हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कितना ललितललाम यार है, भारत घोडे़ पर सवार है

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/26/2007 11:20:00 PM

रेयाज-उल-हक

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58 में उत्तर प्रदेश के ज़िले बस्ती के दीक्षापार गांव में जन्मे अष्टभुजा शुक्ल के लिए कविता करना कवियों की पांत में शामिल होने के लिए किया गया कोई अनुष्ठान नहीं है. कविता उनके अनुभवों से निकलती है-पर वे अनुभव खालिस निजी नहीं, अपने गांव और अपने परिवेश से जुडे़ हुए हैं. वे ठेठ और भदेस भारतीय मुहावरों और संवेदना के क वि हैं- ग्रामीण समाज जहां गुंथा-बझा होता है, अपने पूरे संघर्षों और पूरे संदर्भों के साथ.
कोई कविता अपने को खुद प्रमाणित करती है. वह समाज का कितनी दूर तक साथ देती है, यही कविता की असली कसौटी है.

रविवार की दोपहर बाद एक काव्यपाठ में कवि अष्टभुजा शुक्ल जब यह कह रहे थे-वे इसके तुरंत बाद पढ़ी गयी अपनी कविताओं के जरिये इसे साबित भी कर रहे थे. अपनी कविताओं के जरिये प्रकारांतर से उन्होंने यह भी बताया कि जो कविता समाज का साथ नहीं देती-उसका साथ समाज भी नहीं देता.
जसम
द्वारा आयोजित एकल काव्य पाठ में अष्टभुजा शुक्ला ने कविता पढ़ने की शुरुआत अर्थात पहाड़ से की. पहाड़ यहां एक संवेदनशील और जिम्मेवार भूमिका के साथ सामने आया है-छेनी से काटने पर अगर चिनगारी निकालने लगते हैं तो, पत्थरों की ओर से हम क्षमा मांगते हैं. यहां हम अर्थात पहाड़. अगली कविता में शुक्ला ने अपने पिता को याद किया-एक अच्छे लोक गायक और मां के नायक पिता को. इसके बाद की कविता में मां भी आयीं जिनकी धोती पिता की धोती से तीन गुनी ज्यादा चलती थी, सी-सी कर.
कवि की संवेदना के सूत्र एक तरफ ऊंट से जुड़ते हैं तो दूसरी तरफ वह चैत के बादलों के प्रति किसानों के रोष को भी प्रकट करता है. कहने की बात नहीं है कि यहां चैत के बादल सिर्फ चैत के बादल नही हैं. अष्टभुजा शुक्ला के यहां संवेदना कितने धरातलों और आयामों में यात्रा करती है, इसका एक उदाहरण है किलने नामक कविता. सूखे में बरसात और माई कविताएं भी लोगों को पसंद आयीं. अपने चर्चित संकलन पद-कुपद से अष्टभुजा जी ने कई पद सुनाये-भज आलोचक, कविजन खोज रहे अमराई, और नहीं अब सहनेवाली, पॉलीथीन अपना परिधान आदि. उन्होंने अपनी नयी कविता हाथा मारना भी सुनायी-जो बकौल अरुण कमल देश के धुर गांवों में पूंजीवाद के प्रभाव को रेखांकित करती है. काव्यपाठ की अध्यक्षता कर रहे कवि अरुण कमल ने कहा कि अष्टभुजा शुक्ल व्यवस्था विरोध के कवि हैं. उन्होंने कविता के पारंपरिक चरित्र में बदलाव लाया है.
पेश है आज कवि अष्टभुजा शुक्ल की कुछ चर्चित रही कविताएं. इनमें से एक कविता-भारत घोडे़ पर सवार है-के बारे में अरुण कमल ने बताया कि जब वह पहली बार छपी थी-आलोचना में, तो उस पर काफ़ी विवाद भी हुआ था, और अखबारों में बयान तक दिये गये थे. उन्होंने कहा कि यह शायद पहली कविता है जिसको लेकर अखबारों में इस तरह से बयान दिये गये. प्रसंगवश यहां यह भी बताते चलें कि इसी कविता को हमलोग पटना के नुक्कड़-चौराहों पर धरना, जुलूस, प्रदर्शनों और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गाते रहे हैं. यहां पटना में यह गीत अमिताभ के नाम से जुड़ गया है, जिन्होंने हमारा पहला परिचय इस कविता से कराया. तो अब कविताएं...ये कविताएं हमें समकालीन जनमत (पत्रिका) के संपादक सुधीर सुमन के सौजन्य से मिलीं.

















तसवीर में बायें से :
अष्टभुजा शुक्ल
, तीसरे स्थान पर अरुण कमल, बीच में सफ़ेद नीले कुरते में कथाकार हृषीकेश सुलभ. उनके आगे नीली शर्ट में कर्मेंदु शिशिर. सबसे आगे, सफ़ेद कुरते में (दायें) खगेंद्र ठाकुर. तसवीर अमृत जयकिशन की. प्रभात खबर से साभार.




लेकिन हमें

हमें भले ही पसीने में नहाना पड़े
लेकिन किसी को अंगराग न लगाना पड़े
हमें आधा खाना पड़े, आधा सोना पड़े, आधा पहनना पड़े
लेकिन हमें किसी के राज में न रहना पड़े
हमें भले ही दूसरों के जूते मरम्मत और पालिश करना पड़े
लेकिन हमें किसी को जूते पहनाना न पड़े
हमें भले फलों के बारे में ज्ञान कम हो
लेकिन हमें आम को इमली और इमली को आम न कहना पड़े
हमें होंठ सी लेने पड़े, आंखों से बोलना पड़े और
त्वचा से सांस लेनी पड़े
लेकिन तुम्हें प्यार के विरुद्ध कभी मुंह न खोलना पड़े.

गणित के कुछ प्रश्न

कोई दूकानदार
एक बोरी यूरिया में
एक बोरी पिसा नमक मिलाता है
तो उसकी आय
उसकी लागत की तिगुनी हो जाती है

वही खाद
एक लघु सीमांत किसान
जब अपने खेत में डालता है
तो उसकी आय
उसकी लागत की
आधी आती है
किसान की
किस पीढी़ का बच्चा
दूध भात खायेगा
एवं किस युग के किस चरण में
रामराज्य अथवा समाजवाद आयेगा?

भारत घोडे़ पर सवार है

एक हाथ में पेप्सी कोला
दूजे में कंडोम
तीजे में रमपुरिया चाकू
चौथे में हरिओम
कितना ललित ललाम यार है
भारत घोड़े पर सवार है

एड्स और समलैंगिकता की
रहे सलामत जोड़ी
विश्वग्राम की समता में
हमने सीमाएं तोड़ी
दुनिया पर एकाधिकार है
भारत घोड़े पर सवार है

आठ हजार जेन की मारूती
बिकी मुक्त बाजार
एक हजार पुस्तकें छप कर
पड़ रहीं बेकार
वैभव द्विज, रचना चमार है
जगद्गुरु उत्तम विचार है
भारत घोड़े पर सवार है

कहीं बलात्कार हो जाये
तो चुप रहना नारी जी
बूढ़ी होने पर मुआवजा
देंगे अटल बिहारी जी
तीस फीसदी पर विचार है
भारत घोड़े पर सवार है

तुम भी खालो हम भी खा लें
थोड़ा-थोड़ा देश बचा लें
जब तक जीयें झोंपड़ी-झुग्गी
तब तक अपनी सौंध उठा लें
लालू जी कैसा बिहार है
भारत घोड़े पर सवार है

चंद्रशेखर जी दा़ढी में
कुछ फंसे हुए हैं तिनके
बाल ठाकरे हार चुके
रुद्राक्षी दाने गिन के
कितना पक्का जनाधार है
भारत घोड़े पर सवार है

शासन और प्रशासन से ही
सड़क नहीं है खाली
बची-खुची जगहों पर बाबू
पुलिस पहुंचनेवाली
जनता की सरकार यार है
भारत घोड़े पर सवार है

दुनियावालों आकर देखो
यहां अहिंसा रोती
जाती हुई सदी में भारत
खोल चुका है धोती
आर्यपुत्र को रथ विकार है
हलो! फोन का कटा तार है
भारत कितना मजेदार है
भारत घोड़े पर सवार है.

कल पढिए अष्टभुजा शुक्ल से एक बातचीत तथा कुछ और कविताएं.
कवि की तीन कविता की किताबें अब तक आयी हैं- पद-कुपद, दुस्स्वप्न और चैत के बादल. इसके अलावा मिठउना(ललित निबंध संग्रह) अवधारणा एवं सृजन (ललित निबंध) भी उनकी कुछ अन्य किताबें हैं. उन्होंने अतिक्रमण नाम की लघुपत्रिका का भी संपादन किया है.

सुनिए : भागो मत दुनिया को बदलो

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/25/2007 10:38:00 PM

अमिताभ का एक गीत हम सुन चुके हैं. उनके बहुत सारे गीत अभी किसी अलबम का हिस्सा नहीं बने. इस बार सुनिए उनका एक और गीत-भागो मत दुनिया को बदलो.







बिहार के माथे पर और कलंक मत लगाइए साथी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/24/2007 11:20:00 PM

कुमार अनिल
कुछ दिनों पहले पटना से प्रकाशित एक प्रमुख हिंदी दैनिक के पहले पन्ने पर खबर छपी कि बेगूसराय के बाढ़पीड़ित अब जलदस्युओं से दहशत में हैं. खबर चौंकानेवाली थी. बिहार के माथे पर पहले ही गरीबी, पिछड़ेपन, जातीय हिंसा व पलायन के कलंक लगे हैं. अब ये जलदस्यु कहां से आ गये? खतरनाक लुटेरे, जो समुद्र में यात्रियों या मालवाहक पोतों को लूटते रहे हैं. खूंखार व निर्दयी. क्या बिहारी समाज और खास कर बेगूसराय आज भी 17 वीं या 18 वीं शताब्दी में जी रहा है. सच्चाई यह है कि ये तो हालात के बनाये टुटपुंजिये चोर हैं. बरतन व पुराने कपड़े चुरानेवाले साधारण चोर. लोगों के जागते ही भाग खड़े होते हैं. चोरी की घटनाएं भी उंगली पर गिनने लायक हैं. जलदस्यु की उक्त खबर को देख कर कोई समझेगा कि बिहारी समाज आज भी 18वीं शताब्दी में है. उसे हॉलीवुड की फिल्म पायरेट्स ऑफ कैरिबियन की याद आ सकती है.

इस बाढ़ में बेगूसराय ने एक नया उदाहरण पेश किया है. बसही में जब बांध टूटा, तो सबसे पहले आस-पास के नौजवान दौड़े. उन्हें आपदा प्रबंधन की कोई ट्रेंनिंग नहीं मिली थी. उन्होंने अपनी कमर में रस्सा बांधा, उसे किसी पेड़ से बांधा व गंडक की धार में कूद पड़े. सैकड़ों लोगों को जान पर खेल कर बचाया. ऐसा करनेवाले एक-दो नहीं सैकड़ों नौजवान थे. बचाव के दूसरे दौर, भोजन व जरूरी सामान पहुंचाने में भी उन्होंने सरकार व दलों को पछाड़ दिया. बसही से पहले मोहनपुर गांव है. इस गांव से चार-चार टीमें राहत का सामान रोज लेकर निकलती हैं.ऐसे गांवों की कमी नहीं है. स्थिति यह है कि रोटी-अचार का पैकेट बना कर दिन-दिन भर युवक नाव की खोज करते हैं. बेगूसराय से बसही के बीच 30 किमी की दूरी में जगह-जगह जनता ने अपनी पहलकदमी पर लंगर खोल दिये हैं. किसी अजनबी को देखते ही पूछते हैं, क्या आप बाढ़पीड़ित हैं. अगर हां कहा, तो वे आपको पकड़ कर कहेंगे कि चलिए, पहले खाना खा लीजिए. यह मदद के लिए जनता का उभार है. स्वत:स्फूर्त उभार.

'सच्चाई बयान करने से बचना आत्महत्या के समान है- तसलीमा नसरीन

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/24/2007 01:42:00 AM

तसलीमा नसरीन से मार्कस डैम की बातचीत

तसलीमा नसरीन पर हैदराबाद में हुआ हमला देश की अभिव्यक्ति की आज़ादी के ऊपर हमला था. देश में जिस तरह डेमोक्रेटिक स्पेस कम होता जा रहा है-कम किया जा रहा है, यह उसका एक ताजा नमूना था. प्रस्तुत है, उस हमले के बाद लिया गया तसलीमा का एक इंटरव्यू-जो द हिंदू के 16 अगस्त, 2007 अंक में छपा था. इसका अनुवाद अशोक यादव ने किया है. अशोक जी युवा सामाजिक कार्यकर्ता हैं. यह अनुवाद हमें जनविकल्प के संपादक प्रमोद रंजन के सौजन्य से प्राप्त हुआ.

हैदराबाद के प्रेस क्लब में आप पर हुए हमले को आपने 'मौत से साक्षात्कार` कहा है. जीवन के प्रति आप के दृष्टिकोण पर इस घटना ने क्या प्रभाव डाला है?
इस एक घटना ने जीवन को ज्यादा कीमती बना दिया है. मौत से मेरी यह मुठभेड़ इतना नजदीक थी मानों मैं मौत से घूम कर आयी हूं. 30 मिनट की उस घटना के दरम्यान क्षण-प्रतिक्षण मैं यही सोचती रही कि मौत मुझे ले जाने आखिर आ ही गयी. मेरे दिमाग में यही बात घूमती रही कि मौत कैसी होगी, यातनाभरी या किसी अन्य तरीके से. जब मैं अंतत: बचा ली गयी तो मुझे ऐसा लगा मानों मैं मौत के जबड़े से निकल कर आयी हूं. मेरे लिए जीवन अपने उसूलों के लिए संघर्ष करने के लिए जीना है. मृत्यु ने इसका अंत कर दिया होता.

इस घटना ने जीवन के प्रति आपके दृष्टिकोण (अर्थात लिखने के लिए जीना) को गहरा किया है?

बिल्कुल ठीक कहा आपने. मैं जीती ही क्यों हूं? जब मेरे पास एक जीवन है तो इसे इस्तेमाल करने तथा ज्यादा अर्थवान बनाने की जरूरत है. यह कोई पहली बार नहीं है जब मुझे मौत की धमकी मिली है. मौत की पहली धमकी 1989 में मिली जब मैंने गंभीरता से लिखना शुरू ही किया था. तब से मेरे साथ मार-पीट की कोशिशें तथा गाली-गलौज, दोनों हुई हैं. मुझे अपना वतन छोड़ना पड़ा. मेरी रचनाओं को प्रतिबंधित किया गया, मैं निर्वासन में जी रही हूं, लेकिन मैं अपने विश्वास से डिगी नहीं हूं. ऐसी विपत्तियों ने मुझे मजबूत ही किया है. लेकिन हाल में हैदराबाद का हमला सबसे भयानक था.

मैं केवल मानवतावादी नहीं बल्कि मनुष्य भी हूं. यह घटना दु:स्वपन की तरह मेरा पीछा कर रही है. इस घटना को याद कर मैं भीतर से कांपने लगती हूं.
खास कर एक लेखिका के तौर पर लगतार भय तथा सुरक्षा में जीना क्या मायने रखता है? क्या इससे आपकी आजादी बाधित हुई है?

कब तक मैं एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश भटकती रहूंगी? 13 सालों से मैं ऐसी ही जिंदगी जी रही हूं। मैं कुछ समझ नहीं पाती. कठमुल्ले कोई एक नहीं, बल्कि हर जगह मौजूद हैं. उनके हाथ लंबे हैं. क्योंकि वे मुझे अपना दुश्मन मानते हैं, इसलिए मौत के साये में हमेशा रहना पड़ता है. उनको पछतावा हो रहा है कि मैं बच गयी. उन्होंने सिर कलम करने का फतवा फिर जारी किया है. मैं कहां जाऊं? मैं केवल जीना तथा मन से लिखना चाहती हूं.

हां, मुझे सुरक्षा दी गयी है. इसके चलते मैं प्रतिबंध में जीती हूं. क्या एक सामान्य व्यक्ति की तरह घूमना-फिरना, बाजार जाना तथा दोस्तों से मिलना मैं नहीं चाहती हूं? एक अर्थ में ऐसा जीवन जीना कठिन है, लेकिन दूसरे अर्थ में मैं ज्यादा संकल्पशील बनती गयी हूं, लिखने की प्रतिबद्धता बढ़ती गयी है. मेरे शब्दों को गंभीरता से लिया जा रहा है, तभी तो मेरे ऊपर हमले हो रहे हैं, अन्यथा इन हमलों की और क्या वजह हो सकती है? सच चोट करता है और कुछ लोग को सचमुच चोट पहुंची है, इतनी चोट पहुंची है कि सच से दूर भाग कर मेरे पीछे लग गये हैं. लेकिन मेरे लिए सच्चाई बयान करने से बचना तथा नहीं लिखना आत्महत्या के समान है.

सच चाहे जितना कड़वा क्यों नहीं हो, लेकिन मामला चोट लगने से निश्चय ही ज्यादा का है.
मेरे खिलाफ घृणा का अंतहीन प्रचार है-पुरुषवादियों से लेकर तत्ववादियों और धार्मिक जुनूनी-सभी मेरे पीछे पड़े हुए हैं. इस्लामी तत्ववाद के खिलाफ बोलने का मैंने, बहुत बड़ा खतरा उठाया है, लेकिन ऐसा मैं एकमात्र उद्देश्य मुस्लिम समाज को चेतना देने तथा यह दिखाने के लिए कह रही हूं कि ज्यादा उदारतावादी विकल्प मौजूद हैं.

इसलिए हैदराबाद जैसे हमले लगभग अवश्यंभावी हो गये हैं. मेरे दुश्मन केवल मुस्लिम तत्ववादी ही नहीं बल्कि इसके अलावा अन्य धर्मों में भी मौजूद हैं. हिन्दू और ईसाई उग्रवादी जो कि समानता के खिलाफ हैं, वे भी मुझ पर प्रहार करते हैं. बांग्लादेश में 1991 में बने Smash Taslima Committee (तस्लीमा को मारो कमिटी) की तरह कमेटियां भी मौजूद हैं. उनका उद्देश्य मुझे खत्म करना है.
मुझ पर हमला करने की दूसरे देशों, इंग्लैंड और यूएस के विश्वविद्यालयों में भी; योजनाएं बनी हैं-औरतों के अधिकार तथा समानता को लेकर मेरे लेखन और संघर्ष के कारण.

ऐसी ताकतें पूरी दुनिया में बढ़ रही हैं. कई मामलों में सरकारें तथा राजनीतिज्ञ दोषी हैं. राजनीतिक लाभों के लिए अल्पसंख्यकों को अक्सर तुष्ट किया जाता है, उनके भीतर की हिंसा को अक्सर माफ किया जाता है. तथाकथित उदारवादी, बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा भी इनको बचाने के नाम पर धार्मिक उग्रता को छुपा समर्थन देते हैं.

ऐसा अल्पसंख्यकवाद अंतत: तत्ववाद तथा दकियानूसी को प्रोत्साहन देता है, जिससे जागृति को नुकसान पहुंचता है. जब तक अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा में नहीं मिलाया जाता है तब तक वे अलग-थलग रहेंगे और असिहष्णुता तथा पोंगापंथ भी जीवित रहेगा.
हैदराबाद हमले के खिलाफ बुद्धिजीवियों का विरोध ज्यादातर शांत ही रहा.

विरोध ज्यादा तीखे होने चाहिए थे. खतरे में केवल तसलीमा नहीं है बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं विदेशी हूं या शरणार्थी हूं.

हमलावर मुझे शरणार्थी कहते हैं लेकिन क्या वे सोचते हैं कि इस देश में मेरी तरफ लिखने तथा बोलने वाला कोई पैदा नहीं होगा?
मेरे कुछ साथी हमले के विरोधी हैं किंतु मेरी रचनाओं की आलोचना भी करते हैं. ऐसा क्यों हैं? मेरी सभी रचनाएं धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद, की़ अधिकार, आजादी और समानता के पक्ष में वक्तव्य है. वे शरीयत के खिलाफ हैं. मैं उनसे पूछना चाहती हूं कि मेरे किन मूल्यों पर उनको एतराज है. यदि उन्हें ये मूल्य स्वीकार्य नहीं हैं तो वे भी खतरनाक हैं.

ऐसे भी बुद्धिजीवी हैं जो अनजाने ही धार्मिक उग्रवादियों के हाथों में खेल जाते हैं. वे इनके तलवारों की धार तेज करते हैं. जिन्हें वे प्रगतिशीलता कहते हैं वह हकीकत में समाज को अंधकार की ओर ले जाने वाला होता है. हालांकि उनके तौर तरीके तत्ववादियों से कुछ अलहदा हो सकते हैं. जब हिन्दू तत्ववादी हमला करते हैं तो प्रतिक्रिया तेज होती है किंतु मुस्लिम उग्रवादियों के मामले में प्रतिक्रिया शांत होती है-केवल इसलिए कि मुस्लिम समाज अल्पसंख्यक समुदाय है, जिसे सुरक्षा की जरूरत है.

हैदराबाद में जब हमलावर मेरी ओर आक्रामक अंदाज में बढ़े तो उनकी आंखों में गुस्सा था, घृणा थी जिसे अंधेरे की ताकतों ने पैदा किया था. शायद असली दुश्मन इतनी आसानी से नही दिखायी देते हैं.

ऐनी आपा अपने पीछे सन्नाटा छोड़ गयी हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/22/2007 01:03:00 AM


आज दो श्रद्धांजलियां. ऐनी आपा नहीं रहीं. यह खबर एक सदमे की तरह आयी. लगा, ऐसे समय में, जब इतने हमले हो रहे हैं इनसानियत पर, इतनी शदीद बमबारी हो रही है फ़र्दा की तमाम उम्मीदों पर, एक प्यार करनेवाला और अजीज़ साया उठ गया सर के ऊपर से. वे हमारे लिए सेक्युलरिज़्म और जम्हूरियत की मुजाहिद थीं. उर्दू अदब में शायद वे अंतिम थीं-इस्मत आपा और राजेंद्र सिंह बेदी की विरासत से आनेवालीं. हम नहीं जानते कि आग का दरिया और आखिरे शब के हमसफ़र के कितने अल्फ़ाज़ हमारी नसों में खून के साथ बह रहे हैं. हम शायद बहुत दिनों तक यकीन नहीं कर पायेंगे कि यह दुनिया ऐनी आपा के बिना चल रही है. सफ़दर भाई उन्हें याद कर रहे हैं.
और आप सबने दशरथ मांझी के निधन के बारे में सुना, पढा. उन पर पटना के एक शोधार्थी ने संस्मरण लिखा है.


ऐनी आपा अपने पीछे सन्नाटा छोड़ गयी हैं

सफदर इमाम कादरी
कुर्रतुलऐन हैदर के उपन्यास और कहानियों में भारतीय वांग्मय की स्पष्ट रूप रेखा दिखाई देती है. संसार में ऐसे लेखक बहुत थोड़े हैं, जिनके पास अपनी संस्कृति और इतिहास की गंभीर समझ के साथ अत्यंत व्यापक विश्वदृष्टि भी होती है. पाश्चात्य और प्राच्य का कुर्रतुलऐन हैदर जैसा संगम व्यक्तित्व भारतीय लेखकों में विरले ही मिलेगा. लगभग आधी सदी से कुर्रतुलऐन हैदर विश्वमंच पर उर्दू कथा साहित्य का प्रतिनिधित्व करती रहीं और मात्र 32 वर्ष की आयु में लिखे गये अपने कालजयी उपन्यास आग का दरिया के चमत्कृत और वशीभूत कर देनेवाले अंदाज से एक स्थायी पहचान बनाने में सफल रहीं. 20 जनवरी, 1927 को अलीगढ़ में उनका जन्म हुआ. उनके पिता सज्जाद हैदर चल्दरम उर्दू के पहले कथाकार हैं और उनकी माता नजर सज्जाद उपन्यासकार रही हैं. उन्होंने अंगरेज़ी भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर करने के साथ संगीत, कला, पत्रकारिता और फिल्म निर्माण जैसे विविध क्षेत्रों की शिक्षा भारत और यूरोप के ख्यातिप्राप्त संस्थानों में प्राप्त की. वे अंगरेज़ी पत्रकारिता से भी जुड़ी रहीं. लंदन के कई श्रेष्ठ अखबारों में काम करने के बाद इंप्रिंट और इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादन विभाग में अपना बहुमूल्य योगदान दिया. प्रगतिशील आंदोलन के उत्कर्ष काल में कुर्रतुलऐन हैदर ने अपना लेखन कार्य शुरू किया.


बातचीत बीबीसी हिंदी.काम से साभार

एक शाम शीर्षक क हानी 1943 में छपी, जिसे उनकी पहली रचना माना जाता है उन्होंने रचनात्मक विविधता को शुरू से अपने लेखन का आधार बनाया तथा एक साथ कहानी, उपन्यास, रिपोर्ताज, आत्मकथा, लेख, समीक्षा, फोटोग्राफी, पेंटिंग और अनुवाद कार्य किया. उनके कट्टर आलोचकों का भी यह मानना है कि उनके पास कहने के लिए कुछ विशेष संदर्भ हैं, जिन्हें वह अपनी भाव पूर्ण शैली से पेश करती रहती हैं.

असल में कुर्रतुलऐन हैदर ने भारतीय समाज की सांस्कृतिक एवं दार्शनिक बुनियादों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करते हुए अपनी रचनाशीलता का ऐसा एक गंभीर, आकर्षक और भव्य संसार निर्मित किया जिसका चमत्कार कभी कम नहीं हुआ. कुर्रतुलऐन हैदर ने स्मृतियों के सहारे भारतीय समाज को अपने उपन्यासों में रेखांकित किया है. उनका ज्ञान, संपूर्ण शोध और अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारियां, सब उनकी स्मृतियों में समा कर जीवन गाथा बन जाती हैं.
तकनीक के स्तर पर उन्होंने जबरदत प्रयोगधर्मिता दिखायी. उनका पात्र पलक झपकते हजारों वर्ष की यात्रा करके हमारे सामने खड़ा हो जाता है. वर्तमान, भूत और कभी-कभी भविष्य गड्ड-मड्ड करके वे अपनी जादुई यथार्थवादिता को स्थापित करती है. स्मृतियों का यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में ऐसा सर्वकालिक उपयोग बहुत कम लेखकों ने किया है. इसलिए इतिहास और संस्कृति का उनका औपन्यासिक विश्लेषण अनूठा माना गया तथा दर्जनों भाषाओं में उनकी रचनाओं का बार-बार प्रकाशन होता रहा.

कुर्रतुलऐन हैदर की मौत से उर्दू रचनात्मक साहित्य की वह धुरी समाप्त हो गयी, जहां रचनात्मक साहित्य बौद्धिक उद्बोधन के साथ समाज में अग्रणी भूमिका निभाता है. उन्होंने अपने साक्षात्कार और लेखों में जिस बौद्धिकता के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिदृश्य का विश्लेषण किया है वह किसी दूसरे रचनाकार के यहां शायद ही दिखायी दे. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर वे उर्दू की पहचान थीं. उनके होने से उर्दू की मजबूत उपस्थिति मालूम होती थी. वे सभी भाषाओं के लेखकों के बीच बहुत आदर के साथ सर्वस्वीकृत थीं. उनकी मौत के बाद उर्दू साहित्य जगत में कोई ऐसा दूसरा व्यक्तित्व दिखाई नहीं देता, जिसकी इतनी मजबूत सार्वजनिक उपस्थिति हो. भारतीय स्त्री समाज से शिखर पर पहुंचनेवाले रचनाकार यों भी कम हैं. उनके बाद शायद यह खाई फिर न भरी जा सके. इस्मत चुगताई की मौत के बाद कुर्रतुलऐन हैदर ने वह जगह भरी थी, लेकिन उनके बाद दूर-दूर तक सन्नाटा है.

रेखांकन सफ़दर भाई के सौजन्य से.


उन्हें हमेशा दूसरों की ही चिंता रही
अरुण सिंह
न्म और मृत्यु के बीच का फासला एक अनिवार्य नियति है, लेकिन इतिहास में हर कोई दर्ज नहीं हो पाता. इसके लिए इस फासले को एक मकसद बनाना पड़ता है. कबीर के अनुयायी दशरथ मांझी ने जीवन के इस मकसद को बखूबी पहचाना.उस दिन की भेंट आखिरी भेंट होगी, यह मुझे पता नहीं था. पटना में बुद्धमार्ग पर एक दुकान पर चाय पी रहा था. तब वे दिखे. मुख्यमंत्री से जनता दरबार में मिल कर आ रहे थे. बहुत प्रसन्न दिख रहे थे. मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी कुरसी पर बिठा कर सम्मानित किया था. बताने लगे-मुख्यमंत्री ने उस रास्ते पर सड़क बनाने की सहमति दे दी है. अस्पताल भी बनेगा. जल्दी ही शिलान्यास के लिए चलेंगे. उनकी छोटी-छोटी आंखें खुशी से चमक रही थीं.
यह दशरथ मांझी थे. जिन्हें मीडिया ने माउंटेन मैन, माउंटेन कटर और न जाने क्या-क्या नाम दे रखा है. बरसों पहले मैं उनसे पहली बार मिला था. वह 1988 का सितंबर था. किसी ने दशरथ मांझी के बारे में बताया कि एक ऐसा भी व्यक्ति है, जिसने लगातार 22 वर्षों तक अकेले अपने हाथों पहाड़ काट कर रास्ता बनाया है. उत्सुकता हुई तो उनकी खोज में लगा और एक दिन मैं उनके गांव की छोटी-सी कुटिया में उनके सामने बैठा था.

-क्या आपने ही पहाड़ी काट कर रास्ता बनाया है? क्या वह रास्ता मुझे दिखायेंगे?- मैं अब भी विश्वास नहीं कर पा रहा था.

-हां, हमने ही पहाड़ी काट कर रास्ता बनाया है- उनके चेहरे पर मासूम-सी मुस्कुराहट चली आयी थी, जिसमें थोड़ी झिझक भी शामिल थी, मानो किसी बच्चे ने गलती से कोई अच्छा काम कर दिया हो और अब उसे स्वीकार करने में झिझक रहा हो. तब उन्होंने वह पहाड़ी और वह रास्ता दिखलाया था. मैं देख कर दंग था. एक चट्टान पर छेनी से पहाड़ी काटने का विवरण लिखा हुआ था. उन्होंने उस पर हाथ रख कर बतलाया- यह देखिए, सारा कुछ इस पर लिखा हुआ है. वहां पहाड़ी काटने का विवरण अवश्य था, किंतु दशरथ मांझी का नाम कहीं नहीं था. हां, उस व्यक्ति ने चालाकी से वहां अपना नाम जरूर लिख दिया था, जिसने छेनी से यह सब लिखा था. तब लगा दशरथ बहुत भोले भी हैं. उनके भोलेपन की कहानियां और भी हैं. पहाड़ी काटने के दौरान लोग उन्हें पागल कहने लगे थे. पत्नी और पिता दोनों समझाते. पत्नी ने उन्हें झिड़का था- तुम पागल हुए हो क्या? तुम्हीं को चिंता है रास्ता बनाने की? और फिर यह दरार तो तबसे है, जबसे यह धरती बनी. पागल मत बनो, चुपचाप जाकर खेतों में काम करो. तब वह हंस कर रह जाते. पिता ने समझाना चाहा, तब उन्होंने कहा था- आज तक हमारा खानदान मजदूरी करता रहा है. मजदूरी करते-करते लोग मर गये. खाना, कमाना और मर जाना. इतना ही तो काम रह गया है. सिर्फ यहएक काम है जो मैं अपने मन से करना चाहता हूं. आप लोग मुझे रोकिए मत, करने दीजिए. उनका काम जारी रहा. बीच में उनकी पत्नी का देहांत हो गया.

-आपकी पत्नी नहीं रहीं, फिर भी आपने पहाड़ी काटने का काम क्यों जारी रखा?

-हां मेरी पत्नी जब मरीं, तो मैं बहुत दुखी हुआ था. मुझे लगा जब वे ही नहीं रहीं, तो पहाड़ क्यों काटूं? लेकिन फिर मुझे लगा मेरी पत्नी नहीं रहीं तो क्या हुआ? रास्ते के बन जाने से कितने लोगों की पत्नियों को फायदा होगा. हजारों, लाखों लोग इस रास्ते से आयेंगे-जायेंगे.

वे सीधे-सादे शब्दों में बहुत गहरी बात बोल गये थे. उन दिनों उनके काम की बहुत ज्यादा चर्चा नहीं थी. उन्होंने आर्यावर्त में छपी एक कॉलम की छोटी-सी खबर दिखलायी थी, जिसमें उन्हें इस काम के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री रामसुंदर दास से 500 रुपये मिलने की चर्चा थी. इस कतरन को उन्होंने बड़े जतन से प्लास्टिक की एक शीट के बीच में रखा था. बाद के दिनों में तो उन पर छपनेवाली खबरों का अंबार लग गया था. उन सारे अखबारों, पत्रिकाओं को वह एक बड़े थैले में हमेशा साथ लिये चलते थे. तब मीडिया में उन्हें अपनी खोज बतानेवालों में भी होड़ लग गयी.

उन्हीं दिनों कोलकाता से एक फिल्म निर्माता का पटना में आगमन हुआ. दशरथ मांझी पर फिल्म बनाने के नाम पर उन्होंने कलाकारों से खूब खुशामद करवायी और पैसे भी ऐंठे. दशरथ को भी उन्होंने सपना दिखलाया. वह फिल्म आज तक नहीं बनी.

दशरथ अद्भुत जीवटवाले थे. मैंने कभी उन्हें खाली नहीं देखा. वे एक ऐसी मोमबत्ती थे जो दोनों सिरों से जल कर रोशनी बिखेर रही थी. उन्हें पेड़-पौधे लगाने का भी बहुत शौक था. उनके लगाये न जाने कि तने पौधे अब पेड़ बन गये होंगे. कभी उन्हें अपने इलाके में चापाकल लगवाने की चिंता होती, तो कभी अस्पताल बनाने की. कभी पुल बनवाने की बात करते तो कभी बिजली पहुंचाने की. अपने परिजनों की चिंता में घुलते मैंने उन्हें कभी नहीं देखा. यद्यपि उनका एक मात्र बेटा अपंग है और बेटी विधवा.

दशरथ जी नहीं रहे. उनके सपने अब भी हैं. मरते वक्त भी उन्हें अपने सपनों की ही चिंता रही होगी. दशरथ जी से जब मैं पहली बार मिला था तो एक जिज्ञासा हुई थी क्या दशरथ इतिहास में दर्ज हो सकेंगे? इसका उत्तर मुझे मिल गया प्रतीत होता है. दशरथ जी जनश्रुतियों का हिस्सा बन गये हैं. बरसों बाद जब कभी कोई दशरथ मांझी की चर्चा करेगा तो मैं भी कह सकूंगा हां, मैं उस महामानव से मिल चुका हूं.

...प्यार के गीत गा उठें सभी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/20/2007 01:24:00 AM

अभिव्यक्ति में 11 गाने हैं. कल उसमें से एक गीत पोस्ट किया था, अमिताभ का गाया हुआ. इसी अलबम से एक और गीत, जो मुझे बहुत पसंद है. इसे नेहा ने गाया है. नेहा संभवतः दिल्ली में रहती हैं. संगीत पंकज आयंदे और राणा बनर्जी का है.









समीर लाल जी ने गीत डाउनलोड करने का लिंक मांगा है. मैं कोशिश कर रहा हूं कि पूरा अलबम ही नेट पर डाल दूं. तब तक गीत का मजा लीजिए.

सुनिए : सबसे पहले चाहूंगा तुम्हारा एहसास

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/18/2007 11:43:00 PM

न्हें पहली बार देखा था कालिदास रंगालय में, गिटार कंधे पर लटकाये हुए. उस समय बहुत नज़ाकत से हाथ मिलाया था उन्होंने. उसके बाद अमिताभ पटना में बहुत बार गाते हुए दिखे-मिले. सफ़दर हाशमी की शहादत को याद करते हुए, रंगकर्मी प्रवीण की याद में मनाये जा रहे कार्यक्रमों में, नुक्कड़ नाटकों के पहले और बाद में...अमिताभ पटना की सांस्कृतिक मंडली और जमावडे़ का अहम हिस्सा हैं. अपने गीतों में आम आदमी का दर्द और उसका प्रतिरोध भर देनेवाले अमिताभ अभी एक नये अलबम की तैयारी में हैं. एक दुकान पर उनका पुराना (अब तक का अकेला) अलबम मिला, जिसमें उनके अलावा उनके कुछ दूसरे साथियों के गाये गीत भी हैं. भुपेन हजारिका के गंगा बहती हो क्यों (वीडियो यहां) को मैंने पहली बार अमिताभ के मुंह से सुना, और यह अजीब लगेगा कि मुझे भुपेन दा की जगह अमिताभ इस गीत के स्वाभाविक गायक लगे.







टना में अमिताभ के अलावा संतोष झा दूसरे उल्लेखनीय जनगीत गायक हैं. हम उनका गीत भी यहां देंगे. यहां अमिताभ के अलबम अभिव्यक्ति से एक गीत. संगीत पंकज आयंदे और राणा बनर्जी का है. यह गीत कबीर सुमन के एक गीत से प्रेरित है.

यह मेरा पहला पोडकास्ट है जो इरफ़ान और रवि भाई की मदद और ई पंडित के ट्यूटोरियल के आधार पर ही बन सका है. हम इन सबके आभारी हैं.

भूख जब हद से गुजर जायेगी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/17/2007 12:39:00 AM

मनीष युवा पत्रकारहैं, और उनमें काफ़ी हिम्मत है धारा के विरुद्ध चलने की भी. पहली बार मेरा उन पर ध्यान गया था जब उन्होंने भारत के विश्व कप में हारने की कामना करते हुए एक लेख लिखा था. यहां उनकी चिंताएं और उनके कुछ वाजिब सवाल.

मनीष शांडिल्य
राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्ति की 61 वीं वर्षगांठ मना रहा देश आज स्पष्ट रूप से विभाजित दिखाई दे रहा है. अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती हुई खाई के कारण जनता दो अलग-अलग देशों में रह रही है-एक है समृद्ध इंडिया और दूसरा है विपन्न भारत. वर्तमान आर्थिक विकास को निष्ठुर विकास की संज्ञा दी जा सकती है, जिसमें आर्थिक विकास के लाभों का अधिकतर भाग समृद्ध वर्ग यानी इंडिया को प्राप्त हो रहा है तथा करोड़ों गरीबों यानी भारतवासियों को और बढ़ती हुई गरीबी की परिस्थिति में हर रोज संघर्ष करना पड़ रहा है. घोषित रूप से कल्याणकारी राज्य कहलानेवाले देश इंडिया की आर्थिक नीतियों को देख कर लगता है कि इंडिया बहुसंख्यक भारतीयों को बोझ समझ कर मिटाने पर तुला है. परंतु इंडिया को आज इस मुकाम तक पहुंचाने में भारत का संसाधन और खून-पसीना लगा है और भारत के प्रति उसकी भी महती जिम्मेवारी बनती है-इस सच और जिम्मेवारी से इंडियावाले जान-बूझ कर आंखें चुरा रहे हैं. आज इंडिया नौ प्रतिशत की विकास दर से छाती फुला सकता है और सेंसेक्स की ऊंचाई पर चढ़ कर आसमान छू सकता है पर भारत में रहनेवाली विशाल आबादी बाजार को समृद्ध करते-करते खुद कंगाल होती जा रही है. सवाल है कि यह वृद्धि दर और सेंसेक्स कब तक औसत बेहतरी मापने का पैमाना बने रहेंगे. इस औसत बेहतरी के आंकड़ों में तो बीपीएलवालों की गरीबी भी डुबा दी जाती है. क्या सत्ता की राजनीति करनेवाला कोई भी दल इन जनविरोधी आर्थिक नीतियों का मुकम्मल विरोध करेगा? विपक्ष में रहनेवाले दल मात्र विरोध का धर्म निभाने के लिए विरोध करते हैं. पर सत्ता में आने के बाद फिर इन्हीं नीतियों के पैरोकार बन जाते हैं. वर्तमान में सेज और खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के प्रवेश से लगभग 30 करोड़ भारतीयों के सामने इंडिया के नीति निर्माताओं ने न सिर्फ रोजगार बल्कि अस्तित्व व अस्मिता का भी संकट खड़ा कर दिया है. आखिर ऐसी आर्थिक नीतियां क्यों बन रही हैं कि भारत के आम आदमी का पेट भरनेवाले और तन ढंकनेवाले दुकानों-खोमचों-फेरीवालों को उजाड़ा जाये और इंडिया के लोगों की पसंद मैकडोनॉल्ड और शॉपिंग मॉल को सरकारी खर्चे पर बसाया जाये. आज स्थिति यह है कि इंडिया ने किसानों को कोल्ड स्टोर्स तक के लिए निजी कंपनियों की ओर ताकने पर मजबूर कर दिया है. और निजी पूंजी देशी हो या विदेशी उसका अपना एजेंडा होता है. वह एजेंडा है एकाधिकारवाद का और यह एकाधिकारवाद लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु है. इसलिए आज संकट लोकतंत्र के सामने भी है.
क तरफ अरबपतियों के मामले में इंडिया आठवें नंबर पर है तो दूसरी तरफ मानव विकास सूचकांक में भारत १२६ वें पायदान पर है. इतना बड़ा विभेद क्यों है इंडिया और भारत में? आखिर ऐसी परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई और यह खाई लगातार और चौड़ी ही क्यों होती जा रही है? इसके पीछे है वर्तमान पूंजीवादी अर्थव्यवस्था द्वारा लागू भूमंडलीकरण का कार्यक्रम. पूंजीवादी व्यवस्था में 20 प्रतिशत आबादी के ग्रीड (लालच) तक को तो पूरा करने की क्षमता है पर यह 80 प्रतिशत की नीड (जरूरत) को कभी पूरा नहीं कर सकती. यही 20 प्रतिशत आबादी आज इंडियन सिटिजन है और शेष 80 प्रतिशत भारत का हिस्सा हैं. प्रख्यात लेखिका और समाजकर्मी अरुंधति राय कहती हैं कि इंडिया ने भारत के संसाधन से परिपूर्ण हिस्सों को अपना उपनिवेश बना लिया है और इंडियावालों ने इस धरती पर मौजूद दुनिया के अभिजातों के साथ मिल जाने के लिए भारत के संसाधनों को लूटने और वैश्विक लिहाज से काफी सस्ते श्रम का दोहन करने का पूरा प्रबंध कर लिया है.

र्चित कथाकार शैवाल कहते हैं कि भारत एक संस्कृति का देश है और इंडिया बाजार का देश. संस्कृति और देश के बीच बाजार आ गया है. आज आम-आदमी की जिंदगी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वह जिये तो किस देश में, जहां उसका वजूद सुरक्षित बच जाये. यह सर्वविदित है कि भारतीय संस्कृति को नष्ट किये बगैर विदेशी बाजार अपने पैर नहीं जमा सकता. इसलिए आज भारत की संस्कृति पर पूंजीवादी उपकरणों यानी मनोरंजन के साधनों के माध्यम से लगातार हमला हो रहा है, टीवी के जरिये-फिल्मों के जरिये. और अंतरधार्मिक विवाह, रिचर्ड गेरे-शिल्पा चुबंन, चित्रकारों की प्रदर्शनी पर हाय-तौबा मचानेवाले भारतीय संस्कृति के स्वघोषित झंडाबरदार इस बड़े और योजनाबद्ध सांस्कृतिक हमले पर चुप क्यों हैं?

ले
किन वर्तमान हालात ज्यादा देर तक किसी को चुप रहने का मौका नहीं देनेवाले हैं, क्योंकि हर निगाह पूछ रही है कि आज भारत और इंडिया अलग-अलग देश क्यों हैं? एक ओर अभावों का समंदर तो दूसरी तरफ दौलत का अंबार. यह असंतुलन इसी तरह बढ़ता रहा तो खतरे का निशान पार कर जायेगा. खतरनाक उनके लिए जो इंडिया में रहते हैं. क्योंकि वे भारत की समस्याएं सुलझाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे. और फिर सड़क पर उतरना ही अंतिम रास्ता रह जायेगा भारतवासियों के पास क्योंकि

भूख जब हद से गुजर जायेगी
खुद-ब-खुद सड़कों पे उतर आयेगी.

चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आयी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/15/2007 11:54:00 PM


मैं फ़ैज़ की सुबहे आज़ादी को माजी तक महदूद करके नहीं देखता. मेरा मानना है कि यह आज भी हमारे अजदाद के नामुकम्मल ख्वाबों के लिए आवाज़े जरस है. यह हम सबके लिए आवाज़े जरस है, जो यह मानते हैं कि (मुक्तिबोध के शब्दों में) दुनिया और बेहतर चाहिए. बेहतर दुनिया के इन्हीं ख्वाबों के नाम.





सुबहे आज़ादी


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल

जवाँ लहू की पुरअसरार शाहराहों में
चले जो यार तो दामन पे कितने दाग़ पड़े
पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुखे सहर की लगन
बहुत करीं था हसीना-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी-दबी थी थकन

सुना है हो भी चुका है फ़िराके ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाले-मंज़िल-ओ-गाम
बदल चुका है बहुत अहले दर्द का दस्तूर
निशाते-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाबे-हिज़्र हराम
जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
किसी पे चारा-ए-हिज़्रां का कुछ असर ही नहीं
कहां से आयी निग़ारे-सबा किधर को गयी
अभी चिराग़े-सरे-रह को कुछ खबर ही नहीं

अभी गरानी-ए-शब में कमी नहीं आयी
निज़ाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आयी
चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आयी.

मैंने अच्छे दिनों के कई ख्वाब देखे

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/15/2007 11:25:00 PM


भाई गुलरेज़ को पटना रंगमंच के साथी और पूरे बिहार में हिंदी-उर्दू शायरी के पाठक उनकी नज़्मों, उनके कोलाजों और उनके एखलाक के लिए जानते हैं. अभी वे बाढ़ से घिरे मोतिहारी में हैं-बीमारी से भी अभी-अभी उठे हैं. उनके सपने और उनके सपनों की किर्चियां.


गुलरेज शहजाद
जादी के छह दशक बीत गये, अर्थात जीवन का एक पैराग्राफ समाप्त हो गया. बहुत दुरूह समय काटते हुए हम यहां तक पहुंचे हैं. आज जब हम पूरे कालखंड पर नजर दौड़ाते हैं तो पता चलता है कि स्थितियां नहीं बदलीं, बल्कि सिर्फ माहौल और तरीके बदल गये हैं.
अंगरेजी शासनकाल के राय बहादुरों और खान बहादुरों की जगह देश की संसदीय प्रणाली की बजबजाती हुई जमीन पर `बेहया के पौधों' की तरह उग आये कर्णधारों ने ले रखी है. `ब्यूरोक्रेसी' और `पॉलिटिस' देश का बेड़ा गर्क करने में पूरी तरह तत्पर और संलग्न है. 2020 तक विकसित देशों की श्रेणी में आने की अंधी दौड़ में शामिल भारत में आम जनता बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेल रही है. भूख से मरने की घटनाओं के साथ किसानों की आत्महत्याएं स्थिति की वास्तविकता को दरसाती हैं. नाटककार, कवि मित्र संजीव की कविता की पंक्तियां हैं,

भूख से व्याकुल
भारत में
एक आदमी ने
खुशी-खुशी
अपने बच्चे गिरवी रख कर
बीवी किराये पर देकर
बीच चौराहे
अपने पेट पर
हाथ रख कर
अपनी भी बोली लगा दी
लेकिन उसे दुख
सिर्फ इतना था कि
सभी सौदे नकद नहीं
बल्कि उधार हुए थे.
देश के दूसरे सबसे बड़े समुदाय (मुसलमान) की स्थिति देश के मुंह पर तमाचे की तरह है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने देश के मुसलमानों की स्थिति को आईने की तरह साफ कर दिया है और कमेटी की सिफारिशें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं. प्रदर्शन राजनीति का अंग रहा है. अर्थात जो हम करें वह दिखे, लेकिन राजनीति ने हमारे जीवन को इस तरह प्रभावित किया है कि भावनात्मक संबंधों की सांसें उखड़ने लगी हैं. हमारी मुलाकातों और व्यवहार से सादगी-सच्चाई समाप्त होती जा रही है. हमें आपसी प्रेम-भाईचारा को जताने की आवश्यकता पड़ने लगी है,

हर मुलाकातों का मकसद कारोबार-ए-जिंदगी
सबकी दहशत एक जैसी सबकी घातें एक सी
भूमंडलीकरण और नव उदारवाद ने बेईमानी के अवसर को इतना बढ़ा दिया है कि देश में मुकर जाने की परंपरा-सी बन गयी है. आखिर हम किससे पूछें कि हमारा भविष्य कहां है? मेरा मानना है कि देश की सबसे बड़ी पूंजी इसके लोग हैं. इतनी बड़ी पूंजी का सही निवेश आखिर किसकी जिम्मेदारी है. देश में लेबर फोर्स बढ़ता गया, लेकिन काम के अवसर नहीं बढ़े. हम बहुत जगहों पर गैरजरूरी तरीके से तकनीक के गुलाम बनते जा रहे हैं. देश की प्रगति तभी संभव है जब हर हाथ को काम मिलेगा.

कार्य के बहुत से क्षेत्रों में तकनीक के बजाय परंपरागत तौर-तरीके ज्यादा फायदेमंद साबित होंगे. इसके कई उदाहरण खुद कई पश्चिमी देशों में मौजूद हैं. फिदेल कास्त्रो (दक्षिण सम्मेलन, हवाना-2000) ने फासीवादी शक्तियों के खतरों के तहत वामपंथियों का आह्वान किया था-ऐसे दुश्मन को शिकस्त देने के लिए स्वभावत: जरूरी हो जाता है कि वामपंथी शक्तियां संसदीय बौनेपन का परित्याग करें और गैर संसदीय संघर्ष के विस्तीर्ण मैदान में अपना प्रमुख जोर लगायें. हम खुली आंखों से देख रहे हैं कि वामपंथी शक्तियां अपनी ऊर्जा कहां बरबाद कर रही हैं.

नक्सलबाड़ी आंदोलन के 40 वर्ष हो गये. नक्सलवाद को अपना नैतिक और राजनीतिक समर्थन देनेवालों की एक बड़ी जमात देश में तैयार हुई है, लेकिन जनअदालतों की सच्चाई समाचार चैनलों ने जो दिखायी, उसका असर गलत पड़ा है. इसके अतिरिक्त समय-समय पर मिलनेवाली खबरों के आधार पर हम कह सकते हैं कि आंदोलन भटकाव का भी शिकार हुआ है. आम आपराधिक गिरोह और नक्सलवादियों के बीच के फर्क का फासला बहुत कम दिखने लगा है. सवाल यह है कि क्या नक्सलवादियों के शस्त्रों में विचारधारा के कारतूस का अभाव हो चला है?
यह समय सपनों के टूटने का समय है.
पाश की पंक्ति याद आती है-सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना. सपने टूट जरूर रहे हैं, लेकिन यकीन के साथ कह सकता हूं, सपने मरे नहीं हैं और नहीं मरेंगे. नसीर अहमद नासिर की कविता की पंक्तियां याद आती हैं-
बहुत दूर गांव है मेरा
जहां लालटेनों की मद्धिम रोशनी में
सबको याद करते हुए
मैंने अच्छे दिनों के कई ख्वाब देखे
स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ और नक्सलबाड़ी आंदोलन की 40वीं वर्षगांठ के काल में संघर्ष के एक नये आंदोलन की शुरुआत होगी. जहां से रास्ता खत्म होता, वहीं से दूसरी राह निकलती है.

संपर्क- नकछेद टोला, मोतिहारी.

प्रभात खबर से साभार

हमारे ज़ख्मों से खून रिस रहा है आलमपनाह

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/15/2007 12:45:00 AM

आज़ादी के उल्लास, जय-जयकारे और सत्य-अहिंसा के पवित्र मंत्रोच्चार के बीच यह 15 अगस्त भी बीत जायेगा. हम उनकी विरासत से हैं, जिन्होंने आज से 60 साल पहले भी शंखध्वनियों और शहनाइयों के शोरगुल के बीच कहा था-यह आज़ादी झूठी है, देश की जनता भूखी है. हम मैला आंचल के उन पात्रों की तरह हैं जो आज़ादी के जुलूस में जनता की भूख और उसके अधिकारों की बात कहते हैं और पीटे जाते हैं. मगर हमने अपनी जुबानें बंद नहीं की हैं और अपना दिमाग, अपना बेहतरीन दिमाग, गिरवी नहीं रखा है और अपने विचारों को बाज़ार में नहीं ले आये हैं. इसलिए हमारे सवाल अब भी ज़िंदा हैं, हमारी चीखें अब भी रोशन हैं, हमारे ज़ख्म अब भी दर्द करते हैं और उनसे खून और मवाद रिसता है. हम उन्हीं कुछ सवालों के साथ, जो आज भी असहज कर देते हैं और अनुत्तरित हैं. देश में जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है या बना दिया गया है, उसमें असहमति के स्वर देशद्रोह की तरह लगते हैं. मगर फिर भी, हम यह खतरा उठाते हुए, और यह कहते हुए कि देश नारों और जयकारों से नहीं बनता, बल्कि लोगों से बनता है, अपनी असहमति दर्ज़ कराते हैं. हम इस आज़ादी से अपनी असहमति दर्ज़ कराते हैं.

आज़ादी, मगर कैसी और किसके लिए?
रविभूषण
प्रेमचंद के उपन्यास गबन (1931) में देवीदीन ने यह पूछा था, `साहब, सच बताओ, जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाट बनाये घूमोगे, इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा... तुम दिन में पांच बेर खाना चाहते हो, और वह भी बढ़िया, पर गरीब किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता. उसी का रक्त चूस कर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है. तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग -विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो तुम गरीबों को पीस कर पी जाओगे.'

आजादी की 60वीं वर्षगांठ पर हमें यह जानना और विचार करना चाहिए कि भारत में गरीबों की संख्या कितनी है? ग्रामीण भारत की क्या दशा है? किसानों और मजदूरों का क्या हाल है? देश में आर्थिक विषमता बढ़ी है या घटी है? किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? राज्य अपनी कल्याणकारी भूमिका से क्यों हटा है? नयी आर्थिक नीति (1991) का या भूमंडलीकरण और उदारीकरण का वास्तविक लाभ किसे प्राप्त हुआ है? राजनीति का कार्य क्या है? सामान्य जन और उसके जन प्रतिनिधि में कितना अंतर है? शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा सबको क्यों नहीं है? देश के 32000 स्कूलों में एक भी छात्र क्यों नहीं हैं? क्या भारतीय मध्य वर्ग समूचे भारत का पर्याय है? मीडिया कितनी सच्ची खबरें पाठकों को देता है? क्या भारत हत्या और आत्महत्या के बीच जी रहा है? भारत की आजादी से किसे लाभ प्राप्त हुआ है? क्या हमारे देश में सबको न्याय प्राप्त है? अपराधी और गुंडे जेल में क्यों नहीं हैं? भ्रष्टाचार मिटना चाहिए या नहीं और यह कैसे मिटेगा? भारतीय प्रतिभा का पलायन क्यों हो रहा है? रातोंरात अमीर कैसे बना जाता है? उत्पादक बड़ा है या उपभोक्ता? स्वतंत्र भारत में भारतीय जनता को किसने विभाजित किया? राजनीति में वंशवाद रहना चाहिए या मिटना चाहिए? चापलूसों और खुशामदियों से घिर कर क्या उचित कार्य किया जा सकता है? प्रश्न एक नहीं, हजारों हैं. यह कौन करेगा? इसका उत्तर कौन देगा?
नागार्जुन ने आजादी के मात्र चार वर्ष बाद 1951 में एक कविता लिखी थी-स्वदेशी शासक. आजाद भारत के शासकों का रंग-ढंग उन्होंने समझ लिया था. स्वतंत्र भारत का शासक सामान्य जन को `शांति और संयत जीवन की' नसीहत देता रहा है और अपने लिए `अपरिमित धन की जुगाड़' में तत्पर रहा है. नागार्जुन ने इस कविता में बहुत तीखी बातें लिखी थीं, `हमें, हमारे घरवालों को, पड़ोसियों को दो छुटकारा/ शीघ्र मुक्ति दो इस रौरव से/ जहां न भरता पेट, देश वह कैसा भी हो, महानरक है.' भारत एक साथ स्वर्ग और नरक दोनों है. कुछ लोगों को स्वर्ग का सुख है और सामान्य जन को नरक का दुख. स्वाधीनता की लड़ाई मिलजुल कर लड़ी गयी थी. उस समय के मूल्य और आदर्श मिट गये हैं, क्योंकि आज भारत में अंगरेज नहीं हैं. फिर भारत में इतना हाहाकार क्यों है? लूट और भ्रष्टाचार क्यों है? अपराध और व्यभिचार क्यों है? अपहरण और बलात्कार क्यों है? अशिक्षा और बीमारी क्यों है? बाढ़ और सूखा क्यों है? छीनाझपटी और लूटमार क्यों है? वादा-खिलाफी क्यों है? 60 के दशक में नागार्जुन ने एक कविता लिखी थी, `26 जनवरी 15 अगस्त.' इससे पहले `स्वदेशी शासक' कविता में भारतीयों की साधना को व्यर्थ घोषित किया- `व्यर्थ हुई साधना, त्याग कुछ काम न आया/ कुछ ही लोगों ने स्वतंत्रता का फल पाया.' स्वतंत्रता का फल सबको प्राप्त क्यों नहीं हुआ? हमने जो विकास-नीतियां तय कीं और पंचवर्षीय योजनाएं लागू कीं, क्या उससे सबको फायदा हुआ? हमारी नीयत में खोट थी या हमारी कार्य पद्धति गलत थी?

गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. आजादी की 50वीं वर्षगांठ 1997 में धूमधाम से मनायी गयी थी. गणतंत्र दिवस की अर्धशती भी मनायी जा चुकी है. हम किसी भी अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते. आयोजन उत्सवधर्मी बन जाते हैं या फिर सब कुछ औपचारिक और कर्मकांड बन कर रह जाता है. मगर भारत में सभी सुखी और मस्त नहीं हैं. नागार्जुन ने 26 जनवरी 15 अगस्त कविता में प्रश्न करने के साथ स्वयं उत्तर भी दिया था. `किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?/ कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?' उन्होंने सेठ, शोषक, नामी गला-काटू, थूक-चाटू, चोर, डाकू, झूठा, मक्कार, कातिल, छलिया, लुच्च-लबार को `सुखी' और `मस्त' कहा है. नागार्जुन नेता को इसी श्रेणी में रखते हैं. नेता अच्छे भी होंगे पर उन्हें ढ़ूंढ़ना कठिन है. भारत में एक ओर सुखी और मस्त लोग हैं और दूसरी ओर दुखी और त्रस्त लोग हैं. ऐसा अंतर क्यों है?

भारत आज सुविधा संपन्न और सुविधाविहीन लोगों में विभाजित है. यह विभाजन अनुचित ही नहीं, घातक भी है. आतंकवाद से खतरों की बात अक्सर की जाती है, पर इस अनुचित और अमानवीय विभाजन की ओर कम ध्यान दिया जाता है. आधुनिक भारत की जो रूपरेखा बनी थी, वह नष्ट हो चुकी है. समकालीन भारत की एक नयी रूपरेखा बना दी गयी है. हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ाई लड़ी थी. आज अमेरिकी साम्राज्यवाद का चुंबन-आंलिंगन कर मस्त हुआ जा रहा है. भारत की जनता की उपेक्षा कर भारत का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता. जाति और धर्म की राजनीति से किस प्रकार के भारत का चित्र प्रस्तुत करेंगे?

आजादी के 60वें वर्ष के आयोजन-समारोह में हमें यह भी स्मरण करना चाहिए कि यह वर्ष प्लासी की लड़ाई की ढाई 100वीं वर्षगांठ, 1857 की 150वीं वर्षगांठ और भगत सिंह की जन्मशती का भी है. प्लासी की लड़ाई (1757) सिराजुद्दौला की सेना में 57 हजार सैनिक थे और रॉबर्ट क्लाइब के सैनिकों की संख्या मात्र साढ़े तीन हजार थी और इनमें से भी अंगरेज सैनिकों की संख्या मात्र 950 थी. रॉबर्ट क्लाइव की सेना में 2600 सैनिक भारतीय थे. सिराजुद्दौला की सेना का प्रधान सेनापति मीर जाफर था. वह 45 हजार सेना के साथ अंगरेजों से जा मिला, सिराजुद्दौला बिना लड़े पराजित हो गया. प्लासी की लड़ाई के बाद भारत अंगरेजों के अधीन हो गया. जिम्मेदार भारतीय थे. जॉन विलियम केई ने सिपॉय वार इन इंडिया में लिखा है - `हिंदुस्तान में हमारी सत्ता की पुनर्स्थापना का सेहरा हमारे हिंदुस्तानी समर्थकों के सर है, जिनकी हिम्मत और बहादुरी ने हिंदुस्तान को हमवतनों से छीन कर हमारे हवाले कर दिया.' (शम्सुल इस्लाम द्वारा उद्धृत, प्लासी का साजिशी सबक, जनसत्ता, 15 जुलाई 2007)

भारत को आजादी बिना `खड़ग' और `ढाल' के प्राप्त नहीं हुई है. हजारों लोगों को फांसी दी गयी, लाखों लोग मारे गये, हजारों लोगों को उम्रकैद की सजा मिली. सैकड़ों गांव उजड़ गये. इसे भूलना सबसे बड़ा अपराध है. यह आजादी झूठी तो नहीं, पर अधूरी थी. इसे पूरा करने का दायित्व राजनेताओं और भारतीयों पर था, जो नहीं हुआ. हम आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से स्वाधीन नहीं हुए. मानसिक गुलामी बढ़ती गयी. गांवों का हमने विकास नहीं किया. भारतीय महानगर भारत के द्वीप हैं. इन महानगरों से भारत का वास्तविक चित्र उपस्थित नहीं होता. अधिसंख्य जनता गरीब और फटेहाल है. अशिक्षित और परेशान हैं. यह बहुत बड़ी आबादी है, लगभग 70 प्रतिशत. इसे भूलना और हाशिये पर डालना अनुचित ही नहीं, जुर्म भी है. आजादी का जश्न पूरे होशो-हवास में मनाने पर हम आजाद हिंदुस्तान को बेहतर बनाने की दिशा में पहल कर सकते हैं. यह पहल जरूरी है. स्वतंत्रता का फल सबको प्राप्त होना चाहिए. हमारी सभी नीतियां धनवानों और पूंजीपतियों के लिए नहीं बननी चाहिए. विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अमेरिकी साम्राज्यवाद के लुभावने-आकर्षक मायाजाल में फंस कर हम वास्तविक विकास नहीं कर सकते. स्वतंत्रता के 60वें वर्ष में आत्ममंथन की आवश्यकता है. भविष्य के गर्भ में क्या है, कोई नहीं जनता. मगर हम अनुमान कर सकते हैं.

पत्रकारिता जनता से दूर होती जा रही है : पी साईनाथ

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/13/2007 02:29:00 AM

पी साईनाथ का जन्म आंध्रप्रदेश के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरी के पोते हैं। उन्होंने मद्रास (अब चेन्नई) के लोयोला कॉलेज और प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विव्श्रविद्यालय, नई दिल्ली में पढ़ाई की है। आजादी के 60 वें साल में अपनी जिंदगी के 50 साल पूरे कर रहे पी साईनाथ को इस साल एशिया का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। उन्होंने ग्रामीण भारत की स्थिति और उनकी समस्याओं से रूबरू होने के लिए देश के सबसे गरीब राज्यों में 16 अलग अलग आवागमन के साधनों के जरिए 100,000 किलोमीटर की यात्रा की थी। इनमें 5,000 किलोमीटर वे पैदल चले थे। इस 18 महीने के दौरे में उन्होंने 84 लेख लिखे। इन्हीं लेखों पर आधारित उनकी किताब एवरीबडी लव्ज अ गुड ड्रॉट छपी। पेंग्विन की यह ऑल टाइम बेस्टसेलर है। किताब से मिली रायल्टी के जरिए वे नौजवान ग्रामीण पत्रकारों को पुरस्कार में बड़ी राशि देते हैं।

उन्हें अब तक 30 से 40 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। इनमें रैमन मैग्सेसे(2007), यूरोपीय आयोग का नताली पुरस्कार (1994), संयुक्त राष्ट्र एफएओ पुरस्कार(2001), एमनेस्टी इंटरनेशनल ग्लोबल अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स जर्नलिज्म (2000) और हैरी चैपिन मीडिया अवार्ड (2005) प्रमुख हैं। उनकी पत्रकारिता पूरी तरह से आर्थिक असमानता और असुरक्षा, बेरोजगारी, सामुदायिक सशक्तीकरण और स्थायी विकास और खाद्यान्न उत्पादन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित रही है। उनसे भारत की आज़ादी, पत्रकारिता और सरकारी नीतियों पर दैनिक भास्कर के गुरुदत्त तिवारी ने बातचीत की.

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आजादी के 60 साल बाद सरकार गरीबों तक पहुंचने में कितनी सफल हो पाई है?

उन तक पहुंचने की बात तो छोड़िए इन सालों में तो सरकार यह समझ पाने में ही असफल रही है कि वास्तव में गरीब है कौन। फिर उस तक पहुंचने की बात ही अलग है। अलबत्ता उसी सरकार ने 352 सेजों को स्वीकृति देने में 6 माह भी नहीं लगाए। यह कदम देश में प्रिंसली राज की वापसी है क्योंकि इन क्षेत्रों से न तो सरकर को कोई कर मिलेगा न उसके कानून ही वहां चलेंगे। यहां तक की सरकार ने यह तक सोचने की भी जहमत नहीं उठाई कि जितनी जमीन ये कंपनियां मांग रही हैं, उतनी की उन्हें जरूरत भी है या नहीं। इन्फोसिस को सेज गोल्फ कोर्स तक के लिए जमीन दे गई है, जबकि उसके यहां जितने कर्मचारी काम करते हैं, उससे दोगुने दुनिया की मशहूर इलेक्ट्रॉनिक कंपनी सोनी की दो इमारतों में काम करते हैं।

तो आपकी नजर में विकास का कौन सा मॉडल ठीक है?

मेरा मानना है कि देश के संविधान में जो नीति निर्देशक तत्व बताए गए हैं, उन्हें लागू करना एक बेहतर शुरुआत हो सकती है, लेकिन इससे पहले हमें सबसे गरीब तबके की पहचान करनी होगी। गरीब की देश में वर्ग, जाति, लिंग और क्षेत्र के आधार पर पहचान की जा सकती है। वर्ग के आधार पर 40 फीसदी गरीब भूमिहीन किसान हैं। 45 फीसदी छोटे और 7.5 प्रतिशत ग्रामीण काश्तकार हैं। बाकी हिस्से में देश के दूसर वर्ग आते हैं। जाति के आधार पर दलित और आदिवासियों में गरीबों का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। इसी तरह पश्चिमी उड़ीसा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, दक्षिण तमिलनाडु, उत्तरी कर्नाटक, पश्चिमी छत्तीसगढ़ सहित देश के 10 से 12 क्षेत्र हैं, जहां गरीबों का 70 से 80 फीसदी हिस्सा रहता है। हमार यहां लिंग पर आधारित काफी भेदभाव है। इसके चलते महिला को समान कार्य करने के बाद भी पुरुष की तुलना में कम पैसे मिलते हैं।इस प्रवत्ति के कारण महिलाओं में गरीबी पुरुषों की तुलना में अधिक है।

इस पहचान के बाद अगर हम कोई शुरुआत करते हैं तो उसके नतीजे काफी अच्छे आ सकते हैं, लेकिन अफसोस, आजादी के 60 सालों में ऐसे कोई प्रयास नहीं हुए।

60 सालों में देश की सबसे बड़ी असफलता क्या लगती है?

इस दौरान सिर्फ तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में ही भूमि सुधार हो सका है। इसे पूर देश में लागू करने में असफल रहना देश की सबसे बड़ी विफलता है। केरल में 1957 में सबसे पहले भूमि सुधार हुआ था और आज इस राज्य में साक्षरता दर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से कहीं अधिक है।

आप खुद एक पत्रकार हैं। मौजूदा मीडिया किस दिशा में आगे जा रहा है?

मैं ऐसा नहीं कहूंगा कि मीडिया में आज समर्पित पत्रकारों की कमी है, लेकिन वह अपने अपने मीडिया हाउसों की व्यावसायिक प्रतिबद्धताओं के आगे बेबस हैं। मीडिया लीडरशीप के अभाव में जर्नलिज्म आम जनता से कटता जा रहा है। उसके सामने विव्श्रसनीयता का संकट आ खड़ा हुआ है। 2004 के लोकसभा चुनावों में सभी मीडिया हाउसों के चुनाव पूर्व विश्लेषणों का धर रह जाना इसका सबसे बड़ा सुबूत है कि मीडिया जनता की नब्ज पहचानने में कितना नाकाम है।

क्या आप मानते हैं कि मीडिया कोपरेरट जगत के चंगुल में फंस चुकी है?

हां! यह सच है। मीडिया की पूरी सोच को कापरेरट प्रभावित कर रहा है। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की खबरों के लिए अखबारों में जगह नहीं है। और किसी व्यक्ति द्वारा 15 लाख रुपए महज एक मोबाइल नंबर के लिए उड़ा देने की खबरें पहले पन्ने की बैनर खबर बन जाती है। यह चलन जनता को गुमराह कर रहा है। सच्चाई तो यह है कि आज भी देश के अगड़े ग्रामीण का प्रतिमाह व्यय महज 503 रुपए है। इसमंे 80 प्रतिशत से अधिक भोजन में व्यय करने के बाद वह शिक्षा पर केवल 17 रुपए और स्वास्थ्य पर केवल 34 रुपए प्रतिमाह खर्च पा रहा है। ऐसे में पिछड़े और भूमिहीन गरीब की तो बात ही मत करें। उसके पास तो स्वास्थ्य पर खर्च करने के लिए ही धन नहीं है।

क्या मीडिया में बदलाव आएगा?

हां! आने वाले सालों में हम सब इस बदलाव के गवाह बन सकते हैं। इस तरह विव्श्रसनीयता के संकट से जूझती मीडिया को जनाक्रोश का सामना करना होगा। इसके बाद फिर से उसे अपने बेसिक में लौटकर काम करना होगा।

(भास्कर से साभार)

बस्तर : बंदूक की नोंक पर संविधान

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/10/2007 11:54:00 PM

हमारे पास उग्र उपभोक्तावाद और आक्रामक लिप्सा पर पलता हुआ एक बढ़ता मध्यवर्ग है. पश्चिमी देशों के औद्योगीकरण के विपरीत, जिनके पास उनके उपनिवेश थे, जहां से वे संसाधन लूटते थे और इस प्रक्रिया की खुराक के लिए दास मजदूर पैदा करते थे, हमने खुद को ही, अपने निम्नतम हिस्सों को, अपना उपनिवेश बना लिया है. हमने अपने अंगों को ही खाना शुरू कर दिया है. लालच, जो पैदा हो रही है (और जो एक मूल्य की तरह राष्ट्रवाद के साथ घालमेल करते हुए बेची जा रही है ) केवल अशक्त लोगों से भूमि, जल और संसाधनों की लूट से ही शांत हो सकती है. -अरुंधति राय
जब अरुंधति राय यह कहती हैं तो हमें याद आता है बस्तर. देशी सरकार, हिंदुत्व और विदेशी कंपनियों का जो पूरा हिंसक कार्य व्यापार चल रहा है बस्तर में, (और यह सब लोकतंत्र और विकास के नाम पर हो रहा है) उसकी कई अनजानी-अनपहचानी परतों से हमें अवगत करा रहे हैं आलोक प्रकाश पुतुल. आज पढते हैं, दो किस्तों ( 1, 2) के बाद अंतिम किस्त.

लोहा गरम है

आलोक प्रकाश पुतुल
टाटा स्टील ने जब लोहण्डीगुड़ा में अपने संयंत्र के लिए ज़मीन अधिग्रहण की घोषणा की तो प्रस्तावित संयंत्र से विस्थापित होने वाले 10 गांवों के लोगों को बैलाडीला और नगरनार की बदहाली याद आ गई. टाकरागुड़ा, कुम्हली, बड़ांजी, बेलर, सिरिसगुड़ा, बड़ेपरौदा, दाबपाल, धूरागांव, बेलियापाल और छिंदगांव के लोगों ने साफ कर दिया कि वे जिस भूमि पर बरसों से खेती करते आए हैं, उसे किसी भी हालत में स्टील प्लांट को के लिए नहीं देंगे.

टाटा के प्रस्तावित संयंत्र के लिए इस इलाके की 2161 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण किया जाना था. हालांकि जब जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई शुरु की गई तब टाटा ने अपने प्रस्तावित इस्पात संयंत्र की प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी पेश नहीं की थी. 3906000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले बस्तर में केवल 27.5 प्रतिशत हिस्सा ही कृषि योग्य है. स्थानीय लोगों की मानें तो इस मामले में जगदलपुर का हिस्सा और भी पिछड़ा है, जहां 56 प्रतिशत किसानों के पास एक एकड़ या उससे भी कम ज़मीन है. इसमें भी लोहण्डीगुड़ा के इलाके में सबसे अधिक कृषि योग्य भूमि है. टाटा की प्रस्तावित स्टील प्लांट की 2161 हेक्टेयर जमीन में से 1861 हेक्टेयर जमीन आदिवासियों की कृषि भूमि है. ग्रामीण टाटा द्वारा प्रस्तावित मुआवजे से भी असंतुष्ट थे.
हालांकि टाटा के अनुसार-सीमित विकल्पों के बावजूद इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि आवश्कताओं को न्यूनतम स्तर पर रखकर, भूखंड को सही स्वरूप देकर एवं भूखंड की सीमा के यथोचित निर्धारण के जरिए विस्थापन को न्यूनतम किया जाए। टाटा स्टील ने आदिवासियों को पुनर्वास के पर्चे भेजे हैं, उसके अनुसार-अपनी 75 % से ज्यादा जमीन से वंचित होने वाले प्रभावित जमीन मालिकों की संख्या लगभग 840 है और प्रभावित होने वाले घरों की संख्या लगभग 225 है। पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास का यह पैकेज मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ के समक्ष विगत 15 दिसम्बर 2005 को एवं जिला पुनर्वास समिति के सदस्यों के समक्ष 26 दिसम्बर 2005 को प्रस्तुत किया गया था। जिला पुनर्वास समिति के सुझाव को ध्यान में रखते हुए, प्रशिक्षण एवं नियोजन से संबंधित प्रावधानों की यथासंभव व्याख्या की गई है।... भू-अधिग्रहण कानून के प्रावधानों के अनुरुप मुआवजा जिसमें तोषण, ब्याज तथा छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति 2005 के अनुसार अनुग्रह राशि भी सम्मिलित है।

टाटा के अनुसार ऊसर जमीन के लिए 50 हज़ार रुपए प्रति एकड़, एकल फसल वाली असिंचित जमीन के लिए 75 हज़ार रुपए प्रति एकड़ और दोहरी फसल वाली सिंचित जमीन के लिए 1 लाख रुपए प्रति एकड़ मुआवजे का प्रावधान रखा गया है.
लेकिन ग्रामीणों की मांग थी कि उन्हें इस तरह के मुआवजे के साथ-साथ स्टील प्लांट में शेयर भी मिले. इसके अलावा मांगों की एक लंबी फेहरिस्त थी, जिसको लेकर टाटा स्टील और जिला प्रशासन कोई आश्वासन देने के मूड में भी नहीं था. ऐसे में जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य बनने की पांचवीं वर्षगांठ का उत्सव चल रहा था, उस समय माड़िया आदिवासी बहुल लोहण्डीगुड़ा के लोग टाटा और टाटा के पक्ष में खड़ी सरकार के ख़िलाफ लामबंद हो रहे थे.

5 नवंबर 2005 को हज़ारों लोगों ने बेलर में एक आमसभा की. भाजपा विधायक लच्छू कश्यप, बैदुराम कश्यप और भाजपा के ही सांसद बलीराम कश्यप ने सभा को संबोधित करते हुए लोगों को आश्वस्त किया कि मुख्यमंत्री से चर्चा कर के टाटा के इस्पात संयंत्र के लिए कहीं और जगह तलाश की जाएगी.

लेकिन भाजपा सांसद कुछ ही रोज में टाटा संयंत्र के सुर में सुर मिलाने लगे. सरकार के प्रतिनिधि गांव वालों को समझाने में लग गए कि उन्हें संयत्र लगने से क्या-क्या फायदा होगा. टाटा संयंत्र के खिलाफ लोग संगठित होते रहे और सरकार ने भी जमीन अधिग्रहण का अपना एजेंडा लागू करना आरंभ किया.

उधर एस्सार के खिलाफ भी दंतेवाड़ा के भांसी और धुरली में इसी तरह का माहौल बन रहा था. एस्सार ने भांसी और धुरली गांव के आस पास 1254 हेक्टेयर जमीन अपने स्टील प्लांट के लिए चिन्हांकित की थी. लेकिन जनता ने एस्सार के प्रस्तावित स्टील प्लांट का विरोध शुरु कर दिया. मुद्दे भांसी-धुरली में भी वही थे.

बंदूक की नोंक पर संविधान

फिर शुरु हुआ ग्राम सभा का खेल यानी बंदूक की नोक पर संविधान.

अनुसूचित क्षेत्र Scheduled Area के लिए 1996 में पारित हुए पंचायत राज विस्तार कानून पेशा (Provisions of the Panchayats Extension to Scheduled Area PESA) सबसे पहले लोहण्डीगुड़ा के आदिवासियों की रक्षा के लिए सामने आया.
ग्रामीणों के विरोध प्रदर्शन के बीच सरकार ने टाटा स्टील के लिए सबसे पहले 10 मई 2006 को लोहण्डीगुड़ा-बेलर की ग्राम सभाओं का विशेष सम्मेलन आयोजित किया था लेकिन ग्रामीणो ने पुनर्वास के विरोध में अपनी आपत्ति दर्ज कराई और अपनी 13 सूत्री मांग रखी। गांव वालों ने जिला प्रशासन को 13 सूत्री मांग पत्र सौंपकर स्पष्ट कर दिया कि था जब तक ये मांगें मानी नहीं जाती हैं, तब तक ये गांव खाली नहीं होगे. बेलर-लोहण्डीगुड़ा के लोगों की मांग थी कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा स्टील प्लांट में 49 प्रतिशत शेयर की व्यवस्था के अलावा बंजर जमीन का 5 लाख, एकफसली जमीन का 7 लाख और दो फसली जमीन का 10 लाख रुपए मुआवजा, प्रभावित परिवारों में से एक को अनिवार्य रुप से नौकरी जैसी शर्तें रखी गई थीं.

लेकिन अपनी मांगों को लेकर अड़े हुए ग्रामीणों के व्यापक विरोध को देखते हुए ग्राम सभाओं के सम्मेलन रद्द कर दिए गए. दुबारा 7 जून को ग्राम सभा की कोशिश भी असफल साबित हुई.

इसके बाद 20 जुलाई 2006 को ग्राम सभा का आयोजन किया गया. इससे 2 दिन पहले जिला प्रशासन ने ग्रामीणों की बैठक ली. बड़ांजी और बेलर के सरपंच के अनुसार कलेक्टर ने इस बैठक में बताया कि पुनर्वास को लेकर हमारी सारी मांगें मान ली गई हैं. कलेक्टर की इस घोषणा के बाद कुछ ग्रामीण मांगों को लेकर हुई सहमति का जब लिखित प्रमाण लेने पर अड़ गए तो फिर से ग्राम सभा पर संकट के बादल मंडराने लगे.

लेकिन जिला प्रशासन किसी भी तरह ग्राम सभा निपटाने के मूड में था. इसके बाद प्रशासन ने पूरे इलाके में धारा 144 लागू कर दिया और 55 ग्राम प्रमुखों के खिलाफ मामला दायर कर दिया गया। 17 लोगों को तो गिरफ्तार कर जेल भी भेज दिया गया। लेकिन इसके बाद भी 20 जुलाई को हुए ग्रामसभा में गतिरोध कायम रहा. 2 ग्राम पंचायतों में तो सभा हो ही नहीं पाईं. जिन 8 गांवों में ग्रामसभाएं हुईं, उनमें भी 3 पंचायतों में ग्रामीणों के फैसले ग्रामसभा की पंजी में दर्ज ही नहीं हुए. बाद में सरकारी अधिकारियों द्वारा ग्रामसभा में अनुपस्थित लोगों को सभापति बता कर पंजी में मनमाने निर्णय दर्ज कर लिए गए.

इसके बाद 3 अगस्त 2006 को इस इलाके में सशर्त ग्रामसभा आयोजित की गई. गांव वालों की मानें तो अब तक हुए ग्रामसभाओं में भारी पुलिस बल का इस्तेमाल कर लोगों पर दबाव बनाया गया. इस ग्राम सभा में आदिवासियों को बुला कर उन्हें पर्ची दी गई और उनसे अंगूठे का निशान लगवा कर उनसे जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण के लिए सहमति ले ली गई.

कुम्हली गांव में एक चौराहे पर बैठे एक बुजुर्ग वेणुधर कहते हैं- अगर बंदूक के बल पर आयोजित सभा को आप ग्रामसभा कहते हैं, तो मुझे कुछ नहीं कहना है.

उनके साथ बैठे दूसरे बुजुर्ग घासूराम, धनीराम, हीरा आदि भी कहते हैं कि ग्रामसभा के नाम पर खानापूर्ति हुई है. खेती पर आश्रित ये सभी लोग टाटा के संयंत्र के खिलाफ हैं. हालांकि ऐसा नहीं है कि गांव के सभी लोग संयंत्र के खिलाफ हैं.

गांव में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनके नाम पर कोई जमीन ही नहीं है और ऐसे सभी लोग इस इलाके में संयंत्र के पक्ष में हैं. एक पंचायत सचिव बताते हैं कि सरकारी योजनाओं से किसी भी तरह जुड़े हुए लोग टाटा के संयंत्र का विरोध नहीं कर सकते. ऐसा करने का साहस जिन लोगों ने किया, उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया.

लोहंडीगुड़ा में टाटा के पक्ष में जिला प्रशासन द्वारा 2 ग्रामसभाओं के बाद माना जा रहा था कि अब टाटा के लिए स्टील प्लॉंट का रास्ता साफ हो गया लेकिन इसके बाद आदिवासियों ने 24 फरवरी 2007 को अपनी ग्रामसभा बुलाई. जाहिर तौर पर सरकार के लिए यह चुनौती थी. टाकरागुड़ा और बेलर में आमसभा के बाद आदिवासियों पर पुलिस का कहर बरपा और आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व भाकपा के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम समेत कई लोग गिरफ्तार कर लिए गए.
बस्तर एक बार फिर सुलग उठा और लोहण्डीगुड़ा और बेलर में आंदोलन तेज होने लगा. सरकार और आदिवासी आमने-सामने आ गए. दोनों ने एक दूसरे पर हमला बोलना शुरु कर दिया. कई पुलिस वाले आदिवासियों के आक्रोश के शिकार हुए. दूसरी ओर आंदोलन से नाराज जिला प्रशासन द्वारा आदिवासियों को मारा–पीटा गया, लाठियां बरसाई गईं. इससे भी मन नहीं भरा तो आदिवासियों को गिरफ्तार कर के जेलों में भर दिया गया. लेकिन इससे आदिवासियों के हौसले में कमी नहीं आई. आदिवासी आज भी अपनी मांग के लिए अड़े हुए हैं.

लोहण्डीगुड़ा और उसके आसपास के गांवों में एक अजीब-सा आक्रोश पसरा हुआ है, जिसका शिकार कोई भी हो सकता है. हालत ये है कि लोग अपनी जान देने पर तुले हुए हैं.
आज से 45 साल पहले लोहण्डीगुड़ा में 31 मार्च 1961 को सरकारी लेवी के खिलाफ लोहण्डीगुड़ा के आदिवासियों ने उग्र आंदोलन शुरु किया और 13 आदिवासियों को अपनी जान गंवानी पड़ी. जिन आदिवासियों ने जनता के मुद्दे पर अपनी जान दे दी थी, उनमें कुम्हली गांव के अजम्बर सिंह भी शामिल थे. शायद इतिहास अपने को दुहराता है. अजम्बर के बेटे बल्देव सिंह इस बार लोहण्डीगुड़ा में टाटा के खिलाफ ताल ठोंककर खड़े हैं.

बल्देव कहते हैं- “मेरे पास पांच एकड़ जमीन है और मेरी पूरी जमीन ली जा रही है. जनता और अपने स्वाभिमान की लड़ाई में अगर मेरी जान भी चली जाए तो भी मुझे कोई परवाह नहीं है. मैं एक ही बात जानता हूं-लड़ाई जारी रहनी चाहिए.”
लेकिन इलाके के भाजपा सांसद बलीराम कश्यप इस तरह की लड़ाई को गैरजरुरी बताते हुए कहते हैं कि लोहण्डीगुड़ा में बाहरी हस्तक्षेप के कारण माहौल बिगड़ा है. कश्यप का मानना है कि टाटा का विरोध करने वाले असल में विकास के विरोधी हैं.

हालांकि उनकी ही पार्टी के स्थानीय विधायक लच्छुराम कश्यप और डाक्टर सुभाउ कश्यप पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका को संदिग्ध बताते हैं। लच्छुराम कश्यप कहते हैं- “ ग्रामसभा के लिए ग्राम पंचायतों पर दबाव डाल कर बैठक बुलाई गई. जिला प्रशासन द्वारा जबरिया जमीन अधिग्रहण के लिए लिए अदिवासियों पर दबाव डाला जा रहा है कि वे अपनी जमीन टाटा को दे दें.”

दोनों विधायकों ने टाटा का यह मामला विधानसभा में भी जोर-शोर से उठाया है. लेकिन लगता नहीं है कि सरकार अपनी ही पार्टी के विधायकों द्वारा उठाए गए मुद्दे को लेकर चिंतित है.


टाटा-एस्सार भाई-भाई

उधर एस्सार की ग्रामसभा का किस्सा भी लोहण्डीगुड़ा से अलग नहीं है.

दंतेवाड़ा के धुरली और भांसी में सरकार ने जब एस्सार के लिए जमीन अधिग्रहण का काम शुरु किया तो ग्राम सभा के लिए पूरे इलाके को पहले पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया. उसके बाद भांसी की 280 हेक्टेयर और धुरली की 109.5 हेक्टेयर भूमि के लिए 10 जून 2006 और 3 अगस्त 2006 को ग्रामसभा की राय ली गई.
10 जून को हुई विशेष ग्रामसभा में राज्य के नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा एस्सार का साथ देने के लिए पहुंचे. नक्सलियों के खिलाफ बस्तर में सरकारी संरक्षण में सलवा जुड़ूम नामक आंदोलन चलाने वाले आदिवासी विधायक महेंद्र कर्मा का तर्क था कि एस्सार के स्टील प्लांट से इस इलाके का विकास होगा लेकिन ग्रामीणों ने उनकी बात तक नहीं सुनी और नारेबाजी करते हुए सभा का बहिष्कार कर दिया.
महेंद्र कर्मा का आरोप था कि भाकपा के लोग ग्रामीणों को भड़का रहे हैं और जनहित के मुद्दे पर राजनीति की जा रही है.

इस बीच लगभग 1300 ग्रामीणों ने कलेक्टर को पत्र लिख कर स्पष्ट कर दिया कि वे अपनी जमीन एस्सार को नहीं देंगे.

जाहिर है, प्रताड़ना और दबाव का दौर यहां भी चला. 9 सितंबर 2006 को जब भांसी में विशेष ग्राम सभा का आयोजन किया गया तो इस छोटे से गांव में सशस्त्र बल की दो कंपनियां तैनात कर दी गईं. इसके अलावा जिला पुलिस बल के 100 से अधिक जवान गांव के चप्पे -चप्पे पर तैनात कर दिए गए.

दंतेवाड़ा जिला आदिवासी महासभा के सचिव रामा सोरी का आरोप है कि भूअर्जन के लिए अनैतिक तरीका अपनाया गया और ग्रामसभा के लिए भी जबरदस्ती की गई.

हालांकि एस्सार के प्रतिनिधि विजय क्रांति इस तरह के दबाव और प्रताड़ना को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि जमीन अधिग्रहण का काम हमारा नहीं सरकार का है. इसके लिए सरकार क्या-क्या तरीका अपनाती है, यह सरकार मामला है.

हालांकि वे यह नहीं बताते कि 10 जून 2006 की सभा में सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ एस्सार के क्षेत्रीय निदेशक समेत कई महत्वपूर्ण अधिकारी क्यों उपस्थित थे.

एस्सार के विस्थापितों के मुद्दे पर पुनर्वास समिति की बैठक की अध्यक्षता करने वाले राज्य के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री केदार कश्यप के अनुसार एस्सार स्टील परियोजना के शुरु होने से यहां एक लाख 30 हजार से अधिक स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे.

ज्ञात रहे कि देश भर में एस्सार स्टील के लगभग 15 हज़ार कर्मचारी हैं. ऐसे में अकेले बस्तर में सवा लाख से अधिक लोगों को रोजगार क्या संभव है ? केदार कश्यप की मानें तो 1700 लोगों को एस्सार के स्टील प्लांट में नौकरी दी जाएगी, इसके अलावा लगभग 5 हजार लोग स्टील प्लांट के दूसरे काम में लगेंगे. स्टील प्लांट के शुरु होने के बाद लगभग 1 लाख 25 हजार लोगों को स्टील प्लांट के विभिन्न सहायक उद्योगों में रोजगार मिल जाएगा.

आयरन ओर ऊर्फ दिल्ली दूर है
लेकिन बस्तर के विभिन्न मुद्दों पर पिछले कई सालों से क़ानूनी लड़ाइयां लड़ने वाले अधिवक्ता प्रताप नारायण अग्रवाल स्टील प्लांट की स्थापना और रोजगार के मुद्दे को किनारे करके देखने की बात करते हैं. उनका तर्क है कि बस्तर में टाटा और एस्सार स्टील प्लांट लगाने के बजाय मूल रुप से आयरन ओर का उत्खनन करने और उसके निर्यात में इनटरेस्टेड हैं.

दोनों ही इस्पात कंपनियों के साथ हुए एमओयू में सरकार ने उन्हें उनकी सुविधानुसार आयरन ओर के पट्टे उपलब्ध कराने के लिए आश्वस्त किया है. इसके अलावा सरकार ने उन्हें बस्तर से आयरन ओर के उत्खनन, निर्यात और बिक्री की छूट भी दी है. प्रताप नारायण अग्रवाल को आशंका है कि ये दोनों कंपनियां अपने दूसरे संयंत्रों के लिए कच्चा माल यहां से ले जाएंगी.

बस्तर के लोहे पर अभी तक एनएमडीसी का कब्जा रहा है, जिसका एकाधिकार खत्म करने के लिए पिछले चार दशकों में कई कोशिशें हुईं.

आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण के शुरुवाती दौर में एनएमडीसी को बीमार बना और बता कर बैलाडीला की लोहे की खदानों को निजी हाथों में देने की कई कोशिशें की गईं. इस मुद्दे को मीडिया में जोरशोर से उठाने वाले पत्रकार सुदीप ठाकुर कहते हैं- तत्कालीन इस्पात व खान मंत्री संतोष मोहन देव और प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने बैलाडीला की सबसे कीमती खदान 11 बी को मित्तल समूह की निप्पन डेनरो के हवाले करने के लिए कई योजनाएं बनाईं. प्रधानमंत्री के इशारे पर सबसे पहले एनएमडीसी और निप्पन डेनरो में करार करवा कर एक नयी कंपनी बनवाई गई. इस नई कंपनी बैलाडीला मिनरल डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड में हास्यास्पद तरीके से निप्पन डेनरो की 89 प्रतिशत साझेदारी थी और एनएमडीसी के हिस्से केवल 11 प्रतिशत.

सुदीप ठाकुर का दावा है कि प्रधानमंत्री नरसिंहराव की कोशिशों के बाद बैलाडीला की लौह खदानों पर निजीकरण ने अपना शिकंजा कसना शुरु कर दिया.

दूसरी ओर एनएमडीसी के हाथों से लौह खदानों को लेकर निजी हाथों में दिए जाने की वकालत करते हुए टाटा स्टील के प्रबंध निदेशक एम बी मुथुरमन कहते हैं कि एनएमडीसी अब तक सारे अयस्क जापान जैसे देशों को निर्यात करता रहा है. यह राष्ट्रहित के खिलाफ है. ऐसे में अगर बस्तर के लौह खदानों की लीज बस्तर में ही संयंत्र लगाने वालों को दी जाएगी, तो इससे अच्छा और क्या होगा.

ताज़ा मामले में टाटा और एस्सार समूह ने भी राज्य सरकार के साथ एमओयू करने के बाद सबसे पहले बैलाडीला की लौह खदानों पर अपनी नजरें टिकाई. 27 अक्टूबर 2005 को एस्सार ने और 13 मार्च 2006 को टाटा ने लौह खदानों के लिए अपना आवेदन दिया. इससे पहले भी इस इलाके में खदानों की लीज के लिए 25 आवेदन आए थे, लेकिन सरकार ने उन आवेदनों को निरस्त करते हुए 1 नवंबर 2006 को केवल एस्सार समूह को 2285 हेक्टेयर क्षेत्र का हिस्सा देने की अनुशंसा भारत सरकार को अनुमोदन के लिए भेज दी. लगभग 2 महीने बाद 28 दिसंबर को ही केंद्र सरकार ने इसे अपनी हरी झंडी दे दी.

लेकिन 25 अन्य आवेदनों पर विचार क्यों नहीं हुआ, इसके जवाब में मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं- “क्योंकि दूसरे लोग बस्तर में उद्योग नहीं लगा रहे हैं.”


नो मेंस लैंड

आम तौर पर अशांत इलाकों में पूंजी निवेश से उद्योगपति हमेशा से बचते रहे हैं. ऐसे में देश में सर्वाधिक नक्सल प्रभावित बस्तर में टाटा और एस्सार की दिलचस्पी ने कई सवाल खड़े किए हैं. हालांकि कहा यही जा रहा है कि बस्तर के अपार खनिज का मोह कोई छोड़ना नहीं चाहता. दूसरी ओर सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी है.
लेकिन लोगों की निगाह सरकारी संरक्षण में नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा द्वारा नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे सलवा जुड़ूम यानी शांति अभियान और टाटा-एस्सार के समीकरण की ओर भी है.

टाटा-एस्सार ने जिस समय छत्तीसगढ़ सरकार से एमओयू किया उसके आसपास ही जून 2005 से बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुड़ूम अभियान शुरु हुआ. इस अभियान के बाद नक्सलियों ने अपना हमला तेज़ किया और आज हालत ये है कि पिछले 22 महीनों में कश्मीर समेत देश के किसी भी दूसरे हिस्से से ज्यादा लोग मारे गए हैं.

जगदलपुर के पत्रकार राजेंद्र तिवारी के अनुसार टाटा ने फरसपाल, मासोड़ी, कुंदेपाल, दारापाल, चिदरापाल व फूलगट्टा की 2690 हेक्टेयर जमीन सरकार से लीज पर मांगी थी. सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद 50 हज़ार से अधिक लोग अपने गांवों को छोड़ कर सरकारी शिविरों में रह रहे हैं, लगभग 40 हज़ार लोगों को बस्तर छोड़ कर पड़ोसी राज्यों उड़ीसा और महाराष्ट्र में शरण लेनी पड़ी है. सैकड़ों गांव खाली हो गए हैं.

नक्सली संगठन सीपीआई माओवादी के महासचिव गणपति ने सलवा जुड़ूम को लेकर पहले ही कई गंभीर आरोप लगाए हैं. Independent Citizens’ Initiative को लिखे एक पत्र में गणपति का कहना है- “ There is immense wealth in the areas inhabited by adivasis from Jharkhand to AP and all the big guns have their greedy eyes fixed on this wealth. Hence they leave no stone upturned to grab this wealth even if it means massacring the indigenous people, razing entire villages to the ground and suspending all fundamental rights of the people. In just the three states Chattisgarh, Jharkhand and Orissa over three lakh crores of rupees are likely to be pumped in to extract several times more wealth to fill the coffers of these steel and aluminium barons of India and imperialist countries.. ... This is the logic behind salwa judum.”


लेकिन नक्सली संगठन इस मुद्दे पर खामोश हैं कि सरकारी कैंपों में जो लोग रह रहे हैं, वे नक्सलियों की दहशत के कारण अपना गांव छोड़ कर शरणार्थी बनने को मजबूर हुए हैं. एक तरफ सलवा जुड़ूम में शामिल नहीं होने वाले आदिवासियों को सलवा जुड़ूम समर्थकों के आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है, तो दूसरी ओर सलवा जुड़ूम का साथ देने वालों को नक्सली अपना निशाना बना रहे हैं. पिछले दो साल में 700 से अधिक लोग इन दो पाटों के बीच फंस कर अपनी जान गंवा चुके हैं.

नक्सल प्रभावित बस्तर के कोंटा विधानसभा के आदिवासी विधायक कवासी लखमा कहते हैं- “बस्तर में पहली बार आम जनता इतनी दहशत में है. हमें ऐसा नया राज्य तो नहीं चाहिए था. नक्सली, सरकार और उद्योगपतियों ने आदिवासियों को जिस तरह प्रताड़ित किया है, उससे अगर आदिवासियों के लिए अलग बस्तर राज्य की मांग तेज हो जाए, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.”

कवासी लखमा की आवाज़ कोई सुन रहा है ?

(PANOS SOUTH ASIA के लिए किए गए अध्ययन का हिस्सा)

बस्तर : लोहा गरम है-2

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/10/2007 01:23:00 AM

आप सबको लंबा इंतज़ार करवाया, इसके लिए मआज़रत. दरअसल बिहार में बाढ़ ने इस तरह तबाही मचायी है कि पटना में बैठा नहीं गया. सो हम निकल गये बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के दौरे पर. पहला दौरा समस्तीपुर. असल में यह बाढ़, जैसा कि लोगों ने भी बताया, बांधों के कारण और अधिक तबाही लानेवाली हो गयी है. और इसी के साथ नाकारा और संवेदनहीन तंत्र इस त्रासदी को और गहरा बना रहा है. यही वजह है कि बाढ़ से जितना नुकसान हो रहा है, उससे अधिक नुकसान राहत कार्य के अभाव से हो रहा है. हम ऐसी जगहों पर गये, जहां एक हफ़्ता गुजर जाने के बावजूद न फ़ंसे लोगों को निकाला गया है और न ही उन तक कोई राहत पहुंच सकी है. और जो राहत के पैकेट गिराये जा रहे हैं, उनमें खाद्य सामग्री के नाम पर गेहूं है. गेहूं को न उबाल कर खाया जा सकता है और न भून कर. उसे पीसना ज़रूरी है. और इस तबाही में कौन कहां पिसवायेगा?
खैर बाढ़ की यह दास्तान बाद में, पहले आलोक भाई के लेख की अगली (दूसरी) कडी़. पहली कडी़ आप पढ चुके हैं. दरअसल यह पूरी रिपोर्ट हमें अपने देश के एक दूसरे ही चेहरे से अवगत कराती है.

किस्से अरबों हैं
आलोक प्रकाश पुतुल

सल में लोहण्डीगुड़ा-बेलर में टाटा और भांसी व धुरली में एस्सार के ख़िलाफ़ लोगों का गुस्सा अकारण नहीं है. सच तो ये है स्टील प्लांट और लोहे के नाम पर बस्तर ने अब तक जो कुछ देखा और भुगता है, उसे भुला पाना बस्तर के आदिवासियों के लिए संभव नहीं है.

लोहा बस्तर और छत्तीसगढ़ के जन जीवन में रचा-बसा हुआ है. आयरन ओर से इस्पात बनाने की शुरुवात भी यहां पहली बार नहीं हो रही है. आगरिया गौंड़ आदिवासी तो जाने कब से आयरन ओर को गला कर इस्पात बनाने का काम करते रहे हैं. 19वीं शताब्दी के आरंभ में आगरिया आदिवासियों के कम से कम 441 परिवार घरेलू भट्ठियों में आयरन ओर से इस्पात बनाने का काम कर रहे थे.
और तो और, टाटा ने पहले भी बस्तर में स्टील प्लांट लगाने की पहल की थी. पुराने दस्तावेज़ों की मानें तो 1896 में जमशेदजी टाटा ने भी कुछ भूगर्भ शास्त्रियों के साथ बस्तर का दौरा किया था और बस्तर के लौह खदानों की उपलब्धता व गुणवत्ता के आधार पर बस्तर या उड़ीसा के संबलपुर में स्टील प्लांट लगाने की संभावनाएं तलाशी थीं, लेकिन रेललाइन व दूसरे यातायत के साधनों के अभाव में यह इरादा टालना पड़ा.

इस इलाके में दूसरा कदम रखा एनएमडीसी ने. 15 नवंबर 1958 को स्थापित एनएमडीसी ने 1968 में इसी बस्तर के बैलाडीला से लौह अयस्क का उत्पादन शुरु किया. 14 हिस्सों में बंटे लौह अयस्कों की 2 डिपाजिटों से एनएमडीसी ने उत्खनन शुरु किया और जापान निर्यात करना शुरु कर दिया. प्रति दिन लगभग 1 करोड़ 22 लाख रुपये के 27 लाख टन आयरन ओर का निर्यात किया जा रहा था. लेकिन यह तो तस्वीर का एक पहलू है.

बस्तर में कोंटा इलाके के आदिवासी विधायक कवासी लखमा कहते हैं-एनएमडीसी ने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का शोषण ही किया है. आज भी एनएमडीसी में इस इलाके के अधिकतम 15 फीसदी लोगों को रोजगार मिला है.

लेकिन बात केवल रोजगार की नहीं है. एनएमडीसी की खदानों की लीज जब 1995 में खत्म हुई, उसी के आस पास भारत सरकार से संबद्द साइंस एंड टेक्नालॉजी सेल की रिपोर्ट सामने आई. रिमोट सेसिंग एप्लीकेशन सेंटर द्वारा इस इलाके की व्यापक जांच और सर्वेक्षणों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रम एनएमडीसी द्वारा लगातार उत्खनन और पर्यावरण की घोर उपेक्षा के कारण माईनिंग एरिया के चारों ओर के 35 हजार हेक्टेयर क्षेत्र का पर्यावरण, फ्लोरा-फाना, बॉयोडायवरसिटी, जंगल, खेती और जीव जगत बुरी तरह प्रभावित हुआ है. यह पूरा इलाका वन रहित हो गया है. केंद्र और राज्य सरकारों ने भी समय-समय पर माना कि एनएमडीसी के उत्खनन के कारण इस इलाके में रहने की परिस्थियां बदत्तर हुई हैं.
इस इलाके के लगभग 100 किलोमीटर के विस्तार में बहने वाली शंखिनी नदी में लौह अयस्क की धुलाई के बाद छोड़े गए पानी के कारण शंखिनी और डंकिनी नदी लाल दलदल वाले क्षेत्र में बदल गईं. लाखों लोगों के लिए जीवनदायिनी ये नदियां मुसीबत बन गईं. गावों में नई-नई बीमारियों का प्रकोप फैलता चला गया. सैकड़ों गावों का पानी प्रदूषित हो गया और सिंचाई की सुविधा छिन गई. इन नदियों के दलदल में सैकड़ों पालतू पशु समा गए. कई बच्चे भी इन नदियों के दलदल में फंस कर अपनी जान गंवा बैठे.

वायदों का सच बनाम नगरनार
इधर 90 के दशक में ही बस्तर के मावलीभाटा और नगरनार में भारत सरकार के उपक्रम एनएमडीसी ने स्टील प्लांट लगाने की जब घोषणा की तो बैलाडीला में जल, जंगल और जमीन की हालत से वाकिफ आदिवासियों ने संगठित हो कर यह सवाल पूछा कि इस स्टील प्लांट से हमें क्या मिलेगा.

ज़ाहिर है, इसका जवाब किसी के पास नहीं था. यहां तक कि इस प्लांट के लिए जमीन अधिगग्रहण के दौरान जब आदिवासियों ने अपने पुनर्वास को लेकर सरकारी नीति का खुलासा चाहा तो पता चला कि इस स्टील प्लांट के लिए सरकार ने कोई पुनर्वास नीति बनाई ही नहीं है. लेकिन सरकार के लिए यह स्टील प्लांट तो जैसे नाक की बात हो गई थी. सरकारी दमन चक्र ऐसा चला कि सैकड़ों आदिवासियों के साथ-साथ कई लोग पुलिस और एनएमडीसी के गुंडों के हाथों प्रताड़ित हुए.

भारत जन आंदोलन के नेता व तब के अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के आयुक्त ब्रह्मदेव शर्मा को तो गुंड़ों ने नगरनार का विरोध करने पर लगभग नंगा करके जुलूस निकाला था और सार्वजनिक रुप से उन्हें प्रताड़ित किया था. ये वही ब्रह्मदेव शर्मा थे, जिनकी एक आईएएस के रुप में पूरे बस्तर में तूती बोलती थी.

बहरहाल स्टील प्लांट का विवाद गहराता गया और सरकारी फाइलों का बोझ बढ़ता रहा.
1 नवंबर 2000 को जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बना तो सरकार ने उन पुरानी परियोजनाओं को खंगालना शुरु किया, जो मध्य प्रदेश से विरासत में मिली थी. इसी क्रम में राज्य बनने के कुछ ही दिन बाद एनएमडीसी ने फिर से बस्तर में स्टील प्लांट लगाने की घोषणा की और आनन-फानन में दंतेवाड़ा के गीदम के घोटपाल और हीरानार में स्टील प्लांट के लिए आदिवासियों की ज़मीन पर कब्जा करना शुरु कर दिया.

5वीं अनुसूची लागू होने के करण बस्तर के इस अधिसूचित क्षेत्र में नियमानुसार ग्राम सभा की सहमति से ही ज़मीन ली जा सकती है. लेकिन इस तरह के नियम को ताक पर रख कर जब जमीन अधिग्रहण का काम चालू रहा तो आदिवासी सरकार के खिलाफ लामबंद होने लगे और भूमि अधिग्रहण के मामले की गूंज दिल्ली तक जा पहुंची. छत्तीसगढ़ सरकार ने भी माना कि अधिग्रहण के लिए आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया जा सका है. अंततः एनएमडीसी और छत्तीसगढ़ सरकार ने अपना काम-धाम इस इलाके से समेट लिया। इसके बाद एनएमडीसी और छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बार फिर अपना रुख नगरनार की ओर किया.

बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर है नगरनार. बस्तर के सर्वाधिक घनी आबादी और उत्कृष्ट कृषि योग्य भूमि वाले इस इलाके में जब स्टील प्लांट लगाने के ख्वाब आदिवासियों को दिखाए गए तो उन्हें बताया गया कि इस इलाके के आदिवासियों के लिए रोजगार, आवास, शिक्षा औऱ चिकित्सा के क्षेत्र में संभावनाओं के नए दरवाज़े खुलेंगे लेकिन इसका सच बस्तर की सल्फी से भी कड़वा साबित हुआ.


मई, 2001 में जब भारत सरकार के उपक्रम एनएमडीसी ने नगरनार में स्टील प्लांट लगाने की घोषणा की तो आदिवासियों को कई सब्जबाग दिखाए गए. कहा गया कि 40 हज़ार लोगों को रोजगार दिया जाएगा, लोगों को ज़मीन के बदले जमीन दी जाएगी, बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाएगी, खेतों के बदले पर्याप्त मुआवजा दिया जाएगा और यह भी कि सभी लोगों को घर बना कर दिए जाएंगे. लेकिन जब इस स्टील प्लांट के लिए 300 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण का काम शुरु हुआ किया तो एनएमडीसी और राज्य सरकार की नियत आदिवासियों की समझ में आ गई.
शुरुवात तो ग्राम सभा से से ही हुई जहां ज़मीन अधिग्रहण से पहले गांव वालों की सहमति लेनी थी. सरकार ने तो जैसे तय कर रखा था कि नियम-क़ायदा को ताक पर रख कर चाहे जैसे भी हो एनएमडीसी के लिए आदिवासियों की ज़मीन हासिल करनी है. लेकिन जब आदिवासियों से बंदूक की नोंक पर सहमति बनाने के प्रयास शुरु हुए तो लोगों ने विरोध करना शुरु कर दिया.

24 अक्टूबर 2001 को ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ आदिवासियों ने जब एनएमडीसी और सरकार का विरोध करना शुरु किया तो पुलिस ने पहले तो निहत्थे लोगों पर बर्बरता से लाठियां बरसाई और जब बात उससे भी नहीं बनी तो गोलियां चलाई गई. महिलाओं समेत 50 से अधिक लोग बुरी तरह हताहत हुए.

लेकिन आदिवासियों का विरोध इस तरह की कार्रवाई से भी कम नहीं हुआ. 2 मार्च 2002 को आदिवासियों ने अपनी ग्रामसभा की और तय किया कि एनएमडीसी के प्रस्तावित स्टील प्लांट के लिए ज़मीन अधिग्रहण का काम नियम-क़ानून के दायरे में हो और विस्थापित होने वाले आदिवासियों के पुनर्वास की व्यवस्था के अलावा उन्हें ज़मीन के बदले ज़मीन दी जाए, जिससे उनकी आजीविका चलती रहे.

उम्मीद की जा रही थी कि सरकार आदिवासियों की इन मांगों पर विचार करेगी और मामला सुलझ जाएगा. लेकिन किसी भी क़ीमत पर एनएमडीसी को नगरनार में ज़मीन दिलवाने पर अड़ी हुई सरकार को आदिवासियों का यह विरोध नहीं जंचा. इस ग्रामसभा के अगले दिन से ही पुलिस ने विस्थापित होने वाले आदिवासियों को धमकाना शुरु कर दिया. विस्थापित आदिवासियों को मनमाने तरीके से तय किए गए मुआवजे के चेक जबरदस्ती लेने के लिए पुलिस ने सारे हथकंडे अपनाने शुरु कर दिए.

कस्तूरी, नगरनार या आमागुड़ा जैसे प्रभावित गांव के लोगों के जेहन में आज भी 10 मार्च की याद ताज़ा है. अपनी 5 एकड़ ज़मीन एनएमडीसी के हवाले करने वाले नगरनार गांव में हड्डियों के ढ़ांचे की तरह दिखने वाले रुपसाय हल्बी में बताते हैं- “पुलिस ने उस रात अपनी बर्बरता की सारी हदें लांघ दी थीं.”

गांव वालों के अनुसार एनएमडीसी के प्रस्तावित स्टील प्लांट वाले गांवों में पुलिस ने देर रात को धावा बोला और गांव में महिलाओं और बच्चों समेत जो भी नज़र आया, उन्हें बेतहाशा पीटना शुरु किया. घरों में सो रहे लोगों के दरवाज़े तोड़ डाले गए और लोगों को गांव की गलियों में घेर-घेर कर जानवरों की तरह मारा गया. महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया.

लेकिन इसके बाद कुछ भी नहीं हुआ.

यह “कुछ नहीं होना” नगरनार के लोगों के लिए एक ऐसा नासूर बन गया, जिसका जख्म लगातार रिसता रहता है.

जिस स्टील प्लांट के लिए एनएमडीसी और सरकार ने आदिवासियों पर इतने जुल्म ढ़ाए, उस प्रस्तावित इलाके में एनएमडीसी ने रातों-रात चाहरदिवारी बना दी और अपने बोर्ड टांग दिए. इस बात को लगभग 5 साल होने को आए, लेकिन चाहरदिवारी के अलावा स्टील प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ा.
जिन आदिवासियों की ज़मीन छीनी गई, उनके पास कोई साधन नहीं बचा. खेती वे कर नहीं सकते थे, क्योंकि ज़मीन एनएमडीसी के कब्जे में है और वायदे के मुताबिक उन्हें नौकरी तो मिली ही नहीं, क्योंकि स्टील प्लांट का काम ही शुरु नहीं हुआ. 303 विस्थापित परिवारों में से 43 परिवार तो ऐसे हैं, जिन्हें मुआवजे की राशी भी नहीं मिली.

नगरनार में एनएमडीसी की चाहरदिवारी में ही बने राज्य के पहले आईएसओ थाना के सहायक उपनिरीक्षक प्रमोद मिश्रा अपनी कुर्सी पर लगभग पसरते हुए कहते हैं- “अभी भी शायद आदिवासियों के ख़िलाफ़ कुछ मामले लंबित हैं.”

ज़ाहिर है, अपना सब कुछ गंवा देने के बाद अब आदिवासियों के हिस्से अदालतों के चक्कर हैं, भूख है, बदहाली है और वायदों के ढेर तो हैं ही, जिसके पूरे होने की उम्मीद अब सभी लोग छोड़ चुके हैं.

एनएमडीसी के टेक्नीकल डायरेक्टर पीएस उपाध्याय और नगरनार परियोजना के प्रबंधक आलोक मेहता बताते हैं कि अब नगरनार में स्टील प्लांट के बजाय एक लाख टन वार्षिक उत्पादन की क्षमता का स्पंज ऑयरन संयंत्र लगाया जाएगा. इसके अलावा 10 मेगावाट क्षमता वाले केप्टिव पावर प्लांट की भी स्थापना की जाएगी.

लेकिन बस्तर में अब इस बात पर भरोसा करने को कोई तैयार नहीं है. वैसे भी स्टील प्लांट की तुलना में स्पांज ऑयरन संयंत्र में लोगों को कितना रोजगार मिलेगा, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है.क्रमशः
(पैनोस साउथ एशिया अध्ययन का हिस्सा) तसवीर आलोक प्रकाश पुतुल की

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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