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बीच सफ़हे की लड़ाई

न्याय का दिन कितनी दूर है : अनुसूइया सेन

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/06/2008 10:51:00 PM

डॉ विनायक सेन की मां की अपील

14 मई को रायपुर में पीयूसीएल के उपाध्यक्ष डॉ विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद से उनकी जमानत की सारी कोशिशें विफल हुई हैं। हाल ही में उनकी माँ अनुसूइया सेन ने यह अपील जारी की है। देश में जिस तरह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं पर शासकीय प्रताड़ना बढ़ रही है, वह चिंताजनक है। यह अपील इस चिंता को भी सामने लाती है। मूल अंगरेजी में यह अपील कई (, 2) वेब साइटों पर मौजूद है और इसके कुछ हिस्से बिजनेस स्टैंडर्ड में छपे. प्रस्तुत है इसका हिन्दी अनुवाद।


अनुसूइया सेन

मैं एक ८० साल की औरत हूं. जब हम युवा थे, लोग कर्मयोगियों से प्रेरित रहते थे, जो देशभक्त थे, सेवा के आदर्शों से भरेपूरे, बुद्धिमान और गुणवान. हम अपने को गौरवान्वित महसूस करते अगर हम उनके पदचिह्नों पर चल सकते.मैं अब तक उस अन्याय और हिंसा की एक मूक दर्शक थी, जो आज के हमारे स्वतंत्र लोकतंत्र में व्याप्त है, लेकिन केवल इसलिए कि मैं निजी तौर पर इससे अछूती थी। लेकिन अब, एक उम्रदराज मां के बतौर, और घोर अन्याय के आघात से, मैं अपनी चुप्पी तोडना चाहती हूं. अपने दर्द में टूटी हुई ८१ साल की उम्र में, मैं आजाद, लोकतांत्रिक भारत के लोगों से एक विनम्र अपील करना चाहती हूं.

आप
में से अनेक संभवतः यह जानते होंगे कि मेरा बेटा डॉ विनायक सेन, घोर अन्याय का एक शिकार, आज जेल में है. चार साल की उम्र में वह अन्याय के सवालों के साथ दोचार था : क्यों वह लडका जो हमारे घर में हमारी मदद करता है, हमारे साथ खा नहीं ? क्यों वह किचेन के फर्श पर अकेले खाता ? क्यों वह हमारे साथ खाने पर नहीं बैठ ?
वह २२ साल की उम्र में वेल्लोर के क्रिस्चियन मेडिकल कॉलेज से अपनी पहली मेडिकल डिग्री में डिस्टिंक्शन के साथ स्नातक बना, उसने इंग्लैंड जाकर एमआरसीपी का अध्ययन करने की अपने पिता की इच्छा को मानने से इनकार कर दिया। उसने जोर देकर कहा कि उसे अपने देश में लोगों का इलाज करने के लिए जितने ज्ञान की जरूरत है, उसे वह यहीं पा लेगा. उसने इसके बाद वेल्लोर से ही बाल रोग में एमडी किया और तब एक सहायक प्रोफेसर के बतौर जेएनयू गया, इस इच्छा के साथ कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य में पीएचडी करेगा. लेकिन उसने और देर बरदाश्त नहीं की. उसने मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में फ्रेंड्स रूरल सेंटर द्वारा चलाये जा रहे टीबी शोध केंद्र और अस्पताल जाने के लिए जेएनयू का अपना एकेडमिक कार्य छोड दिया.

यहाँ
दो साल के बाद उसे छत्तीसगढ के किशोरों के बीच काम करने का अवसर मिला।
वहाँ वह दिवंगत स्वतंत्र टेड यूनियनिस्ट शंकर गुहा नियोगी से जुडा और खुद को भिलाई कारखानों के दिहाडी मजदूरों और डल्ली राजहरा तथा नंदिनी के खदानों के खदान कर्मचारियों और उनके परिवारों की निस्स्वार्थ सेवा तथा गरीबों और उत्पीडित लोगों को उनकी सामाजिक बुराइयों से निजात पाने में उनके रोजमर्रा के संघर्षों में अनथक रूप से सहायता करने और उन्हें संगठित करने के काम में सौंप दिया. वहीं, शंकर गुहा नियोगी के छत्तीसगढ खदान श्रमिक संघ के साथ काम करते हुए, डॉ सेन ने इलाके के मजदूरों के लिए उन्हीं के द्वारा एक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना की. कुछ ही सालों के भीतर यह २५ बिस्तरोंवाले एक हॉस्पिटल में विकसित हो गया. डॉ सेन ने तब यह हॉस्पिटल मजदूरों और कुछ डॉक्टरों-जो वहां उसके कामकाज से प्रेरित थे-की देखरेख में छोड दिया और वे रायपुर में अपनी पत्नी डॉ इलीना सेन के पास रूपांतर नाम का एक एनजीओ शुरू करने आ गये. यह संगठन सामुदायिक स्वास्थ्य, पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ खेती, महिलाओं की आत्मनिर्भरता में उनकी सहायता और बच्चों और वयस्कों की औपचारिक-अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में काम करता है. हर क्षेत्र में काम सफलतापूर्वक तेजी से चल रहा था.
जब भाटागांव में चावल शोध केंद्र खुला, एक वैज्ञानिक ने अपने लेखन में डॉ सेन को एक किसान डॉ सेन्व के रूप में उद्धृत किया. डॉ सेन ने धमतरी और बस्तर के गांवों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी खोले, खुद को मरीजों का इलाज करने और प्राथमिक स्वास्थ्य की देखरेख के लिए तथा उनके समुदायों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता फैलाने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करने में लगा दिया. अनेक गांवों में प्राथमिक और वयस्क शिक्षा केंद्र खोले. डॉ सेन के उदाहरण से प्रेरित एम्स जैसे मशहूर मेडिकल संस्थानों के अनेक डॉक्टरों ने बिलासपुर में ऐसे ही स्वास्थ्य केंद्र खोलने के लिए अपना कमाऊ कैरियर और अपनी आरामदेह जीवनशैली छोड दी. ये केंद्र अब सफलतापूर्वक चल रहे हैं.

रायपुर में रूपांतर के साथ काम करते हुए, डॉ सेन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) से इसके अखिल भारतीय उपाध्यक्ष तथा छत्तीसगढ के सचिव के बतौर जुडे. गरीबों और उत्पीडित लोगों के बीच अपना चिकित्सकीय कार्य करते हुए, जो कि पहले ही उनका सारा समय ले लेता था, वे अब बस्तर जिले के गरीब आदिवासियों के प्रति शासन के दुर्व्यवहारों से अवगत हुए, और उन्होंने सरकार प्रायोजित सलवा जुडूम आंदोलन का विरोध किया, जिसने कि आदिवासियों को एक दूसरे के खिलाफ खङा कर दिया. शासन ने गरीबों की तरफ से किये जा रहे उनके विरोधों पर कोई दया नहीं दिखायी.
जब रायपुर सेंटल जेल में बंद एक उम्रदराज और बीमार कैदी के भाई ने डॉ सेन से उसके भाई से मिलने और उनका इलाज करने को कहा, डॉ सेन ने जेल अधिकारियों की अनुमति से ऐसा किया. इस तथ्य ने कि कैदी नक्सली था, शासन को १४ मई, २००७ को राज्य लोक सुरक्षा अधिनियम के तहत डॉ सेन को गिरफ्तार करने और जेल में डालने का अवसर दे दिया. एक देशभक्त, जिसने कि अपना पूरा पेशेवर जीवन गरीब लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था-उसके खुद के कॉलेज द्वारा उसे दिये गये पॉल हैरिसन अवार्ड से साभार-वही आदमी आज जेल में था, एक आतंकवादी होने और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने के आरोपों के तहत.
जब छत्तीसगढ उच्च न्यायालय ने डॉ सेन की जमानत याचिका को खारिज कर दिया, उनकी पत्नी डॉ इलीना सेन ने उच्चतम न्यायालय में अपील की. जमानत याचिका की सुनवाई की तारीख सोमवार, १० दिसंबर, २००७ तय हुई.एक सीनियर और एक जूनियर जज का एक खंडपीठ जमानत की अपील पर सुनवाई के लिए नियुक्त हुआ. बाद में एक दूसरे जूनियर जज ने पहले की जगह ले ली. आठ दिसंबर को, छत्तीसगढ सरकार ने एक खंडपीठ के एक सीनियर सदस्य को रायपुर में एक कानूनी सहायता केंद्र के उद्धाटन समारोह के लिए मुख्य अतिथि के बतौर आमंत्रित किया और उनकी खातिरदारी नौ दिसंबर तक जारी रखी, जब तक कि सीनियर जज नयी दिल्ली लौटे. उसके अगले ही दिन खंडपीठ ने डॉ विनायक सेन की जमानत याचिका को महज ३५ मिनटों में खारिज कर दिया.
यहां, किसी की ईमानदारी पर बिना किसी संदेह या आक्षेप के, मैं विनम्रतापूर्वक आजाद और लोकतांत्रिक भारत की जनता और आदरणीय नेताओं के लिए अपने सवाल रखना चाहती हूं : क्या मुझे जमानत याचिका खारिज होने को न्याय मानना चाहिए, ऐसे आदमी की जमानत याचिका जो अन्याय के कारण बचपन में इस ओर मुडा, जिसने अपना पूरा कामकाजी जीवन निस्स्वार्थ भाव से गरीबों को भोजन और स्वास्थ्य मुहैया कराने के लिए सौंप दिया, जिसने दौलत की लालच के बगैर अपने दिन दाल, रोटी और हरी मिर्चों पर गुजारे, जो गरीबों की तरह जीवन जीने का आदी हो गया, जिसने अपना जीवन इस देश के लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया और जो अब सार्वजनिक सुरक्षा में सेंध लगाने और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने का अपराधी ?
यह न्याय है, तो मुझे अन्याय से मुक्ति के लिए कहां जाना ? क्या मुझे इस उम्र में भी अन्याय का पीडित बने रहना ? निस्स्वार्थ, बुद्धिमान, गुणवान, विनम्र, शांतिप्रिय कर्मयोगी, सेवाभावना से पूरी तरह प्रेरित और गरीबों के बीच रहनेवाले मेरे इस बेटे को क्या अपने दिन जेल में गुजारने ?
यह अपील पढनेवाले सभी हमदर्द लोगों से मेरा सवाल है : डॉ विनायक सेन के लिए वह दिन और कितनी दूर है, जब उसे न्याय हासिल ?
सवाल सिर्फ मेरा और मेरे बेटे का नहीं, बल्कि उन सभी माओं की तरफ से भी है, जिनके बेटे अन्याय भुगत रहे हैं. क्या न्याय हमारे आजाद और लोकतांत्रिक देश में इतना दुर्लभ है ?



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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ न्याय का दिन कितनी दूर है : अनुसूइया सेन ”

  2. By दिलीप मंडल on January 7, 2008 at 1:25 AM

    विनायक सेन को रिहा करो। भारतीय लोकतंत्र पर सवालिया निशान है ये अन्यायपूर्ण गिरफ्तारी। डॉक्टर सेन की मां से पूरी हमदर्दी है।

  3. By चंद्रभूषण on January 7, 2008 at 5:16 PM

    न्यायिक और राजनीतिक व्यवस्था के बारे में क्या कहना, मेरी तकलीफ दूसरी है। इस समाज को क्या हो गया है? अस्सी दशक की शुरुआत में नागभूषण पटनायक की रिहाई के लिए चले नागरिक अधिकार आंदोलन से हम कितनी दूर चले आए हैं? विनायक सेन का अबतक जेल में पड़े रहना और देश भर में इसपर कोई सुगबुगाहट नजर आना भारत के लिए एक भयानक भविष्य का संकेत है।

  4. By Darvesh on January 8, 2008 at 2:51 PM

    Yeh kab tak chalega-Nirdosh kab tak nirdyi shasan ki chakki main pisenge

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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