हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सोनपुर : कटाव जारी है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/29/2007 09:08:00 PM

सोनपुर मेले पर मेरी एक रिपोर्ट यहाँ पढ़िए।

नंदीग्राम : हीरक राजार देशे

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/27/2007 05:30:00 PM

रविभूषण

हान फिल्मकार सत्यजीत राय ने आठ वर्ष की उम्र में अपने पितामह उपेंद्र किशोर राय चौधरी की १९१४ में बांग्ला पत्रिका संदेश में प्रकाशित गोपी और बाघा की कहानी पढी थी. १९६८ में उन्होंने इस कहानी पर आधारित फिल्म 'गुपी गाइन, बाघा बाइन' बनायी. यह फिल्म रातोरात जनप्रिय संस्कृति का अंग बन गयी. इस फिल्म के दस वर्ष बाद सत्यजीत राय ने १९८० में 'हीरक राजार देशे' फिल्म प्रस्तुत की.

इमरजेंसी का दौर समाप्त हो चुका था. पश्र्िचम बंगाल में माकपा की सरकार थी और इस फिल्म की प्रोड्यूशर पश्र्िचम बंगाल की सरकार थी. हीरक राजा की भूमिका में उत्पल दत्त थे और सौमित्र चटर्जी स्कूल शिक्षक उदयन थे. 'अपूर संसार' में अपु की भूमिका में सौमित्र चटर्जी ने आरंभ में ही अभिनेता के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की थई. सत्यजीत राय की फिल्म 'अभिजन' में सौमित्र चटर्जी नरसिंह 'चारुलता' में अमल, 'कापुरुष-ओ-महापुरुष' में कापुरुष के रूप में अमिताभ राय, 'अरण्येर दिन रात्रि' में असीम की भूमिका में. 'अशनि संकेत' में गंगाचरण चकवर्ती, 'सोनार केला' में प्रदोष मित्तर (फेलु), 'जय बाबा फेलुनाथ' में भी प्रदोष मित्तर (फेलु) के साथ कई फिल्मों में महत्वपूर्ण अभिनय किया था.
बांग्ला सिनेमा के अभिनेताओं में सौमित्र चटर्जी की ख्याति सर्वविदित है. सत्यजीत राय ने 'हीरक राजार देशे' फिल्म को 'गुपी गाइन, बाघा बाइन' की तुलना में अधिक गंभीर माना है. उनके अनुसार 'हीरक राजार देशे' फिल्म में राजा अधिक महत्वपूर्ण है और उनके दरबारी और वैज्ञानिक उनके साथ हैं. फिल्म की फैेंटेसी के पीछे छुपे राजनीतिक विषय की पहचान आरंभ में ही कर ली गयी थी और उत्पल दत्त ने, जो इस फिल्म में राजा की भूमिका में थे, यह कहा था कि यह फिल्म पूरी तरह राजनीतिक है. इस फिल्म में राजा के सिपाही गरीबों को हटा देते हैं, जिससे आगंतुक उन्हें न देख सके. इस दृश्य को उस मसय इमरजेंसी में झुग्गी-झोपडियों को हटाने और बुलडोजर चलाने से जोड कर देखा गया था.
बांग्लादेश में टेलीविजन पर 1981 में यह फिल्म दिखाई गयी थी. इस फिल्म में सौमित्र चटर्जी उस स्कूल शिक्षक की भूमिका में थे, जो राजा के विरोधियों का नेतृत्व कर रहा था, जिसका स्कूल शिक्षा मंत्री ने बंद कर दिया था, क्योंकि वहां प्रश्र्नकर्ताओं को प्रोत्साहित किया जाता था. 'हीरक राजार देशे' में सौमित्र चटर्जी राजा और शासक वर्ग के विरोध में थे. क्या यह दुखद और आश्र्चर्यजनक नहीं है कि उन्होंने नंदीग्राम के मसले पर बुद्धदेव भट्टाचार्य का साथ दिया. अभिनय में कुछ और जीवन में कुछ. 1980 के बाद बदली स्थितियों ने कई कवियों, लेखकों, कलाकारों, अभिनेताओं, रंगकर्मियों, संस्कृतिकर्मियों का मानस बदला है, पर अभी भी सत्य, नैतिकता, प्रतिरोध और संघर्ष नहीं कायम है. सौमित्र चटर्जी ने वाम मोरचा की सरकार का पक्ष लेकर अपने को अलग-थलग कर लिया है. उन्हें 'हीरक राजार देशे' के स्कूल मास्टर की याद दिलायी गयी है, पर उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडा है. सौमित्र चटर्जी ने सरकार के विरोधियों से प्रश्र्न किया है कि जब भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के सदस्यों ने मापका के कैडरों पर आक्रमण किया था, तब उन्होंने कोई आवाज क्यों नहीं उठायीङ्क्ष फुटबॉल खिलाडी सुरजीत दास गुप्ता ने सौमित्र चटर्जी के इस रिमार्क को ठीक हो स्टुपिड कहा है. कोलकाता में आयोजित फिल्म समारोह के अध्यक्ष थे सौमित्र चटर्जी और उस समारोह में किसी ने भाग नहीं लिया. नंदीग्राम के समर्थन में सौमित्र चटर्जी का कथन क्या 'राजा' के दरबारियों और प्रशंसकों की तरह नहीं हैङ्क्ष क्या नंदीग्राम के साथ इस फिल्म का एक संबंध स्थापित नहीं होताङ्क्ष राजा के साथ रहना जनता के विरोध में रहना है. पश्र्िचम बंगाल की सरकार देशी-विदेशी बडे पूंजीपतियों के साथ है. उसकी विकास-संबंधी नीतियां सामान्य जनता के पक्ष में नहीं है.
नंदीग्राम में माओवादियों की उपस्थिति का तर्क भुरभुरा है. माओवादी वहां पहले क्यों नहीं थे? जहां भी गरीबी, शोषण, अत्याचार और लूटमार है, वहां माओवादी क्यों धमक जाते हैं? उनके लिए क्या शासक वर्ग ने ही ऐसी स्थितियां उत्पन्न नहीं कर दी हैं, जिनमें वे बढे-फैले. सुचित्रा भट्टाचार्य ने माओवादियों की उपस्थिति के तर्क को ठीक ही इराक पर बुश द्वारा किये गये आक्रमण-तर्क के साथ जोड कर देखा है.
पश्र्िचम बंगाल के 294 विधायकों में से गैरवामपंथी विधायकों की संख्या कम है. विरोधी राजनीतिक दल नहीं, जनता है और इस जनता के साथ बुद्धिजीवी, कवि-लेखक, अभिनेता, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी सब हैं. सौमित्र चटर्जी अकेले हैं और जहां तक बुद्धदेव भट्टाचार्य का प्रश्र्न है, उनके पास मात्र सत्ता है. पश्र्िचम बंगाल को विश्र्व पूंजीवाद के मार्ग पर ले जाने के खतरे का मात्र आरंभिक स्वर है नंदीग्राम. बुद्धदेव भट्टाचार्य विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के समर्थक हैं. इस विशेष आर्थिक क्षेत्र से क्या सामन्य जन-जीवन प्रभावित-संचालित नहीं होगाङ्क्ष किसके पक्ष व हित में भूमि-अधिग्रहण होगाङ्क्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महाजाल में फंस कर छटपटाया ही जा सकता है.
भारत का शासक वर्ग वैश्र्िवक पूंजीवाद के साथ गतिशील है. औद्योगिक पूंजी का दौर समाप्त हो चुका है और शासक वर्ग वित्तीय पूंजी की चमचमाहट से प्रन्न और गदगद है. 'इंडिया शाइनिंग' इसी से जुडा था. यह भारत का खंडित और एकांगी सच है, जिसे संपूर्ण बनाने के प्रयत्न जारी हैं. भारत का प्रत्येक राजनीतिक दल विकास की इसी पूंजीवादी धारणा के साथ है. उसके पास अपनी न कोई ष्टि है, न विजन. अमेरिका सारी दुनिया का हीरक राजार देश है, अधिसंख्य देश विकास के अमेरिकी पूंजीवादी मार्ग पर हैं. इसके वामपंथी अनुयायी और समर्थक चीन का उदाहरण देते हैं.
1989 में चीन ने अपनी आर्थिक सुधारवादी नीति के जरिये विकास किया है. उसका आर्थिक विकास निर्यात केंद्रित है. इसी उदाहरण से यह समझाया जाता है कि भारत आर्थिक सुधारवादी/ उदारवादी नीतियों के जरिये अपना आर्थिक विकास करेगा और यह आर्थिक विकास निर्यात केंद्रित होगा. इस आर्थिक विकास के लिए जरूरी है सेज. विशेष सेज फ्री ट्रेड जोन (एफटीजेड) और एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोंस (इपीजेड) का विकसित-परिष्कृत रूप है. अपने ही देश में एक प्रकार का विदेशी क्षेत्र है सेज. ये नयी रियासतें हैं. अपने में स्वतंत्र. जाहिर है, बाद में निरंकुश भी होंगी. इनकी अपनी अदालतें होंगी, जिनमें आर्थिक अपराधों की सुनवाई होगी. बहुराष्ट्रीय कंपनियां और कॉरपोरेट घरानें भारतीय राष्ट्र-राज्य के अधीन होंगे या स्वतंत्रङ्क्ष राज्य द्वारा सुविधाएं प्राप्त कर क्या ये राज्य को कमजोर नहीं करेंगीङ्क्ष राज्य द्वारा नियंत्रित-संचालित न होकर अपनी शर्तों से राज्य को नियंत्रित-संचालित करनेवाली शक्तियों की पहचान नहीं की जानी चाहिएङ्क्ष राज्य के उत्पादन के लिए इन्हें प्रोत्साहन देगा और सेज ड्यूटी फ्री जोन होंगे. इन्हें सभी ड्यूटी और करों से मुक्ति दी जायेगी और दस वर्ष के लिए ये आयकर से भी मुक्त होंगे. ऐसी सुविधा और कहां हैङ्क्ष सुविधाएं और छूट सीमित नहीं हैं. इस क्षेत्र विशेष में पानी, बिजली किसी की कमी नहीं होगी और शत-प्रतिशत विदेशी निवेश की छूट रहेगी.
पश्र्िचम बंगाल सरकार सेज का समर्थन कर किसानों और सामान्य भारतीय जनों को क्या संदेश देना चाहती हैङ्क्ष उसका मार्क्सवाद हीरेक राजार के पक्ष में है या विरोध में? क्या सेज हमारे देश में संपत्तिशालियों का, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विशेष सुरक्षित क्षेत्र नहीं होगा? राजग की सरकार ने सेज-संबंधी बिल 10 मई, 2000 को लोकसभा में पेश किया था. इस बिल पर कितनी बहसें हुईं? क्या भारतीय नागरिकों को यह जानकारी नहीं होनी चाहिए कि इस बिल के दूरगामी नतीजों पर किन सांसदों ने गंभीरतापूर्वक विचार किया? दोनों सदनों में यह बिल 12 मई 2005 को पारित हुआ. राष्ट्रपति ने 23 जून, 2005 को इस बिल पर हस्ताक्षर किये और फरवरी 2006 तक सेज-संबंधी कानून पास हो गया.
प्रतिरोध की राजनीति घटी है, पर प्रतिरोध की संस्कृति बढ रही है. इसे दमन, भय और आतंक से कुचला नहीं जा सकता. सहयोग और समर्थन से सौमित्र चटर्जी एकाकी हो गये हैं और प्रतिरोध का सामूहिक स्वर बढ रहा है. नंदीग्राम माकपा के लिए एक सबक है. 'वार्निंग' है. 'हीरक राजार देशे' फिल्म के वास्तविक स्वर सुनने चाहिए.

नंदीग्राम ने हथियार नहीं डाले हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/25/2007 07:25:00 PM

सुष्मिता को हम पहले भी पढ़ चुके हैं, जब उन्होंने बंगाल की सीपीएम सरकार के चौन्धियानेवाले आंकडों के झूठ को उजागर करते हुए हमें बताया था की असलियत क्या है. इस बार वे फिर कुछ नए तथ्यों और नंदीग्राम के लोगों के प्रति संवेदना के साथ अपनी टिप्पणी लिए प्रस्तुत हैं.
सुष्मिता
पने बुद्धदेव के चेहरे की चमक देखी होगी, जब वे घोषणा कर रहे थे कि नंदीग्राम के लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे दिया गया है. यह चमक ठीक वैसी ही मालूमपडती थी, जैसे इराक और अफगानिस्तान पर कब्जे की घोषणा करते हुए जॉर्ज बुश के चेहरे की चमक. फर्क केवल इतना ही था कि बुद्धदेव के चेहरे पर अपने ही राज्य के लोगों की हत्या की चमक थी और जॉर्ज बुश दूसरे देशों के लोगों की हत्याओं पर मुस्कुरा रहे थे. यदि आपको लगे कि २००२ में नरेंद्र मोदी भी शायद कुछ इसी तरह मुस्कुरा रहे थे, जब वह गुजरात में नरसंहारों को जायज ठहराने के लिए क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया के सिद्धांत को याद कर रहे थे तो इसमें आपकी गलती नहीं है. चेहरे एक-दूसरे में घुल-मिल से गये हैं.

अंततः नंदीग्राम को फतह कर लिया गया. एक भयानक नरसंहार...जिसने सैकडों लोगों की जान ली, दूसरे सैकडों अब भी लापता हैं, दर्जनों महिलाओं का सीपीए के झंडे तले बलात्कार हुआ और अनेक मकान जला दिये गये.
गांववालों का कहना है कि दूसरे दौर की हिंसा में करीब 150 लोगों को मार दिया गया है. लगभग 2000 लोग अब भी गायब हैं. घटना के दिन करीब 550 लोगों को रस्सी से बांध कर खेजुरी ले जाया गया जहां इनको सीपीए ने ढाल के रूप में इस्तेमाल किया, ताकि नंदीग्राम के लोग जवाबी कार्रवाई न कर सकें. तमाम स्रोतों का कहना है कि इस हत्या अभियान में पेशेवर अपराधियों एवं डकैतों का सहारा लिया गया था.
नंदीग्राम को फतह कर लेने की जिम्मेवारी जिस माकपाई गुंडावाहिनी को दी गयी थी, उसका नेतृत्व उसके चार सांसद कर रहे थे और उसमें शामिल थे तपन घोष एवं शकुर अली जैसे कुख्यात अपराधी. ये दोनों 2001 में छोटा अंगरिया हत्याकांड में सीबीआइ द्वारा घोषित फरार अपराधी हैं.
हमने सुना कि नंदीग्राम के लोगों ने अपनी करतूतों की पाई-पाई चुका दी है.
हमने सुना कि महिलाओं द्वारा मेधा पाटकर को अपना पिछवाडा दिखाना समाजवाद लाने के कार्यभारों में से है.
हमने यह भी सुना कि नंदीग्राम की महिलाओं की देह में सीपीएम के लाल झंडे गाड दिये गये.
हमने सुना और शर्मसार हुए. हमने उजाले की संभावनाओं को अंधेरे के सौदागरों के हाथों बेच देनेवालों के बारे में सुना. हमने उस मुख्यमंत्री के बारे में सुना जो 150 लोगों के कत्ल के बाद सुगंधित पानी से हाथ धोकर फिल्मोत्सव की तैयारियों में जुट गया.
नंदीग्राम को फतह कर लिया गया है...और फिजा में विजय के उन्माद से भरे नारों और गीतों का जश्न है. सहमा...वीरान...राख...राख नंदीग्राम! वह नंदीग्राम जो हमारी उम्मीदों का सबसे ताजा मरकज है.
वह नंदीग्राम जो पेरिस कम्यून से लेकर रूस, चीन, वियतनाम और नक्सलबाडी सहित अनेक महान शहादतों में सबसे गर्म खून है.
नंदीग्राम को फतह करने की पृष्ठभूमि लगभग एक साल से बनायी जा रही थी. सिंगूर के सेज से सबक लेकर नंदीग्राम के लोग पहले से ही सचेत थे. जुलाई, 2006 से ही नंदीग्राम में केमिकल हब के लिए 28, 000 एकड जमीन के अधिग्रहण की बात हवा में थी. नंदीग्राम के लोगों ने अपनी जमीन बचाने की लडाई शुरू कर दी. पिछले मार्च में भी सीपीएम ने नंदीग्राम पर कब्जा जमाने का भरसक प्रयास किया. लेकिन वे सफल नहीं हो सके.
दरअसल यह सीपीएम के लिए प्रतिष्ठा का सवाल था. वह नंदीग्राम की जनता की चुनौती बरदाश्त नहीं कर सकती थी, इसलिए इस बार सीपीएम ने काफी साजिशपूर्ण तरीके से अपना हमला संगठित किया. सबसे पहले भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के लोगों के साथ समझौता कराया गया एवं उसके बाद फिर उन पर हमला किया गया, ताकि वे प्रतिरोध के लिए तैयार नहीं रह सकें. कहा जा रहा है कि इस हमले की तैयारी कई महीनों से खेजुरी में चल रही थी. इसके लिए रानीगंज, आसनसोल, कोलबेल्ट, गरबेटा एवं केशपुर से गुंडों को भाडे पर लाया गया. इस पूरे अभियान का संचालन सीपीएम के उच्च नेतृत्व के हाथ में था. यह पूरी तरह गुप्त तरीके से चलाया जा रहा था.
हत्या अभियान के दिन सीपीएम के लक्ष्मण सेठ कह रहे थे-'मारो, न मरो.' विनय कोनार महिलाओं का आह्वान कर रहे थे कि वे 'अपनी साडी उठायें और मेधा पाटकर को अपना पिछवाडा दिखायें.' विमान बोस लगातार देश को बता रहे थे-'नंदीग्राम के लोग हमें रसगुल्ला नहीं खिला रहे थे.'
इन्हीं हत्यारे नारों के बीच कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग में ठहाके गूंज रहे थे और यहां के निवासी आश्वस्ति और उल्लास में एक दूसरे को बधाइयां देते हुए हाथ मिला रहे थे-'नंदीग्राम के लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे दिया गया है.'
सीआरपीएफ की तैनाती भी साजिशपूर्ण तरीके से की गयी. पहले नंदीग्राम पर बर्बर हमला किया गया और उसके बाद सीआरपीएफ को पश्चिम बंगाल की जनता के तमाम विरोधों के बाद तैनात किया गया ताकि वहां की जनता को प्रतिरोध करने से रोका जा सके एवं नंदीग्राम पर पूरी तरह उनका नियंत्रण बना रहे. इस पूरी प्रक्रिया में केंद्र और राज्य दोनों की सरकारों के बीच निर्लज्जा सौदेबाजी हुई. केंद्र सरकार का कोई भी मुख्य अधिकारी नंदीग्राम में नहीं गया. उसने सीआरपीएफ की कंपनी दी और इसके एवज के बतौर वामफ्रंट ने न्यूक्लियर डील पर आइएइए से बात करने की हरी झंडी दी. साम्राज्यवाद की चमचागीरी का यह एक और नमूना है.
अब नंदीग्राम में शांति है. एक मरी हुई शांति, जो श्मशान में होती है. बस जल्लाद चीख रहा है. जल्लाद नंदीग्राम के लोगों को तहजीब बता रहा है. वह पूरे देश की जनता को लोकतंत्र के मायने समझा रहा है. वृंदा करात और प्रकाश करात मारो-मारो की हत्यारी पुकारों के बीच निर्लज्जातापूर्वक हमें लोकतंत्र की तहजीब के बारे में बता रहे हैं. हमें कहा जा रहा है कि चूंकि वहां बहुमत की सरकार द्वारा यह कदम उठाया गया है इसलिए नंदीग्राम का हत्या अभियान जायज है. हमें कहा जा रहा है कि नंदीग्राम पर सवाल उठानेवाले लोग एक चुनी हुई सरकार के खिलाफ साजिश कर रहे हैं. 2002 में नरेंद्र मोदी की भाषा यही थी या नहीं, क्या हमें यह याद करने की इजाजत है 'कॉमरेडों'? क्या जॉर्ज बुश की भाषा इससे अलग होती है जब वह इसी लोकतंत्र का हवाला देकर दुनिया के कमजोर एवं प्रतिरोध करनेवाले देशों पर हमला करता हैङ्क्ष सीपीआइ के डी राजा एवं सीपीएम के प्रकाश करात कह रहे हैं कि चुनी हुई सरकार को नंदीग्राम में कोई काम नहीं करने दिया जा रहा था. मतलब कि इनके लोकतंत्र को नंदीग्राम के लोगों से खतरा था. तो क्या अब लोकतंत्र केवल सत्ता द्वारा जनता की हत्याओं को जायज ठहराने का औजार भर रह गया है? क्या सत्ता को आम जनता को उसके घरों से खदेडने एवं हत्या करने का अधिकार केवल इसलिए मिल गया है कि तथाकथित रूप से वह चुनी हुई हैङ्क्ष यदि इस लोकतंत्र को नंदीग्राम के लोगों से खतरा है तो नंदीग्राम के लोगों को भी यह कहने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि यदि यह लोकतंत्र हमारे जीने के अधिकारों पर पाबंदी लगाता है तो उन्हें भी इस लोकतंत्र से खतरा हैङ्क्ष सच तो यह है कि नंदीग्राम की जनता तो अपने जीने के अधिकारों के लिए ही लड रही है, जो अंतिम रूप से अपनी मातृभूमि की रक्षा की भी लडाई है.
लेकिन इस हत्या एवं उत्पीडन का गवाह अकेले नंदीग्राम नहीं है. साम्राज्यवादी ताकतों ने पूरी दुनिया में नंदीग्राम की तरह ही अभियान चलाया. पूरे लैटिन अमेरिका एवं वियतनाम में साम्राज्यवादी लूट को चलाने के लिए वहां के स्थानीय आदिवासियों को भयानक हत्या के जरिये उनकी वास्तविक जगहों से भगा दिया गया. कहीं-कहीं उनकी पूरी प्रजाति को ही नष्ट कर दिया गया.
भारत में भी साम्राज्यवाद के चमचे उनकी ही रणनीति अपना रहे हैं. वर्षों पहले केरल मे मुथंगा में सत्ता ने ऐसा ही नरसंहार रचा था. मुथंगा में भी आदिवासियों ने बहादुरी से प्रतिरोध किया. लेकिन अंततः सत्ता के योजनाबद्ध एवं खूनी हमले में उनको कुचल दिया गया. ठीक ऐसी ही प्रक्रिया छत्तीसगढ में अपनायी गयी. आदिवासियों में पहले फूट डाली गयी एवं एक हिस्से को अपने पक्ष में करके उन्हें उनकी जगह से हटा कर कैेंपों में लाया गया. जबकि दूसरे हिस्से पर भयानक हमला कर उन्हें भी वहां नहीं रहने दिया गया. अब वहां राहत शिविरों को ही गांवों में बदल देने की योजना है. इन सबको अपनी जमीन से उजाड दिया गया और उनकी जमीनें बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी जा रही हैं. यही प्रक्रिया उडीसा, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल में भी चलाने की साजिशें जारी हैं. पहले निवासियों को उनकी जमीन से हटाओ (चाहे जैसे भी हो), फिर उसे साम्राज्यवाद के कदमों में हस्तांतरित कर दो.
नंदीग्राम की जनता के साथ भी यही किया गया है. प्रतिरोध करनेवाले लोगों को उनकी जगहों से खदेड दिया गया है और कहा जा रहा है कि अब वे सीपीएम की मरजी पर ही वहां लौट सकते हैं.
हमें लगता है कि हम अपनी जगह में बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से बैठे हैं. इसलिए कि अशांति तो हमसे दूर कहीं मुथंगा, छत्तीसगढ या फिर नंदीग्राम में है.
लेकिन वह हरा सांप हमें अचानक रेंगता हुआ अपनी खाट के नीचे महसूस होता है. वह हरी घासों में इस तरह छिपा होता है कि पता ही नहीं चलता कि वह है कहां. ऐसे में हमारे पास अपनी खाट छोडने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता. वह सांप हरी घास में छिपा हुआ रेंग रहा है. मुथंगा से छत्तीसगढ, कलिंग नगर, झारखंड, सिंगुर, नंदीग्राम और न जाने कहां-कहां. सीपीआइ-सीपीएम के लोग उन तमाम लोगों को विकास विरोधी बता रहे हैं, जो नंदीग्राम अभियान का विरोध कर रहे हैं.
लेकिन आंकडों पर गौर करें तो पता चलता है कि पहले से ही पश्चिम बंगाल में लगभग 55 हजार कारखाने बंद पडे हैं. बीमार उद्योगों की संख्या 1, 13, 846 है, जो पूरे देश का 45.60 प्रतिशत है. पिछले 15 सालों में लगभग 15 लाख मजदूरों को उनके काम से निकाल दिया गया, जबकि महज 43 हजार 888 लोगों को काम मिला. सरकारी एवं निजी संगठित क्षेत्रों में 1980 में कुल 26 लाख, 64 हजार लोग कार्यरत थे. जब औद्योगिकीकरण का मंत्र पढा जा रहा है, इस दौर में यह गिर कर 22 लाख 30 हजार पर आ गया है. वहीं रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या 1977 (जब वाम फ्रंट सत्ता में आयी) के 22 लाख 27 हजार से बढ कर 2005 में 72 लाख 27 हजार 117 हो गयी है. यहां यह जानना जरूरी है कि 35 साल से अधिक उम्र के लोग इसमें नहीं लिये जाते. कृषि संकट ने और बुरे हालात पैदा किये हैं. सीपीएम के नेता भूमि सुधार की डींग हांकते नहीं थकते. वे तर्क दे रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में कृषि ने उद्योग के लिए आधार तैयार कर दिया है. लेकिन इनका ढोंग तब सामने आ जाता है जब पता चलता है कि 1982 में विधानसभा चुनाव एवं 1983 में पंचायत चुनाव के बाद ऑपरेशन बर्गा या बंजर जमीनों को जोतने लायक बनाने का काम भी रुक गया. यही नहीं 2004 की मानव विकास रिपोर्ट बताती है कि राज्यों में 14.31 प्रतिशत बर्गादार अलग-अलग जगह विस्थापित हो गये हैं. यह प्रतिशत जलपाईगुडी में 31.60, कूचबिहार में 30.2, उत्तर दिनाजपुर में 31.42 एवं दक्षिण दिनाजपुर में 30.75 है. यही नहीं पट्टा दिये गये लोगों का विस्थापन भी लगभग 13.23 है. 1992-2000 में 48.9 प्रतिशत गांवों के परिवार भूमिहीन हो गये. जहां तक खाद्यान्न उत्पादन का सवाल है वह भी पश्चिम बंगाल में कृषि की दयनीय स्थिति को स्पष्ट करता है. 1976 में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पूरे देश में खाद्यान्न उपलब्धता 402 ग्राम के मुकाबले पश्चिम बंगाल में 412 ग्राम था. यह 1999 में 502 ग्राम के मुकाबले 444 ग्राम हो गया. 2001 में यह आंकडा पश्चिम बंगाल में 413 ग्राम तक पहुंच गया. (स्रोत-अजीत नारायण बसु, पश्चिम बंगाल की अर्थनीति एवं राजनीति) यह कृषि के भयानक संकट को स्पष्ट करता है.
यदि विकास के सिद्धांतों पर गौर करें तो पश्चिमी अर्थशास्त्रियों का आधुनिकता और विकास का सिद्धांत मूलतः सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) एवं औद्योगिकीकरण के स्तर को विकास का आधार मानता था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद पिछडे देशों में नव उपनिवेश की अवस्था में इन्होंने आधुनिकता के पश्चिमी मॉडल पर जोर दिया. यह मूलतः चीन एवं रूस में खडे हो रहे एक समाजवादी विकल्प को नकारता था. मार्क्स ने अपने विकास के सिद्धांत में सामंतवाद या पूर्व पूंजीवादी संबंधों के विनाश पर औद्योगिकीकरण की बात की थी. पश्चिमी अर्थशास्त्रियों का आधुनिकता का सिद्धांत 1970 के बाद ही गरीब देशों में बुरी तरह विफल साबित हुआ. अब साम्राज्यवादी देशों के अपने संकट को भी हल करने केलिए विश्व बैंक एवं अन्य साम्राज्यवादी संस्थाओं ने इसी सिद्धांत को प्रोत्साहित किया.
बुद्धदेव ने भी इसी सिद्धांत को उधार लेते हुए इंडोनेशिया में घोषणा की कि कृषि पिछडेपन की निशानी है, जबकि उद्योग विकास की. यह और कुछ नहीं, बल्कि साम्राज्यवाद की दलाली थी. कृषि बुराई नहीं है बल्कि बुराई तो वितरण में भारी असमानता, महाजनी में वृद्धि, बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए जगह बनाना, भारी पैमाने पर शॉपिंग मॉल एवं उपजाऊ जमीनों को नष्ट करते हुए हाइवेज का निर्माण करना है-जो बुद्धदेव सरकार ने किया है.सीपीएम के विकास की यह अवधारणा मूलतः साम्राज्यवाद के हित में अपनायी जानेवाली अवधारणा है, जो कृषकों को और गहरे संकट में धकेल देगी. इसके साथ ही साथ यह राज्य में और भयानक लूट को जन्म देगी. उपजाऊ जमीनों के भयानक पैमाने पर अधिग्रहण से खाद्यान्न उत्पादन में और गिरावट होती तथा एक बडी जनसंख्या और बदहाली में जियेगी. लेकिन नंदीग्राम ने स्पष्ट कर दिया है कि यह सरकार अपनी साम्राज्यवादपक्षीय नीति के खिलाफ उठनेवाली हरेक आवाज को खूनी पंजों से मसल देगी.
सीपीएम ने अपने तमाम विपक्षियों के साथ यही भूमिका निभायी है. इनके खिलाफ खडी होनेवाली तमाम ताकतों को शुरू से ही भयानक सशस्त्र दमन का शिकार होना पडा है. सीपीएम ने कभी भी अपने खिलाफ विपक्ष को पनपने नहीं दिया. वह उन्हें भू्रण रूप में ही मसल देती है. सीपीएम की 30 सालों की सफलता का यही राज है. लेकिन जिन इलाकों में प्रतिरोधी स्वर ने लगातार सीपीएम के खिलाफ संघर्ष जारी रखा अब सीपीएम वहां अस्तित्व की लडाई लड रही है. गरबेटा इसका उदाहरण है और अब वहां के इनके गुंडे नंदीग्राम एवं सिंगुर में काम आ रहे हैं. नंदीग्राम में तो सीपीएम के नेताओं ने स्वीकार भी किया है कि वे इस तरह से इलाकों को अपने हाथ से नहीं जाने दे सकते (तहलका). अर्थात पश्चिम बंगाल में वही विपक्ष में खडे रह सकता है, जो सीपीएम की गुंडावाहिनी का प्रतिरोध कर सके. शायद इसी प्रतिरोध का भय उन्हें माओवादियों से होता है. सीपीएम ने बार-बार कहा कि नंदीग्राम में हिंसा इसलिए हुई चूंकि वहां माओवादी थे. अर्थात अगर वहां माओवादी नहीं होते तो सीपीएम शांतिपूर्ण तरीके से अपना पूरा काम निबटा लेती.
1970 से ही सीपीएम पर सामाजिक फासीवादी होने के आरोप लगते रहे हैं. ये आरोप धीरे-धीरे सही भी साबित हुए हैं. सामाजिक फासीवाद एवं सांप्रदायिक फासीवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. नंदीग्राम ने तो यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है. सीपीएम पर नंदीग्राम में अल्पसंख्यकों को लेकर कई सांप्रदायिक आरोप लगते रहे. यह महत्वपूर्ण है विपक्षहीन बंगाल में नंदीग्राम ने वास्तविक विपक्ष की भूमिका निभायी है. उसने अपने प्रतिरोध संघर्ष को सालभर तक टिका कर रखा है.
अब नंदीग्राम को फतह कर लिया गया है. ठीक उसी तरह जैसे पेरिस कम्यून से लेकर रूस, चीन एवं अन्य देशों में जीते सर्वहारा की सत्ता पर फिर से पूंजीवादियों की फतह! ठीक वैसा ही जश्न जैसे हरेक विद्रोह को कुचलने के बाद सत्ता का जश्न!
तो क्या अब उम्मीद कविता की आखिरी पंक्ति में भी नहीं बची रह पायेगीङ्क्ष क्या फिल्मों के समापन दृश्य में बच्चों की किलकारियां असंभव बना दी जायेंगी? चिडियों की उडान से महकते आसमान और चींटियों के सपनों से भरी जमीन की दुनिया खत्म हो जायेगी? क्या बसंत अब फिर नहीं आने के लिए आखिरी बार जा चुका हैङ्क्ष लेकिन युद्ध के मोरचे पर आगे बढना या पीछे हटना युद्ध का हिस्सा है. युद्ध में पीछे हटना हथियार डालना नहीं होता है. जनता के सपने अब भी जिंदा हैं.
सुना है नंदीग्राम में इस बार की फसल नहीं बोयी जा सकी है.
सुना है परती खेतों में लोगों की लाशें हैं और ईंट-पत्थर हैं.
मगर नंदीग्राम की मिट्टी में उम्मीद की जो फसल लहलहा रही है उसके बारे में क्या किसी ने नहीं सुना है?
आइए, इस नयी फसल के स्वागत में हम सभी खडे हों-हाथ उठाते हुए.

नंदीग्राम : माकपा मार्क्सवाद को अश्लील कर रही है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/21/2007 11:16:00 PM

रविभूषण
समकालीन हिंदी कवि नवीन सागर (९ नवंबर १९४८- १४ अप्रैल २०००) के पहले
कविता संग्रह नींद से लंबी रात की एक कविता 'अच्छी सरकार' में एक साथ
सरकार द्वारा सितार बजाने और हथियार चलाने की बात कही गयी है, ' यह बहुत
अच्छी सरकार है. इसके एक हाथ में सितार, दूसरे में हथियार है. सितार
बजाने और हथियार चलाने की तजुर्बेकार है्व'
पश्र्िचम बंगाल में माकपा ने अपने कार्यकाल के आरंभ में भूमि संबंधी
कानूनों से सितार बजाने की जो शुरुआत की थी, वह कुछ समय बाद ही समाप्त हो
गयी. आर्थिक उदारीकरण ने राज्य समर्थित पूंजीवाद को तिलांजलि देकर
स्वतंत्र बाजार के पूंजीवाद को गले लगाया. माकपा ने भी यही राह पकडी.
माकपा की आर्थिक नीति और कांग्रेस-भाजपा की अर्थनीतियों में क्या कोई
अंतर हैङ्क्ष आर्थिक सुधार और उदारीकरण की वकालत कर विकास की पूंजीवादी
अवधारणा से सहमत होकर इस मार्ग पर चलना मार्क्सवाद नहीं है. आर्थिक सुधार
का सही नाम 'पूंजीवादी विकास' है. नंदीग्राम इसी पूंजीवादी विकास मार्ग
से उत्पन्न है. प्रकाश करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य इस मार्ग के
मार्क्सवादी पाथिक हैं.
१९७० के दशक और २००७ में अंतर है. '७० के दशक में प्रकाश करात जेएनयू
छात्र संघ के पहले अध्यक्ष चुने गये थे. इस वर्ष जेएनयू के छात्र संघ के
चुनाव में माकपा और भाकपा के छात्र संगठनों- एसएफआइ और एसएसएफ में जेएनआइ
ने- विकास के लिए नंदीग्राम की हत्याओं का पक्ष लेकर माकपा की कार्यशैली
को उचित ठहराया और वे चुनाव में बुरी तरह हारे, पहली बार जेएनयू के
इतिहास में धुर वाम छात्र संगठन आइसा (माले लिबरेशन की छात्र शाखा) ने
सारी सीटें जीतीं.
मार्च '०७ के बाद नवंबर '०७ में नंदीग्राम में जो भी घटित हुआ है, उसे
भुलाया नहीं जा सकता. मार्च में पुलिस ने ग्रामीणों पर गोलियां चलायी
थीं और नवंबर में माकपा के हथियारबंद कैडरों ने. क्या पुलिस और माकपा के
हथियारबंद कैडर भाई-बंधु हैंङ्क्ष क्या नंदीग्राम एक युद्धस्थल हैङ्क्ष
किसानों पर गोलियां चलानेवाले माकपा के कैडर किन अर्थों में मार्क्सवादी
हैंङ्क्ष माग्नुस एजेंस बर्गर की एक छोटी कविता मार्क्स पर है : मैं
देखता हूं, तुम्हें ाधेखा दिया/ तुम्हारें शिष्यों ने/ केवल तुम्हारे
शत्रु/ आज भी वही हैं, जो पहले थे.
मार्च २००७ की घटनाओं के बाद मार्क्सवादी इतिहासकार सुमित सरकार ने पहली
बार नंदीग्राम की तुलना गुजरात नरसंहार से की. क्यों अब नरेंद्र मोदी के
नाम के साथ बुद्धदेव भट्टाचार्य का नाम जोडा जाता हैङ्क्ष मोदी ने गोधरा
की प्रतिक्रिया में गुजरात नरसंहार की बात कही थी; बुद्धदेव भट्टाचार्य
के अनुसार माओवादियों को उन्हीं की शैली में जवाब देकर माकपा के कैडरों
ने सही कार्य किया है. दूसरी ओर प्रकाश करात मनमोहन सिंह को उद्धृत कर
रहे हैं- 'माओवादी राष्टीय सुरक्षा के लिए सबसे बडा खतरा हैं.'
१४ मार्च २००७ को माकपा सरकार की पुलिस ने नंदीगा्रम में निर्दोष
ग्रामीणों की हत्या की थी और अगले दिन १५ मार्च को कलकत्ता हाइकोर्ट ने
मीडिया रिपोर्ट को ध्यान में रख कर सीबीआइ को जांच के आदेश दिये थे. तब
नंदीग्राम के वासियों को राज्य सरकार सुरक्षा नहीं दे सकी थी. अब
हाइकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर अपराधियों पर केस दायर करने का आदेश दिया
है और एक महीने के भीतर रिपोर्ट जमा करने को कहा है. हाइकोर्ट ने राज्य
सरकार को घटना में मरे लोगों के परिजनों और घायलों को मुआवजा देने का भी
आदेश दिया है.
नंदीग्राम में पहले पुलिस और बाद में माकपा के कैडरों द्वारा की गयी
हत्याओं को क्या किसी प्रकार उचित और न्यायसंगत सिद्ध किया जा सकता है
ङ्क्ष माकपा के साथ अब नंदीग्राम सदैव के लिए जुड गया है. कैडरों द्वारा
नवंबर में एक सप्ताहिक हिंसा और उपद्रव जारी रखना क्या सिद्ध करता
हैङ्क्ष माकपा के कार्यकर्ताओं ने सीआरपीएफ के जवानों को नंदीग्राम जाने
नहीं दिया. कलकत्ता हाइकोर्ट ने १४ मार्च ०७ को नंदीग्राम में हुई
फायरिंग को असंवैधानिक और अनुचित कहा है ङ्क्ष क्या नवंबर में नंदीग्राम
पर कब्जा करने के लिए माकपा कैडरों द्वारा की गयी हत्या संवैधानिक और
उचित है ङ्क्ष माकपा की कार्रवाई का सबने विरोध किया है. वाम सरकार के एक
मंत्री ने तो इस्तीफे की पेशकश भी की थी. राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने
ज्योति बसु के घर जाकर उनसे नंदीग्राम में शांति कायम करने का आग्रह किया
था. माकपा के सहयोगी दलों- भाकपा, आरएसपी और फारवर्ड ब्लॉक ने उनके
नाजायज तरीकों पर आपत्ति की है. स्वयं बुद्धदेव भट्टाचार्य के अनुसार ७००
व्यक्ति रहात शिविरों में हैं. माकपा के कैडरों पर सैकडों घर जालाने,
हत्या और बलात्कार के आरोप हैं. राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी के बयान पर
माकपा की बौखलाहट के पीछे उसकी घबराहट थी.
माकपा भूल चुकी है कि लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने भाजपा और राजग को
उनकी आर्थिक नीतियों के कारण सत्ता से हटा दिया था. भारतीय जनता आर्थिक
सुधार के कार्यक्रमों के खिलाफ है. यह अकारण नहीं है कि गुजरात में रतन
लाल टाटा नरेंद्र मोदी की विकास नीतियों के साथ हैं; और पश्र्िचम बंगाल
में बडे पूंजीपति बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ हैं. बुद्धदेव किसानों,
गरीबों और सामान्य व्यक्तियों के साथ नहीं हैं. हाथ से सितार छूट चुका
है.
माकपा के खिलाफ बंगाल बंद हो चुका है. १४ नवंबर को कोलकाता में कवियों,
लेखकों, कलाकारों, रंगकर्मियों, अभिनेताओं, फिल्मकारों के साथ हजारों की
संख्या में मौन जुलूस संदेश को क्या बुद्धदेव भट्टाचार्य भूल पायेंगे
ङ्क्ष माकपा के कैडर और कार्यकर्ता के सामने मृणाल सेन, गौतम घोष अपर्णा
सेन, ऋतुपर्णा घोष, जोगेन चौधुरी, शंख घोष, जय गोस्वामी, महाश्र्वेता
देवी, सुचित्रा भट्टाचार्य, विभाष चक्रवर्ती, सांवली मित्र, कौशिक सेन,
मेघा पाटेकर आदि क्या कोई अर्थ नहीं रखतेङ्क्ष १४ नवंबर को ही लोकसभा
अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने जेएनयू में जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल व्याख्यान
में नेहरू के लोकतंत्र संबंधी विचारों को उद्धृत किया था. अपने इस
व्याख्यान में सोमनाथ चटर्जी ने जनता के प्रति सरकार की एकाउंटिबिलिटी
की बात की थी. बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री से अधिक पार्टी से
जुडाव-लगाव को महत्व दे रहे हैं और अपनी पार्टी के कैडरों के
क्रियाकलापों को उचित ठहरा रहे हैं.
नंदीग्राम ने राज्य बनाम पार्टी, भारतीय संविधान और संसदीय लोकतंत्र से
जुडे कई अहम प्रश्र्न उपस्थित कर दिये हैं. राज्य और राजनीतिक दल में
सर्वोपरि कौन हैङ्क्ष संविधान की शपथ लेकर संविधान के उसूलों के खिलाफ
कार्य करना क्या सही हैङ्क्ष संसदीय लोकतंत्र के नियमों को नष्ट करना
लोकतंत्र के हित में कैसे हैङ्क्ष संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन का
प्रश्र्न बडा प्रश्र्न है. गयारह महीनों से नंदीग्राम पर भूमि उच्छेद
प्रतिरोध कमेटी का कब्जा था और अब माओवादियों ने स्वीकारा है कि वे
नंदीग्राम में हैं. नंदीग्राम 'मुक्तक्षेत्र' नहीं था. अब वहां के किसान
स्थानीय माकपा नेताओं की अनुमति के बगैर खेतों से अपनी फसल अपने घर नहीं
ले जा सकते. वहां राज्य नहीं, माकपा के कैडर कार्यरत हैं. क्या यह स्थिति
लंबे समय तक कायम रह सकेगीङ्क्ष माकपा ने नंदीग्राम में 'केमिकल हब' और
'सेज' के लिए भूमि अधिग्रहण न करने की बात अवश्य कही है, पर मुख्य सवाल
यह है कि पूंजीवादी विकास के मार्ग से वह अपने को अलग करेगी या नहींङ्क्ष
रणधीर सिंह पश्र्िचम बंगाल में माकपा की राजनीति के जिन वर्तमान संकटों
और टैजिडी की जडें की ओर ध्यान दिलाते हैं, उस ओर प्रकाश करात और
बुद्धदेव भट्टाचार्य को ध्यान देना चाहिए. रणधीर सिंह ने फ्यूचर ऑफ
सोशलिज्म में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि तीस वर्ष तक लगातार सत्ता
में बने रहने के बाद भी दूसरे राज्यों की तुलना में माकपा ने उनसे भिन्न
और कुछ विशिष्ट नहीं किया है. उसने भी अन्य राज्यों की तरह विकास के
पूंजीवादी मार्ग का ही चयन किया है. अब माकपा नेता समाजवाद और वर्ग
राजनीति की भाषा में बात नहीं करते हैं. मार्क्सवाद को उद्धृत करते हैं,
उसे अश्लील करने के लिए. पूंजीवादी विकास - मार्ग को 'रिजेक्ट' कर ही
सच्चा मार्क्सवादी हुआ जा सकता है. रणधीर सिंह प्रश्र्न करते हैं कि
समाजवादी सिद्धांतों की रोशनी में पश्र्िचम बंगाल में क्या किया जा सकता
है और क्या नहीं किया जा सकता हैङ्क्ष अच्छी सरकार एक हाथ में सितार और
दूसरे में हथियार नहीं रखती.

कामरेड चल दिये राजा के घर : सुनिए अमिताभ का नया गीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/15/2007 07:25:00 AM

अमिताभ ने अपने नये अलबम में जो कुल 8 गीत गाये हैं, उनमें से एक है यह गीत-कामरेड चल दिये राजा के घर. सिंगूर-नंदीग्राम की पृष्ठभूमि में लिखा गया यह गीत भाकपा-माकपा के शासकवर्ग के रूप में ढल जाने और उसकी दलाली करने को लेकर है.
सीपीम ने नंदीग्राम में जो किया है, और वह अब तक जो करती रही है, वह जनवाद की आकांक्षा रखनेवाले किसी भी व्यक्ति के लिए शर्मनाक है. और क्या आपने बुद्धदेव को सुना? वे कह रहे थे-नंदीग्राम के लोगों ने जैसा किया वैसा पाया. उनके समर्थन में उनकी पूरी पार्टी खडी़ है. शायद 2002 के गुजरात में भी इतनी निर्लज्जतापूर्ण बयान नहीं दिये गये थे.

आइए सुनते हैं अमिताभ को.







बच्चों के लिए नहीं, बाज़ार के लिए बनती हैं फ़िल्में

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/14/2007 01:56:00 AM

फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम बता रहे हैं कि भारत में बच्चों के लिए फ़िल्में क्यों नहीं बनायी जातीं.

ज बाल फिल्मों का स्वरूप बदल गया है. फिल्में अब कम बनने लगी हैं. इसके पीछे बहुत से कारण हैं, जिनकी वजह से बच्चे और उनकी फिल्में सिनेमा जगत से गायब होती जा रही हैं.
चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी जब बनी थी, तब उद्देश्य यह रखा गया था कि बच्चे जो देश के भविष्य होते हैं, उन्हें फिल्मों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाये. इसमें उनके शैक्षिक उद्देश्य और नैतिकता को प्रमुखता दी गयी थी. लेकिन जिस उद्देश्य से चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी बनी, उस उद्देश्य से आज वह भटक गयी है. पहले यह सोसायटी नियमित रूप से एक साल में तीन-चार फिल्में बनाती थी, लेकिन आज इसमें काम कम और राजनीतिक गुटबाजी अधिक होने लगी है. कह सकते हैं कि पहले सरकार बच्चों के विकास को लेकर अधिक सक्रिय थी, लेकिन आज वह सक्रियता मंद पड़ गयी है.
इन बातों से ऐसा नहीं समझना चाहिए कि बाल फिल्में बननी बंद हो गयी हैं. वे अब सरकारी स्तर पर न बन कर व्यक्तिगत स्तर पर बन रही हैं. हाल ही में विशाल भारद्वाज ने बच्चों के लिए ब्लू अंब्रेला नामक बाल फिल्म बनायी है. लेकिन सरकारी और व्यक्तिगत फिल्म निर्माण में उद्देश्यों को लेकर अंतर आ जाता है. निश्चित रूप से व्यक्तिगत रूप से फिल्म बनेगी, तो उसका टारगेट बाजार ही होगा. बच्चों में कितना सामाजिक संदेश जाता है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि इस बाल फिल्म ने मार्केट में कितना बिजनेस किया.
जहां तक हॉलीवुड और बॉलीवुड की बात करें तो बाल फिल्मों के निर्माण के कॉन्सेप्ट अलग हो जाते हैं. हॉलीवुड की फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी ही जाती है बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रख कर. वहां चिल्ड्रेन साइकोलॉजी पर काफी होमवर्क किया जाता है, तब जाकर बाल फिल्म तैयार होती है. भारत में तो ऐसी फिल्में लगभग नहीं के बराबर हैं, जो बच्चों को अपील कर सकें. बॉलीवुड की फिल्मों में मुश्किल यह है कि यहां बाल मनोविज्ञान पर होमवर्क बिलकुल नहीं किया जाता है. यहां जिस फिल्म में बच्चों को कास्ट कर लिया जाता है, उसे ही बाल फिल्मों की संज्ञा दे दी जाती है. जैसे अस्सी के दशक में एक फिल्म मासूम आयी थी, जिसे बाल फिल्म की श्रेणी में रखा गया. लेकिन मेरी नजर में वह फिल्म बड़ों के लिए थी.
आज बॉलीवुड की बाल फिल्मों में एनीमेशन फिल्मों ने अपना स्थान बना लिया है, इसके पीछे दो कारण हैं. पहला कारण है कि आज बच्चों का मूड बदल गया है. बच्चों में यह खासियत होती है कि उनकी मानसिकता बहुत चंचल होती है. वे बड़ों के समान धैर्यपूर्वक फिल्में नहीं देख सकते हैं. एनीमेशन फिल्मों में कट-टू-कट होता है और सब कुछ जल्दी-जल्दी घटित होता है. इसलिए बच्चे इसमें ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं. दूसरी बात यह है कि एनीमेशन फिल्में, जो बच्चों के लिए बन रही हैं, वे अधिकतर पौराणिक पटकथाओं पर आधारित होती हैं. जैसे बाल गणेश हो या हनुमान, ऐसी फिल्मों पर निर्माताओं को बाल मनोविज्ञान पर होमवर्क नहीं करना पड़ता है और फिल्म आसानी से बन जाती है. सबसे बड़ी बात है कि बाल फिल्मों का निर्माण बच्चों को ध्यान में रख कर नहीं बाजार को ध्यान में रख कर किया जा रहा है.
आज बाल फिल्मों के अभाव में बच्चे बड़ों की फिल्में देख रहे हैं. जैसे अधिकतर बच्चों की मनपसंद फिल्म कृष या धूम है. इसलिए जरूरी है कि बच्चों के लिए बाल मनोविज्ञान पर और बच्चों को ही कास्ट करके फिल्में बनायी जायें. बच्चों के बदलते मूड को ध्यान में रखते हुए भारतीय सिनेमा जगत को बाल मनोविज्ञान पर होमवर्क करने की जरूरत है, जिसके लिए यह तैयार नहीं दिखता है.

बच्चे हमारी चिंताओं में कब शामिल होंगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/14/2007 01:51:00 AM

बाज़ार के दौर में बच्चों के भविष्य से जुडे़ कुछ सवालों को रेखांकित कर रही हैं संध्या.

15 नवंबर को अखबारों में बाल दिवस मनाये जाने की खबरें छपेंगी और यह मान लिया जायेगा कि समाज ने बच्चों को लेकर अपना दायित्व पूरा कर लिया. दशकों से मनाया जा रहा बाल दिवस एक बार फिर मना लिया जायेगा, एक और साल बीत जायेगा और बच्चे बाजार की अपेक्षाओं की कीमत चुकाते रहेंगे.

स्कूल जानेवाले अधिकतर बच्चों के लिए बाल दिवस का मतलब सिर्फ यह होता है कि इस दिन पढ़ाई नहीं होती, बच्चों को कुछ छोटे-बड़े उपहार दिये जाते हैं और कुछ स्कूल उन्हें घुमाने ले जाते हैं.
बाजार का गहरा प्रभाव समाज पर पड़ा है. बच्चे चूंकि इसी समाज का हिस्सा हैं, वे इस प्रभाव से अछूते नहीं हैं. आदमी को एक कमोडिटी बनाने की प्रक्रिया बचपन से ही शुरू हो जाती है. बच्चों को बाजार के ढांचे में बचपन से ही फ्रेम कर दिया जाता है. अब बच्चों को इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर या स्कॉलर बनने के सपने नहीं देखने दिये जाते, बल्कि उन पर बचपन से ही यह दबाव बनाया जाता है कि उन्हें पैसे कमाना है और इसी के लिए उन्हें कुछ बनना है. बच्चों से कभी नहीं पूछा जाता कि उन्हें क्या बनना है, उनकी अपेक्षाएं क्या हैं. बाजार, माता-पिता और टीचरों की अपेक्षाओं के दबाव में आकर बच्चों की अपेक्षाएं दब जाती हैं. इससे बच्चों की रचनात्मकता और उनकी जीवन के प्रति कलात्मकता खत्म हो जाती है. वे अपनी खुद की अपेक्षाएं भी नहीं रख पाते, वे बाज़ार की अपेक्षाओं पर ही चलते. बाजार ने उनके लिए ऐसी प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की नहीं, सबको पीछे छोड़ कर आगे निकलने की मानसिकता पैदा की जाती है.

बच्चों पर पढ़ाई का दबाव भी बहुत रहता है. परीक्षाओं की व्यवस्था ऐसी है कि जीवन का एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई करते ही बीत जाता है. इससे बच्चों में इनोवेटिव होने, कुछ नया कर-सोच पाने की क्षमता विकसित नहीं होने पाती. एक तो परीक्षाएं बहुत ली जाती हैं और दूसरे उनका जो पैटर्न होता है, उसमें प्रतिभा नहीं बल्कि स्मरण शक्ति देखी जाती है. इसके अलावा परीक्षा और फर्स्ट आने का दबाव बच्चों को मानसिक रूप से प्रभावित करता है. वे परीक्षाओं के आसपास प्राय: बीमार पड़ जाते हैं. मनोचिकित्सकों ने इसे एक्जामोफोबिया का नाम दिया है.

इस तथ्य को विशेषज्ञ बार-बार दोहराते हैं कि असल में यह शिक्षा तंत्र मैनेजर बना सकता है, विद्वान, स्कॉलर, फिलासफर, प्रोफेसर नहीं बना सकता. हर चीज जब खरीदने-बेचने की चीज हो जाती है तो उस पर इन्वेस्टमेंट भी इसी दृष्टि से किया जाता है कि मुनाफा अधिक-से-अधिक हो. बच्चों की परवरिश और शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था भी इसी तरह की जा रही है कि वे कमाऊ बन सकें न कि एक बेहतर इनसान बनें.
गत कुछ वर्षों में बाल मजदूरी पर काफी चर्चा हुई है. इसको लेकर कानून तक बना और लागू हुआ. मगर जो कुछ हमारे सामने है, उसे देखें तो लगता है कि ईमानदार प्रयास नहीं हुए हैं. इसका पता इस बात से भी लगता है कि 52 ऐसे मामले सामने आये हैं, जिनमें उन लोगों के घरों में बच्चे घरेलू नौकर के बतौर काम करते पाये गये, जिन्हें गार्जियन्स ऑफ लॉ कहा जाता है. इसके अलावा बाल मजदूरी पर पूरी बहस को एकांगी तरीके से उठाया जाता है और बाल मजदूरी रोकने के लिए बनाये गये कानूनों में उन बच्चों के लिए और उनके परिवारों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए, जो काम पर से हटाये जायेंगे, कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गयी है.

दुनिया के स्तर पर देखें तो विभिन्न देशों में जारी अमेरिकी सैन्य हमलों और प्रतिबंधों का सबसे अधिक खामियाजा बच्चे ही भुगतते हैं. इराक में युद्ध और प्रतिबंधों की वजह से पिछले डेढ़ दशक में भूख और बीमारी की वजह से पांच लाख से अधिक इराकी बच्चे मारे गये. सोमालिया और सूडान के बच्चों की दुर्दशा तो एक त्रासद परिघटना की तरह हमारे सामने है.

बाल दिवस के बारे में भी बच्चों का एक खास तबका ही अवगत है. स्कूल जानेवाले बच्चे एक खास तबके से आते हैं. यह वह तबका है जो स्कूल जाने का खर्च वहन कर सकता है. मगर जो बच्चे स्कूल भी नहीं जा पाते, जो बच्चे ट्रेनों और बसों में भीख मांगते हैं, सड़कों पर कूड़ा बीनते हैं, झाड़ू देते हैं, उनके लिए इस दिवस का क्या मतलब है? उनके लिए इसका कोई मतलब क्यों नहीं होना चाहिए? आखिर हम कब अपनी चिंता में उन बच्चों को और कुल मिला कर सभी बच्चों को शामिल करेंगे?

प्रभात खबर से साभार.

हमारे सवालों से आप डरते क्यों हैं अंकल

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/14/2007 01:46:00 AM

मन्नू हमारी एक प्यारी-सी साथी है. वह अभी छठे क्लास में पढ़ती है. उसके पास सवालों की कभी कमी नहीं रहती और चीज़ों को अपने तरीके से देखने की ललक भी उसमें खूब है. बाल दिवस के दिन उसके कुछ सवाल, आप और हम सबके लिए.


मनु साक्षी
ज के बच्चे अनेक सवालों से घिरे हैं. इन सवालों का पता आप हमारी चुप्पी, हमारे तनाव और डरे हुए चेहरे से लगा सकते हैं. आप पायेंगे कि हमारी कोमलता नष्ट हो रही है.
हम आज पाते हैं कि बड़ों को, जो हमारे अभिभावक हैं, शिक्षक हैं और पूरा समाज ही है, अब बच्चों की शरारतें, नटखटपन और मासूमियत पसंद नहीं है. सब लोग हमें जल्दी से परिपक्व, तेज और सबसे अधिक धूर्त बनाने की कोशिशों में लगे हुए हैं.

सरकार ने बच्चों को मजदूरी करने के काम में लगाये जाने से रोकने के लिए कानून बनाये हैं. हमने इसको लेकर प्रचार भी देखे हैं. लेकिन उनमें यह रास्ता नहीं बताया जाता है कि उनका पेट कैसे भरेगा. अगर लोगों को जीने के लिए आसानी से चीजें मिल जायेंगीं तो उनके बच्चे मजदूरी क्यों करेंगे? लेकिन जब सरकार खुद 60-70 रुपये मजदूरी देती हो तो फिर बच्चों को काम पर जाने से कैसे रोका जा सकता है? और बहुतों को तो वह भी नहीं मिलता.

मैं पिछले साल अपने गांव गयी थी. वहां के स्कूल में अक्सर पढ़ाई बंद रहती है. शिक्षक दूसरे कामों में लगा दिये जाते हैं. जब स्कूल चलता है तो वे आधे से ज्यादा दिन खाने की व्यवस्था में ही लगे रहते हैं.

बच्चों की शिक्षा से जुड़ी एक और बात बताती हूं. मेरी एक परिचित नूतन दीदी एनजीओ के प्रोजेक्ट में काम करती थीं. वे बता रही थीं कि वहां पढ़ानेवाले शिक्षकों को 300 से 400 रुपये मासिक वेतन मिलता है. शहर से देहात में फैले हजारों प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों को हजार-1500 रुपया मासिक वेतन मिलता है. यानी इन्हें सरकार की न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन पर पढ़ाना पड़ता है. लेकिन हमसे फीस तो भारी-भरकम ली जाती है. अब शिक्षक का ध्यान पढ़ाने में लगेगा या यह सोचने में कि शाम को उसके घर का चूल्हा कैसे जलेगा?

खुद टीचर जिस स्कूल में पढ़ाते हैं, वहां अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते. हमारी एक आंटी केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाती हैं, लेकिन उनकी बच्ची डीपीएस में पढ़ती है.

अक्सर ऐसी तसवीरें पत्रिकाओं-अखबारों में देखने को मिलती हैं, जिनमें भूख से चिल्लाते, हाथ फैलाये भोजन मांगते बच्चे दिखते हैं. जब पूरी दुनिया में इतना अनाज पैदा हो रहा है कि खेत परती रखने के लिए सरकार मुआवजा देती है, अनाज समुद्र में फेंका जा रहा है, गोदामों का अनाज सड़ रहा है और उसे चूहे खा रहे हैं, तब करोड़ों बच्चे भूख पेट क्यों सोते हैं?

हम पर पढ़ाई और कैरियर का दबाव है. हम खुशी से खेल नहीं पाते. कुल मिला कर हम दुखी और उदास हैं. क्यों? हम में से बहुतेरे सवाल करने की हिम्मत करते हैं. और जब हम ऐसा करते हैं तब बड़े लोग, अभिभावक और शिक्षक पहले तो कन्नी काटते हैं, टाल-मटोल का सहारा लेते हैं, लेकिन बार-बार वही पूछने पर हमें डांट कर चुप करा दिया जाता है. पता नहीं क्यों हमारे अभिभावक हमसे डरने लगते हैं. क्या आप आज के दिन हमारी पीड़ा से जुड़े इन सवालों के जवाब देंगे?

कामरेड्स! इस शानदार विजय के लिए बधाई

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/13/2007 12:33:00 AM
















नं
दीग्राम को फ़तह कर लिया गया.

यह बेशुमार फ़तहों का दौर है-बगदाद, काबुल और नंदीग्राम इसके अलग-अलग मोर्चे हैं, जिन्हें फ़तह किया गया है, फ़तह किया जा रहा है. सोमालिया और सूडान कुछ और मोर्चे हैं. तेहरान जैसे नये मोर्चे भी खुलनेवाले हैं. ये वे जगहें हैं जिन्हें मुक्त बाज़ार के हिरावल दस्ते ने मुक्त करा लिया है.

लाल झंडे लिये कामरेड्स बंगाल की सड़कों पर अपनी जीत का जश्न मनाने निकल पडे़ हैं.

हम विजेताओं को उनकी इस शानदार विजय पर बधाई और शुभकामनाएं देते हैं.


इस लडा़ई में हम 'पराजित' लोगों के साथ हैं.

______________________________




















वह दूसरे की धरती को

जीतने नहीं जा रहा था
वह जा रहा था
अपनी ही धरती को मुक्त करने
उसका नाम कोई नहीं जानता
पर इतिहास की पुस्तकों में
उनके नाम हैं
जिन्होंने उसे मिटा दिया

वह मनुष्य की तरह जीना चाहता था
इसीलिए एक जंगली जानवर की तरह
उसे जिबह कर दिया गया

उसने कुछ कहा था
फंसी-फंसी आवाज में
मरने से पहले
क्योंकि उसका गला रेता हुआ था
पर ठंडी हवाओं ने उन्हें चारों ओर फैला दिया
उन हजारों लोगों तक
जो ठंड से जकड़ रहे थे.


इस लडाई में, विश्व बैंक, अमेरिकी धन्नासेठों और वैश्विक बाज़ार के लिए हुए इस कत्लेआम में मारे गये लोगों की याद में ब्रेष्ट की कविता के अंश.

रात के विरुद्ध, प्रात के लिए...

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2007 12:20:00 AM





















पको अपने बचपन की दीपावली याद है? आपने अपने पास-पड़ोस के कुम्हारों को सिर पर हाथ रखे यों दीपावली को बीत जाते कब देखा था?

इस दीपावली पर, पिछले कुछ सालों की ही तरह बाजार में सस्ते और प्राय: विदेशी खिलौनों, मूर्तियों की भरमार है. और कहने की जरूरत नहीं है कि इसने देश के उन लाखों लोगों के धंधों को चौपट कर दिया है, जो उनकी आजीविका के साधन थे.
और यह सिर्फ दीपावली की बात नहीं है.
बाजार ने हमारे लिए पर्व-त्योहारों के जो नये अर्थ दिये हैं, उनमें मनुष्य और उसकी गरिमा कहीं नहीं है. बाजार जिस उत्सव में शामिल है, वह सिर्फ मुनाफे का उत्सव है. अगर आप इसे दूसरे शब्दों में देखना चाहें तो कुछ आंकड़ों पर गौर करें. पिछले एक साल में देश भर में 22 करोड़ लीटर शराब पी गयी है. डांस, बार और पबों में एक हजार से 50 हजार रुपये तक एक आदमी द्वारा खर्च कर दिये जाते हैं- सिर्फ एक घंटे की मौज-मस्ती पर. अनेक महानगरों में नाइट क्लबों में प्रवेश की फीस 10 हजार रुपये तक है. फाइव स्टार पार्टियों में हरेक व्यक्ति पर तीन से 10 हजार तक का खर्च आता है. देश का लॉटरी बाजार 250 अरब रुपये का है. भारत में जुए का बाज़ार 500 अरब रुपये का और विलासिता की सामग्री का बाजार 64,000 करोड़ रुपये का है.

दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक आबादी घोर विपन्नता और गरीबी के अंधकार में जी रही है. सीमांत पर जी रहे ये करोड़ों लोग उत्सव में शामिल तो हैं, पर उनके पास इसका कोई उल्लास अब नहीं बचा रह गया है. इससे व्यापक आबादी में क्षोभ और काफी हद तक हताशा भी पैदा हुई है.

देश में बड़ी मात्रा में आ रही वित्तीय पूंजी ने, कारपोरेट चालित मीडिया ने और लगातार घटते अवसरों ने यह मानस गढ़ने की कोशिश की है कि अब सट्टे के जरिये, लॉटरी और ऐसे ही तमाम हथकंडों के जरिये अमीर बना जा सकता है या बना जाना ही चाहिए. यह लोगों को एक लंबी और अंधी सुरंग में दाखिल कर देने जैसा है.

इसलिए दीपावली की खुशियां ज्यादा रोशनी से भरी हों, जिंदगी की राहों में और अधिक उजाला हो और हमारे दिन अपने उल्लास से भरे-पूरे हों-इसके लिए बाजार के गणित और उसके मुनाफे के चक्रव्यूह से अपने त्योहारों को निकालने की कोशिश हो.

आइए, इस दीपावली में हम वे दीप रोशन करें जो रात से इस लड़ाई में सवेरा होने तक हमारा साथ दें.

आप सबको दीपावली की ढेरों शुभकामनाएं.

किसान के संघर्ष में आज की कविता नहीं है उसके साथ

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/08/2007 12:57:00 AM

कवि अष्टभुजा शुक्ल की कविताओं पर बात करने का मतलब है किसान जीवन के राग-विराग, दुख-सुख और उनके संघर्षों पर बात करना. शुक्ल गांव-गंवई की संवेदना और संभावनाओं से इतने गहरे तक जुड़े हुए हैं कि उन्हें अलग से इन पर सोचना नहीं पड़ता. वे खेती करते हैं, चैत के बादलों को कोसते हैं और हाथा भी मारते हैं. कुछ माह पहले एक काव्य पाठ के सिलसिले में पटना आये अष्टभुजा शुक्ल. प्रस्तुत है कवि से दो बातचीत. एक तो वह है जो मैंने की थी, दूसरी बातचीत बीबीसी हिंदी के मणिकांत ठाकुर ने की थी. (बीबीसी से साभार)

शुरुआत शुरू से ही करते हैं. आपके लेखन की शुरुआत कब से हुई?

तारीख या वर्ष याद नहीं है. लिखने और पढ़ने में, मतलब साहित्य में रुचि प्रारंभ से ही कुछ रही है. उसके तहत पढ़ता था, पढ़ते हुए लगा कि लिखना भी चाहिए. छात्र जीवन था, उस वक्त. मैंने जिक्र भी किया है कहीं कि छंदों में जो गीतात्मक छंद हैं- आंसू के तर्ज पर, उस तरह से लिखता था पहले. छुपा-छुपा कर रखता था. लोगों को पढ़ाने की तत्परता नहीं थी. अब भी वह तत्परता नहीं है.
और उसमें रसीले गन्ने और ताड़ीवान कब दाखिल हुए?
हमारा परिवेश ग्राम्यजीवन का परिवेश है. बचपन में हम कुल्हड़ में अनाज ले जाते थे, ताड़ीवान के पास, बाग में. ताड़ीवान को अनाज देकर बदले में ताड़ी लाते थे. हम देखते कि वह कितनी ऊंचाई पर गया है. जब वह उतरता तो पेड़ को प्रणाम करता, मानों एक खतरनाक ऊंचाई पर पहुंच कर उतर आया हो. तब उसका जीवन मुझे अलग, खास लगता था. हमें उसका ऊंचाई पर जाना आकर्षित करता था.
लोग कहते हैं कि जड़ों की ओर लौटो. मैं तो जड़ों में ही पड़ा हुआ हूं, अलग से जड़ों की ओर जाने की जरूरत कभी पड़ी नहीं. हम तो रोजाना के भुक्तभोगी हैं. हम गन्ने की फसल गोरने जाते थे, तो पत्तों से शरीर में धारियां पड़ जाती थीं. फिर गुड़ के पकने की सुगंध जो थी, वह भी अपनी ओर खींचती थी. अब तो कोल्हू खत्म होते जा रहे हैं और मिलें गन्ना पेर भी नहीं पा रही हैं.
पद-कुपद में गन्ने पर, कोयले पर कविताएं हैं. किसानों के जीवन से संबद्ध कविताएं हैं. मुझे किसान जीवन को याद करने की जरूरत नहीं पड़ती. मैं वही जीवन जीता हूं. किसान जीवन की संवेदना नयी कविता और आलोचना में कम होती गयी है.

आज की कविता में बल्कि पूरे साहित्य में किसानों की और ग्रामीण परिवेश की उपस्थिति से आप संतुष्ट हैं?
मैं संतुष्ट नहीं हूं. गुप्त ने जिस तरह किसानों को याद कि या था, उस समय अभिव्यक्ति के जो भी उपकरण थे, शैली थी, तादात्म्य था, उसमें. आज जो कविता है, वह किसान जीवन की समस्याओं पर लिखी ही नहीं जा रही है, जबकि यह आज की प्रमुख राष्ट्रीय समस्या है.
आपकी दृष्टि में इसकी वजह क्या हो सकती है?
इसकी बहुत सारी वजहें हो सकती हैं. जमीनी लगाव और जमीनी संवेदना का अभाव है. लोग इसके बदले कृत्रिम संवेदना और लगाव के फांस में पड़े हुए हैं. किसान का आनंद तो छिन चुका है, पर उसके दुख और संघर्ष में उसका साथ देनेवाली कविताएं भी नहीं हो रहीं.
आज जो बिल्कुल नया कवि है, वह कवि बनने के लिए कविता लिखता है. जीवन जीने के लिए वह कविता नहीं लिखता. जीवन के स्रोतों से कटाव निरंतर जारी है-जो मूल स्रोत हैं. सुघड़ संवेदना की कविताएं, चिकनी-चुपड़ी संवेदना की कविताएं लिखी जा रही हैं.

आपने छंदों को नहीं छोड़ा है. उन्हें बरतते आये हैं अब भी.
निराला जी ने बड़ा क्रांतिकारी काम किया था कि परंपरागत छंद जो थे उन्हें तोड़ा, जान बूझ कर, मगर उन्होंने उनका निषेध भी नहीं किया. उन्होंने नये छंदों की बात की थी. अब के पाठक समझते हैं कि तुकांत ही छंद है. हरेक छंद कविता नहीं होता है. कविता के लिए संवेदना की जरूरत होती है, आंतरिक लय की जरूरत होती है.
कविता वाचन की चीज होती है-वह कागजी कार्रवाई नहीं होती. मगर आज कविता कागजी कार्रवाई की चीज हो गयी है. अब तो गद्य कविता की जा रही है. क्या कविता गद्य की कोई विधा है? कविता तो एक स्वतंत्र विधा है.

कविता को लेकर आपकी नजर में आज के समय के खतरे क्या हैं?
खतरे तो हैं और दोनों ओर से हैं. एक तो छंद और लय के नाम पर गीतों और गजलों की वापसी की बात की जा रही है. पहले से ही मानक गीत और गजलें इतनी लिखी जा चुकी हैं कि उनमें नया कुछ भी संभव नहीं है. हमें नये छंदों को निर्मित करना होगा. यह आवश्यक नहीं कि वह तुकांत हो.
राजेश्वर 11 वीं शताब्दी के आचार्य हुए दक्षिण के. उन्होंने लिखा था कि एक कवि ऐसे होते हैं, जिनकी कविता उनके घर में ही रह जाती है. एक दूसरी कोटि के कवि ऐसे होते हैं, जिनकी कविता मित्रों तक सीमित होती है. मगर तीसरी तरह की कविता जबान-जबान पर व्याप्त हो जाती है.
कहा जाता है कि कविता के पाठक, उसको समझनेवाले थोड़े ही रहे हैं, मानो वह कोई दड़बा हो. कविता की सबसे बड़ी ताकत उसकी व्याप्ति है. अगर यह व्याप्ति नहीं है तो वह गद्य का एक टुकड़ा होकर रह जायेगी.
अपने पढ़ने की प्रक्रिया के बारे में बताएं. आप क्या और किस तरह पढ़ते हैं?
कोशिश करता हूं कि जो मिल जाये उसे पढ़ डालूं. मेरी एक सीमा है कि मुझे पढ़ने को ही बहुत कम मिल पाता है. कविता का जहां तक सवाल है, हिंदी में तुलसी दास से बड़ा कवि नहीं मानता मैं किसी को, फिर निराला हैं और फिर नागार्जुन हैं. धूमिल मेरे प्रिय कवि हैं. जरूरी नहीं कि आज की तारीख तक आ जायें.

सुनिए अष्टभुजा शुक्ल से मणिकांत ठाकुर की बातचीत.








रूसी क्रांति के 90 साल : समाजवाद का सपना ज़िंदा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/07/2007 12:53:00 AM

वह दुनिया की पहली क्रांति थी जो पहले से तारीख तय करके हुई थी. लेनिन ने कहा था-6 नवंबर वक्त से पहले होगा... और 8 नवंबर तक वक्त बीत चुका होगा. हमें 7 नवंबर को कार्रवाई शुरू करनी होगी. और क्रांति 7 को शुरू हुई.

विचारधाराओं और इतिहास के अंत की दंभपूर्ण घोषणाओं के दौर में रूस की संगठित सर्वहारा क्रांति ने 90 वर्ष पूरे किये. यह वह दौर है जब 'द इकोनॉमिस्ट' में लंबे-लंबे लेख इन प्रस्थापनाओं के साथ प्रकाशित हो रहे हैं कि एक विचार के बतौर समाजवाद सबसे उन्नत है, लेकिन इसका कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं है. यहां तक दावे किये जा रहे हैं कि लेनिन का प्रयोग मार्क्सवाद से एक भटकाव था.
अब रूसी क्रांति के 90 सालों के बाद, जब उस क्रांति द्वारा स्थापित हुआ सोवियत संघ भी अब अस्तित्व में न हो, इकोनॉमिस्ट का यह कहना यह दिखाता है कि मार्क्सवाद का भय किस कदर बना हुआ है.

20 वीं सदी की शुरुआत, 19वीं सदी के अंत की तरह सर्वहारा के संघर्ष से हुई, जिसके साथ मार्क्सवाद का क्रांतिकारी वैचारिक आधार था और जिसे अंतरराष्ट्रीय तौर पर लेनिन जैसे नेता का नेतृत्व हासिल था. लेनिन ने पूंजीवाद के स्थायी रूप से संकटग्रस्त होने की बात करते हुए कहा कि पूंजीवाद का अल्पकालिक संकट अब एक निरंतर संकट के दौर में प्रवेश कर गया है, जो अंतत: पूंजीवाद के अंत पर जाकर समाप्त होगा. इसे उन्होंने पूंजीवाद की उच्च्तम अवस्था कहा, जहां से आगे जाना संभव नहीं है, बस उसका अवसान और अंत ही संभव है.

लेनिन को सुनिए : सोवियत सत्ता क्या है










(इस आडियो में लेनिन सोवियत सत्ता के बारे में बता रहे हैं. यह आडियो लेनिन के उन 13 भाषणों में से है जो ग्रामोफोन पर रिकार्ड किये गये थे. भाषण का टेक्स्ट पढ़ने के लिए यहां आएं.)
हालांकि लेनिन की क्रांति संबंधी कार्यनीतियों को अनेक कम्युनिस्ट नेताओं ने ही चुनौती दी, मगर अंतत: लेनिन सही साबित हुए. उनके नेतृत्व में सर्वहारा ने क्रांति की.

एक ऐसे समय में जब दुनिया के साम्राज्यवादी देश दुनिया पर कब्जे के लिए युद्ध कर रहे थे और मुनाफे के लिए मारामारी के बीच जनता भयानक और त्रासद गरीबी में जी रही थी, क्रांति ने दुनिया की एक बड़ी आबादी को मुनाफाखोरों के कब्जे से निकाल लिया. हालांकि दो ही दशकों के भीतर दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ और इसमें सोवियत जनता को काफी जान-माल की क्षति उठानी पड़ी. लेकिन इसी के साथ यह उपलब्धि भी सोवियत जनता की ही थी कि उसने फासीवाद से दुनिया को बचाया.

रूसी क्रांति की कुछ तसवीरें
मगर जल्दी ही, स्टालिन के बाद के सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी पर स्टालिनविरोधी ताकतों का कब्जा हो गया. काउत्स्कीपंथी और स्टालिनविरोधी ताकतें हावी हुईं. उनकी कारगुजारियों ने अंतत: सोवियत संघ का विघटन करके छोड़ा. यह विघटन उनके पूंजीवाद का पतन था न कि लेनिन और मार्क्स की विचारधारा का.

माओ-त्से-तुंग ने लेनिन की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए चीन में सांस्कृतिक क्रांति की और उसे और अद्यतित किया. मगर माओ के बाद के चीन में भी ऐसी शक्तियां हावी हुईं, जिन्होंने चीन को बाजार के आगे दंडवत कर दिया है.
तो क्या इससे यह साबित होता है कि अब समाजवाद की उम्मीद खत्म हो गयी? वह विफल हो गया? दरअसल इन घटनाओं से सिर्फ यह साबित होता है कि समाजवाद को जैसे ही मेहनतकश जनता से अलग किया जायेगा, वह खत्म हो जायेगा. इन दोनों असफलताओं ने मार्क्स और लेनिन को और ज्यादा सही साबित किया है.

और आज के दौर में, जब एफडीआइ-एफआइआइ के रूप में पूंजी का आयात-निर्यात अपने सबसे विकराल रूप में हमारे सामने है, एमएनसी-टीएनसी पूरे व्यापार का नियंत्रण कर रहे हैं और साम्राज्यवाद अपने संकट से निकलने के लिए एक के बाद एक देश पर युद्ध थोपता जा रहा है-लेनिन और मार्क्स उतने ही अपरिहार्य लग रहे हैं. जिस महामंदी से पूंजीवाद को कीन्स ने निकाला था, 70 के दशक से वह फिर हावी हो गया है. यह इसलिए अधिक खतरनाक है, क्योंकि इससे निबटने के सारे कीन्सीय औजार विफल हो गये हैं.

और ठीक इसी समय दुनिया के अनेक देशों में जनता का प्रतिरोध तेज हो रहा है. पूरा एशिया और लैटिन अमेरिका जनता के विद्रोहों के केंद्र बनते जा रहे हैं. पूंजी का इतना असमान वितरण हुआ है कि मात्र एक प्रतिशत लोग दुनिया की आधी से अधिक संपत्ति के स्वामी हैं.

और ऐसे में समाजवाद का सपना जिंदा है, क्योंकि उसे अभी संसाधनों का, आमदनी का, अवसरों का और सामाजिक न्याय का समाज में समान बंटवारा करना है-वह सब करना है जिसे आज तक की कथित उदारवादी आर्थिक नीतियां करने में विफल रही हैं. उसे उत्पादन को इस तरह समायोजित करना है कि पूरे समुदाय की जरूरतों को पूरा करे, न कि मुनाफे का माध्यम बने.

सोवियत संघ खत्म हो गया, मगर इससे क्रांति समाप्त नहीं हुई. चिड़िया घोंसला बनाती है और आंधियां उसे उड़ा ले जाती हैं. मगर इससे चिड़िया के लिए घोंसले की उपयोगिता-अनिवार्यता खत्म नहीं हो जाती. उसे बार-बार घोंसला बनाना पड़ता है. बस, इससे वह यह सीखती है कि उसे और बेहतर घोंसला बनाना है. इसलिए यह इतिहास के अंत का नहीं, जनता द्वारा स्वर्णिम इतिहास के निर्माण का दौर है.


देखिए, रूसी क्रांति पर आइजेंस्टाइन की मशहूर फ़िल्म अक्टूबर





देखिए, क्रांति पूर्व रूसी मज़दूरों और सैनिकों की दयनीय दशा, फ़िल्म पीटर्सबर्ग का अंत

मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/05/2007 11:55:00 PM

बिहार में जनता की लडा़इयों की एक लंबी परंपरा रही है और इस परंपरा में जनता के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़नेवाले लेखकों, कवियों की भी. बिजेंद्र अनिल उन्हीं में से एक थे. आज वे हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके गीत हमारे साथ हैं और जो जनता लड़ रही है-उसके साथ हैं. पेश है एक श्रद्धांजलि और उनके कुछ गीत.


सुधीर सुमन
थाकार-गीतकार बिजेंद्र अनिल तीन नवंबर को नहीं रहे. यह सही है कि पिछले एक दशक में उन्होंने बहुत कम लिखा पर गरीब मजदूरों और मेहनकश किसानों से उनका संवेदनात्मक रिश्ता नहीं टूटा था. तीन चार वर्ष पहले उन्होंने खेत मजदूरों के राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए पांच गीत लिखे और शिक्षक की नौकरी से रिटारमेंट के बाद इधर नये सिरे से पूरी तैयारी के साथ लिखने की योजना बना रहे थे. सामाजिक-राजनीतिक बदलाव चाहनेवालों और क्रांति के आकांक्षी तमाम लोगों के लिए उनका अचानक चले जाना बहुत बड़ा आघात है.

अब सांस्कृतिक समारोहों और विचार गोष्ठियों में जनसंघर्षों की आंच से तपा और जमीनी अनुभवों से मिली वैचारिक दृढ़तावाला वह सांवला चेहरा नजर नहीं आयेगा. पर जनता की ताकत की ऊष्मा और संवेदनशीलता से भरी उनकी मुस्कुराहट कभी भुलायी नहीं जा सकती. और न ही उनके गीत भुलाये जायेंगे. सामाजिक-राजनैतिक सरोकारवाले रचनाकारों के लिए उनका होना एक ताकत की तरह था. अब जब वे नहीं हैं, तो उनका जीवन और उनकी रचनाएं हमारे लिए प्रेरणा का काम करेंगी, उनकी कहानियां लेखकों-कलाकारों को उनका सामाजिक -राजनीतिक फर्ज समझायेंगी.
ब्रेन हेमरेज का जो खतरनाक और अकस्मात हमला था, उसे वे बेशक नहीं झेल पाये और इस देश में आम लोगों के स्वास्थ्य के ठेकेदारों ने जरूर बिना कोशिश किये हाथ खड़े कर दिये कि इतना क्षतिग्रस्त दिमाग तो अमेरिका में भी कम बचाया जा सकता है. पर बिजेंद्र अनिल तो अपने उस दिमाग का प्रतिरूप पहले ही अपने शब्दों में उतार कर चले गये हैं. वह दिमाग, जो गांव के सामंत से लेकर साम्राज्यवाद तक का निर्भीकता के साथ प्रतिरोध करता है और प्रतिरोध के लिए व्यापक जनता को संगठित करने की तैयारी करता है, उसे वे अपनों के बीच छोड़ गये हैं>.

दर्जनों कहानी संग्रह और उपन्यास बिजेंद्र अनिल ने नहीं लिखे. 18 वर्ष की उम्र में आग और तूफान कविता संग्रह के प्रकाशन से उनके रचनात्मक सफर की शुरुआत हुई और विस्फोट और नयी अदालत नामक दो कहानी संग्रह ही प्रकाशित हुए. आरंभ एक भोजपुरी और दूसरा हिंदी में उपन्यास भी लिखा. उनकी इच्छा थी कि फर्ज कहानी को उपन्यास का रूप देते, पर इसका वक्त ही नहीं मिला. पिछले एक दशक से उनका तीसरा कहानी संग्रह इलाहाबाद के एक प्रकाशक ने लटकाये रखा. गजलों के प्रकाशन की योजना भी पूरी नहीं हुई. इसके बावजूद उन्हें पाठकों और लेखकों ने एक बहुत बड़े रचनाकार का दर्जा दिया और उनको आदर्शों का सम्मान किया.
बिजेंद्र अनिल वैकल्पिक जनसंस्कृति का निर्माण करनेवाले ऐसे महान रचनाकार हैं, जिन्होंने लिखने और जीने के प्रश्न को एक साथ लिया. व्यावसायिक लाभ के लिए गैरजनवादी प्रवृत्ति को प्रश्रय देनेवाली पत्रिकाओं में कुछ नहीं लिखा. लघु पत्रिका आंदोलन के जरिये वैकल्पिक मीडिया के निर्माण की कोशिशों को उनकी सृजनात्मक ऊर्जा का जबर्दस्त सहारा मिला. विजेंद्र अनिल ने सत्ता के केंद्रों की ओर नहीं देखा, चाहे वह दिल्ली में हो या पटना में. लेखन के शुरुआती दशक में ही उन्होंने अपने गांव से प्रगति पत्रिका निकाल कर अपने मंसूबे का संकेत दे दिया था.

बिजेंद्र अनिल उन लेखकों में नहीं थे, जो सिर्फ दूर की क्रांतियों और जनसंघर्षों का गान करते हैं और अपने आसपास चल रहे आंदोलनों पर सायास चुप्पी साधे रहते हैं. उन्होंने लेखक के लिए फर्ज की कसौटी गढ़ दी कि वह न केवल न्याय, समानता, आजादी और लोकतंत्र के पक्ष में संघर्षरत ताकतों की आवाज को अनियंत्रित करे बल्कि उनकी लड़ाइयों में शामिल भी हो. बिजेंद्र अनिल ने विचार और कर्म के स्तर पर इसे खुद भी साबित किया. गांव में जो उन्होंने लेखक कलाकार मंच नामक संगठन बनाया था, उसका मकसद किसान मजदूरों और अनपढ़ गरीब लोगों की चेतना को उन्नत करना था. इसके कारण उन्हें इलाके के कुख्यात सामंत से टकराना पड़ा. उन्हें प्रलोभन दिये गये कि पैसे ले लो पर ऐसे गीत न लिखो, ऐसी संस्था न चलाओ. बाद में धमकियां भी मिलने लगीं और इनका हाथ तोड़ दिया गया. मगर इन्होंने लिखना नहीं छोड़ा. 1980 में उन्होंने गांव में ही प्रेमचंद पर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमे कफन, पूस की रात और सवा सेर गेहूं का उनके द्वारा किया गया भोजपुरी नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया गया. बिहार नव जनवादी मोरचा और जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में से एक हैं बिजेंद्र अनिल.
विगत वर्ष बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान समारोह में साहित्य में किसान विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि आजकल लेखक उसी को याद कर रहा है, जिससे उसकी रोजी-रोटी चलती है, जबकि उसे मेहनतकश वर्ग और उसकी समस्याओं को ठीक से जानना-समझना चाहिए, क्योंकि उसी के बल पर दुनिया को बदला जा सकता है. हल, बैल, माल-मवेशी, विस्फोट, आग, अमन चैन, फर्ज, नयी अदालत, अपनों के बीच जैसी कहानियां लिखनेवाले बिजेंद्र अनिल के उपरोक्त विचारों पर ध्यान देना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. अब ना सहिब हम गुलमिया तोहार चाहे भेजउ जेलिया हो, रउवा शासन के बडुए ना जवाब भाई जी, बदली जा देसवा के खाका, बलमु लेके ललका पताका हो जैसे जनगीतों के रचनाकार बिजेंद्र अनिल हमेशा जनता के संघर्षों के साथ रहेंगे. आइल बा वोट के जबाना हो, पिया मुखिया बन जा आज भी कितना प्रासंगिक लगता है. अस्पताल में मरीजों के प्रति संवेदनहीनता और लूट को महसूस कर उनका गीत लगातार जेहन में गूंजता रहा, केकरा से करीं अरजिया हो सगरे बटमार. बटमारों और लुटेरों की संस्कृति के खिलाफ ही उन्होंने अपनी रचनाएं लिखीं. शहीदों और आंदोलनकारियों की तरफ से लिखनेवालों को क्रांतिकारी सलाम भेजा.

आज उनकी स्मृति जोरदार तरीके से हमसे कह रही है कि मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना.

बिजेंद्र अनिल के गीत

सगरे बटमार
केकरा से करीं अरजिया हो, सगरे बटमार
राजा के देखनीं, सिपहिया के देखनीं
नेता के देखनीं, उपहिया के देखनीं
पइसा प सभकर मरजिया हो, सगरे बटमार
देखनी कलट्टर के, जजो के देखनीं
राजो के देखनीं आ लाजो के देखनीं
कमवा बा सभकर फरजिया हो, सगरे बटमार
देस भइल बोफोर्स के तोप नियन सउदा
लोकतंत्र नाद भइल, संविधान हउदा
कइसे भरायी करजिया हो, सगरे बटमार
छप्पन गो छूरी से गरदन रेताइल
सांपन के दूध आउर लावा दिआइल
गाईं जा नयका तरजिया हो, सगरे बटमार
केकरा से करीं अरजिया हो, सगरे बटमार

बदलीं जा देसवा के खाका
बदलीं जा देसवा के खाका, बलमु लेई ललका पताका हो
खुरपी आ हंसुआ से कइनी इयारी
जिनमी भ सुनली मलिकवा के गारी
कबले बने के मुंहताका, बलमु लेई ललका पताका हो
ना चाहीं हमरा के कोठा-अटारी
ना चाहीं मलमल आ सिलिक के साड़ी
बन करअ दिल्ली के नाका, बलमु लेई ललका पताका हो
राजा आ रानी के उड़े जहजिया
हमनी के के हू न सुने अरजिया
जाम करअ शासन के चाका, बलमु लेई ललका पताका हो
तू बनिजा सूरज, हम बनि जाइब लाली
तू बनि जा झरना, हम बनबि हरियाली
पंजा पअ फेंकीं जा छाका, बलमु लेइ ललका पताका हो
बदली जा देसवा के खाका, बलमु लेई ललका पताका हो
15.10.1984

आइल बा वोट के जबाना
आइल बा वोट के जबाना हो, पिया मुखिया बनि जा
दाल-चाउर खूब मिली, खूब मिली चीनी
फेल होई झरिया-धनबाद के कमीनी
पाकिट में रही खजाना हो, पिया मुखिया बनि जा
जेकरा के मन करी, रासन तू दीहअ
जेकरा से मन करी, घूस लेई लीहअ
हाथ में कचहरी आ थाना हो, पिया मुखिया बनि जा
तोहरा से बेसी के करेला सेवा
जिनिगीन ओढ़त रहल टाट आउर लेवा
कबो ना मिलल नीमन खाना हो, पिया मुखिया बनि जा
अहरा आ पोखरा के लीहअ तू ठीका
कीनि दीहअ हमरा के झुमका आ टीका
गावे के फिलिमी तराना हो, पिया मुखिया बनि जा
आइल बा वोट के जबाना हो, पिया मुखिया बनि जा
02.02.1978

केकर हअ ई देश अउर के काटत बड़ुए चानी

केकर जोतल, केकर बोअल
के काटेला खेत?
केकर माई पुआ पकावे
केकर चीकन पेट?
के मरि-मरि सोना उपजावे, के बनि जाला दानी?
ताजमल के कर सिरजल हअ
केकर हअ ई ताज?
केकर ह ई माल खजाना?
करत आजु के राज?
पांकी-कांदो में के बइठल, के सेवे रजधानी?
केकरा खून-पसेना से
लउकत बड़ुए हरियाली?
के सीमा पर खून बहावे
केकरा मुंह पर लाली?
केकर अमरित के घड़ा बनावे, के पीयेला पानी?
केकर हअ ई देस अउर के काटत बड़ुए चानी?

इन गंदे नेपकिनों को निपटाना ज़रूरी हो गया है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/05/2007 01:14:00 AM

हिंदुत्ववादी फ़ासिस्ट संगठन न सिर्फ़ अपने विरोधियों की ज़ुबान खामोश करना चाहते हैं, बल्कि उन लोगों की भी जो इन फ़ासिस्टों की करतूतों को सामने लाते रहे हैं, लोगों तक पहुंचाते रहे हैं. इस सिलसिले में ताजा घटना दिल्ली की है, जहां आह्वान और नौजवान भारत सभा के कार्यालय पर आकर इन संगठनों ने धमकी दी. हम लोग, जो आज़ादी, जनवाद और मानवाधिकारों के लिए लगातार संघर्षरत हैं, इसके खिलाफ़ तीव्र प्रतिरोध दर्ज़ कराते हैं. हमारे समाज के ये गंदे नेपकिन हैं (राहुल भाई, आभार आपका) जिन्हें निपटाया जाना शेष है. हमारी पूरी सहानुभूति आह्वान और नौभास के साथियों के साथ है. इस घटना के बाद आज शाम को यह मेल मुझे प्राप्त हुआ.प्रस्तुत है यह मेल, पूरा का पूरा.


प्रिय साथी,
हम आपको एक गंभीर घटना के प्रति सतर्क कर रहे हैं!
आज सुबह (रविवार, 4 नवबंर, 2007) बजरंग दल के करीब 35-40 कार्यकर्ताओं ने
नौजवानों की पत्रिका 'आह्वान` और नौजवान भारत सभा के करावल नगर, दिल्ली स्थित
कार्यालय पर आकर धमकी दी कि यदि नौजवान भारत सभा ने अपना अभियान बंद नहीं
किया तो इसके गंभीर नतीजे होंगे.
नौभास और दिशा छात्र संगठन ने गुजरात में सांप्रदायिक फासिस्टों की घृणित करतूतों
के नये खुलासे के बाद इस मुद्दे पर निकाले गये परचे के साथ विभिन्न इलाकों में सभाएं
और सघन जनसपंर्क करते हुए व्यापक अभियान चला रखा है. बजरंग दल और संघ
परिवार के लोग इसी से बौखलाए हहुए हैं.
दिशा और नौभास हिंदू फासिस्टों की तमाम धमकियों के बावजूद इस मुहिम को जारी
रखने के लिए दृढ संकल्प हैं. हम आपको इस घटना की जानकारी दे रहे हैं क्योंकि हमें
पता चला है कि बौखलाहट में ये तत्व 'आह्वान` और 'नौजवान भारत सभा` के कार्यालय
पर हमला करने की योजना बना रहे हैं. सभी जानते हैं कि तर्क करने में इनका कोई
विश्वास नहीं होता और साजिशाना तरीके से भावनाएं भडक़ा कर भीड़ की ताकत से हमला
करना ही इनका तरीका होता है.
यदि कोई भी ऐसी घटना होती है तो हम आपको अविलंब सूचना देंगे. हमें विश्वास है कि
आप इसे लोगों तक पहुंचाने में सहयोग करेंगे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की इस लड़ाई
में हमारे साथ खड़े होंगे.
आपके,
अभिनव, दिशा छात्र संगठन
9213243755, 9999379381

आशीष, नौजवान भारत सभा
9211662298

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सपंर्क : बी-100, मुकुंद विहार, करावल नगर, दिल्ली-110094

राम के होने का कोई प्रमाण नहीं है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/04/2007 01:21:00 PM

राम के अस्तित्व और अयोध्या नगरी की ऐतिहासिकता पर दिये गये अपने लंबे व्याख्यान में इस बार प्रो राम शरण शर्मा राम और अयोध्या की ऐतिहासिकता के प्रमाणों के अभाव की चर्चा कर रहे हैं. आठवीं किस्त.

प्रो राम शरण शर्मा

सा पूर्व 1000-800 के ग्रंथ अथर्ववेद (10.2.31-33) में अयोध्या का सबसे पहला उल्लेख मिलता है और वह भी एक काल्पनिक नगर के रूप में. इसे देवताओं की नगरी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आठ चक्रों से घिरी है और नौ प्रवेश द्वारों से सज्जित है, जो सभी ओर से प्रकाश में घिरे हैं. संयुत्त निकाय (नालंदा संस्करण, खंड-3, पृष्ठ-358, खंड-4,पृष्ठ-162) में, जो लगभग ईसा पूर्व 300 का पालि ग्रंथ है, अयोध्या को गंगा नदी के कि नारे बसा हुआ दरसाया गया है, जिसका फैजाबाद जिले में सरयु नदी के किनारे बसी अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नही है. आरंभिक पालि ग्रंथ इस विचार का समर्थन नहीं करते कि गंगा शब्द का इस्तेमाल सरयू सहित सभी नदियों के लिए आम अर्थ में किया गया है. वे मही (गंडक ) और नेरजरा (फल्गू) नदियों सहित, जिनके किनारों पर बुद्ध ने पर्यटन किया था, बहुत-सी नदियों का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं. इनमें सरभू अथवा सरयू का भी उल्लेख है, पर एक ऐसे संदर्भ में, जिसका अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नहीं. वाल्मीकि रामायण के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक, मुनीशचंद्र जोशी ने अयोध्या को सरयू से कुछ दूरी पर ढूंढ़ निकाला. वाल्मीकि रामायण का उत्तरकांड ईसा की आरंभिक सदियों में रचा गया है. उसके अनुसार अयोध्या सरयू से अध्यर्घ योजना दूर है. यह सस्कृंत अभिव्यित बालकांड (22.11) में भी मिलती है और टीकाकारों के मुताबिक इसका अर्थ है 6 कोस अथवा 12 मील. वे इसका अर्थ डेढ़ योजन लगाते हैं. इससे पुन: उलझन उठ खड़ी होती है क्योंकि वर्तमान अयोध्या तो सरयू तट पर स्थित है. यह नदी पूर्व की ओर बहती है तथा बलिया और सारन जिलों में इसे पूर्वी बहाव को घाघरा कहते हैं. सारन जिले में जाकर यह गंगा में मिल जाती है. सरयू अपना मार्ग बदलती चलती है. जिसकी वजह से कुछ विद्वान बलिया जिले के खैराडीह इलाके को अयोध्या मानना चाहते हैं. सातवीं शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा अयोध्या की अवस्थिति के संबंध में प्रस्तुत साक्ष्य से भी कठिनाइयां उठ खड़ी होती हैं. उनके अनुसार अयोध्या कन्नौज के पूर्व दक्षिणपूर्व की ओर 600 ली (लगभग 192 किलोमीटर) दूर पड़ती थी और गंगा के दक्षिण की ओर लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित थी. अयोध्या को लगभग गंगा पर स्थित बता कर चीनी यात्री संभवत: उसकी अवस्थिति के बारे में आरंभिक बौद्ध परंपरा की ही पुष्टि करते हैं.


पिछली किस्तें : एक, दो, तीन, चार, पांच, छह, सात
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ह्वेनसांग के अनुसार अयोध्या देश में 3000 बौद्ध भिक्षु थे और साधु-संन्यासियों व गैर बौद्धों की संख्या इससे कम थी. अयोध्या राज्य की राजधानी के विषय में बताते हुए वह एक पुराने मठ का जिक्र करते हैं, जो काफी समय से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का केंद्र बना हुआ था (सीयूकी, खंड-1,लंदन, 1906 पृष्ठ 224-25). इससे सातवीं शताब्दी में अयोध्या में बौद्ध धर्म के प्रभुत्व का संकेत मिलता है. फिर भी ह्वेनसांग का कहना है कि अयोध्या देश में 100 बिहार तथा 10 देव (ब्राह्मणों के अथवा अन्यों के ) मंदिर थे. इससे पहले ईसा की पांचवी शताब्दी में फाह्यान साकेत में बुद्ध की दातौन (दंत काष्ठ) का उल्लेख करता है, जो कि सात-एक हाथ ऊंची उगी हुई थी. हालांकि ब्राह्मणों ने इस पेड़ को नष्ट कर दिया था, फिर भी वह उसी जगह पर फिर से उग आया (जेम्स लेगी, ए रिकार्ड ऑफ बुद्धिस्ट किंगडम, आक्सफोर्ड, 1886, पृष्ठ 54-55). अयोध्या को परंपरागत रूप से कई जैन तीर्थंकरों अथवा धार्मिक उपदेशकों की जन्मस्थली भी माना जाता है और जैनी इसे तीर्थ मानते हैं. जैन परंपरा में इसे कोसल राज्य की राजधानी बताया गया है पर यह ठीक कहां स्थित है यह नहीं दरसाया गया. गुप्तकाल के बाद जाकर ही कहीं वर्तमान अयोध्या को राम की लोक विश्रुत अयोध्या के साथ जोड़ा जाने लगा. उस समय तक राम को विष्णु का अवतार माना जाने लगा था.
अब तक विशेष रूप से अयोध्या का उल्लेख करने वाली मुहरों या सिक्कों का यहां पता नहीं चला है. हमें विभिन्न प्रकार के सिक्के जरूर मिलते हैं, जिन्हें अयोध्या सिक्कों के नाम से जाना जाता है, जो ईपू दूसरी शताब्दी से लेकर पहली शताब्दी और दूसरी शताब्दी ईस्वी तक के हैं. पर उन पर अयोध्या का नाम अंकित नहीं है. उदाहरण के लिए उज्जयिनी, त्रिपुरी, एरणु, कौशांबी, कपिलवस्तु, वाराणसी, वैशाली, नालंदा आदि की पहचान या तो मुहरों या फिर सिक्कों के आधार पर स्थापित की गयी है. अयोध्या से प्राप्त पहली शताब्दी के एक शिलालेख में पुष्यमित्र शुंग के एक वंशज का उल्लेख है पर सिक्के और शिलालेख राम दाशरथिवाली अयोध्या की पहचान नहीं करा पाते. यह सचमुच निराशाजनक बात है कि पर्याप्त उत्खनन और अन्वेषण के बावजूद हम वर्तमान अयोध्या को गुप्तकाल से पूर्व कहीं भी राम के साथ विश्ववासपूर्वक नहीं जोड़ सकते.

रामकथा को हिंदी भाषा क्षेत्र में हालांकि रामचरितमानस ने लोकप्रिय बनाया, तथापि अवधी भाषा का यह महाकाव्य वाल्मीकि के संस्कृत महाकाव्य रामायण पर आधारित है. मूल राम महाकाव्य कोई समरूप रचना नहीं है. मूल रूप से इसमें 6,000 श्लोक थे, जिन्हें बाद से बढ़ा कर 12,000 और अंतत: 24,000 कर दिया गया. विषयवस्तु के आधार पर इस ग्रंथ के आलोचनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि यह चार अवस्थाओं से होकर गुजरा था. इसकी अंतिम अवस्था 12वीं शताब्दी के आसपास की बतायी जाती है और सबसे आरंभिक अवस्था ईपू 400 के आसपास की हो सकती है. किंतु यह महाकाव्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ग विभक्त, पितृसतात्मक और राज्यसत्ता आधारित समाज के व्यवस्थित कार्यचालन के लिए कतिपय आदर्श निर्धारित करता है. यह शिक्षा देता है कि पूत्र को पिता की, छोटे भाई को बड़े भाई की और पत्नी को पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए. यह इस बात पर बल देता है कि विभिन्न वर्णों के लिए जो कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं, उन्हें उनका पालन अवश्य करना चाहिए और वर्ण-जाति संबंधी कर्तव्यों से भटक जानेवालों को जब भी जरूरी हो निर्मम दंड दिया जाना चाहिए और अंत में यह राजा सहित सभी को आदेशि करता है कि धर्म के जो आदर्श राज्य, वर्ण और परिवार के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए निर्दिष्ट किये गये हैं, उन्हीं के अनुसार चलें. विभीषण अपने कुल, जो गोत्र आधारित समाज के सदस्यों को एक साथ बांधे रखने के लिए सर्वाधिक आवश्यक था, के प्रति निष्ठा की बलि देकर भी धर्म नाम की विचारधारा में शामिल हुआ. वाल्मीकि द्वारा निर्दिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड जैन, बौद्ध और अन्य ब्राह्मण महाकाव्यों और लोक कथाओं में भी दृष्टिगोचर होते हैं, महाकाव्य और लोक कथाएं भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में मानदंडों, अवस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, पर उनमें उल्लिखित कुछ ही राजाओं व अन्य महान विभूतियों की ऐतिहासिकता को पुरातत्व, शिलालेखों, प्रतिमाओं और अन्य स्त्रोतों के आधार पर सत्यापित किया जा सकता है. दुर्भाग्य से हमारे पास इस तरह का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 1800 के बीच एक ऐसी अवधि, जिसे पुराणों की परंपरा पर काम करनेवाले कुछ विद्वानों ने राम का काल बताया है, अयोध्या में राम दशरथि की ऐतिहासिकता को सिद्ध कर सके.

जो सच कह देगा वह रेशमा की तरह मारा जायेगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/03/2007 03:59:00 PM

एक गुंडा विधायक द्वारा पत्रकारों की पिटाई के संदर्भ में मेरी टिप्पणी पर प्रमोद रंजन की यह लंबी टिप्पणी प्राप्त हुई है. यह असल में एक स्वतंत्र पोस्ट का दर्जा रखती है, इसलिए इसे यहां डाला जा रहा है. इरादा है कि इसी बहाने भारत के मीडिया जगत के चरित्र पर एक बहस खडी़ हो.

भाई रेयाज जी,

आपकी टिप्पणी अच्छी लगी लेकिन इससे बिहार की पत्रकारिता असली चेहरा नहीं दिखता। हमाम के नंगेपन की पूरी सच्चाई कहने का हौसला तो शायद किसी में नहीं है।उस सच को भी जो पूरा कह देगा रेशमा खातून की तरह मारा जाएगा।

मीडिया की तटस्थता नासूर बन चुकी है। आज की मन:स्थिति में इस कथित तटस्थता के कारणों का विश्लेषण कर पाने की स्थिति में नहीं हूं , लेकिन जरा सोचिए, रेशमा की यह जो चिट्ठी आपने ब्लॉग पर दी है, पटना के मीडिया कार्यालयों में कई दिनों से घूम रही थी । बताया जा रहा है कि कुछ दफ्तरों में तो रेशमा और उसके भाई ने खुद जाकर यह पत्र संपादकों को सौंपा था। बार-बार बलत्कृत एक महिला को संपादकों को पत्र सौंपने के बाद वाली सुबह कैसा लगा होगा, जब उसने पाया होगा कहीं कुछ नहीं छपा? क्या गुजरी होगी उस पर, जब उसने जाना होगा कि उसकी जिंदगी के लिए अखबारों, समाचार चैनलों के पास एक पंक्ति की भी जगह नहीं है? क्या आप उसके तिल-तिल कर मरने की बेचैनी महसूस कर सकते हैं? अभी हम रेशमा के बारे में ज्यादा नहीं जानते पर शायद वह निम्न मध्यमवर्ग की, नौकरी की चाहत रखने वाली कोई मजबूर स्त्री थी। अन्य आम लोगों की तरह मीडिया पर उसका अथाह भरोसा था। वह अनंत सिंह की ताकत के सामने आत्मसमर्पण कर सकती थी। अगर वह उसके कहे अनुसार एक विधायक ( जो संभवत: राजद के एक विधान पार्षद हैं) पर बलात्कार का मुकदमा करती तो उसे पैसे भी मिल सकते थे लेकिन उसने मीडिया पर भरोसा किया। मुख्यमंत्री के नाम यह पत्र, जिसकी प्रति राबड़ी देवी व पुलिस अधिकारियों को भेजी गई है, निश्चित ही किसी पत्रकार की सलाह पर ही लिखा गया होगा । शायद वह भी आम लोगों की तरह थाना जाने की हिम्मत न कर पाई हो, अगर जाती तो उसका जिक्र पत्र में जरूर रहता, या गई भी हो तो वहां उसे उसकी और 'छोटे सरकार` (अनंत सिंह) की हैसियत का फर्क बता दिया गया होगा। सप्ताह में दो दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जनता दरबार सबके लिए खुला रहता है लेकिन वह वहां भी नहीं गई। जिस मुख्यमंत्री का अनंत सिंह को संरक्षण प्राप्त है, जिनके आवास में ही उसके असली आका रहते हैं, वहां मौजूद अनंत के गुर्गों की नजर से भी वह भला कैसे बचती? मीडिया दफ्तरों में जाकर उसने अपनी आपबीती सुनाई होगी तो उससे कहा गया होगा कि बिना प्रमाण के तो यह बातें प्रसारित नहीं हो सकतीं , एक उपाय है तुम मुख्यमंत्री व आला अधिकारियों के नाम पत्र लिखो। उसकी प्रतिलिपि मीडिया को दो तो उस हवाले से खबर छप सकती है। आप भी जानते हैं कि तटस्थता का ढ़ोंग करने वाली पत्रकारिता का यह पुराना स्टंट है। लेकिन खबर नहीं छपी क्योंकि वह जिस आदमी से संबधित थी वह अनंत सिंह था। अनंत सिंह, मतलब सूबे का सबसे बड़ा हत्यारा, हथियारों के सबसे बड़े जखीरे का मालिक, नीतीश कुमार के साथलालू प्रसाद का भी खासमखास। इतना ही नहीं, बिहारी पत्रकारिता के एक खास पावरफुल तबके का भी गॉडफादर।
आज अनंत सिंह द्वारा पत्रकारों की पिटाई की घटना पर पटना के एक अखबार में पहले पन्ने पर एक सेवानिवृत सम्मानित पत्रकार (व्यक्तिगत रूप से मैं भी उनके लेखन से तथ्य संग्रह की बारीकियां सीखता रहा हूं) की टिप्पणी छपी है 'कब तक पिटते रहेंगे प्रकाश सिंह`! उन्होंने लिखा हैं '' प्रकाश सिंह ने तो खबर संग्रह के क्रम में प्रताड़ना झेली है,पर यह कम लोगों को पता होगा कि मीडिया का एक हिस्सा बाहुबलियों से जुड़ी खबरों को नजरअंदाज कर देता है। इस तरह बिहार में वास्तव में क्या हो रहा है, उनमें काफी कुछ जनता के सामने नहीं आ पाता। यह सब राजनीति के अपराधीकरण का परिणाम है।'' आह! कैसी विश्वसनीय बात लिखी है महोदय ने! राजनीति के अपराधीकरण से डरे बेचारे मीडियाकर्मी करें भी तो क्या? लेकिन क्या यह सच नहीं है कि पटना के जिस नं वन अखबार में उन्होंने अपनी उम्र लगा दी, उस अखबार के एचआरडी का सर्वोच्च अधिकारी अनंत सिंह की कोई बात नहीं टालता? 'छोटे सरकार` के आदेश पर वहां वर्षों से पत्रकारों की बहाली होती रही है? उसके आदेश से नियुक्त किए गए पत्रकार अब विभिन्न अखबारों में फैल गए हैं। मैं उनसे तो यह आशा नहीं करता कि वे इस उम्र मे पत्रकारों के उस दूसरे तबके के बारे में जानकारी देकर स्वयं को खतरे में डालें। परन्तु सच्चाई यह है कि बिहार में राजनीति का ही नहीं मीडिया का भी अपराधीकरण हो चुका है। जातिवाद तो खैर चरम पर है ही।
और यह जो राजद-लोजपा का आज बंद था, उससे बड़ा ढकोसला कुछ और नहीं हो सकता। अनंत सिंह जंगली खुंखारपन को सत्ता के गलियारे तक पहुंचाने वाले लालू प्रसाद ही रहे हैं। वह जिसकी कुछ महीने पहले मौत हुई,अनंत सिंह का बड़ा भाई दिलीप सिंह राजद का मंत्री था, उसकी अपनी कोई ताकत नहीं थी। लालू प्रसाद ने अनंत की ताकत का इस्तेमाल करने के लिए ही उसके भाई को मंत्री बनाया था क्योंकि कई हत्याओं के आरोपी अनंत को कोर्ट की नजर में फरार रहना पड़ता था। बाढ-मोकामा इलाके का बच्चा-बच्चा जानता है कि वास्तव में लालू के कार्यकाल में 'छोटे सरकार` कभी फरार नहीं रहा, वह हमेशा अपने घर से इलाके पर राज करता रहा।
मुश्किल तब खड़ी हुई जब अनंत का एक मजबूत गुर्गा सूरज सिंह उर्फ सूरजभान सिंह अजीत सरकार हत्याकांड में जेल चला गया। कहा जाता है उस समय सूरजभान को अनंत ने मदद नहीं की। दोनों में अदावत बढ़ी और अंतत: सूरजभान अनंत सिंह के मंत्री भाई दिलीप सिंह के खिलाफ वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़ा हो गया। दोनों ही भूमिहार जाति के थे इसलिए कड़ा मुकाबला हुआ लेकिन सूरजभान भारी मतों से जीत गया। चुंकि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे सूरजभान की जीत हुई थी इसलिए मोकामा इलाके मे वर्चस्व की दृष्टि से वह लालू प्रसाद के लिए महत्वपूर्ण था। इससे दिलीप सिंह का महत्व कम हुआ। अंतत: 2004में ऐसी स्थिति आई कि लालू प्रसाद ने अनंत सिंह के घर पर छापा मारने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स भेज दी। यह सब ठेठ लालू शैली मे चलता रहा ,ठीक शाहबुद्दीन मामले की तरह कभी मार कभी प्यार शैली में। इसी बीच लालू ने दिलीप सिंह को बिधान परिषद् का सदस्य भी बना दिया। लेकिन अनंत शाहबुद्दीन की तरह राजनीतिक बुद्धि का अपराधी` नही रहा है, उसे लालूजी का यह अंदाज पसंद नहीं आया सो उसने ललन सिंह की रहनुमाई में नीतीश कुमार का दामन थाम लिया। नीतीश कुमार को लगा कि वह उन्हें बाढ़ लोकसभा से चुनाव जीतने में मदद कर सकता है। नीतीशजी को अनंत सिंह द्वारा चांदी के सिक्कों से तौले जाने की खबर तो आपको भी याद होगी रेयाज भाई।
इसलिए यह अनायास नहीं है कि आज पत्रकारों की पिटाई की घटना के विरोध में बंद करवाने पटना के डाकबंगला चौराहे पर लोजपा का सांसद सूरजभान सिंह सबसे पहले पहुंचा था। इस अपराधी सांसद के पिछले सात वर्षों के राजनीतिक जीवन में नेताओं के साथ मंच साझेदारी के आलावा किसी और कार्यक्रम में शिरकत की खबर आपने नहीं देखी-सुनी होगी। लेकिन इस मामले में वह सुबह 8 बजे ही बंद करवाने पहुंच गया। क्या इसलिए कि उसे पत्रकारों की पिटाई की फिक्र है, या दर्जनों हत्याओं का यह आरोपी एक लड़की के बलात्कार से व्यथित हो गया? जाहिर है, नहीं। यह मोकामा टाल की बर्बर आपराधिक अदावत है जो राजनीति का नकाब ओढ़ कर अब सूबे की राजनीति में पहुंच चुकी है।

अभी बस इतना ही। व्यथित हूं कुछ और बातें मन में घुमड़ रहीं हैं पर कहने का मन नहीं बन पा रहा।

- प्रमोद रंजन

महानुभावों! यह दमन का एक्सटेंशन ही तो है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2007 06:56:00 PM

पत्रकारों को पीटे जाने की घटना से उठे कुछ ज़रूरी सवालों को रेखांकित कर रहे हैं प्रभात ख़बर के संपादक अजय कुमार.

महानुभावों! यह दमन का एक्सटेंशन ही तो है

अजय कुमार
बाहुबली विधायक अनंत सिंह और उनके समर्थकों द्वारा पत्रकारों को बंधक बना कर पीटे जाने की खबर देश-दुनिया में जैसे ही फै ली, बिहार से बाहर के चार मित्रों के एसएमएस मिले. चारों संदेशों के कॉमन बिंदु थे-`क्या बिहार नहीं सुधरेगा? एसएमएस भेजनेवाले मित्रों में दो गैर बिहारी भी हैं.

यह सवाल ऐसे समय में पूछे जा रहे हैं, जब बिहार की ब्रांडिंग क रने की बात चल रही है. पूंजी निवेश के लिए निवेशकों को बुलाने की पहल की जा रही है. बिहारी क हलाना जहां गौरव की बात होगी, अपमान की नहीं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि `या सचमुच बिहार नहीं सुधरेगा? नवनिर्माण और पुनर्निर्माण की बातें तो बहुत दूर की हैं.
आखिर खोट कहां है? जब इस व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक और जनता के प्रति उत्तरदायी बनाने के उपाय तलाशे जा रहे हैं, दूसरी तरफ आम आदमी पर आफत बढ़ती ही जा रही है. आखिर इस तंत्र का चेहरा लगातार मनुष्य विरोधी `यों होता जा रहा है? भागलपुर के नाथनगर से लेक र पत्रकारों की पिटाई तक , इसकी एक लंबी शृंखला बनती जा रही है. ऐसा क्यों है कि समाज के एक हिस्से को लगता है कि वह कुछ भी कर लेगा, किसी को भी सबक सिखा देगा और फिर भी बचा रहेगा?
शायद बहुतों ने उम्मीद की थी कि जिन चीजों से बिहार की बदनामी होती रही है, वे क्रमिक ढंग से डरावने अतीत का हिस्सा बन जायेंगी. लेकि न वर्तमान का सवाल बार-बार सामने खड़ा हो जाता है-क्या बिहार नहीं सुधरेगा?
अभिव्यति की आजादी जैसे बड़े सवालों को छोड़ दें, तो दमन की एक छोटी बानगी देखिए. एक सरकारी उपक्रम के खिलाफ राजधानी में व्यवसायी संगठनों ने धरना दिया. खबर छपने के बाद अखबारों पर मुकदमे कर दिये गये. पटना से छपनेवाले एक -दो अखबारों को छोड़ कर सभी अखबार मुकदमे का सामना कर रहे हैं. यह बात सत्ताधारी दल के शीर्ष लोगों को बतायी गयी. उन्होंने इस बात पर सहमति भी जतायी कि धरना की खबर छपना मुकदमे की वजह नहीं हो सकता. पर वास्तविक ता यह है कि वह मुकदमा अब भी चल रहा है.
अनंत सिंह मुकदमा नहीं कर सकते. उन्हें अपने बाहुबल पर भरोसा है. सो, उन्होंने पत्रकारों को अपने सरकारी आवास पर बुलाया और उनकी जम कर धुनाई कर-करा दी. तो एक तरह से अखबारों-पत्रकारों पर जो प्रकारांतर से दमन चल रहा है, यह घटना उसी का विस्तार है.
डॉ जगन्नाथ मिश्र ने जब प्रेस बिल लाया था, तो देश भर में उसका तीखा विरोध हुआ था. पत्रकार ही नहीं बल्कि अलग-अलग तबकों के लोगों ने उसका प्रतिवाद किया था. बेशक , उसमें वे राजनीतिज्ञ भी थे, जो आज राज्य में पक्ष-विपक्ष की भूमिका में हैं. व्यक्ति भले बदल गये हों, सत्ता का चरित्र वही है.
और वह सवाल फिर खड़ा है-`क्या बिहार नहीं सुधरेगा?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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