हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

...तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/31/2007 12:14:00 AM

पाश को पढ़ना और फिर-फिर पढ़ना अपने समय के प्यार और अपने समय की नफ़रतों को जानने की तरह है. वे कुछ उन कवियों में शामिल हैं, जिन्हें बार-बार पढा़ जाना ज़रूरी हो गया है-नेरुदा, ब्रेष्ट और मुक्तिबोध की तरह. हमारे देश में जहां अंधेरा इतना घना है और उजाले की लडा़ई भी उतनी ही सघन, पाश लिजलिजे हिंदी लेखकों और कवियों से कहीं ऊपर इस लडा़ई में और इस अंधेरे के खिलाफ़ हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं. वे हमारे समय के लोर्का हैं. उनकी संपूर्ण कविताएं हिंदी में अनूदित होकर कुछ साल पहले प्रकाशित हुई हैं. प्रस्तुत हैं कुछ कविताएं. हम कोशिश कर रहे हैं-पाश पर कुछ और सामग्री देने की.

पाश की कविताएं

हम लडेंगे साथी

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है
उदास निहाई पर हल की लीकें
अब भी बनती हैं, चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता, सवाल नाचता है
सवाल के कंधों पर चढ़ कर
हम लड़ेंगे साथी.

कत्ल हुए जज्बात की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़ी गांठों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे तब तक
कि बीरू बकरिहा जब तक
बकरियों का पेशाब पीता है
खिले हुए सरसों के फूलों को
बीजनेवाले जब तक खुद नहीं सूंघते
कि सूजी आंखोंवाली
गांव की अध्यापिका का पति जब तक
जंग से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने ही भाइयों का गला दबाने के लिए विवश हैं
कि बाबू दफ्तरों के
जब तक रक्त से अक्षर लिखते हैं...
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है...

जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी...
हम लड़ेंगे
कि लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अभी तक लड़े क्यों न
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जानेवालों
की याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी...

तीसरा महायुद्ध

कचहरियों के बाहर खड़े
बूढ़े किसान की आंखों में मोतियाबिंद उतर आयेगा
शाम तक हो जायेगी सफेद
रोजगार दफ्तर के आंगन में थक रही ताजी उगी दाढ़ी
बहुत जल्द भूल जायेगा पुराने ढाबे का नया नौकर
अपनी मां के हमेशा ही धुत्त मैले रहनेवाले
पोने की मीठी महक
ढूंढ़ता रहेगा किनारे सड़क के वह निराश ज्योतिषी
अपने ही हाथ से मिटी हुई भाग्य रेखा
कार तले कुचले गये और पेंशन लेने आये
पुराने फौजी की टूटी हुई साइकिल
तीसरा महायुद्ध लड़ने की सोचेगी

तीसरा महायुद्ध
जो नहीं लड़ा जायेगा अब
जर्मनी और भा़डे के टट्टुओं के बीच
तीसरा महायुद्ध सीनों में खुर रही
जीने की बादशाहत लड़ेगी
तीसरा महायुद्ध गोबर से लिपी
छतों की सादगी लड़ेगी
तीसरा महायुद्ध कमीज से धुल न सकनेवाले
बरोजे की छींटे लड़ेंगीं
तीसरा महायुद्ध
पेशाब से भरी रूई में लिपटी कटी हुई उंगली लड़ेगी

जुल्म के चेहरे पर चमकती
बनी-संवरी नजाकत के खिलाफ
धरती को कैद करना चाहते चाबी के छल्ले के खिलाफ
तीसरा महायुद्ध
कभी न खुलनेवाली मुट्ठी के खिलाफ लड़ा जायेगा
कोमल शामों के बदन पर रेंगनेवाले
सेह के कांटों के खिलाफ लड़ा जायेगा
तीसरा महायुद्ध उस दहशत के खिलाफ लड़ा जायेगा
जिसका अक्स दंदियां निकालती मेरी बेटी की आंखों में है,
तीसरा महायुद्ध
किसी फटी-सी जेब में मसल दिये गये
एक छोटे से संसार के लिए लड़ा जायेगा.


लड़े हुए वर्तमान के रू-ब-रू

मैं आजकल अखबारों से बहुत डरता हूं
जरूर उनमें कहीं-न-कहीं
कुछ न होने की खबर छपी होगी
शायद आप जानते नहीं, या जानते भी हों
कि कितना भयानक है कहीं भी कुछ न होना
लगातार नजरों का हांफते जाना
और चीजों का चुपचाप लेटे रहना-किसी ठंडी औरत की तरह

मुझे तो आजकल चौपालों में होती गपशप भी ऐसी लगती है
जैसे किसी झूमना चाहते वृक्ष को
सांप गुंजलक मार कर सो रहा हो
मुझे डर है खाली कुरसियों की तरह कम हुई दीखती
यह दुनिया हमारे बारे में क्या उलटा-पुलटा सोचती होगी
अफसोस है कि सदियां बीत गयी हैं
रोटी, काम और श्मशान अब भी समझते होंगे
कि हम इनकी खातिर ही हैं...
मैं उलझन में हूं कि कैसे समझाऊं
लजीले सवेरों को
संगठित रातों और शरीफ शामों को
हम कोई इनसे सलामी लेने नहीं आये
और साथ-को-साथ जैसा कुछ कहां है
जो आलिंगन के लिए खुली बांहों से
बस हाथ भर की दूरी पर तड़पता रहे
आजकल हादसे भी मिलते हैं तो ऐसे
जैसे कोई हांफता हुआ बूढ़ा
वेश्या की सीढ़ी चढ़ रहा हो
कहीं कुछ इस तरह का क्यों नहीं है
जैसे किसी पहली को कोई मिलता है

भला कहां तक जायेगा
सींगोंवाली कब्र के आगे दौड़ता हुआ
महात्मा लोगों का वरदान दिया हुआ यह मुल्क
आखिर कब लौटेंगे, घटनाओं से गूंजते हुए घरों में
हम जीने के शोर से जलावतन हुए लोग
और बैठ कर अलावों पर कब सुनेंगे, आग के मिजाज की बातें
किसी-न-किसी दिन जरूर अपने चुबंनों से
हम मौसम के गालों पर चटाख डालेंगे
और सारी-की-सारी धरती अजीबो-गरीब अखबार बनेगी
जिसमें बहुत कुछ होने की खबरें
छपा करेंगी किसी-न-किसी दिन.


अपनी असुरक्षा से

यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये
आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है
हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे खतरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा

और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रहे
कीमतों की बेशर्म हंसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से खतरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.


हमारे समयों में

यह सब कुछ हमारे ही समयों में होना था
कि समय ने रूक जाना था थके हुए युद्ध की तरह
और कच्ची दीवारों पर लटकते कैलेंडरों ने
प्रधानमंत्री की फोटो बन कर रह जाना था

धूप से तिड़की हुई दीवारों के परखचों
और धुएं को तरसते चूल्हों ने
हमारे ही समयों का गीत बनना था

गरीब की बेटी की तरह बढ़ रहा
इस देश के सम्मान का पौधा
हमारे रोज घटते कद के कंधों पर ही उगना था
शानदार एटमी तजर्बे की मिट्टी
हमारी आत्मा में फैले हुए रेगिस्तान से उड़नी थी

मेरे-आपके दिलों की सड़क के मस्तक पर जमना था
रोटी मांगने आये अध्यापकों के मस्तक की नसों का लहू
दशहरे के मैदान में
गुम हुई सीता नहीं, बस तेल का टिन मांगते हुए
रावण हमारे ही बूढ़ों को बनना था
अपमान वक्त का हमारे ही समयों में होना था
हिटलर की बेटी ने जिंदगी के खेतों की मां बन कर
खुद हिटलर का डरौना
हमारे ही मस्तकों में गड़ाना था

यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊं
मार्क्स का सिंह जैसा सिर
दिल्ली की भूल-भुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे ही समयों में होना था

बहुत दफा, पक्के पुलों पर
लड़ाइयां हुईं
लेकिन जुल्म की शमशीर के
घूंघट न मुड़ सके
मेरे यारो, अकेले जीने की ख्वाहिश कोई पीतल का छल्ला है
हर पल जो घिस रहा
न इसने यार की निशानी बनना है
न मुश्किल वक्त में रकम बनना है

मेरे यारो, हमारे वक्त का एहसास
बस इतना ही न रह जाये
कि हम धीमे-धीमे मरने को ही
जीना समझ बैठे थे
कि समय हमारी घड़ियों से नहीं
हडि्डयों के खुरने से मापे गये

यह गौरव हमारे ही समयों को मिलेगा
कि उन्होंने नफरत निथार ली
गुजरते गंदलाये समुद्रों से
कि उन्होंने बींध दिया पिलपिली मुहब्बत का तेंदुआ
और वह तैर कर जा पहुंचे
हुस्न की दहलीजों पर

यह गौरव हमारे ही समयों का होगा
यह गौरव हमारे ही समयों का होना है.


बेदखली के लिए विनयपत्र

मैंने उम्र भर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है
अगर उसके अफसोस में पूरा देश ही शामिल है
तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें
मैं खूब जानता हूं नीले सागरों तक फैले हुए
इस खेतों, खानों,भट्ठों के भारत को
वह ठीक इसी का साधारण-सा एक कोना था
जहां पहली बार
जब दिहाड़ी मजदूर पर उठा थप्पड़ मरोड़ा गया
किसी के खुरदरे बेनाम हाथों में
ठीक वही वक्त था
जब इस कत्ल की साजिश रची गयी
कोई भी पुलिस नहीं खोज पायेगी इस साजिश की जगह
क्योंकि ट्यूबें सिर्फ राजधानी में जगमगाती हैं
और खेतों, खानों व भट्ठों का भारत बहुत अंधेरा है

और ठीक इसी सर्द अंधेरे में होश संभालने पर
जीने के साथ-साथ
पहली बार जब इस जीवन के बारे में सोचना शुरू किया
मैंने खुद को इस कत्ल की साजिश में शामिल पाया
जब भी वीभत्स शोर का खुरा खोज-मिटा कर
मैंने टर्राते हुए टिड्डे को ढूंढ़ना चाहा
अपनी पुरी दुनिया को शामिल देखा है

मैंने हमेशा ही उसे कत्ल किया है
हर परिचित की छाती में ढूंढ़ कर
अगर उसके कातिलों को इस तरह सड़कों पर देखा जाना है
तो मुझे भी मिले बनती सजा
मैं नही चाहता कि सिर्फ इस आधार पर बचता रहूं
कि भजनलाल बिशनोई को मेरा पता मालूम नहीं

इसका जो भी नाम है-गुंडों की सल्तनत का
मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं
मैं उस पायलट की
चालाक आंखों में चुभता भारत हूं
हां मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में
अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है
तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो.


भारत

भारत-
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहां कहीं भी प्रयोग किया जाये
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं

इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में हैं
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं
और वह भूख लगने पर
अपने अंग भी चबा सकते हैं
उनके लिए जिंदगी एक परंपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति
जब भी कोई समूचे भारत की
राष्ट्रीय एकता की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है-
उसकी टोपी हवा में उछाल दूं
उसे बताऊं
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं
वरन खेतों में दायर हैं
जहां अन्न उगता है
जहां सेंध लगती है...


और अंत में

तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त
सिवाय इसके
कि मुझे जीने की बहुत लालसा थी
कि मैं गले तक ज़िंदगी में डूबना चाहता था.
मेरे हिस्से का जी लेना मेरी दोस्त
मेरे हिस्से का जी लेना.

(मैं अब विदा लेता हूं से)

मूल पंजाबी से अनुवाद : चमनलाल

लालू की रैली : सरकार से असहमत जनता का सैलाब

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/29/2007 12:46:00 AM

लालू प्रसाद का आकर्षण बिहार में कम नहीं हुआ है-आज की रैली ने यह एक बार फिर साबित किया. यह लालू की सत्ता के बाहर रहते पहली रैली थी-पिछले 17 सालों में पहली बार लालू विपक्षी पार्टी के नेता के तौर पर लोगों के सामने थे-और वह भी ऐसे समय में जब वर्तमान सरकार को भी अभी बहुत दिन न हुए हों-वह ठीक से अभी दो साल की भी न हुई हो-लालू के लिए इतनी बडी़ भीड़ का जुटना और इतनी शालीनता से जुटना दिखाता है कि लालू का आधार खिसका नहीं है. पहले की रैलियों को देखें तो एक बात और दिखी-इस बार प्रबंधन पर ध्यान दिया गया और बेतरतीबी और हुड़दंग नाम को नहीं था. कुमार अनिल की टिप्पणी.

कुमार अनिल
चेतावनी रैली लालू प्रसाद की पिछली रैलियों से कई मायनों में भिन्न थी. लाठी-बंदूकवाले नेता इस बार नजर नहीं आ रहे थे. इस बार उच्छृंखलता बिल्कुल नहीं थी. यह छोटे किसानों-भूमिहीनों की बड़ी रैली थी. गरीब जनता की शालीन राजनीतिक दावेदारी थी.

खुद लालू भी बदले-बदले से नजर आये. उन्होंने हंसी-ठहाके के बहुत कम मौके दिये. उनका भाषण कुछ बिखरा बिखरा- सा था. स्वाभाविक भी था-आखिर वे 17 वर्षों के बाद विपक्ष के नेता के बतौर बोल रहे थे. ऐसा इसलिए भी था कि वे आज उस पक्षी की भूमिका में थे, जो किसी आंधी में अपने घोंसले के उजड़ जाने के बाद फिर से तिनका-तिनका जोड़ता है. लालू ने अपना भाषण गुजरात के मुसलिम विरोधी दंगे से शुरू किया, पर वे जानते हैं कि आज सिर्फ सांप्रदायिक दंगे से सुरक्षा का वादा करके मुसलमानों को नहीं जीता सकता. वे सच्चर कमीशन की सिफारिशों की चर्चा करते हैं. वे दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति की सुविधा देने की बात बताना भी नहीं भूलते. उन्होंने ऊंची जाति को बार-बार संदेश दिया कि वे सबको लेकर चलना चाहते हैं. आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने ब्रह्मर्षि समाज (भूमिहारों) को बधाई देने के साथ ही कायस्थ समाज को भी रैली में आने के लिए बधाई दी. वे पिछड़ावाद को छोड़े बगैर ऊंची जाति को अपने साथ लाने के लिए बार-बार संतुलन बिठाते दिखे. शंकर प्रसाद टेकरीवाल, रामचंद्र पूर्वे, प्रेमचंद गुप्त व राजनीति प्रसाद को प्रमुखता दी गयी. पिछड़े, मुसलमानों, दलितों व अतिपिछड़ों के अलावा ब्रह्मर्षि, कायस्थ व बनिया समाज पर लालू की विशेष नजर थी. वे यह बताने में सफल रहे कि रैली सिर्फ यादवों की रैली नहीं है.
15 वर्षों के उनके शासन पर निकम्मेपन का आरोप लगता रहा है. उन्होंने रेलवे के जरिये अपने किये जा रहे कामों का विशेष उल्लेख किया. परसा, मढ़ौरा, मधेपुरा, मोकामा, मुजफ्फरपुर व गढ़हरा में रेलवे के खुलनेवाले कारखानों के जरिये उन्होंने अपनी नयी छवि पेश करने की कोशिश की. उन्होंने रोजगार व पलायन जैसे मुद्दों की चर्चा की, जो कभी उन्हीं की आलोचना के लिए पेश किये जाते थे. पुलिसिया अत्याचार, बीपीएल कार्ड व इंदिरा आवास पर भी वे खूब बोले. कभी लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच वर्ष इंतजार नहीं करतीं. वर्षों से यह उक्ति विपक्ष को ताकत देती रही है. लालू ने भी इस ऐतिहासिक उक्ति का इस्तेमाल करते हुए कहा कि चेतावनी रैली के बाद जल्द ही वे `भगावन रैली' करेंगे. पर इस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए जिस रणनीतिक नारे की जरूरत होती है, वह लालू प्रसाद नहीं बता सके. किसी भी बदलाव के लिए नारे की जरूरत होती है. नारे में ही निहित होता है राजनीतिक दर्शन. कभी इंदिरा ने `गरीबी हटाओ' का नारा दिया था. 1977 का नारा तानाशाही के विरुद्ध लोकशाही था. खुद लालू के खिलाफ एनडीए ने जंगलराज हटाओ का नारा दिया था. कई बार वे हमला करने के बजाय सफाई देते लगे. साफ है कि जिस पिछडा़वाद के जबरदस्त उभार ने लालू प्रसाद को भारतीय राजनीति में स्थापित कर दिया था, अब 90 के दशक का वह दौर भी नहीं है. नयी परिस्थितियों में नयी चुनौतियों का सामना करना अभी बाकी है. हालांकि नारे नेता की उपज नहीं होते, उन्हें परिस्थितियां ही जन्म देती हैं-और यह बेहद स्वाभाविक था कि लालू अभी चीजों को देख रहे हैं. अभी उनके लिए नया नारा देना संभव नहीं है-क्योंकि नये हालात ने अभी ठोस स्वरूप अख्तियार नहीं किया है.
रैली के प्रभावों-संदेशों पर चर्चाएं होती रहेंगीं, लेकिन अभी इतना तो साफ़ है कि रैली सफल रही और बिहार की राजनीति में यह रैली एक नया मोड़ साबित होगी.
तसवीरें मनीष और अमृत की.

संत और सिपाही में देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/26/2007 12:43:00 AM


दखलवाले चंद्रिका भाई की यह रिपोर्ट भारत के शासक वर्ग के चरित्र, संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों के शासकवर्गीय रवैये और जुझारू जनता की हिम्मत को एक ही साथ रेखांकित करती है. कालिख उन लोगों के मुंह पर, जो भूखे लोगों से शांति और अहिंसा की मांग करते हैं और शासकों के लिए हिंसा को आरक्षित कर देते हैं.





चंद्रिका
यह वक्त घबराये हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं

और न यह पूछने का
कि संत और सिपाही में
देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!

खबार के पन्ने पर जो खबर 29 जुलाई को छायी हुई थी, उससे बेपरवाह, होटल के नौकर ने टेबल पर गिरी चाय को पोंछकर डस्टबिन में फेक दिया. चौराहे के कचड़े से गाय ने उठा कर अपने जबड़ों में उसे निगल लिया. मूंगफली बेचनेवाले के ठोंगों से होती हुई वह खबर किसी दरवाजे के पास पड़ी थी, जिस पर कुत्ते ने मूत दिया. ट्रेन के डब्बे में वह पढ़ने के बाद बिस्तर बनी. झाडू लगानेवाले ने उसे बुहार कर तेज रफ्तार से दौड़ती ट्रेन की पटरियों पर गिराया और वह हवा में धूल के साथ देर तक उड़ती रही.
खबर थी मोदी गोंडा में पुलिस की गोलियों से भूने गये उन लोगों की जो शांतिपूर्वक धरने पर बैठे हुए थे. मसला था 170 एकड़ जमीन का जो सरकारी कब्जे में थी.
दस हजार की आबादीवाले इस मण्डल में कुल 24 गाँव है, यहाँ के लोग मुख्यतः कृषि पर निर्भर हैं. दरअसल बात यहां से शुरू की जाये जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने राज्य से शांति वार्ता के दौरान इस जमीन को भूमिहीनों में बांटने की मांग की. उनकी यह मांग पूरी न हो सकी. अलबत्ता अन्य पार्टियों व उनके कार्यकर्त्ताओं की नजर इस पर जरूर गड़ गयी. कुछ माह बाद जमीन का 35 एकड़ कांग्रेस समर्थकों व कार्यकर्त्ताओं द्वारा जोत लिया गया, जिस पर कोई आवाज इसलिए नहीं उठी, क्योंकि सरकार कांग्रेस की थी. तत्पश्चात मोदी गोंड़ा के प्रधान, जो कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (संसदवादी) के सदस्य हैं, के कुछ कार्यकर्त्ताओं व समर्थकों ने भी 16 जुलाई को कुछ जमीन जोतनी शुरू की, मनाही होने पर वे 21 जुलाई को धरने पर बैठे. धरने को बेअसर देखते हुए 24 जुलाई से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की. 27 को हुए लाठी चार्ज के विरोध में 28 जुलाई को बंद का आह्वान किया. बंद को असरदार बनाने के लिए सड़क पर वाहनों को न चलने देने का फैसला लिया गया. 28 को दोपहर 12 बजे के आसपास पुलिस की एक टुकड़ी ने आकर 1 घटे के अंदर प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया. धरने पर बैठे लोग अपनी मांगों को लेकर अडिग रहे. फिर पुलिस द्वारा लाठी चार्ज शुरू किया गया. जवाब में लोगों ने पत्थर फेंकना शुरू किया तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी, जिससे सात लोग मारे गये, कई लोग घायल हुए. 20 लोगों की सूची घायलों में उपलब्ध हो पायी.
लोगों द्वारा पुलिस के खिलाफ थाने में एफआइआर जैसी हास्यास्पद कार्रवाई की गयी, पर एफआइआर नामंजूर कर दिया गया. उल्टा पुलिस ने ही लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज किया. कुछ समय बाद एपीसीएलसी (आंध्रप्रदेश सिविल लिबर्टी कमेटी) ने किसी तरह से एक एफआइआर दर्ज करवाया, जिस पर सिवाय एक-दो तबादलों के कोई कार्यवाही नहीं हुई.
यह एक संक्षिप्त घटनाक्रम था, जिसकी तफ़्तीश के लिए हम हैदराबाद से सुबह पाँच बजे निकले. हम कुल सात लोग थे, 220 किमी की यात्रा तय कर हमें खम्मम पहुंचना था. जहाँ से 15 किमी दूरी पर बसा था मोदी गोंडा मंडल, सड़क के चारो तरफ टीलानुमा पहाड़िया थीं. सड़क के किनारे खेतों में कपास की फसलें लगी हुई थीं. हमारी गाड़ी में कोई तेलगू धुन बज रही थी, जिसमें बीच-2 में अंगरेज़ी के शब्दों की भी दखलंदाजी थी. झोंपड़पट्टी, भूख, गरीबी, असमानता को देख कर भारत की अखंडता में एकता का एहसास हो रहा था, जो कन्याकुमारी से जम्मू-कश्मीर तक सर्वव्याप्त है. तस्वीरों को अपनी आंखों में संजोते हुए तीन घंटे का रास्ता तय करके हम खम्मम के लेनिन नगर कस्बे में पहुंचे, जहां से हमारे साथ कुछ शिक्षक, वकील मोदी गोंडा के लिए रवाना हुए. इनको साथ में लेने के पीछे कारण यह था कि हम गांववालों की तेलगू समझ सकें.
अब हम उस चौराहे पर थे, जहां लोगों को कुछ दिन पूर्व गोलियों से भूना गया था. चौराहे पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (संसदवादी) के झंडे लगे हुए थे, जिसके नीचे सार्ट-कट में सीपीएमजेडएनबी लिखा हुआ था (कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद). किनारे पर आंबेडकर की मूर्ति लगी थी, जो एक हाथ उठा कर आसमान की तरफ इशारा कर रही थी, जिसे हम नहीं समझ सके. चारों तरफ से लोगों ने हमें घेर लिया. लोग हमें घटनाओं का ब्योरा दे रहे थे.
शर्मीला जी, जिनकी म्युजिक की दुकान है, जिसके बगल में ही लोग धरने पर बैठे हुए थे, हमें अपनी दुकान के नजदीक ले गयीं. उन्होंने अपनी दुकान की शटर बंद करके गोलियों के छर्रों से शटर में हुए छेद और निशान दिखाये. गोलियों से टूटे पीसीओ के शीशे भी दिखाये.
हमने आसपास की सभी दुकानों के कांउटर, बाक्स व अन्य सामान में गोलियों के निशान देखे. जगह-2 दीवालों के पलस्तर टूट गये थे.
चौराहे पर, घटना के दौरान मारे गये लोगों की याद में एक 38 फुट ऊंचा स्मारक बनाया गया था. यह 20 फुट लंबे व 20 फुट चौड़े आधार पर गुंबदनुमा निर्माण था. इसमें घटना में मारे गये, उन सात लोगों की तस्वीरें मढ़ी गयी थीं और नीचे उनके नाम लिखे हुए थे. गांव के एक व्यक्ति ने तेलुगू में लिखे उन नामों को पढ़ कर सुनाया जो इस प्रकार थे (उसकेला गोपया, वनका गोपीया, चिट्दूरीबाबू राव, छगम बाला स्वामी, एलागन तुला वीरन्ना, कट्टूला पेदूदा लक्ष्मी, पुस्थलति कुटुम्बराव). इन सात लोगों में छह लोग घटनास्थल पर ही मारे गये, जबकि छगम बाला स्वामी ने 31 जुलाई को अस्पताल में दर्द से कराहते हुए दम तोड़ा.
स्मारक के बगल में उन 16 लोगों के भी नाम थे, जो इस घटना में घायल हुए थे. लोगों ने हमें बताया कि 300 से 400 गोलियां पुलिस द्वारा चलायी गयीं. हम स्मारक में जड़े गये उन सात मृतकों के चित्र देख रहे थे.
रमेश, जिसकी उम्र तकरीबन 15 साल होगी, ने हमें बताया कि उसकी मां बट्टू राम बाई के पैर में गोली लगी है, जिससे उनके पैर में स्टील की छड़ डाली गयी है वे अब चल नहीं सकतीं. चौराहे पर वे ठेला लगा कर केले बेचती थीं. पिता उपेन्द्र, जो दूध बेचते हैं, अब घर का काम देखते हैं. रमेश ने हमसे पूछा कि क्या मैं उसे कोई नौकरी दिला सकता हूं! चौराहे से 100 मी की दूरी पर कोटेश्वर राव का घर था, जिनके हाथ में गोली लगी थी और स्टील की छड़ से उसे बांधा गया था. कोटेश्वर ने हमें बताया कि पहली गोली उनकी शर्ट की जेब पर लगी, जेब में डायरी रखी हुई थी, जिससे वे बच गये. उन्होंने वह डायरी दिखायी, जो फट गयी थी. कोटेश्वर कह रहे थे कि डायरी न होती तो उस स्मारक में मेरा भी फोटो लगा होता.
हम घटना में मृत वीरन्ना की पत्नी उषा से मिले उषा 28 वर्ष की एक दुबली-पतली महिला है, जिनके आंखों के आंसू सूख चुके थे, पर तबाही के मंजर व पति के मृत होने का दर्द अभी-भी किसी कोने में छुपा था. उषा अपने 3 व 4 वर्ष के बच्चों के साथ इस वक्त अपने बहन के घर में रहती थी. उषा ने हमें बताया कि वीरन्ना धरने में शामिल नहीं थे. हादसे के वक्त वे देखने के लिए घर से गये थे और नाहक ही मारे गये.
चौराहे के बगल में भाकपा (संसदवादी) के आफिस में हम गये. हंसिए-हथौड़े का एक बड़ा चिह्न दीवाल पर लाल रंग से पेंट किया हुआ था. चिह्न देख कर नंदीग्राम की याद आ गयी, जहां हंसिया किसानों का गला काटने व हथौड़ा मजदूरों का सिर कुचलने पर उतारू था.
आफिस में हमें घटना के समय कैमरे में कैद की गयी कुछ तस्वीरें दिखायी गयीं. लोगों की अफरा-तफरी, रोते-कराहते चेहरों के साथ फोटो मौन थे. कोई चीख नहीं थी, कोई आवाज नहीं थी.
कैमरे में कैद किये गये चित्रों को तारतम्यता से घटनानुसार रखा गया था- खेत जोतते किसानों के चित्र,, धरने पर बैठे लोग, भूख हड़ताल पर बैठे लोग, बंदी के दिन शांतिपूर्वक बैठे लोग, पुलिस के साथ बातचीत करते लोग, पुलिस की गोलियों से भूने जाते लोग, एसएलआर और एके 47 लिये सिविल ड्रेस में पुलिस, इसके बाद सड़क पर बिखरी लाशें थीं. एक फोटो ऐसा था जिसमें छह लाशों को एक साथ रखा गया था, उन्हे भाकपा (संसदवादी) के झंडे से लपेटा गया था. उसे देख कर यह लगा कि इन पार्टियों के लिए लाश भी वोट मांगेगी. कल उनके बड़े-2 बैनर बनेंगे, सड़क, चौराहे, मुहल्ले, गलियों में वे चिपकाये जायेंगे. गोपीया, बाबू राव, लक्ष्मी, वीरन्ना सब इनके लिए वोट मांगने का काम करेंगे.
मृतकों को पांच लाख रूपये व घायलों को 50 हजार रू की राशि सरकार के द्वारा विभिन्न तरीकों से बांटी गयी, लेकिन लोगों के यह सवाल भी थे कि क्या जिंदगी की कीमत पैसे से तौली जा सकती है? क्या गोपीय, वीरन्ना को 6 लाख रू में लौटाया जा सकता है? क्या कागज के टुकड़ों से उषा के आंसू व दर्द पोंछे जा सकते हैं? क्या दमन व हत्या पुलिस की आदत बन चुकी है? धमाके की अवाज वहां नहीं थी. बीते हुए कल के साथ लोगों ने घटना को अपने घरों में, बच्चों ने अपनी चीखों में, सड़क ने अपनी धूल के नीचे दबा दिया था. तबाही के बाद सब कुछ शांत था. स्मारक पर एक दिया जलते-2 बुछ चुका था जिसकी राख इधर-उधर बिखरी हुई थी.

नरसंहारों के लिए नोबेल पुरस्कार

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/24/2007 11:45:00 PM

















रेयाज उल हक


र्यावरण के लिए आंदोलन और नरसंहार में क्या समानता हो सकती है? युद्ध और शांति में क्या समानता हो सकती है? मार्टिन लूथर किंग, मदर टेरेसा, दलाई लामा, आन सांग सू की और अल गोर में क्या समानता हो सकती है? और ऐसे में नोबेल शांति पुरस्कार का क्या मतलब है, जब वह जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में किये गये उल्लेखनीय कार्य के लिए दिया जाये? शायद बच्चें का सामूहिक नरसंहार? या शायद कोसर पैदा करनेवाले रसायनों का आबादियों के ऊपर हवाई छिड़काव?

आप क्या पसंद करेंगे?
नोबल पुरस्कार समिति का कहना है कि अलगोर को यह सम्मान उनकी जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संषर्घ को लेकर दृढ़ प्रतिबद्धता के लिए दिया गया है।

मगर क्या यहीं आप उत्तर पूर्वी कोलंबिया के ऊष्ण कटिबंधीय जंगलों के मूल निवासियों से अल गोर की इस प्रतिबद्धता का मतलब नहीं जानना चाहेंगे?
यह सही है कि माइकल जैक्सन और शकीरा की आवाजें ज्यादा सुरीली हैं और हालीवुड की फिल्में सप्ताहांत के मनोरंजन के लिए अधिक पसंद की जाती हैं, मगर इन बेहद गर्म जंगलों में बसनेवाले मूल निवासियों से मिला जा सकता है।

असल में अल गोर अपने पुराने 'प्रतिद्वंद्वी' जार्ज बुश की तरह ही एक काबिल बाप के काबिल बेटे हैं। अल गोर के पिता अल्बर्ट गोर (सीनियर) एक तेल कंपनी के निदेशक मंडल में रहे। ऑक्सीडेंटल पेट्रोलियम (संक्षेप में ऑक्सी) नाम की इस कंपनी के संस्थापक अर्मांड हैमर के वे करीबी मित्र थे। हैमर ने उन्हें यह ओहदा अमेरिकी सीनेट से उनके रिटायरमेंट के बाद दिया। अल्बर्ट गोर की कुल जायदाद ऑक्सी के शेयरों सहित करोड़ों डॉलर की थी और उनके बेटे अल गोर भी कंपनी से भारी आर्थिक मदद पाते रहे हैं।

मगर इस तरह की कोई भी मदद कारपोरेट जगत तभी देता है जब उसे किसी तरह के लाभ की उम्मीद हो। अल गोर ने बदले में कंपनी की भरपूर मदद की। जब वे अमेरिका के उप राष्ट्रपति थे, उन्होंने कोलंबिया योजना को लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। कुख्यात कोलंबिया योजना के बारे में वैसे तो बताया गया कि वह मादक द्रव्य के व्यापार के खिलाफ एक सैन्य अभियान थी, मगर असल में उसका उद्देश्य राष्ट्र पर अमेरिकी नियंत्रण के विस्तार के लिए स्थानीय लोगों के प्रतिरोध को कुचलना था। अमेरिका की नशीली दवाओं के विरुद्ध युद्ध और कोलंबिया योजना के तार आपस में जुड़े हुए थे और अमेरिका ने यह पूरा अभियान ही लैटिन अमेरिका में अपने प्रभुत्व के विस्तार के लिए छेड़ा था। अब यह कोई ढंकी-छुपी बात नहीं है। नोम चोम्स्की समेत अनेक टिप्पणीकार इस पर विस्तार से लिख चुके हैं।

ऑक्सी इस कोलंबिया योजना के उत्साही प्रस्तावकों में से थी, जो अमेरिकी सैन्य अभियानों का अब भी फायदा उठा रही है। इसके बाद अमेरिकी सेना के ठेकेदारों ने पाइपलाइन की सुरक्षा के लिए आसपास की आबादी को उनकी जमीन से खदेड़ दिया और कोका उन्मूलन के नाम पर वहां अत्यधिक मात्रा में कार्सीनोजेनिक रसायनों का हवाई छिड़काव किया। इसका प्रतिरोध भी होता रहा है। १९९० के दशक में ५००० स्थानीय लोगों ने ऑक्सी को तेल निकालने के लिए जमीन की खुदाई करने से रोकने की कोशिश की।

ऑक्सी अकेली कंपनी नहीं है जो इस इलाके के प्राकृतिक संसाधनों के निर्बाध दोहन का अधिकार चाहती रही है। वह सिर्फ उनमें से एक है। एक्सन और बीपी समेत अनेक कंपनियों ने कोलंबिया के मूल निवासियों को उनकी जमीन पर से उजाड़ने के लिए अर्ध सैन्य बलों का सहारा लिया। इन मूल निवासियों को उनकी जमीन से उजाड़ कर उनसे कहा गया कि वे अमेजन में जाकर फिर से बस जायें।

अमेजन में बसने का मतलब जानने के लिए आपको रॉकेट विज्ञानी होने की जरूरत नहीं है। वहां बसने का मतलब है -बीमारियां, भुखमरी और त्रासद मृत्यु।

और इस तरह शांति के लिए प्रतिबद्ध अल गोर ने मूल कोलंबियनों को अमेजन में फिर से बसाने की योजनाओं पर काम किया और अपने पेट्रोकेमिकल मालिकों के लिए कोलंबिया की तेल से समृद्ध जमीन को खाली करवाया।

आप अगर अल गोर को मिले नोबेल शांति पुरस्कार में 'शांति' शब्द का मतलब जानना चाहते हैं तो कृपया इराक की एक सैर कीजिए। और वहां कब्रिस्तानों को देखना मत भूलिए। अल गोर उन १० डेमोक्रेट सीनेटरों में से एक थे, जिन्होंने १९९० में इराक के खिलाफ युद्ध के समर्थन में मत दिया था। वे उस प्रशासन के सेकेेंड इन कमांड थे, जिसने अमेरिकी सेना को सोमालिया, हैती और बोस्निया भेजा, कोलंबिया में हत्यारे गिरोहों (डेथ स्क्वाड) को धन दिया, इराक , अफगानिस्तान और सूडान पर बमबारी की। उनके प्रशासन द्वारा इराक पर लगाये गये प्रतिबंधों की वजह से पांच लाख इराकी बच्चों की मौत हुई और सर्बिया के खिलाफ विध्वंसक हवाई युद्ध छेड़ दिया गया।

१९९२ में आयी अपनी किताब 'बैलेंस इन द अर्थ' में वे पृथ्वी का विध्वंस करनेवाली ताकतों के रूप में वायु एवं जल प्रदूषण, मृदा क्षय, जंगलों का घटना, बढ़ती आबादी, ओजोन परत में छेद और ग्लोबल वार्मिंग को गिनाते हैं। गोर ने इस किताब में इस पर जोर दिया है कि आंतरिक दहनवाले इंजनों को प्रचलन से बाहर किया जाये। मगर जब वे उपराष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दिशा में कोई काम नहीं किया। इसके उलट जब वे इस पद पर आये तो उन्होंने पर्यावरण आंदोलन को नाफ्टा जैसी मजदूर विरोधी, पर्यावरण विरोधी बिजनेस संस्था के हाथ में सौंप दिया। उन्होंने १९९५ में स्पेंडिंग बिल का समर्थन किया, जिससे लाखों एकड़ वन काट डाले गये और इस कार्रवाई को दो सालों के लिए पर्यावरण और न्यायिक कानूनों द्वारा होनेवाली समीक्षा से छूट मिल गयी। उन्होंने क्लिंटन के साथ मिल कर दक्षिण फ्लोरिडा में चीनी के उद्योगपतियों को हजारों एकड़ जमीन के विनाश की अनुमति दी। उन्हें खाद्य पदार्थों को कोसरकारी तत्वों से बचानेवाले कानून में भी ढील दी।

१९७७ से १९८५ तक हाउस में, १९८५ से १९९३ तक सीनेट में और फिर इसके बाद उपराष्ट्रपति के रूप में अल गोर पेंटागन और रक्षा सामग्री के ठेकेदारों के हितों के लिए काम करते रहे। उन्होंने रक्षा खर्चों में कटौती का विरोध किया और ग्रेनेडा पर हमले तथा केंद्रीय अमेरिका में लड़ाइयों के समय रीगन प्रशासन का समर्थन किया। वे उस क्लिंटन प्रशासन में उपराष्ट्रपति थे, जिसने १९९० के दशक में युगोस्लाविया पर नाटो के जरिये हमला किया और जिसका विस्तार मध्य और पूर्वी यूरोप तक इसके बाजार, संसाधनों और सस्ते श्रम के लिए किया गया। कोसोवो में उन्होंने सर्बिया के खिलाफ कोसोवो लिबरेशन आर्मी नामक एक अर्ध्दसैन्य गिरोह के साथ सहयोग किया और उसके अनेक संगठित अपराधों को नजरअंदाज किया। इसके अलावा उन्होंने सद्दाम हुसैन का तख्ता पलटे जाने का समर्थन किया।

कारपोरेट मीडिया के इस दौर में इन तथ्यों से इसका कोई लेना-देना नहीं है कि न्यू जर्सी में सात प्रतिज्ञाएं लेनेवाले पर्यावरण के इस नये मसीहा द्वारा जलवायु परिवर्तन के नाम पर कितनी जबानी जमाखर्च की जाती रही है।

जब नोबेल कमेटी यह कहती है कि अल गोर संभवत: अकेले आदमी हैं, जिन्होंने दुनिया में (पर्यावरण संरक्षण संबंधी) कदमों को अपनाये जाने को लेकर महत्वपूर्ण विश्वव्यापी समझ बनाने का काम किया है, तो उसे बताये जाने की जरूरत है कि अल गोर खुद इसको लेकर कितने गंभीर हैं। अल गोर और उनकी पत्नी ऐसे दो बड़े घरों रहते हैं जहां बिजली की अत्यधिक खपत होती है। उनका एक घर नेशविले में १०००० वर्ग फुट का है, दूसरा आर्लिंगटन में ४००० वर्ग फुट का। इन दोनों जगहों पर कंपनियों ने पवनचालित ऊर्जा विकल्प प्रस्तुत किये हैं और अल गोर उन्हें आसानी से वहन भी कर सकते हैं, मगर इसमें उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखायी।

तो क्या यह समझा जाये कि नोबेल समिति इन तथ्यों से अनजान थी और उसने गलती से पर्यावरणविरोधी गतिविधियों में लिप्त एक युद्ध अपराधी को पर्यावरण संबंधी उसकी चिंताओं के लिए शांति पुरस्कार दिया है? कोई राय कायम करने से पहले कुछ और तथ्य जानने जरूरी हैं।

यह पहली बार नहीं है कि किसी युद्ध अपराधी को शांति का नोबेल सम्मान दिया गया है। इसके पहले वुड्रो विल्सन, जिमी कार्टर, हेनरी किसिंजर और थियोडोर रुजवेल्ट जैसे युद्ध, नरसंहारों और तानाशाहों के समर्थन के लिए कुख्यात अमेरिकी राष्ट्रपतियों को यह सम्मान दिया जा चुका है। इसके साथ ही इस्राइल के तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों शिमोन पेरेस, यित्जाक राबिन और मेनाकेम बेजिन को भी यह सम्मान हासिल हो चुका है। कोफी अन्नान को यह सम्मान उस दौर में मिला, जब उनके संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव रहते अफगानिस्तान और इराक पर नृशंस युद्ध थोप दिये गये।

हेनरी किसिंजर को १९७३ में नोबल सम्मान मिला। वियतनाम युद्ध के दौरान हेनरी किसिंजर अमेरिका के राष्ट्रपति थे। इस युद्ध में ४० लाख दक्षिण एशियाइयों की हत्या हुई। किसिंजर की चिली की लोकतांत्रिक सरकार के तख्ता पलट में सक्रिय भूमिका रही। उन्होंने लैटिन अमेरिकी तानाशाहों का भी समर्थन किया। किसिंजर ने सुहार्तो द्वारा पश्चिमी पापुआ को हथियाने और पूर्व तिमोर में लाखों लोगों की हत्याओं में उसकी सहायता की। उन्होंने खमेर रुज का समर्थन किया। किसिंजर ने बांग्लादेश की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट करवाने में सहयोग किया, जिसके कारण लगभग पांच लाख मौतें हुई।

कोफी अन्नान को यह सम्मान २००१ में एक 'बेहतर संगठित और शांतिपूर्ण विश्व' के लिए उनके योगदान के लिए दिया गया। मगर अन्नान का इतिहास जानना दिलचस्प है। वे एक समय न्यूयार्क में सचिवालय सेवा विभाग में कार्यरत थे। उस समय उन्हें विशेष राजनीतिक मामलों के विभाग ने मध्यपूर्व और अफ्रीका में अतिरिक्त प्रभार दिया था। उन्होंने अमेरिका द्वारा १९९० के शुरू में सोमालिया में सेना भेजे जाने की मांग का समर्थन किया। इसके बाद वे १९९३ तक शांतिरक्षक अभियानों के प्रभारी रहे। इस दौरान रवांडा में कत्लेआम की स्थिति पैदा हुई। उन्होंने अपनी जिम्मेवारी के तहत इसको रोकने की कोई कोशिश तो नहीं ही की, इसकी रोकथाम के लिए कोई कदम उठाये जाने से दूसरों को जहां तक हो सका रोका। इसके फलस्वरूप वहां लगभग आठ लाख हत्याएं हुई। उन्होंने सुरक्षा परषिद को भी इस नरसंहार की आशंका की जानकारी नहीं दी। इसके अलावा उन्होंने १९९५ में बोस्निया में सर्बों पर बमबारी के अमेरिकी कदम का समर्थन किया।
यह वही आदमी था, जिसने बाद में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के बतौर ली गयी इस शपथ, कि वह आनेवाली पीढ़ियों को युद्ध की त्रासदी से निजात दिलायेगा, मूलभूत मानवाधिकारों में आस्था को पुनर्स्थापित करेगा, न्याय की स्थितियों को स्थापित करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि सशस्त्र सेना का उपयोग न हो, को उलट कर रख दिया। कोफी अन्नान ने इसके बरअक्स इराक पर आर्थिक प्रतिबंधों का समर्थन किया, जिसके फलस्वरूप १५ लाख इराकी मौत के शिकार हुए, जिनमें १० लाख ऐसे बच्चे थे, जिनकी उम्र पांच साल से कम थी। अन्नान ने २००३ में बुश प्रशासन द्वारा इराक पर कब्जे का समर्थन किया, जिसके दौरान ६ लाख से अधिक और मौतें हुई। उन्होंने अफगानिस्तान पर हमले का भी समर्थन किया। वे ईरान पर हमले की संभावनाओं के दौरान भी निरंतर खामोश रहे।

संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षक सेना को १९८८ में शांति का नोबेल अवार्ड दिया गया। यह एक ऐसी सेना है जो कभी भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुई। इस सेना को तनावग्रस्त इलाकों में भेजा जाता है, ताकि वह तनाव को कम करे और आम लोगों के लिए सुरक्षा और रोजमर्रा का जीवन सुनिश्चित कर सके, जब तक कि एक स्थानीय सरकार यह काम करने योग्य न हो जाये। १९४८ से अब तक ६० से अधिक ऐसे अभियानों में यह सेना लगायी गयी है और लगभग हर अभियान में यह या तो हमलावर या थोपी गयी सेना के रूप में पेश आयी। अंतत: शांतिरक्षक सेना जहां गयी, वहां उसने मदद की जगह नुकसान अधिक किया। इस्राइल में वह लगभग आधी सदी से तैनात है और यह सब जानते हैं कि वहां संकट सुलझने के बजाय उलझा ही है। यह वहां इस्राइल द्वारा मानवता के विरुद्ध किये जा रहे अपराधों को आंख मूंद कर देखती रही है।

तीनों इस्राइली प्रधानमंत्री, जिन्हें शांति सम्मान दिया गया-नृशंस हत्याओं और नस्लपरस्ती के लिए जाने जाते हैं। मेनाकेम बेजीन ने तो फलस्तीनियों को 'दो पांववाले जानवर' कहा था और उनका मानना था कि यहूदी स्वामी (मास्टर) नस्ल है और यह इस ग्रह पर दिव्य ईश्वर है। शिमोन पेरेस भी फलस्तीन के खिलाफ उग्र सैन्य कार्रवाइयों के लिए जाने जाते हैं।

इसलिए जब नोबल समिति अल गोर को शांति के लिए सम्मानित कर रही होती है तो वह असल में कोई गलती नहीं करती बल्कि वह अपने वास्तविक चारित्र को ही सामने रख रही होती है।

जहां तक अल गोर के पर्यावरण संबंधी सरोकारों का सवाल है, हम उस पर अब बात कर सकते हैं। जब वे जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में बात कर रहे होते हैं, वे पर्यावरण को पहुँच रहे खतरों के बुनियादी कारणों के बारे में बात करने में असफल रहते हैं-वह कारण है मुनाफे का अनियोजित और अराजक तंत्र। वे दरअसल एक पूंजीवादी राजनेता की तरह ही एपल, गूगल और दूसरी हाइटेक कंपनियों में हिस्सेदारियों से धनी हुए हैं। वे सिद्धांतत: और सामाजिक सरोकारों के नजरिये से भी इसके लिए अक्षम हैं कि जलवायु परिवर्तन के बारे में गंभीरता से बात कर सकें।

हम ऐसे मौके पर एक कोलंबिया के जंगलों के एक मूल निवासी के उन शब्दों को दोहरा सकते हैं, जो उसने अल गोर से कहे थे-आपकी खामोशी धरती और उस पर के जीवन की मौत का प्रतीक है।

पूरा पढिए.

राम का अस्तित्व और अयोध्या

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/19/2007 12:48:00 AM

क्या राम का वास्तव में कोई अस्तित्व था? क्या अयोध्या एक ऐतिहासिक नगरी है? प्रख्यात इतिहासकार राम शरण शर्मा अपने लंबे व्याख्यान के इस हिस्से में (और आगे के हिस्सों में भी) मुख्यतः इसकी चर्चा कर रहे हैं. सातवीं किस्त.

प्रो राम शरण शर्मा

तिहास में लूटपाट करनेवाले आमतौर कब्जे में आयी लूटपाट के मामले में अपने सभी उत्पीड़ितों से एक जैसा ही व्यवहार करते हैं. इसी तरह तैमूर ने मध्य एशिया में मुस्लिम आबादी पर उससे कहीं अधिक विध्वंस बरपा किया, जितना उसने भारत में किया था. 1398-99 में भारत में काफी मुस्लिम आबादी थी पर तब भी गैर मुस्लिम आबादी उससे ज्यादा ही थी. इस तरह हालांकि तैमूर के हमले प्रथमत: मुसलमान शासकों के खिलाफ लक्षित थे पर जो प्रजा उसके हमलों की शिकार बनी, उसमें स्वभावत: ही हिंदू भी थे. ऐसे अनेकानेक उदाहरण दिये जा सकते हैं कि जब सत्ता और लूट के माल का मामला होता था तो हिंदू और मुस्लिम दोनों ही शासक वर्गों के सदस्य समान रूप से क्रूर सिद्ध होते थे. इसके विपरीत ऐसे बहुत से उदाहरण भी मिलते हैं, जिनमें हिंदु और मुस्लिम दोनों समुदायों के आम लोगों के बीच मौजूद सहिष्णुता की बात तो जाने दीजिए, हिंदु और मुस्लिम शासकों, दोनों ने सहिष्णुता दर्शायी. इसलिए मुस्लिम शासकों को क्रूर और हिंदू शासकों को दयालु व सहिष्णु शासकों के रूप में चित्रित करना गलत होगा. पर दुर्भाग्य से हिंदू संप्रदायवादी ऐसी ही छवि चित्रित कर रहे है तथा मुस्लिम कट्टरपंथी भी कोशिश में है कि इस मामले में उनसे पीछे न रहें.

पिछली किस्तें : एक, दो, तीन, चार, पांच, छह
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सांप्रदायिक प्रचार का एक महत्वपूर्ण नमूना बाबरी मसजिद की दीवारों पर अंकित एकदम हाल के 30 भित्ति चित्र हैं. इस मसजिद में राम की प्रतिमा को जबर्दस्ती बिठाया गया है. जिस जिला न्यायाधीश के फैसले की वजह से संप्रदायवादी बाबरी मसजिद को कब्जे में ले सके, उसकी प्रतिमा बड़े ही उत्साहपूर्वक मसजिद के प्रवेश द्वार पर स्थापित की गयी है. उस के बाद से तो लगता है कि संप्रदायवादी राम की पूजा करने से अधिक उस न्यायाधीश की छवि को महिमा मंडित करने में संलग्न रहे हैं. दरअसल राम को अपने निकृष्टतम राजनीतिक दुराग्रहों को छुपाने के लिए आड़ बना लिया गया है. एक भित्ति चित्र में यह दर्शाया गया है कि किस तरह बाबर के सैनिक राम के इस कल्पित मंदिर को ध्वस्त कर रहे हैं और हिंदुओं का कत्लेआम कर रहे हैं. इस भित्ति चित्र के नीचे लिखा है कि बाबर के सिपाहियों ने अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करते समय 75000 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया और उनके रक्त को गारे की तरह इस्तेमाल कर बाबरी मसजिद खड़ी की. आग लगानेवाली ऐसी झूठी बातें सांप्रदायिक भावनाओं को हवा देने के लिए प्रस्तुत की जाती हैं. यह प्रचार उतना ही झूठा है जितना यह विचार कि बाबर ने राम मंदिर को ध्वस्त किया और उसकी जगह पर बाबरी मसजिद बनवायी.
उत्तर प्रदेश के पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक, रामचंद्र सिंह ने अयोध्या में 17 स्थानों की खुदाई करवायी और ऋणमोचन घाट व गुप्तारघाट नाम के दो स्थलों का भी उत्खनन करवाया. उनके अनुसार वहां अधिकतर स्थानों पर ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से पहले आबादी होने के चिह्र नहीं मिलते. केवल मणिपर्वत और सुग्रीवपर्वत नाम के दो स्थानों को मौर्य काल का कहा जा सकता है. भारत सरकार के पुरात्तत्व विभाग के भूतपूर्व महानिदेशक ब्रजवासी लाल ने कई बार अयोध्या के कई स्थलों का उत्खनन करवाया और इस उत्खनन से पता चला कि ईसा पूर्व सातवीं सदी भी कुछ पहले ही जान पड़ता है क्योंकि उत्तरी छापवाले पोलिशदार बर्तनों की तिथि को आसानी से उक्त काल का नहीं ठहराया जा सकता.
यह बात याद रखनी होगी कि अयोध्या में बस्ती होने की सबसे पुरानी अवधि के लिए हमारे पास कोई कार्बन तिथि नहीं है. वहां प्रारंभिक आबादी की अधिक विश्वसनीय तिथि कुछ मृण्मूर्तियों के अस्तित्व द्वारा मिलती है. इनमें से एक जैन आकृति है, जो मौर्य युग की अथवा ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के अंत और ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के के आरंभ की हैं. बहरहाल, मध्य गंगा क्षेत्र की कछारी भूमि में जितने स्थानों का उत्खनन किया गया, उनमें से अधिकतर स्थान ईसा पूर्व सातवीं-छठी शताब्दी तक पर्याप्त रूप से बसे हुए प्रतीत नहीं होते. जो लोग राम की ऐतिहासिकता में विश्वास करते हैं, वे उनकी तिथि ईसा पूर्व 2000 के आसपास तय करके चलते हैं. यह इस आधार पर किया जाता है कि राम दाशरथि महाभारत युद्ध से लगभग 65 पीढ़ियों पूर्व हुए थे. आम तौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि महाभारत युद्ध ईसा पूर्व 1000 के आसपास हुआ था. इसलिए हमारे सामने पर्याप्त रूप से अयोध्या के बसने और अयोध्या में राम के युग के बीच 1000 वर्षों से अधिक का अंतर प्रकट होता है. इसी कठिनाई की वजह से कुछ विद्वान अयोध्या को अफगानिस्तान में बताने की कोशिश करते हैं.

मुसलिम हमलावरों की लूटपाट और अन्य ऐतिहासिक तथ्य

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/18/2007 01:02:00 AM

राम के अस्तित्व, सांप्रदायिक राजनीति और इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर प्रख्यात इतिहासकार प्रो राम शरण शर्मा के व्याख्यान की छठी किस्त में इतिहासकारों द्वारा अपनायी गयी त्रुटिपूर्ण और एकांगी इतिहास दृष्टि की चर्चा की गयी है.

प्रो राम शरण शर्मा

रंभिक मध्यकालीन बिहार की विभिन्न प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से यह संकेत करती हैं कि बौद्धों और ब्राह्मण धर्म के अनुयायियों के बीच खुला और हिंसक टकराव रहा था. इन प्रतिमाओं में अपराजित सहित कई बौद्ध देवताओं को शैव देवों को पैरों से रौंदते हुए चित्रित किया गया है. धर्मग्रंथों में यह टकराव बौद्धों के खिलाफ शंकर द्वारा व्यापक पैमाने पर चलाये गये अभियान में प्रतिबिंबित होता है. यह सोचना गलत होगा कि बौद्धों का इस देश से सफाया केवल इस वजह से हुआ कि उनके खिलाफ वैचारिक प्रचार किया गया था. ऐसा लगता है उनका बाकायदा उत्पीड़न किया गया था. इससे उनके सामने केवल दो विकल्प बच रहे थे. या तो वे भाग कर दूसरे देशों में चले जायें या फिर सामाजिक विषमताओं से छुटकारा पाने के लिए इस्लाम धर्म अपना ले. विचार करने की बात है कि भारत में धर्म के रूप में इस्लाम केवल उन क्षेत्रों में ही पैर जमा सका जो बौद्ध धर्म के मजबूत गढ़ थे. यह बात कश्मीर, उत्तर पश्चिमी सीमांत क्षेत्र, पंजाब और सिंध के बारे में सच लगती है. उसी तरह नालंदा (बिहार शरीफ), भागलपुर (चंपारण) और बांगलादेश में, जहां बौद्ध काफी संख्या में रहते थे, मुसलिम आबादी है. बौद्ध भारत से वस्तुत: गायब क्यों हो गये इस बात को केवल इस आधार पर ही स्पष्ट नहीं किया जा सकता कि उनका धर्म आंतरिक तौर पर परिवर्तित हो रहा था. इस प्रश्न पर विचार करने के लिए उनके प्रति मध्यकालीन हिंदू शासक वर्गों और धार्मिक नेताओं के दृष्टिकोण पर ध्यान देना होगा. जैनियों का भी उत्पीड़न किया जाता रहा था. लखनऊ संग्रहालय में रखी जैन देवी देवताओं की कई प्रस्तर मूर्तियां, विरूपित अवस्था में मिली हैं. स्पष्टत: ही यह काम इन मूर्तियों को वैष्णव जामा पहनाने के लिए कुछ वैष्णवों द्वारा किया गया था. जैनियों ने अपने कर्मकांडों और सामाजिक रीति-रिवाजों को काफी हद तक संशोधित करके, अपने को प्रभुत्वशाली ब्राह्मणवादी जीवन पद्धति के अनुरूप ढाल लिया. इस बात पर जोर देना गलत होगा कि हिंदू एक समेकित समुदाय थे. जाने-माने पुनरुत्थानवादी और मुस्लिम विरोधी इतिहासकार रमेशचंद्र मजूमदार तक इस बात को मानते हैं कि हिंदू शासक वर्ग की कतारों में एकजुटता का अभाव था और वे अंतर्विरोधों से बुरी तरह ग्रस्त थे. उन्हें यह बात बहुत ही दुखद लगती है कि जब एक हिंदू राज्य पर मुसलमानों ने हमला किया तो एक पड़ोसी हिंदू राजा ने इस अवसर का लाभ उठा कर पीछे की तरफ से उस राज्य पर वार किया. (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ इंडियन पीपुल, खंड-5, प्रस्तावना, पृष्ठ 14-16).

पिछली किस्तें : एक, दो, तीन, चार, पांच
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विंध्याचल के दक्षिणवर्ती क्षेत्र तक में मुस्लिम खतरे को इतना कम करके आंका गया कि दक्कन के शक्तिशाली यादव शासकों ने गुजरात के चालुक्यों पर दक्षिण से ठीक उस समय हमला बोल दिया जब वे उत्तर में आये मुस्लिम हमलावरों के साथ जीवन-मरण के संघर्ष में लगे थे (वही पृष्ठ 14).
हिंदू धार्मिक नेताओं के बीच सांप्रदायिक असहिष्णुता का स्पष्ट उदाहरण अयोध्या के मध्यकालीन इतिहास से लिया जा सकता है. जब तक औरंगजेब का शासन था, उसके लौह हस्त के नीच अयोध्या में सब कुछ शांत रहा. पर 1707 में उसकी मृत्यु के बाद हम वहां शैव संन्यासियों और वैष्णव वैरागियों के संगठित दलों के बीच खुला और हिंसक टकराव देखते हैं. इन दोनों के बीच विवाद का मुद्दा यह था कि धार्मिक स्थलों पर किसका कब्जा रहे और तीर्थयात्रियों को भेंट और उपहारों में प्राप्त होनेवाली आय किसके हाथ लगे. 1804-05 की एक पुस्तक से इन दोनों संप्रदायों के बीच होनेवाले हिंसक टकरावों के बारे में उद्धरण दिये जा सकते हैं : उस समय जब राम जन्म दिवस का अवसर आया, लोग बड़ी संख्या में कौसलपुर में एकत्र हुए. कौन उस जबर्दस्त भीड़ का वर्णन कर सकता है. उस स्थान पर हथियार लिये जटाजूटधारी और अंग-प्रत्यंग में भस्म रमाये असीमित(संख्या में) संन्यासी वेश में बलिष्ठ योद्धा उपस्थित थे. वह युद्ध के लिए मचलती सैनिकों की असीम सेना थी. वैरागियों के साथ लड़ाई छिड़ गयी. इस लड़ाई में (वैरागियों को) कुछ भी हाथ न लगा क्योंकि उनके पास रणनीति का अभाव था. उन्होंने वहां उनकी ओर बढ़ने की गलती की. वैरागी वेशभूषा दुर्गति का कारण बन गयी. वैरागी वेशभूषावाले सारे लोग भाग खड़े हुए उनसे बहुत दूर (यानी संन्यासियो से) उन्होंने अवधपुर का परित्याग कर दिया. जहां भी उन्हें (संन्यासियों को) वैरागी वेष में लोग नजर आते, वे उन्हे भयावह रूप से आतंकित करते. उनके डर से हर कोई भयभीत था और जहां भी संभव हो सका लोगों ने गुप्त स्थानों में शरण ली और अपने को छिपा लिया. उन्होंने अपना बाना बदल डाला और अपने संप्रदाय संबंधी चिह्र छिपा दिये. कोई भी अपनी सही-सही पहचान नहीं प्रकट कर रहा था. (हैंसबेकर, अयोध्या, गोरनिंगनन, 1986, पृष्ठ 149 में श्रीमहाराजचरित रघुनाथ प्रसाद से उद्धृत)
उक्त उद्धरण मध्यकालीन धार्मिक हिंदू नेताओं द्वारा सहिष्णुता बरतने के मिथक का भंडाफोड़ कर देता है. हम लक्षित कर सकते हैं कि सदियों के मतारोपण से एक समेकित हिंदू समुदाय का निर्माण नहीं हुआ. आज तक भी तथाकथित अनुसूचित जातियां पशुओं का मांस खाती हैं, जिनमें गायें भी शामिल हैं तथा कुछ मामलों में अपने मृतकों को दफनाती तक हैं.

उत्पीड़ित वर्गो की ठीक यही वह कोटि है, जिसे महात्मा गांधी ने हरिजन की संज्ञा दी थी और बिहार और अन्यत्र गांवों में जिनके मकानों को मुख्यत: आर्थिक कारणों से जला कर राख कर दिया जाता है और जिनके परिवार के सदस्यों को भून डाला जाता है. एकदम हाल में जब बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति के लोगों ने दक्षिण में ईसाई धर्म अपनाने का फैसला किया तो इससे हिंदुत्व के तथाकथित संरक्षकों के बीच बड़ा कोहराम मच गया.

इसी तरह, पुराणपंथियों के हिंसक प्रचार के बावजूद, मुसलमानों को समेकित समुदाय नहीं माना जा सकता. भारत में और अन्यत्र शियाओं और सुन्नियों के बीच खूनी टकराव सर्वविदित है. ईरान और इराक के बीच लंबे समय तक चले खूनी टकराव की तो चर्चा ही क्या. भारत में बहुत से ऊंचे दर्जे के और संपन्न मुस्लिम परिवार, हिंदुओं के उच्चतर तबकों और संपन्न परिवारों की तरह ही जुलाहों, पंसारियों और मुसलमानों के अन्य तथाकथित निम्न समुदायों को नीची नजर से देखते हैं. दंगा जांच आयोग की रिपोर्टो से पता चलता है कि दंगों के दौरान हिंदू और मुसलिम दोनों संप्रदायों के निम्न तबकों के लोग ही बड़ी संख्या में उत्पीड़न और खून-खराबों के शिकार बनते हैं. रमेशचंद्र मजूमदार मुसलमानों को हिंदुओं के साथ अनवरत रूप से वैरभाव में लिप्त एक समेकित धार्मिक समुदाय मानते हैं. महमूद गज़नी और तैमूर का भूत ऐतिहासिक रूप से उन्हें संत्रस्त किये रहता है. जैसाकि वह कहते है- 400 वर्ष पहले सुलतान महमूद के समय से भारत में कभी भी हिंदुओं के सोचे-समझे तौर पर किये गये ऐसे नृशंस हत्याकांड नहीं देखे गये (जैसेकि तैमूर के समय में). उसके धर्मोन्मादी सैनिकों ने अनियंत्रित हिंसा और बेरोक बर्बरता बरपा करने में कल्पना के सारे बांध तोड़ दिये और उसकी चरम सीमा वह थी, जब दिल्ली के मैदानों के बाहर एक लाख हिंदू कैदियों का नृशंस नरमेध रचाया गया. एक ऐसी घटना, जिसकी दुनिया के इतिहास में कोई मिसाल नहीं (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ द इंडियन पीपुल, प्रस्तावना, पृष्ठ-24).
ऐसे वक्तव्य महमूद गजनी, मोहम्मद गौरी और समरकंद के तॅमूर द्वारा मुस्लिम जन समुदाय और मध्य एशिया के शासकों पर ढहाये गये कहर को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य था दूसरे देशों की लूटपाट करना, अपना खजाना भरना तथा अपनी संपदा में वृद्धि करना. जब महमूद गजनी और मोहम्मद गौरी ने भारत पर चढ़ाई की, तब उसके आक्रमण के शिकार क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी वस्तुत: अस्तित्वहीन थी. लेकिन 10वीं-11वीं शताब्दियों तक लगभग पूरा मध्य एशिया इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो चुका था और फिर भी अपने इन सहधर्मियों को इन आक्रांताओ ने नही बख्शा. मध्य एशिया के मुसलमानों की उन्होंने जो लूटमार मचायी वह उत्तर भारत के हिंदुओं की उनके द्वारा की गयी लूटमार से व्यापकता और बर्बरता में कहीं कम नहीं थी.
क्रमशः

बाबा रामदेव बनाम बिहार के दफ़्तरी

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/18/2007 12:37:00 AM

आज कुमार अनिल बिहार के दफ़्तरों और दफ़्तरियों की खबर ले रहे हैं.

कुमार अनिल
बिहार में बाबा रामदेव के समर्थक उदास हैं. इसलिए कि बाबा का प्रभाव लगातार कमजोर होता जा रहा है. लोगों ने कपालभाति आदि का अभ्यास बंद कर दिया है. बाबा के स्वस्थ भारत की कल्पना को सबसे बड़ी चुनौती बिहार सरकार के दफ्तरों ने दी है.

कपालभाति आदि से क्या होता है? सांस की गति तेज की जाती है. योग से मांसपेशियां मजबूत होती हैं. बिहार सरकार के दफ्तरों का कहना है कि जो काम बाबा फीस लेकर करते हैं, वही काम वे मुफ्त में करते हैं.
आपको विश्वास नहीं, तो आप कोई भी छोटा-सा काम लेकर किसी दफ्तर में चले जायें. आपको इस बिल्डिंग से उस बिल्डिंग तक इतनी दफा आना- जाना पड़ेगा कि आपकी सांसें ऊपर-नीचे होने लगेंगीं.
पतंजलि में एक बाबा हैं. यहां हर दफ्तर में अनेक बाबा हैं. वहां भी बाबा से रू -ब-रू होना मुश्किल है. यहां भी आसान नहीं. वे कभी लंदन, कभी अमेरिका में हैं. यहां के बाबा की खोज-खबर ही नामुमकिन है.
रामदेव बाबा बस एक ही चीज में आगे हैं. वे बेहतर ब्रांडिंग कर लेते हैं. टीवी में छाये रहते हैं. बिहार सरकार को भी चाहिए कि वह अपने दफ्तरों की ब्रांडिंग करे. देश को बताये कि प्रखंड के बड़ा बाबू से लेकर सचिवालय के मुलाजिम तक लोगों को दौड़ा-दौड़ा कर किस प्रकार मैराथन धावक तैयार करने का काम कर रहे हैं.
नीतीश जी गरीबों के लिए नाहक परेशान हैं. अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन कर रहे हैं. लाखों खर्च हुए. उन्हें चाहिए कि वे अविलंब एक आदेश पारित करें. हर गरीब के लिए सुबह-सुबह सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाना अनिवार्य कर दें. साल भर में गरीब हट्टे-कट्टे हो जायेंगे. आखिर आंबेडकर छात्रावास के लड़के छात्रवृत्ति के लिए दौड़-दौड़ कर हट्टे-क ट्टे हो रहे हैं या नहीं.
पतंजलि के बाबा के पास गिने-चुने नुस्खे हैं. हमारे दफ्तरों के पास अनगिनत नुस्खे हैं. लाल कार्ड की सूची, आवास प्रमाणपत्र, माध्यमिक बोर्ड से अंक प्रमाणपत्र... कितना गिनायें. कोई काम शुरू कर के देखिए. भूमिहीन कमजोर होता है व भूस्वामी मजबूत. भूस्वामी इसलिए मजबूत होता है, क्योंकि दादा से पोता तक वह दाखिल-खारिज के लिए दौड़ता रहता है.
आजकल जच्चा-बच्चा भत्ता देने की योजना चल रही है. हर जननी मातृत्व भत्ते के लिए अस्पतालों की दौड़ लगा रही है. इससे जच्चा तंदुरुस्त होती है, फिर बच्चे तो तंदुरुस्त होंगे ही. यह योजना बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में ज्यादा कारगर है. वहां जान-माल की क्षतिपूर्ति के लिए अनेक योजनाएं शुरू की गयी हैं. क्षतिपूर्ति के लिए हर आदमी दौड़ रहा है. रोज दौड़ रहा है. इससे बाढ़पीड़ितों के साथ ही उनकी आनेवाली नस्लें भी स्वस्थ होंगी.
पतंजलि के बाबा कहते हैं कि कोका-कोला मत पियो. कई तो कहते हैं कि गोमूत्र ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक है. बिहार के बाढ़पीड़ित गोमूत्र में और भी जैविक पदार्थ मिला कर पी रहे हैं. पी कर सीधे स्वर्ग जा रहे हैं. डायरिया तो मुफ्त में वाहवाही ले रहा है. असली योगदान तो हमारे दफ्तरों का है, स्वास्थ्य केंद्रों का है.
जय हो दफ्तर की. जय हो दफ्तरी की.

ये चेहरे भी हमारी ही दुनिया के हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/12/2007 05:36:00 AM

लालिमा ने अपने ब्लाग पर इनमें से कुछ तसवीरें एक अलबम के रूप में पोस्ट कीं तो देख कर रोंगटे खडे़ हो गये. अविश्वसनीय-सी लगनेवाली ये तसवीरें हमारे ही समय की हैं-किसी और समय की नहीं और हमारे ही मुल्कों की हैं. जब हम अंतरराष्ट्रीयतावाद की बात कर रहे होते हैं तो हमारे लिए पूरी दुनिया एक मुल्क की तरह होती है. और ये तसवीरें उसी दुनिया का चेहरा हैं-असली और खरा चेहरा-जिसमें एक खास फोन नंबर हासिल करने के लिए 15 लाख रुपये फूंके जा सकते हैं.

सोचा कि इन्हें थोडा और बेहतर ढंग से पेश किया जाये. और फिर जो सामने आया वह ये वीडियो है. पीछे बजनेवाले एक गीत की जगह इंतेसाब ने ली-तो फिर उसकी लेंथ के हिसाब से कुछ और फोटो डाले गये-इनमें से दो एक ब्लागर साथी के ब्लाग से लिये गये. गीत एक दूसरे ब्लागर साथी के यहां से.
आप भी देखें, और...अपनी राय ज़रूर दें. बस एक ध्यान रखें-इस वीडियो का मुख्य उद्देश्य फोटोग्राफ्स दिखाना है. कहीं-कहीं गीत के साथ फोटो का मेल नहीं भी होगा.

और फिर मिलते हैं चार-पांच दिनों की छुट्टी के बाद.

भारत-अमेरिका परमाणु करारः मानव जाति का अस्तित्व ही दावं पर लगा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/10/2007 01:20:00 AM

नोम चोम्स्की ज़िंदाबाद केवल अरुंधति राय ही नहीं करतीं, किसी न किसी कारण से वे सभी लोग भी करते हैं जो अमेरिकी साम्राज्य के लौह पंजे के तले अपनी गरदन दबी हुई महसूस करते हैं और उसके खिलाफ़ संघर्षों में भागीदार हैं. चोम्स्की अमेरिका में रहते हुए अमेरिकी नीतियों के सबसे मुखर आलोचक हैं. यह लगभग सर्वसम्मत बात है कि अभी की दुनिया के वे सबसे बडे़ बौद्धिक-विचारक हैं. उनकी आवाज़ दुनिया की सबसे बडी़ आवाज़ों में से है. मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर एमेरिटस चोम्स्की की गिनती बीसवीं सदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाषाविज्ञानियों में होती है, मगर उनका काम मीडिया, राजनीति और आधुनिक मनोविज्ञान में भी वैसा ही-उतना ही महत्वपूर्ण है. इस बार वे भारत द्वारा अमेरिका के साथ किये गये करार पर चिंता जता रहे हैं. आइए, हम सब सुनें.

नोम चोम्स्की

रमाणुसंपन्न देश अपराधी देश हैं. विश्व न्यायालय के अनुसार उनका कानूनी दायित्व है कि वे परमाणु अप्रसार संधि की धारा छह की कसौटी पर खरे उतरें. इस संधि के प्रावधानों के अनुसार परमाणु हथियारों के पूरी तरह से खात्मे के लिए विश्वासपूर्ण समझौते करना है. कोई भी परमाणुसंपन्न देश इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा है. इसका उल्लंघन करने में संयुक्त राज्य अमेरिका अगुआ है, खासतौर पर बुश प्रशासन, जिसने यहां तक कहा कि वे धारा छह के अधीन नहीं हैं.

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सुनिए एक दुर्लभ बातचीत, जिसमें नोम चोम्स्की दुनिया के एक और महान विचारक-लेखक हावर्ड ज़िन के साथ इराक, वियतनाम, एक्टिविज़्म और इतिहास पर चर्चा कर रहे हैं. इस बातचीत का हिंदी अनुवाद जल्दी ही हाशिया पर देने की कोशिश चल रही है.












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27 जुलाई को वाशिंगटन ने भारत के साथ एक ऐसा समझौता किया है, जो परमाणु अप्रसार संधि की मूल आत्मा को नष्ट करता है. हालांकि दोनों देशों में इसका पुरजोर विरोध हो रहा है. इस्राइल और पाकिस्तान की भांति भारत ने एनपीटी पर दस्तखत नहीं किया है. इसने इस संधि से बाहर रह कर परमाणु हथियार विकसित किया है. यह समझौता करके बुश प्रशासन ने उद्दंड व्यवहार को अपना समर्थन दिया है. यह समझौता संयुक्त राज्य अमेरिका के कानून का उल्लंघन तो है ही, साथ ही न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप को बाइपास भी करता है. यह ग्रुप 45 देशों का समूह है, जिसने परमाणु हथियारों के विस्तार के खतरे को कम करने के लिए कड़े नियम बनाये हैं.
आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डैरिल किंबाल का आकलन है कि यह समझौता भारत को और परमाणु परीक्षण करने से प्रतिबंधित नहीं करता है. सबसे चकित करनेवाली बात यह है कि अगर भारत ऐसे परीक्षण करता है, तब भी अन्य देशों से ईंधन हासिल करने में वाशिंगटन दिल्ली की मदद करेगा. यह बम बनाने के लिए सीमित घरेलू आपूर्ति को फ्री करने के लिए भारत को अनुमति भी देता है. ये सारे कदम अंतरराष्ट्रीय अप्रसार समझौते का सीधा उल्लंघन हैं.

भारत-अमेरिकी समझौता दूसरे देशों को नियम तोड़ने के लिए उकसानेवाला है. ऐसी खबर है कि पाकिस्तान परमाणु हथियारों के लिए प्लूटोनियम उत्पादन के लिए रिएक्टर बनानेवाला है. यह ज्यादा उन्नत हथियार बनाने के दौर की शुरुआत है. भारत जैसी सुविधा हासिल करने के लिए इस्राइल अमेरिकी कांग्रेस में लॉबिंग कर रहा है. उसने नियमों से छुटकारे के लिए न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप से निवेदन किया है. एक बार अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों ने दरवाजा खोल दिया, तो चीन-पाकिस्तान समझौते की भांति अब फ्रांस, रूस और ऑस्ट्रेलिया भारत के साथ परमाणु समझौते के लिए आगे बढ़ें, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

भारत-अमेरिकी समझौते में फौजी और व्यापारिक दोनों ही उद्देश्य निहित हैं. परमाणु हथियार विशेषज्ञ गैरी मिलहोलिन ने कांग्रेस में विदेश सचिव कोंडेलिजा राइस द्वारा दिये गये बयान के हवाले से बताया है कि `प्राइवेट सेक्टर को ध्यान में रखते हुए इस डील को बनाया गया था. खासतौर पर एयरक्राफ्ट और रिएक्टर के लिए.' मिलहोलिन मानते हैं कि यह डील फौजी विमानों के लिए है. परमाणु युद्ध के खिलाफ प्रतिबंधों को नजरअंदाज करके यह समझौता क्षेत्रीय तनावों को न सिर्फ बढ़ाता है, बल्कि वह दिन भी जल्द ही दिखा सकता है, जब परमाणु विस्फोट किसी अमेरिकी शहर को तबाह कर देगा. वाशिंगटन का संदेश साफ है- `संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए पैसे की तुलना में निर्यात नियंत्रण कम महत्वपूर्ण है.' अमेरिकी कारपोरेटों के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है मुनाफा, चाहे कितना भी खतरा क्यों न हो. किंबाल बताते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका परमाणु व्यापार के मामले में भारत को उन देशों की तुलना में ज्यादा सहूलियत दे रहा है, जो परमाणु अप्रसार संधि की सभी शर्तों और जवाबदेहियों को पूरा कर रहे हैं. दुनिया के अधिकांश हिस्से में कुछ ही लोग इस पागलपन को देखने में असफल रह सकते हैं. ईरान के खिलाफ युद्ध की धमकी के दौरान ऐसा दिखा कि वाशिंगटन उन देशों को पुरस्कृत करता है, जो परमाणु अप्रसार संधि के नियमों की अवहेलना करते हैं. वस्तुस्थिति यह है कि बुरी तरह से उकसाने के बावजूद ईरान ने परमाणु अप्रसार संधि के नियमों का उल्लंघन नहीं किया है. संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के दो पड़ोसियों पर कब्जा जमा लिया है और ईरान की सत्ता को खुले तौर पर गिराने में लगा है. गौरतलब है कि 1979 से ईरान पर अमेरिकी नियंत्रण नहीं है, इससे वह क्षुब्ध है.

पिछले कुछ वर्षों से भारत और पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में कोशिशें की हैं. आम लोगों के आपसी संपर्क में बढ़ोत्तरी हुई है. दोनों देशों के बीच कई लंबित विवादों पर बातचीत का दौर जारी है. भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते से इस प्रक्रिया पर उलटा असर पड़ सकता है. इस पूरे क्षेत्र में भरोसा निर्माण के कई साधनों में से एक है- पाकिस्तान के रास्ते बननेवाली प्राकृतिक गैस के लिए ईरान-भारत पाइपलाइन का निर्माण. यह पाइपलाइन इलाके के लोगों को एक साथ करती और शांतिपूर्ण एकता की संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करती.

यह पाइपलाइन और वह उम्मीदें, जो इससे बंधी हैं, भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते की बलि चढ़ सकते हैं. अमेरिका इसे अपने दुश्मन ईरान से भारत को अलगाने के रूप में देखता है, इसीलिए वह भारत को ईरानी गैस के बदले में परमाणु शक्ति दे रहा है. हालांकि सच्चाई यह है कि अमेरिका जो भारत को देगा, वह ईरान से मिलनेवाली सामग्री की तुलना में बहुत ही कम है.

भारत-अमेरिकी समझौता वाशिंगटन के द्वारा ईरान को अलग-थलग करने का उपाय है. 2006 में अमेरिकी कांग्रेस ने `हाइड एक्ट' पारित किया है, जिसमें निर्दिष्ट है कि जनसंहार के हथियारों को हासिल करने के प्रयासों के लिए ईरान को निरुत्साहित करने, अलग-थलग करने और जरूरत पड़े तो प्रतिबंधित करने और नियंत्रण करने की अमेरिकी कोशिशों में भारत का पूरा और सक्रिय सहयोग हासिल किया जाये.

गौरतलब है कि अधिकांश अमेरिकी और ईरानी लोग इस पूरे इलाके (ईरान और इस्राइल समेत)को परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र बनाने के पक्षधर हैं. तीन अप्रैल 1991 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 687 को भी याद कर सकते हैं, जब अमेरिका से इराक पर हमले की बाबत जवाब-तलब किया गया था, तो वाशिंगटन ने लगातार वकालत की थी कि मध्य-पूर्व क्षेत्र को नरसंहार के हथियारों और मिसाइलों से मुक्त किया जाये.

साफ है, मौजूदा संकट को कम करने के रास्ते की कमी नहीं है. भारत-अमेरिकी समझौते को पटरी से उतार दिये जाने की जरूरत है. परमाणु युद्ध का खतरा बहुत ही गंभीर है और बढ़ रहा है. और इसकी वजह अमेरिकी अगुआईवाले वो परमाणुसंपन्न देश हैं, जो परमाणु अप्रसार के दायित्वों को पूरा करने से इनकार करते हैं और उसका खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं. भारत-अमेरिकी समझौते का यह नवीनतम प्रयास विपत्ति की तरफ ही एक और कदम होगा. इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप के द्वारा इसके निरीक्षण के बाद अमेरिकी कांग्रेस के पास इस समझौते को जांचने-परखने के लिए चिंतन करने का मौका है. मुमकिन है कि कांग्रेस इस समझौते को रद्द कर सकती है. कांग्रेस में परमाणु अस्त्रों के खिलाड़ियों से ऊबे हुए लोगों की संख्या अच्छी है. आगे बढ़ने का सबसे अच्छा रास्ता है कि वैश्विक स्तर पर परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए काम किया जाये. हम इस बात को समझें कि दावं पर मानव जाति का अस्तित्व लगा है.
अनुवाद: विनय भूषण
साभार: खलीज टाइम्स, हिंदी अनुवाद प्रभात खबर में प्रकाशित | मूल लेख यहां पढें.

अनंत ऊर्जा के असली स्रोत हैं सूप व चलनी

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/08/2007 09:50:00 AM

प्रायः गंभीर विषयों पर लिखनेवाले कुमार अनिल ने इधर कई व्यंग्य लिखे हैं और उनसे लोग तिलमिलाये भी हैं. प्रस्तुत हैं उनके व्यंग्यों में से कुछ, क्रमवार. आज पहला व्यंग्य.

कुमार अनिल

र्जा को लेकर देश में एटमी करार पर इतनी तेज बहस हुई कि सरकार डगमगाने लगी. ऊर्जा की बहस में देश की कीमती ऊर्जा बरबाद हुई.
चलनी कहे सूप से कि तुममे हैं अनेक छेद. इस कहावत के जरिये आदमी की अनावश्यक दोष निकालने की प्रवृत्ति की निंदा की जाती है. निंदा-दर-निंदा के बावजूद यह प्रवृत्ति जिंदा है, क्योंकि यह प्रवृत्ति आदमी को ऊर्जा देती है. इससे एक रस मिलता है. ऊर्जा के असली स्रोत हैं सूप व चलनी. इनके बेहतर इस्तेमाल से ऊर्जा समस्या का समाधान संभव है. युगों-युगों से इसका इस्तेमाल होता आया है. एक आदमी जब इसका इस्तेमाल करता है, तो उसके तन-मन में ऊर्जा के लावे फूटने लगते हैं.

मान लीजिए, किसी ने कोई अच्छा काम कर दिया. सभी उसकी महानता के नीचे दबने लगते हैं. इसी बीच कोई पुरुष उसके अच्छे काम की तुलना किसी बड़े अच्छे काम से कर देता है. क्षण भर में अच्छे काम की महत्ता कपूर की तरह उड़ जाती है. पहला व्यक्ति अपने को हीन समझने लगता है, जबकि दूसरे में ऊर्जा का संचार होने लगता है.

अभ्यास से आदमी इसके इस्तेमाल में महारत हासिल कर सकता है. आज के नेताओं के पास चलनी व सूप का बड़ा स्टॉक है. नीतीश जी चाहे जितना अच्छा काम करें, राबड़ी उन्हें अपने सूप से एक बार में ही फटक देती हैं. विपक्ष को ऊर्जा मिलती है. सूप व चलनी का स्टॉक सत्ता पक्ष भी रखता है. विपक्ष आज का सवाल खड़ा करेगा, तो सत्ता पक्ष पंद्रह सालों की चलनी में चाल देगा. इससे सत्ता पक्ष को ऊर्जा मिलती है.
कवि-लेखक भी इसका इस्तेमाल करके ऊर्जावान होते हैं. फिराक की चर्चा हो, तो आप फैज की चर्चा शुरु कर दें. आपकी धाक जमनी तय है. गोष्ठी में ऊर्जा की तरंगें दौड़ने लगती हैं. इससे भी काम न चले, तो आप कवि के पायजामे की चर्चा कर सकते हैं. इसका इस्तेमाल सर्वव्यापी है.

इसका इस्तेमाल सर्वव्यापी है. ब्लॉग से लेकर दफ्तर तक. दफ्तर में अगर राम कुमार की आलोचना हो, तो उसे चाहिए कि वह फौरन श्याम कुमार का पोस्टमार्टम शुरू कर दे. इससे आलोचना का असर फौरन छू-मंतर हो जाता है और राम कुमार में फिर से ऊर्जा भर जाती है.

जिसके पास जितनी वेराइटी के सूप व चलनी होंगे, वह उतना ही प्रकाशमान होगा. मिथिला के भोज में जो व्यक्ति भोजन की सपाट बड़ाई करेगा, उसे भोलू समझा जाता है. जो देवता सिंह साहब के भोज में खाते हुए चौधरी साहब के भोज का गुणगाण करेंगे, उनकी पूछ बढ़ जाती है. यजमान अपने को तुच्छ समझने लगता है व देवता के चेहरे पर बल्ब जलने लगते हैं. ऐसे देवताओं का बिरादरी में मान बढ़ जाता है. वे समाज में रोशनी फैलाने लगते हैं.

विज्ञान की चर्चा हो, तो आप इतिहास के सूप से फटक दीजिए. इतिहास की चर्चा हो तो आप आस्था की चलनी में चाल दीजिए. इससे राष्ट्र मजबूत होता है. इस राष्ट्रीय ऊर्जा से लोग भूख-प्यास तक भूल जाते हैं.
महिलाओं के पास पहले छोटे साइज के सूप व चलनी थे. वे दिन भर घर में बैठ कर पति को फटकती रहती थीं. दिल्ली में स्वराज व सोनी के पास बड़ी-बड़ी चलनियां हैं. मायावती के सूप से मुलायम खेमे में दहशत है. बिहार की पंचायतों में महिलाएं तेजी से सूप व चलनी के इस्तेमाल की ट्रेनिंग ले रही हैं.

हर धर्म में स्वर्ग की कल्पना की गयी है, पर कोई आदमी मरना नहीं चाहता. इसलिए कि वहां सूप व चलनी की व्यवस्था नहीं है.

लोकतांत्रिक लडा़इयों के लिए सिकुड़ता स्पेस

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/06/2007 11:54:00 PM

सीतामढी़ ज़िले के रुन्नीसैदपुर में भाकपा (माले) नेता अशोक साह मारे गये. वे बाढ राहत सामग्री में धांधली को लेकर खाद्यान्न माफ़िया के खिलाफ़ संघर्षरत थे. वे मुख्यंत्री तक से मिले थे और शिकायत की थी-मगर सब बेअसर रहा. अगर हमारे देश में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण संघर्षों का जवाब यही है तो हम क्यों माओवादी आंदोलनों को कोसते हैं? लोग शांतिपूर्ण तरीके से नहीं लड़ने दिये जायेंगे और उनकी समस्याओं का निबटारा नहीं होगा तो वे फिर वे हथियार ही उठायेंगे.

अशोक साह की हत्या और इसके निहितार्थों पर प्रभात खबर के स्थानीय संपादक अजय कुमार की टिप्पणी.

लोकतांत्रिक लडा़इयों के लिए सिकुड़ता स्पेस

अजय कुमार

शोक साह मारे गये. पुलिस हिरासत में उनकी मौत (हत्या) हो गयी. अशोक कोई बड़े नेता नहीं थे. लेकिन वह बड़ा काम जरूर कर रहे थे. यह उनकी मौत का कारण बना.
बाढ़ राहत के मौके को ललचायी नजरों से अवसर के तौर पर देखना प्रशासनिक तंत्र का पुराना जनविरोधी धंधा रहा है. इस बाढ़ में इस धंधे के खिलाफ आम लोगों की दर्जनों स्थानों पर पुलिस-प्रशासन के साथ तीखी झड़पें हुईं. कई जगहों पर गोलियां चलीं. लाठी की तो पूछिए ही नहीं.

अशोक साह ने सीतामढ़ी के रुन्नीसैदपुर में बाढ़ राहत में गोलमाल के खिलाफ आवाज उठायी थी. निर्धारित वजन की तुलना में कम राहत सामग्री देना किसी अपराध से कम नहीं है. इस अपराध के खिलाफ बोलने की सजा अशोक को मिली. जो अपराधी थे, वे खुले घूम रहे हैं. यह इस समय की त्रासदी है.

सरकार कहती है कि जो भ्रष्ट हैं, उनके बारे में सूचनाएं दें. अशोक ने यह सब कुछ किया, बाढ़पीड़ितों के साथ मिल कर. पर यह व्यवस्था उन्हें कोई संरक्षण नहीं दे सकी. अगर उनके साथ आम जन खड़े न होते, तो शायद उनका शव भी गायब हो जाता. इस आशंका की वजह पुलिस का वह चरित्र है, जो इस घटना में बार-बार दिखता है. बाढ़ राहत में गड़बड़ी के खिलाफ आवाज उठाने पर दुष्कर्म का एक झूठा मुकदमा उन पर लाद दिया गया. पुलिस ने राहत में गड़बड़ी करनेवालों के खिलाफ तो कुछ भी नहीं किया, उलटे उसने एक लोकतांत्रिक आवाज को खामोश कर दिया. इस व्यवस्था को घुन की तरह चाट-चाट कर कमजोर-विकृत बना रहे तत्वों की वह चेरी बनी रही.

हमारे आसपास जो कुछ भी गलत चल रहा है, आखिर उसे कहां रखा जाये? थाने का हाल तो सबके सामने है. इस मामले में डीआइजी के निर्देशों का खुल्लम-खुला उल्लंघन `मनसोखी' का नमूना है. यह भी कि निचले स्तर पर पुलिस बल किस कदर उच्छृंखल हो चुका है. जानकारी यह भी मिली है कि अशोक को थाने पर लाने के बाद उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए बड़े अधिकारियों को लानतें दी जा रही थीं. कहा जा रहा था कि हमारे खिलाफ बोलने का अंजाम अब समझ लो. मुख्यमंत्री के जनता दरबार तक में अशोक ने स्थानीय पुलिस और भ्रष्टचारियों की साजिश के बारे में जानकारी दी थी. पर हुआ कुछ भी नहीं.

इस प्रकरण ने इस सवाल को भी मौजूं बना दिया है लोकतांत्रिक तरीके से व्यवस्था विरोधी प्रवृत्तियों के खिलाफ लड़ने की जगह कितनी सिकुड़ती जा रही है. क्या उसी राजनीतिज्ञ की बात सुनी जायेगी, तो बाहुबली और ताकतवर हो? आम आदमी की राजनीति के लिए कोई जगह नहीं होगी क्या?

वे मंदिर, जो लूटे और तोडे़ गये

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/06/2007 02:46:00 PM

इतिहास में बार बार हिंदू मंदिरों के लूटे और तोडे़ जाने का ज़िक्र आता है. इसके लिए सांप्रदायिक इतिहासकार और राजनीतिक दल शासकों के मुसलमान होने को ज़िम्मेवार ठहराते हैं. प्रख्यात इतिहासकार प्रो रामशरण शर्मा सांप्रदायिक राजनीति और राम के अस्तित्व संबंधी अपने व्याख्यान के इस चरण में उन्हीं मंदिरों की कहानी कह रहे हैं.
राम और कृष्ण के अस्तित्व, इतिहास के सांप्रदायिकीकरण और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रोफेसर राम शरण शर्मा के व्याख्यान की पांचवीं किस्त.




पिछली किस्तें : एक, दो, तीन, चार
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सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता-5

प्रोफेसर आरएस शर्मा


र्तमान में पुनरुत्थानवादी विचारों को कुछ सांप्रदायिक मानसिकतावाले लेखक इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें समर्थन दे रहे हैं. यह दावा किया जा रहा है कि अतीत में दुनिया में जो कुछ भी अच्छा और महान रहा है, वह भारत से ही उद्भूत हुआ और यहीं से दुनिया के दूसरे भागों में फैला. लेकिन इतिहासकार, जिन्हें ठोस प्रमाणों को आधार बनाना होता है, ऐसे विचारों को स्वीकार नही कर सकते. बात चाहे विभिन्न प्रकार की धातुओं और सिक्कों के इस्तेमाल की हो या लेखन के प्रयोग और सभ्यता के ऐसे ही अन्य तत्वों की, हमें तो बड़ी ही सावधानी से प्रमाणों की छानबीन करनी होती है. जैसाकि पता चलेगा तमाम अति पुनरुत्थानवादी विचार ऐसे इतिहासकार प्रस्तुत करते हैं, जो हिंदू संप्रदायवादी और इसलामी रुढ़िपंथी विचारों से प्रतिबद्ध है.

भारत में संप्रदायवाद की समस्या को बुनियादी तौर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंधों की समस्या के तौर पर देखा जाता है. यह समस्या इस तरह नहीं सुलझायी जा सकती कि एक धर्म विशेष को माननेवाले शासकों द्वारा दूसरे धर्म को माननेवाले शासकों और अधीनों के खिलाफ की गयी दमन-उत्पीड़न की कार्रवाइयों पर परदा डाला जाये. इतिहास बतलाता है कि शासक वर्ग चाहे किसी भी धर्म के रहे हों, उनका यह विशेषाधिकार रहा है कि वे अपनी प्रजा को और अपने दुश्मनों को लूटें और उनका उत्पीड़न करें और जो मालमत्ता मिले उसकी मुख्यत: शासक वर्ग के ऊपरी तबकों के सदस्यों के बीच बंदरबांट कर लें. अगर इसलामी बादशाहों और राजाओं ने हिंदू मंदिरों की लूटपाट की तो इतिहासकार इस तथ्य को नजरअंदाज करके उनके प्रति कोई सद्भावना पैदा नहीं कर सकते. पर ऐसी लूटपाट के कारणों का विश्लेषण करना होगा और उनकी व्याख्या करनी होगी जैसा कि मोहम्मद हबीब ने अपनी पुस्तक सुल्तान महमूद आफ गजनीन में महमूद गजनी द्वारा की गयी लूटपाट के मामले में किया है. साधारण व्यक्ति भी इस बात को देख सकता है कि चाहे सभी हिंदू मंदिर सोमनाथ और तिरुपति के मंदिरों की तरह समृद्ध न रहे हों तो भी आम तौर पर मसजिदों के मुकाबले मंदिर कहीं अधिक समृद्ध हुआ करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में, सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां, 300 हजाम और बहुत से पुजारी थे. इस मंदिर के स्वामित्व में 10 हजार गांव थे. पर मसजिदों की वास्तु संबंधी बनावट ही ऐसी है कि संपत्ति संग्रह के लिए वहां कोई जगह नहीं होती. यह तो प्रार्थना के लिए एक खुली इमारत होती है. मंदिरो में संपदा के संचय के कारण ही कुछ हिंदू राजा कीमती धातुओ से बनायी गयी मूर्तियों को ध्वस्त करने और राजकोष के लिए धन संपत्ति पर कब्जा करने के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में कश्मीर के शासक हर्ष ने ऐसा ही किया था. उसने एक अधिकारी नियुक्त किया था, जिसका काम मूर्तियों को ध्वस्त करना था (देवोत्पाटन). ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति और कौटिल्य द्वारा अर्थशास्त्र में अंधविश्वासपूर्ण युक्तियों से भोले-भाले लोगों से पैसा उगाहने के लिए सुझाये गये उपायों से यह विचार खारिज हो जाता है कि हिंदू शासक वर्ग के लोग अपनी प्रजा के प्रति लगातार सहिष्णु रहते आये थे. पतंजलि के महाभाष्य, यानी ईसा पूर्व 400 के लगभग के पाणिनी के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी पर ईसा पूर्व 150 के लगभग लिखित उनकी टीका के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अपना खजाना भरने के लिए मौर्य शासक धातु मूर्तियों को पिघलाते थे. अत: धन की अदम्य लालसा के चलते मौर्यों और अन्य शासकों ने धार्मिक मूर्तियों की पवित्रता तक को नहीं बख्शा.


निश्चय ही अशोक ने जो कुछ किया वह कहीं अधिक श्लाघ्य और सराहनीय था, पर उसकी नीति से ब्राह्मणों को आर्थिक धक्का लगा. मौर्यों की सत्ता के रहे-सहे अवशेषों का सफाया करनेवाला और ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के अंत के आसपास ब्राह्मण राजवंश का संस्थापक, पुष्यमित्र शुंग दूसरी तीसरी शताब्दि के आसपास लिखित ग्रंथ दिव्यावदान में बौद्ध मतावलंबियों के घोर उत्पीड़क के रूप में प्रकट होता है. वह अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ स्तूपों को नष्ट करता, विहारों को जलाता, भिक्षुओं की हत्याएं करता, शाकल यानी आधुनिक सियालकोट तक आगे बढ़ता चला गया था. सियालकोट में उसने घोषणा की थी कि जो भी उसे एक बौद्ध भिक्षु का सिर लाकर देगा, उसे सोने के सौ सिक्के पुरस्कार में मिलेंगे. यह बात अतिरंजनापूर्ण भी हो सकती है, क्योंकि शुंग शासन के अंतर्गत बौद्ध स्तूपों का निर्माण भी किया गया था. लेकिन पुष्यमित्र शुंग और भिक्षुओं के बीच शत्रुतापूर्ण वातावरण से इनकार नहीं कि या जा सकता. हमें यह भी पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में गौड़ के शैव शासक शशांक ने उस बोधिवृक्ष को कटवा डाला था, जिसके नीचे बैठ कर बुद्ध को ज्ञान (बुद्धत्व) प्राप्त हुआ था. सातवीं शताब्दी के उसके समकालीन राजा हर्ष को सहिष्णु शासक माना जाता है पर उसने भी उन ब्राह्मणों को कारावास में डाला और उनका संहार किया था जिन पर कन्नौज की सभा में बुद्ध के सम्मान में खड़ी की गयी मीनार को जलाने का षड़ंयत्र रचने का आरोप था. मध्यकाल के आरंभ में दक्षिण भारत के जैनियों और शैवों के बीच हमें खुली शत्रुता की बातें सुनने को मिलती हैं और परंपरागत कथनों से पता चलता है कि 8000 जैनियों को सूली पर चढ़ा दिया गया था. यह घटना मंदिर के उत्कीर्णनों में भी परिलक्षित है.
क्रमशः

सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता-4

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/05/2007 01:52:00 AM

राम और कृष्ण के अस्तित्व, इतिहास के सांप्रदायिकीकरण और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रोफेसर राम शरण शर्मा के व्याख्यान की चौथी किस्त.

प्रोफेसर आरएस शर्मा

कु
छ महत्वपूर्ण भारतीय इतिहासकार ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा बिछाये सांप्रदायिक जाल में फंस गये. 19वीं शताब्दी के दौरान मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल करने की औपनिवेशिक नीति पर चलते हुए ब्रिटिश इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ताओं ने मुसलमान शासकों पर आरोप लगाया कि उन सभी ने समान और अनवरत रूप से हिंदू मंदिरों को नष्ट किया तथा हिंदुओं का दमन-उत्पीड़न किया ताकि मुसलिम राजाओं के शासन की तुलना में ब्रिटिश शासन की बेहतर छवि प्रस्तुत की जा सके. अंगरेज़ों द्वारा सांप्रदायिक इतिहास लेखन का सर्वाधिक स्पष्ट उदाहरण 1849 में भारत सरकार के सचिव एचएम इलियट की कलकत्ता से प्रकाशित पुस्तक, बिब्लियोग्राफिकल इंडेक्स : द हिस्टोरियंस ऑफ मुहम्मडन इंडिया के पहले खंड की उनके द्वारा लिखित प्रस्तावना में मिलता है. इलियट महोदय, जो बाद में चल कर डावसन के साथ सुल्तानों और मुगल बादशाहों के शासन से संबंधित आठ खंडोंवाली पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाइ इट्स हिस्टोरियंस के लेखक के रूप में प्रसिद्ध हुए, मुसलिम शासकों की कठोरतम शब्दों में भर्त्सना करते हैं. उनका रोष यह है कि `अंगरेजों द्वारा गद्दी पर बिठाये गये मुसलिम राजा भी आलस और भोगविलास के गर्त में डूब गये तथा दुर्गुणों में वे कालीगुला या कोमोडोस से होड़ देने लगे.' इलियट के अनुसार मुसलिम शासकों ने हिंदू शोभायात्राओं, पूजा-आराधना आदि पर रोक लगा दी. मूर्तियों का अंग-भंग किया, मंदिरों को धराशायी कर डाला. लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन किया और बड़े पैमाने पर खून-खराबा किया, संपत्ति की लूटपाट की आदि. उन्होंने पुस्तक के पहले खंड में इन सभी असहनीय कार्रवाइयों के उदाहरण प्रस्तुत किये. इलियट ने जो तसवीर प्रस्तुत की है वह लगभग एक तरफा है और निर्लज्जताभरी दुर्भावना से प्रेरित है. इलियट को पूरी आशा थी कि एक बार उसकी पुस्तक छप जाये तो अंगरेजों को `अपनी सरकार के तहत अधिकतम व्यक्तिगत स्वतंत्रता भोगनेवाले बड़बोले बाबुओं की देशभक्ति और अपनी वर्तमान हालत के पतन को लेकर चीख-पुकार सुनने को नहीं मिलेगी.' वह आशा प्रकट करते हैं कि `थोड़े से समय में ही' वे अब `उस अंधकारपूर्ण अवधि के दिनो' की वापसी के बारे में `आहें भरना' बंद कर देंगे. बहरहाल इलियट को यहां तक यकीन था कि अपने शारीरिक और नैतिक गठन में त्रुटियों के कारण, जिन्हें न तो भोजन से और न शिक्षा से दूर किया जा सकता है. भारतवासी राष्ट्रीय स्वतंत्रता तक का प्रयास नहीं करेंगे.



पहली किस्तें : एक, दो, तीन

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उपनिवेशवादी पुरातत्वेत्ता भी इलियट की ही भावनाओं को दोहराते हैं. इस तरह 1891 में अयोध्या के स्मारकों की चर्चा करते हुए, ए फ़्युहरर अविवेक पूर्ण ढंग से इस कुप्रेरित स्थानीय परंपरा को अपना लेते हैं कि जन्मस्थान पर स्थित मंदिर सहित अयोध्या के तीनों मंदिरों को मुसलमानों ने ही ध्वस्त किया था. (द मोनूमेंटल एंटीक्विटीज एंड इंस्क्रिप्शंस इन दि नार्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध, आरकियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, इलाहाबाद,1891 पृ 297). आगे वह कहते हैं कि `अधिकतर आधुनिक ब्राह्मण और जैन मंदिर अपने से भी प्राचीन उन मंदिरों की जगह पर अवस्थित हैं, जिन्हें मुसलमानों ने नष्ट कर दिया था' (वही, पृ 296-97). इन अतिरंजनापूर्ण टिप्पणियों का कोई आधार नहीं है, जो उस समय की गयी थीं, जब सन सत्तावन के विद्रोह की स्मृतियां ताजी ही थीं तथा ब्रिटिशविरोधी वहाबी आंदोलन की अनुगूंजें अभी मंद नहीं पड़ी थीं. ऐसा लगता है कि डब्ल्यूडब्ल्यू हंटर द्वारा मुसलमानों के सहायतार्थ दिये गये प्रवचन (इंडियन मुसलमांस, 1870) केवल शासकों तक ही सीमित थे और शैक्षिक जगत के उनके भाईबंदों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा था.

यह साफ जाहिर है कि 19वीं शताब्दी के औपनिवेशिक इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता भारतीय इतिहासकारों को सांप्रदायिकता की घुट्टी पिलाने में सफल हो गये थे. यही कारण था कि बंगाल के प्रमुख इतिहासकारों ने पूर्वी भारत में ब्रिटिश हुकूमत की स्थापना को वरदान समझा. हालांकि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए समान रूप से उत्पीड़नकारी था, तो भी जदुनाथ सरकार जैसे महान इतिहासकार उसे परित्राणकारी कृत्य के रूप में देखते हैं. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उनके विचारों को आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव जैसे इतिहासकारों ने अपना लिया और उन्हें बेतुकेपन की हद तक खींच ले गये. श्रीवास्तव पाकिस्तान के निर्माण के लिए सिंध पर 712 में हुए अरबों के हमले को जिम्मेदार समझते है. यह बात सुविदित है कि सिंध पर अरबों द्वारा हमला भारत के इतिहास में निष्प्रभावी घटना थी. हालांकि अरबों ने भारतीय संस्कृति के कुछ तत्वों को पश्चिम में छितराया जरूर था पर सिंध पर उनके चार शताब्दियों के शासन ने भारतीय राज्यतंत्र संस्कृति और समाज पर कोई वास्तविक छाप नहीं छोड़ी.


बंगाल के कुछ अग्रणी शिक्षाशास्त्रियों और इतिहासकारों के दिमाग चूंकि सांप्रदायिक ढर्रे पर काम कर रहे थे. अत: वे इतिहास के एक ऐसे समेकित विभाग के बारे में नहीं सोच सकते थे, जिसमें इतिहास के सभी कालों और पहलुओं को पढ़ाया जा सके. स्पष्ट ही प्राचीन भारत के महिमामंडन के लिए ही पहली बार देश में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास तथा संस्कृति का अलग से एक विभाग खोला गया. इसी तरह हिंदू इतिहास के अध्ययन के समकक्ष इसलामिक इतिहास का एक विभाग भी खोला गया. यह महत्वपूर्ण है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए अनुशंसित पाठ्यक्रम में राजपूत इतिहास, मराठा आदि पर प्रबंध भी लिखे गये. इसके विपरीत अंगरेजों के औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बंगाल में अनेकानेक विद्रोहों की मिसाले होने के बावजूद उनके संबंध में कोई पाठ्यक्रम नहीं अपनाये गये. अत: ऐसा लगेगा कि मुसलमानों को विदेशी मानने का विचार-हालांकि वे स्थायी रूप से देश में बस गये थे और देश की मिली-जुली संस्कृति का अभिन्न अंग बन गये थे- सांप्रदायिक ढर्रे पर ऐतिहासिक अध्ययनों के संगठन द्वारा पोषित किया गया और विधि सम्मत करार दिया गया. विश्वविद्यालयों में ऐतिहासिक और अन्य अध्ययनों का नमूना कलकत्ता ने ही बंगाल, बिहार व अन्य पड़ोसी क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों के लिए प्रस्तुत किया. जब एकबार कलकत्ता में प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति का विभाग खुल गया तो बाद में चल कर बनारस और दूसरे विश्वविद्यालयों में भी ऐसे विभाग खोले गये. इसमें कोई संदेह नही कि इन विभागों के कई सदस्यों ने बहुमूल्य शोधकार्य किया पर इसके साथ इनमें से बहुत से विभाग बहुत दिन तक रूढिवाद और हिंदू सांप्रदायिकता के गढ़ बने रहे और उन्होंने प्राचीन भारत में जो कुछ भी हुआ उसकी प्राचीनता और अनूठेपन पर जोर दिया तथा प्रकारांतर से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हिंदू धर्म मूलत: इसलाम और अन्य धर्मों से श्रेष्ठ है.
क्रमशः

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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