हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता-3

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/30/2007 01:12:00 PM

राम और कृष्ण के अस्तित्व, इतिहास के सांप्रदायिकीकरण और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रोफेसर राम शरण शर्मा के व्याख्यान की तीसरी किस्त.

प्रोफेसर आरएस शर्मा

मेशचंद्र मजूमदार (1888-1980) की रचनाओं में तो हिंदू पुनरुत्थानवाद का तत्व प्रबलतर दिखायी देता है. वे भारतीय जनता के इतिहास और संस्कृति पर बहुत से खंडों में प्रकाशित उस पुस्तक के प्रमुख संपादक थे, जिसे पुनरुत्थानवादी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की देखरेख में बिड़लाओं की वित्तीय मदद से बंबई से भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित किया गया था. काल विभाजन की दृष्टि से हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ दि इंडियन पीपुल में उन कालों के बारे में अधिक खंड दिये गये, जिन्हें मजूमदार हिंदू गौरव और प्रभुत्व के काल समझते थे तथा उन कालों के बारे में कम खंड थे, जिन्हें वह मुसलिम प्रभुत्व के काल समझते थे. वह बृहत भारत के कट्टर पक्षपोषक थे. उन्होंने दक्षिणपूर्व एशिया की देशीय संस्कृतियों की उपेक्षा की और उसके हिंदूकरण पर जोर दिया. कहना न होगा कि मजूमदार इतिहास के प्रति सांप्रदायिक दृष्टि के मुखर प्रवर्तक थे. उनकी ऐतिहासिक दृष्टि तुर्क सल्तनत की स्थापना संबंधी उनकी टिप्पणियों से स्पष्ट होती है:


पहली किस्तें : एक, दो
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अब तक के भारतीय इतिहास में पहली बार दो एकदम अलग-अलग, लेकिन प्रमुख समुदाय और संस्कृतियां एक -दूसरे के बिल्कुल रू-ब-रू खड़ी थीं और भारत दो शक्तिशाली इकाइयों में स्थायी रूप से विभाजित हो गया था, जिनमें से प्रत्येक इकाई की अपनी विशिष्ट पहचान थी, जो दोनों के किसी भी प्रकार के विलयन या दोनों के बीच किसी भी तरह की धनिष्ठ स्थायी समन्वय के लिए उपयुक्त नहीं थी. (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ दि इंडियन पीपुल-5, पृष्ठ-xxviii)
इस दृष्टि के आधार पर मजूमदार ने उन सभी लोगों को आड़े हाथों लिया है जो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भाईचारे और सद्भाव के उदाहरणों का उल्लेख करते थे. उन्होंने हिंदु और मुसलमान शासकों के सम्मिलित शासन के पूरे विचार को ही कठोरता से ठुकरा दिया. उनके अनुसार :

प्रमुख हिंदू राजनीतिक नेता यह उद्घोषित करने की स्थिति तक बढ़ गये कि मुसलिम हुकूमत के दौरान हिंदू कतई शासित जाति नहीं थे. इस तरह के बेढंगे विचार, जिन पर 19वीं शताब्दी के प्रारंभ के भारतीय नेता हंस ही सकते थे, उस शताब्दी के अंत में राजनीतिक जटिलताओं के तकाजों के कारण इतिहास का अंग बन गये. (वही,पृष्ठ xxix)

इतना ही नहीं मजूमदार के अनुसार, हिंदू शासक राजवंशों के पतन के बाद, मुसलिम हमलावरों और शासकों ने मंदिरों और मठों का लगभग पूरी तरह विनाश किया. इस तरह उन्होंने हिंदू संस्कृति को पोषित और पल्लवित करनेवाले स्रोतों को नष्ट करके उसका लगभग सफाया ही कर डाला. उसका आगे का विकास रुक गया तथा उसके ऊपर लगभग अभेद्य अंधकार छा गया. वह हिंदू संस्कृति के विकास के 'अचानक रुक जाने' की चर्चा इस प्रकार करते हैः '
अतीत के गौरव और संस्कृति की मशाल उत्तर में केवल मिथिला और दक्षिण में विजयनगर में ही जलाये रखी गयी. (वही पृष्ठ-xxxi).

मजूमदार का यह विचार कि मध्य एशिया से आये हमलावरों को सल्तनत काल के हिंदू विशुद्ध धार्मिक अथवा इसलामिक रूप में ही देखते थे, आधारहीन है. भारतीय लोग मध्य एशियाइयों और उनके शासन को नृवंशीय, सामाजिक और सांस्कृतिक समुदाय की प्रभुता के रूप में देखते थे. यही वजह है कि गाहड़वाल के अभिलेखों में तुरुष्कदंड का उल्लेख मिलता है, यानी ऐसा कर जो तुर्कों से लड़ने के लिए जनता पर लगाया गया था. क्षेत्रीय भाषाओं में अक्सर ही हमें तुरूक शब्द मिल जाता है और इससे ऐसे लोगों का बोध नहीं होता, जिनकी धार्मिक भिन्नता पर बल दिया गया हो. 'मुसलिम' और 'इसलाम' शब्द कदाचित ही प्रयुक्त हुए हैं. ऐसा भारतीय आर्य भाषाओं और साथ ही द्रविड़ भाषाओं, दोनों में मिलता है. दक्षिणवासी भी अक्सर सुल्तानों द्वारा भेजी गयी सेनाओं को तुर्क ही समझते थे. मजूमदार मिथिला में हिंदु संस्कृति की उदीप्त चमक की बात करते हैं पर मैथिली के महान कवि विद्यापति तो मिथिला के मुसलमानों के लिए हर जगह तुरुक शब्द का इस्तेमाल करते हैं. इस तरह मध्य एशियाई आक्रामकों के संबंध में मध्यकालीन हिंदू धारणा उनके धर्म पर जोर नहीं देती थी. वह आधुनिक काल के मजूमदार द्वारा प्रतिपादित पूर्णत: सांप्रदायिक धारणा से बिल्कुल भिन्न थी.


यह कहना कि 'इसलाम' ने हिंदू संस्कृति को लगभग पूरी तरह से विनष्ट कर दिया था, इतिहास का एक और मिथ्याकरण है. अगर हम आंतरिक और बाहरी कारकों की अनुक्रिया में भारतीय संस्कृति के विकास और संश्लेषण की प्रक्रिया को देखें तो पता चलता है कि मध्यकाल में संस्कृति की निश्चित तौर पर प्रगति हुई. खुद मजूमदार ने सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों के महत्व पर जोर दिया है. यहां हम भारतीय इसलामी कला, वास्तु, साहित्य आदि के विकास की, जिससे इतिहास के विद्यार्थी भली-भांति परिचित हैं, अधिक चर्चा नहीं करेंगे. पर यदि हम केवल ब्राह्मण संस्कृति और संस्कृत साहित्य के अध्ययन की प्रगति तथा भारतीय आर्य और द्रविड़ भाषाओं के विकास की समीक्षा करें, तब भी मध्यकाल भारतीय इतिहास का निर्विवाद रूप से महान रचनात्मक काल सिद्ध होगा. सुलतानों और मुगल राजाओं के शासनकाल में ही बंगाल सहित भारत के प्रत्येक महत्वपूर्ण क्षेत्र ने अपनी सांस्कृतिक पहचान विकसित की और इस तरह भारतीय संस्कृति के बहुरंगी वितान में अपना योगदान किया. असल में क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्य के विकास की दृष्टि से मध्यकाल सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय था. मजूमदार सोचते हैं कि हिंदू संस्कृति केवल दो अलग-अलग द्वीपवत क्षेत्रों में, उत्तर में मिथिला में और दक्षिण में विजयनगर में पुष्पित-पल्लवित हुई. पर संस्कृत की सबसे अधिक पांडुलिपियां हमें 'मुसलिम' शासित राज्य कश्मीर से प्राप्त हुई हैं, जहां के पंडितों को फारसी और संस्कृत दोनों में समान रूप से प्रवीणता प्राप्त थी. अगर तर्क यह है कि नालंदा की समस्त बौद्ध पांडुलिपियां मुसलमानों द्वारा नष्ट कर दी गयी थीं, तब गुजरात के सुलतानों के समय क्यों जैन पांडुलिपियों को भली-भांति संरक्षित रखा गया? ऐसी अधिकतर पांडुलिपियां, जिनके आधार पर प्राचीन भारतीय विरासत का उद्धार हुआ खास कर कश्मीर, पश्चिमी और दक्षिणी भारत तथा मिथिला और पूर्वी भारत में सुलतानों और मुगलों के शासन के दौरान, लिखी गयीं और संरिक्षत की गयीं. जिसे आधुनिक 'हिंदू नवजागरण' कहा जाता है, वह इन मध्यकालीन पांडुलिपियों के बिना संभव ही न हुआ होता.

तुर्क सुल्तानों और मुगल बादशाहों के शासनकाल में, मूल रचनाओं के अलावा न केवल महाकाव्यों, काव्यों, धर्मसूत्रों और स्मृतियां पर बल्कि श्रोतसूत्रों और गुह्यसूत्रों, दर्शन, तर्क शास्त्र, व्याकरण, खगोल विज्ञान, गणित आदि सहित वैदिक ग्रंथों पर भी अनेकानेक विद्वत्तापूर्ण टीकाएं लिखी गयीं. प्राचीन पाठों पर टीकाएं लिखने की प्रक्रिया में टीकाकारों ने काफी कुछ मौलिक योगदान किया. यही नहीं, तर्क शास्त्र की नव्यन्याय प्रणाली, जिसके लिए भारत प्रसिद्ध है न केवल मिथिला में विकसित हुई, बल्कि सुलतानों के शासन के अंतर्गत बंगाल में भी उसका विकास हुआ. धर्मशास्त्र के टीकाकारों ने समाज में हो चुके परिवर्तनों को यथोचित लक्षित किया और धर्मशास्त्र के प्रावधानों की तदनुसार व्याख्या करने का प्रयास किया. निश्चय ही भारत में उत्तर मध्यकाल के दौरान ठीक उस तरह की सामाजिक और आर्थिक प्रगति नहीं हुई, जिस तरह की ग्रति पश्चिमी यूरोप के देशों में हुई थी. किंतु यह बात लगभग संपूर्ण एशिया के बारे में सच है, जिसका कि केवल एक हिस्सा इसलामी शासकों के शासन के अंतर्गत था. फिर भारत में ही मुसलिम शासन को क्यों भला-बुरा कहा जाये? यह तो केवल सांप्रदायिक आधार पर ही किया जा सकता है.
क्रमशः
नोट :शब्दों पर जोर खुद आर एस शर्मा का है.

जब मुक्ति का युग शुरु होगा : सलाम भगत सिंह

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/28/2007 01:13:00 AM

भगत सिंह. एक ऐसा नाम जिसे याद करने के लिए हमें उसकी जयंती और शहादत दिवस का सहारा नहीं लेना पड़ता. वह हमारी रगों में है. और हम उसे उसी तरह याद भी करते हैं. वह एक कामरेड था. अलग से उस पर कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं है. बस एक बात, वह क्या बात थी भगत सिंह में कि उससे आज की राजसत्ता भी डरती है? एक बार सोचें.



उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारंभ होगा


भगत सिंह


मैं
इस संसार को मिथ्या नहीं मानता. मेरा देश, न परछाई है, न ही कोई मायाजाल. ये एक जीती-जागती हकीकत है. हसीन हकीकत और मैं इससे प्यार करता हूं. मेरे लिए इस धरती के अलावा न तो कोई और दुनिया है और न कोई स्वर्ग. यह सही है कि आज थोड़े से व्यक्तियों ने अपने स्वार्थ के लिए इस धरती को नर्क बना दिया है. लेकिन इसके साथ ही इसे काल्पनिक कह कर भागने से काम नहीं चलेगा. लुटेरों और दुनिया को गुलाम बनानेवालों को खत्म करके हमें इस पवित्र धरती पर वापिस स्वर्ग की स्थापना करनी होगी.

मैं पूछता हूं कि सर्वशक्तिमान होकर भी आपका भगवान अन्याय, अत्याचार, भूख, गरीबी, लूट-पाट, ऊंच-नीच, गुलामी, हिंसा, महामारी और युद्ध का अंत क्यों नहीं करता? इन सबकों खत्म करने की ताकत होते हुए भी वह मनुष्यों को इन शापों से मुक्त नहीं करता, तो निश्चय ही उसे अच्छा भगवान नहीं कहा जा सकता और अगर उसमें इन सब बुराइयों को खत्म करने की शक्ति नहीं है, तो वह सर्व शक्तिमान नहीं है.
अगर वह ये सारे खेल अपनी लीला दिखाने के लिए कर रहा है, तो निश्चय ही यह कहना पड़ेगा कि वह बेसहारा व्यक्तियों को तड़पा कर सजा देनेवाली एक निर्दयी और क्रूर सत्ता है और जनता के हित से उसका जल्द-से-जल्द खत्म हो जाना ही बेहतर है.

मायावाद, किस्मतवाद, ईश्वरवाद आदि को मैं चंद लुटेरों द्वारा साधारण जनता को बहलाने-फुसलाने के लिए खोजी गयी जहरीली घुट्टी से ज्यादा कुछ नहीं समझता. दुनिया में अभी तक जितना भी खून-खराबा धर्म के नाम पर धर्म के ठेकेदारों ने किया है, उतना शायद ही किसी और ने किया होगा. जो धर्म इनसान को इनसान से अलग करे, मोहब्बत की जगह एक-दूसरे के प्रति नफरत करना सिखाना, अंधविश्वास को उत्साहित करके लोगों के बौद्धिक विकास को रोक कर उनके दिमाग को विवेकहीन बनाना, वह कभी भी मेरा धर्म नहीं बन सकता.

हम भगवान, पुनर्जन्म, स्वर्ग, घमंड और भगवान द्वारा बनाये गये जीवन के हिसाब-किताब पर कोई विश्वास नहीं रखते. इन सब जीवन-मौत के बारे में हमें हमेशा पदार्थवादी ढंग से ही सोचना चाहिए. जिस दिन हमें भगवान के ऊपर विश्वास न करनेवाले बहुत सारे स्त्री-पुरुष मिल जायें जो केवल अपना जीवन मनुष्यता की सेवा और पीड़ित मनुष्य की भलाई के सिवाय और कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते. उसी दिन से मुक्ति के युग का शुभ आरंभ होगा. मैंने अराजकतावादी, कम्युनिज़्म के पितामह कार्ल मार्क्स, लेनिन, ट्राटस्की और अन्य के लिखे साहित्य को पढ़ा है. वो सारे नास्तिक थे. सन 1922 के आखिर तक मुझे इस बात पर विश्वास हो गया कि सर्वशक्तिमान परमात्मा की बात, जिसने ब्रह्मांड की संरचना की है, संचालन किया है, एक कोरी बकवास है.



हम भगत सिंह को हरियाणा के उस दलित नौजवान की तरह समझते हैं जो कहता है कि जैसे लड़ोगे, वैसे लड़ेंगे. दरअसल जो लोग संघर्ष के बारे में यह प्रश्न उठाते है कि वह हिंसात्मक होगा या अहिंसात्मक वे लोग सत्ता के साथ खड़े होते है. भगत सिंह का पूरा दर्शन कहीं भी और कभी भी नहीं कहता है कि हिंसा ही एक रास्ता है. उन्होंने बम भी फेंका और अनशन भी किये. बुनियादी परिवर्तन करनेवाले सूत्र भगत सिंह के दर्शन में मिलते हैं.

-अनिल चमड़िया
(अनिल चमडिया से यह पूरी बातचीत पढिए जल्दी ही हाशिया पर.)


भारत-पाकिस्तान का साझा नायक भगत सिंह


हुसैन कच्छी


गत सिंह हीरो है, भारत-पाकिस्तान का इकलौता संयुक्त हीरो, एक प्रिंस चारमिंग अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ उपमहाद्वीप में साझा संग्राम का नायक निर्विवाद और उसके चाहनेवाले पेशावर से चात्गाम तक फैले हुए हैं. पाकिस्तान के पिछले सफर में मैंने ये बातें सुनीं, जब अलाप संस्था के निमंत्रण पर लाहौर में आयोजित तीन द्विवसीय इंटर फेथ रिलेशंस फैसटीबल में शिरकत के लिए गया था. अल हमरा ऑर्ट सेंटर में मुल्क भर से आमंत्रित अलग-अलग धर्मों के माननेवाले आये थे. इनसानदोस्ती और मुहब्बतों से डूबे लोगों का मेला था. सूफियान नगमों, गीतों की बारिश हो रही थी, सब एक -दूसरे की बांहों में बाहें डाले झूम रहे थे व गा रहे थे. इसी माहौल में मेरी मुलाकात गुरमीत सिंह से हो गयी. गुरमीत पाकिस्तान के नागरिक हैं.

उनका घर भगतसिंह के पैतृक गांव के पास ही है. लायलपुर (अब फैसलाबाद) के तहसील जड़ांवाला के चॉक न. 105 ग्राम बंगा में 28 सितंबर, 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ. हम आज भगत की जन्मशती मना रहे हैं. पिछले वर्ष गुरमीत ने भगत सिंह के जन्म दिवस पर जड़ांवाला में सांस्कृतिक कार्यक्रम और भगत सिंह मेमोरियल कबड्डी टूर्नामेंट का आयोजन कि या था, जिसमें प्रशासन के सहयोग से कई टीमों ने हिस्सा लिया और पंजाबी टीवी चैनल पर उसका प्रसारण भी किया गया था. गुरमीत सिंह कुछ वर्षों से भगत सिंह के जीवन और उनके आंदोलन पर काम कर रहे हैं. वे इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि भगत सिंह का घर राष्ट्रीय स्मारक घोषित हो. लाहौर किला, जहां भगत सिंह को कैद रखा गया था और दरिया-ए-सतलुज के किनारे भगत सिंह की यादगार कायम की जाये. इसके लिए सरकार से उनकी वार्ता जारी है. उन्होंने बताया भारत सरकार की ओर से भी इस मुद्दे पर चर्चा की उन्हें सूचना है. चूंकि पाकिस्तान में भगत सिंह के किसी रिश्तेदार के होने की कोई खबर नहीं और उन्हें अमर शहीद पर अभी बहुत सूचनाएं एकत्रित करनी हैं, इसलिए वे भारत में भगत सिंह के रिश्तेदारों से मिलने का प्रोग्राम बना रहे हैं. अनेक रिश्तेदारों का अता-पता वह जमा कर रहे हैं.

पाकिस्तान में भगत सिंह के विषय पर गहरी रुचि का अनुभव हुआ, समय-समय पर अब अखबारों में उनकी गाथाएं छपती हैं. अहमद सलीम की दो किताबें भगत सिंह, जीवन के आदर्श 1973 और 1986 में छपी भगत सिंह देखने को मिली. इसके अलावा अजय घोष की पुस्तिका भगत सिंह और उसके साथी का उर्दू अनुवाद भी उपलब्ध है. प्रोफेसर नसरीन अंजुम भट्टी, अधिवक्ता आफताब जावेद, शिराज राज ने बताया कि भगत सिंह पर आधारित भारतीय फिल्में इस लगन और दिलचस्पी से देखी जाती हैं कि ये साड्डे (अपने) भगत सिंह की कहानी है. भगत साड्डा हीरो है, बहुत बड़ा और निर्विवाद हीरो, जिस पर कोई बहस नहीं और जिसकी कुर्बानी बेमिसाल है, पेशावर से चात्गाम तक भगत हर मां का बेटा है, सबका भाई है. हमें गर्व है कि भगत हमारी मिट्टी का सपूत है, वे कहते हैं कि आजादी के लिए उपमहाद्वीप के साझा संग्राम का वही एक मात्र लीडर है, जिसके लिए सरहद के दोनों तरफ एक से जज्बात हैं. अब खबर आयी कि भगत सिंह जन्मशती के मौके पर पाकिस्तान सरकार ने उनकी यादगार कायम करने का फैसला किया है, इसका चौतरफा स्वागत हुआ. अखबारों ने संपादकीय लिख कर इसकी सराहना की है. भाई गुरमीत से संपर्क बना हुआ है वे पूरे जोश खरोश से वहां आयोजित होनेवाले कार्यक्रमों में व्यस्त हैं, फुरसत पाते ही भारत आयेंगे, तो और जानकारी मिलेगी. भगत सिंह का त्याग बोल रहा है कि नफरतों के बीज बोनेवाले तो जा चुके हैं. अब साझा संस्कृति के वारिसों के दरम्यान गलतफहमी क्यों है? जो दिलों को जोड़ दें उस इंकलाब को जिंदाबाद किया जाये.
कच्छी जी का यह आलेख प्रभात खबर से साभार.

सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता-2

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/27/2007 11:58:00 AM

आज देखते हैं कि किस तरह देश के इतिहास को विकृत किया गया और उसमें आधारहीन बातों की मिलावट की गयी, जिनके आधार पर आज फ़ासिस्ट सांप्रदायिक गिरोह अपनी स्थापनाएं प्रस्तुत करते हैं. दूसरी किस्त.

प्रोफेसर आरएस शर्मा
मय-समय पर, जब धर्म के पुराने सिद्धांत बदलती हुई सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में संगत नहीं रह जाते, तो धर्मों में सुधार करने तथा उनके अनुयायियों से उन्हें स्वीकार्य बनाने के लिए आंदोलन चलाये जाते हैं.
आधुनिक काल में आर्य समाज, प्रार्थना समाज और ब्रह्म समाज इसके महत्वपूर्ण उदाहरण है. इनमें से आर्यसमाज आंदोलन सर्वाधिक महत्वपूर्ण जान पड़ता है. आर्यसमाज आंदोलन ने महिलाओं और शूद्रों पर, जिन पर कि वेदों का पठन-पाठन करने की पाबंदी थी और खास करके महिलाओं पर, जिन्हें कि बालविवाह व आजीवन वैधव्य का शिकार बनाया जाता था, लगायी गयी पाबंदियों के विरुद्ध अभियान चलाया. उसने मूर्ति पूजा का विरोध किया और उससे जनित बुराइयों के खिलाफ संघर्ष चलाया. आर्यसमाजियों ने काफी शोघ और अनुसंधान किया तथा अन्य सुधारकों के साथ मिल कर प्राचीन ग्रंथों से, खास कर वेदों से, अनेक ऐसे उदाहरण एकत्र किये, जिनसे हिंदू समाज में महिलाओं और निचले तबकों की स्थिति को ऊपर उठाने के लिए समर्थन प्राप्त हो. पर अब आर्यसमाज के प्रारंभिक संस्थापकों द्वारा हिंदू समाज के सुधार के लिए दरसाया गया, उत्साह नहीं रहा. उसकी जगह मुसलिम विरोधी अभियान ने ले ली है. इससे भी बुरी बात यह कि संसार के सारे बुद्धि-वैभव और उपलब्धियों को, आंख बंद कर, वेदों में ही स्वीकार करने की विचारग्रस्तता हावी है. इस तरह के प्रचार को कोई भी इतिहासकार, जिसे अपने को तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित करना होता है, गले के चे नहीं उतार सकता. जब तक इस तरह के घृणित प्रचार का तथ्यों और आंकड़ों द्वारा प्रतिकार नहीं किया जाता, जिनकी प्राचीन ग्रंथों में कोई कमी नहीं, तब तक शिक्षित समुदाय के लोगों दिमागों के संप्रदायीकरण को नहीं रोका जा सकता और शिक्षितों के प्रभाव में रहनेवाले साधारणजनों को भी भ्रमित होने से बचाया नहीं जा सकता. अन्य कारणों के साथ इस तरह के जहरीले धार्मिक प्रचार के चलते ही मध्यकाल में जेहाद हुए और कैथोलिकों व प्रोटेस्टेटों के बीच धर्मोन्मादपूर्ण युद्ध हुए. इस समय इस तरह का प्रचार भारत की राष्ट्रीय एकता के ध्येय के लिए खतरा खड़ा करता है.

पहली किस्त यहां पढें

औपनिवेशिक आधिपत्य के तहत एशियाई देशों के राष्ट्रवादियों ने, जो उस समय सभ्य देश बन चुके थे, जब औपनिवेशिक देश सांस्कृतिक रूप से बहुत पिछड़े हुए थे-स्वभावत: अपने अतीत से प्रेरणा ग्रहण की. भारत, अरब देशों, तुर्की और कई अन्य देशों में अभी यही हुआ. स्वतंत्रता सेनानी अपने देश के सामंती पिछड़ेपन तथा अपने शासकों की औद्योगिक -पूंजीवादी प्रगति से जरा भी विचलित नहीं हुए. उपनिवेदशवादियों की हुकूमत का प्रतिरोध करने के लिए उन्होंने अतीत की अपने देश की उपलब्धियों को याद किया. इनसे उन्होंने विश्वास और प्रेरणा हासिल की. भारत में और अन्यत्र यह कार्य कुछ खतरा मोल लेकर इतिहासकारों ने किया. अपने निरंकुश शासन को न्यायोचित ठहराने के लिए ब्रिटिश इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि भारतीय स्वशासन चला सकने में असमर्थ हैं और यह कि वे अपने समूचे इतिहास के दौरान निरंकुश सत्ता के आदी रहे है. इसके जवाब में भारतीय इतिहासकारों ने यह दरसाने की कोशिश की कि भारत में स्थानीय स्तर पर और राज्य स्तर पर भी, अनेक स्वशासित संस्थाओं का अस्तित्व रहा है. ब्रिटिश इतिहासकारों ने खास तौर से और पश्चिमी इतिहासकारों ने आम तौर से यह दावा किया कि सभ्यता के अनेक तत्व भारत में बाहर से आये थे. इसके जवाब में भारतीय राष्ट्रीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि उनकी संस्थाएं और सांस्कृतिक तत्व विशुद्ध देशीय थे. निस्संदेह, भारत के अतीत को अंगरेज़ों द्वारा मलिन करने के प्रत्युत्तरस्वरूप अच्छा शोध कार्य किया गया. राष्ट्रवादियों द्वारा भारत के अतीत की जो खोज की गयी, उसने देश के इतिहास के अनेक पक्षों को उजागर किया, किंतु साथ ही पुनरुत्थानवाद के कतिपय प्रबल तत्वों को भी उछाला.

प्राचीन भारत का अध्ययन करनेवाले कुछ प्रमुख इतिहासकारों में, जिन्होंने देशभक्तिपूर्ण स्थिति अपनाने का प्रयास किया, काशीप्रसाद जायसवाल, हेमचंद्र रायचौधरी और केए नीलकंठ शास्त्री आते हैं. जायसवाल पहले इतिहासकार थे, जिन्होंने प्राचीन भारत में गणतंत्रों के अस्तित्व के बारे में ठोस प्रमाण प्रस्तुत किये. इसी तरह नीलकंठ शास्त्री ने सबसे पहले चोलों और पल्लवों के तहत ग्राम और जिला स्तरों पर स्वशासन संस्थानाओं के महत्व को रेखांकित किया. ऐसे अनुसंधानों ने निश्चत ही उन लोगों की वाणी को मुखर किया, जो अंगरेजों की इस बात का खंडन करना चाहते थे कि भारत में निरंकुश शासन की ही परंपरा रही है. पर कभी-कभी ये लेखक विज्ञानसम्मत ऐतिहासिक पुनर्रचना की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाते थे. जायसवाल ने हिंदू राज्यतंत्र नामक अपनी पुस्तक का समापन इस सूक्ति से किया: जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी, जिसका अर्थ है कि जननी तथा जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है. उन्होंने प्राचीन भारतीय राजनीतिक संस्थाओं का बड़ा ही प्रेरणाप्रद वर्णन प्रस्तुत किया. नीलकंठ शास्त्री ने तो ब्राह्मणों की सांस्कृतिक सर्वोच्चता तक पर जोर दिया है और कहीं-कहीं यह माना है कि हिंदू मुसलमानों से अधिक सहिष्णु थे, एक ऐसी उक्ति जो अब संप्रदायवादियों के बीच काफी चल पड़ी. जायसवाल, नीलकंठ शास्त्री और अन्य इतिहासकारों ने शकों और मौर्य युग के बाद भारत आनेवाले अन्य लोगों के विजातीय चरित्र पर भी जोर दिया. के गोपालाचारी ने सातवाहनों की इस बात के लिए सराहना की कि उन्होंने शकों को इस आधार पर भारत में अपना पैर नहीं जमाने दिया कि वे विदेशी थे. इस तरह उनलोगों तक को, जो स्थायी रूप से भारत में बस गये और उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का अभिन्न अंग बन गये, विदेशी कहने का यह रवैया अब कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है तथा हिंदू संप्रदायवादी बार-बार मुसलमानों को विदेशी कहते हैं.
क्रमशः

सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/26/2007 12:11:00 AM

ज्यों-ज्यों और जब-जब सत्ता का संकट गहराता है, धर्म और सांप्रदायिक राजनीति की शरण में पूरी व्यवस्था चली जाती है. याद करिए 1991-1992 का दौर, जब देश पर आर्थिक उदारीकरण के रूप में नव उदारवाद थोपा जा रहा था, सांप्रदायिक राजनीति उफान पर थी. आम लोग लोग मंदिर-मसज़िद के चक्कर में पडे़ थे और देश में अमेरिकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप मज़बूत हो रहा था. बाज़ार खोले जा रहे थे और लोगों की जेब तक बहुराष्ट्रीय पंजों की पहुंच संभव बना दी गयी थी. यह केवल एक उदाहरण है. उसके पहले और उसके बाद भी, जब-जब राजसत्ता संकट में फंसी है और उससे निकलना मुश्किल लगा है-धर्म ने उसकी मदद की है-यह एक ऐतिहासिक तथ्य है. अभी, जब सरकार को लगा कि वह परमाणु करार पर फंस रही है, रामसेतु सामने आया. यहां साफ़ होना चाहिए कि यह संकट तथाकथित वामदलों की तरफ़ से नहीं था, बल्कि वामदलों ने किसी भी तरह का संकट नहीं खडा़ किया, वे तो बस नूराकुश्ती करते रहे. उन्होंने वे असली सवाल खड़े ही नहीं किये जो इस करार के संदर्भ में किये जाने चाहिए थे. कुल मिला कर वाम दलों ने विरोध का दिखावा किया (उनसे हम इसके अलावा किसी और चीज़ की अपेक्षा भी नहीं करते). संकट यह था कि सरकार (मतलब यह पूरी व्यवस्था ही) लोगों के सामने इसके लिए बेपर्द हो रही थी कि उसने अमेरिका के सामने घुटने टेक दिये थे और लोग देख रहे थे कि इस 'महाशक्ति' को एक अदना-सा अमेरिकी अधिकारी भी घुड़क सकता था. वाम दल अब नौटंकी करते-करते थक चुके थे और कोई दूसरी स्क्रिप्ट उन्हें नहीं मिल पा रही थी. रामसेतु इसी मौके पर त्राता के रूप में सामने आया.

मगर रामसेतु ने कई और सवाल भी खडे़ किये. इस पूरे प्रसंग पर लोगों ने यह कहा कि किसी की आस्था से छेड़्छाड़ ठीक नहीं. बिलकुल. आस्थाओं से क्यों छेड़छाड़ हो? यह ज़रूरी भी नहीं. कोई कुछ भी आस्था रखे, इससे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मगर जब इसी आस्था के नाम पर हज़ारों-लाखों का कत्लेआम किया जाने लगे (किया जा चुका ही है) तो इस आस्था को माफ नहीं किया जाना चाहिए. यह किसी की भी आस्था हो सकती है कि राम हुए थे, मगर इसे लेकर जब वह हत्याकांड रचने लगे तो फिर उसे यह बताना ज़रूरी है कि वह गलती पर है. ऐतिहासिक तौर पर यह साबित नहीं होता कि राम और कृष्ण का अस्तित्व था. कोई कुछ भी कहता और मानता रहे, वह मानने को आज़ाद है. मगर इससे इतिहास लिखनेवाले और वैज्ञानिक नज़रिया रखनेवाले अपनी धारणा क्यों बदलें? क्या एएसआइ यह मान ले कि राम का अस्तित्व था? भगवा ब्रिगेड तो यही चाहता है.
प्रोफेसर रामशरण शर्मा
प्राचीन भारत के इतिहास के प्रख्यात विद्वान हैं. वे उन इतिहासकारों में से हैं, जिन्होंने प्राचीन भारत के बारे में पुरानी धारणाओं और नज़रिये को बिल्कुल बदल डाला. इसीलिए वे हमेशा से भगवा ब्रिगेड के निशाने पर रहे हैं. उनपर कई जानलेवा हमले तक किये गये हैं. इस व्योवृद्ध इतिहासकार का एक लंबा व्याख्यान हम किस्तों में यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति के विभिन्न आयामों और राम-कृष्ण की ऐतिहासिकता पर विस्तार से चर्चा की है. यह व्याख्यान उन्होंने 1990 में काकतिया विश्वविद्यालय में हुए आंध्र प्रदेश इतिहास कांग्रेस के 14वें अधिवेशन में दिया था. इसका अनुवाद यश चौहान ने किया है. व्याख्यान का प्रकाशन पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने किया है. साभार प्रस्तुति.


सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या

आरएस शर्मा

ब राजनीतिक उद्देश्य से धर्म के नाम पर उसके अनुयायियों को उभारा जाता है तब सांप्रदायिकता का उदय होता है. अपने संप्रदाय की सुरक्षा के नाम पर दूसरे संप्रदाय के लोगों को सताना भी सांप्रदायिकता है. भारत में संप्रदायवाद को खास तौर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंधों की प्रकृति की रोशनी में देखा जाता है, हालांकि हाल में सिख धर्म के आधार पर संगठित समुदाय को भी जोरों से उभारने की चेष्टा चल रही है.
प्रकृति द्वारा खड़ी की गयी बाधाओं को हटाने के लिए मानव को अनवरत संघर्ष करना पड़ता है, जिससे धार्मिक विश्वास, कर्मकांड और रीति-रिवाजों का उदय और विकास होता है. उसी प्रकार सामाजिक मसलों पर मानव के विरुद्ध मानव के संघर्ष में भी धर्म और कर्मकांड उभरते व विकसित होते हैं. जब लोगों के लिए प्रकृति द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों की युक्तिपूर्वक विवेचना कर पाना कठिन हो जाता है, तो वे चमत्कारिक और अंधविश्वासपूर्ण स्पष्टीकरणों का सहारा लेने लगते हैं. इन्हीं से जन्म लेते हैं, अनेकानेक देवी-देवता. ऋग्वेद में वर्णित अधिकतर देव प्रकृति की या तो उपकारी या फिर अपकारी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

फिर जब किसानों, दस्तकारों और अन्य मेहतकशों की कमाई पर आधारित अपनी सत्ता और विशेषाधिकारों को बरकरार रखने में विशेषाधिकार-संपन्न लोग कठिनाई अनुभव करते हैं, तो वे कर तथा खिराज वसूल करने के लिए अंधविश्वास के इस्तेमाल के तरीके ढूंढ़ निकालते हैं. इसी तरह जब अभावों के बोझ से पिस रहे जनसमुदाय सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं, तो वे देवता को सहायता के लिए पुकारते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास कराया जाता है कि देवता ने मुक्त और समान मानव प्राणियों का सृजन किया है. इस तरह, धर्म का प्रयोग समाज के विशेषाधिकार संपन्न और सुविधाहीन वर्ग, दोनों करते हैं. पर यह कार्य अधिकतर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग करते हैं, क्योंकि उनकी विचारधारा, जैसाकि भारतीय स्थिति में दरसाया जा सकता है, प्रभुत्वपूर्ण विचारधारा में तब्दील कर दी जाती है और जनता के दिलो-दिमाग में गहरे बिठा दी जाती है.

प्राचीन और मध्यकाल के पूंजीवाद पूर्व के समाजों में धर्म ने वही भूमिका निभायी, जो भूमिका आधुनिक काल के पूंजीवादी और अन्य समाजों में विभिन्न प्रकार की विचारधाराएं निभा रही हैं. इस कथन का आशय यह नहीं कि पूंजीवाद पूर्व के राज्य धर्म शासित राज्य थे. उनकी नीतियां अधिकतर शासक वर्ग के आर्थिक व राजनीतिक हितों से निर्देशित होती थीं और खुद धर्म का इस्तेमाल इसी प्रयोजन से किया जाता था. इस तरह बौद्ध, ईसाई और इसलाम जैसे धर्मों के उदय ने और भी स्वस्थ दिशाओं में समाज व अर्थतंत्र में सुधार लाने व उसे पुनर्गठित करने में सहायता पहुंचायी. धर्मों द्वारा प्रतिपादित सामाजिक मानदंडों ने बेहतर सामाजिक प्रणालियां निर्मित करने के लिए जनता को प्रेरित किया. पर यह बात समझ लेनी चाहिए कि प्रत्येक धर्म खास किस्म के सामाजिक वातावरण की उपज होता है. इस तरह, बौद्ध धर्म द्वारा आम तौर पर समस्त प्राणियों और विशेष कर गायों की रक्षा पर जो जोर दिया गया, उससे ऐसे समय में सहायता मिली जब लगभग ईसा पूर्व 500 के बाद, गंगा के मध्य मैदानी भागों में बड़े पैमाने पर खेती में लौह उपकरणों का इस्तेमाल होने लगा था. लेकिन बौद्ध धर्म ने उन वर्ण आधारित भेदों को नहीं मिटाया, जो समाज के विभिन्न हिस्सों के बीच अतिरिक्त उत्पाद (अधिशेष) के असमान वितरण के फलस्वरूप पैदा हो गये थे. ब्राह्मण धर्म ने गाय की रक्षा के विचार पर ध्यान केंद्रित करके बौद्ध धर्म के हाथ से पहल छीन ली. बड़ी ही चालाकी से उसने यह घोषणा भी कर डाली कि ब्राह्मणों का जीवन भी गाय की तरह अति पवित्र है और फिर इस विचार को पुर्नजन्म के विचार के साथ जनता के दिमाग में ठोंक-पीट कर बैठा दिया गया. स्पष्ट ही, गाय की रक्षा के सिद्धांत ने उन जनजातीय क्षेत्रों में हल आधारित कृषि और पशुपालन को काफी उन्नत किया, जो क्षेत्र विजित करके और भूमि अनुदानों के जरिये, ब्राह्मणों के प्रभाव के तहत आ गये थे. लेकिन अब कृषि तकनीक में उल्लेखनीय प्रगति के साथ सुरक्षा में प्राथमिकता की दृष्टि से स्वभावत: ही, मवेशी काफी पीछे रह गये हैं. आज पवित्र गाय का सिद्धांत हमारी आर्थिक प्रगति में अवरोध बन जाता है. हम या तो ऐसे पशुओं का ही पेट भरें जो आर्थिक रूप से अलाभकारी और अनुत्पादक हैं और या फिर उत्पादक कार्यों में संलग्न इनसानों का ही. इस बात पर अनेक प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने जोर दिया है. इस प्रकार हम भौतिक जीवन और विचारधारा की शक्ति के तकाजों के बीच परस्पर क्रिया को देख सकते हैं. पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि आरंभिक इतिहास में बौद्ध धर्म ने सकारात्मक भूमिका निभायी और समाज को गति प्रदान की.

इसी तरह ईसाई धर्म ने दास और स्वामी के बीच समानता के सिद्धांतों का प्रचार किया, दोनों को ईश्वर की दुनिया में एक ही कोटि का प्राणी घोषित किया, पर रोमन साम्राज्य ने इस दोनों के बीच मौजूद वास्तविक सामाजिक विभेद का उन्मूलन करने के लिए कुछ भी नहीं किया. इसलाम धर्म ने विभिन्न अरब कबीलों और जनजातियों को एक ही राज्य में जोड़ कर प्रगतिशील भूमिका अदा की और उनके बीच लगातार चलनेवाले कबीलाई झगड़े-फसादों को काफी हद तक कम कर दिया. उसने अमीर और गरीब के बीच समानता के सिद्धांतों का भी प्रचार किया और यह आग्रह किया कि जकात (दान) व करों के जरिये अमीरों को गरीबों की मदद करनी चाहिए. पर इसलाम भी अपनी जन्मभूमि में मौजूद सामाजिक वास्तविकता की उपेक्षा न कर सका और उसे अपने अनुयायियों को अधिकतम चार पत्नियां रखने की अनुमति देनी पड़ी. यह कबीलाई मुखियों द्वारा 20-30 या उससे भी अधिक पत्नियां रखने से निश्चय ही बेहतर था. हालांकि इसलाम मूर्ति पूजा के खिलाफ था, पर उसे भी इसलाम पूर्व के मक्का में स्थापित संगे असवद की पवित्रता को स्वीकार करना पड़ा. अत: धर्मों को उन सामाजिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता, जिनमें वे जन्म लेते हैं.
क्रमशः

सिमरिया का सच - हुंकार का तिरस्कार

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/24/2007 12:10:00 AM

दिनभर सिमरिया में रह कर लौटा हूं. भाई रामाज्ञा राय शशिधर ने एक बडा़ आयोजन करवाया. मैनेजर पांडेय, अरुण कमल और अवधेश प्रधान ने रामधारी सिंह दिनकर पर बहुत कुछ अनकहा कहा. खैर वह सब एक ओर. भाई अपूर्व कृष्ण पिछले साल सिमरिया गये थे और उन्होंने कविता, दिनकर और सिमरिया को समेटते हुए एक दिलचस्प लेख लिखा है. वे बीबीसी हिंदी में हैं. प्रस्तुत है यह लेख. साथ की तसवीरें भी उन्हीं की खींची हुई हैं. हां एक बात इसी के साथ कि सिमरिया में इस एक साल में दो बदलाव आये हैं. एक-आज जब हम गये तो सड़क बन रही थी-क्योंकि गांव में कल (सोमवार को) कई मंत्री आनेवाले हैं. दूसरा यह कि वह घर जहां दिनकर जन्मे थे, अब नहीं रहा. उसे तोड़ कर अभी एक पक्के मकान का निर्माण हो रहा है. एक दालान बचा हुआ है जिसे दिनकर जी ने बनवाया था.

सिमरिया का सच - हुंकार का तिरस्कार
अपूर्व कृष्ण
कविता क्या है?...किसी धीर-गंभीर-चिंताजीवी-चिंतनजीवी से लगनेवाले प्राणी से ये सवाल किया जाए तो उत्तर में आत्मानुभूति-अनूभुति, अभिव्यक्ति-आत्माभिव्यक्ति आदि भारी-भरकम शब्दों के इर्द-गिर्द रहनेवाला एक उत्तर मिलने की संभावना सौ नहीं तो निन्यानवे प्रतिशत तो अवश्य रहेगी।























घर जिसमें दिनकर जन्मे थे. कुछ ही हफ़्ते पहले यह तोड़ दिया गया है.


लेकिन सामान्य प्राणियों की दुनिया में बिल्कुल नीचे से शुरू किया जाए तो किसी छुटके से स्कूली बच्चे के लिए कविता क्या है?...वो छुटकू तो तब अपने भाव को व्यक्त भी नहीं कर सकता। लेकिन थोड़ी उम्र होने पर शायद इस तरह की कुछ परिभाषा आएगी कि – ‘कविता कुछ ऐसी पंक्तियाँ थीं जिन्हें रटकर उगलना ज़रूरी था, ताकि परीक्षा में पास हुआ जा सके’। थोड़ा ऊपर की श्रेणी में जाएँ, जब छुटकू एक टीनएजर या किशोर बन जाता है, तो उसके लिए कविता ‘साहित्य-सरिता’ या ‘भाषा-सरिता’ जैसी पाठ्य-पुस्तकों में शामिल ऐसी पंक्तियाँ बन जाती हैं, जिनको रटने से ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है उनकी व्याख्या को रटना। कवि ने कविता क्यों लिखी, इसको समझना, या रटना। वो भी गेस के हिसाब से, कि पिछले साल निराला की ‘भिक्षुक’ आ गई थी इसलिए उसे पढ़ना बेकार है। इस साल तो दिनकर की ‘शक्ति और क्षमा’ या बच्चन की ‘पथ की पहचान’ में से कोई एक लड़ेगी...फिर स्कूली शिक्षा समाप्त, जबरिया कविता की पढ़ाई समाप्त!


लेकिन छुटकू जब बड़ा होकर कॉलेज में आता है तो भी कविता से ख़ुदरा-ख़ुदरी वास्ता पड़ता ही रहता है। मसलन कोई वाद-विवाद प्रतियोगिता हो, कोई लेख हो, तो उसमें छौंक लगाने के लिए कहीं से छान-छूनकर दो-चार पंक्तियाँ लगाने के लिए कविता की आवश्यकता पड़ती है। एक तो भाषण में, लेख में चार चाँद लग जाएँगे, ऊपर से इंप्रेशन भी जमेगा, कि लड़का पढ़ने-लिखनेवाला है।


कुछ इसी तरह के माहौल में दिनकर जी की कविताओं से मेरा परिचय हुआ। स्कूली दिनों में दिनकर जी की कौन-सी कविता पढ़ी, बिल्कुल याद नहीं, ये भी हो सकता है कि उस साल दिनकर जी की कविता गेस में नहीं हो, इसलिए देखी तक नहीं। अलबत्ता एक लड़का था स्कूल में, जिसके बारे में चर्चा थी या कोरी अफ़वाह, कि वो दिनकर जी का नाती है। मैं भी लड़के को देखकर आया, लेकिन मुझे उसमें, एक छात्र जो अपढ़ाकू था, एक क्रिकेटर जो अगंभीर खिलाड़ी था और एक वाचाल जिसकी भाषा अश्लील थी, इसके सिवा कुछ ना दिखा। मगर हुआ ये कि दिनकर मेरे लिए पहेली अवश्य बन गए, बल्कि दिनकर जी का पहला इंप्रेशन तो निहायती अप्रभावकारी सिद्ध हुआ।



बहरहाल, कॉलेज के दिनों में भाषण और लेख में छौंक डालने के अभियान के दौरान मुझे - कविता क्या है - इस प्रश्न का उत्तर मिल गया। कविता मेरे लिए कुछ वे पंक्तियाँ बन गईं जो आपको हिलाकर रख दे, एक छोटा-सा ही सही, मगर झटका ज़रूर दे, आपकी तंद्रा भंग कर दे, आपको आत्मशक्ति दे, आपका नैतिक विश्वास डगमग ना होने दे, आपको एक अच्छा इंसान बनाने में मदद करे। और कविता की इस शक्ति से मेरा साक्षात्कार कराया दिनकर जी की कविताओं ने, जिनका एक कथन बाद में पढ़ा कि – “कविता गाकर रिझाने के लिए नहीं बल्कि पढ़कर खो जाने के लिए है”।


तब पढ़ी हुईं उनकी कुछ पंक्तियाँ ऐसे ही याद हो गईं, बिना रट्टा मारे! छोटे-छोटे काग़ज़ के पर्चों पर स्केच पेन से लिखकर उनकी इन कुछ पंक्तियों को साथ रखा करता था –


“धरकर चरण विजित श्रृंगों पर, झंडा वही उड़ाते हैं,

अपनी ही ऊँगली पर जो, खंजर की ज़ंग छुड़ाते हैं,

पड़ी समय से होड़, खींच मत तलवों से काँटे रूककर,

फ़ूँक-फ़ूँक चलती ना जवानी, चोटों से बचकर, झुककर.”


और एक कविता से कुछ पंक्तियाँ थीं –


“तुम एक अनल कण हो केवल,

अनुकूल हवा लेकिन पाकर,

छप्पड़ तक उड़कर जा सकते,

अंबर में आग लगा सकते,

ज्वाला प्रचंड फैलाती है,

एक छोटी सी चिनगारी भी.”


एक और कविता थी –


“तुम रजनी के चाँद बनोगे, या दिन के मार्तंड प्रखर,

एक बात है मुझे पूछनी, फूल बनोगे या पत्थर?

तेल-फुलेल-क्रीम-कंघी से नकली रूप सजाओगे,

या असली सौंदर्य लहू का आनन पर चमकाओगे?”


पता नहीं साहित्य के धुरंधरों की दुनिया में इन पंक्तियों का कितना महत्व है, लेकिन एक सामान्य छात्र की सामान्य दुनिया में ये पंक्तियाँ कई कमज़ोर पलों का सहारा बनीं।



फिर छह साल बाद जब बीबीसी हिंदी सेवा के लिए काम करने लंदन आया तो एक दिन एक पुराने वरिष्ठ सहयोगी से पूछा कि क्या बीबीसी ने कभी दिनकर जी से कोई इंटरव्यू लिया था जो मैं सुन सकूँ। पता चला कि प्रख्यात प्रस्तुतकर्ता ओंकारनाथ श्रीवास्तव जी ने एक बार लंदन में ही दिनकर जी का इंटरव्यू लिया था और उसकी कॉपी ओंकार जी के पास होनी चाहिए जो तबतक अवकाश प्राप्त कर चुके थे मगर बीच-बीच में बीबीसी के दफ़्तर आते थे। आख़िर मैंने श्रद्धेय ओंकार जी से एक दिन अपनी इच्छा बताई और मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा जब कुछ ही दिन बाद उन्होंने बिना किसी मान-मनौव्वल के अपनी जानी-पहचानी मुस्कुराहट के साथ दिनकर जी के इंटरव्यू का एक कैसेट लाकर मुझे सौंप दिया और ये भी बताया कि दिनकर जी का डील-डौल और व्यक्तित्व कितना प्रभावोत्पादक था। इस घटना के कुछ अर्से बाद ओंकार जी का स्वर्गवास हो गया। उनका वो अमूल्य उपहार अभी भी मेरे पास रखा है।


अब दिनकर जी की कद-काया के बारे में तो मैं दूसरों से ही सुन सकता था, लेकिन उनकी आवाज़ सुनने का मौक़ा मेरे सामने प्रस्तुत था। और सचमुच दिनकर जी की आवाज़ में वही गर्जना थी, वही तेज़, वही आह्वान जो उनकी कविताओं में महसूस किया जाता रहा है...


“सुनूँ क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, कि स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं...” (स्कूली दिनों में सुना था कि एक किसी चटकारे प्रसंग में दिनकर जी ने ख़ुद कहा, या उन्हें किसी ने कहा इसी कविता के संदर्भ में दिनकर जी के गाँव का नाम लेते हुए कि – “सुनूँ क्या बंधु मैं गर्जन तुम्हारा, कि स्वयं सिमरिया का भूमिहार हूँ मैं”)


तो इस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में दिनकर जी से नाता बना रहा। कभी “रश्मिरथी”, तो कभी “कुरूक्षेत्र”, तो कभी “हुँकार” को उलटता-पलटता रहा। “संस्कृति के चार अध्याय” को भी पढ़ गया जिसके आरंभ में नेहरू जी के साथ बेलाग ठहाका लगाते हुई उनकी तस्वीर है।


लेकिन मन में इच्छा थी उस माटी को देखने की जिसने दिनकर जी को पैदा किया, पाला-पोसा, आशीष दिया। ये इच्छा पूरी हुई पिछले साल दिसंबर में, जब काम के सिलसिले में बेगूसराय गया। बरौनी ज़ीरो माइल से राजेंद्र पुल की ओर बढ़ने पर बीहट बाज़ार के पास एक बड़ा सा गेट दिखा जिसपर दिनकर द्वार लिखा था, और उनकी कुछ कविताएँ भी लिखीं थीं। मैं रोमाँच से भर उठा, राष्ट्रकवि दिनकर का गाँव, सिमरिया!


चरपहिया गाड़ी गेट के नीचे से सरसराते हुए आगे निकली लेकिन कुछ ही दूर जाकर हिचकोले खाने लगी। रास्ता कच्चा पहले से था, या पक्का होने के बाद फिर से कच्चा जैसा लगने लगा था, ये बताना बेहद मुश्किल था। मगर रास्ते का रंग देखकर तो यही लग रहा था कि वो ना पक्का था-ना कच्चा, खरंजे वाली सड़क थी जिसमें शायद ईंटे बिछाई गई थीं किसी ज़माने में जो अब घिस चुकी थीं और अब उनपर धूल और मिट्टी का राज था। रास्ते के दोनों तरफ़ खेत थे, जो तब भी वैसे ही रहे होंगे जब दिनकर इन रास्तों से गुज़रे होंगे। मन था कि खेत, धूल-मिट्टी तथा आते-जाते लोगों, गाड़ी को निहारते बच्चों से डायरेक्ट आँखें मिलाऊँ लेकिन तेज़ उड़ती धूल के कारण गाड़ी का शीशा चढ़ाना ही पड़ा। गाड़ी हिचकोले खाते, धूल के बादल से लड़ती हुई आगे बढ़ती रही, मैं शीशे के पीछे से कभी आगे-कभी दाएँ-कभी बाएँ निहारता रहा। लेकिन रास्ता था कि ख़त्म होने का नाम ही ना हो और मैं सोच रहा था कि पता नहीं तब के ज़माने में दिनकर जी कैसे मुख्य सड़क पर आते होंगे क्योंकि तब क्या, अभी के दिनों में भी सिमरिया जैसे बिहार के गाँवों में अधिकांश लोगों के लिए बाज़ार तक आने-जाने का सबसे सुलभ साधन अपने ही पाँव हुआ करते हैं, या बहुत हुआ तो साइकिल।


आख़िर चरपहिया गाड़ी में बैठकर की गई एक लंबी सी प्रतीत हुई यात्रा के बाद हम पहुँच ही गए – दिनकर के जन्मस्थान। भारत में कवियों-लेखकों-कलाकारों के जन्मस्थानों की दशा पर जिसतरह की रिपोर्टें अक्सर आती रहती हैं, उनसे मुझे ये तो कतई उम्मीद नहीं थी कि दिनकर जी की जन्मस्थली पर उसतरह का कुछ भव्य होगा जैसा कि इंग्लैंड में हुआ करता है।


इंग्लैंड में विलियम शेक्सपियर, जॉन मिल्टन, विलियम वर्ड्सवर्थ, चार्ल्स डिकेंस, जेन ऑस्टन आदि लेखकों-कवियों के जन्मस्थल-मरणस्थल से लेकर उनसे जुड़े दूसरे पतों की भी एक विशेष पहचान रखी गई है। दूर-दूर से लोग देखने आते हैं, कि अमुक पते पर, अमुक हस्ती जन्मा-मरा, या इतना समय बिताया, या कि वहाँ रहकर फ़लाँ कृति लिखी, आदि-इत्यादि। और तो और लंदन में तो आर्थर कॉनन डॉयल के विश्वविख्यात चरित्र शर्लक होम्स के नाम पर भी एक म्यूज़ियम बना है, बेकर स्ट्रीट के उसी पते पर जो कहानियों में उसका ठिकाना है। और ये तब जबकि शर्लक होम्स एक काल्पनिक चरित्र है। वैसे ये अलग बात है कि इन सारे स्थलों को देखने के लिए टिकट कटाना पड़ता है, लेकिन जिस प्रकार की व्यवस्था वहाँ है उसके लिए पैसे तो लगने स्वाभाविक हैं, इसलिए लोग टिकट कटाकर शेक्सपियर और जेन ऑस्टन के जन्मस्थलों और समाधियों को देखने जाते हैं।































सिर्फ़ तसवीरों में बचा है यह घर, इसका एक बडा़ हिस्सा अब नहीं बचा.


बहरहाल सिमरिया में ब्रिटेन सरीखी किसी व्यवस्था की तो मुझे उम्मीद नहीं थी, लेकिन जो दिखा उसकी भी कहीं से कोई उम्मीद नहीं थी। दिनकर के जन्मस्थल की एक-एक दरकती-जर्ज़र ईंट भारत में साहित्यकारों के साथ किए जानेवाले बर्ताव की जीती-जागती कहानी हैं। भरभराती-गुमसाई दीवारों के बीच से ले जाकर मुझे एक कमरा ये कहते हुए दिखाया गया कि यही वो गर्भगृह है जहाँ दिनकर का जन्म हुआ था। अब उस कमरे की हालत ऐसी कि सिर ऊपर करो तो साक्षात दिनकर यानी सूर्यदेवता के दर्शन हो जाएँ क्योंकि छत का नामोनिशान मिट चुका था। और दिलचस्प ये कि गर्भगृह में पता नहीं किस कारण से, दरवाज़े की चौखट में लगी साँकल में ताला लगा था। मज़े की बात ये थी कि जिस कमरे की भुसभुसाई चौखट में झूलती जंग लगी साँकल में उतना ही ज़ंग लगा ताला झूल रहा था, उस दरवाज़े के पल्ले ही नदारद थे! अलबत्ता बदहाल घर के बाहर एक चमचमाते काले संगमरमर की एक पट्टिका दिखी जिसपर लिखा था – ‘15 जनवरी 2004 को बरौनी रिफ़ाइनरी के सौजन्य से राष्ट्रकवि की जन्मस्थली के उन्नयन कार्य का श्रीगणेश हुआ’। शायद भगवान गणेश भी अपनी बदनामी पर आहत हो रहे होंगे!


दिनकर के जन्मस्थल की ये दुर्दशा देखकर विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि लगभग सौ साल पहले सचमुच यहाँ साहित्य का एक ऐसा प्रखर दिनकर जन्मा था जिसकी आभा से सारा राष्ट्र आलोकित हुआ।


सिमरिया में दिनकर जी की पीढ़ी के कुछ लोगों का कहना था कि राष्ट्रकवि बनने के बाद भी दिनकर का सिमरिया से नाता टूटा नहीं था। लोगों ने बताया कि दिनकर जी के अपने रिश्तेदार अब पटना में रहा करते हैं। पटना में दिनकर जी के घर का या किसी अन्य स्मृति-स्थल का तो पता नहीं, वैसे एक दिनकर मूर्ति अवश्य है राजेंद्र नगर के पास, जिसका ज़िक्र अब केवल पता बताने के एक प्वाइंट के तौर पर हुआ करता है।


बात समझ में बिल्कुल नहीं आती कि दिनकर जी के घर की ऐसी हालत क्यों है। दिनकर जी स्वयं भी तीन-तीन बार राज्यसभा के सांसद रहे थे, फिर ये हाल कैसे है, क्योंकि आज के दिन में तो ये बात अपचनीय है कि किसी पूर्व सांसद का घर बेहाल हो। दिनकर जी के गाँव में, उनका जो टूटा-फूटा घर बचा है उसके चारों तरफ़ के सारे घर पक्के हैं। केवल एक घर कच्चा है – दिनकर का घर।


लेकिन शायद गाँधीवाद को स्वीकार करने के बावजूद युवाओं को विद्रोह की राह दिखाने के कारण स्वयँ को एक ‘बुरा गाँधीवादी’ बतानेवाले दिनकर संसद में पाँव रखकर भी नेता नहीं बन सके।


कैमरे में तस्वीरें, और मन में एक मायूसी लिए मैं वापस जाने के लिए तैयार हुआ। ये सोचता कि अगर राष्ट्रकवि के जन्मशती वर्ष में उसके जन्मस्थल का ऐसा तिरस्कार हो सकता है तो राष्ट्र के अन्य कवियों की कहानी बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती है।


मैं दिनकर के जन्मस्थल पर कोई रिपोर्ट करने के इरादे से कतई नहीं गया था। रिपोर्ट मेरे दूसरे सहयोगी कर रहे थे। लेकिन मेरे साथ सफ़र कर रहे एक स्थानीय पत्रकार को लगा कि शायद मैं कोई ‘स्टोरी’ ढूँढ रहा हूँ, इसलिए उसने मुझसे कहा – ‘आए हैं तो यहाँ एक रिपोर्ट कर लीजिए, एक चरवाहा है जो भैंसी भी चराता है और दिनकर जी की कविताएँ भी सुनाता है।’


मैंने धन्यवाद देकर उस सज्जन से कहा – ‘ना ठीक है, आप कर लीजिए।’


पत्रकार ने कहा – ‘हम तो पहले ही कर चुके हैं, सहारा-ईटीवी सबपर आ चुका है।’


मैंने कहा – ‘तो ठीक ही है, हो तो चुका है।’


पत्रकार ने हिम्मत नहीं हारी और कहा- ‘एक और कहानी है, पास में नौ साल का एक बच्चा है जो बड़ा-बड़ा आदमी को उठाकर बजाड़ देता है।’


मैंने मुस्कुराकर ना की मुद्रा में सिर हिला दिया और गाड़ी में बैठा। पीछे एक तिराहे पर दिनकर जी की, शीशे में चारों ओर से घिरी, एक साफ़-स्वच्छ स्वर्णिम मूर्ति, मौन मगर मुस्कुराती, हमारी गाड़ी को जाते देख रही थी। कुछ ही पलों में गाड़ी के चारों चक्के फिर कच्ची सड़क पर हिचकोले खाने लगे। धूल-मिट्टी उड़ने लगी। शायद नाच रही थी वो माटी भी, अपने ही एक सपूत की लिखी इस कविता की धुन में खोई -


“मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का,

चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं

पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी,

समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं”.

एक कामरेड कवि को लाल सलाम

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/23/2007 01:36:00 AM

ज के दिन, 23 सितंबर, 1973 को नेरुदा ने दुनिया को खैरबाद कह दिया था. हालांकि उनकी मौत बीमारी से हुई, मगर यह भी उतना ही सही है कि अगर सीआइए के समर्थन से सत्ता में आये तानाशाह जनरलों ने नेरुदा के इलाज में अड़ंगा न लगाया होता तो शायद नेरुदा कुछ समय तक और जी जाते. मगर एलेंदे के बाद चिली में नेरुदा ही उन जनरलों के लिए और सीआइए के लिए सबसे खतरनाक आदमी थे, बल्कि शायद एलेंदे से भी ज्यादा. हम नेरुदा के लिए अगर सबसे सही संबोधन चुनें, तो शायद हम कार्ल मार्क्स का नाम लें. हमें नेरुदा में मार्क्स की ऊंचाई दिखती है-वे शायद कविता के मार्क्स थे. यों ही नहीं है कि जब विवान सुंदरम नेरुदा की कविता पर पेंटिंग बनाते हैं तो उसमें मार्क्स का चेहरा उभर आता है.

नेरुदा निजी तौर पर मेरे लिए एक प्यार की तरह हैं.
माना जाता है भारतीय उपमहाद्वीप में नेरुदा जैसी प्रतिबद्धता, पार्टी के लिए सक्रियता और आमजन से जुडा़व के स्तर पर कोई रचनाकार है तो वह फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ हैं.
प्रस्तुत है नेरुदा की एक कविता और उनसे जुडे़ कुछ वीडियो.

अब हम बारह तक गिनेंगे
और फिर बिना हिले-डुले खडे़ रहेंगे
आइए इस सरज़मीं पर कम-से-कम एक बार
हम किसी भाषा में न बोलें
पल भर के लिए ठिठकें
और अपनी बांहें न हिलायें

वह कितना अलौकिक क्षण होगा
बिना हड़बडी़, बिना इंजन के बूते
हम सब एक साथ होंगे
किसी आकस्मिक अजनबीपन के बीच

ठंडे समंदर में मछुआरे
व्हेल मछलियों को अभयदान देंगे
और किनारे पर नमक बीनता आदमी
अपने टीसते हाथों की ओर नहीं देखेगा

वे जो नयी लडा़इयों के मंसूबे बना रहे हैं
ज़हरीली गैस और ज्वालाओं से लैस
लडा़इयां
जिनमें विजय के बाद कोई बाकी नहीं बचेगा
वे सब भी साफ़-सुथरे कपडे़ पहन
अपने भाइयों के साथ छांह में टहलेंगे
तफ़रीह के साथ

मैं जो चाहता हूं उसे
निष्क्रियता न समझा जाये
बल्कि मैं ज़िंदगी की बात कह रहा हूं...

इतने एकाग्र भाव से
अपनी ज़िंदगी चलाने के बीच
अगर कभी-कभार
कुछ भी किये बगैर
एक लंबी खामोशी में डूब सकते
तो शायद अपने को समझ न पाने
और रह-रह कर जान का जोखिम झेलने
की यह उदासी टूटती

शायद यह धरती हमें सिखा सकती है
कि सर्दियों में सब कुछ मरा हुआ दिखने के बाद
कैसे बाद में जीवित साबित होता है

अब मैं बारह तक गिनता हूं
और तुम सब यूं ही चुपचाप रहो
जब तक मैं चला न जाऊं.


एक कवि जिसने बहुत चीजों को प्यार किया



मैं पाब्लो नेरुदा हूं



नेरुदा का जीवन

जेल जाने के डर से चुप नहीं रहा जा सकता

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/23/2007 12:37:00 AM

इलीना सेन की पहचान डॉ विनायक सेन की पत्नी के बजाय एक सक्रिय मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अधिक है. चार माह पहले जब डॉ विनायक सेन को छत्तीसगढ़ सरकार ने गिरफ्तार किया था तो आशंका जतायी जा रही थी कि इलीना सेन को भी गिरफ्तार किया जा सकता है. डॉ विनायक सेन के आरोपपत्र की जो भाषा थी, उससे साफ पता चलता है कि सरकार और प्रशासन बेहद विनम्र इस महिला के बारे में क्या धारणा रखती है. शनिवार को इलीना सेन पटना में थीं. उनसे प्रभात खबर के लिए की गयी बातचीत के कुछ हिस्से यहां प्रस्तुत कर रहा हूं.

अब पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनायक सेन कोई अनजाना नाम नहीं रह गया है. उन्हें गत मई में नक्सलियों का समर्थक होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. इलीना सेन बताती हैं कि असल में डॉ सेन छत्तीसगढ़ में मानवाधिकारों पर हमलों, कारपोरेट लूट, सरकारी दमन के खिलाफ लगातार बोलते रहे. सलवा जुडूम के बारे में सबसे पहले डॉ सेन की ही पहल पर जांच की गयी और लोगों को पता चला कि आदिवासियों पर किस तरह आतंक थोप दिया गया है. इन सब कारणों से डॉ सेन सरकार के निशाने पर थे.
इलीना सेन ने डॉ सेन पर लगाये गये आरोपों को असंबद्ध और बकवास बताया. उन्होंने बताया कि पुलिस ने एक सबूत यह दिया कि राजनांदगांव में मुठभेड़ के बाद भागे नक्सलियों से छूटे दस्तावेजों में डॉ सेन का नाम था. मगर जो दस्तावेज प्रस्तुत किया गया, वह धुंधला (दिखने में अस्पष्ट) था. जब पुलिस से कहा गया कि वह मूल प्रति दिखाये तो उसने बताया कि मूल प्रति (जो मिली वह) तो है ही नहीं. इसी तरह एक और आरोप डॉ सेन के ऊपर लगाया गया कि वे माओवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में मिलते थे और उनकी चिटि्ठयां भाकपा (माओवादी) तक पहुंचाते थे, जिसके कारण माओवादी अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए थे. इलीना सेन ने प्रतिप्रश्न किया कि जेल सुपरिटेंडेंट की अनुमति से जेलर के सामने वे मुलाकातें हुईं, ऐसे में क्या यह संभव था?

इलीना सेन ने कहा कि जब माओवादियों की तरफ से आम नागरिकों के प्रति हिंसा होती है तो हम उसे भी कंडेम करते हैं. छत्तीसगढ़ में गृहयुद्ध चल रहा है और ऐसे में पुलिसिया कार्रवाई करके कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता. छत्तीसगढ़ की जनता भूखी है, उसे कोई बुनियादी सुविधा मुहैया नहीं है, न स्वास्थ्य, न शिक्षा. ऐसे में वह क्या करे अगर वह दखल न दे? राज्य के अनेक इलाकों में लोग बहुत न्यूनतम स्तर का जीवन जीते हैं. यही वे इलाके हैं, जहां माओवादियों की पकड़ लगातार मजबूत हुई है. आज़ादी के बाद से 60 साल बीत गये. लोग कब तक धीरज धरे रहेंगे? वे कुछ न कुछ तो करेंगे ही.

इलीना सेन ने महिलाओं के शोषण को उजागर करने में काफी काम किया है. उनका कहना है कि राज्य में महिलाओं की स्थिति बेहद खराब है. सलवा जुडूम और दूसरी कार्रवाइयों में उन पर अत्याचार और बढ़ा है. स्वास्थ्य की स्थिति तो बहुत खराब है. उनमें भारी कुपोषण है. जो आजीविका के साधन थे इलाके के लोगों के, वे चौपट हो गये हैं. सैन्य बल महिलाओं का काफी शोषण करते हैं. 100 से ज्यादा मामले सिर्फ हमने दर्ज किये हैं- और न दर्ज हो पानेवाले मामलों की संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी. सरकार महिलाओं के लिए कुछ नहीं करती. बस चटनी-आचार बनाने के प्रशिक्षण दिये जाते हैं, पर वह कोई समाधान नहीं है.

इलीना सेन बताती हैं कि सलवा जुडूम के दौरान उजाड़े गये लोगों को जिन सरकारी राहंत कैंपों में रखा गया था, उन कैंपों को स्थायी राजस्व ग्राम में बदले जाने की बात आयी है. और इन राहत कैंपों में रहनेवाले जिन गांवों को छोड़ कर आये हैं वे उजाड़ दिये गये गांव एमएनसीज को दे दिये जायेंगे. असल में सलवा जुडूम अभियान ही इसीलिए चलाया गया था कि जमीनें खाली हों तो उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दिया जाये. लोहंडीगुडा में आदिवासी ग्राम सभा ने जमीन बेचने की अनुमति नहीं दी तो फर्ज़ी ग्रामसभा बना कर उससे अनुमति दिला दी गयी. अब कहा जा रहा है कि एक बार ग्रामसभा ने अनुमति दे दी तो दोबारा उस पर विचार नहीं किया जा सकता. स्थानीय लोग इसका विरोध कर रहे हैं तो उन्हें माओवादी बताया जा रहा है, जबकि वे सीपीआइ से जुडे़ हुए हैं.

इलीना सेन बताती हैं कि राज्य में बौद्धिक माहौल में गिरावट आयी है. कोई भी सरकार के और इन कार्रवाइयों के विरोध में बोलना नहीं चाहता. उनलोगों को लगता है कि ग्लोबलाइजेशन से उन्हें फायदा है.

इलीना सेन के अनुसार डॉ सेन इतने सिंपल हैं कि उनके बारे में यह सोचा भी नहीं जा सकता कि वे हिंसक कार्रवाइयों को सपोर्ट कर सकते हैं.

इलीना सेन थोड़ा हंसती हैं-डॉ सेन की चार्ज शीट की जो भाषा है उस पर. उसमें कहा गया है कि डॉ सेन का काम डॉक्टरी रूप से शून्य है. इलीना बताती हैं कि जब छत्तीसगढ़ बना था तो पहली सरकार ने राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए जो सलाहकार समिति बनायी थी, उसमें डॉ सेन एक प्रमुख सलाहकार थे (इलीना सेन भी उस समिति की सदस्य थीं). अब यह भाजपा सरकार आयी है तो इसे पता ही नहीं कि उनका डॉक्टरी योगदान क्या है.

पूरे छत्तीसगढ़ की स्थिति पर इलीना सेन ने कहा कि सरकार सैन्यीकरण को बढ़ा रही है. युवाओं के लिए सारे अवसर बंद हैं. केवल सेना में नौजवानों की भरती हो रही है. बड़ा बजट है नक्सलियों को खत्म करने का. नक्सली समस्या है तो कइयों को फायदा है इससे. स्थास्थ्य बजट से अधिक का बजट है नक्सली उन्मूलन का.

कहा जाता है कि वहां सीआरपीएफ लोगों की सुरक्षा के लिए हैं. जो उनकी चौकियां हैं उनमें बाहर एसपीओ रहते हैं और उनके सुरक्षा घेरे में सीआरपीएफ. एसपीओ तो स्थानीय लोग ही बनते हैं. आप देखिए कि कौन किसकी सुरक्षा कर रहा है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर बढ़ती दमनात्मक कार्रवाइयों से चिंतित इलीना सेन कहती हैं कि जेल जाने का शौक किसी को नहीं होता. अगर कोई गलत काम होता है तो उस पर जेल जाने के डर से चुप भी नहीं रहा जा सकता. पीयूसीएल के पास जो भी रास्ते हो सकते हैं, उन्हें वह अपना रहा है अपना विरोध दर्ज कराने के लिए.

पाल रोबसन का गीत और गंगा बहती हो क्यों

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/22/2007 01:24:00 AM

युनूस भाई ने कुछ समय पहले भुपेन हज़ारिका का मशहूर गीत गंगा पोस्ट किया तो याद आया कि जन संघर्षों और सर्वहारा के महान गायक पाल रोबसन ने एक गीत गाया था आ'ल मेन रिवर. गंगा इसी गीत का भारतीय संस्करण है. लीजिए आज सुनिए, खुद भाई पाल रोबसन की आवाज़ में उनका वह मशहूर गीत. इसी के साथ देखिए भुपेन हज़ारिका को गंगा गाते हुए. नीचे भुपेन दा की ही आवाज़ में सुनिए गंगा. इसे उनके अलबम से लिया गया है. अलबम भाई संजीत ने उपलब्ध कराया जिसके लिए हम उनके आभारी हैं.







पाल रोबसन





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भुपेन हज़ारिका




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गंगा








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भविष्य जनता के प्रतिरोध में है : सच्चिदानंद सिन्हा

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/20/2007 12:38:00 AM

वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा इस सितंबर में 79 वर्ष के हो गये. मुज़फ़्फ़रपुर में अपने गांव मणिका में एक छोटे-से पुराने मकान में रहनेवाले सच्चिदा बाबू इस उम्र में भी काफी पढ़ते हैं. हाल ही में उन्होंने पूंजी का अंतिम अध्याय नाम से एक किताब पूरी की है, जो जल्दी ही प्रकाशित होगी. इन्होंने 1986 में कोएलिशन इन पॉलिटिक्स नाम से किताब लिखी थी. उस समय कोई गंठबंधन पर सोचता भी नहीं था. जब हम उनके घर पहुंचे, वे रात का समाचार सुनने के बाद लालटेन की मद्धिम रोशनी में पढ़ रहे थे. प्रभात खबर के लिए गंठबंधनों पर विशेष सीरीज़ के लिए सच्चिदानंद सिन्हा से मैंने बातचीत की. प्रस्तुत है इस बातचीत के प्रमुख अंश. ये हाल ही में प्रभात खबर में प्रकाशित हुए हैं.

अभी जो गंठबंधन की राजनीति पूरे देश में चल रही है, उसे आप समग्र रूप में कैसे देखते हैं?

यह भारतीय राजनीति में कोई नयी प्रवृत्ति नहीं है. 1986 में ही इस पर मेरी एक किताब आयी थी कोएलिशन इन पॉलिटिक्स. उस समय कोई गंठबंधन पर सोचता भी नहीं था. 1985 में राजीव गांधी जीत कर आये थे और लोगों का कहना था कि अब देश में एक ही पार्टी का शासन होगा. विपक्ष का भी सफाया हो जायेगा. उस दौर में मैंने गंठबंधन की बात की थी. उस समय जो क्षेत्रीय पार्टियां उभर रही थीं, उन पर किसी की नजर नहीं थी. मैंने उन्हीं के आधार पर कहा था कि अब देश में एक जमात की सत्ता नहीं रहेगी. अब एक पार्टी का एकछत्र शासन खत्म हो जायेगा. असल में इस देश में इतनी भिन्नता है, सांस्कृतिक आधार पर भी तथा अन्य आधारों पर भी कि एक नीति से पूरे देश को चला पाना असंभव है. एक नीति में पूरे देश की राजनीति को समाहित कर पाना असंभव है. उसमें क्षेत्रीयता का पुट होना लाजिमी है. यह नहीं रहेगा तो राजनीति सफल नहीं हो पायेगी. इसी संदर्भ में मैंने बताया था कि दुनिया भर में हर जगह गंठबंधन बन रहे हैं और वे देश का शासन चला रहे हैं. दरअसल गंठबंधन अपने यहां भी काफी पहले से बनते आये हैं. आजादी के दौर में अगर कांग्रेस के स्वरूप पर गौर करें तो हम पायेंगे कि वह अनेक दलों का गंठबंधन थी. तो इस हम तरह देखते हैं यह कितना पहले से होता आया है.

राजनीति में गंठबंधन की आवश्यकता सामाजिक विकास के किस मोड़ पर और क्यों पड़ती है?
पूरे देश का हित तो एक जैसा नहीं होता न. बिहार में जिस तरह की जाति संरचना है, वैसी बंगाल में नहीं है. इसके साथ-साथ राजनीतिक विकास भी अलग-अलग हिस्सों में इतना भिन्न है कि एक राजनीतिक व्यवस्था के जरिये इसे एक जगह नहीं समाहित किया जा सकता है.भारत में जिस तरह का राजनीतिक विकास हुआ उसमें एक तरह के राजनीतिक तंत्र से हुकूमत नहीं चल सकती है. ऐसी अनेक छोटी क्षेत्रीय पार्टियां उभरेंगी ही जिन्हें एक जगह करना होगा. राजीव गांधी की जो सरकार बनी तो लोगों ने कहा था कि यह स्थिरता है, मगर मैंने इसी संदर्भ में कहा था कि यह अस्थिरता है. इतने विशाल देश में हर जगह का राजनीति का चरित्र भी भिन्न था. एकीकृत राजनीतिक सत्ता की संभावना देश में नहीं थी. इसलिए अंतत: ऐसी स्थिति उभरी कि सबको उसे कबूल करना पड़ा. देश की जो अंतर्निहित विविधता थी, उसमें लाजिमी था कि केंद्र या राज्य सत्ता के लिए विभिन्न दलों का गंठबंधन तैयार हो. इससे बचने का एक ही उपाय था कि देश पर तानाशाही थोप दी जाती, जिसमें सारे दलों को जबरन दबा दिया जाता. मगर लोकतंत्र में ऐसा संभव नहीं था. अगर आपको वास्तव में लोकतांत्रिक सत्ता चलाना है तो यह जो विविधता है राजनीतिक दलों के अंदर, उसे समेटना अनिवार्य है. यह हमारे लोकतांत्रिक विकास की अनिवार्य परिणति थी. मगर इसे शुरू में कबूल करने में दिक्कत रही. कांग्रेस ने इसे समय पर पहचाना नहीं. उसका एकछत्र राज था. इसीलिए इसे सामने आने में इतनी देर लगी.

अब जो गंठबंधन सामने आ चुके हैं और वे जिस सामाजिक समीकरण को अभिव्यक्त कर रहे हैं, उन्हें देख कर क्या लगता है कि समीकरण पूरा हो चुका या फिर प्रक्रिया जारी है और अभी इसका अंतिम स्वरूप आना शेष है?
आगे भी नये समूह उभरेंगे. एक ही दल में अलग-अलग जातीय टकरावों से अनेक दल बनेंगे जैसे विगत में जनता दल से टूट कर समता पार्टी, राजद और जदयू आदि दल बने. लोकतांत्रिक राजनीति में अलग-अलग समूहों की भावनाएं होती हैं और उन्हें समेटने की प्रक्रिया भी. निचले स्तर पर जो भावनाएं होती हैं उन्हें समेट कर स्पेस देना ही गंठबंधन की राजनीति है.
आपने कहा कि शुरू में इसे समझने में देर लगी कि गंठबंधन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही अनिवार्य हिस्सा है. क्या कारण रहे इसके?

शुरू में कांग्रेस का एकछत्र राज था. हालांकि तब डीएमके और वामपंथ कुछ जगहों पर उसे चुनौती दे रहे थे, पर केंद्र में कांग्रेस को कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली. पहली बार तब जनता पार्टी की सरकार ने कांग्रेस को एक बड़ी चुनौती केंद्र में दी. मगर जब जनता पार्टी का बिखराव हो गया तो कांग्रेस का पुनः एक छत्रराज हो गया. मगर इसके बाद सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी. 1985 में भी राजीव गांधी की लहर आयी थी तो वह सहानुभूति के वोटों पर आयी थी. उसमें एक कृत्रिम स्थायित्व था. वह भ्रमपूर्ण स्थिति थी. मैंने उसी समय कहा था कि स्थानीय हितों को समाहित करके ही राजनीति हो सकती है. वह आज सही साबित हो रहा है.
आप भी मान रहे हैं कि गंठबंधन वंचित समूहों को अभिव्यक्त करते हैं, जिन्हें बड़ी पार्टियां स्पेस नहीं दे पातीं. आज के गंठबंधनों से क्या लगता है कि अभिव्यक्ति के उस दायित्व को वे पूरा कर रहे हैं?

कुछ अभिव्यक्ति तो हो ही रही है. जैसे पंजाब में जो अकाली दल है, उसकी शक्ति के स्रोत जाट हैं जो प्रायः सिख हैं. पंजाब में सिख किसान हैं और व्यापारी हिंदू हैं. अकाली दल मूलतः किसानों की पार्टी है. कांग्रेस के शासन में जब कि सानों की बात नहीं सुनी गयी तो अकाली वहां मजबूत हुए और वे जीत कर आये. असम में असम गण परिषद बना पर वे असम के लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं निकाल पाये तो लोग कांग्रेस के पास गये. उससे भी समाधान नहीं हो पाया तो वह अभिव्यक्ति अब उल्फा के जरिये हो रही है. इसकी दोषी सीधे तौर पर राष्ट्रीय पार्टियां हैं जो असंतोष का हल राजनीतिक प्रक्रिया से नहीं कर पायीं. देश में दलितों की स्थिति काफी खराब है. वे बेहद अमानवीय परिस्थिति में रह रहे हैं. उन्हें कोई सुविधा हासिल नहीं है. न उनकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था है और न जीवन की बुनियादी जरूरतों की. उनकी आवाज मायावती उठायीं, पर वे उनकी स्थिति में सुधार के लिए जरूरी बदलाव नहीं ला पा रही हैं. इसके लिए जरूरी अर्थव्यवस्था वे नहीं ला सकतीं. उनका सोच अभिजात वर्ग से जुड़ा हुआ है. उनका व्यवहार भी वही है. मायावती गरीब-दलितों की भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं कर पा रही हैं. अभी के गंठबंधनों में अगर इनकी आवाज को जगह नहीं मिली तो नये गंठबंधन बनेंगे. गंठबंधनों के बारे में खास बात यह है कि वे स्थिर नहीं होते. जैसी समाज की स्थिति उभर कर आयेगी, वैसे गंठबंधन भी शक्ल लेंगे. सारी दुनिया में यही नियम लागू होता है. इस मामले में अमेरिका की स्थिति थोड़ी भिन्न है. जो अंगरेज वहां बसे, उन्हीं के कारण इतनी एकरूपता दिखती है. फिर भी थोड़ी-बहुत भिन्नता तो वहां है ही. हमारा देश जितना बड़ा है उसके अंदर राजनीतिक तौर पर बिल्कुल एकरूपता नहीं ला सकते. वह तानाशाही के जरिये ही संभव है. सबकी भावनाओं की अभिव्यक्ति सिर्फ गंठबंधन की राजनीति में ही हो सकती है. जर्मनी और फ्रांस जैसे छोटे देशों में भी गंठबंधन की सरकारें हैं. यूरोप के अधिकतर देशों में ऐसा है.
गंठबंधनों के इस दौर में वंचित समूहों को अभिव्यक्ति तो मिली, मगर समग्र रूप में देखें तो राज्यों को इसका क्या लाभ मिला, खासतौर पर बिहार और झारखंड में?
लाभ इस पर निर्भर करता है कि कैसी पार्टियों का गंठबंधन है. झारखंड में तो हास्यास्पद स्थिति है. वहां कोई वैचारिक गंठबंधन नहीं है, व्यक्तियों का गंठबंधन है. यहां के मुख्यमंत्री भी निर्दलीय हैं. इस तरह गंठबंधन अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं होता. यह इस पर निर्भर करता है कि गंठबंधन किस तरह के दलों का है.एक दिलचस्प उदाहरण जर्मनी का है. वहां सोशल डेमोक्रेटिक तथा क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टियां मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टियां रही हैं. भूमंडलीकरण का इतना दबाव है कि पूंजीपतियों को काफी रियायतें देनी पड़ीं, कल्याणकारी राज्य को सीमित करना पड़ा. इससे 40 लाख लोग बेरोजगार हो गये. इसके बाद पिछला जो चुनाव हुआ उसमें इन दोनों के बीच बहुत हल्का फर्क रहा. उनकी राजनीति में कोई फर्क नहीं था. अब उन दोनों ने मिल कर सरकार बनायी और चला रहे हैं, जिसकी चांसलर एंजेला मर्केल हैं, जबकि कुछ ही साल पहले तक वे मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे.
इसलिए मैं कह रहा हूं कि गंठबंधन की अच्छाई और उससे मिलनेवाला लाभ इस पर निर्भर करता है कि वह लोगों की भावनाओं का कितना प्रतिनिधित्व करता है. गंठबंधन लोकतंत्र का एक अनिवार्य ढांचा है जहां विविध तरह के सामाजिक तत्व समाहित होते हैं.
बिहार में जो वर्तमान गंठबंधन है, उसके आधार पर आप क्या आकलन करते हैं कि वह बिहार की भावनाओं की अभिव्यक्ति करता है?

पहले की जो सरकार थी, उसे तो देखा ही है हम सबने. आज भी नीतीश केवल बयान ही देते हैं. उन्होंने ग्लोबल मीट भी करा लिया, पर गांव में तो कुछ भी अंतर नहीं दिख रहा है. मेरे गांव के गरीबों की हालत तो इधर खराब ही हुई है.
नीतीश कुमार विकास के उसी रास्ते पर चल रहे हैं जिस पर चंद्रबाबू नायडू चले थे. क्या भविष्य दिखता है इनका?
चंद्रबाबू नायडू ने जिस तरह काम किया, उसमें बाहर से पैसा आता है, कुछ युवकों को रोजगार भी मिलता है. शुरू-शुरू में तो यह सब चमत्कार की तरह दिखता है, पर वह सब कुछ समाज के सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के लाभ के लिए होता है. नीचे के किसानों की स्थिति इतनी खराब हो गयी कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़ी. इसी असंतोष का परिणाम है वहां नक्सली आंदोलन की मजबूती. जिस रास्ते पर नीतीश चल रहे हैं, उसमें सतह पर तो काफी चकाचौंध दिखाई देती है पर खेती में जब तक बदलाव नहीं आयेगा, लोगों का जीवन स्तर नहीं सुधरेगा तब तक विकास का कोई मायने नहीं. महाराष्ट्र भी इतना उन्नत राज्य है पर किसान सबसे अधिक आत्महत्याएं वहीं कर रहे हैं.
बिहार में पहले जो गंठबंधन था और अब जो गंठबंधन है, उसमें विशेष अंतर क्या है? बिहार में गंठबंधन किस हालत में है? क्या उससे विकास होगा?
कोई खास अंतर नहीं है. अतिपिछड़ों-दलितों की महिलाओं को पंचायत में आरक्षण दिया गया, पर जो एकल पद हैं उनके आरक्षण से महिलाओं का सशक्तीकरण तो नहीं हुआ, हां पंचायतों को कमजोर जरूर किया गया. मेरे गांव में एक दलित महिला मुखिया चुनी गयी है. बैठकों में वह नहीं जाती, उसके पति जाते हैं, जिनकी कोई वैधानिक स्थिति नहीं है. इसलिए अधिकारी उनकी सुनते नहीं और मनमाने फैसले ले लेते हैं. गंठबंधन तो सपाट हालत में है. जहां तक विकास की बात है, वे एनआरआइ से विकास करना चाहते हैं. भला वे कैसे करेंगे एनआरआइ से विकास? यहां न खनिज हैं और न बड़े उद्योग-धंधों के आधार पर यहां कुछ हो पायेगा. यहां छोटे उद्योगों से ही कुछ होगा. मगर नीतीश जी के सोच में दिखता है कि बिहार का विकास यहां की ऊर्जा और यहां के दिमाग पर नहीं हो सकता. महिलाओं के लिए यह सोच विकसित हुआ है कि नीतीश जी उनके लिए काम कर रहे हैं. इससे उन्हें सहानुभूति और समर्थन मिला है. मगर उनके राज में पंचायती राज व्यवस्था तो खत्म ही हो गयी है. यह बिहार की त्रासदी है. अभी जरूरत थी इस व्यवस्था को सशक्त करने की, मगर महिलाओं को दिये गये आरक्षण ने पंचायतों की रही-सही साख भी खत्म कर दी. वे कमजोर हुई हैं, ब्यूरोक्रेसी के हाथ में चली गयी हैं. हां एक फर्क जरूर है. लालू के समय में केंद्र से आया बहुत सारा पैसा लौट जाता था, खर्च नहीं हो पाता था. अब उसे नीतीश कुमार नौकरी देकर खर्च कर रहे हैं. मगर उन्होंने जो रास्ता अख्तियार किया है कि ठेके पर बहाली का, वह ग्लोबलाइजेशन के पैटर्न पर है. यह खतरनाक हो सकता है. जिनकी नियुक्ति हो रही है वे अनुबंध की अवधि में चाहेंगे कि नौकरी से जितना हो सके फायदा उठा लें. मतलब यह कि पैसा काफी खर्च हो रहा है, जो तत्काल दिखाई भी दे रहा है. लालू के समय में यह नहीं होता था. दलों के बारे में मेरी मान्यता है कि देश में जितने भी मुख्य दल हैं, बुनियादी तौर से उनकी नीतियों में कोई फर्क नहीं है. माकपा सहित सभी दल भूमंडलीकरण को लेकर चल रहे हैं. वे सब उसे कैसे भी लागू करने के प्रति दृढ़ दिखते हैं. सिंगूर में जो हुआ वह इसका एक अच्छा उदाहरण है. सेज नामक योजना विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ की नीति है. यह चीन से शुरू हुई. इसकी मूल नीति है कि औद्योगिक विकास को प्रश्रय दिया जाये और किसानों की जमीन किसी भी तरह ले ली जाये. हाल ही में मैं चीन के बारे में एक रिपोर्ट पढ़ रहा था, जिसमें रिपोर्टर ने उसके औद्योगिक विकास की तारीफ की है पर उसका अनुमान है कि अगले 20-30 वर्षों में 40 करोड़ लोग गांवों से शहरों की तरफ पलायन कर जायेंगे. आखिर ऐसे विकास का क्या मतलब?
आरक्षण ने भारत के समाज को और राजनीतिक परिदृश्य को गतिशील किया. अब इसकी भूमिका किस तरह की रह गयी है?

इस सवाल के उत्तर के दो आयाम हैं. परंपरा से वर्ण व्यवस्था की वजह से अगड़ी जातियों को छोड़ कर बाकी लोगों को आगे बढ़ने से रोका गया था. पढ़ाई-लिखाई वर्जित थी पिछड़ों में. इससे उनमें शिक्षा का ह्रास हुआ. फिर उनके पढ़े- लिखे लोगों में चेतना आयी कि शिक्षा का प्रसार होना चाहिए. अंगरेजों के ही समय में जस्टिस पार्टी ने आरक्षण की मांग की जिसके प्रयासों से आरक्षण मिला. इसके बाद इधर 20-25 सालों से आरक्षण का नया दौर चला. लोगों को इसके आधार पर नौकरी मिलनी शुरू हुई. वे राजनीति में भी आने लगे. एक हद तक विकास हुआ. मगर दूसरा पहलू यह है कि अब पिछड़ी जाति के नेताओं की कोशिश है कि अगड़ी जाति के नेताओं की जमात में ही शामिल हो जायें. उनका ध्यान अपनी जाति पर नहीं है. वे ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाते, जो आज के समय का सबसे बड़ा मुद्दा है.आरक्षण से एक हद तक प्रगति तो हुई कि वे वहां तक पहुंचे जहां से इन्हें वंचित रखा गया था, पर दलित अब भी भूमिहीन और विपन्न हैं. ये जो पिछड़ों के नेता हैं उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी कि गरीबी को कैसे हटाया जाये, इस पर विचार करें. फिर अगर वे ऐसा करेंगे तो उन्हें ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ संघर्ष करना पड़ेगा, जो वे करेंगे नहीं. एक तबका, जिसे क्रीमी लेयर कहते हैं, सारी सुविधाएं उसी तक सीमित हो गयी हैं, नीचे तक वे पहुंचे ही नहीं पा रही हैं. यह तभी संभव होगा जब बुनियादी आर्थिक नीतियों में परिवर्तन हो. मगर यह सब जिन पर करने का दायित्व है, वे अगड़ी जातियों के नेताओं की जमात में शामिल होने की सोच रहे हैं. पिछले उत्तर प्रदेश चुनाव में दाखिल कि ये गये कागजातों से पता लगा कि राज्य में सबसे अधिक संपत्ति मायावती की थी. दूसरे नंबर पर मुलायम थे. ये उस जाति के नेता हैं जो दिन भर मेहनत करता है तो दो जून भी मुश्किल से खा पाता है. बिहार में भी देखिए कि रामविलास पासवान कितने संपन्न हैं, जबकि उनकी जाति के लोग अब भी काफी दरिद्रता में रह रहे हैं. ऐसा इसलिए है कि रामविलास पासवान की तमन्ना इस अर्थव्यवस्था को बदलने की नहीं है. यानी इनकी स्थिति सुधारने की तमन्ना नहीं बल्कि उनकी भावनाओं को उभार कर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश है.
अब तो मायावती भी ब्राह्मणों को रिझा कर सत्ता की महात्वाकांक्षी को और आगे बढ़ाने में लगी हुई हैं. मगर मूल बात है कि जब तक आर्थिक नीति नहीं बदलेगी, सिर्फ आरक्षण की बात कहने भर से दलितों-पिछड़ों का विकास नहीं होगा. कितने दलित पढ़े-लिखे होंगे कि वे आरक्षण से नौकरी पा सकेंगे? जब दलितों के लिए कोई जगह ही नहीं है तो आरक्षण से क्या होगा? उनके जीवन में सुधार के लिए वर्तमान आर्थिक नीतियों पर हमला करना होगा और फिर सभी जातियों के गरीबों की बात करनी होगी. मगर यह भी ये नेता नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनका वोट बैंक गड़बड़ा जायेगा.
इन आर्थिक नीतियों से भविष्य में सामाजिक स्तर पर क्या बदलाव आने की उम्मीद हैं?
अभी तो खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को मंजूरी दी गयी है. इससे हालत और खराब होगी. अभी होता यह है कि युवक कहीं कर्ज-उधार लेकर कोई दुकान खोल लेते हैं. पर वालमार्ट आदि के आने से उनकी स्थिति और बदतर हो जायेगी. अभी एक खबर आयी कि सतपुड़ा में बाघों का अभयारण्य बन रहा है. 150 गांव इसके दायरे में आ रहे हैं, जिन्हें विस्थापित करना है.
पहले तवा जलाशय बना था, उनको उसमें मत्स्यपालन का अधिकार काफी संघर्षों से मिला. अब वह जलाशय भी अभयारण्य के दायरे में है. आदेश हुआ है कि अब गांववाले जलाशय में मत्स्यपालन और डूब की खेती नहीं कर सकते. इस तरह सैकड़ों परिवारों की आजीविका छिन जायेगी. यह सब ग्लोबलाइजेशन से हो रहा है. वहां पर्यटक आयेंगे और मौज करेंगे. वह पैसा धनिकों की जेब में जायेगा. गरीबों को क्या मिलेगा?
भारत में राजनीति की एक और धारा है-नक्सल धारा. इसका भविष्य क्या देखते हैं?

इसका कोई भविष्य नहीं दिखता है. माओ की बात वे करते हैं. माओ ने सांस्कृतिक क्रांति की चीन में और आज वही चीन पूंजीवाद पर पहुंच गया है. ऐसे में देखें तो भारत में इसकी क्या जरूरत है कि यहां भी लाखों लोग मरें और फिर 50 साल बाद माओवादी शासन में आयें और पूंजीवाद की राह अपना लें.असल में जो सबसे गरीब तबका है इस देश का, उसे राहत नहीं मिल रही है.
नक्सलवाद के रूप में यह उसकी बगावत है. बस यही. और सिर्फ नक्सलवाद ही नहीं, कश्मीर, मणिपुर आदि का आतंक वाद भी इसी असंतोष का विस्फोट है.मगर इसके नाम पर जो कुछ भी हो रहा है वह व्यवस्थित और सोची-समझी रणनीति के तहत नहीं हो रहा है. यह केवल भावनात्मक विस्फोट है जो स्थितियों से परेशान होकर वंचितों की बगावत है अपनी स्थितियों के खिलाफ. यह हम छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, असम, मिजोरम, उत्तरबंग, कामतापुरी में देख सकते हैं. मुद्दे अलग-अलग हैं पर वे सब एक हैं.
तो भविष्य किसमें है?
भविष्य जनता के प्रतिरोध में है. जनता ही कुछ करेगी. लैटिन अमेरिका में यह दिख रहा है शावेज और इवो मोरालेस के रूप में. मोरालेस पहला मूल निवासी है वहां का राष्ट्रपति बननेवाला. फिर निकारागुआ में भी उम्मीद दिख रही है. दुनिया में दिखाई दे रहा है कि अमेरिकी साम्राज्य के खिलाफ शक्ति उभर रही है.

कुसूरवार

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/16/2007 09:00:00 AM

जी कल्याण राव का नाम पहली बार तब सुना जब दो साल पहले उन्हें आंध्र प्रदेश सरकार ने गिरफ़्तार किया था. उनके साथ कवि वरवर राव भी गिरफ़्तार किये गये थे. पिछले साल किसी पत्रिका में यह कहानी पढी- उसी के आसपास प्रभात खबर में यह कहानी छपी भी. तेलुगू के प्रख्यात कथाकार-लेखक और विरसम के अध्यक्ष कल्याण राव की एकमात्र रचना जो हमने पढी़ है. लीजिए, आप भी पढिए और याद कीजिए कि हिंदी में ऐसी कोई कहानी अंतिम बार कब पढी थी आपने. रीढ़विहीन लेखकों से भरी पडी़ हिंदी आखिर कब तक उन्हें ढोती रहेगी?

कुसूरवार

जी कल्याण राव

जीना पाप नहीं है. जिंदगी जीने की चाह भी कोई कुसूर नहीं. जिंदगी के बारे में इस बात को किसी बड़े बुद्धिजीवी या विद्वान के मुंह से सुनने की जरूरत भी नहीं होती. यह कोई ऐसा बड़ा विषय भी नहीं कि कोई महात्मा आकर इसे हमें समझाये या किसी ऊंचे मंच से तालियों के बीच आकर कोई लोग इस पर भाषण झाड़े.

आप जीने की चाह करते हैं. आपके चारों ओर जो लोग रहते हैं, वे भी जीने की चाह करते हैं. ऐसा करके आप या वे कोई पाप नहीं करते, कोई कुसूर नहीं करते. आप ही की तरह मैं भी जीना चाहती हूं. मेरा पति भी जीना चाहता है. लेकिन हम जिस तरीके से जीना चाहते हैं, वह सामान्य से थोड़ा अलग है. हो सकता कि वह तरीका इस या इस जैसी किसी सरकार को अच्छा न लगे. पर इन्हें अच्छा न लगने मात्र से न तो जीने का वह तरीका दूषित कहा जा सकता है और न ही हम कुसूरवार करार दिये जा सकते हैं.
मुझे मालूम है, मेरे नाम को वे तीन बार पुकारेंगे. तीसरी बार जब पुकारा जायेगा, मैं अंदर जाऊंगी. तब तक कठघरे में जो एक चूहा रहता है, वह मुझे देख कर भाग गया होगा. मुझसे कुछ बुलवाने के लिए वे जोर आजमाइश जारी रखेंगे. लेकिन मैं कुछ नहीं बोलती. कोई बात नहीं करती. इसलिए नहीं कि मुझे बोलना नहीं आता. इसलिए कि अब तक मैंने जो कुछ भी कहा है, वह सब रिकार्ड किया गया है. इन चूहों के बीच, इनकी चिल्लपों के बीच भेड़िया न्याय के लिए मेरी बातों को रिकार्ड किया गया है. वही बातें मैं बार-बार दोहराना नहीं चाहती. बोलने से क्या फायदा?

मैंने इन्हें कई बार बताया है कि मैं जीवन से प्यार करती हूं. साथ ही जीवन मूल्यों को. स्वयं जीवन के अस्तित्व को ही नष्ट करनेवाली इस व्यवस्था से नफरत करती हूं. प्यार की खातिर जीना चहती हूं. नफरत की खातिर जीना चाहती हूं. लोगों से प्यार करना दोष नहीं. शोषण से नफरत करना पाप नहीं. सारी धरती पर इससे बढ़ कर मूल्यवान बात और क्या हो सकती है? ये बातें काफी हैं, मुझे रिहा करने के लिए. मुझे अपने मुन्ने के पास जाने देने लिए, जिसे मैं बेहद प्यार करती हूं. अपने पति की कब्र पर एक छोटा-सा गुलाब का पौधा लगा देने के लिए. मुझे मेरे अपनों के साथ जीने देने के लिए. लेकिन मुझे मालूम है, वे ऐसा अवसर नहीं देंगे. मुझे वे फिर उसी अंधेरी कोठरी में ...

कम से कम इतना भी कर देते तो अच्छा होता कि जिस कोठरी में मेरे पति को बंद रखा था, उसी में मुझे भी बंद कर देते. वह कोठरी भी तो अभी खाली पड़ी है. उसकी दीवारों पर उसके द्वारा अपने लहू से लिखे क्रांति के नारे अभी वैसे ही हैं. वह तो मुझे काल कोठरी ही लगती है क्योंकि वहां तो मेरे पति के अद्भुत सपने संजो कर रखे हुए हैं. वहां पर जिस स्वप्निल चांदनी की वर्षा होती रहती थी, उस चांदनी और उस प्रकाश को मैं अब भी महसूस कर सकती हूं.

दूर-दूर तक फैले समुंदर के पानी के किनारे, बहुत बड़े और विस्तृत भूखंड में फैले लंबे-लंबे पड़ों के बीच रेतीले टीलों के किनारे एक छोटा-सा गांव था. इलाके के दूसरे गांवों की तरह वह गांव भी बहुत गरीब था. हमारी पहली मुलाकत उसी गांव में हुई थी. उस समय हमारे ऊपर आसमान और सामने जैसे रोता हुआ समुंदर. पीछे ताड़ के पत्तों के छोटे-छोटे घरों में टिमटिमाते दीये जल रहे थे. उस समय उसने जो कुछ कहा था वे बातें मेरे सीने पर लिखी हैं.
`प्रकाश देनेवाला सूरज, चांदनी देनेवाला चंदा और सबको अन्न देनेवाली यह धरती-ये तीनों दोषी हैं. मनुष्य मात्र के लिए दोष मैं भी कर रहा हूं. अगर तुम भी इस दोष की भागीदार बनो तो हमारा स्नेह स्थायी बन सकता है.'
ये थीं उसकी बातें. मैंने कहा-प्यारे दोस्त, तुम्हारे इस संघर्ष का आधा भाग मैं हूं. ऊंची लहरों की तरह प्रवाहित होनेवाले मानव जीवन प्रवाह में मैं भी जी रही हूं. कितना भी मजबूत बांध बना कर जिस तरह समुद्र का प्रवाह नहीं रोका जा सकता, उसी तरह प्रतिबंध और दमन के बल पर इस जीवन संघर्ष को भी नहीं रोका जा सकता. जब संघर्ष रोका नहीं जा सकता तो मेरा यह जीवन भी झुकनेवाला नहीं. यह जीवन अजेय है इसलिए कि यह जीवन है. जीवन होने के नाते यह अजेय है. और यह जीवन मृत्यु से बहुत बलवान है. अगर उसे किसी एक जगह दबा भी दिया जाता है तो दूसरी जगह यह जमीन फाड़ कर ऊपर आ जाता है.'
जब मैंने यह सब कहा तो उसने मुस्कराते हुए मेरी तरफ देखा. उसने मेरा हाथ थामा. समुंदर के पानी से भीगी रेतीली पगडंडियों पर हमारे कदमों ने जो निशानियां बनायीं, वे मेरे मन में अंकित हो गयीं.

अगर आपका जीवन पर से भरोसा उठ गया है तो गांधी मार्ग के 16 नंबर का दरवाजा खटखटाइए. वहां के पुलिस अफसर से पूछिए कि पार्वती की चीजें कहां रखी हैं. पर पुलिस आपको उन चीजों को दिखायेगी नहीं. अगर भूल से दिखा भी दिया तो उनमें एक फोटो आपको दिखेगा. उस फोटो के पीछे लिखे अक्षरों को पढ़िए-`जीवन हमेशा सुंदर रहा है. संघर्षरत जीवन और भी सुंदर होता है. इसीलिए हमारी यह मुलाकात इतनी सुंदर है.'

महीने का यह आखिरी दिन है. मैं अपने पति का इंतजार करती उसकी राह देख रही हूं. उसे 10 बजे तक आना था. पर देर से आना या ज्यादा काम पड़े तो एक -दो दिन घर न आना कोई नयी बात नहीं है. लेकिन उस दिन तो उसे जरूर आना था. मैं एक-एक पल गिन रही हूं. समय कटता नहीं है. एक-एक लम्हा भारी लग रहा है. क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होने के बाद रात-रात भर अकेले रहना मामूली-सी बात हो गयी है. मुन्ने के पैदा होने के बाद कुछ दिन तक तो अकेले होने पर रात-रात भर उससे बातें करते ही गुजार देती. वह सोता तो उसकी नन्हीं-नन्हीं हथेलियों को सहलाती रहती. जब मैं ऐसा करती तो वह सोते-सोते ही मुस्कुराता रहता.

कुछ बड़ा होने पर मुझे मालूम हुआ कि पुलिस ने मेरी बड़ी बहन के घर पर हमला किया. बहन और बहनोई को भी छह-छह महीने जेल काटनी पड़ी. मालूम नहीं अब मेरा मुन्ना कहां है. शायद वह भी चांद और सूरज की तरह ही कुसूरवार है.

मुरगे ने पहली बांग दी. कड़ाके की ठंड है. बाहर पत्तों पर टप -टप गिरनेवाली बूंदों के शब्द सुनाई पड़ रहे हैं. इतने में दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई.

`पार्वती'- कोई पुकार है.

मेरा पति मुझे कभी भी` पार्वती' नहीं पुकारता था. वहां मेरा नाम परमिला है. दरवाजा खटखटाने का तरीका भी एक दम अलग है. कौन हो सकता है? अभी सोच ही रही थी कि दरवाजा तोड़ कर 10 पुलिसकर्मी उस छोटे से कमरे में घुस आये. मेरे दोनों हाथ बांध दिये गये हैं. मैंने गुहार लगाने की कोशिश की तो एक पुलिसिये ने मेरे मुंह पर ऐसा घूंसा मारा कि लगा जैसे मैं मर जाऊंगी. पुलिसियों ने उस छोटे से कमरे की हर चीज को तहस-नहस कर दिया. कमरे में रखी सारी किताबों को सामने डाल कर वे बैठे हैं. यह संदर्भ मुझे नया नहीं लगा क्योंकि ऐसी बातें हमे हमेशा सुनाई पड़ती रहती हैं. सुबह एक साथी शहर से आनेवाला है. अगर वह यहां आता है तो पुलिस के हाथ पड़ जायेगा. इसके अलावा मेरे पति को देने के लिए एक पत्र आया है जिसे मैंने एक किताब में रखा है. अगर वह पुलिस के हाथ लग जाता है तो... होनेवाले अनर्थ की चिंता होती है.

यह समय रोने-पीटने, हैरान होने या सोचने का नहीं है. झटपट कुछ करने का समय है. मेरे हाथ बंधे हैं. मैं हाथों का इस्तेमाल नहीं कर सकती हूं. मेरा मुंह तो खुला है. मैं जोर-जोर से बोलना शुरू क रती हूं. मैं कभी अश्लील बातें मुंह से नहीं निकालती. पर उस समय मैं भद्दी और गंदी गालियां देने लगती हूं. गालियां देने पर वे जानवर भी मुझ पर टूट पड़े और मुझसे अधिक जोर -शोर से गलियां देने लगे. साथ ही मुझे मारने लगे. वे जितना जोर-शोर से गालियां दें, उतना ही अच्छा है. मैं उन्हें जितना उकसा सकूं, उतना ही उच्छा है. क्योंकि मेरा पति आनेवाला है... और शहर से साथी भी आनेवाला है. वे दोनों घर में होनेवाले इस शोर-शराबे को अगर सुन लें तो भाग कर अपने को बचा सकते हैं. इसी मकसद से मैं पूरी ताकत लगा कर गालियां दे रही हूं. मुझसे बढ़ कर जोर-शोर से गालियां वे भी बक रहे हैं. एक बूढ़ा सियार मेरे पति के लिए मृत्यु के रूप में दीवार की आड़ में खड़ा इंतजार कर रहा है. मैंने उसे भी गालियां देनी शुरू की हैं. वह हांफता हुआ मुझ पर आ गिरा. इसके बाद क्या हुआ, मुझे मालूम नहीं लेकिन मैं जीवित हूं. समुद्र-तल से भींगी उन रेतीली पगडंडियों पर मैं और मेरा पति, दोनों चल रहे हैं. अभी-अभी निकाले गये हमारे फोटो के पीछे दोनों सही कर रहे हैं. मेरा नन्हा-मुन्ना नींद में हंस रहा है. कितनी अदभुत है वह हंसी. मेरे पांवों को कोई खींच रहा है, कमरे में इधर-उधर बिखरी चीजों से मेरे पैरों के लगने से अगर आवाजें निकलतीं तो कितना अच्छा होता. वे जानवर मुझे गालियां दे रहे हैं. मुझे कुछ भी मालूम नहीं पड़ रहा है. इसके सिवा और कुछ नहीं मालूम हो रहा है कि ... सारी दुनिया में मुझ जैसी बहनें पेट के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं... कीचड़ में उतर कर धान की पौध रोप रही हैं. खेत की मेंड़ों पर या पेड़ों की डालियों पर डाले झूलों में उनके बच्चे दूध के लिए रो रहे हैं. ओ मेरे नन्हे-मुन्ने बच्चों, मैं तुम्हारे लिए मौत को गले लगा रही हूं. मैं अपने आप से कह रही हूं कई बार..

वे मेरे नाम की पुकार लगा रहे हैं. अभी दो बार और पुकारेंगे. आपके और मेरे बीच की दूरी नहीं है. चट्टान जैसे कलेजे पर लोहे के बूटों की लातें फिर भी यह सब आपके और मेरे दरमियान बाधा नहीं बन सकता . मैं चुप हूं...

फिर भी... मैंने और मेरे पति ने जिस गांव को बेहद प्यार किया है. उस गांव के लोगों. मैं तुम सबसे बातें कर सकती हूं. तुमलोगों की निगाहें मेरी निगाहों से मिल रही हैं. वे दूसरी बार मेरे नाम की पुकार लगा रहे हैं. शायद अब मेरे मुकद्दमे को खारिज भी कर सकते हैं. मुझे गोलियों से उड़ा भी सकते हैं.उनकी मरजी.
ओ मेरे गांववासियों. हम दोनों तुम्हारे गांव में कहां से आये हैं, यह तुम्हें मालूम नहीं फिर भी तुम लोगों ने हमें भरपूर प्यार दिया है. हमारे लिए मुट्ठी भर चावल के दानों का इंतजाम किया है. थोड़ा-सा चावल-मांड हमारे लिए छुपा कर रखा है. अपने फटे -पुराने बिस्तरों पर हमें जगह दी है. गरीबी से मारे तुम लोगों ने अपने दिल में जगह दी है. हमारे लिए`सेंट्री' की ड्यूटी (पहरेदारी) की है. हमें गले लगाया है. रोया है. कितने अद्भुत इनसान हो तुम लोग. तुम लोगों से प्यार करना क्या कुसूर है? क्या इस कारण हम कुसूरवार होते हैं?

तुम लोगों से कुछ दूरी पर, उस पेड़ के नीचे दो बूढ़े बैठे हैं. तुम लोग उनको नहीं जानते. वे मेरे मां -बाप हैं. पिता यीशू के भक्त हैं. उन्होंने मेरे लिए आंसू बहाते हुए यीशू से शायद दुआ भी मांगी होगी. मेरी मां ने भी दुआ मांगी होगी, लेकिन वे नहीं जानते कि हमारे ये शासक रोमन शासकों से भी ज्यादा दुष्ट, अत्याचारी और जुल्मी हैं. मेरे मां-बाप से कुछ दूरी पर जो दो बूढ़े बैठे हैं. वे मेरे माधव के माता-पिता हैं. माधव की मां, मेरी सास बड़ी निष्ठावान स्त्री हैं. बिना स्नान -पूजा के खाना पकाती तक नहीं. फिर भी, मेरी सास मेरे पास आयी. मेरे माधव ने जिन आंखों को बहुत प्यार किया था उन आंखों की तरफ अपलक देखती रहीं. फिर उसने मेरे गालों को चूम कर मुझे अपने प्यार से सराबोर कर दिया.

तीसरी बार मेरे नाम की पुकार लगायी गयी है. लोहे के बूट मेरी बगल में ठक-ठक शब्द कर रहे हैं. कोर्ट हॉल में मान्यवर आंखें मेरे लिए इंतजार करती होंगीं. मैं अब जा रही हूं प्यारे, दोस्तों अब मैं रुख्सत होती हूं.

ओ मेरी मां. मेरे गालों पर एरंड का तेल मलनेवाली मेरी मां, मेरे गालों को चूमनेवाली सासू मां, मेरे पिताजी, इस देश के करोडों-करोड़ लोगों में ही तुम्हारे बच्चे हैं. इस देश की जनता की आखों में ही हमारी आंखों को देख लीजिए. उनकी हंसी में हमारी हंसी छिपी मिलेगी...
जीना कुसूर नहीं है. जीने की चाह करना दोष नहीं है. हमने जीवन से प्यार किया है, शोषण से नफरत की है. इसके लिए हम इस देश में कुसूरवार हुए हैं. इस तरह का मूल्यवान और महत्वपूर्ण कुसूर हम जिंदगी भर करते रहेंगे.

अलविदा. कुसूरवार की कब्र पर गुलाब का पौधा लगाना भूलियेगा नहीं.

काले सूरज की रोशनी

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/15/2007 12:32:00 AM

एक बार फिर निकर-लाठीधारी भगवा गिरोह अपने एजेंडे पर है. राम को फिर से झाड-पोंछ कर जगाया जा रहा है और इस बार पूरे नाटक की नाभिनाल जुडी़ है पत्थरों से बनी एक ऐसी संरचना से जो पुल की तरह लगती है और जिसे कई लाख साल पहले का बताया जा रहा है. हालांकि यह पुल खोजनेवाली एजेंसी नासा पहले ही इसके बारे में किये जा रहे अतिशयोक्तिपूर्ण दावों को खारिज कर चुकी है. मगर इससे उन्हें क्या लेना-देना जो यह मानते हैं कि दुनिया केवल आस्था और विश्वास के बल पर ही चलती है.

और ऐसी ही अंधेरगर्दी में लालिमा ने एक अलबम बनाया- जो इसी गुंडा गिरोह के काले कारनामों की एक बार फिर याद दिलाता है. इसे उन्होंने अपने ब्लाग पर पोस्ट किया है, जहां से हम साभार यहां दे रहे हैं. इसके अधिकतर फोटो गुजरात दंगों के हैं.

देखिए, फ़ासीवाद की प्रयोगशाला की कुछ पुरानी तसवीरें

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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