हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

असीमा जी, सारा दोष आलोकधन्वा का ही था?

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2007 11:29:00 PM

असीमा भट्ट के लिखे आत्मसंघर्ष पर जिन कुछ लोगों ने प्रतिप्रश्न किये हैं, उनमें से एक हैं जैगम इमाम. दीवानमेल पर असीमा भट्ट के आत्मसंघर्ष को पढ़ने के बाद उन्होंने मुझे उसी के ज़रिये यह सवाल भेजा. क्या आपको लगता है कि इसमें जवाब देने लायक कुछ है?

रियाज साहब


क्या इन बातों का जवाब मिल पाएगा.....

बडी सोची समझी स्क्रिप्ट है। लिखी गई मिटाई गई फिर लिखी गई। खैर, 45 साल के
पुरुष का एक भावुक निमंत्रण और 23 साल की लडकी कुर्बान हो गई। कमाल का प्रेम
है। अब नफरत के पात्र हुए आलोकधन्वा में उस वक्त क्या हीरे जडे़ थे? लेखिका
ने अपने प्रेम की उस अद्भुत अनुभूति को बिना बखाने छोड़ दिया। कवि कम उम्र की कमसिन
कन्या को भोगने को आतुर थे मगर कन्या को तो जैसे इस बात की उत्सुकता ही नहीं
थी कि आलोकधन्वा जैसे कवि की देह का स्पर्श कैसा होता होगा? कवि तो उसे अपनी
गोद में खिलाने के शादी कर रहा था?

आत्मकथा के जरिये आत्मप्रलाप करने में यही दिक्कतें हैं। सच्चाई को अपने
हिसाब से लिखा जाता है। दीवान पर इस कथा के दूसरे अंक के आने के बाद मैंने अपने
एक जाननेवाले, जो कि दीवान पर रजिस्टर हैं, को फोन किया। सवाल था कि ये
लेखिकाएं पति से अलग होने के बाद ही क्यों जहर उगलती हैं। साथ में रहते हुए
कुछ लिख दें...। उन्होंने कहा कि दीवान पर पूछो। सो पूछ रहा हूं। आप मुझे
कुछ भी कह सकते हैं। शायद मुझे ये हक भी नहीं है कि मैं इन सवालों को उठाऊं।
लेकिन अगर इसे पढने का हक दिया गया तो पूछूंगा जरुर। असीमा जी की आत्मकथा में
बार-बार एक बात उभर कर सामने आती है। वो कहीं भी कुछ गडबड नहीं करतीं। सबकुछ
आलोकधन्वा करते हैं। एक मां को अपने अजन्मे बच्चे पर तरस नहीं आता। ये जानते
हुए भी कि रक्त किसी का हो, कोख मां की तो बच्चा मां का है। वो ये कह कर
बच्चे को खत्म कर देती है कि उसका पिता उसे अपना नहीं मानता। हां इस बात की
टीस बार बार उसके जहन में रहती है कि उसका बच्चा चला गया। सच कहूं तो मुझे ये
आत्मसंघर्ष सफाई संघर्ष लगा। हर बात पर लेखिका अपने को बचा रही है। सामनेवाले
को जलील करना उसका मकसद है। और हां, ये भी बता दूं कि मुझे रंडी शब्द का
इंतजार था। जो आ भी गया, मेरी सारी शंकाएं दूर हो गयीं।
खैर लेखिका ने अपनी असफल जिंदगी के लिए पुरुष प्रधान समाज को भी जिम्मेदार ठहराया है। मर्द हर औरत को
भोगना चाहता है...मगर औरत कुछ नहीं चाहती है। उसकी कोई लिप्सा नहीं, उसकी कोई
लालसा नहीं। हर मर्द के लिए मां और बहन, बेटी को छोड़ कर सारी औरतें रंडी
हैं...लेकिन औरतों के लिए बाप, भाई, बेटे को छोड कर दूसरे पुरुष भी पिता और भाई,
बेटे के समान हैं...।
एक बुड्ढे लेखक की आबरु उतारने के लिए इतना करने की क्या जरुरत थी? किसी कवि सम्मेलन के मंच पर चढकर मुंह काला कर देतीं...आपकी
हिम्मत भी दिख जाती और कवि कहीं मुंह दिखाने के काबिल न बचता। चलते-चलते एक
बात और एक सज्जन ने कहा-लेखिका हिम्मती है। हिंदी में इतनी साफगोई से बातें
नहीं होतीं. मैंने कहा बिल्कुल सही...ये एक नयी परंपरा हो सकती है। लेकिन हम उस
देश से आते हैं जहां कई बार पूर्व पति या पत्नियां अपने पति या पत्नियों की
हत्या तक करा देती हैं। फिर ऐसे में आत्मकथा के हथियार से अपने पति उर्फ एक
लेखक को मारना क्या बडी बात है?

शुक्रिया
जैगम

नया ज्ञानोदय विवाद की एक और कडी

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/23/2007 01:30:00 PM



परिचय और पाठ का अंतर्विरोध


- प्रमोद रंजन

परिचय कैसा भी हो,वह मनुष्‍य की बहुआयामी संभावनाओं को सीमित करता है। साहित्यिक हलकों में इन दिनों चर्चा और विवाद का विष्‍य बने भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक पत्रिका 'नया ज्ञानोदय` के परिचय प्रसंग में भी यह मूल बात ध्यान रखी जानी चाहिए। विवाद की शुरूआत नया ज्ञानोदय के मई, २००७ युवा पीढ़ी पर केंद्रित विशेषांक में प्रकाशित विजय कुमार के लेख से हुई।उसके बाद विशेषांक में प्रकाशित परिचयों पर भी विवाद हुआ। यद्यपि ज्ञानोदय ने अपने लेखकों के 'परिचयों` के साथ पहली बार मसखरी नहीं की है ।पत्रिका के वर्तमान संपादक रवीन्द्र कालिया 'वागर्थ` के समय से ही अतिश्योक्तिपूर्ण परिचय प्रकाशित कर हिन्दी के साहित्यिकों को प्रसन्न करते रहे हैं ।

मैं अन्‍यत्र भी यह कह चुका हूं कि नया ज्ञानोदय के मई अंक में विजय कुमार के जिस लेख 'कवित्त ही कवित्त है` से विवाद का जन्म हुआ वह सदाशयतापूर्वक लिखी गई अलोचना है। उतनी ही सुरूचिपूर्ण भी, जितनी कि कलावाद को प्रश्रय देने वाली कोई आलोचना हो सकती है। इस विवाद के दोनों पक्ष गैरऱ्यथार्थपरक, और अंतत: कलावादी इसलिए भी कहे जा सकते हैं कि विजय कुमार का विरोध करने वालों ने भी इस तथ्य पर उंगली रखने की आवश्यकता नहीं समझी कि विजय जी अपनी आलोचना में 'यथार्थबोध` के स्थान पर 'सौंदर्य शिल्प और रूप-रचाव` पर जोर दे रहे हैं। न ही किसी ने यह याद करने की कोशिश की कि लेखकों के ऐसे अतिश्योक्तिपूर्ण परिचय की आवश्यकता प्राय: सभी साहित्यिक पत्रिकाओं को क्यों होने लगी है?

यह सच है कि नया ज्ञानोदय के युवा पीढी विशेषांक में लेखकों के परिचय 'अतिश्योक्ति` की भी सीमा पार कर हास्यास्पद और वल्गर हो गए हैं ।अंक में किसी युवा लेखक के परिचय में लिखा गया कि 'अविवाहित कथाकार।कॉम्लेक्शन एंड क्वालिफिकेशन नो बार।बट गर्ल्स फादर मस्ट हैव ओन बार` तो किसी युवा लेखिका के बारे में कहा गया कि 'दुबली-पतली और सुन्दर कहानीकार`। इसके अलावा अन्य पत्रिकाओं की ही तरह ज्ञानोदय में प्रकाशित इन परिचयों में भी लेखकों के उंचे घराने से संबंधित होने अथवा उंची नौकरियों में होने जैसी बातों को प्रमुखता दी गई है। साहित्यिक पत्रिकाओं का 'उंचे` लोगों के प्रति मोह अलग विश्लेषण की मांग करता है। जरा सोचें, यदि कबीर अथवा रविदास के समय ये साहित्यिक पत्रिकाएं होती और उनमें से कोई उनकी वाणी छापने के लिए तैयार भी हो जाती तो उनका 'परिचय` क्या होता? क्या अभिजात संपादकीय मानसिकता यह पचा पाती कि उसका लेखक 'कपड़ा बुनता है` या 'जूता बनाता है`? और वे अपने तुलसी का परिचय क्या देते?

ज्ञानोदय के मई और जून में प्रकाशित युवा पीढी पर केंद्रित दो विशेषांकों में प्रकाशित इन परिचयों के पीछे की मानसिकता को समझने में पत्रिका का जुलाई अंक सहायक बन सकता है। संभवत: यह रवींद्र कालिया के विरोधियों द्वारा ज्ञानपीठ प्रबंधन से की गई शिकायतों का असर रहा कि नया ज्ञानोदय के जुलाई अंक में लेखकों के परिचय एकदम गायब हो गए। अंक में लेखकों के सिर्फ फोटो छापे गए हैं। पिछले अंकों में प्रकाशित परिचयों के लिए संपादक ने स्पष्‍टीकरण भी दिया है। लेकिन इस अंक से एक और नई कवायद शुरू की गई है। इसमें वरिष्‍ठ कवि भगवत रावत की कविताओं और शशिकला राय द्वारा लिखी गई समीक्षा के साथ उन पत्रों को भी छाप दिया गया जो इन रचनाकारों ने संपादक के नाम लिखे थे। इन पत्रों में भगवत रावत को कहते हुए दिखलाया गया है कि 'अगर आपको यह कविता इस योग्य किसी भी कारण से न लगे कि इसे प्रकाशित किया जाए तो यह बात आप और मेरे बीच ही रहे`। शशिकला राय का पत्र है कि 'आपके आदेशनुसार समीक्षा भेज रही हूं।मुझे समीक्षा नहीं लिखने आती`। दोनों पत्रों के उपरोक्त उद्धृत हिस्सों से इन्हें प्रकाशित किए जाने के कुछ निहितार्थ तो स्वयं स्पष्‍ट हो जाते हैं लेकिन इनके प्रकाशन से यह भी संकेत मिलता है कि नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया इन चीजों को रचना का 'पूरक` मानते हैं। परिचयों के बारे में संपादकीय स्पष्‍टीकरण में उन्होंने इस आशय की बाते कहीं भी हैं। असली पेंच भी यही है। वह यह नहीं समझ पाते कि इस तरह की चीजें रचना के आस्वाद में बाधक होती हैं।परिचय तो दूर,'पाठ के बाहर कोई अर्थ नहीं है' का उदघोष करने वाले फ्रेंच चिंतक जॉक देरिदा तो यहां तक कहते थे कि रचना के साथ छपा रचनाकार का चित्र भी पाठक-आलोचक से रियायत मांगता प्रतीत होता है। मुझ जैसे अनेक लोगों की (जो पाठ के बाहर लेखक की सामाजिक पृ ठभूमि में भी अर्थों को देखते हैं, भी सहमति कम से कम देरिदा की इन बातों से तो बनती ही है) किसी रचनाकार का यह परिचय कि उसे ससुराल में 'बार` चाहिए या वह एक छरहरी सुंदरी है , किसी पाठ का पूरक नहीं हो सकता। हां, यदि आप यह बताएं कि फलां 'कर्मकांडी परिवार' से आते हैं, तो उसकी कुछ सार्थकता संभव है। तब यह देखा जा सकता है कि उसकी रचना के आंतरिक तत्व क्या हैं अथवा उसने अपनी पृष्ठभूमि का कितना अतिक्रमण किया है। इसी तरह, अगर यह बताया जाए कि यह युवा रचनाकार धोबी परिवार आता है और किशोरवस्था तक घाटों पर कपड़े साफ करता था तब उसकी पृष्‍ठभूमि यह देखने के लिए पूरक बन सकती है कि उस छूट चुके परिवेश,मेहनतकश भारतीय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता कितनी है। जाहिर है दोनों पूरकों के उपयोग में एक बडा फर्क होगा। किन्तु अंततोगत्वा यह खोज और विश्लेशण आलोचना का काम है। रचना के साथ किसी तरह की पृष्‍ठभूमि,परिचय आदि का प्रकाशन मूल रूप से पाठक के पाठ में हस्तक्षेप करना ही है। न यह बात रवीन्द्र कालिया समझ पाते हैं, न उनके विरोधी।


( नया ज्ञानोदय प्रकरण पर यह लेख प्रभात खबर के लिए लिखा गया था, जैसा कि प्रभात खबर के पटना संस्‍करण में अक्‍सर होता है, यह लेख उसके ' जिला संस्‍करणों' में 18 जुलाई,2007 को छपा । वैसे मुझे ज्‍यादा कोफत होती अगर यह पटना में छपा होता और उन जिला संस्‍करणों में नहीं, जहां के साहित्यिक पाठकों को दिल्‍ली दरबारों से संबंधित सूचनाओं का शिददत से इंतजार रहता है । गनीमत है ऐसा नहीं हुआ। > प्रमोद रंजन )

कविता

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/21/2007 10:04:00 PM

विकास का सुनामी


-प्रभात कुमार शांडिल्‍य




हमारे घर का आंगन
सामने का बाग-बागान
खेल का मैदान
खेत-खलिहान
जानवरों का बथान
देवी-देवताओं का स्थान
कब्रिस्तान, मशान
सीमा समाप्ति का निशान
गांव का सीवान
सब नहीं हैं अब
खत्म हो गये ये सब
गांव मेरा हो गया आपका
अब इतिहास के पन्नों की धरोहर हो चुका
फिल्मों या टीवी सीरियलों में जब कभी
दिख जाता है
नाटक-नौटंकी या राजपथ पर निकाली गयी
झांकियों में

अब तो जमाना है
अपार्टमेंट, बेसमेंट, फ्लावर पॉट,
स्टेडियम, वेलोड्रोम, स्वीमिंग पुल,
डिपार्टमेंटल स्टोर्स, मल्टीप्लैक्स
फ्लाइओवर, स्लाटर हाउस,
राम मंदिर, महावीर स्थान, जामा मस्जिद,
दरगाह, चर्च, डेयरी, नर्सिंग होम,
ओल्ड एज होम, विद्युत शवदाह गृह
और कब्रिस्तान को घेरे सरकारी दीवार का

गांव नहीं बचा
क्या जरूरत उसकी सीमा रेखा की
पीने के लिए है बिसलेरी की बोतलें
व्हिस्की, रम और तरह-तरह के ब्रांड हैं
देशी, विदेशी, मसालेदार
जहां बोतलें नहीं वहां है चापाकल, बोरिंग
हैं सिंचाई के लिए पंपिंग सेट
बिजली-डीजल-केरोसिन चालित
फिर है टेलीविजन, सीडी प्लेयर, डीवीडी,
मोबाइल फोन और कंप्यूटर
नाभिकीय बम
सब काम तमाम कर देंगे
पल भर में

पीनके के पानी का कुंआ
ठाकुर का कुआं
मर गये मुंशी प्रेमचंद उर्फ धनपत राय
मगर गया कुआं
खेतों के पटवन के स्रोत
आहर-पोखर-तालाब-चौर-पाईन
और औजार
लाठा, कुंडी, रहट, करींग, चांड, सैंन
गांव की नदहीं, आसपास की पहाड़ियों
से अविरल बहते-गिरते झरने
सबको देश की आजादी
देखते-देखते लील गयी
लोकतंत्र टुकुर-टुकुर ताकता रह गया

आधुनिकीकरण, पिख्यमीकरण औद्योगिकीरण
शहरीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण
यह करण-वह करण
की ऐसी आंधी चली
सभ्यता का ऐसा तूफान आया कि धराशायी हो गया
हमारी संस्कृति का विशाल बरगद

फिर बवंडर आये कई
टेका-पट्टा, घूस, बेईमानी, चोरी
कमीशनखोरी, गोली, बंदूक, बक के
और आखिर में आया सुनामी
प्रगति और विकास जैसा सुनाम धन का
ाहर बसते रहे बेतरतीब गांव उजाड़े जाते रहे
नदियां बेच, नहरें सुखा दी गयी
खेत बन गये रेगिस्तान
और अंतत: सब गांव हो गये वीरान
सावन, आश्विन, अगहन, फागुन सब गुजर गये
आसमान ताकता रह गय किसान
मजदूर मजबूर हो
कर गये पलायन
अब तो एक ही काम बचा है
वह है बनाना जल्दी-से-जल्दी
हिन्दुस्तान को सूडान
फिर
भारत सचमुच हो जायेगा महान

क्या केवल मुसलमान ही दोषी हैं?

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/20/2007 12:03:00 AM

कुलदीप नैयर
बैंगलूर एक चर्चित स्थान हो गया है। अभी बहुत समय नहीं बीता, वहां से आतंकवादी संबंधी समाचार आए थे। लश्कर-ए-तोइबा ने कड़ी सुरक्षा से युक्त भारतीय विज्ञान संस्थान पर, डेढ़ वर्ष पूर्व हमला किया था। मुझे स्मरण आ रहा है कि क्षेत्र में शीर्षस्थ व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने, हमले से एक दिन पूर्व ही मुझे बताया था कि आतंकवादी कभी भी और कहीं भी हमला कर सकते हैं। उन्होंने अपनी मजबूरी जताई थी। मेरा उद्देश्य इस उल्लेख द्वारा यह जताने का है कि ऐसी चेतावनी के बावजूद अधिकारियों की प्रतिक्रिया निरुत्साहित सी ही रही थी। अधिकारियों ने उस समय उस आतंकवादी तंत्र के राज्य और राज्य के बाहर भी विस्तार पर गहनता से दृष्टिपात नहीं किया। जो व्यक्ति ग्लागो हवाई अड्डे पर जलती हुई जीप ले जा धमका और जो लोग उसके मददगार रहे, वे बैंगलूर के डाक्टर ही हैं। स्पष्ट ही है कि पुलिस, खुफिया एजेंसियां और राज्य की मशीनरी ने तब अपना काम बखूबी अंजाम नहीं दिया था। वे अखिल इस्लामी कट्टरतावाद और तब लीग के केंद्रों तक पहुंच पाने में असफल रहे, जहां डाक्टरों को शिक्षित-दीक्षित किया गया था।

समग्र भारत में अधिकारियों के कुल मिलाकर क्रियाकलाप को देखकर मैं यही महसूस करता हूँ कि या तो उनमें अनुभव की कमी है, अथवा वे राजनीतिक दबावों के चलते अपने काम को मन लगाकर पूरा नहीं कर पाते। राजनीतिक दबाव की बात अनेक राज्यों के बारे में एक सच्चाई है। खासतौर पर महाराष्ट्र के बारे में तो यह मानना ही होगा। इसके बावजूद ग्लासगो हवाई अड्डे की घटना के बाद जो रहस्य प्रकाश में आए हैं उन्होंने भूमिगत गतिविधियों और उनके पीछे जो संगठन है, उनका पर्दाफाश कर दिया है। दुख के साथ यह स्वीकार करना पड़ता है कि तालिबान और अलकायदा के सेल (प्रकोष्ठ) भारत में भी सक्रिय हैं। उन पर यूरोप तक से कट्टरपंथियों के लिए सहायता जुटाने में सक्रिए रहने का संदेह है।
जिस बात से कुछ लोगों को खासा आघात लगा है, वह यह है कि अभी कुछ साल पहले तक ही हममें से सभी सगर्व यह कहते थे कि भारतीय मुसलमानों ने बड़ी दृढ़ता के साथ अफगानिस्तान में जिदाह में योगदान हेतु उग्रवादियों के आह्वान को खारिज कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 2002 में आक्सफोर्ड में बड़ी दृढ़ता के साथ यह कहा था कि 'भारतीय मुसलमान अल कायदा जैसी सोच रखने वाले नहीं हैं।' विगत कुछ वर्षों से अयोध्या में बाबरी विध्वंस जैसी कोई घटना नहीं हुई और न ही गुजरात जैसा नरसंहार हुआ है। इन दोनों घटनाओं ने मुस्लिमों और बहुलवादियों को संतप्त कर दिया था। फिर भी ये ऐसे पुराने घाव हैं कि जो हो सकता है अभी तक नहीं भर सके हों, फिर भी मुसलमानों में उन घटनाओं के प्रतिशोध जैसा कोई आक्रोश तो अब नहीं ही है।

सत्य है कि ज्यादातर मुस्लिम अभी भी मुख्यधारा से दूर हैं, किंतु उन्होंने हालात के साथ रहना सीख लिया है, जबकि व्यापक तस्वीर सेक्युलर ही है। मेरा सोचना यह है कि बैंगलूर के डाक्टरों की प्रतिक्रिया की वजह इस बात को लेकर कि पश्चिम ने विगत छह दशकों में मुस्लिम विश्व के साथ क्या कुछ किया जाता रहा है। वह अलग-थलग सा महसूस करता है और सोचता है कि अमेरीका, ग्रेट ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देश इस आधार पर कि ईसाई और मुस्लिम सभ्यताओं में संघर्ष है, उसके साथ टकराव की राह अपना रहे हैं, जबकि यह टकराव यह स्थापित करने लिए हो रहा है कि दोनों में से कौन सर्वोच्च है।

इराक पर हमले को भी इसी दृष्टि से देखा जा रहा है, यह असंदिग्ध तौर पर सिध्द हो चुका है कि उस देश के पास सामूहिक संहारक कोई आयुध नहीं थे और राष्ट्रपति बुश ने वहां जो मारकाट कराई, उसके बाहरी कारण ही थे। हजारों इराकी मारे जा चुके हैं और उनमें से हजारों को पाषाण युगीन जैसे हालात में जिन्दगी काटने पर बाध्य किया जा चुका है। अमरीका ने और अधिक सैनिक वहां भेजे हैें।

यदि अमरीका अपनी आक्रामकता में कुछ बदलाव करता तो शायद मुस्लिम जगत यह सोचता कि संभवत: उसकी सोच सही नहीं है कि पश्चिम उसका शत्रु है। वस्तुकाल यदि अमरीका कुछ सदाशयता दर्शाए तो उसके भी सर्वत्र ही उसके प्रति मुस्लिम सोच में एक सीमा तक बदलाव आ सकता है। नए ब्रिटिश प्रधानमंत्री गोर्डन ब्राउन अमरीका के संकेतों पर चलते रहने के बजाय, कुछ ऐसे कदम उठा सकते हैं कि जिससे तनाव में कमी आए। मुस्लमानों में फलस्तीन को लेकर भी चिंता है। वे उस देश की सहायतार्थ ठोस भले ही न कर सकें, परन्तु विश्वभर में मस्जिदों के मिम्बर से इसका उल्लेख होता ही है। कोई भी अब यहूदियों को समुद्र में फेंकने जैसे वाक्य का इस्तेमाल नहीं करता जो अतीत में सामानय रूप से उच्चारित होता था। इस्राइल एक हकीक्त है, जिसे अनिच्छा से ही मुस्लमान भी मान्य करते हैं। इस पर भी ऐसे कोई संकेत नहीं है कि इस्राइल अपनी उन मूल सीमाओं पर लौटने को तैयार जो संयुक्त राष्ट्रसंघ ने तब निर्धारित की थी, जब उस राज्य की स्थापना हुई थी।

सऊदी अरब के प्रिंस ने इस्राइल को मान्यता देने के प्रस्ताव इस शर्त के साथ रखा है कि वह उन क्षेत्रों को खाली कर दे, जिन पर उसने युध्दों के दौरान कब्जा किया था। फिर कोई आपत्ति नहीं होगी। अमरीकाको भी इस प्रस्ताव के पीछे अपना ताकत लगानी चाहिए थी। मगर उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि अमरीकी कांग्रेंस और वाल स्ट्रीट में यहूदी लांबी बहुत अधिक सशक्त है। और इनका ही अमरीकी वित्तीय स्थिति पर प्रभुत्व है। मुस्लिमों की शिकायतें व शिकवे, जिनमें से कुछ वास्तविक और कुछ काल्पनिक, उसका यह अर्थ नहीं है कि मजहब के साथ ही कुछ गलत नत्थी है। आतंकवाद उसका हिस्सा नहीं है और जिहाद का आह्वान गलत ढंग से उभारा गया और वह इस्लाम की मूल मान्यताओं के ही खिलाफ है। टर्की पर दृष्टिपात कीजिए। वह एक इस्लामिक राज्य है। किंतु किसी ने यह नहीं सुना कि अमुक-अमुक आतंकवादी टर्किश (तुर्की) है। अभी बहुत दिन नहीं हुए इस्तम्बूल की सड़कों पर सेक्युलरवाद के समर्थन में एक जलूस निकाला गया था। इसके बावजूद टर्की की सबसे बड़ी खामी यूरोपियन बाजार नहीं बनाने को लेकर यह है कि वह एक मुस्लिम देश है।

निसंदेह मुस्लिम जगत के शेखों और विदृतजनों को मिल बैठकर इस्लाम में विमत के लिए गुंजाइश की राह खोजना चाहिए। कुछ मजहबी सिध्दान्तों की पुन: व्याख्या अपेक्षित है।

कोई भी देख सकता है कि टर्की, पाकिस्तान, बंगलादेश में ऐसा भी हो रहा है। किंतु आपत्ति का अधिकार और अधिक सशक्त तथा मुखर होना चाहिए। कुरान का कथन है 'अल्लाह के नाम पर उन लोगों से लड़ों जो तुम्हारे विरुध्द लड़ते हों। मगर विद्वेष का शुरुआत न करो।' आतंकवाद निर्दोषों की हत्या का एक सुनियोजित कृत है। इस्लाम इसे मंजूर नहीं करता।

अधिक चिंता की बात यह है कि भारतीय राष्ट्र जो बहुलवाद और सहनशीलता से परिपोषित है, इसमें भी ऐसे लोग हों, जो मजहब को देश से ऊपर रखते हैं। कोईभी व्यक्ति एक ही साथ भारतीय और मुस्लिम होने पर गर्व कर सकता है। बैंगलूर के डाक्टरों ने भारत को बदनाम किया है, क्योंकि उन्होंने अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति बमों के माध्यम से की है। यह कृत्य जितना अभारतीय है, उतना ही गैर-इस्लामिक है।

साथ ही ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन आदि में भारतीय डाक्टरों के साथ जो व्यवहार जवाबी प्रतिक्रिया के तौर पर हुआ है, वह भी दुभाग्यपूर्ण है। हर समुदाय में ही कुछ बुरे लोग होते हैं। इसके तात्पर्य सारे समुदाय के ही खराब होने का तो नहीं है। किंतु मुझे आशंका है कि कुछ पश्चिमी देश जातिवादी सोच से प्रेरित हो रहे हैं। 1990 में लंदन में भारत के उच्चायुक्त के तौर पर मैं तब स्तम्भित रह गया था, जब ब्रिटेन जैसे परिपक्व और बहुलवादी राष्ट्र में मुझे जातिवाद के उभार की झलक मिली थी, उन दिनों उपमहाद्वीप का हर व्यक्ति 'पाकी' था। बड़े-बड़े सुसभ्य ब्रिटिश जन घृणा मात से इस संज्ञा का प्रयोग करते थे। अश्वेतों को वहां सहन किया जाता था, मान्य नहीं।

मैं यह सोचकर सिहर सा उठता हूं कि ब्रिटिश आव्रजन के नाम पर कौन से नए नियम-उपनियम लागू करेंगे। मारग्रेट थै्रचर ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल के अंतिम दिनों में मुझसे कहा था कि साम्यवाद की पराजय के बाद इस्लाम संसार के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा। मैं सोचता हूं कि उनका तात्पर्य इस्लामिक कट्टरतावाद से था।


देशबंधु से साभार.

आलोकधन्वा की नज़र में मैं रंडी थी

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/19/2007 07:46:00 AM

आज दोपहर में मुझे एक फोन आया. उधर से एक परिचित और वरिष्ठ सज्जन थे, जिन्होंने खासी नाराजगी से कहना शुरू किया कि असीमा जैसी औरत से यह सब लिखवा कर 'तुमलोग' ठीक नहीं कर रहे हो. आलोक आत्महत्या कर लेगा, अगर उसे अधिक प्रताडि़त किया गया. कई दशकों से पटना में जनवाद और अभिव्यक्ति की आज़ादी की लडा़ई लड़ने का दावा करनेवाला वह शख्स आज मुझसे कह रहा था कि असीमा को कुछ भी लिखने का अधिकार नहीं है और न दिया जा सकता है क्योंकि बकौल उनके 'असीमा के कई लोगों से संबंध रहे हैं.' मैं हतप्रभ था. उन्होंने कहा कि नंदीग्राम हत्याकांड के समय उसकी निंदा करनेवाले बयान पर आलोकधन्वा ने चूंकि हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था, इसलिए उससे बदला लेने के लिए तुमलोग उसे बरबाद कर रहे हो, असीमा के ज़रिये. वे बके जा रहे थे-असीमा की कोई औकात नहीं है. उसे दुनिया सिर्फ़ आलोकधन्वा की पत्नी के रूप में जानती है. उसके कोई स्वतंत्र पहचान, व्यक्तित्व नहीं है. उस औरत को इतना मत चढा़ओ तुमलोग.

मैं नहीं जानता कि जनवाद क्या होता है, अगर वह एक औरत के बारे में इस तरह के शब्द इस्तेमाल करने की इजाज़त देता है. और उन्होंने जिस अभद्र भाषा का प्रयोग बार-बार किया, वह निहायत शर्मनाक थी, इसलिए भी कि हम उन्हें एक गंभीर आदमी समझते थे. हम आलोकधन्वा को बेहद प्यार करते थे, एक कवि के रूप में. आज भी उनकी कविताएं हमें अपने समय में सबसे प्यारी हैं-इसके बावजूद असीमा के सवाल और उनका दर्द हमें असीमा के साथ खडा़ करता है.
अब तक आपने इस आत्मसंघर्ष की दो किस्तें ( 1, 2 )पढी हैं. आज पढिए अंतिम किस्त.


दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना-3
असीमा भट्ट
अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा था. शाहिदा जी के पास अक्सर जाती थी. वहीं मुझे जरा तसल्ली मिलती थी. कई बार उन्होंने मेरे पति से बात की, उन्हें समझाने की कोशिश की पर सब बेकार.
जहां तक एक कवि और उनकी कविता से प्रेम का संबंध है तो वह मुझे आज भी है. मैं उनकी बातों और कविता की मुरीद थी. वे बातें करते हुए मुझे बहुत अच्छे लगते. ऐसा लगता है- 'इत्र में डूबे बोल हैं उनके, बात करे तो खुशबू आये.'
मेरे द्वंद्व और दर्द का एक बड़ा कारण यह भी था कि जो इनसान घर से बाहर अपनी इतनी सुंदर, शालीन, संभ्रांत, ईमानदार, नफासतपसंद छवि प्रस्तुत करता है वही घर में सिर्फ मेरे लिए इतना अमानवीय क्यों हो जाता है? बात-बात पर ताने, डांट! कई बार इस कदर जीना दूभर कर देते कि मैं खुद दीवार से अपना सिर पीट लेती. अपने आपको कष्ट देती. एक बार याद है, मुझे आफिस जाने के लिए देर हो रही थी. उनके लिए पीने का पानी उबालना था. यह रोज का सिलसिला था. लगभग आधे घंटे पानी उबालना, जब तक पतीली के तले में सफेदी न जम जाये. मैं जल्दी में थी, इसलिए ज्यादा देर पानी उबालना संभव नहीं था कि तभी वे अपनी तुनकमिजाजी के साथ बहस लेकर बैठ गये-'तुम्हारा ऑफिस कोई पार्लियामेंट नहीं है जो समय पर जाना जरूरी है. पहले पानी घड़ी देख कर आधा घंटा उबालो.'
-आपको क्या लगता है, डिसिप्लीन सिर्फ पार्लियामेंट में होना चाहिए और बाकी कहीं नहीं?
इसी बात पर उन्हें गुस्सा आ गया और उन्होंने चिल्लाना शुरू कर दिया. मैंने गुस्से में पूरा उबलता हुआ गरग पानी का पतीला अपने ऊपर उंड़ेल लिया, लेकिन उन पर कोई असर न हुआ. इस तरह की अनगिनत घटनाएं हैं, जहां मैं अपने आप को ही यातना देती रही.
आखिरकार मैंने अपने पिता जी (मेरे पिता मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के मेंबर हैं. पूरा जीवन उन्होंने समाज सेवा में बिताया) से बात की. उन्होंने कहा-भूल जाओ उसे और अपने पैरों पर खड़ा होना सीखो.
मैंने एक बच्चे की तरह गिड़गिड़ाते हुए अपने पति से तलाक मांगा- सर अब आपके साथ मेरा दम घुटता है. मुक्त कर दीजिये मुझे. हम आपसी समझ से तलाक ले लेते हैं.
उनके लिए मेरा यह कहना असहृय था. उन्होंने अपने माता-पिता की दुहाई दी-अपने बूढ़े माता-पिता को इस उम्र में मैं कोई सदमा नहीं पहुंचा सकता. मेरे भाइयों के बच्चों की शादी नहीं होगी. लोग क्या कहेंगे? मेरी क्या इज्जत रह जायेगी? मैं ने इस उम्र में शादी की. तुम पूरी दुनिया में मेरी पगड़ी उछालना चाहती हो?
अब तो उनके माता-पिता को गुजरे भी बहुत समय हो गया लेकिन वे आज तक तलाक को टालते आ रहे हैं. मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. मैं जिस इनसान को जानती थी, वह तो एक कम्यूनिस्ट था, लेकिन यहां मैं एक रूढ़िवादी सामंती पति को देख रही थी-साहब, बीबी और गुलाम के एक ऐय्याश और घमंडी पति की तरह, मैं एकदम से सब कुछ हार गयी थी. मेरा तो जैसे सब कुछ खत्म हो गया. वो कवि भी नहीं रहा, जिसे मैं प्यार करती थी. मेरे लिए वह दुनिया के बेहतरीन कवि थे, जिसकी कविता में मुझे झंकार सुनायी देती थी. आज मेरी ही जिंदगी की झंकार खो गयी. मैं कुछ भी नहीं बन पायी. न पत्नी, न मां. क्या थी मैं? अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया मेरे सामने. दोबारा उन्हीं डाक्टर दोस्त के पास गयी. शाहिदा जी ने मेरी जिंदगी बदल दी. उन्होंने समझाया-तुम पढ़ी-लिखी हो, सुंदर हो, यंग हो तुम्हारे सामने तुम्हारी पूरी जिंदगी पड़ी है. गो एहेड लिव योर लादफ, गिव चांस टु योरसेल्फ डोंट शट द डोर फॉर लव, कोई आता है तो आने दो.
उन दिनों मैं इप्टा में, रक्तकल्याण कर रही थी. उसमें अंबा और इंद्राणी दोनों चरित्र मैं करती थी. लोगों ने मेरे अभिनय को बहुत पसंद किया. एक ही नाटक में दो अलग-अलग चरित्र जो एक दम कंट्रास्ट थे, करना मेरे लिए एक चुनौती थी. वहीं से राष्ट्रीय नाटक विद्यालय आने का रास्ता सूझा, हालांकि यह बहुत मुश्किल था. मेरे पति इसका जितना विरोध कर सकते थे, उन्होंने किया. उनकी मरज़ी के खिलाफ घर से भाग कर मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की परीक्षा के लिए गयी. अंतत: मेरा नामांकन नाट्य विद्यालय में हो गया. अब मेरे पति को मुझे खोने का डर और सताने लगा और वे भी मेरे पीछे-पीछे दिल्ली आ गये. वहां भी मैं खुल कर सांस नहीं ले पा रही थी. हर पल जैसे मैं किसी की पहरेदारी में हूं. मेरे क्लासमेट इसका बहुत मजाक उड़ाते थे. जाहिर है हमारे बीच उम्र का अंतराल भी सबके लिए उत्सुकता का विषय था. वे तरह-तरह की बातें करते. अब मेरे पति का व्यवहार और भी बदल गया था. लगातार मुझे खो देने की चिंता उन्हें लगी रहती, इस वजह से वे और भी अधिक असामान्य और अमानवीय व्यवहार करने लगे. यहां तक कि मैं किसी भी सहपाठी या शिक्षक से बात करती, उन्हें लगता, मैं उससे प्रेम करती हूं.
मैंने हमेशा उन्हें समझाने की कोशिश की कि वे बेकार की इन बातों को छोड़ कर लिखने-पढ़ने में अपना ध्यान लगायें. लिखने के लिए उन्हें सुंदर-सुंदर नोट बुक, हैंड मेड पेपर और कलम ला कर देती. बड़े-बड़े लेखकों-विद्वानों के वाक्य लिख-लिख कर देती ताकि वे खुद लिखने के लिए प्रेरित हों. गालिब की मजार और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर ले जाती. खूबसूरत फूल उपहार में देती, पर मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता. मुझे समझ में नहीं आ रहा था आखिर इन्होंने लिखना बंद क्यों कर दिया है और मैं दिन पर दिन चिड़चिड़ी होती जा रही थी. मेरा भी अपनी पढ़ाई से मन उचट रहा था.
मैंने अपने पति में कई बार भगोडी़ और कायर प्रवृत्ति देखी. मुझे याद है शादी के तीन वर्ष बाद मैं ससुराल गयी थी, वहां सब लोग मुझसे यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि मुझे अब तक बच्चा क्यों नहीं हुआ. कुछ दिन पहले ही मेरी अबार्शनवाली घटना हुई थी. मैं रो पड़ी. मेरे पास कोई जवाब नहीं था. मैंने सिर्फ इतना कहा, मैं बांझ नहीं हूं, लेकिन मेरे पति ने इसका कोई जवाब नहीं दिया बल्कि उन्हें अपने पौरुष पर संकट उठता देख मुझ पर गुस्सा आया, जबकि सेक्स हमारे बीच कोई समस्या नहीं थी.
जिस आदमी ने मुझसे मां बनने का गर्व छीन लिया वह मुझ पर यह आरोप भी लगाता है कि मैंने एनएसडी में एडमिशन के लिए उससे शादी की और कैरियर बनाने के लिए बच्चा पैदा नहीं किया. मेरी शादी 1993 में हुई और चार साल शादी बचाने की सारी जद्दोजहद के बाद मैं एनएसडी में 1997 में आयी. क्या एनएसडी में एडमिशन के लिए आलोकधन्वा से शादी करना जरूरी था. शादी के चार साल बाद उन्होंने मेरा एडमिशन क्यों कराया. अगर शादी करना एडमिशन की शर्त थी तो शादी के साल ही एडमिशन हो जाना चाहिए था. मेरा गर्भपात 1995 में हुआ. उस समय न मैं एनएसडी में थी और न कैरियर के बारे में मैंने सोचा था. जबकि दुनिया की हर औरत की तरह एक पत्नी और मां बनने का सपना ही मेरी पहली प्राथमिकता थी. जहां तक आलोक का सवाल है, वह पिता इसलिए नहीं बनना चाहते थे क्योंकि वह कोई भी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते थे. हद तो उन्होंने तब कर दी, जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के द्वितीय वर्ष में मुझे एक्टिंग और डायरेक्शन में से किसी एक को चुनना था. मैं एक्टिंग में स्पेशलाइजेशन करना चाहती थी. उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया. उनका दबाव था कि मैं डायरेक्शन लूं. हमारी इस बात पर बहुत बहस हुई. उन्होंने इतना दबाव बनाया कि मानसिक तनाव के कारण मैं डिप्रेशन में चली गयी. बाद में अनुराधा कपूर ने समझाया-तुम बेहतरीन अभिनेत्री हो. यू मस्ट टेक एक्टिंग. मैंने एक्टिंग ली. मेरे पति का विरोध बरकरार रहा. उन्होंने अनुराधा कपूर पर भी आरोप लगाया कि वह फेमिनिस्ट है. तुम्हें बहका रही है. वह तो मुझे अब समझ में आ रहा है कि वह आखिर किस बात पर इतने नाखुश थे. दरअसल मुझे अभिनय अलग-अलग लड़कों के साथ करना पड़ता. अलग-अलग नाटकों में अलग-अलग चरित्र और प्रेम के दृष्य करूंगी. उनकी कुंठा यहां थी. एक तरह की असुरक्षा की भावना उनमें घर कर गयी थी. काश कि वे समझ पाते कि मेरे मन में प्रेमी के रूप में उनके अलावा कोई दूसरा नहीं था. मैं उन्हें बहुत प्यार करती थी. दुनिया की तमाम खूबसूरत चीजों में मैं उन्हें देखती थी. मेरा सबसे बड़ा सपना था वे कविता लिखे और मैं अभिनय करूं. दुनिया देखे कि एक कवि और अभिनेत्री का साथ कैसा होता है. एक छत के नीचे कविता और अभिनय पनपे. मैं उनकी कविताओं को हद से ज्यादा प्यार करती थी. आज भी उनकी पंक्तियां मुझे जबानी याद हैं. मैं उनकी कविताओं की दीवानी थी. कई बार मैं उन्हें कोपरनिकस मार्ग पर बने पुश्किन की प्रतिमा के पास ले जाती. उनकी तुलना पुश्किन से करती ताकि उनका आत्मविश्वास बढ़े.
इस बीच उन्हें गले में कैंसर की शिकायत हुई. एक बच्चे की तरह उन्होंने अपना धीरज खो दिया और जीने की उम्मीदें भी. उन्हें डर था कि अब वे नहीं बचेंगे. पति ऐसे दौर से गुजर रहा हो तो एक पत्नी पर क्या बीतती है, इसका अंदाजा कोई भी पत्नी लगा सकती है. एक बच्चे की तरह उन्हें समझाती रही-कुछ नहीं होगा. फर्स्ट स्टेज है. डाक्टर छोटा-सा आपरेशन करके निकाल देंगे. उसी शहर में अकेले मैंने अपने पति के कैंसर का ऑपरेशन कराया, जहां वे मुझे बिल्कुल अकेली और बेसहारा छोड़ कर गये.
वे अक्सर जब लड़ते तो मुझे कहते- तुम मुझे समझती क्या हो? मैंने इसी दिल्ली में शमशेर और रघुवीर सहाय के साथ कविताएं पढ़ी हैं. मेरे नाम पर हॉल ठसाठस भरा रहता था और लोग खड़े होकर मेरी कविता सुनने के लिए बेचैन रहते. आज उसी शहर में लोग उसकी पत्नी की कीमत लगा रहे थे. दीवार क्या गिरी मेरे खस्ता मकान की, लोगों ने उसे आम रास्ता बना दिया. बिहार में एक कहावत है कि जर, जमीन और जोरू को संभाल कर न रखा जाये तो गैर उस पर कब्जा कर लेते हैं. अब हर आदमी की निगाह मुझ पर उठने लगी.
मेरे पति जिस वक्त मुझे छोड़ कर गये, उस वक्त मुझे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. मैंने एनएसडी से प्रशिक्षण तो प्राप्त कर लिया था पर रेपर्टरी में काम नहीं मिल पाया. अब आगे क्या करना है, पता नहीं था. एकदम शून्य नज़र आ रहा था. उनके जाने के साथ ही एक दूसरे किस्म का संघर्ष शुरू हो गया. सबसे अजब बात तो यह थी कि जैसे ही लोगों को पता चलता मैं अकेली रहती हूं, उनके चेहरे का रंग खिल जाता. मैं बिना किसी पर आरोप लगाये यह कहना चाहती हूं कि मुझे हासिल करने की कोशिश ऐसे शख्स ने भी की जिसकी खुद कोई औकात नहीं थी या फिर वैसे लोग थे जिनके अपने हंसते-खेलते परिवार थे. प्यारे-प्यारे और मेरी उम्र के बच्चे थे. वो अपनी और बच्चों के लिए दुनिया में सबसे अच्छे और ईमानदार पति और बेस्ट पापा थे और समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. खैर अब मुझे इन बातों पर हंसी आती है. जिंदगी को इतने करीब से देखा कि अब किसी से कोई शिकायत नहीं. लोग मुझसे अजीव-अजीब सवाल पूछते, तुम अकेली कैसे रहती हो, तुम्हारा सैक्समेट कौन है. आज जो बातें मैं इतनी सहजता से लिख रही हूं उस समय ऐसा लगता जैसे कोई गरम सीसा मेरे कान में उंड़ेल रहा है.
जब लोगों को पता चला कि हमारे बीच दरार है तो उन्होंने भी मेरा भरपूर इस्तेमाल करने की कोशिश की. मेरे पति की किताब की रॉयल्टी मेरे नाम से है और मुझे आज तक एक पैसा नहीं मिला है. पिछले सालों में मैंने भी उनसे कुछ नहीं मांगा लेकिन अभी हाल ही में मेरी छोटी बहन की शादी के लिए मुझे रुपये की जरूरत थी तो मैंने अपना अधिकार मानते हुए रॉयल्टी की मांग की. उन्होंने (प्रकाशक ने) मुझे बदले में पत्र भेजा कि वह रॉयल्टी का पैसा कवि को दे चुके हैं. जवाब में मैंने पत्र लिखा कि जिसके नाम रॉयल्टी होती है पैसे भी उसे मिलने चाहिए तो उन्होंने मुझे बदनाम करने की कोशिश की. उन प्रकाशक के मित्र, जो मेरे अभिनय के प्रशंसक रहे हैं, फोन करके मुझे खचड़ी और बदमाश औरत जैसे विशेषणों से नवाजते हैं और कहते हैं कि वह जिंदा है तो तुम्हारा हक कैसे हो गया उसकी किताब पर? मैंने जवाब दिया कि मैं किसी की रखैल नहीं हूं, संघर्ष करती हूं तो गुजारा होता है. मैं अपने हक का पैसा मांग रही हूं. एक औरत जब अपने हक की आवाज उठाती है तो उसके विरुद्ध कितनी तरह की साजिश होती है. वह आदमी जो पूरी दुनिया में डंका पीटता है कि वह मुझे बेहद प्यार करता है, वह मेरे बिना जी नहीं सकता, वह मेरे वियोग में मनोरोगी हो गया, उससे मैं पूछती हूं, क्या उसने पति के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभायी? क्या उसने मुझे सामाजिक और भावानात्मक सुरक्षा दी? क्या उसने आर्थिक सुरक्षा दी? सभी जानते हैं मैं पिछले छह साल से अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हूं. पिछले छह साल से नितांत अकेली एक विधवा की तरह जी रही हूं. क्या वे मेरी तमाम रातें वापस लौटा सकते हैं? भयानक अपमान के दौर से गुजरे दिनों का खामियाजा कौन भरेगा? जिसके लिए मैंने अपने जीवन की तमाम बेशकीमती रातें रोकर बितायीं, वह मेरे लिए क्या एक बार मेरी उम्र के बराबर आ कर सोच सकता है? मैं अपनी उम्र की सामान्य लड़की की तरह क भी नहीं जी पायी. कभी पति के साथ कहीं घूमने नहीं गयी, पिक्चर या पार्टी में नहीं गयी. कितनी तकलीफ होती है जब एक स्त्री अपने तमाम सपने को मार कर जीती है.
छह साल से मैं अकेली एक ही घर में रह रही हूं, यह मेरे चरित्र का सबसे बड़ा सबूत है. मेरे मकान मालिक मुझे बेटी की तरह मानते हैं. मेरे घर न पुरुष है, न पुरुष की परछाईं. पर जब मैं एक बार अचानक पटना गयी तो अपने बेडरूम में मैंने दूसरी औरत के कपड़े देखे. इतना सब देखने के बाद क्या कर सकती थी मैं ? और क्या रास्ता था मेरे पास?
दिन-पर-दिन मैं असामान्य होती जा रही थी. न किसी से मिलने का मन होता न बात करने का. कोई हंसता तो लगता कि मेरे ऊपर हंस रहा है. कभी मैं देर रात तक दिल्ली की सुनसान सड़कों पर अकेली भटका करती. घर आने की मेरे पास कोई वजह नहीं थी. न किसी को मेरे आने का इंतजार, न कहीं जाने की परवाह. ऐसा लगता था, या तो आत्महत्या कर लूं या किसी कोठे पर जा कर बैठ जाऊं. लेकिन नहीं, अन्य दूसरे भले घर की बेटियों की तरह मेरे मां-बाप ने भी मुझे अच्छे संस्कार दिये थे, जिसने मुझे ऐसा कुछ करने से बचाया.
अपनी बीवियों पर खुलेआम चरित्रहीनता का आरोप लगानेवाले मर्द बड़ी आसानी से यह भूल जाते हैं कि वे खुद कितनी औरतों के साथ आवारगी कर चुके हैं. नहीं, किसी मर्द में स्वीकार करने की हिम्मत नहीं होती. देश का अत्यंत प्रतिष्ठित कवि, जिसके शब्दों में मैं एक रंडी हूं, उसकी आखिर क्या मजबूरी है मुझे हासिल करने की? क्यों नहीं वह मुझे अपनी जिंदगी से निकाल बाहर करता? मैंने तलाक के पेपर बनवाये. कमलेश जैन (प्रतिठित अधिवक्ता) गवाह हैं. मैंने अपने भरण-पोषण के लिए कुछ भी नहीं मांगा. तब भी वह मुझे तलाक नहीं दे रहा, बल्कि मुझे हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा है. अपने मित्रों मंगलेश डबराल और उदयप्रकाश तक से पैरवी करवा रहा है, क्यों? इन सबके आग्रह और आलोक के माफी मांगने पर मैंने उन्हें एक मौका दिया भी था, लेकिन एक सेकेंड नहीं लगा, उन्हें अपने पुराने खोल से बाहर आने में. एकांत का पहला मौका मिलते ही पूछा-तुम्हारे कितने शारीरिक संबंध है?
मैं हैरान! अगर मेरे बारे में यह धारणा है तो मुझे पाने के लिए इतनी मशक्कत क्यों की?
आलोक जब मुझे हासिल करने में हर तरह से नाकामयाब हो गये तो उन्होंने मुझसे कहा-तुम रंडी हो, तुम्हारी कोई औकात नहीं, बिहारी कहीं की. दो कौड़ी की लड़की. शादी से पहले तुम्हें जानता कौन था. मेरी वजह से आज लोग तुम्हें जानते हैं, तुम जो कुछ भी हो, मेरी वजह से हो. मेरे आत्मसम्मान को ऐसी चोट पहुंची कि तंग आ कर मैंने अपने पिता का बचपन में दिया हुआ नाम क्रांति बदल लिया, जबकि मैं क्रांति भट्ट के नाम से अभिनय के जगत में अपनी पहचान बना चुकी थी.
मुझे अपने पिता का इतने प्यार से दिया हुआ नाम बदलने में बहुत तकलीफ हुई थी. अभी हाल में जब मैं अपने पिता से मिली तो उनसे माफी मांगते हुए कहा, माफ कीजिए. मुझे मजबूरीवश अपना नाम बदलना पड़ा. उन्होंने जवाब दिया- कोई बात नहीं. ठीक ही किया. क्रांति असीम है. क्रांति कभी हारती नहीं. क्रांति कभी रुकती नहीं. रिवोल्यूशन इज अनलिमिटेड.
मैं बिना किसी शिकायत और शिकन के आज कहना चाहती हूं- हां, दर्द हुआ था. अपने पति के मुह से रंडी का खिताब पा कर बहुत दर्द हुआ था तब जब उस इनसान ने मुझ पर इतना घिनौना आरोप लगाया. वह इनसान जिसका मैंने सारी दुनिया के सामने हाथ थामा. वह इनसान जिसके बच्चे को मैंने गर्भ में धारण किया. जो खुद मेरी गोद में मासूम बच्चे की तरह पड़ा रहता था. उसने आज पूरी दुनिया के सामने मेरी इज्जत को तार-तार कर दिया. मैं आज तक इस बात को नहीं समझ पायी कि जब दो इनसान इतने करीब होते हैं, वहां ऐसी बातें आ कैसे जाती हैं. ऐसी ठोस कुंठा और भयंकर इगो.
बहुत दर्द और लंबी यातना से गुजरी इस बीच. नितांत अकेली कोई नहीं था. बंद कमरे में खुद से बातें करती थी. ऊंचे वॉल्यूम में टीवी चला कर जब रोती थी तो किसी का कंधा नहीं था. बीमार पड़ी रहती थी, कोई देखनेवाला नहीं, दवा ला कर देनेवाला नहीं. पर आज सब कुछ सामान्य लग रहा है. जब कोई घाव पक जाता है तो दर्द देता ही है और उसका फूट कर बह जाना अच्छा ही है, चाहे दर्द जितना भी हो. घाव के पकने और बहने का यही सिलसिला है. मेरा घाव भी पक कर बह गया. दर्द हुआ. बेशुमार दर्द हुआ, लेकिन अब जख्म भर गया है. दर्द भी अपनी मुराद पूरी कर चुका.
मैं अपने अभिनय में अपनी काबिलियत की परीक्षा छह साल से दर्शकों को दे रही हूं और शुक्रगुजार हूं वे मुझे प्यार करते हैं. अब मेरी अपनी एक जमीन है, एक पहचान है.
जब मैं राम गोपाल बजाज के साथ गोर्की का नाटक तलघर कर रही थी तो बजाज जी ने मुझसे कहा था-बहुत सालों के बाद नाट्य विद्यालय में सुरेखा सीकरी और उत्तरा वावकर की रेंज की एक्ट्रेस आयी. सिर्फ़ अपने काम की वजह से एनएसडी में मुझे सारे क्लासमेट और सीनियर, जूनियर का प्यार मिला. मेरी काम के प्रति शिद्दत और लगन की वजह से हमेशा चैलेंजिंग रोल मिले. चाहे ब्रेख्त का नाटक गुड वुमन ऑफ शेत्जुआन हो या इब्सन के वाइल्ड डक में मिसेज सॉवी या चेखव के थ्री सिस्टर्स की छोटी बहन याविक्रर्मोवंशीय में उर्वशी की भूमिका.
एनएसडी के बाद सारवाइव करने के लिए मैं सोलो करती हूं. एक बार जेएन कौशल साहब ने कहा था- 10 लाइन बोलने में एक्टरों के पसीने छूटते हैं. सोलो के लिए तो बहुत माद्दा चाहिए. तुम एक बेमिसाल काम कर रही हो.
मेरे प्यार में पागल या मनोरोगी होने का ढिंढोरा पीटनेवाला दरअसल इस बात से ज्यादा दुखी है कि जिसे वह दो कौड़ी की लड़की कहता था, वह हार कर, टूट कर वापस उसके पास नहीं आयी. उन्हें इस बात का बहुत बेसब्री से इंतजार था कि एक-न-एक दिन मैं उनके पास लौट आऊंगी. इसलिए उन्होंने मुझे आज तक तलाक नहीं दिया. उनके पुरुष अहं को संतुष्टि मिलती है कि मैं आज भी उनकी पत्नी हूं.
शादी का मतलब होता है, एक दूसरे में विश्वास, एक दूसरे के दुख-सुख में साथ निभाना. लेकिन आलोक न मेरे दुख के साथ है, न सुख में. छह साल से ऊपर होने को आये. मुझे एक शिकायत अपने ससुरालवालों से भी है. कभी उन्होंने भी यह नहीं जानना चाहा कि आखिर समस्या कहां है. कभी किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि आखिर बात क्या है. एक अच्छा परिवार तलाक के बाद भी रिश्ता रखता है, मेरा तो तलाक भी नहीं हुआ. अब भी मैं उस परिवार की बहू हूं. कानूनी और सामाजिक तौर पर मेरे सारे अधिकार होते हुए भी मैंने उन लोगों से कुछ भी नहीं लिया. तब भी वे लोग मुझे ही दोष देते हैं.
यह सब लिख कर मेरा कतई यह इरादा नहीं कि लोग मुझसे सहानुभूति दिखायें, मुझ पर दया करें. मैं बस यह चाहती हूं कि लोगों को दूसरा पक्ष भी मालूम हो.
आज तक मैं चुप रही तो लोगों ने मेरे बारे में खूब अफवाहें उड़ायीं. मैं सुकून से अपना काम करना चाहती हूं और लोग मेरी व्यक्तिगत जिंदगी की बखिया उधेड़ना शुरू कर देते हैं. जीवन की हर छोटी-छोटी खुशी के लिए मैं तरसती रही. लोग कहते हैं, मैंने उनका इस्तेमाल किया पर मैं कहती हूं, एक कम उम्र लड़की को भोगने की जो लालसा (या लिप्सा) होती है, क्या उन्होंने मेरा इस्तेमाल नहीं किया? जिस लड़की को शादी करके लाये, उसे पहले ही दिन से एक अवैध संबंध ढोने पर मजबूर किया गया. मैं जानती हूं, इस तरह के वक्तव्य किसी मर्द को अच्छे नहीं लगेंगे पर मैं यह कहना चाहती हूं कि दुनिया के हर मर्द को अपनी मां, बहन, बेटी को छोड़ कर दुनिया की सारी औरतें रंडी क्यों नजर आती हैं? मर्द उसे किसी भी तरह से हासिल करना चाहता है. आखिर यह पुरुषवादी समाज है. मर्दो में एक बेहद क्रूर किस्म का भाईचारा है. काश, यह सामंजस्य हम औरतों में भी होता. यहां तो सबसे पहले एक औरत ही दूसरी औरत का घर तोड़ती है और टूटने पर सबसे पहले घर की औरतें ही उस औरत को दोष देना शुरू कर देती हैं. मेरी कई सहेलियों ने कहा-अरे यार, समझौता करके रह लेना था, हम लोग भी तो रह रहे हैं. वे यह नहीं जानतीं कि समझौता करके रहने की मैंने किसी भी औरत से ज्यादा कोशिश की, आखिरकार मैं थक गयी. शायद और समय तक रहती तो खुदखुशी कर लेती. मुझसे कई शादीशुदा औरतें इस बात के लिए डरती हैं कि कहीं मैं उनके पति को फंसा न लूं, वे मुझे दूसरी शादी की नेक सलाह देती हैं. अपना भला-बुरा मैं भी समझती हूं पर क्या ताड़ से गिरे, खजूर में अंटकेवाली स्थिति मुझे मान्य होगी? शादी करके घर बसाने और बचाने की मैंने हर संभव कोशिश की और न बचा पाने की असफलता ने मुझे भीतर तक तोड़ दिया. एक पराजय का बोध आज भी है.
आज हर कदम फूंक-फूंक कर रखती हूं, जैसे कोई दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है.
फिर भी मैं दिल से शुक्रगुजार हूं अपने पति की, उन्होंने जो भी मेरे साथ किया. अगर उन्होंने यह सब न किया होता तो आज मैं असीमा भट्ट नहीं होती.

लडकी, जो भागी न थी

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/18/2007 01:34:00 AM

असीमा भट्ट के आत्मसंघर्ष का पहला हिस्सा आपने कल पढा था-आज इसका अगला हिस्सा. असीमा के इस लेख ने न सिर्फ़ स्त्री अधिकारों के संदर्भ में कुछ अहम (जिनमें कुछ क्लासिकल भी हैं) सवाल उठाये हैं बल्कि यह भी बहस पैदा की है कि एक लेखक-कवि का मूल्यांकन उसके लेखन के साथ-साथ उसके ऐसे व्यवहारों से भी क्यों नहीं होना चाहिए (यह बात सभी क्षेत्रों में लागू होती है).

दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना-2

असीमा भट्ट
मुझे शादी के बाद पत्नी का कोई अधिकार नहीं मिला. घर के परदों का रंग भी उनकी प्रेमिका तय करती थी. हालांकि आलोक सिनेमा नहीं देखते थे लेकिन एक बार मेरे बहुत जिद्द करने पर जब हम फिल्म सरदारी बेगम देखने गये तो वह अपनी प्रेमिका को भी साथ ले गये और वह हम दोनों के बीच में बैठी. मेरे लिए यह सब असह्य और अपमानजनक था. आलोक से सबसे बड़ी शिकायत मेरी यह रही कि उनमें कभी कोई निर्णय लेने की ताकत नहीं थी. हर बार, हर बात में जो भी करना है, वह उन दीदी से पूछ कर करना. उसे भी मैं नजरअंदाज करती रही, लेकिन मेरे मामलों में उनकी दखलंदाजी दिन पर दिन बढ़ती ही गयी. ऊपर से आलोक हमेशा यह कहें कि वे उम्र में तुमसे बड़ी हैं, कॉन्वेंट में पढ़ाती हैं, उनसें सीखो.

मुझे पहले ही दिन से उस औरत का विरोध करना और एक पत्नी के अधिकार के लिए कदम उठाना चाहिए था. धीरे-धीरे मैं उदासीन और निराश होती चली गयी, जो जैसा चल रहा है, चलने दो. जहां एक ओर मैं आलोक का आत्मविश्वास बढ़ाने का काम कर रही थी, वहीं मेरा अपना आत्मविश्वास मेरे हाथ से छूटने लगा. और तब मुझे लगा कि नहीं, मुझे इस तरह से हार नहीं माननी है. इसलिए मैंने पटना छोड़ने का फैसला कर लिया. ऑफिस, थिएटर और घर के काम में मैं पिसती रहती थी. अकेली, आलोक कभी कोई मदद नहीं करते. खाना बनाना, कपड़े धोना और घर की सफाई. कभी-कभी उनकी बहन मेरे घर आती तो कहती-तोहार घर त आईना एइखन चमकत बा. (तुम्हारा घर तो आईने की तरह चमकता है). एक और बात बताते हुए अब तो हंसी आती है कि जब मैं आलोक के साथ थी तो वे नौकरानी नहीं रखते थे. मैं घर का काम करने के बाद नौकरी करने जाती, फिर शाम को थिएटर करके वापसघर आ कर घर का काम करती. कभी थकी होती तो कहती, आज ब्रेड ऑमलेट या पनीर खा लो, खाना बनाने की हिम्मत नहीं है, तो वे कहते-तुम तो पांच मिनट में खाना बना लेती हो. रात तो अपनी है, थोड़ा देर से ही सही पर खाना तो बनना ही चाहिए. अब जब मैं अलग रहने लगी तो मेरे प्यार का दम भरनेवाला इनसान दो-दो नौकरानियां रखता है. एक नौकरानी का नाम शांति था. जब कभी छुटि्टयों में मैं घर (पटना) जाती तो वह मुझे शांति कह कर पुकारते थे.
मैं अपनी मरज़ी से घर पर किसी को बुला नहीं सकती थी. कभी मेरी मां-बहन मेरे घर आयी तो मेरे पति ने उन्हें अपमानित करके बाहर निकाल दिया. एक बार मेरी छोटी बहन बीमार थी. वह डाक्टर को दिखाने मेरे पास आयी. मैंने जब अपनी बहन को अपने पास रखने का फैसला लिया तो उन्होंने मुझे अपनी भाभी और उसके परिवार के सामने पीटा. एक बार उन्होंने ऐसे ही देर रात को मेरी मां को घर से निकाल दिया. मेरी मां ने एक गंदी धर्मशाला में रात गुजारी जहां पीने का पानी तक नहीं था जबकि मेरी मां ब्लडप्रेशर की मरीज हैं.
बस समय बीतता गया और एक दिन वह भी आया जिसका इंतजार दुनिया की हर औरत करती है. मां बनने का इंतजार ! वह दिन मेरी जिंदगी में भी आया. आलोक को शायद अंदेशा लग गया था. उन्होंने जबरदस्ती मुझे अपनी परिचित डाक्टर शाहिदा हसन के पास भेजा. शाहिदा जी मुझे बेहद प्यार करती थीं. मुझे कभी-कभी लगता वे मेरी मां भी हैं, डाक्टर भी और एक सहेली भी. चेकअप के बाद उन्होंने मुझे मुस्कुराते हुए गले लगा लिया और मुझे मां बनने की शुभकामनाएं दीं. मैं शरमा गयी.
मेरे लिए यह मेरी जिंदगी का पहला और अनोखा अनुभव था. क्लीनिक से घर आते-आते रास्ते भर में न जाने कितने ख्याल मन में दौड़ गये, कितने सपने मैंने बुन डाले. घर जा कर पति से क्या कहूंगी, कैसे कहूंगी. हिंदी सिनेमा के कई दृष्य आंखों के सामने घूम गये. जब एक नायिका अपने पति से कहती है कि मैं मैंने कई दृष्यों की कल्पना की. मेरा होनेवाला बच्चा कैसा होगा. लड़का होगा या लड़की?
घर पहुंची तो दरवाजा खोलते ही मेरे पति चीखे- कहां थी इतनी देर? मैं कब से इंतजार कर रहा हूं चाय भी नहीं पी है मैंने, जाओ, जल्दी चाय बनाओ, और मैं बस मुस्कुराती जा रही थी. मुझे लगा शायद वे मेरे शरमाने से समझ जायें, लेकिन नहीं, हार कर मैंने ही बताया, शाहिदा जी के पास गयी थी. तो? उनके चेहरे का जैसे रंग उड़ गया.
-मैं प्रेगनेंट हूं.
-यह कैसे हो सकता है? यह मेरा बच्चा नहीं है.
इस तरह से मेरे आनेवाले बच्चे का स्वागत हुआ. मैं किस कदर टूटी, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता. बच्चे को लेकर जो सपने मैंने देखे थे, बुरी तरह बिखर गये. रात भर सो नहीं पायी. खाना भी नहीं खाया और रोती रही. सुबह होते ही मैं शाहिदा जी के पास गयी और सब कुछ बताया. उन्होंने मुझे अबॉर्शन की सलाह दी. मैं आज भी नहीं जानती कि मेरा वह फैसला सही था या गलत पर यह सच है कि मुझे आज भी अपने बच्चे को खोने का दुख है. मैं देखना चाहती थी, मेरे गर्भ में जो बच्चा था वह लड़का था या लड़की. देखने में कैसा होता. आज वह होता तो कितने साल का होता.
मैं मां बनना चहती थी पर ऐसे इनसान के बच्चे की नहीं जो अपने बच्चे को स्वीकारना ही नहीं चाहता हो. मैंने कहीं प़ढा़ था, मेल मीन्स प्रोवाइडर एंड प्रोटेक्टर. मेरे मन में हमेशा से अपने होनेवाले पति की बहुत ही सुंदर छवि थी. वह इनसान ऐसा होगा, जो मुझे बेहद प्यार करेगा. मैं उसकी बांह पकड़ कर चलूं तो लगे कि सारी दुनिया मेरे साथ चल रही है. वह मेरी ताकत और आत्मविश्वास बनेगा. लेकिन यहां तो मैं ऐसे इनसान के साथ रह रही थी, जिसके बदन से हमेशा दूसरी औरत की बू आती थी. न मुझे मेरा घर अपना लगा था, न बेडरूम. सब कुछ बंटा हुआ. हर वक्त किसी दूसरी औरत की मौजूदगी मेरे मन को सालती रहती थी. बच्चे के आने की खबर से अपनी टूटती गृहस्थी बचाने की उम्मीदें जितनी बढ़ गयी थीं, इस घटना के बाद मैं उतना ही टूट गयी. आज तक अपने पर लगा आरोप और उससे पैदा हुआ अपमान नहीं भूलती. आज भी पूछती हूं अपने पति से किसका बच्चा था वह, मुझे तो नहीं पता, तुम्हें पता हो तो तुम्हीं बतला दो. औरत के लिए दुनिया की सबसे गंदी गाली है कि उसे अपने बच्चे के बाप के बारे में मालूम न हो. सिर्फ कुतिया ही नहीं जानती कि उसके पिल्लों का बाप कौन है. मुझे खुद से नफरत हो गयी थी. मेरे भीतर की स्त्री, प्रेम, संवेदना सब कुछ जैसे एक झटके में समाप्त हो गये. मुझे किसी का छूना तक अच्छा नहीं लगता. नतीजतन हमारे बिस्तर अलग हो गये. एक ही छत के नीचे रहते हुए भी हम अलग-अलग कमरों में बंट गये. लेकिन दुनिया के सामने एक अच्छी पत्नी बने रहने में मैंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. इस सबके बावजूद उनके स्वास्थ्य का, खाने-पीने में उनकी पसंद-नापसंद का हमेशा ध्यान रखा. कब उन्हें खाने में दही चाहिए, कब पपीता, कब छेना, कब केला और कब सलाद तो कब शाम को ग्रीन लेबल चाय और साथ में नाइस बिस्किट. आज भी मुझे उनकी सारी दिनचर्या याद है, जबकि हमें अलग हुए छह साल बीत गये.
बड़ा मुश्किल हो रहा है आगे लिखना. ऐसा लगा रहा है जैसे मैं ऑपरेशन थियेटर में लेटी हूं और मेरे जख्मों की चीर-फाड़ हो रही है. दुबारा उसी दर्द, उसी यातना से गुजर रही हूं.
मैंने जिस इनसान से शादी की, उसकी और हमारी उम्र में दो दशक का फासला था. शादी की एक रात में ही मैं अपने 20 साल पीछे छोड़ आयी. बीच के वे साल मैं जी नहीं पायी. अचानक मैं 20 साल बड़ी हो गयी. मैं अचानक अपनी उम्र के बराबर के लोगों की चाची-मामी और नानी-दादी बन गयी. बड़ा अजीब लगता, मुझे जब मेरे पिता या चाचाजी के उम्र के लोग मुझे भाभी बुलाते या मुझसे मजाक करते. एक बात और मैंने गौर की, मेरे पति को किसी से भी मेरा हंस कर बात करना अच्छा नहीं लगता. मैं उनके दोस्तों या परिवार या रिश्ते के भाई या बहनोई से सिर्फ इसलिए ठीक से बात करती क्योंकि यह एक स्वाभाविक कर्टसी है कि घर आये मेहमानों से ठीक से या तहजीब से बात की जाये, जबकि मेरा अपना कोई दोस्त, परिचित या परिवार का सदस्य मेरे घर नहीं आता था, क्योंकि मेरे पति को पसंद नहीं था इसलिए मैंने सबसे नाता तोड़ लिया था. उनके ही परिवार के सदस्यों की और मित्रों की मैं खातिर-तवज्जो करती और उनके जाने के बाद ताने मिलते कि मैं बड़ा हंस-हंस कर बात करती हूं. इस तरह के आरोप मुझे बहुत सालते पर मैंने ये बातें किसी को नहीं बतायीं. सब कुछ चुपचाप सहती और बरदाश्त करती रही. उनकी भाभी, मुझे प्यार से बेटी बुलाती थीं, क्योंकि उनकी बेटी मेरे बराबर की थी. मुझे भी उनका इस तरह प्यार से बुलाना अच्छा लगता था. मैं उन्हें मां समान मानती थी. एक दिन उनसे रोते हुए मैंने कहा- भाभी हमारा घर बचा दो. हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है. हम सिर्फ दुनिया की नजर में पति-पत्नी हैं.
उन्होंने बस इतना कहा-देखो यह तुम्हारा पर्सनल मैटर है. तुम खुद ही इसे सुलझाओ. क्रमशः

अपने समय की एक औरत का दर्द और कुछ सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/17/2007 01:32:00 AM

साल के शुरू में एक कविता आयी थी यवन की परी. स्त्री की यातना, पीडा़, दर्द और आंसुओं में लिपटी उस कहानी को कहानी भर माना जा सकता था. माना भी गया. मगर यहां जो कुछ हम पढ रहे हैं-वह अपने आसपास की पीडा़ है, वेदना है, यातना है और कुछ सवाल हैं-जिनके जवाब बाकी हैं. हो सकता है कि कुछ प्रतिप्रश्न भी हों, जिन्हें और जिनके जवाब हम समय के साथ तलाशेंगे (कोशिश करेंगे) मगर अभी वे सवाल पूरे के पूरे और दर्द का वह आवेग-पूरा का पूरा. क्या हुआ जो यह सब उस कवि के बारे में है जिसे अपने समय में हम सबसे अधिक प्यार करते हैं, चाहते हैं.
असीमा भट्ट
का यह आत्मसंघर्ष कथादेश के जुलाई अंक में छपा है. यह बहुत लंबा है इसलिए यहां उसे क्रमवार रूप से
(साभार) दिया जा रहा है. आज पहली किस्त.

दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना

असीमा भट्ट
कितनी अजीब बात है जब मैं पत्रकारिता करती थी, लोगों से साक्षात्कार लेती थी और उनके बारे में लिखती थी और जब कुछ खास नहीं होता था तो खीझ कर कहती थी-कहानी में कोई डेप्थ नहीं है संघर्ष नहीं है ! मजा नहीं आ रहा, क्या लिखूं? आज जब अपने बारे में लिखने बैठी हूं तो बड़े पसोपेश में हूं, अपने बारे में लिखना हमेशा कठिन होता है. कहां से शुरू करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह जीवनी नहीं है. हां मेरे जीवन की कड़वी हकीकत जरूर है. कुछ कतरनें हैं, जिन्हें लिखने बैठी हूं. बहुत दिनों से कई मित्र कह रहे थे-अपने बारे में लिखो. पर हमेशा लगता था, अपना दर्द अपने तक ही रहे तो अच्छा. उसे सरेआम करने से क्या फायदा?
लेकिन सुधादी के स्नेह भरे आग्रह ने कलम उठाने पर मजबूर कर दिया क्योंकि यह सच है कि जिसे मैं अपनी निजी तकलीफ मानती हूं, सिर्फ अपना दर्द, वह किसी और का भी तो दर्द हो सकता है. लोहा-लोहे को काटता है इसलिए यह सब लिखना जरूरी है ताकि एक दर्द दूसरे के दर्द पर मरहम रख सके. हो सकता है, जिस कठिन यातना के दौर से मैं गुजरी हूं, कई और मेरी जैसी बहनें गुजरी हों, और शायद वे भी चुप रह कर अपने दर्द और अपमान को छुपाना चाहती हों. या अब तक इसलिए चुप रही हों कि अपने गहरे जख्मों को खुला करके क्या हासिल? खास करके जब जख्म आपके अपने ने दिये हों. वही जो आपका रखवाला था. जिसे अपना सब कुछ मान कर जिसके हाथों में आपने न केवल अपनी जिंदगी की बागडोर सौंप दी बल्कि अपने सपने भी न्योछावर कर दिये.
बिहार के एक प्रतिष्ठित परिवार में मेरा जन्म हुआ. मेरे दादा जी अपने इलाके के जाने-माने डाक्टर थे और उनका सिनेमा हॉल और ईंट के भट्ठे का कारोबार था. समाज में हमारे परिवार का बहुत नाम और इज्जत था. मेरे नाना जी स्वयं जमींदार थे. उनकी काफी खेती-बाड़ी और काफी तादाद में पशु (गाय-बैल और भैंस) थे. पिता जी कम्युनिस्ट थे. बनारस विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. छात्र जीवन से ही वे क्रांतिकारी हो गये. उन्होंने सरकारी तंत्र का कड़ा विरोध किया, जिसके लिए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. लंबे समय तक उन्हें जेलों के यातनाघर (सेल) में रखा गया. बाद में उनके साथियों ने उनके लिए केस लड़ा और पिता जी जेल से बाहर आये बाद में जेपी आंदोलन में भी वे काफी सक्रिय रहे. मैं अपने माता-पिता की शादी के 14 साल बाद पैदा हुई थी. मेरे जन्म के बाद मेरे चाचा जी ने कहा था, इतने दिनों बाद हुई भी तो बेटी. इस पर मेरे पिता जी हमेशा कहते हैं-क्रांति मेरी ताकत है. मेरा विश्वास है. उन्हें मुझ पर बहुत गर्व था. वे कहते थे एक दिन आयेगा जब लोग कहेंगे देखो वह क्रांति का पिता जा रहा है.

दुनिया में कोई भी शादी इसलिए नहीं होती कि उसका अंजाम तलाक हो. शादी किसी भी लड़की की जिंदगी की नयी शुरुआत होती है. नये सपने, नयी उम्मीदें, नयी उमंगें, बचपन में हर लड़की अपनी दादी-नानी से परियों की कहानी सुनती है. एक परी होती है और एक दिन सफेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और परी को ले जाता है. दुनिया की शायद ही कोई लड़की हो, जिसने ये सपने न देखे हों-सिंड्रेला की तरह.
मेरी शादी पांच जुलाई, 1993 को पटना में हुई. मेरे पति आलोकधन्वा एक प्रतिष्ठित-सम्मानित कवि हैं. खास तौर से संवेदना और प्रेम के कवि. हमारी शादी कई मायनों में भिन्न थी. जाति-बिरादरी के अलावा हमारी उम्र में लंबा अंतराल था. लगभग 20-22 साल का. शादी के वक्त मेरी उम्र 23वर्ष थी और उनकी 45 वर्ष. बड़ी उम्र होने की वजह से हमेशा उनमें एक कुंठा रहती थी. लेकिन शादी के बाद मैंने उम्र को कभी तूल नहीं दिया. प्यार किया तो पूरी तरह से डूब कर प्यार किया. पूरी शिद्दत, पूरी ईमानदारी से. मैं काफ़ी बागी किस्म की लड़की थी. बगैर उनके उम्र और दुनिया की परवाह किये मैं सरेआम, खुली सड़क पर उन्हें गले लगा कर चूम लेती थी और वे झेंपते हुए कहते-तुम प्रेमिकाओं की प्रेमिका हो.
हमारा प्रेम कुछ इस तरह परवान चढ़ा. छोटे शहरों में आज भी रंगमंच के क्षेत्र में कम ही लड़कियां आगे आती हैं. पटना में भी इस क्षेत्र में इनी-गिनी लड़कियां ही थीं. मैं भी उनमें से एक थी. उन दिनों उनकी बेहद मशहूर कविता भागी हुई लड़कियां का मंचन होना था. इसका मंचन संभवतः मई 1993 में हुआ था. उसी दौरान हमारी मुलाकात हुई. मैंने उनकी कविता में भूमिका भी की. शुरू-शुरू में हमारी उस कविता को लेकर बहुत बहस होती थी. अकसर मैं कविता को बारीकी से समझने के लिए पूछती, आखिर आपने यह पंक्ति क्यों लिखी? और वे हंसते हुए जवाब देते-मैंने तुम जैसी लड़कियों के लिए ही लिखा है.
धीरे-धीरे जान-पहचान दोस्ती में बदल गयी. कभी-कभी मैं उनके घर भी जाने लगी. उनकी उम्र को देख कर मुझे हमेशा लगता कि वे शादीशुदा हैं और शायद पत्नी कहीं बाहर रहती हैं या फिर अलग. एक दिन मैंने पूछ ही लिया. आपकी पत्नी कहां रहती हैं. कभी उन्हें देखा नहीं. वे जोर से हंसे और कहा-अरे पगली मैंने शादी नहीं की.
-क्यों?
-इसलिए कि अब तक कोई तुम जैसी पगली मेरी जिंदगी में नहीं आयी.
-आप मजाक कर रहे हैं.
-नहीं! मैं सच कह रहा हूं. तुमने तो जैसी मेरी कविता को सजीव बना दिया. जैसे यह कविता मैंने सिर्फ तुम्हारे लिए ही लिखी थी.
-आप जैसे कवि को कोई अब तक कोई मिली क्यों नहीं आखिर?
-शायद तुम मेरी तकदीर में थीं. वे अकसर ऐसी बातें करते और मैं उन्हें बस यों ही लिया करती थी. हां! एक बात जरूर थी कि उनका बात करने का खास अंदाज मुझे बहुत भाता.
मुझे याद है, एक दिन शरतचंद्र के श्रीकांत की अभया और टाल्सटाय की अन्ना कारेनीना पर बातें हो रही थीं. उन दोनों को देखने की उनकी दृष्टि मुझसे भिन्न थी और मैंने सहमत न होते हुए तपाक से कहा, आपको नहीं लगता, आखिर उन दोनों स्त्रियों (अभया और अन्ना कारेनीना) की तलाश एक ही थी और वह थी प्रेम की तलाश. वे अचानक बोले-तुम्हें पता है जब मर्लिन मुनरो, अन्ना कारेनीना और इजाडोरा डंकन को एक बोतल में मिला कर हिलाया जायेगा तो उससे जो एक व्यक्तित्व तैयार होगा वह हो तुम. तुम्हारे अंदर की आग ही मुझे तुम्हारे प्रति खींचती है. आज तक मुझे तुम जैसी बातें करनेवाली लड़की नहीं मिली. मुझसे शादी करोगी?
अप्रत्याशित सवाल से मैं चौक गयी-सर मैं आपकी कविताएं पसंद करती हूं. आपकी इज्जत करती हूं, लेकिन शादी के बारे में सोच भी कैसे सकती हूं, आप उम्र में मुझसे कितने बड़े हैं.
-तो क्या हुआ? ब्रेख्त की पत्नी हेलेना भी उनसे लगभग 20 वर्ष छोटी थीं. दिलीप साहब और सायरा जी की उम्र तो बाप-बेटी के बराबर है. दिलीप कुमार तो सायरा बानों की मां नसीम बानो के साथ अभिनय कर चुके थे. तुमने बंदिनी देखी है?उसमें अशोक कुमार और नूतन का प्रेम देखा है?
-फिर भी मैं ऐसा नहीं कर सकती. मैं अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी हूं. मेरी मां इसके लिए कभी राजी नहीं होगी.
-उन्हें बताने की क्या जरूरत है. आखिर तुम अपनी जिदंगी अपनी मां और भाई-बहन के लिए नहीं जी रही हो. तुम्हारी जैसी खुद्दार लड़की को अपने फैसले खुद लेने चाहिए. तुम्हें अपनी शर्तों पर जीना चाहिए.

-नहीं मैं आपसे शादी नहीं कर सकती-कहती हुई मैं वापस आ गयी.

उन दिनों मैं एक वर्किंग वीमेंस हॉस्टल में रहती थी और पटना से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक आज में काम करती थी. तीन दिन बाद एक बुजुर्ग महिला (मेरे पति की मित्र) मुझसे मिलने मेरे दफ्तर आयीं और बताया कि तुम्हारे आने के बाद से वह गंभीर रूप से बीमार हैं. तुम्हारे ऑफिस में फोन किया लेकिन तुमने नहीं उठाया. तुम्हारे हॉस्टल भी मिलने गया लेकिन तुमने मिलने से मना कर दिया. वह हताश हो गया है. उसे गहरा सदमा लगा है. एक बार चल कर देख लो. उसे मुझे उनसे शादी नहीं करनी थी इसलिए उनसे मिलने या बात करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं उनके साथ ही उन्हें देखने उनके घर आ गयी.
वाकई वे बहुत बीमार और कमजोर लग रहे थे. उस वक्त वहां उनके कुछ मित्र भी थे जो मेरे जाते ही बाहर चले गये. और मेरे कवि पति मेरे पैरों पर गिर कर रोने लगे-मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. तुम नहीं जानतीं तुम मेरे लिए कितनी अहमियत रखती हो. तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी को एक नया अर्थ मिला है. मैं तुम्हें हमेशा, हर तरह से खुश रखूंगा.
इतना बड़ा कवि मेरे सामने फूट-फूट कर रो रहा था. मैं स्तब्ध थी और अचानक मेरे मुंह से निकला ठीक है, आपको शादी करनी है तो जल्दी कर लीजिए वरना मेरे घरवालों का दबाव पड़ेगा तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी. कहने की देर थी और हफ्ते भर में मेरी शादी हो गयी. शादीवाले दिन मेरा मन बहुत उदास था. आखिर मेरी उम्र की लड़कियों की जैसी शादी होती है, वैसा कुछ भी नहीं था. दिल के भीतर से कहीं आवाज उठ रही थी-जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है मैं कहीं भाग जाना चाहती थी, ऐसा जी होता था कि किसी सिनेमा हॉल में जा कर बैठ जाऊं ताकि लोग मुझे ढूंढ न पायें. पर मुझे घर से बाहर जाने का मौका नहीं मिला क्योंकि शादी के कुछ दिन पहले से ही मेरे पति मुझे अपने घर ले आये थे, जहां उनकी बहनें लगातार मेरे साथ रहती थीं.
लगातार रोने और मन बेचैन होने से मेरे सर में दर्द था. हमारी शादी एक साहित्य भवन में हुई थी. वहां से घर आ कर मैं जल्दी सोने चली गयी. देर रात तक मेरे पति और उनकी महिला मित्र की आवाजें मेरे कानों में पड़ती रहीं. सुबह जब मैं जागी तो मेरे पति ने मुझसे कहा जाओ-जा कर उनका पैर छुओ.
-किनका? मैं चौंकी.
मैंने देखा, घर में कोई और नहीं था. उन्होंने रात ही अपनी मां-बहन को अपने घर भेज दिया था. थोड़ी देर बाद उनकी बड़ी बहन का फोन आया. उन्होंने पहला सवाल किया, वो मास्टरनिया (वो महिला एक स्कूल में पढ़ाती थी, इसलिए उन्हें सब मास्टरनिया बुलाते थे) रात में कहां थी?
-यहीं हमारे घर पर ही थीं.
-देखो, अब वह घर भी तुम्हारा है और पति भी. अब पति और घर तुम्हें ही संभालना है.
मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि सबने जान-बूझ कर मुझे धोखा दिया. मेरी सास-ननद को सब पता था और सबने मुझे इस आग में झोंक दिया. ऐसी थी मेरी सुहागरात! मैं शादी के पहले दिन ही बुरी तरह से बिखर गयी. मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. मैं आज तक नहीं समझ पायी आखिर क्यों किया इन्होंने ऐसा?
बाद में मैंने इस पर बड़े धैर्य और प्यार से बात की-सर मैं आपको सर कहती हूं. आपकी बेटी की उम्र की हूं फिर भी आपसे शादी की. लेकिन जब आप किसी और से प्रेम करते थे तो आपने मुझसे शादी क्यों की? आप जैसे इनसान को तो उन्हीं से शादी करनी चाहिए थी, जिससे प्रेम हो.
-मैं उनसे शादी नहीं कर सकता था.
-क्यों?
-क्योंकि वह पहले से शादीशुदा हैं. उनके बच्चे हैं, वे उम्र में मुझसे 12 साल बड़ी हैं.
मैं जैसे आसमान से नीचे गिरी. मेरे मुंह से यकायक निकला- यह कहां की हिप्पोक्रेसी है सर? आप 22 साल छोटी लड़की से शादी कर सकते हैं और 12 साल बड़ी स्त्री से नहीं तो फिर आपको उनसे प्रेम संबंध भी नहीं बनाना चाहिए. पत्नियां जब ऐसे सवाल करती हैं तो उनका क्या हश्र होता है, शायद यह किसी से छिपा नहीं. सबसे घिनौनी बात यह थी कि मेरे पति अपनी महिला मित्र को सार्वजनिक जगहों पर घोषित रूप से दीदी बुलाते थे. सुना है, पुष्पाजी भी भारती जी को राखी बांधा करती थीं, यह इलाहाबाद में सभी जानते थे. भाई-बहन के रिश्ते का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है?
बाद में एक दिन उन दीदी का 60वां जन्मदिन भी हमारे ही घर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया. एक दिन मैंने उनसे कहा, अगर आप में साहस है तो खुल कर इस रिश्ते को स्वीकारें. मुझे खुशी होगी कि मेरे पति में इतनी हिम्मत है. यह कायरोंवाली हरकत देश के इतने बड़े कवि को शोभा नहीं देती. मैं आपका साथ दूंगी. आप उन्हें सार्वजनिक तौर पर स्वीकारें. लेकिन इसके लिए तैयार होने के बजाय उन्होंने मुझे बाकायदा धमकी दी कि मैं यह बात किसी से न कहूं, खास कर उनके भैया-भाभी और बच्चों से. वह दिन मुझे आज भी याद है, जब पहली बार उन्होंने मुझ पर हाथ उठाया. जो इनसान पहले मुझसे कहा करता था कि तुम्हारे अंदर आग है. तुम्हारे सवाल बहुत आंदोलित करते हैं, आज वही मेरे पत्नी होने के मूल अधिकार के सवाल पर मुझे प्रताड़ित कर रहा था. ऐसे में हर लड़की का आसरा मायका होता है पर मैं तो वह दरवाजा पहले ही बंद कर आयी थी. मैं बड़ी मन्नतों-मनौतियों के बाद पैदा हुई थी. इसलिए मुझे दादी और नानी के घर सभी जगह बहुत लाड़-प्यार मिला. सबके लिए मैं भगवान का भेजा हुआ प्रसाद थी. सबकी चहेती, सबकी लाडली, अपनी मरज़ी से शादी करके मैंने सबका दिल तोड़ था. चूंकि मैं कहीं जा नहीं सकती थी इसलिए छह महीने अंदर-ही-अंदर घुटती रही और सब सहती रही. एक दिन तंग आकर मां के पास चली गयी. हालांकि मुझमें मां को सब सच बताने की हिम्मत नहीं थी कि मेरे साथ क्या-क्या हो रहा है लेकिन वह मां थी. वह अपने आप समझ गयी थी कि मैं इस शादी को तोड़ने का फैसला करके आयी हूं. उन्होंने जो कहा उसने मुझे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया. मां ने कहा, हम औरत जात को दो-दो खानदानों की इज्जत निभानी पड़ती है. एक अपने मां-बाप की और दूसरा अपने ससुराल की. अब तुमने जो किया सो किया. अब शादी तो निभानी ही पड़ेगी. वरना लोग क्या कहेंगे? शादी-ब्याह कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल तो है नहीं.
मैं वापस वहीं लौट आयी जहां मेरे लिए एक पल भी जीना मुश्किल था, फिर भी मैंने एक अच्छी पत्नी बन कर घर बसाने की पूरी कोशिश की लेकिन मैं सफल न हो सकी. शायद मैं बंजर धरती पर फूल खिलाने की कोशिश कर रही थी. आज दुख इस बात का है कि जो रिश्ता बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था उसे मैं सड़ी लाश की तरह घसीटती रही. लहरों के राजहंस में सुंदरी अपने विरेचक (बिंदी) को लगातार इस उम्मीद में गीला रखती है कि उसका पति नंद वापस आ कर उसका श्रृंगार प्रसाधन पूरा करेगा. आखिर सुंदरी हार कर कहती है, मुझे खेद है तो यही कि जितना समय इसे गीला रखना चाहिए था, उससे कहीं अधिक समय मैंने इसे गीला रखा.
मेरा मन कचोटता है-क्यों हर मां सिर्फ अपनी बेटी को ही घर बसाने और बचाने की नसीहत देती है? क्यों घर बचाना सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी है? क्यों जब किसी औरत का घर टूटता है तो सारी दुनिया उसे ही कटघरे में खड़ा करती है? क्यों कोई मां अपने बेटे से नहीं कहती कि बेटा, शादी और गृहस्थी की गाड़ी तुम्हें भी चलानी है, कि समाज और खानदान की इज्जत तुम्हारे हाथ में भी है? घर को बचाने की जवाबदेही जितनी पत्नी की है, उतनी पति की क्यों नहीं है? मेरे कई सवालों के उत्तर मुझे आज तक नहीं मिले. क्रमशः

तसवीर : असीमा भट्ट अपने नाटक एक गुमनाम औरत का खत में
और नीचे, आलोकधन्वा

आंदोलनों की पीड़ा

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/13/2007 11:26:00 PM

इस बार अनिल चमडिया का आलेख आंदोलनों की समस्याओं और उनकी चुनौतियों पर. आलेख देशबंधु से साभार.
अनिल चमड़िया
आंदोलनकारियों की क्या पीड़ा होती है। उन्हें आधार बनाकार यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि राजनैतिक स्थितियां कैसे यथास्थितिवादी होती जा रही हैं। पिछले तीन दिनों में तीन लोंगों ने अपने आंदोलनों पर सवाल खड़े किए। पहले ने बताया कि उन्हाेंने अपने गांव के जिस जमींदार को वर्ग शत्रु बताकर हथियार उठाया था उस जमींदार का बेटा दिल्ली में रिक्शा चला रहा है। हमने वर्ग शत्रु की पहचान ठीक नहीं की थी। दूसरे ने एक दफ्तर में कम्प्यूटर से कामकाज होते देखकर कहा कि हम इसका कितना विरोध करते रहे हैं। आज कई दफ्तरों में तो इसके बिना काम मुश्किल हो गया है। तीसरे ने कहा कि आंदोलन ठेके पर नियुक्ति का विरोध करते रहे और आज लगभग दफ्तरों में ठेके पर नियुक्तियां हो गई हैं। कई यूनियनें समाप्त हो गई। ये तो आंदोलनों की समझ पर सवाल खड़े करने वाली पीड़ाएं हैं। लेकिन इस बातचीत का यह एक पहलू है। इस पहलू का एक विस्तार भी यहां है। आंदोलन में सफलता के बाद भी भिन्न किस्म की पीड़ा होती है। विकास परियोजना के एक इलाके में कार्यरत् एक आंदोलनकारी ने अपना दु:ख व्यक्त करते हुए कहा कि एक तरफ तो उनके सामने वे गांव होते हैं जहां अपनी जान-पहचान बढ़ाते हैं और वे गांव डूब जाते हैं। गांव डूबने का अर्थ वास्तव में डूबने से है। बड़े बांधाें के लिए गांवों को खाली करा लिया जाता है। दूसरी तरफ वे गांव हैं जिन्हें आंदोलन की वजह से मुआवजा मिलता है। उनकी जिंदगी एक मुकाम पर आ जाती है और वह गांव और लोग उन्हें भूल जाते हैं। लेकिन इस शिकायत की प्रवृत्ति विकास परियोजना वाले इलाकों की ही नहीं है। इसका विस्तार खेत-खलिहानों और कल-कारखानों तक होता है। मजदूर यूनियन चलाने वाले कई नेता बताते हैं कि संघर्ष के बाद मजदूरों को जब सुविधाएं और पैसे मिल जाते हैं तो वह यूनियन को भूल जाता है। कई बार तो यूनियन का विरोधी भी हो जाता है। भूमि सुधार आंदोलनों के नेताओं के भी ऐसे ही अनुभव रहे हैं। भूमिहीन को भूमि का पट्टा मिलने के बाद उसके सरोकार और संबंध परिवतत हो जाते हैं। जातीय आधार पर आरक्षण पाने वालों का भी रूख इसी तरह बदल जाता है।

यहां आंदोलन का अर्थ लोगों के संगठित होकर यथास्थितिवाद को तोड़ने से भी है और वैसे परिवर्तन को रोकने से भी है जो सत्ता और उसके आधार वर्ग के ही हितों का विस्तार करता है। लेकिन आंदोलन एक आम अधिकार है। इसका इस्तेमाल अपने-अपने तरीके से किया जाता है। अधिकार का मतलब ही होता है कि उसका समाज की कोई भी ईकाई सामान स्तर पर इस्तेमाल कर सकती है। यह अधिकार बोध लोकतंत्र की ताकत को तो जाहिर करता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता है कि मुक्कमल परिवर्तन की राजनैतिक परियोजना के साथ ही इस अधिकार का इस्तेमाल होना चाहिए। इसीलिए कई बार आंदोलन केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्त होती है। वह अचानक संगठित होती है। इस तरह के आंदोलन सत्ता के हितों के विरूद्ध नहीं होते हैं बल्कि उसके तरीकों के खिलाफ होते हैं। चूंकि उसकी कोई तैयारी नहीं होती है इसीलिए वह एक अवधि तक के लिए जारी दिखता है। कम्प्यूटर के आने की सूचना कोई नई नहीं थी। लेकिन कम्प्यूटर के आने के बाद इस आधार पर उसके विस्तार का विरोध किया गया कि इससे लोगों के रोजगार के अवसर कम होंगे। इस तरह से आंदोलन के केन्द्र में लोगों की जीविका यानी मनुष्यता का भाव दिखता है। उस तरह के आंदोलन की यह व्याख्या नहीं की जा सकती है कि वह तकनीकी विकास का विरोधी है। मनुष्यता को केन्द्र में रखने वाला कोई भी परिवर्तनगामी आंदोलन तकनीक के विकास का विरोधी नहीं हो सकता है और इसी तरह तकनीक के विकास के बाद उसके विस्तार के सामने खड़ा नहीं हो सकता है। यदि वह ऐसा करता है तो वह इसमें सफल नहीं हो सकता। अपने देश में कम्प्यूटर के बाद तमाम तरह के तकनीकी विकास के विस्तार को रोकने में कोई भी आंदोलन सफल नहीं हुआ और ना ही हो सकता है।
दरअसल अपने देश और समाज में आंदोलन एक प्रतिक्रिया के रूप में तो दिखाई देते हैं लेकिन एक राजनैतिक परियोजना के रूप में मुकम्मल दिखाई नहीं देते हैं। प्रतिक्रिया की तैयारी और उसके राजनैतिक विकास की संभावनाएं तलाशने की क्षमता नेतृत्व पर निर्भर करती है। लेकिन नेतृत्व की क्षमता केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया के लिए खुद को तैयार करने की सीमा से बाहर नहीं निकल पाया है। जिन आंदोलनकारियों की शिकायत अपने मुद्दे की गलत पहचान के बाबत् है, ये कोई दो-चार उदाहरणों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि यह एक ऐसी प्रवृत्ति के रूप में दिखाई देती है जो राजनैतिक स्तर पर भिन्नता जाहिर करने वाले तमाम तरह के आंदोलनों के बीच भी मौजूद है। इस प्रवृत्ति को इस तरह से भी देखा जाना चाहिए कि आखिर तमाम तरह के झंडे वाले आंदोलनकारियों के बीच एक समानता यह क्यों देखी जाती है कि उनके चरित्र में दोहरापन होता हैं। आम शब्दावली में दोगलापन होता है। नेतृत्व के कामकाज के तरीके से ही उसका चरित्र निमत होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि आंदोलन अंतवरोधी आधारों और मुद्दों का शिकार हो और उसके नेतृत्व का चरित्र उससे भिन्न हो। यह बात कई स्तरों पर व्यक्तिगत जीवन पर भी लागू होती है। उसका व्यक्तिगत जीवन सामाजिक प्रवृत्तियों को ही प्रतिबिंम्बित करता है।
जिन आंदोलनों की सफलता के दावे किए जाते हैं, उन आंदोलनों में यह दिखाई देता है कि उनमें निरंतरता की कोई परियोजना है ही नहीं। उनका यह मकसद भी दिखाई नहीं देता है। यदि मान लें कि कोई मुआवजे के लिए आंदोलन में शामिल होता है तो वह आंदोलन से मुआवजे के बाद क्यों जुड़े रहना चाहेगा। एक तो मुआवजे का मकसद पूरा होने के बाद वह आंदोलन आंदोलन रह नहीं जाता है। वह एक आंदोलन की विरासत की संस्था बन जाती है। ऐसी संस्थाएं दर्शनीय और अध्धयन की सामग्री भर रह जाती है। फिर इस तरह की आकांक्षा का पलना कि उन्हें भुला दिया जाता है, यह सोच किस तरह के आंदोलन की उपज हो सकती है। निजी महत्वकांक्षा के अलावा और यह क्या है? आंदोलनकारी यदि एक राजनीतिककर्मी है तो वह अपनी एक परियोजना के साथ लोगों को आमंत्रित करता है। लेकिन उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा उसके साथ निरंतर रहती है। देखा जाए तो वह अपने इस तरह के निजी महत्वाकांक्षाओं के कारण ही अपनी पूरी राजनैतिक परियोजना को अंजाम नहीं देता है और उसे समेटे रहने की जगह तलाशता रहता है। राजनैतिक परियोजना यह होनी चाहिए कि यदि मुआवजे के लिए आंदोलन हो रहा है तो मुआवजाजीवी समाज निमत करने वाली सत्ता संस्कृति के खिलाफ स्वामित्व और स्वावलंबन के आधार पर गतिशील रहे समाज को कैसे विकसित किया जाए। ठेके का विरोध इस तरह से नहीं हो सकता है कि ठेके के कामगारों के साथ रिश्ते बनाने में एक दूरी का एहसास लंबे समय तक बना रहें। भूमिहीनता के खत्म होने के बाद श्रमिक किसान के रूप में कैसे आंदोलन की ताकत को जीवित रखा जाए। कैसे कल-कारखाने से संघर्ष के बाद मालिकों से अपने हक हकूक को हासिल करने वाले श्रमिक को एक निरंतरता में कायम रखा जाए। यदि हक हकूक का भाव किसी भी आंदोलन से गायब होता दिखें और वह केवल पैसे पाने के भाव में सिमटते चला जाए तो यह किसका दोष हैं? जबकि आंदोलन का नेतृत्व तो खुद को राजनैतिक परियोजना का मैनेजर मानता है। दरअसल अपने देश में आंदोलनों का मकसद सत्ता में जगह पाना यादा रहा है। इसीलिए बुनियादी परिवर्तन की आकांक्षा का लगातार और तेजी के साथ विस्तार होता चला गया है। मौजूदा स्थिति में क्या देखा जा रहा है कि जो खुद को परिवर्तनगामी आंदोलन जाहिर करते रहे हैं वे सत्ता से भिन्न कतई नहीं हैं। यहां उदाहरण के लिए नंदीग्राम और सिंगूर को ही लिया जा सकता है। आखिर आंदोलन ऐसी सत्ता के रूप में कैसे परिवतत हो गए जो उस तरह की सत्ता के खिलाफ लोगों से संगठित होने की अपील करते रहे हैं। परिवर्तन की बुनियादी शर्त अपनी राजनैतिक परियोजना के लिए आंदोलन के जरिये सतहें तैयार करना होता है। सतहें सामने खड़ी सत्ता के लिए सीढ़ियां नहीं हो सकती हैं। बुनियादी परिवर्तन की राजनैतिक परियोजना की सतहें खड़ी करने वाला अपने अनुभवों को आधुनिकता में ढालने की क्षमता रखता है, ऐसे समाज में यह चुनौती सबसे बड़ी होती है।

भागलपुर दंगा : सज़ा मिली, मगर इनसाफ़?

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/09/2007 01:13:00 AM

एक गुजरात ही नहीं है जहां से जले हुए मांस और खून की बदबू आती है- भागलपुर भी उन जगहों में से एक है, जहां के लोगों खास तौर से अल्पसंख्यकों ने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, (भाजपा, विहिप आदि सहित) की नफ़रत की फ़सल की कीमत चुकायी है. भागलपुर दंगा देश के बडे़ दंगों में से एक था, जिसने हज़ारों परिवारों को बरबाद कर के रख दिया था. 07 जुलाई को इस मामले में 14 आरोपितों को उम्रकैद की सज़ा सुनायी गयी. मगर सवाल सबसे बडा़ यह है कि क्या दंगा सिर्फ़ एक सपाट कत्ल भर का मामला होता है जिसमें आरोपितों पर हत्या का मुकदमा चला कर सजा दे दी जाये. क्या किसी भी दंगे में हुआ एक कत्ल केवल एक साधारण कत्ल भर होता है? और क्या उसका आरोपित एक साधारण हत्यारा? और क्यों नहीं इस पर चर्चा होती कि दंगों के सूत्रधारों को भी सजा मिले? और जब किसी मामले में फ़ैसला ही इतनी देर से आये कि पीडि़त ज़ख्म का एहसास तक भूल जायें तो उस फ़ैसले का क्या अर्थ? और जैसा कि इस रिपोर्ट में हम देखेंगे-इस फ़ैसले का अब वैसे भी लौंगाय के लोगों और सकीना के लिए कुछ भी मतलब नहीं. तो एक और सवाल है-वह यह है कि फ़ैसला तो हुआ, सज़ा भी हुई, मगर क्या दंगा के पीड़ितों को न्याय मिला? रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस के जेपी यादव की है, जो उन्होंने आरोपितों को दोषी ठहराये जाने के बाद (सजा सुनाये जाने से पहले) गांव की यात्रा के बाद लिखी थी. इसके कुछ अंश अब अप्रासंगिक हो जाने की वजह से हटा दिये गये हैं. अनुवाद कुमार अनिल ने किया है.

दु:स्वप्न का अंत दु:स्वप्न की शुरुआत

जेपी यादव

कानून ने 1989 के भागलपुर दंगे के कुछेक अपराधियों को दबोच लिया है. 32 में से 14 आरोपितों को दोषी करार दिया गया है. दंगा पीड़ितों के लिए यह दु:स्वप्न के अंत जैसा हो सकता है, जबकि दोषियों के परिजनों के लिए यह बुरे दिनों की शुरुआत.
बीबी सकीना की 53 साल की आंखें उम्र के साथ कमजोर होती गयीं, लेकिन वे आज भी 18 साल पहले अपने पति की हत्या करनेवालों के चेहरे पर हत्या के निशान पढ़ सकती हैं. उन्होंने अपनी यादों से 1989 की भयानक तसवीरों को मिटा देना चाहा, लेकिन जो तसवीर दिलों-दिमाग पर बन जाये, उसे मिटाना आसान नहीं होता. वे इन तमाम वर्षों में उस बुरे सपने के साथ जीती रही हैं.
1989 के दंगे में सब कुछ खत्म हो जाने से पहले उनकी जिंदगी खुशहाल थी. लौंगाय गांव की गरीबी की तुलना में उसकी जिंदगी बेहतर थी. उन्होंने शौहर, ससुर, सास, देवर व गोतनी का भीड़ द्वारा कत्लेआम होते देखा. वे अपने बच्चें के साथ धान के खेत में भाग गयीं. भीड़ उनलोगों को नहीं देख पायी. वे यह नहीं तय कर पा रही थीं कि बचा लेने के लिए वह अल्लाह का शुक्रिया अदा करे या अच्छा होता कि वह भी नहीं बचती.
वे उस दिन उत्सव मना सकती थीं, जब एडिशनल जिला जज ने 115 मुसलमानों के कत्लेआम के लिए 14 लोगों को दोषी करार दिया, पर उनके चेहरे पर कोई मुस्कराहट नहीं थी. इन वर्षों में लगातार हत्यारों द्वारा दी जा रही धमकियों के बीच वे जिंदा रहीं. उन्हें बार-बार धमकी दी जाती थी कि -`हत्यारों को मत पहचानो'. लेकिन एक आंतरिक शक्ति उन्हें बराबर ताकत देती रही-`मैं उन चेहरों को किस प्रकार भुला सकती हूं. उन्होंने मुझे व मेरे सपनों को हिला कर रख दिया. उन पुलिसवालों के चेहरे, जो मुझसे बराबर लौंगाय में ही रहने के लिए जोर डालते रहे थे कि वे उनकी मदद करेंगे, लेकिन बाद में खुद ही हत्यारों में शामिल हो गये और मेरे परिवारवालों का कत्लेआम कर दिया'. सकीना कहती हैं,`चुप रहने से मैं मर जाना पसंद करती.'
32 आरोपितों में 14 को दोषी करार दिया गया. ट्रायल के दौरान छह की मृत्यु हो गयी व शेष रिहा कर दिये गये. वे दोषियों को मौत से कम कुछ नहीं चाहतीं. इनमें पुलिसवाले भी शामिल हैं.
बिना किसी सरकारी सहयोग के पांच बच्चें की परवरिश आसान नहीं थी. दंगे ने उनका सब कुछ छीन लिया था. वे कहती हंै-`मैट्रिक के बाद मेरा बड़ा लड़का भागलपुर मुसलिम कॉलेज में दाखिल हुआ. आरोपितों ने कोर्ट में बयान न बदलने पर बेटे की हत्या की धमकी दी. मेरे बेटे की पढ़ाई नहीं हो सकी. आज वह बेरोजगार है.'
यह सकीना बीबी के लिए विनाशकारी बदलाव है. लौंगाय में सबसे अधिक जमीनवाले परिवार की सकीना आज छह किमी दूर बबूरा गांव में रिफ्यूजी की जिंदगी बिता रही हैं. दंगाइयों से बच कर सकीना व उसके बच्चे एक नदी पार करके घंटों चलने के बाद मुसलिम बहुल बबुरा गांव पहुंचे थे.
मेरी छोटी बच्ची नौ महीने की थी. अन्य बच्चे दो से छह साल के बीच थे. मैं आज कल्पना नहीं कर सकती कि मुझमें किस प्रकार इतनी ताकत आ गयी कि मैं अपने बच्चें के साथ भाग रही थी, जबकि पीछे हमलावरों की भीड़ थी. महीनों तक मैं बेसुध थी. गांववालों ने मेरे बच्चें की देखभाल की. उसके बाद से बबुरा ही मेरा घर हो गया.'
सरकारी मशीनरी के आश्वासनों के बावजूद वे लौंगाय वापस जाने की हिम्मत नहीं कर सकीं. पिछले 18 वर्षों से उन्होंने अपने बगीचे के आम का स्वाद नहीं चखा. उन्होंने अपने तालाब की मछलियों को नहीं देखा. उन्होंने लौंगाय की जमीन का एक हिस्सा बेच कर एक घर बनाया और थोड़ी-सी जमीन ली. उन्होंने अपनी तीन में से दो बेटियों व
बेटे की शादी की. गांववालों ने शादी में मदद की. उनके पास देने के लिए कुछ नहीं था.
लौंगाय में उनके रहने के कोई निशान नहीं हैं. उनका दोतल्ला मकान ध्वस्त कर दिया गया. उनकी 40 बीघे जमीन पर बगल के दामूचक के पूर्व मुखिया सदानंद सिंह ने कब्जा कर लिया.
सकीना दृढ़ता के साथ कहती हैं-सब कुछ छीन लेनेवाला वह दंगाइयों का नेतृत्व करनेवालों में से एक था. वह भी एक आरोपित था, पर उसकी कुछ वर्षों पहले मृत्यु हो गयी.' सब कुछ लुटा चुकी वे कहती हैं -`एक बार मेरा बेटा अपनी जमीन पर दावा करने गया, तो सदानंद के बेटों ने कहा कि दोबारा आया तो वे उसकी हत्या कर देंगे.'
दंगाइयों का मकसद जमीन पर कब्जा करना था. यह कहना है डीआइजी अजीत दत्त का, जिन्होंने दंगे के दो महीनों बाद एक खेत से लाशों को बरामद किया था, जहां उन्हें गाड़ दिया गया था. जिन मुसलमानों के पास अधिक जमीन थी, उन्हें औने-पौने दाम पर बेच देने को बाध्य कर दिया गया. भाइयों मुहम्मद अमीर, सुहैल व समीर सबके पास दो-दो बीघा जमीनें थीं. आज इमारते शरिया द्वारा दी गयी जमीन के टुकड़े उनके पास हैं और वे दैनिक मजदूर का जीवन बिता रहे हैं. दंगे के कुछ साल बाद उनका जीवन मुश्किल भरा हो गया, क्योंकि उन्हें अपनी जमीन 25 हजार रुपये बीघे के हिसाब से बेचनी पड़ी. कुछेक मुसलिम परिवार गवाही के लिए सामने नहीं आये और किसी प्रकार अपनी जमीन बचा पाने में कामयाब रहे. हालांकि उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी.
19 वर्षीय राकेश मंडल एक आम जिंदगी जी रहा था. हालांकि वह जानता था कि उसके पिता व चाचा उसके गांव में हुए दंगे, जिसमें 116 लोग मारे गये थे, में आरोपित हैं. बचे हुए लोगों के लिए यह दु:स्वप्न 19 वर्ष पहले शुरू होता है, राकेश के लिए यह अब शुरू हो रहा है. शिवलाल मंडल का बड़ा पुत्र बी-कॉम का छात्र, भागलपुर से अपने घर पहुंचा. जज ने उसके 50 वर्षीय पिता को अभी-अभी दोषी करार दिया था. यह मंडल का परिवार है, जो भयानक भयग्रस्त हुआ. राकेश का भविष्य चौपट हो सकता है, क्योंकि उसके पिता ही एक मात्र क मानेवाले व्यक्ति हैं. उसके रिश्तेदारों से आर्थिक सहयोग की संभावना कम है. उसके चाचा अजबलाल मंडल व उसके दादा अजबलाल के पिता रामदेव मंडल भी दोषी करार दिये गये हैं.
`मैं नहीं जानता क्या होगा. कोर्ट द्वारा दोषी करार दिये जाने के बाद से मेरी मां बीमार है. मुझे उसकी मदद करनी है. दो छोटे भाइयों को देखना है.' वह कहता है-`बड़ा भाई होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि मैं इस संकट की घड़ी में परिवार के काम आऊं. सजा के बाद मुझे गांव में रहना पड़ेगा और खेती-बाड़ी संभालनी होगी. उस स्थिति में पढ़ाई जारी रखना मुश्किल होगा.' राकेश को उस उन्मादी दिन की याद नहीं है. वह तब लगभग एक साल का था. लेकिन उसने अपने पिता व अन्य लोगों से तब की कहानियां सुन रखी हैं-`मेरे पिता निर्दोष हैं. मेरे पिता का नाम शुरुआती एफआइआर में नहीं था. मेरे पिता ने कहा था कि उसने किसी मुसलमान का कत्ल नहीं किया. यह सब कुछ बाहरी लोगों द्वारा किया गया, जो हजारों की संख्या में आये थे.' वह एक ऐसे परिवार से आता है, जिसके पास एक बिगहा जमीन है. इसका परिवार बंटाइदारी करता है-`जब मैं कॉलेज पहुंचा, तब पढ़ाई के लिए भागलपुर में रहना जरूरी हो गया. इसीलिए मैंने प्राइवेट ट्यूटर का काम शुरू किया, ताकि मेरे खर्च निकल सकें . लेकिन गांव में रह कर मैं इसे कैसे पूरा कर सकता हूं?'
राकेश समझ सकता है कि कोर्ट के फैसले का क्या मतलब होगा. लेकिन संजीव कुमार, सिर्फ 13 वर्ष का बच्चा, जो अन्य बच्चों की तरह है, नहीं जानता कि उसके परिवार की किस्मत किस प्रकार उलट गयी है. उसके पिता कुलदीप मंडल (४०) और दादा सुखदेव मंडल (८७) को सजा हो गयी है. उससे उनके दंगे में शामिल होने की बात पूछिए, तो बच्चे के पास मासूम जवाब है-`मैं नहीं जानता कि क्या हुआ.' राकेश व संजीव कोइरी जाति से आते हैं, जिनकी लौंगाय में आबादी अधिक है. कोइरी जाति विनम्र जाति मानी जाती है, पर अर्थव्यवस्था का आयाम लोगों के साथ अजीब खेल खेलता है. लौंगाय के अधिकतर कोइरी छोटी जोतवाले किसान हैं. मुसलमानों के पास अधिक जमीन थी. कोइरी बंटाईदार के तौर पर उनके खेतों में काम करते थे. उनका रोष, अगर कुछ था, दंगे के दौरान सतह पर आ गया. जैसे ही रामलीला पूजन का जुलूस विश्व हिंदू परिषद के नेता कामेश्वर यादव के नेतृत्व में भागलपुर में निकला, दंगा शहर के बाद गांवों में भी फैल गया. लौंगाय उन्हीं मे से एक है, जहां सबसे भयानक घटनाएं हुईं.
हिंदू उन्मादियों ने कोइरियों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काया. एक ग्रामीण पर, जिसने जनसंहार करने से इनकार कर दिया, दंगाइयों ने व्यंग्य किया-`तुम सब हिंदुओं के नाम पर कलंक हो. तुम मुसलमानों के खेत में काम करते हो, जो गाय का मांस खाता है. क्या यह पाकिस्तान है?'
हिंसा के तुरंत बाद कांग्रेसी सरकार गिर गयी और लालू प्रसाद ने सत्ता संभाली. लालू को मुसलमानों, जो अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे, व पिछड़ों का समर्थन प्राप्त था. लेकिन जिस प्रकार दो दशकों तक भूल-भुलैयावाले रास्ते पर मुकदमा चलता रहा, उसके लिए लोग वोट बैंकवाली राजनीति को जिम्मेदार बता रहे हैं. वे कहते हैं, राजद पिछड़ों को नाराज करने का खतरा मोल लेना नहीं चाहता था और इसीलिए बीच का रास्ता चुना गया. लालू प्रसाद पिछड़ों के सशक्तीकरण की बात करते थे. उन्होंने मुसलमानों से वादा किया कि दंगे अब नहीं होंगे.
सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील भागलपुर आज उस चौराहे से बाहर निकल आया है. आज हिंदुओं और मुसलमानों की अगली पीढ़ी यह महसूस करती है कि यह समय भविष्य के बारे में सोचने का है, न कि बदला लेने के बारे में विचार करने का. राकेश कहता है `मैं नहीं जानता उस समय क्या हुआ. सांप्रदायिक हिंसा ने मुसलमानों-हिंदुओं दोनों को बरबाद किया. दंगा पीड़ित मुसलमानों के बच्चे भी यही व्यक्त करते हैं. बीबी सकीना का बेटा मो अंसार कहता है `मेरे लिए जीने का स्रोत ढूंढ़ना ज्यादा अहम है. सरकार मेरी जमीन मुक्त कराये या मेरे लिए काम की व्यवस्था करे, जिससे मैं अपने परिवार की देखभाल कर सकूं. पिछले 18 वर्षों ने लोगों को जीवन के बहुत से पाठ पढ़ाये हैं. इंडियन एक्सप्रेस से साभार

देखिए : इंतेसाब का एक अंश

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/07/2007 09:06:00 AM

यह पोस्ट नासिर भाई की टिप्पणी के बाद...फ़ैज़ की नज़्म इंतेसाब का एक अंश...

...दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/07/2007 01:26:00 AM

इंतेसाब

यह नज़्म बडे मौके से याद आयी. इसे पढ़ते वक्त नहीं लगता कि हम आज भी उस अंधेरी रात से बाहर आ पाये हैं, भले कुछ नेपकिन टाइप लोगों और सरकारों को लगता हो कि यह स्वर्णयुग है. फ़ैज़ ने इस नज़्म में जिन लोगों का नाम लिया है उनमें से कई अब ज़ाहिरा तौर पर इतिहास की वस्तु बन गये हैं. मगर जो बचे हैं वे भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उन्हें खत्म करने या कम से कम आदमी के तौर पर उनकी संवेदना और सम्मान खत्म कर देने की साजिशें हर तरफ़ से हो रही हैं. हालांकि इसके खिलाफ़ लडा़ई भी जारी है. यह हमारे समय में शायद आदमी को बचाने की सबसे संजीदा और सबसे बडी़ पुकार है.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज के नाम
और
आज के गम के नाम
आज का गम कि है ज़िंदगी के
भरे गुलिस्तां से खफ़ा

ज़र्द पत्तों का बन
ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है
दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है
क्लर्कों की अफ़्सुर्दा जानों के नाम
किर्म खुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम
पोस्टमैनों के नाम
तांगेवालों के नाम
रेलबानों के नाम
कारखानों के भोले जियालों के नाम
बादशाहे जहां, वालीए मासिवा, नइबुल्लाहे फ़िलअर्ज़ दहकां के नाम

सुनें फ़ैज़ को बोलते हुए



जिस की ढोरों को ज़ालिम हंका ले गये
जिस की बेटी को डाकू उठा ले गये
हाथ भर खेत से एक अंगुश्त पतवार ने काट ली
दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली
जिस के पग ज़ोरवालों के पांव तले
धज्जियां हो गयी है

उन दुखी मांओं के नाम
रात में जिन के बच्चे बिलखते हैं और
नींद की मार खाये हुए
बाज़ूओं से संभलते नहीं
दुख बताते नहीं
मिन्नतों-ज़ारियों से बहलते नहीं

उन हसीनाओं के नाम
जिनकी आंखों के गुल
चिलमनों और दरीचों की
बेलों पे बेकार खिल-खिल के
मुरझा गये हैं
उन ब्याहताओं के नाम
जिनके बदन
बेमोहब्बत रियाकार सेजों पे
सज-सज के उकता गये हैं
बेवाओं के नाम
कोठरियों, गलियों, मुहल्लों के नाम
जिनकी नापाक खाशाक से चंद रातों
को आ-आ के करता है अकसर वज़ू
जिनकी सायों में करती है आहो-बुका
आंचलों की हिना
चूडि़यों की खनक
काकुलों की महक
आरज़ूमंद सीनों की अपने
पसीने में जलने की बू

पढ़नेवालों के नाम
वो जो असहाबे तब्लो अलम
के दरों पर किताब और कलम
का तकाज़ा लिये, हाथ फैलाये
पहुंचे, मगर लौट कर घर ना आये
वो मासूम जो भोलेपन में
वहां अपने नन्हे चिरागों में
लौ की लगन
लेके पहुंचे जहां
बंट रहे थे घटाटोप, बेअंत
रातों के साये
उन असीरों के नाम
जिन के सीनों में फ़र्दा के शबताब गौहर
जेल खानों की शोरीदा रातों की सर-सर में
जल-जल के अंजुमनुमा हो गये हैं

आनेवाले दिनों के सफ़ीरों के नाम
वो जो खुशबू-ए-गुल की तरह
अपने पैगाम पर खुद फ़िदा हो गये हैं

फ़ैज़ द्वारा अधूरी रह गयी नज़्म.

नक्सलवाद : समस्या है या समस्याओं का समाधान

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/04/2007 12:42:00 AM

एक ओर अरुंधति राय का मानना है कि नक्सली देश में अकेले ऐसे लोग हैं जो कुछ सार्थक कर रहे हैं-वे केवल राजसत्ता से ही नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि सामंती जमींदारों और उनकी सशस्त्र सेना से भी. वे अकेले लोग हैं जो कुछ सार्थक कर रहे हैं. और मैं इसकी प्रशंसक हूं, तो दूसरी तरफ़ भारत सरकार इसे देश की सबसे बडी़ आंतरिक समस्या मानती है. हाशिया पर नक्सल आंदोलन पर दी गयी सामग्री (1, 2) पर जो बात सामने आयी, हम उन्हें यहां रख रहे हैं. आप बतायें कि क्या यह एक समस्या है? कितनी बडी़ समस्या है? इससे कैसे निपटा जाये? या वाकई जितनी बडी़ समस्या मानती है भारत सरकार उतनी बडी़ यह समस्या है? या फिर इसे अरुंधति और चंद्रिका की तरह समस्याओं का समाधान माना जाये?

अनामदास का कहना है...

नक्सलवाद रोग नहीं बल्कि रोग का लक्षण है, उसकी सीधी वजह ग़रीबी, अन्याय और शोषण है. नक्सलवादी आसमान से उतरे हुए शैतान नहीं बल्कि उनका नेतृत्व पढ़े-लिखे लोगों के हाथों में है जबकि उनकी फौज में शोषित-तिरस्कृत लोग हैं. उन्हें फलने-फूलने के लिए पर्याप्त खाद-पानी दिया जा रहा है, शोषण, अन्याय और भ्रष्टाचार का राज चलाकर, वे राज विरोधी हैं जिन्हें सरकारों ने राष्ट्रविरोधी बना दिया है, आम तौर पर लोग उतना ही जानते-समझते हैं जितना व्यवस्था के लोग और व्यवस्था अभिमुख मीडिया से पता चलता है. नक्सलवादी सही हैं यह कहना उद्देश्य नहीं है लेकिन वे सिर्फ़ बंदूक से या हिंसा से रास्ते पर लाए जा सकते हैं, ऐसा सोचना मूर्खता है. जब तक व्यवस्था न्यायपरक, समतामूलक नहीं होगी, नक्सलवाद और चरमपंथ जैसी समस्याएँ लक्षण के रूप में सिर उठाती रहेंगी. रोग के समाधान की दिशा में काम होना चाहिए, शॉर्ट कट से कुछ नहीं मिलेगा.


notepad का कहना है...

दिनेश महतो जैसे पढे लिखे युवक साफ कह रहे है कि नक्सलाइट सही है कम से कम वे झारख्न्ड के वन्चित् निर्धन लोगो की समस्याएं समझते है ‍।यहां न स्वास्थ्य सुविधाएं है‍ न पोषण और न ही अधिकार । क्या वाकई यह विकसित भारत का अन्ग है ?
वाकई विमर्श के ज़रूरत है ।यह भी सही है कि नक्सलवाद के नाम को भुना कर फायदा कमाने वाला वर्ग कोई और ही है ।


चन्द्रिका ने कहा...

नक्सलवाद समस्या नही कई मायने मे समाधान के रूप मे आया है खासतौर से बिहार की बात ले तो आज बिहार में दलित महिलाओं के साथ उस तरह से व्यवहार नही किये जाते जैसे पहले होते थे या कहीं न कहिं नक्सलवादियों का डर बना हुआ है क ई मायने मे यद्पि जाति आधारित भेद-भाव बढ़े है पर यह संसदीय पार्टियों का ही देन है नक्सल वादियों ने इस गैप को भरने का काफी प्रयास किया है.


विरोध में भी कुछ टिप्पणियां आयीं जैसे कि...

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा...

प्रभाकर जी,

कभी कभी लगता है कि
" क्रांति के नाम पर जो बाँटते बंदूख हैं
अब उन्हीं का घर जलाना सीख लेना चाहिये"

यथास्थितिवादिता गलत है, यकीनन गलत है किंतु अंध-उत्साह शर्मनाक। आज कल की पत्रकारिता क्रांति केवल इसी लिये नही कर सकती क्योंकि गुमराह स्वयं है। आपकी वरिष्ठता आपकी सोच पर मुहर लगाये जाने का कारण नहीं हो सकती। एक व्यवस्था का विरोध दूसरी व्यवस्था का आरोपण ही तो है, पूछ तो लें हम बस्तरियों से कि उन्हें क्या चाहिये? आंध्रप्रदेश से आये चंद आतंकवादी बस्तर के बिलों में चुप कर क्रांति कर सकते हैं तो धन्य हैं भई वे..और एसी आशावादिता को भी नमन।
क्रांति एक सकारात्मक विचार है लेकिन मेरी छाती पर चढ कर मुझसे नहीं करवायी जा सकती। क्रांति भगत सिंह के उस बम से आ सकती है जो बहरों को सुनाने के लिये था लेकिन उस बारूदी सुरंग के फटने से नहीं आ सकती जिसमें मरने वाला भी सुकारू ही है। ......???


और
Gaurav Pratap ने कहा...

अनिल भाई, मैं स्वयं बिहार के भोजपुर ज़िले से आता हूँ. नक्सलवाद को मैंने भी देखा है. अगर आप थोड़ा पीछे देखेंगे तो याद आयेगा कि देश का पहला सी.पी. आई.(एम. एल.) साँसद आरा से ही जीता था. आज आप उनका अस्तित्व देख लें. कहाँ से कहाँ आ गये हैं वो. जिन गरीबों की बात वो करते हैं उन्होंने भी देख लिया कि उनका दुःख कोई नहीं समझने वाला. सिर्फ़ नफ़रत फ़ैला कर कोई लक्ष्य नहीं हासिल किया जा सकता है. सी.पी. आई.(एम. एल.) और रणवीर सेना दोनों ही लगभग मित चुके हैं. मैंने गरीबों की प्रतिबद्धता देखी है, सी.पी. आई.(एम. एल.) के प्रति. जब बोरों में पैसे जाते थे...... सिर्फ़ सिक्के.... क्युँकि गरीब रुपये नहीं दे सकते थे. आज वो ही पैसे देने वाला.... सबकी सच्चाई जान चुका है. किताबों में पढ़ने के लिये अच्छा है साम्यवाद..... नक्सलवाद.... ज़मीन पर सब एक ही हैं...

आप क्या मानते हैं?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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