूटने के बाद इसकी रही-सही कसर भी निकल गयी. इसके बाद से ही विश्व एवं अमेरिकी अर्थव्यवस्था सिकुडती गयी. इंटरनेट बुलबुले के फूटने के बाद फेडरल रिजर्व (अमेरिकी केंद्रीय बैंक) ने हाउसिंग बुलबुले के जरिये इस संकट को पार करने की कोशिश की. कुछ समय तक तो वह सफल हुआ, लेकिन 15 अगस्त, 2007 को यह बुरी तरह धराशायी हो गया, जिसे सब प्राइम संकट कहा गया. इस संकट के प्रभाव काफी दूरगामी हैं. आइएमएफ के तात्कालिक प्रबंध निदेशक रोडिगो राटो के अनुसार 'अमेरिका इस संकट के प्रभाव का शिकार लंबे समय तक रहेगा. इस संकट के प्रभाव को कम करके नहीं देखा जाना चाहिए एवं इसके ठीक होने की प्रक्रिया दीर्घकालिक होगी. साख (क्रेडिट) की स्थिति जल्दी सामान्य नहीं होगी.' इसके आगे उनका कहना है कि इसका प्रभाव वास्तविक अर्थव्यवस्था पर पडेगा एवं यह 2008 में सबसे ज्यादा महसूस किया जायेगा (3). हम अमेरिकी अर्थव्यवस्था, जो अब भी दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था है, के इस संकट को समझ सकते हैं. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह उस बाजार में पहला संकट है, जहां कर्जों एवं परिसंपत्तियों की जमानत पर निर्मित नये 'उत्पादों' की विश्व स्तर पर खरीद-फरोख्त होती है. इस पूरे संकट का दुष्प्रभाव अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर व दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पडना लाजिमी है. फिर मंदी के आसार देखे जाने लगे हैं, जो भूमंडलीय आर्थिक संकट को और बढा देगी.
अमेरिकी सब प्राइम बाजार के संकट से पूरी दुनिया के शेयर बाजार लडखडाने लगे. इस संकट के परिणाम इतने गहरे थे कि विश्व के कई नेतृत्वकारी बैंकों को गंभीर खतरा हो गया. इनको बचाने के लिए केंद्रीय बैंकों ने भारी पैमाने पर धन डाला. यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने 130 बिलियन डॉलर, जापान के बैंक ने एक ट्रिलियन डॉलर एवं अमेरिकी फेडरल ने 43 बिलियन डॉलर इसमें लगाये. इस दौर के संकट के आयाम तो पिछले समयों के तमाम संकटों से काफी व्यापक हैं. इसका मूल कारण यह है कि साम्राज्यवाद ने उन तमाम कीन्सीय एवं अन्य औजारों का इस्तेमाल कर लिया, जिसके जरिये वह महामंदी से बाहर निकला था, लेकिन संकट में बदलाव के कहीं कोई खास संकेत नहीं हैं. इन संकटों के परिणामस्वरूप उत्पीडित देशों में और ज्यादा भयानक पैमाने पर लूट-खसोट मचायी जायेगी, जिसका माध्यम भूमंडलीकरण होगा. अमेरिका द्वारा अपने देश से बाहर किये गये, निवेश के जरिये कमाये गये मुनाफे पर नजर डालें तो 1970 के दशक के 11 प्रतिशत से बढ कर 1980 एवं 1990 के दशक में यह क्रमशः 15 एवं 16 प्रतिशत तथा 2000-04 के बीच यह औसतन 18 प्रतिशत था (4). इसके अलावा सट्टेबाजी में और वृद्धि होगी. हम यदि पिछले 30 सालों के रूझानों पर नजर डालें तो न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज में 1975 में लगभग 19 मिलियन शेयर की खरीद-फरोख्त होती थी. यह 1985 में 109 मिलियन से बढ कर 2006 में 1,600 मिलियन तक पहुंच गया. विश्व मुद्रा बाजार में खरीद-फरोख्त इससे कहीं ज्यादा है. यह 1977 के 18 मिलियन डॉलर प्रतिदिन से बढ कर 2006 में 1.8 ट्रिलियन डॉलर प्रतिदिन हो गया. इसका मतलब था कि प्रत्येक 24 घंटे में मुद्रा की खरीद-फरोख्त पूरी दुनिया के वार्षिक जीडीपी के बराबर थी(5). अर्थात मुनाफे की भूख में आवारा पूंजी और ज्यादा मुंह मारती फिरेगी. इससे हम विश्व की अर्थव्यवस्था की अस्थिरता का अंदाजा भर लगा सकते हैं.
इसके अलावा केंद्रीकरण में भी भयानक स्तर तक इजाफा हुआ है. नवंबर/दिसंबर, 2005 में प्रकाशित एक अध्ययन पर नजर डालें तो दुनिया की 10 बडी दवा कंपनियों का 98 नेतृत्वकारी घरानों के 59 प्रतिशत शेयर पर नियंत्रण था. दुनिया के 21,000 मिलियन डॉलर के व्यावसायिक बीज बाजार के लगभग 50 प्रतिशत पर 10 बडी कंपनियों का नियंत्रण था. 29,566 मिलियन डॉलर के विश्व कीटनाशक बाजार के लगभग 89 प्रतिशत का नियंत्रण 10 बडी कंपनियों के हाथ में था. विश्लेषकों के अनुसार 2015 तक केवल तीन कंपनियों का पूरे कीटनाशक बाजार पर कब्जा होगा. 2004 में फूड रिटेल बाजार के अनुमानित आकार 3.5 ट्रिलियन डॉलर के 24 प्रतिशत हिस्से (84,000 मिलियन डॉलर) पर 10 बडी कंपनियों का कब्जा था. इन इजारेदारियों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि हमारे आम सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक जीवन का निर्धारण किस तरह से पारदेशीय निगम कर रहे हैं. भूमंडलीकरण के शुरुआती दौर (1990) में कहा गया था कि निगमों के विलय का दौर समाप्त हो गया है, लेकिन 2004 की शुरुआत में विश्व स्तर पर विलयों एवं अधिग्रहणों का आंकडा 1.95 ट्रिलियन डॉलर का था. यह 2004 में 2003 के 1.38 ट्रिलियन डॉलर से 40 प्रतिशत बढ गया था. 2004 में 200 बडे पारदेशीय निगमों की संयुक्त बिक्री विश्व की संपूर्ण आर्थिक गतिविधियों की 29 प्रतिशत थी. यह लगभग 11,442,253 मिलियन डॉलर के बराबर थी. धन के संकेंद्रण का अंदाजा हम इस बात से भी लगा सकते हैं कि दुनिया के 946 अरबपतियों के धन में प्रतिवर्ष लगभग 35 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है. वहीं दुनिया की आबादी के नीचे के 55 प्रतिशत लोगों की आय में या तो गिरावट है या ठहराव है. जेम्स पेत्रास ने लिखा है कि रूस, लैटिन अमेरिका और चीन (जहां 10 से भी कम सालों में 20 अरबपतियों ने 29.4 बिलियन डॉलर जमा किये हैं) में वर्गीय एवं आय असमानताओं को देखते हुए इन देशों को उभरती हुई अर्थव्यवस्था के बजाय उभरते हुए अरबपति कहना ज्यादा मुनासिब होगा. पिछडे देशों में भूमंडलीकरण को जनता के तमाम संकटों का समाधान बताया गया. सरकारी अर्थशास्त्रियों ने हमें पढाया कि अंततः पूंजी का प्रवाह अमीर से गरीब देशों की तरफ होता है. लेकिन 'द इकोनॉमिस्ट' पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2004 में उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं ने अमीर देशों को 350 बिलियन डॉलर भेजे(6). केंद्रीकरण के ये तमाम तथ्य इस ओर इशारा करते हैं कि साम्राज्यवाद और कितने गहरे संकट में फंसता जा रहा है. हम जानते हैं कि साम्राज्यवाद के संकट का सबसे मूल कारण मालिकाने का निजी स्वरूप और उत्पादन के सामूहिक चरित्र के बीच अंतर्विरोध है. ये तमाम प्रक्रियाएं साम्राज्यवाद के तमाम अंतर्विरोधों को और भयानक पैमाने पर तीखा करती जायेंगी. हम कह सकते हैं कि लेनिन के समय का साम्राज्यवाद यदि परजीवी और मरणासन्न था तो आज वह उससे हजार गुना परजीवी और मरणासन्न है. साम्राज्यवाद इससे बचने के लिए और प्रतिगामी रुख अपनायेगा. परिणामस्वरूप गरीब देशों की लूट और भयानक स्तर पर बढ जायेगी. साम्राज्यवादी युद्ध के खर्चों में वृद्धि होगी. हथियारों के बाजार को और प्रोत्साहित किया जायेगा. तमाम देशों में नस्लीय एवं धार्मिक नफरतों को भडकाया जायेगा. और तो और मुनाफे के स्तर को बनाये रखने के लिए भयानक नरसंहार किये जायेंगे. चूंकि साम्राज्यवाद के पास अंततः यही औजार हैं.
भारतीय अर्थव्यवस्था के मुखिया भले ही भारतीय जनता को अर्थव्यवस्था के फूलप्रूफ होने के सब्जबाग दिखाते रहें, लेकिन उनको भी पता है कि स्थिति उतनी अच्छी नहीं है. अमेरिका के सब प्राइम संकट के बाद विदेशी संस्थागत निवेशकों ने अगस्त में सबसे ज्यादा बिक्री की. यह 1990 में उनकी भागीदारी से अब तक एक महीने में सबसे अधिक थी. अर्थात अमेरिकी बाजार का एक संकट पूरे बाजार को हिला देने की क्षमता रखता है. भारत के दलाल पूंजीपति घराने आज ज्यादा से ज्यादा हद तक साम्राज्यवादियों के साथ जुडे हुए हैं. कई बडे बैंक भारतीय से अधिक विदेशी हो चुके हैं. भारत में स्टॉक बाजार में भारी पैमाने पर विदेशी संस्थागत निवेश की मूल वजह तो सब प्राइम बाजार का संकट, अमेरिकी ब्याज दरों का कम होना रहा है, न कि भारतीय अर्थव्यवस्था का काफी मजबूत होना. अर्थव्यवस्था में विदेशी नियंत्रण भयावह पैमाने पर बढ गये हैं. दूर संचार क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश लगभग 74 प्रतिशत है. भारत का रियल एस्टेट बूम भी अमेरिकी रास्ते पर ही बढ रहा है. कृषि संकट जग जाहिर है. देश में खाद्यान्न उत्पादन की दर में भारी गिरावट थी, जो पिछले 30 सालों में सबसे अधिक थी. बाजार में मुद्रास्फीति की मूल वजह खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट थी. विदेशी कर्ज 2006-07 के दौरान 23 प्रतिशत बढ कर 155 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया. यह पूरी जीडीपी का लगभग 16.4 प्रतिशत है. मई, 2007 से ही अर्थव्यवस्था की विकास दर के धीमे होने के संकेत हैं. विदेशी पूंजी पर इस हद तक निर्भरता से स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का छोटा संकट भी भारतीय अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोर देगा. इसके अलावा भूमंडलीकरण के दौर में भयानक पैमाने पर संकेंद्रण में भी वृद्धि हुई है. जेम्स पेत्रास के अनुसार 'भारत में जहां अरबपतियों की संख्या एशिया में सबसे अधिक, 36, है-की कुल संपत्ति लगभग 191 बिलियन डॉलर की है. ऐसे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह माओवादियों एवं देश देश के सबसे गरीब इलाकों के जन संघर्षों को सबसे बडा आंतरिक खतरा घोषित करते हैं. चीन 20 अरबपतियों की 29.4 बिलियन डॉलर की संपत्ति के साथ दूसरे नंबर पर है. इस दौर में भयानक पैमाने पर प्रतिरोधों का सामना कर रहे नये शासकों ने प्रदर्शन एवं दंगा विरोधी विशेष सशस्त्र बलों की संख्या में 100 गुना वृद्धि की है (7). अर्थात बढते जनसंघर्षों का सीधा संबंध इन आर्थिक संकटों एवं संकेंद्रणों से है. इससे निबटने के लिए शासक वर्ग के पास फासीवाद के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.

सामाजिक जनवाद और
फासीवाद
भारत में सामाजिक जनवाद, जो कि मूलतः सामाजिक फासीवाद में बदल चुका है, ने भी फासीवाद के विकास में भूमिका निभायी. इसने जान-बूझ कर इसके वर्गीय चरित्र एवं वित्तीय पूंजी के साथ रिश्ते के पहलुओं को अनदेखा किया. इसका एक बडा कारण था कि जिन राज्यों में यह लंबे समय से सत्ता में है, वहां इसका भी वर्गीय आधार कमोबेश वही है एवं वित्तीय पूंजी की इसकी भूख तो जग जाहिर है. संसदवाद की दलदल में सिर से पैर तक धंसे इन तमाम झूठे मार्क्सवादियों ने फासीवाद के खिलाफ तमाम संघर्षों को संसदवाद के समीकरणों में जान-बूझ कर फंसाये रखा. वित्तीय पूंजी की तिजारती में तो इसने शासकवर्गीय पार्टियों को भी पीछे छोड दिया है. इसने जनता की गोलबंदी को न केवल वित्तीय पूंजी के हित के लिए इस्तेमाल किया, बल्कि उसने इन जन समूहों का इस्तेमाल वित्तीय पूंजी के खिलाफ संघर्षरत जनता के दमन के लिए किया. इसने भूमि सुधार की भयानक डींगें हांकीं, लेकिन सर्वविदित है कि अधिगृहीत जमीनों का बडा हिस्सा अब भी कानूनी पचडे में फंसा हुआ है. इसने किसानों को बांटने के लिए जमीनें जमींदारों से लेने में उतनी तत्परता नहीं दिखायी, जितनी साम्राज्यवादियों के लिए किसानों से छीनने में. फासिज्म के सत्तारूढ होने के बारे में सामाजिक जनवादियों की भूमिका पर दिमित्रोव ने लिखा : 'फासिज्म इसलिए भी सत्तारूढ हुआ, क्योंकि सर्वहारा ने खुद को स्वाभाविक मित्रों से अलग-थलग पाया. फासिज्म इसलिए भी सत्तारूढ हुआ क्योंकि किसानों के विशाल समुदाय को वह अपने पक्ष में लाने में सफल हुआ और इसका कारण यह था कि सामाजिक जनवादियों ने मजदूर वर्ग के नाम पर ऐसी नीति का अनुसरण किया, जो दरअसल किसानविरोधी थीं. किसानों की आंखों के सामने कई सामाजिक जनवादी सरकारें सत्ता में आयीं, जो उनकी दृष्टि में मजदूर वर्ग की सत्ता का मूर्तिमान रूप थीं, पर उनमें से एक ने भी किसानों की गरीबी का खात्मा नहीं किया, एक ने भी किसानों को जमीन नहीं दी. जर्मनी में, सामाजिक जनवादियों ने जमींदारों को छुआ तक नहीं, उन्होंने खेत मजदूरों की हडतालों को कुचला...'(8) क्या यह पूरी तरह भारत के भी सामाजिक जनवादियों के लिए सही नहीं है? भारत के भी सामाजिक जनवादियों ने मेहनतकशों को विकास के हित में हडताल न करने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि अभी वर्ग संघर्ष का नहीं बल्कि वर्ग सहयोग का वक्त है.
अक्सर फासीवाद को रोकने के नाम पर यहां के सामाजिक जनवादियों ने दलाल बुर्जुआ एवं सामंती शासक वर्ग के दूसरे हिस्से के साथ गठजोड किया, जिनके फासीवाद के रूप में विकसित होने के पर्याप्त कारण मौजूद थे. इन्हीं सवालों पर दिमित्रोव ने लिखा :'क्या जर्मन सामाजिक जनवादी पार्टी सत्तारूढ नहीं थी? क्या स्पेनिश सोशलिस्ट उसी सरकार में नहीं थे, जिसमें पूंजीपति शामिल थे? क्या इन देशों में पूंजीवादी साझा सरकारों में सामाजिक जनवादी पार्टियों की शिरकत ने फासिज्म को सर्वहारा पर हमला करने से रोका? नहीं रोका. फलतः यह दिन की रोशनी की तरह साफ है कि पूंजीवादी सरकारों में सामाजिक जनवादी मंत्रियों की शिरकत फासिज्म के रास्ते में दीवार नहीं है' (9). दिमित्रोव के शब्दों से ही सामाजिक जनवादियों के ढोंग स्पष्ट हो जाते हैं.
2003 में पंचायत चुनाव के बाद वेंकैया नायडू ने बुद्धदेव भट्टाचार्य के बारे में अपने एक साक्षात्कार में कहा : 'बुद्धदेव बाबू एक सुसंस्कृत आदमी हैं. लेकिन क्या उनके आदेश से पार्टी चलती है? पोटा पर उनकी राय को कौन नहीं जानता? लेकिन क्या इसे वे अपने राज्य में लागू कर सकते थे? वे इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि कई गैर कानूनी मदरसों से विध्वंसकारी गतिविधियां चलायी जा रही हैं एवं वे कडे कदम उठाना चाहते हैं.' (10)
2002 से ही बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मदरसों के खिलाफ बातें व पश्चिम बंगाल में पोटा जैसे कानून को लागू करने की बात शुरू कर दी थी. इसके अलावा 6 मई, 2003 को तपन सिकदर पर हुए हमले पर दुख जताने के लिए बुद्धदेव ने आडवाणी को फोन किया(11). इस पर तपन सिकदर ने बुद्धदेव एवं सीपीएम के राज्य नेतृत्व द्वारा हमले के बाद की प्रतिक्रिया पर आभार जताया.
हम इन तमाम संकेतों से सामाजिक जनवादियों के वर्ग चरित्र को समझ सकते हैं. जो मुख्यमंत्री गरीब किसान जनता की विदेशी पूंजी के हित में हत्याएं करवाता हो और इस पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहता हो कि उन्हीं की भाषा में जवाब दे दिया गया है, वही मुख्यमंत्री फासीवादियों पर हमले के लिए माफी मांगता हो, यह हमें काफी कुछ कह जाता है. इन सामाजिक जनवादियों ने भारत के ग्रामीण इलाकों में संघर्षरत ताकतों को ही सबसे बडा खतरा बताया. नंदीग्राम की घटना में इसने शासक वर्ग को माओवादियों के खतरे को समझने की सलाह दी. ऐसे खतरों के बारे में बात करनेवालों के बारे में दिमित्रोव ने कहा : 'दूसरे इउंटरनेशनल के सठियाये सिद्धांतकार कार्ल काउत्स्की जैसे भारी नक्काल, पूंजीपति वर्ग के चाकर ही मजदूरों को इस तरह की झिडकियां दे सकते हैं कि उन्हें ऑस्ट्रिया और स्पेन में हथियार नहीं उठाने चाहिए थे. अगर ऑस्ट्रिया और स्पेन में मजदूर वर्ग काउत्स्की जैसों की गारी भरी सलाहों से निर्देशित होते, तो इन देशों में आज मजदूर वर्ग का आंदोलन कैसा दिखता?' (12).
आज सामाजिक जनवाद हमें सलाह दे रहा है कि हमें अब समाजवाद के सपनों को भूल जाना चाहिए. हमें भूल जाना चाहिए कि मानव सभ्यता का इतिहास हमारे भाइयों-बहनों एवं मेहनतकशों के खून से रक्तरंजित है. हमें भूल जाना चाहिए कि इन बर्बर सत्ताओं ने मुनाफे की लूट के लिए पूरी दुनिया को खून के समुंदर में डुबो दिया. हमें भूल जाना चाहिए कि हमारे दोस्तों ने जार एवं च्यांग काई शेक का ध्वंस कर एक नयी व्यवस्था के लिए कुरबानी दी. हमें यह समझाया जा रहा है कि मजदूर वर्ग के करोडों बेटे-बेटियों की अब तक की शहादत बेमानी है एवं समाजवाद उनका दिमागी फितूर था. हमें भूल जाना चाहिए कि हिरोशिमा व नागासाकी में पूरी मानव सभ्यता को मुनाफे के लिए नष्ट कर दिया गया. हमें भूल जाना चाहिए कि इन मुनाफाखोर लुटेरों के हाथ वियतनाम, चिली एवं अन्य देशों में हमारे भाइयों-बहनों के खून से सने हैं. जनता समाजवाद के सपनों को भूल नहीं सकती. काउत्स्की की विरासत जनता की विरासत नहीं है. जनता की विरासत तो महान क्रिस्टोफर कॉडवेल, लोरका और केन सारो वीवा जैसे लेखकों और बुद्धिजीवियों की व उन महान सोवियत बेटे-बेटियों की विरासत है, जिन्होंने स्टालिन के नेतृत्व में दुनिया के नक्शे को बदल देने का सपना पालनेवाले हिटलर के खूनी पंजों को तोड दिया.
तथ्य यह दिखाते हैं कि दुनिया के स्तर पर साम्राज्यवाद के संकट के नये दौर की शुरुआत एवं भारत में विदेशी पूंजी का प्रवेश ही भारत में हिंदुत्व की फासीवादी ताकतों एवं कानूनों के उदय का दौर है. जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी की भूमिका बढी है, वैसे-वैसे दंगों एवं नफरतों का दौर भी शुरू हुआ है तथा गैर जनवादी औजारों का इस्तेमाल बढता गया है. गुजरात से लेकर नंदीग्राम तक की भारतीय लोकतंत्र की शोभायात्रा का संबंध भी इसी विदेशी पूंजी के साथ है. राजनीतिक संकट में लगातार वृद्धि ने भी तमाम शासकीय पार्टियों को तमाम प्रतिगामी तरीकों के इस्तेमाल की तरफ बढाया है. इन संकटों से जूझ रहे शासकवर्ग के पास फासीवाद के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है. सामाजिक जनवादी और अन्य उदारवादी ताकतें फासीवाद की ताकत को बढा-चढा कर दिखा कर अंततः फासीवाद की चाल को ही पूरा करते हैं. इस तथ्य को वे अनदेखा करते हैं कि बढते जन संघर्षों एवं अपने गहराते संकट से ही निकलने के लिए वह फासीवाद का इस्तेमाल करता है. शासक वर्ग अपनी सत्ता को बचाये रखने के लिए धार्मिक एवं जातीय विभाजन एवं जनता के आपसी अंतर्विरोधों को लगातार तीखा कर रहा है. लेकिन इन्हीं भयानक संकटों के बीच जनता उठ खडी होती है व अपने संकटों को हल करने के लिए भारी जनसंघर्षों में गोलबंद होती है. इसमें जनसंघर्ष ही प्रधान पहलू हैं, जिसकी ताकत के बारे में लेनिन कहते हैं, 'गृहयुद्ध की पाठशाला जनता को प्रभावित किये बिना नहीं छोडेगी. यह एक कठोर पाठशाला है और इसके पूर्ण पाठ्यक्रम में अनिवार्यतः प्रतिक्रांति की जीतें, क्रुद्ध प्रतिक्रियावादियों की लंपटताएं, पुरानी सरकारों द्वारा विद्रोहियों को दी गयी बर्बरतापूर्ण सजाएं आदि शामिल होती हैं. किंतु इस तथ्य पर कि राष्ट्र इस कष्टकर पाठशाला में भरती हो रहे हैं, वे ही आंसू बहायेंगे जो सरासर दंभी और दिमागी तौर पर बेजुबान पुतले होंगे, यह पाठशाला उत्पीडित वर्गों को यह सिखाती है कि गृहयुद्ध कैसे चलाया जाये, यह सिखाती है कि किस तरह विजयी क्रांति संपन्न करनी चाहिए, यह आज के गुलामों के समुदाय में इस नफरत को घनीभूत कर देती है, जिसे पददलित, निश्चेष्ट, ज्ञानशून्य गुलाम अपने हृदय में हमेशा पाले रहते हैं और जो उन गुलामों से, जो अपनी गुलामी की लानत के बारे में जागरूक हो जाते हैं, महानतम ऐतिहासिक कारनामे कराती है'(13).
आज फिर शासक वर्ग लगातार फासीवादी होता जा रहा है. फासीवाद अपराजेय नहीं है. यह शासक वर्ग को और पतन की ओर ले जायेगा. दूसरी तरफ जनता के महान संघर्षों की रफ्तार भी बढी है, जिसे कुचलने के लिए शासक वर्ग और फासीवादी हो रहा है. आज फिर साम्राज्यवाद महामंदी के बाद सबसे गंभीर संकट से जूझ रहा है. यह ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रियावादी हो रहा है. लेकिन दूसरी तरफ लैटिन अमेरिका सहित एशिया के बडे हिस्सों की जनता ज्यादा-से-ज्यादा संघर्ष में शामिल हो रही है. आज फिर फासीवाद को परास्त करने की महान जिम्मेदारियां फासीवाद के खिलाफ कुरबान हुए सोवियत बेटे-बेटियों एवं मुनाफाखोर सत्ता को ध्वंस करने के लिए कुरबान हुए महान योद्धाओं के उत्तराधिकारियों पर है. मेहनतकशों की जीत अवश्यंभावी है, क्योंकि जनता ही सृष्टि करती है. सत्ता तो केवल और केवल दमन करती है.

1. फासीवाद के खिलाफ जनमोर्चा, ज्यार्जी दिमित्रोव
2. फासीवाद और उसकी कार्यपद्धति, पामीरो तोग्लियाती
3. द इंडिपेंडेंट, 25 सितंबर, 2007
4. मंथली रिव्यू, दिसंबर, 2006
5. -वही-
6. द इकोनॉमिस्ट, 24 सितंबर, 2004
7. ग्लोबल रूलिंग क्लास, जेम्स पेत्रास
8. फासीवाद के खिलाफ जनमोर्चा, ज्यार्जी दिमित्रोव
9. -वही-
10. आनंदबाजार पत्रिका, 24 अप्रैल, 2003
11. हिंदुस्तान टाइम्स, 7 मई, 2003
12. फासीवाद के खिलाफ जनमोर्चा, ज्यार्जी दिमित्रोव
13. -वही (उद्धृत)-

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ भारतीय लोकतंत्र की शोभायात्रा : गुजरात से लेकर नंदीग्राम तक ”

  2. By Dr.Rupesh Shrivastava on January 19, 2008 at 3:24 PM

    आत्मा को झकझोरने वाले सत्य उजागर होते हैं ।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें