हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बेईमान लेखकों से भरा समय : बहस वाया मंगलेश डबराल-अरुण कमल

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/30/2007 06:45:00 PM

आजकल नया ज्ञानोदय को लेकर जो भी बहस चल रही है, उसमें हमारा पक्ष जो भी हो मगर यह तो तय है कि वर्तमान में साहित्य के सरोकारों पर युवा और वरिष्ठ लेखकों की चिंताएं सामने आ रही हैं. हम भी यह मानते हैं कि अब साहित्य के सरोकार पहले से कमजोर हुए हैं और इसी के साथ हमारा यह भी मानना है कि इसका दोष सिर्फ़ युवा लेखकों पर डालना हद दरजे की बेईमानी है. जो पुराने हैं, आगे हैं, उनमें यह विकृति कहीं अधिक दिखती है. कर्मेंदु जी के बारे में अब कोई परिचय देने की ज़रूरत नहीं. यह आलेख उनसे प्रभात खबर के लिए की गयी बातचीत पर आधारित है, जो कबीर और बाबा नागार्जुन की याद में विशेष प्रस्तुति के लिए मैने की थी.

देश को जरूरत है ऐसे लेखकों की जो सच को सच और झूठ को झूठ कहें

कर्मेंदु शिशिर
कबीर और नागार्जुन दोनों लीक से हट कर चलनेवाले विद्रोही कवि थे. उन्होंने अपने समाज की प्रचलित काव्य रूढ़ियों को तोड़ा था. दोनों की काव्य भाषा और कथ्य जनता से लिये हुए हैं और वे जनता के लिए ही थे. उनके लेखन में कोई साहित्यिक महत्वाकांक्षा हो, ऐसा नहीं लगता. वे आलोचकों और काव्य रसिकों को ध्यान में रख कर नहीं लिखते थे.
आज की जो परंपरा है, वह वह पूरा साहित्यिक परिदृश्य जिन चीजों के विरोध में खड़ा है उन्हीं का शिकार हो गया है, उनकी गोद में बैठ गया है. वे बाजार के खिलाफ हैं, मगर उनमें सबसे अधिक बाजार और बाजार में स्थान की आकांक्षा भी है. समकालीन परिवेश पर जो भी महत्वपूर्ण विमर्श और विचार हैं, वे उन्हें ही कमोडिटी की तरह पेश करते हैं. अगर आपके विचार आपके जीवन में नहीं दिखते तो वे समाज में कैसे दिखेंगे?

ये दोनों कवि ऐसे थे जो अपने समय के समाज के अनुभवों को अपनी कसौटी पर कसते-जो बात उन्हें अच्छी लगती, वे उनका पक्ष लेते और जो बात उन्हें बुरी लगती उसे छोड़ते नहीं बल्कि उसका डट कर विरोध करते. आज के साहित्य में सरोकारों में सघनता और ईमानदारी नहीं रही. ये चीजें कम हुई हैं और इसी कारण से साहित्यकार इनके अभाव को ढंकने के लिए तराशी हुई भाषा और शिल्प पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं. अगर आप हिंदी साहित्य को देखें तो पिछले कुछ दशकों से कविता केंद्र में है, जबकि गद्य को जीवन संग्राम की भाषा माना गया है. इस कविता में भी कुछ ही लोग केंद्र में हैं, जैसे कि मंगलेश डबराल और अरुण कमल. ये दोनों लगातार कलात्मक भाषा की ओर गये हैं. इनका अपने कथ्य के प्रति सरोकार ढीला हुआ है, इन्होंने अपने सोच को कमोडिटी में बदल दिया है. इनकी इनकी कविताएं पढ़ने में तो बहुत सुंदर लगती हैं, पर दिल को छूती नहीं हैं, इसलिए हमारे भीतर कोई परिवर्तन नहीं करतीं. ये गालिब, मजाज, नजरुल, निराला, नेरुदा आदि से अपने को जोड़ते भी हैं, तो उन्हें कैश करने के लिए, ताकि उन्हें कुछ फायदा हो जाये. वे अपने को त्रिलोचन और गालिब की संतानें कहते हैं, मगर उनकी पहचान उनके रचनाकर्म से नहीं सम्मानों से बनी है. नागार्जुन ने कभी किसी सामान्य आदमी से भी मिलने में कोई अहंकार और ऐंठ नहीं दिखायी. मगर यह बात आज के प्रख्यात कवियों में नहीं दिखती है.
ऐसे में जनता विकल प्रतीक्षा में है ऐसे कवियों, रचनाकारों की जो सच को सच कहें और झूठ को झूठ कहें-पूरी ताकत से, बिना अपना नफा और नुकसान देखे. देश में ऐसे कुछ कवि हुए भी हैं-जैसे श्रीश्री, वरवर राव, गदर, पाश और निखिलेश्वर.
बातचीत के कुछ अंश प्रभात खबर में प्रकाशित
पेंटिंग : कबीर पर आनंदमय बनर्जी की पेंटिंग

जो सोचते हैं, वे वामपंथी होते हैं : अरुंधति राय

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/26/2007 01:18:00 AM

यह हमारे समय की दुनिया की सबसे बडी़ आवाज़ों में से एक आवाज़ है-हम इसे यहां दे रहे हैं. यह साक्षात्कार प्रभात खबर में 24 जून को छपा, जिसे मनीष कुमार ने लिया था. साभार प्रस्तुति.

भारतीय समाज को आप किस नजरिये से देखती हैं?
किसी भी समाज के बारे में दो वाक्यों में नहीं बताया जा सकता है. एक लेखक समाज के बारे में बताने में पूरी जिंदगी गुजार देता है. लेकिन मुझे लगता है कि दक्षिण अफ्रीका में जिस प्रकार का रंगभेद होता था, ऐसा ही भारत में भी है. वहां आप काले-गोरे के भेद को खुलेआम देख सकते थे, लेकिन यहां पहचान करने में थोड़ी मुश्किल है. यह भी रंगभेद का ही एक प्रकार है.
आप कई बार समाज के सर्वहारा वर्ग के पक्ष में खड़ी नजर आयीं. इसके पीछे क्या कारण रहा?
मेरे ख्याल में दो किस्म के लोग होते हैं. एक, जिनका शक्तिशाली लोगों के साथ नेचुरल एलाइनमेंट रहता है, दूसरे वे लोग हैं जिनके पास कुछ नहीं है. जनता के पास शक्ति तो काफी है, लेकिन देश में जो कुछ हो रहा है, उसे किस प्रकार से ठीक किया जाये, उसका सही तरीका समझ में नहीं आ रहा है. अगर कोई प्रधानमंत्री भी बन जाये, तो वह सबकुछ सुधार नहीं सकता. मुझे नहीं लगता है कि ऊपर से कोई सुधार हो सकता है, सुधार निचले स्तर से ही संभव है.
अभी देश की विकास दर 10 फीसदी के पास है, सरकारी आंकड़ों में 26 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, हर साल अरबपति लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, सेंसेक्स डेली रिकॉर्ड ऊंचाई छू रहा है, विदेशी पूंजी का प्रवाह बना हुआ है. इस पूरे ताने-बाने को आप किस रूप में देखती हैं?
ये जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है. यह सिर्फ उनको अच्छा लग रहा होगा, जो निजी कंपनियों के सीइओ होंगे, जिनका स्टॉक एक्सचेंज काफी बढ़ रहा है. इसको कैसे रोका जाये इस सवाल का जबाव ढूंढना होगा. मुझे लगता है कि गांधीवादी माहौल का जो रेसिस्टेंस है वो अब नहीं चलता. इसमें पूरी तरह एनजीओ आ गये हैं, लोगों को बांट देते या खरीद लेते हैं. इस माहौल को बदलने का हल क्या है? हल है भी या नहीं, ये भी हमें पता नहीं? मुझे लगता है कि अगर कोई रैडिकल रिवोल्यूशनरी सोल्यूशन नहीं होता है तो फिर कुछ वर्षों में पूरे देश में अपराध बढ़ जायेगा.
सरकार की नीतियां समाधान के बदले किस तरह जनता के हितों के विरुद्ध जा रही है?
आज आप कुछ भी करो सरकार, पुलिस और आर्मी कुचल देती है. पहले तो इसलामिक टेररिज्म का नाम लिया जाता था, लेकिन अब उन्हें लगता है कि इसलामिक टेररिज्म में सब नहीं आते इसमें सिर्फ मुसलमान ही आते हैं, तो बाकियों को कैसे बंद किया जाये. अब जो इस्लामिक टेररिज्म के श्रेणी में नहीं आते हैं उसे माओवादी टेररिस्ट बना दिया गया है. इस तरह राज्य के लिए आतंकवाद का जो पुल है वह बढ़ रहा है. अभी जो कुछ छत्तीसगढ़ में हो रहा है यही चीज कोलंबिया जैसे देश में हुआ था. वहां पर सरकार ने खुद एक पिपुल मिलिशिया खड़ी कर दी और विद्रोहियों के साथ उनका सिविल वार जैसी स्थिति बन गयी, जब सभी लोग छद्म युद्ध देख रहे थे, तो एक बड़ी कंपनी वहां जाकर खनिज की खुदाई की, यही छत्तीसगढ़ में हो रहा है. लोगों को नचाने में ये लोग काफी उस्ताद हैं. इन दिनों एक बात पर काफी चर्चा हो रही है कि सीइओ को 25 करोड़ की सैलरी मिलनी चाहिए या नहीं. इसमें कहा गया कि अगर उनका वेतन कम होगा तो रिफॉर्म की प्रक्रिया बंद हो जायेगी. अब आप बताइये इन दिनों किसी कंपनी के सीइओ के पद पर किस तबके लोग बैठते हैं.
पिछले डेढ़-दो दशक में हमारे देश में उपभोक्तावादी संस्कृति काफी हावी होती जा रही है.आपकी नजर में समाज पर इसका क्या असर हो रहा है?
कुछ दिनों पहले अखबार में एक बड़ा विज्ञापन शॉपिंग रिवोल्यूशन के संबंध में आया था. मुझे लगता है कि भारत में उदारीकरण की जो नीति आयी है इसने मध्य वर्ग को फैलाया है. इससे आज हमारे देश में अमीरी-गरीबी की खाईं बढ़ती जा रही है, अमीर और धनी होते जा रहे हैं, गरीब पिछड़ते जा रहे हैं. उदाहरण के लिए सौ लोगों को रोटी, कपड़ा, पानी और यातायात की सुविधा मिलती है लेकिन अधिकतर लोग इससे वंचित रह जाते हैं. लेकिन यदि आप कोई नयी आर्थिक नीति लाते हैं, जिसके तहत 25 लोगों को बहुत अमीर बनाते हैं और बाकी 75 लोगों से सभी कुछ छीन लेते हैं तो इसका दीर्घकालीन प्रभाव समझा जा सकता है. अभी भारत का बाजार इस प्रकार से बनाया जा रहा है कि ज्यादातर लोगों से काफी कुछ छीन कर कुछ लोगों को दे दिया जाये. अब यह समझना होगा कि ये लोग उपभोक्ता की वस्तु कहां से ला रहे हैं. यदि आप भारत का नक्शा देखें, तो पता चलता है कि जहां पर जंगल है उसके नीचे खनिज- संपदा है. अब आपके पास चुनने का विकल्प है. जंगल को काट कर निकाल दें और इससे बहुत पैसा भी मिलेगा पर इससे 50 वर्षों में सारा देश सूख जायेगा. हमारे देश के प्रधानमंत्री हों या मोंटेक सिंह अहलूवालिया या पी चिंदबरम इनके पास कोई कारगर नीति नहीं है सिर्फ आंकड़े दिखाते हैं. इससे ज्यादा खतरनाक क्या हो सकता है कि बगैर किसी ऐतिहासिक साहित्यिक या सामाजिक नजरिये से देखने के बजाय आप आंकड़ों के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं.
एक तरफ अमेरिकी नीति मानवता के इतनी खिलाफ लगती है, लेकिन दूसरी ओर हर कोई अमेरिका जाने का मौका छोड़ना नहीं चाहता है. ऐसा क्यों?
अमेरिका के लिए मुझे कोई चाह नहीं है, मैं सच कहूं तो मुझे घसीट कर भी ले जाओ तो मैं वापस चली आऊंगी. इतना मशीनी बन कर मैं रहने का सोच भी नहीं सकती हूं. लेकिन अगर आप किसी गांव के दलित हों, आप वहां पानी नहीं पी सकते, किसी के सामने नहीं जा सकते और फिर आपको अमेरिका जाने का मौका मिले तो क्यों नहीं जायेंगे? अमेरिका ज्यादातर नेताओं और अधिकारियों के बच्चे ही जाते हैं. लेकिन इतना सत्य है कि यह खतरनाक प्रवृत्ति है.
किस प्रकार से आप खतरनाक मानती हैं?
खतरनाक है, अगर आप 16 या 18 वर्ष के बच्चे को अमेरिका भेज दो तो उसका पूरा दिमाग या उनके सोचने का तरीका बदल जाता है. वो भी किसी जेल में नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों में. वहां उनका पूरा ब्रेन वॉश हो जाता है. यह अमेरिकी नीति है कि नौजवानों को पहले अपने यहां प्रशिक्षण दो और फिर उन्हीं का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करो, जैसा कि 1973 में चिली में जो कू हुआ था आइएमए के खिलाफ. इससे पहले अमेरिका ने वहां के नौजवानों को शिकागो स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भर्ती किया, स्कॉलरशिप देकर इनके दिमाग में न्यू कंजरवेटिव फ्री मार्केट आइडियोलॉजी डाल दी गयी और फिर इन लोगों ने चिली का जिस तरह से दोहन किया वह सभी को पता है. हमारे भारत में भी मुख्यत: इलीट वर्ग के बच्चे अमेरिका जाते हैं, जिनके बाप-दादा यहां मंत्री, ब्यूरोक्रेट या बड़े बिजनेसमैन हैं. इस तरह से यह पूरा चक्र घूमता है.
भारतीय लेखन का मौजूदा दौर आपको कैसा लगता है?
ये भारतीय लेखन क्या है? मैं इसे नहीं मानती हूं. क्या जो अंगरेजी में लिखते हैं वे अलग हैं? हिंदी या भोजपुरी में लिखनेवालों में ऐसा नहीं है. अंगरेज़ी के भारतीय लेखक, कहानी को घुमा-फिरा कर पाठक को संदेह में डाल देते हैं. भारतीय भाषाई लेखन का क्या भविष्य देखती हैं? भारतीय भाषाई लेखन का भविष्य, क्षेत्र पर निर्भर करता है लेकिन मुझे लगता है कि भाषाई लेखन का माहौल पूरी तरह से अलग हो रहा है. इलीट वर्ग समाज से पूरी तरह अलग हो गया है. निम्न तबका उनके पास पहुंच नहीं पाता, ऐसे में दोनों के बीच संवादहीनता का माहौल पैदा हो गया है. दोनों के पास कोई भाषा ही नहीं बची है और जब आपको लिखना होगा तो दोनों को समझने की आवश्यकता होगी. इस तरह की परिस्थिति में आप कैसे भाषाई लेखन का भविष्य देख सकते हैं.
ऐसा देखने में आता है कि इलीट वर्ग के बच्चे समज से पूरी तरह कट से गये हैं. इसके पीछे प्रमुख वजह क्या है?
आपने सही कहा कि आज के धनी वर्ग के बच्चे पूरी तरह से समाज से कटे हुए हैं. कुछ दिनों पहले इसी वर्ग में से आनेवाली एक लड़की ने कहा कि अरुंधति तुम्हारी किताब द अलजेब्रा ऑफ इनफिनिट जस्टिस मैंने अपने भाई को पढ़ने को दिया तो उसने काफी आश्चर्य से आदिवासियों के बारे में बोला भारत में इस प्रकार के प्राणी भी रहते हैं. ऐसा नहीं है कि ये बच्चे खराब हैं या दिल से बुरे हैं. लेकिन समाज से कट से गये हैं. इसके पीछे मुझे कारण लगता है कि इनदिनों इस प्रकार की दुनिया बन रही है जिसमें गाड़ी, अखबार, कॉलेज, अस्पताल, शिक्षा आदि सभी कुछ इस वर्ग के लिए अलग है. जबकि पहले ऐसी बात नहीं थी. आज जो समाज में खाई बनी हुई है, यह किसी भी तरह से लाभकारी नहीं हो सकता. इसी वजह से ये इलीट वर्ग आज सिर्फ छीननेवाले बन गये हैं, इनसे आप किसी भी तरह की उम्मीद नहीं कर सकते हैं.
आप अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में जाकर वहां के सरकार की नीतियों के खिलाफ लिखती हैं. इस तरह से लिखने का साहस आप कैसे दिखा पायीं?
जब 11 सितंबरवाली घटना हुई तो मैंने इस घटना के विषय में काफी सोच-विचार किया. इसके बाद मैंने निर्णय लिया कि अगर मैं लेखिका हूं तो इसपर लिखूंगी. अगर नहीं लिख सकती तो जेल में जाकर बैठना मेरे लिया ज्यादा अच्छा होगा. यह निर्णय मैंने तुरंत लिया और लिख डाला. लेकिन भारत में काफी लल्लो-चप्पो करनेवाले लोग हैं, यहां बुश के खिलाफ लिखनेवाले बहुत कम लोग हैं, जबकि आपको अमेरिका में इनके खिलाफ बोलनेवाले काफी ज्यादा मिलेंगे. वियतनाम की लड़ाई के खिलाफ अमेरिका में जितना विरोध हुआ वह मिसाल है. सैनिकों ने अपने मेडल वापस कर दिये. क्या भारत में ऐसा संभव है? कश्मीर के मुद्दे पर सेना ने कभी कुछ नहीं बोला.
न्यायपालिका से आपके विरोध को लेकर काफी चर्चा हुई थी. क्या आपको लगता है कि देश में न्यायिक सक्रियता के दौर के बावजूद न्यायिक ढ़ांचा खासा जर्जर है?
मुझे लगता है कि प्रजातंत्र में सबसे खतरनाक संस्था ज्यूडिसियरी है, क्योंकि यह जिम्मेदारी से अपने को मुक्त किये हुए है. कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट ने सबको डरा दिया है. आप इसके खिलाफ कुछ नहीं कर सकते हैं, प्रेस भी कुछ नहीं कर सकता. अगर आप जजमेंट को देखें तो आपको पता चलेगा कि कोर्ट कितनी गैरजिम्मेदाराना ढंग से निर्णय देती है. प्रजातंत्र में ज्यूडिसियरी का इतना शक्तिशाली होना सही नहीं है.
जल, जंगल और जमीन के मुद्दे पर आप काफी काम करती हैं. जिस तरह से जंगल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दिया जा रहा है और आदिवासियों को उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है. इसका भविष्य आप किस रूप में देखती हैं?
एक किताब है जिसका नाम कोलैप्स है. इसमें एक ईस्टर आइलैंड के बारे में लिखा गया है जो प्रशांत महासागर में है. यहां काफी बड़े-बड़े पेड़ों को वहां रहने वाले लोग अपने रिवाज कि लिए काटा करते थे, जबकि उन्हें मालूम था कि तेज समुद्री हवाओं से ये बड़े पेड़ उन्हें बचाते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने एक-एक करके पेड़ों को काट डाला और अंत में समुद्री तूफान से वह आइलैंड नष्ट हो गया, कमोबेश भारत में भी यही स्थिति बनती जा रही है. सरकार शॉर्ट टर्म फायदा के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को माइनिंग करने की इजाजत दे रही है और ये कंपनियां अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही हैं, जिसका कुप्रभाव हमें कुछ वर्षों के बाद दिखायी देगा. मानव और जानवर में यही अंतर है कि जानवर भविष्य नहीं देखते हैं और मानव भविष्य के बारे में सोचते हैं. लेकिन यहां समस्या यह है कि सरकार ज्यादा लंबा भविष्य न देखकर कम समय का भविष्य देख रही है. यह सही है कि आज इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियां माइनिंग के बदले काफी धन दे रही हैं, लेकिन आज से पचास वर्ष बाद क्या स्थिति होगी? एक वेदांत नाम की कंपनी उड़ीसा में बॉक्साइट निकाल रही है जबकि बदले में वह वहां विकास करने की बात करती है. लेकिन जहां बॉक्साइट का भंडार है उससे उड़ीसावासियों को पानी मिलता है. अब आप ही बताइये उसे खत्म करने के बाद पानी की कमी होगी या नहीं. इसलिए सरकार थोड़े समय के लाभ के लिए लंबे समय वाले नुकसानवाली नीति पर चल रही है.
हथियार और बम के बूते दुनिया में दादागिरी दिखाने वाले राष्ट्रों के खिलाफ कोई विश्वजनमत क्यों नहीं तैयार हो पा रहा है?
पूंजीवादी दौर में सभी अपने-अपने फायदे में लगे हुए हैं. किसी के खिलाफ जाने पर फायदा नहीं की सोच पूरे राष्ट्र में व्याप्त् है. लेकिन यह शॉर्ट टर्म विजन है. वास्तव में इसका फायदा कुछ शक्तिशाली राष्ट्र उठा रहे हैं. हाल में ही अमेरिका और भारत के बीच हुए न्यूक्लियर डील को आप किस रूप में देखती हैं? भारत और अमेरिका के बीच हुए न्यूक्लियर डील को देखकर मुझे यह लगता है कि हमारे नेताओं ने अदूरदर्शिता दिखायी है. उन्हें यह नहीं मालूम कि जिन्होंने भी अमेरिका के साथ डील किया, उनकी क्या हालत हो गयी. अमेरिका अब एक ऐसी नीति बनायेगी जिससे वह पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रण में ले लेंगे. फिर कहेंगे एनरॉन का कॉट्रेक्ट साइन करो नहीं तो यह नहीं देंगे, वह नहीं देंगे. इस तरीके से अमेरिका भारत के ऊपर हावी हो जायेगा.
आतंकवाद आज पहले से ज्यादा खतरनाक मुद्दा बन गया है, इस चुनौती से निपटने के लिए दुनिया में जो भी पहल हो रही है, उसमें देशों की आपसी गुटबंदी ही ज्यादा दिखायी पड़ती है. आतंकवाद की चुनौती से निपटने का कारगर तरीका क्या हो सकता है?
आप इसे रोकने की जितनी ज्यादा कोशिश करेंगे यह उतना ही ज्यादा बढ़ेगा. इस्लामिक देशों का सारे तेल पर नियंत्रण कर रहे हैं. हर चीजों का निजीकरण किया जा रहा है. अगर आप किसी के संसाधन पर कब्जा करेंगे तो इसके खिलाफ विद्रोह तो फैलेगा ही. इससे निपटने के लिए सरकारों को अपने नीतियों को लेकर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है. भारत की ही स्थिति देखें तो छत्तीसगढ़ में 600 गांवों के लोगों को हटा कर एक पुलिस कैंप में डाल दिया जाता है. हजारों लोगों को घर से बेघर करने का असली मकसद क्या है? असली आतंकवादी वे ही हैं जो नंदीग्राम से लोगों को भगा रहे हैं, कलिंग नगर में गोली चला रहे हैं. जहां तक विश्वस्तर पर आतंकवाद की समस्या से निपटने के प्रयास की बात है, मुझे लगता है कि इसके लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं हो रहा है. सभी अपने-अपने लाभ की प्रकृति को देखते हुए आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करते हैं.
आपके विचारों में वामपंथ का प्रभाव ज्यादा दिखता है, इसकी वजह क्या है?
मेरा वामपंथ, पार्टीवाला वामपंथ नहीं है. सोचने वाले जो भी लोग होंगे, निश्चित रूप से उनके विचारों में वामपंथ का प्रभाव दिखायी देगा, यह बात कहने में मुझे कोई ऐतराज नहीं है. सरकार की नीतियों के बारे में सोचने पर कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं पागलखाने चली जाऊंगी.
आप गांधी जी से किस तरह से प्रभावित हैं?
कुछ चीजों में गांधी जी से काफी प्रभावित हूं, लेकिन गांधी जी के जाति के संबंध में जो विचार थे उनसे मैं असहमत हूं. मुझे गांधी के आर्थिक विचार काफी प्रासंगिक लगते हैं लेकिन सरकार ने उनके विचार को खेल बना दिया है. यह गांधी के विचारों का मखौल उड़ाना है. राजनीतिज्ञ इस समय गांधी के नाम का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए करते हैं. जहां फायदा होता है, वहां गांधी के नाम का दुरुपयोग करने से भी परहेज नहीं करते.
ऐसी चर्चा है कि इन दिनों मेधा जी से आपका कुछ वैचारिक मतभेद चल रहा है? इसके पीछे मूल वजह क्या है?
यह सरासर गलत बात है, मेरा मेधा जी से किसी प्रकार का अनबन नहीं है. वे एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जबकि मैं अपने आपको सोशल वर्कर नहीं मानती हूं क्योंकि मैं कष्ट उठा कर कोई काम नहीं कर सकती. मैं अपने आपको लेखिका मानती हूं. मैं किसी मुद्दे पर लिख सकती हूं. मुझमें नेतृत्व का गुण नहीं है. मैं नेता कभी नहीं बन सकती हूं.
आप अपने लेखन और रचनात्मक आंदोलन में हिस्सेदारी को लेकर आगामी सालों के लिए क्या प्रतिबद्धता मानती हैं?
मैं किसी को आगे रास्ता दिखाउंगी इसका मैं वचन नहीं दे सकती. मैं नियम बना कर कोई काम नहीं करती. वक्त के अनुसार निर्णय लेती हूं.

आज भी आपातकाल : हमने इस इश्क़ में क्या खोया क्या सीखा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/26/2007 12:32:00 AM

आज का दिन कोई ऐसा दिन नहीं है कि हम सिर्फ़ आपातकाल को याद करें, उन काले दिनों को याद करें जो हमारे देश के कथित गौरवशाली लोकतंत्र के ढांचे के भीतर से ही हम पर फ़ासीवादी आतंक के साथ छा गये थे. यह अलग से रेखांकित करनेवाली बात है कि आपातकाल असंवैधानिक नहीं था, उसके भीतर से निकले जुल्म और आतंक भी असंवैधानिक नहीं थे. इसका मतलब यह है कि वह सब संविधान सम्मत था. क्या हम उस आतंक और उन काले दिनों को संविधान सम्मत मानते हैं? हम कुछ भी मानें, सच्चाई तो यही है. यह संविधान उन काले दिनों की भरपूर संभावनाओं को लिये हुए अब भी मौजूद है?
और दूसरी बात है कि अब आपातकाल की देश में बिलकुल ज़रूरत नहीं रही. तंत्र ने वे तरीके विकसित कर लिये हैं कि उसे आपातकाल लागू करने की ज़रूरत ही नहीं रही. हम एक डीफ़ैक्टो इमरजेंसी से गुजर रहे हैं बिना घोषित तौर पर आपातकाल लागू किये आपातकाल लागू है. नौकरी-काम मांगने वालों पर लाठियां बरसायी जाती हैं (अभी नीतीश सरकार ने तीन दिन पहले यह शुभकार्य एक बार फिर दोहराया है) आप सरकारों की आलोचना नहीं कर सकते, जेल में डाल दिये जायेंगे या फिर नक्सली कह दिये जायेंगे. अगर विपक्षी दल में हैं तो आप पर पोटा लाद दिया जायेगा. एक पूरे राज्य को नफ़रत की भट्ठी में झोंक दिया जाता है- इस संविधान के रहते, संसद के रहते, देश के तथाकथित महान लोकतंत्र की हर एक गौरवशाली संस्था के रहते गुजरात में एक खास धर्म के लोगों के लिए घेट्टो बना दिये जाते हैं. अमीरों को ज़मीन नहीं देनेवाले किसान मार कर गड्ढों में फेंक दिये जाते हैं, आदिवासियों को 'शांतिपूर्ण सामूहिक शिकार' (सलवा जुडूम) के ज़रिये सबक सिखा दिया जाता है, फ़िल्मकारों-चित्रकारों पर हमले होते हैं, लेखक अपनी प्रस्थापनाओं के लिए अदालतों में घसीट लिये जाते हैं, पुस्तकालयों को जलाया जाता है और कहीं कुछ नहीं होता, एक युवती सात सालों से अनशन पर है, कोई उसकी नहीं सुनता, नर्मदा आंदोलन के हजारों लोग बार-बार दुत्कारे जा चुके हैं, हजारों के घर डुबा दिये गये हैं और उनका पुनर्वास अब भी बाकी है. और उनकी बातों को सामने लाने के लिए कोई लेखक अगर तैयार होता है तो इसे अदालतें अपना अपमान समझ कर उसे जेल तक भेज देती हैं. किसी को सजा नहीं होती. और फिर आप ब्लाग पर भी कुछ नहीं कह सकते-आपको नैतिकता और भाषा के स्वयंभू ठेकेदार लतिया कर बाहर कर देंगे अपने मंच से. क्या यह आपातकाल नहीं है? क्या हम वास्तव में एक आपातकाल से नहीं गुजर रहे? पेश है एक लेख और एक संस्मरण, प्रभात खबर से साभार.

अप्रत्यक्ष रूप में आज भी जारी है इमरजेंसी
कुलदीप नैयर, वरिष्ठ पत्रकार

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इमरजेंसी की घटना एक काला धब्बा थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने चुनाव में अपनी पराजय के फलस्वरूप इसे लागू किया था. करीब एक लाख लोगों की गिरफ्तारी की गयी. संविधान द्वारा प्रदत्त मूलाधिकारों को निलंबित कर दिया गया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी कुचलने का भरपूर प्रयास किया गया. वास्तव में यह एक तरह की तानाशाही थी, जिसके माध्यम से लोकतंत्र का गला घोंटा गया. लेकिन आज की परिस्थिति भी कुछ इससे अलग नहीं है. चेहरे बदल गये हैं और तरीका बदल गया है बाकी सब इमर्जेंसी के समय जैसा ही है. अब संसद में दो तिहाई बहुमत के कारण कानूनी इमरजेंसी से भले ही बच सकते हैं, लेकिन प्रवृत्ति के रूप में आज भी शेष वैसा ही है. आज बिना इमरजेंसी के ही इमरजेंसी जैसी परिस्थिति है. उस समय भी सरकार के अधीन काम करनेवाले अधिकारी ऊपर के दिशा-निर्देंशों के मुताबिक काम करते थे और आज भी कमोबेश स्थिति जस की तस है. सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग सत्ता में बैठे शासकों के हितों के अनुरूप ही किया जाता है. राज्यों में अधिकारी मुख्यमंत्री, मंत्री के इशारों पर काम करते हैं तो केंद्र में बैठे अधिकारियों की प्रवृत्ति भी प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और दूसरे सत्ता प्रतिष्ठानों के मन-मुताबिक काम करते हैं. इसका प्रमाण क्वात्रोच्ची मामले में सीबीआइ की भूमिका से साफ है. जिस तरह से क्वात्रोच्ची को इंटरनल नोटिंग की जानकारी पहले ही दे दी गयी उससे सीबीआइ की सत्तानिष्ठा का प्रमाण ही कहा जायेगा. आइबी और दूसरी खुफिया संस्थानों की भूमिका सत्ता में बैठे शासकों के हितों को पूरा करने में किया जाना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्य है. पुलिस का जुल्म आज भी यथावत जनता को कुचलने और दबाने में किया जाता है. विपक्षी राजनीतिक दलों के लोगों और दूसरे आलोचकों को आज भी तंग किया जाता है. सत्ताप्रतिष्ठान लोकतंत्र के मूल्यों को तोड़ने-मरोड़ने में जरा भी नैतिकता की परवाह शायद ही करते हैं.
राजनीतिक आजादी के इतने वर्षों में अभी तक हम इतिहास से कोई सबक सीखने को तैयार नहीं दिखते. इमरजेंसी की घटना को पूरा हुए 32 बरस हो गये लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा है. लोकतांत्रिक ढांचा भले ही बना हुआ है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है. संसद में अपराधी छवि के लोग चुन कर पहुंच रहे हैं. यहां तक कि हमारी न्यायपालिका भी स्वतंत्र नहीं है. न्यायपालिका में कार्य की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. उस पर राजनीतिज्ञों का दबाव होता है और फैसलों को अपने अनुसार मोड़ने के लिए सत्ता का प्रभाव उपयोग करते हैं. आज जरूरत है अच्छे नेताओं के सामने आने की जो इस प्रवृत्ति को रोक सके. नैतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों में पतन चिंता का विषय है.

लोकेश कुमार भारती से बातचीत पर आधारित

देखिए इंतेसाब (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)




एक काली अंधियारी रात की कहानी

मधुकर
बत्तीस साल पहले की बात है. मैं 20 साल का था. बीएससी कर रहा था. देश में इमरजेंसी लग चुकी थी. अपने कॉलेज के वनस्पतिशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो विश्वनाथ सिंह के यहां कुछ पढ़ने-समझने के अलावा क्रांतिकारी साथी पंकज जी का हाल-चाल लेने पहुंचा था, जो प्रो सिंह के बड़े पुत्र थे और कुछ दिन पहले गिरफ्तार हो गये थे. रात के करीब नौ बज रहे थे. तभी शहर-कोतवाल रामाधार सिंह सदल-बल पहुंचे. कुछ ही दिनों पूर्व प्रोफेसर साहब के यहां चोरी हुई थी. उस चोर को पहचानने के नाम पर उन्होंने मुझे थाना चलने को कहा. मैंने और प्रो साहब ने भी प्रतिकार किया. मैं न तो उस दिन सर के यहां था, न ही कोई कारण ऐसा था कि चोर को मैं पहचान सकूं. सर (अब स्वर्गीय) ने पूछा- आप कॉलेज कैंपस में बिना प्रिंसिपल के परमिशन के कैसे आ गये? लेकिन इमरजेंसी में तो तीन ही की चलती थी- कांग्रेस, सीपीआइ और पुलिस. उन्होंने कहा कि नहीं-नहीं मैं तो आप ही के काम से आया हूं. इनको जाने दीजिए न.
मैं उस समय लुंगी-गंजी में था. मैंने कहा, आप चलिए, मैं थाने आता हूं. लेकिन थानेदार थोड़ी देर में मैं ही छोड़ने की बात कहते हुए साथ चलने पर जोर देने लगे. तब मैं एमजेके कॉलेज, बेतिया से सटे दुर्गा मंदिर में रहा करता था. मैंने पूछा, कपड़े बदल लूं. थानेदार ने कहा हां-हां बदल लीजिए. थानेदार सदल-बल मंदिर तक गये, लेकिन गेट के बाहर ही रुक गये, बोले-आप कपड़ा बदल कर आइए, हम इंतजार कर रहे हैं. छोटे दारोगा ने कहा कि सर भाग जायेगा. थानेदार बोले, मैं जानता हूं न, भागेगा नहीं. मैं कपड़ा बदल कर थानेदार के साथ जीप पर बैठा. हम कोतवाली पहुंचे. मुझे बाहर रखे कुरसी-टेबुल के पास बिठा कर वहां तैनात सुरक्षागार्ड को सौंप दिया और कहा कि मैं राउंड लगा कर आता हूं, फिर आपको छोड़ दूंगा. मैं समझ रहा था कि मैं गिरफ्तार हो चुका हूं. मानसिक रूप से तैयार था. कुछ देर बैठने के बाद मैंने लघुशंका जाने की बात सिपाही से कही. वह बोला कि बैठो चुपचाप, नहीं तो गोली मार देंगे. जितनी बार मैं समझाने की कोशिश करता, वह गोली मारने की बात दुहराता. मैंने तब आजिज आकर कहा, मैं यहीं लघुशंका करता हूं. तब वह मेरी पीठ में राइफल सटा कर मुझे समीप के नाले के पास ले गया. मैं लौट कर इंतजार करने लगा.
थानेदार करीब दो बजे रात को वापस लौटे. पूछा कहां सोना पसंद करेंगे, घर में या हाजत में. मैंने कहा, आप तो मुझे चोर पहचनवाने के लिए लाये थे? वादा किया था कि घर छोड़ देंगे. थानेदार ने कहा- चोर तो पकड़ा गया है. चलिए मिलवाते हैं. हाजत खोला गया. चोर झपकी ले रहा था. जगाने और पूछने पर उसने कहा कि उसी ने प्रोफेसर साहब के यहां चोरी की थी. इसके बाद थानेदार ने फिर मेरे सोने की बाबत पूछा. मैंने अनजान बनते हुए पूछा- क्या आपने मुझे गिरफ्तार कर लिया है? थानेदार बोले- हां. मैंने पूछा-किस दफा में, क्यों? थानेदार ने कहा- मीसा में. बहुत आंदोलन और क्रांति कर लिये, अब कुछ दिन जेल में आराम कीजिए. फिर मुझे उसी चोर के साथ उसी हाजत में बंद कर दिया. दूसरे दिन उसी चोर के साथ रिक्शे में बैठा कर जेल भेज दिया. कहने के लिए हमें अदालत भी ले जाया गया, लेकिन मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया. सीधे जेल भेज दिया गया, जहां कई काली अंधियारी रातें गुजारनी पड़ीं. एक खूबसूरत-बेहतरीन सुबह के इंतजार में. संपूर्ण क्रांति होगी. सबको सम्मानजनक जिंदगी नसीब होगी. इस उम्मीद में कि रात जितनी भी संगीन होगी, सुबह उतनी ही रंगीन होगी. जेल में कई क्रांतिकारी मित्रों से भेंट हुई. सबने जोरदार स्वागत किया. जेल वैचारिक बहसों व अध्ययन का केंद्र बन गया. बहुत कुछ पढ़ा, बहुत कुछ सीखा. जिंदगी को बहुत करीब से देखा. वहीं नक्सली मित्रों से मुलाकात हुई, बात हुई. उनके प्रति एक समझ बनी. वहीं गैरों से अपनापन और दोस्ती का जो गुर सीखा, वह आज भी अमूल्य धरोहर है. जेल में भी बाहर की तरह ही इमरजेंसी थी, वहां भी यही कहता रहा `हिम्मत से सच कहो, तो बुरा मानते हैं लोग; रो-रो कर बात करने की आदत नहीं रही.' जेल तो गया था अकेले, लेकिन `मैं तो चला था अकेला ही जानिबे मंजिल, लोग मिलते गये, कारवां बनता गया.' बीस वर्ष की उम्र में नेताजी बन गया. बड़े से लेकर बूढ़ों तक का भाई और भैया बन गया.

नक्सली हिंसा : क्या यह और बढे़गी

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/25/2007 01:30:00 AM

और इसकी वजह क्या है?

माफ़ करें अगर आपने इस पोस्ट को कल पढ़ लिया है. इसे दोबारा पोस्ट करने का कारण यह है कि इसके शीर्षक के कारण लगता है इस पर किसी का ध्यान ही नहीं गया. इसलिए इसे दोबारा पोस्ट किया जा रहा है.

इधर पूरे देश में नक्सलवाद और बढ़ती हिंसा पर बहस का एक नया दौर शुरू हुआ है. कवि आलोकधन्वा कहते हैं कि किसी भी समाज में हिंसा इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसके लोग (आम आदमी) कितनी हिंसा चाहते हैं. यह हमेशा शासक वर्ग पर निर्भर करता है कि समाज में कितनी हिंसा होगी. हाशिया पर इस बहस की शुरूआत करते हुए, प्रस्तुत है इस सिलसिले में रायपुर से छपनेवाले समाचार पत्र देशबंधु की वेबसाइट पर प्रकाशित आलेख, साभार. आप भी इसमें हिस्सा लें.

उलालों के सौदागर

प्रभाकर चौबे
वे लोग जो इस लोकतंत्र को कायम रखने के लिए समर्थित हैं और यथास्थितिवादी हैं, वे तो हिंसक घटनाओं की निंदा करते ही हैं, लेकिन वे भी जो क्रांति के दर्शन और व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के विचार को मानते हैं, वे भी ऐसी हिंसक घटनाओं का न केवल समर्थन नहीं करते हैं, न केवल इस पर विश्वास नहीं करते वरन इसकी निंदा करते हैं। क्रांति पर विश्वास करने वाले, उस दिशा में जनचेतना फैलाने ये काम में लगे जन यह जानते हैं कि जनता के एक साथ उठ खड़े होने पर ही क्रांति होती है। जनता का समर्थन जरूरी है। नेपाल में अंतत: लोकतांत्रिक दलों ने व्यवस्था में पूर्ण परिवर्तन के लिए माओवादियों का समर्थन लिया और जब जनता लामबंद हुई तो ऐसा परिवर्तन आया कि वहां राजसत्ता खत्म कर दी गई। वहां लोकतंत्र आया। वहां हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर धर्म निरपेक्षता सरकार को स्वीकार करना पड़ा। राजा के अधिकार छिने। फौज रखने का उसका अधिकार छीन लिया गया। इसलिए क्रांति में हिंसा के लिए स्थान नहीं है। हर नक्सली हिंसा के बाद जो लोग आवाज लगाते हैं कि क्रांति की बात करने वाले बुध्दिजीवी और मानवाधिकार के लिए आवाज उठाने वाले एक्टिविस्ट अब कहां हैं, वे क्रांति के दर्शन को जनता से ओझल करने का काम करते हैं। परिवर्तन पर और बेहतर जिंदगी तथा इस लोकतंत्र में मानवीय गरिमा की बात करने वालों ने, तथा उसके लिए संघर्ष करने वालों ने ऐसी हिंसक घटनाओं की हमेशा निंदा की है, लेकिन वे तार्किक तरीके से यह सवाल भी उठाते हैं कि इस स्थिति के उपजने के कारणों की भी पड़ताल की जाए। लेकिन यथास्थितिवादी पड़ताल की जरूरत से हमेशा बचते हैं। कार्य-कारण की समीक्षा और पड़ताल के लिए पूर्वाग्रहों से मुक्त होना होता है और परिवर्तन के लिए अपनी सुविधाओं का बलिदान करना होता है। इनके छिनने का 'भय' यथास्थितिवादियों को कुतर्क व गलत कारणों को गढ़ने का तरीका सिखाता रहता है। किसी भी बुध्दिजीवी या लेखक ने नक्सली हिंसा अथवा सांप्रदायिकता का समर्थन नहीं किया। लेकिन यह जरूर कहते रहे हैं, कहते हैं कि इसके पैदा होने के कारण इसी व्यवस्था में हैं। इस व्यवस्था की छानबीन की जाए। खंगाला जाए।

व्यवस्था के पास विधायिका है जो कानून बनाती है, कार्यपालिका है, न्याय है, न्यायविदों और कानूनविदों की लंबी कतार है, फौज है, पुलिस है और व्यवस्था से लाभ उठाने वाले दलालों का ताकतवर समूह है। मीडिया उसका है। जनता की ओर से और विशेषकर आदिवासियों के द्वारा बार-बार यह पूछा जाता रहा है कि आजादी के बाद से ही आदिवासियों के विकास के लिए, उनकी उन्नति के लिए करोड़ों रुपए आए, दिए गए, फिर भी विकास क्यों नहीं हुआ। कहां बिला गए करोड़ों रुपए। किनके पेट में समा गया। स्व. राजीव गांधी का यह कथन न भी दोहराएं कि विकास के लिए भेजे गए एक रुपए में से नीचे तक केवल पंद्रह पैसे पहुंचते हैं। इस कथन को बार-बार दोहराया जाता है। लेकिन जनता इसे महसूस करती रही है।
बस्तर में आदिवासियों के विकास के लिए इन साठ सालों में जो धन आया उसके पाई-पाई का हिसाब उन्हें दिया जाना चाहिए। वहां किनका विकास हुआ। बड़े-बड़े जंगल चोरों की निकल पड़ी। आदिवासियों के बच्चों के लिए सहायता के रूप में आया दलिया, दूध, पौष्टिक अहार खुले बाजार में बिकते रहा। आदिवासियों के बच्चों के हास्टलों के लिए खरीदे गए कंबल, गद्दे-तकिया, बर्तनों में कितनी दलाली खाई गई। उनकी छात्रवृत्ति की कितनी राशि गड़प ली गई। सड़कों, पुलों के निर्माण में वास्तविक खर्च कितना हुआ? सड़कें बनी नहीं, कागजों में बनी। स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल कर रखा है। आज भी मौसमी बीमारी से हजारों आदिवासी पीड़ित होते हैं और सैकड़ों काल के ग्रास बनते हैं। मलेरिया, डायरिया, पेचिस तक की दवाएं उपलब्ध नहीं। शुध्द पेयजल देने की योजना का कितना धन बिचौलियों ने गटक लिया। इन सबका हिसाब कहां है। भूमि सुधार, जमीन का बटवारा क्यों नहीं लागू हुआ।

शिक्षा का और संपूर्ण साक्षरता का क्या हाल कर दिया है। दूर जाने की जरूरत नहीं, अभी दो साल पहले राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत साक्षरता अभियान में खरीदी में कितने घपले किए गए- दस रुपए का मटका और बिल पचास रुपए का। दस रुपए के गिलास की कीमत चालीस रुपए लिखी गई। मग्गा, मटका, बाल्टी आदि उपकरण खरीदी में कितना भ्रष्टाचार किया गया, यह अखबारों में छपा। राशन में भ्रष्टाचार। कनकी कांड। धान खरीदी में भ्रष्टाचार। डामर घोटाला कांड। वाहन खरीदी में भ्रष्टाचार। कालातीत दवाइयां खरीदने के मामले। शिक्षाकर्मी भर्ती में लेनदेन के आरोप। कम गुणवत्ता की सड़कों का निर्माण। और तो और अदरक की खेती के नाम पर किसानों के साथ लूट और धोखा- कितना गिनाएं। कहा जाता है कि इनकी जांच की जाती है। दोषियों को नहीं बख्शा जाता है। ऐसे वाक्य पानी पड़ी धान की तरह सड़ गए, किसी काम के नहीं। और जांच कितने दिन चलती है। चारा घोटाला कब हुआ। कब फैसला होगा। लूट, हत्या, हिंसा के आरोपी सांसद और विधायक बन रहे हैं- सालों मुकदमा चलता है।
सेज के नाम पर किसानों की जमीन ली जा रही है। सब्जी, फल, अनाज में बड़ी कंपनियां आ गई हैं- छोटे कारोबारियों का रोजगार छिन रहा है। रेलवे स्टेशनों में ठेले लगाकर माल बेचने वालों को बेदखल कर दिया गया, भगा दिया गया। यहां बड़े ठेकेदार काबिज करा दिए गए। छोटों व गरीबों की रोजी-रोटी छीनने का षड़यंत्र चल रहा है और यह सब विकास के नाम पर चल रहा है। कहां जाएंगे ये छोटे-मोटे काम-धंधा करने वाले। देश की एक अरब की आबादी का हर व्यक्ति क्या मॉल, मल्टीप्लेक्स, फाईवस्टार और इंटरनेट में नौकरी-रोजगार पा सकता है। जो इसके बाहर हैं उनकी रोटी छीनने का कुत्सित कार्य बंद क्यों नहीं किया जाता। देश में बेरोजगारों की भीड़ लग रही है- वे काम मांग रहे हैं। लेकिन ऐसी आर्थिक उदारीकरण की नीति चलाई जा रही है कि वे जो कामकर रहे हैं, वह उससे भी वे वंचित हो रहे हैं। दिन-रात भजनों, प्रवचनों, उत्सवों का तांता लगाकर व्यवस्था समझती है कि युवक अपना दुखड़ा भूल जाएंगे। लेकिन आज युवा वर्ग भारी प्रतिस्पध्र्दा में है। अनिश्चितता के कारण उपजा रोष भी है और जो वंचित हैं, वे गुस्से में हैं। आर्थिक असमानता, विषमता के कारण सामाजिक संगठन तार-तार हो रहा है। संवेदनाएं, सद्भाव, विवेक के लिए अवसर ही नहीं बच रहा। इनमें भी आदिवासियों की स्थिति और भी खराब है। उनकी आर्थिक दुर्दशा के लिए जवाबदार जो हैं, उन्हें चिन्हित करने से ऐसी संस्थाएं परहेज करती हैं।

आदिवासियों को गरिमामय बराबरी का दर्जा देने के काम इतना पिछड़ गया है कि इनमें असंतोष फैला है। आदिवासी या कोई भी समाज कोई कर्मकांड न जाने तो कोई नुकसान नहीं हो जाता, लेकिन विषमता से और गैरबराबरी से भरे समाज के बीच वह खुद को घोर उपेक्षित पाता है और ऐसी समझ विद्रोह को जन्म देती है। इसका इलाज है समतावादी समाज-आर्थिक रास्ते पर चलने सबको बराबरी का हक। असंतोष को दूर नहीं किया गया तो अराजकता फैलेगी ही। आजादी के लड़ाई के दौरान सुभद्राकुमारी चौहान ने ''झांसी की रानी'' कविता लिखी। उसकी एक पंक्ति है ''बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी''

आजादी से पहले भारत बूढ़ा था। आजादी के बाद जवान हो गया है-उसका अपना संविधान है। उसका अपना लोकतंत्र है। उसमें जोश है। नई चेतना जागी है। और अब वह बंधुवा बनकर नहीं रहेगा। व्यवस्था के केंद्र में और उसके इर्द-गिर्द घेरा डाले बैठे-खड़े-लेटे-दंडवत होते लोग इस पर बात नहीं करते। इसलिए उन्हें दुरुस्त करने देश में जगह-जगह कई तरीके से कई रूपों में प्रतिकार हो रहा है। वे समझें कि भारत आजादी के बाद जवान हुआ है। और अब लूट-खसोट को कैसे सहे जबकि इसने औपनिवेशिक सत्ता को खदेड़ा। व्यवस्था के कर्ताधर्ता समझें। लेकिन कैसे समझें, कैसे समझाया जाए।

मुक्तिबोध कहते हैं-

जनता को ढोर समझ
ढोरों की पीठ भरे
घावों में चोंच मगर
रक्त-भोज, मांस-भोज
करते हुए गर्दन मटकाते दर्प-भर कौंओं-सा
भूखी अस्ति-पंजर शेष
नित्य मार खाती-सी
रंभाती हुई अकुलाती दर्द भरी
दीन मलिन गौओं-सा
व्यवस्था में बैठे उजाले के सौदागरों ने विकास का सारा उजाला गोदामों में डम्प कर रखा है और अपनों को ही उजाला बेच रहे हैं।

आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा है.

बाजार के दौर में रिश्ते

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/23/2007 12:49:00 AM

कुछ समय पहले पटना में एक खबर छपी-संपत्ति विवाद के मामले में एक मां ने अपने बेटे की हत्या कर दी. मित्र प्रमोद रंजन ने इस घटना को अधार बना कर आज के रिश्तों और संपत्ति संबंधों की पड़ताल करने की कोशिश की. यह आलेख जनविकल्प में छप चुका है. आप बतायें कि हमें अपने समय के रिश्तों को क्या फिर से परिभाषित करने की ज़रूरत है या फिर हम इन खतरों को कैसे लें?

प्रमोद रंजन
एक भारतीय मां ने संपत्ति के लिए जवान पुत़्र की हत्या कर दी !! पिछले दिनों पटना से निकली इस खबर को तर्कसंगत बनाने के लिए मीडिया को मां के अवैध प्रेम संबंध की तलाश करनी होगी या फिर पुत्र के दुश्चरित्र होने की उपकथा ढूंढनी होगी. ऐसा संभव न हो सका तो अखबार और टीवी चैनल संपत्ति विवाद की इस कथा को ज्यादा नहीं बेच पाएंगे. कारण? भारत में यौन शुचिता और चरित्र समानार्थी हैं. यहां किसी को बेईमान होने, घूसखोर होने, शोषक होने, जातिवादी होने, ब्लैकमार्केटियर होने, असमानता का व्यवहार करने से या फिर हत्या करने पर भी दुष्चरित्र नहीं कहा जाता. अगर हत्यारी माता 'सचरित्र` पायी जाती है तो भारतीय मीडिया के पास भी इसे अपवाद मान कर मौन हो जाने के अलावा कोई चारा नहीं. लेकिन क्या यह वास्तव में अपवाद मात्र है?

भारतीय समाज मौजूदा दशक में तेजी से बदल रहा है. हालांकि यह प्रक्रिया इससे काफी पहल आरंभ हो गयी थी, लेकिन सुविधा के लिए इसे 1990 के आसपास से माना जाता है. यह बदलाव प्राथमिक रूप से आर्थिक रहे हैं. आर्थिक उछाल और शिक्षा दर की बढ़ोतरी ने एक ऐसे तबके को निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग में ला दिया जिनके लिए इंदिरा गांधी के समय चलाए गए बड़े नोटों को देखना भी सपना रहा था. लेकिन सामंतवाद से पूंजीवाद की ओर बढ़े कदमों ने भारतीय समाज की संलिष्ट संरचना में बाहरी तौर पर ही हस्तक्षेप किया. जातिगत वर्चस्व के समीकरण बदले, वंचित तबकों की जुबान पर भी सत्ता स्वाद की कुछ बूंदें टपकीं. किन्तु इससे समाजिक संरचना की मूल ईकाई परिवार अप्रभावित ही रहा. पूंजीवाद जैसे बाहरी उपकरण के लिए यहां तक पहुंच पाना संभव भी नहीं था. (पूंजीवाद की ही तरह कम्यूनिज्म़ भी समाज की आंतरिक संरचना को प्रभावित करने में विफल रहता है, रूस के कम्यूनिस्ट काल में चर्च की लोकप्रियता इसका उदाहरण है) वास्तव में भारतीय संदर्भ में जिस 1990 को हम विभाजक रेखा मानते हैं वह पूंजीवाद के आगमन का नहीं बल्कि भूमंडलीकरण के कारण पूंजीवाद के तेज होने तथा उपभोक्तावाद के आगमन का काल है.

यही उपभोक्तावाद अब भारतीय परिवारों के सामंती दरवाजों पर अपने जूतों से ठोकर मार रहा है. मूल्य दरक रहे हैं और अजीबो-गरीब लगनेवाली घटनाएं घट रही हैं. 'सचरित्र` हत्यारिन मां या 'दु चरित्र` मटुकनाथों की अपवाद लगनेवाली घटनाएं इस विध्वंस के आरंभिक संकेत हैं. उपभोक्तावाद परिवार की सामंती संरचना पर मर्मांतक प्रहार कर रहा है. बेशक, यह ऐतिहासिक कार्य है. लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को अपवाद मानकर उपेक्षित कर देना या इतिहास को घटते हुए महज देखते रहना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती. एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में कानूनों के माध्यम से इसके दु प्रभावों को नियंत्रित किए जाने की कोशिश की जानी चाहिए.

मध्यवर्ग में माता-पिता और संतान के पारंपरिक संबंध त्रासद स्थिति में पहुंचने लगे हैं. शहरों का तो निम्नमध्यवर्ग भी इससे अछूता नहीं रहा है. पूंजीवाद के आगमन के कारण सामंती जकड़न से आजाद हुई जातियों की पहली पीढ़ी के लोग भी बड़ी संख्या में इस विध्वंस के शिकार हुए हैं. बल्कि थोड़ी सी समृद्ध की पहली बरसात के साथ-साथ टेलीविजन के पर्दे से आती उद्दाम लालसाओं की आंधियों को रोक पाने की अक्षमता ने उनके साथ ही ज्यादा तोड़-फोड़ की है. एक स्थूल उदाहरण से इसे समझा जा सकता है. चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी के एकलौते बेटे ने लगभग दो वर्ष पहले अपने दाहिने हाथ पर किरोसिन छिड़क कर आग लगा ली थी. जब मैं उससे मिला तो उसने बताया कि उसकी मां ने उस पर पीटने का आरोप लगाया था. मामला कुछ इस तरह था कि उस लड़के ने मां से पचास रुपए मांगे थे. नहीं देने पर माता से उसकी झड़प हुई. लेकिन उसका कहना था कि उसने मां पर हाथ नहीं उठाया. कि वह ऐसा सोच भी नहीं सकता. हां, इतना जरूर था कि वह मां को उस पैसे के खर्च का हिसाब नहीं बताना चाहता था. इस पर उसका बाप अपना सिर मुंडा कर मुहल्ले (पटना सिटी) भर में यह कहता घूमता रहा कि मेरा बेटा मर गया. लड़के ने क्षोभ से भर कर उस हाथ को ही पूरी तरह नष्ट कर देना चाहा था जिस हाथ पर माता को पीटने का आरोप था. उसने बताया था कि उसे पैसे पत्नी के अंतःवस्त्र और गर्भनिरोधक उपायों के लिए चाहिए थे. मां को कैसे बताता? मैंने कहा, तुम खुद कुछ करते क्यों नहीं? तो उसने बताया था कि दहेज से बचे 30 हजार रुपयों से मुर्गी पालन का धंघा अपने आधा कट्ठा के मकान की छत पर आरंभ किया था. लेकिन चल नहीं सका. दहेज वाले पैसे भी पिता ने बहुत हुज्जत करने पर दिए थे. अब वे कुछ भी न देंगे. कोई पैतृक संपत्ति है नहीं. पटना शहर में बना दो कमरों का वह मकान मां के नाम है. नौकरी मिलती नहीं. मजदूरी मैं कर नहीं सकता.

जाहिर है उद्दाम लालसाओं की गिरफ्त दोनों ओर थी. कम साधन के बावजूद अधिकाधिक उपभोग की प्रवृत्ति माता-पिता में थी तो पुत्र भी अपनी आर्थिक वास्तविकता को समझने को तैयार न था. पिछले सप्ताह वह सुदर्शन युवक मुझे विक्षिप्तावस्था में मिला.

यदि किसी में शहरी बेरोजगार लड़कों से मिलने का माद्दा हो तो उसे अधिकांश जगह कमोबेश ऐसी ही कहानियां मिलेंगी. मेरी जानकारी में कम-ज्यादा ऐसी पच्चासों घटनाएं हैं. और मुझे नहीं लगता कि राजनीति, साहित्य अथवा किसी अन्य प्रकार की अकादमिक दुनिया के प्रतिभाशाली युवाओं के रूझानों के आधार पर समाज की मति-गति का आकलन करना किसी भी दृष्टि से उचित निष्कर्ष की ओर ले जाएगा. अपवाद वे प्रतिभाशाली युवा हैं, बहुसंख्या इन सामान्य लोगों की है, इन्हें ही सामाजिक प्रवृति के रूप में समझा जा सकता है. इस बहुसंख्या में अर्ध-रोजगार भी शामिल हैं. तकनीक ने श्रम को बेहद सस्ता कर दिया है. महंगे से महंगे शहरों में भी 1 हजार से 3 हजार तक की नौकरी करने वाले युवा हर जगह अंटे पड़े हैं. कंम्प्यूटर आपरेटर, रिसेप्निस्ट, नर्सें, सेल्स मैन, कूरियर पहुंचाने वाले, सूपरवाइजर नुमा लोग और अन्य नई सेवाओं में लगे इन युवाओं को भविष्य में भी अच्छा वेतन मिलने की कोई उम्मीद नहीं है. सेवा प्रदाता क्षेत्रों में श्रम लगातार और सस्ता होता जा रहा है. मीडिया में काम करते हुए मैंने देखा कि शिमला जैसे मंहगे शहर में 70 फीसदी पत्रकार 1 से 1.5 हजार रूपए वेतन पा रहे थे. लगभग 20 फीसदी जो उत्तरांचल, बिहार और उत्तरप्रदेश से पलायन कर वहां पहुंचे थे, हाड़-तोड़ मेहनत कर 3 से 4 हजार तक पाते हुए सपरिवार गुजारा कर रहे थे. हिन्दी के जिस 'इंडियाज नं वन डेली` में मैं काम कर रहा था उसमें अनुसेवक को वर्ष 2001 में 2500 हजार रुपया वेतन दिया जाता था. उस अनुसेवक ने काम छोड़ा तो नए को 1800 पर रखा गया. 2005 आते-आते दो और अनुसेवक बदले. जब मैं वहां पहुंचा तो नया अनुसेवक 800 रुपए पर बहाल हुआ था, वह भी 'इंटरव्यू` के बाद. शायद विश्वास न आए पर हिन्दी समाचार पत्रों में तो ऐसी स्थिति हो गई है कि मुफ्त काम करने वाले पत्रकारों को भी 'बर्खास्त` किया जाता है. यानी श्रम का मूल्य तो दूर, काम करने का अवसर देना भी अब एक अनुकंपा है. प्राय: सभी संस्थानों में ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनसे काम सीखने के नाम पर 2-2 वर्ष तक मुफ्त काम करवाया जाता है. कथित रूप से काम सीखने तक टिके रहे तो वही 800-1000 रुपए मासिक वेतन.

इस तरह के अर्धरोजगार लोग भी पैतृक संपत्ति पर निर्भर रहने के लिए अभिशप्त हैं. लेकिन पहली बार समृद्धि का स्वाद चखने वाले परिवारों में पैतिक संपत्ति नाम की कोई चीज प्राय: नहीं होती. वंचित समुदायों से आनेवाले इन लोगों ने अपनी शिक्षा से कुछ हासिल कर शहरों में एकल परिवार बसाया होता है. उत्तराधिकार कानूनों (भारतीय उत्तदाधिकार अधिनियम तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम) के तहत उनकी संतानों को महज खेती योग्य भूमि में हिस्सा मिल सकता है. जबकि इनके पास देहात में जो थोड़ी बहुत जमीन होती है, वह अक्सर पहले ही बिक चुकी होती है. अगर कुछ बची भी रह गई तो शहर के नगदी जीवन के सामने उनका कोई मोल नहीं. अगर जायज-नाजायज कुछ कमाया-बचाया भी तो उपभोग की असीम इच्छाओं के सामने खेती योग्य जमीन जोड़ने की फिक्र किसे? यह भी एक कारण है कि जहां शहरों में जमीन के भाव आसमान छू रहे हैं वहीं गांवों में आज खेत मिट्टी के भाव बिक रहे हैं. भारतीय गांवों से पैसों का शहरों की ओर आना अनवरत जारी है, शहरों से गांवों की ओर यह प्रवाह ठप है. उपभोक्तावाद ने बाहरी चमक-दमक के साथ-साथ देह और स्वास्थ तक को उपभोग के दायरे में ला दिया है. आखिर उपभोग तो इस नश्वर देह को ही करना है. और यह तभी संभव हो सकता है जब आप अधिकाधिक स्वस्थ, चिर युवा रहें. ब्यूटी पार्लर, जिम से लेकर बाबा रामदेव जैसों के धंधे इसी कारण फल-फूल रहे हैं. इन नव स्वास्थ केंद्रों में जाने वाला शायद ही कोई यह सोचता हो कि, स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिक का वास होता है. विज्ञापनी दुनिया उन्हें लगातार बताती रहती है कि 'स्वस्थ शरीर में मंहगे आभूषण फबते हैं.` बहरहाल, अनेक कारणों से भारतीयों की औसत आयु, उनका यौवन काल बढ़ा है. निश्चित रूप से इस औसत के बढ़ने में नव मध्यम वर्ग के ही बेहतर होते स्वास्थ का योगदान रहा है. अच्छे स्वास्थ ने उनकी लालसाओं की अवधि को लंबा कर दिया है. उपभोग के उत्कर्ष को छूते हुए उन्हें बुढ़ापा कभी न आने वाले दु:स्वप्न की तरह लगता है, तो आश्चर्य नहीं. बुढ़ापे का पारंपरिक सहारा मानी जाती रही संतान भी उन्हें अपने तात्कालिक सुखों में कटौती करती प्रतीत होती है. भारतीय उत्तराधिकार विधान भी उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित करता है कि उनकी पूरी संपत्ति (स्वयं द्वारा अर्जित तथा संयुक्त परिवार से मिला हिस्सा भी) सिर्फ उनके उपभोग के लिए है. अपनी संतान (पुत्री अथवा पूत्र) के प्रति उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं है.

भूमंडलीकरण की तरह उपभोक्तावाद भी एक यथार्थ है. इसे किसी धार्मिक नैतिकता या भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर रोका नहीं जा सकता. न इसे अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान आदि में इस्लामिक तालिबान रोक पाए न ही भारत के हिन्दू तालिबानों में यह कुव्वत है. अक्सर मुगालते में रहनेवाले कम्यूनिस्ट मित्र चाहें तो चीन घूम कर आ सकते हैं. वहां के शहरों में महज कुछ वर्षों में यूरोपिय शहरों से कहीं अधिक आलीशान मॉल, शापिंग काम्पलेक्सों ने आकार ले लिया है. जैसे समाजवाद के पूर्व पूंजीवाद का आना प्रक्रिया का हिस्सा है उसी तरह उपभोक्तावाद परिवार के आंतरिक सामंतवाद की समाप्ति में अपना ऐतिहासिक अवदान देने को उद्धत है. वस्तुत: यह कुछ और नहीं परिवार का आंतरिक 'पूंजीवाद` ही है. इसलिए जनतांत्रिक परिवार (अथवा कहें समतामूलक) के बड़े स्वप्न के संदर्भ में उपभोक्तावाद पर बात करते हुए यह आवश्यक है कि हम सिर्फ इसकी लानत-मानत करने की बजाय इसके गुण-दोषों को तटस्थता से समझें. इसके दुष्प्रभावों को कम करने के लिए देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जो भी कानून संभव हो बनाएं. यह किसी नैतिकता के रोके नहीं रूकनेवाला. इसके जिम्मे एक नया समाजशास्त्र गढ़ने की जिम्मेवारी है. इसने जहां नये मध्यवर्ग में अभिभावक और संतान के संबंधों को कटुतापूर्ण बना दिया है वहीं इस तबके की महिलाओं के लिए आर्थिक मुक्ति के द्वार भी खोले हैं. यह छोटी उपलब्धि नहीं है. यौन शुचिता संबंधी दुराग्रहों की समाप्ति की राह भी आने वाले समय में यहां से निकलेगी. दूसरी ओर, यह भी देखने की बात है कि अभिजात तबके में इसका असर कुछ अलग तरह का है. वहां इसने अभिभावक-संतान के संबंधों को मित्रतापूर्ण बनाया है. स्त्री़ कौमार्य के बंधनों को ढीला किया है. तात्कालिक उदाहरण के तौर पर अमिताभ-जया और अभिषेक बच्चन के संबंधों तथा सलमान, विवेक ओबराय और ऐश्वर्या राय के त्रिकोणात्मक प्रेम संबधों के बाद अभिषेक बच्चन से उसकी शादी को समझा जा सकता है. पूंजीपति परिवारों के बदलावों को पेज थ्री पार्टियों का निरंतर अध्ययन करते हुए भी देखा जा सकता है. वे अब तोंदियल सेठ-सेठानियां नहीं रहे हैं. अंधानुकरण की नकारात्मक प्रवृति पर पलने वाला उपभोक्तावाद भूल वश ही सही, अनेक सकारात्मक प्रवृतियों को भी मध्यमवर्ग तक पहुंचा रहा है, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए.

मुक्ति के विचार विजय तक जिंदा रहेंगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/21/2007 11:17:00 PM

योद्धा जीतने का इरादा रखते हैं, प्रतिद्वंद्वी को मुहंतोड़ जवाब देने के लिए अंतिम समय तक डटे रहते हैं न कि घणित षड्यंत्रकारियों की तरह सामनेवाले के हट जाने, भाग जाने, मारे जाने की बाट जोहते हैं. इससे भी न हुआ तो वे घटियापा पर उतर आते हैं और प्रतिद्वंद्वी को मार देने के लिए सुपारी तक देते हैं. अमेरिका का इतिहास ऐसे ही घृणित शासकों का इतिहास रहा है. फ़िदेल आज भी, मुक्ति और नयी दुनिया का सपना देखने वाली कौमों के लिए रोशनी की मीनार और उम्मीद की तरह हैं. पेश है हाल ही में लिखा गया उनका लेख जो भारत में द हिंदू में छपा था.इसे यहां देशबंधु की वेबसाइट से साभार दिया जा रहा है.

विचारों की हत्या नहीं की जा सकती

फिदेल कास्रो

पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने अपनी क्यूबा नीति के बारे में किसी मेहमान से कहा था कि 'वे फिदेल कास्त्रो के मरने का रास्ता देख रहे हैं।' कास्त्रो जो कि अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं, ने इस लेख द्वारा न केवल राष्ट्रपति बुश को करारा जवाब ही दिया है बल्कि उन्होंने पुन: एक बार यह दर्शा दिया है कि उनमें वह क्या है जो आज भी उन्हें अधिकांश विश्व का सर्वमान्य नेता व प्रणेता मानता है। इस लेख में कास्त्रों की सामाजिक प्रतिबध्दता की अभिव्यक्ति भी चरम पर है।
कुछ दिनों पूर्व एस्टयूट शृंखला में निर्मित हो रही तीन पनडुब्बियों पर हो रहे खर्च का विश्लेषण करते हुए मैंने कहा था, 'अगर हम अमेरिका में चिकित्सा शिक्षा पर किए जा रहे खर्च से एक तिहाई ही प्रशिक्षण पर खर्च करें तो इस धन के माध्यम से 75000 चिकित्सकों को प्रशिक्षण दिया जा सकता है। जो कि 15 करोड़ व्यक्तियों का उपचार करने में समर्थ होंगे। मैं विस्मयपूर्वक यह सोचने को बाध्य हूं कि अमेरिका ने ईराक पर मात्र एक वर्ष अपना कब्जा बनाए रखने हेतु बुश के हाथ में जो 100 अरब डॉलर दिए हैं उससे कितने चिकित्सक शिक्षा ग्रहण कर सकते थे? उत्तर है, 9 लाख 99 हजार चिकित्सक, जो कि उन दो अरब व्यक्तियों की देखरेख कर सकते थे जिन्हें आज तक किसी भी प्रकार की आधुनिक चिकित्सा सहायता उपलबध नहीं है।' ईराक पर अमेरिकी हमले के बाद 6 लाख से अधिक व्यक्तियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है और 20 लाख से ज्यादा पलायन को मजबूर हो गए हैं।

अमेरिका में आज भी 5 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध नहीं है। वहां के निष्ठुर बाजार मूलक कानून यह संचालित करते हैं कि किस प्रकार से यह महत्वपूर्ण सेवा संचालित हो। स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते मूल्य के कारण अब तो विकसित देशों में भी अनेक लोगों की पहुंच इन सेवाओं तक नहीं रह गई है। चिकित्सा सेवाएं अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान तो करती है परंतु इसके बावजूद जो इसे उपलब्ध कराते हैं उनके जमीर को यह जगा नहीं पाती और न ही यह उन व्यक्तियों को मानसिक संतोष पहुंचा पाती है जो कि इसे प्राप्त करते हैं।

जिन देशों में विकास कम हुआ है और बीमारियां ज्यादा हैं वहाँ सबसे कम चिकित्सक उपलब्ध हैं अर्थात् 5,10,15,20 हजार या उससे भी अधिक व्यक्तियों पर एक चिकित्सक। हाल ही में प्रकाश में आए यौन जनित रोग जैसे- एचआईवीएड्स ने पिछले बीस वर्षों में लाखों व्यक्तियों को मार डाला हैं। जिसमें अनेक माताएं और बच्चे भी शामिल हैं। हालांकि इससे पार पाने के छोटे-मोटे प्रयास चल रहे हैं परंतु प्रति मरीज प्रतिवर्ष दवाईयों का खर्च पांच हजार से दस हजार डॉलर और कुछ स्थितियों में 15 हजार डॉलर तक पहुंच जाता है।
अधिकांश विकासशील देशों के लिए यह चौंका देने वाला आंकडा है। जहां पर कुछ एक सार्वजनिक अस्पताल बीमारों से उफन रहे हैं और जिस तादाद में वे मर रहे हैं वहाँ उनका इस तरह से ढेर लग रहा है, जैसे वे जानवर हों और एकाएक किसी महामारी के शिकार बन गए हों। इस वास्तविकता पर यदि हम प्रकाश डालेंगे तो हम इस त्रासदी को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे। इसमें लगने वाले धन और तकनीक की बात करने का उद्देश्य इसकी लागत का व्यावसायिक विज्ञापन करना भी नहीं है।

इतना ही नहीं एक ओर लाखों लाख व्यक्ति भूख से मर रहे हैं और वहीं दूसरी ओर अन्न को ईंधन में परिवर्तित करने के विचार के प्रतीक चिन्ह के बारे में मंथन कीजिए, इसका उत्तर 'जार्ज बुश' ही होगा।
हाल ही में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा जार्ज बुश से यह पूछे जाने पर कि क्यूबा के संबंध में उनकी नीति क्या है? उनका उत्तर कुछ इस प्रकार था-'मैं एक कठोर प्रकृति का राष्ट्रपति हैं और महज कास्रो की मृत्यु की बाट जोह रहा हूं।' एक इतने शक्तिशाली सान की इच्छा मेरे लिए कोई छोटा सम्मान नहीं है।
मैं न कोई पहला व्यक्ति हूं और न ही आखिरी व्यक्ति हूंगा जिसकी हत्या का आदेश बुश ने दिया।

'विचारों की हत्या नहीं की जा सकती' सारिया ने अत्यंत भावुक होकर कहा था। सारिया बातिस्ता की सेना की उस टुकड़ी की एक अश्वेत लेफ्टिनेंट थी जिसने कि मोंकाडा गैरिसन पर कब्जे के दौरान हम तीनों साथियों को तब गिरफ्तार किया था जबकि हम वहाँ से उनके कब्जे को हटाने हेतु प्रयत्न करते-करते इतने अधिक थक गए थे कि वहीं एक पहाड़ी झोपड़ी में सो गए थे। वे सिपाही इतनी घृणा से भरे हुए थे कि मुझे पहचाने बिना ही अपनी बंदूकों से हमें मारने को तत्पर हो गए थे। इस सबके बीच वह अश्वेत लेफ्टिनेंट अपनी शांत आवाज में लगातार यंत्रवत् दोहरा रही थी, 'विचारों की हत्या नहीं की जा सकती।'

'मैं ये शानदार शब्द श्रीमान बुश आपको समर्पित करता हूं।'
(सप्रेस)

...क्योंकि गलियां हमारी हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/21/2007 01:29:00 AM

बर्तोल्त ब्रेष्ट की चिंता में समतापूर्ण समाज की तखलीक थी. उनकी हर रचना में चाहे वह उनके नाटक हों, कविताएं हों या छोटी कहानियां, अपने समय की पूंजीवादी बुराइयों और विस्तारवादिता, ढोंग, सैन्यशाही और नस्लपरस्ती के खिलाफ़ उनके मजबूत स्वर उनमें सुनायी देते हैं. ब्रेष्ट ने इन कविताओं में जिन प्रवत्तियों की ओर इशारा किया है वे क्या हमारे देश और हमारे समय की याद नहीं दिलातीं? सोचें और हमें बताएं. भारतीय राष्ट्र की वही विस्तारवादिता, नाज़ियों का वही आतंक (ब्लाग तक की दुनिया में) उनसे लड़ने में कम्युनिस्टों में वही लड़खडाहट... और वही शहादतें... सब कुछ वही...

नयी पीढ़ी के प्रति मरणासन्न कवि का संबोधन

आगामी पीढ़ी के युवाओं
और उन शहरों की नयी सुबहों को
जिन्हें अभी बसना है
और तुम भी ओ अजन्मों
सुनो मेरी आवाज सुनो
उस आदमी की आवाज
जो मर रहा है
पर कोई शानदार मौत नहीं

वह मर रहा है
उस किसान की तरह
जिसने अपनी जमीन की
देखभाल नहीं की
उस आलसी बढ़ई की तरह
जो छोड़ कर चला जाता है
अपनी लकड़ियों को
ज्यों का त्यों

इस तरह
मैंने अपना समय बरबाद किया
दिन जाया किया
और अब मैं तुमसे कहता हूं
वह सबकुछ कहो जो कहा नहीं गया
वह सबकुछ करो जो किया नहीं गया
और जल्दी

और मैं चाहता हूं
कि तुम मुझे भूल जाओ
ताकि मेरी मिसाल तुम्हें पथभ्रष्ट नहीं कर दे
आखिर क्यों
वो उन लोगों के साथ बैठा रहा
जिन्होंने कुछ नहीं किया
और उनके साथ वह भोजन किया
जो उन्होंने खुद नहीं पकाया था
और उनकी फालतू चर्चाओं में
अपनी मेधा क्यों नष्ट की
जबकि बाहर
पाठशालाओं से वंचित लोग
ज्ञान की पिपासा में भटक रहे थे

हाय
मेरे गीत वहां क्यों नहीं जन्में
जहां से शहरों को ताकत मिलती है
जहां वे जहाज बनाते हैं
वे क्यों नहीं उठे
उस धुंए की तरह
तेज भागते इंजनों से
जो पीछे आसमान में रह जाता है

उन लोगों के लिए
जो रचनाशील और उपयोगी हैं
मेरी बातें
राख की तरह
और शराबी की बड़बड़ाहट की तरह
बेकार होती है

मैं एक ऐसा शब्द भी
तुम्हें नहीं कह सकता
जो तुम्हारे काम न आ सके
ओ भविष्य की पीढ़ियों
अपनी अनिश्चयग्रस्त उंगलियों से
मैं किसी ओर संकेत भी नहीं कर सकता
क्योंकि कोई कैसे दिखा सकता किसी को रास्ता
जो खुद ही नहीं चला हो
उस पर

इसलिए
मैं सिर्फ यही कर सकता हूं
मैं, जिसने अपनी जिंदगी बरबाद कर ली
कि तुम्हें बता दूं
कि हमारे सड़े हुए मुंह से
जो भी बात निकले
उस पर विश्वास मत करना
उस पर मत चलना
हम जो इस हद तक असफल हुए हैं
उनकी कोई सलाह नहीं मानना
खुद ही तय करना
तुम्हारे लिए क्या अच्छा है
और तुम्हें किससे सहायता मिलेगी
उस जमीन को जोतने के लिए
जिसे हमने बंजर होने दिया
और उन शहरों को बनाने के लिए
लोगों के रहने योग्य
जिसमें हमने जहर भर दिया


जब फासिस्ट मजबूत हो रहे थे

जर्मनी में
जब फासिस्ट मजबूत हो रहे थे
और यहां तक कि
मजदूर भी
बड़ी तादाद में
उनके साथ जा रहे थे
हमने सोचा
हमारे संघर्ष का तरीका गलत था
और हमारी पूरी बर्लिन में
लाल बर्लिन में
नाजी इतराते फिरते थे
चार-पांच की टुकड़ी में
हमारे साथियों की हत्या करते हुए
पर मृतकों में उनके लोग भी थे
और हमारे भी
इसलिए हमने कहा
पार्टी में साथियों से कहा
वे हमारे लोगों की जब हत्या कर रहे हैं
क्या हम इंतजार करते रहेंगे
हमारे साथ मिल कर संघर्ष करो
इस फासिस्ट विरोधी मोरचे में
हमें यही जवाब मिला
हम तो आपके साथ मिल कर लड़ते
पर हमारे नेता कहते हैं
इनके आतंक का जवाब लाल आतंक नहीं है
हर दिन
हमने कहा
हमारे अखबार हमें सावधान करते हैं
आतंकवाद की व्यक्तिगत कार्रवाइयों से
पर साथ-साथ यह भी कहते हैं
मोरचा बना कर ही
हम जीत सकते हैं
कामरेड, अपने दिमाग में यह बैठा लो
यह छोटा दुश्मन
जिसे साल दर साल
काम में लाया गया है
संघर्ष से तुम्हें बिलकुल अलग कर देने में
जल्दी ही उदरस्थ कर लेगा नाजियों को
फैक्टरियों और खैरातों की लाइन में
हमने देखा है मजदूरों को
जो लड़ने के लिए तैयार हैं
बर्लिन के पूर्वी जिले में
सोशल डेमोक्रेट जो अपने को लाल मोरचा कहते हैं
जो फासिस्ट विरोधी आंदोलन का बैज लगाते हैं
लड़ने के लिए तैयार रहते हैं
और शराबखाने की रातें बदले में मुंजार रहती हैं
और तब कोई नाजी गलियों में चलने की हिम्मत नहीं कर सकता
क्योंकि गलियां हमारी हैं
भले ही घर उनके हों

अनुवाद: रामकृष्ण पांडे

उपहार

सैनिक की पत्नी ढक्कन खोल आवाक
बूढ़े शहर प्राग ने भेजा है उपहार
एक जोड़ी ऊंची ऎड़ीवाली खूबसूरत जूती
बूढ़े शहर प्राग ने सौंपी है संभार
सैनिक की बीवी खोल रही धीरे-धीरे
सागर पार से क्या भेजा असलो ने
आदमी ने भेजी फर की कीमती टोपी
खुशी से पागल अर्मानी.
सैनिक की बीवी आवाक होकर सोचती है
ब्रासेल्स फिर इतना रंगदार, शौकीन
गजब की लेस भेजी है डाक से
आज का दिन बहुत अच्छा बितेगा
सैनिक की पत्नी बहुत ही भाग्यशालिनी है
पारी की रोशनी से आंखें चौधियाती उसकी
फैशन स्वर्ग की रेशमी कुरती से
शौक पूरा हुआ है उस वामा का
सैनिक की बीवी आराम से आंखें बंद कर लेती है
दूर बुखारेस्ट ने भेजा है ब्लाउज
जिसे उसके आदमी ने खोज-खोज कर पाया है
रंग और नक्शे में दिलबहार
नाजी सेनानी की बीवी हक्का-बक्का
बरफ ढंके रूस देश का उपहार
तुषार धवल देश ने उसके नाम भेजा
सद्य विधवा का काला लिबास

मेरा भाई था विमान चालक
मेरा भाई था विमान चालक
उसे एक दिन एक कार्ड मिला
बक्से में भर कर अपना सामान
दक्षिण की ओर उसने कदम बढ़ाया

दिग्विजय था मेरा भाई,
लोगों के मुकाबले जगह चाहिए,
सीमा तोड़ कर देश पर कब्जा
आदिकाल से उसका लोभ
अंत में मेरे भाई ने हासिल किया
ग्वादामारा मैकसिफ का मैदान,
लंबाई में छह फीट दो इंच
चौड़ाई में चार-छह की एक कब्र

अनुवाद: सुबीर मालाकार

इसलिए उसे जिबह कर दिया गया

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/20/2007 12:56:00 AM

ब्रेष्ट की यह कविता नयी दुनिया के निर्माण का सपना देखने और उसे ज़मीन पर उतारने में अपना खून देनेवाले हर शहीद के नाम है. देखना और पूछना ज़रूरी है कि क्यों हर वह आदमी जो मनुष्य की तरह जीना चाहता है, आज जानवरों की तरह जिबह किया जा रहा है. क्या हमें मनुष्यता और नयी दुनिया की कोई ज़रूरत नहीं रही?

अज्ञात क्रांतिवीर का शिलालेख
बर्तोल्त ब्रेष्ट क्रांति का
अज्ञात वीर मारा गया
मैंने उसका शिलालेख
सपने में देखा
वह कीचड़ में पड़ा था
दो शिलांश थे
उन पर कुछ नहीं लिखा था
पर उनमें से एक कहने लगी
जो यहां सोया है
वह दूसरे की धरती को
जीतने नहीं जा रहा था
वह जा रहा था
अपनी ही धरती को मुक्त करने
उसका नाम कोई नहीं जानता
पर इतिहास की पुस्तकों में
उनके नाम हैं
जिन्होंने उसे मिटा दिया

वह मनुष्य की तरह जीना चाहता था
इसीलिए एक जंगली जानवर की तरह
उसे जिबह कर दिया गया

उसने कुछ कहा था
फंसी-फंसी आवाज में
मरने से पहले
क्योंकि उसका गला रेता हुआ था
पर ठंडी हवाओं ने उन्हें चारों ओर फैला दिया
उन हजारों लोगों तक
जो ठंड से जकड़ रहे थे.
अनुवाद : रामकृष्ण पांडेय
ब्रेष्ट की कुछ और कविताएं जल्दी ही हाशिया पर.

जो वाकई एक गंदे नेपकिन की तरह है

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/19/2007 12:58:00 AM

राहुल, अविनाश आदि के पूरे प्रकरण के पीछे गुजरात का काला चेहरा ही था, जिसे मोदी की हत्यारी राजनीति को खाद-पानी देनेवाले ब्लागरों और उच्च तकनीकी क्षमता से लैस उनके कुछ आत्ममुग्ध साथियों ने अपने भद्दे तरीके से अंजाम तक पहुंचाया. उन्हें यह स्वीकार्य नहीं, कि मोदी के गुजरात को गाली दी जाये. जो अपने आप में सभ्य समाज और मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए एक भद्दी गाली की तरह है उस मोदी को, संघ परिवार को, भाजपा को और मोदियाए हुए गुजरात को गाली न दी जाये? जो राज्य विशेष समुदाय के लिए आतंक का पर्याय बन गया हो, जो निरंतर अपने यहां बसे मुसलमानों के खिलाफ़ खुली-छुपी हिंसा कर रहा हो, जो लाखों लोगों के जीने के बुनियादी अधिकारों को जबरन छीने बैठे हो और उन्हें जंजीरों में जकडी़ जिंदगी जीने को विवश किये हुए हो वह और उसके चारण असल में सम्मान पाने के हरेक अधिकर को खो चुके हैं. वे असल में एक ऐसे शासक के लिए संयत भाषा का आग्रह कर रहे हैं जिसने अपने देश की संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ़ और उनके अधिकारियों के खिलाफ़ लगातार जहर उगला, देश की सबसे पुरानी और सबसे बडी़ राजनीतिक पार्टी की अध्यक्ष को कुतिया कहा... हमसे आग्रह है कि हम उसी शासक और उसके चारण ब्लागरों के प्रति सम्मानजनक भाषा के साथ पेश आयें. यह असंभव है. आपने परिवेश को इतना सम्मानजनक रहने ही नहीं दिया है. राहुल के ही शब्द को उधार लूं तो कहूंगा, पूरे गुजरात की राजनीति एक गंदे नेपकिन की तरह हो गयी है. उसे बिना साफ़ किये उसका बने रहना देश के लिए खतरनाक है.
गुजरात की राजनीति की इसी गंदगी और इस पूरी प्रवृत्ति पर गौहर रज़ा का यह आलेख. इसे समकाल ने हाल ही में छापा है. गौहर रज़ा देश के जाने-माने इनसानदोस्त संस्कृतिकर्मी हैं. आप इन्हें इनकी फ़िल्म ज़ुल्मतों के दौर में से जान सकते हैं. फ़िल्म को देखना एक थरथरा देनेवाले अनुभव से गुजरने जैसा है. इसके अलावा इनकी शायरी इनकी चिंताओं के बडे़ फ़लक को सामने रखती है.

फासीवाद का खूनी पंजा

गौहर रजा
फासीवाद के कई चेहरों के पीछे बस एक ही चेहरा होता है. नफरत और अहिंसा का चेहरा. कभी नफरत सामने होती है तो कभी हिंसा, नफरत के बिना हिंसा का भड़कना नामुमकिन है और हिंसा के बिना नफरत को ज्यादा देर तक हवा देना मुश्किल.
वक्त और जरूरत के हिसाब से बाकी सब कुछ बदलता रहता है. इस नफरत की बाती को जलाये रखने के लिए स्थायी दुश्मन की जरूरत होती है जो कमजोर भी हो. कमजोर इसलिए कि अगर दुश्मन ज्यादा मजबूत होगा तो फासीवाद पनप ही नहीं सकता.
देश के हिंदू और मुसलमानों के सांप्रदायिक गुटों ने कभी अंगरेज़ सरकार से टक्कर नहीं ली, क्योंकि वह बड़ी ताकत थी.
सावरकर और वाजपेयी जैसे लोगों ने तो अंगरेज़ी सरकार से माफी मांगी. खुद जेल से बाहर आये और स्वतंत्रता सेनानियों को काला पानी की सजा दिलवायी.
आज भी आरएसएस, भाजपा, विहिप, बजरंग दल या दुर्गा वाहिनी के लोग कभी भी पुलिस के खिलाफ नारे नहीं लगाते, यह अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है. या हिंदू पुलिस भाई-भाई, देश के किसी और राजनीतिक दल ने इस तरह के नारे नहीं लगाये.
प्रश्न यह है कि इस नारे की जरूरत क्यों पड़ती हैं. हिंसा भड़काने के लिए समाज विरोधी तत्वों को लामबंद करना फासीवाद की एक जरूरत है. इस नारे का मतलब है, तुम हिंसा करो, घरा जलाओ, लूटो, दुष्कर्म करो, पुलिस से डरे बिना, क्योंकि हमने उससे पहले ही सांठगांठ कर रखी है.
फासीवाद के पनपने के लिए दुश्मन का कमजोर होना जरूरी है. मगर नफरत न तो एक दुश्मन के भरोसे पनप सकती है और न उसे एक दुश्मन तक सीमित रखा जा सकता है. आरएसएस का इतिहास बताता है कि पहले उनके दुश्मन मुसलमान थे, फिर कम्युनिस्ट इस सूची में शामिल हुए, फिर इसाई, फिर दीपा मेहता, एमएफ हुसैन, फिर दीपा मेहता, एमएफ हुसैन, राहुल ढोलकिया जैसे कलाकार, लेखक और इतिहासकार, फिर वे नौजवान लड़के-लड़कियां, जो वेलंटाइन डे पर दूसरे से दोस्ती व्यक्त करना चाहते हैं फिर वे लड़कियां जो स्कर्ट या जींस पहनने की आजादी चाहती हैं. आमतौर पर अवाम इस तरह के हमलों को जुर्म समझते हैं, इसलिए परंपराओं, धाराओं, जाति विशेष पर एक बड़े खतरे का एहसास दिलाया जाता है. फिर परंपराओं और अस्मिता की दुहाई और भावनाओं पर ठेस के डंडे से किसी को भी लहूनुहान किया जा सकता है. एक बार यह डंडा चलना शुरू हो तो इसे रोकना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर होता है.
यह वही मानसिकता है, जिसकी गूंज सारी दुनिया में हाल में सुनी गयी. जो हमारे साथ नहीं वह हमारा दुश्मन है. आरएसएस के सरसंघ चालक पहले ही कह चुके हैं कि यह महाभारत है. यानी जो आरएसएस में नहीं वह कौरव है. यह मानसिकता है धीरे-धीरे नये दुश्मन तलाश करने की. इस परिप्रेक्ष्य में गुजरात में घटी तीन घटनाओं को परखना जरूरी है. गुजरात के भाजपा संसद सदस्य की एक औरत को अपनी बीबी बना कर अमेरिका ले जाने की घिनौनी साजिश, पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी का तीन लोगों (जिस में दो मुसलमान और एक हिंदू था) का बर्बरता से कत्ल और पुलिस की मदद से एक गुंडे का आर्ट के छात्रों पर हमला. ये तीनों घटनाएं फासीवाद के नफरत और हिंसा भरे चेहरे को दरसाती हैं.
जब आप परंपरा, अस्मिता और मुसलमान या ईसाइयों से दुश्मनी के नाम पर समाज के सब से घिनौने गुटों को इकट्ठा कर के उनको राजगद्दी तक पहुंचाते हैं तो उनसे यह उम्मीद नहीं रख सकते कि वे अपने अतीत को भूल कर राजपाट चलाने के लिए सभ्य हो जायेंगे. यह एसपी 2002 में मुसलमानों के कत्लेआम में शामिल था और यही उसके संसद तक पहुंचने का आधार बना. यह कैसे सोचा जा सकता है कि वह अपने पद को विदेशों में भारतीय महिलाएं और बच्चे सप्लाई करने का धंधा चलाने के लिए नहीं इस्तेमाल करेगा. मुसलमानों और गरीब (दलित) इनसानों का घर लूट कर पेट नहीं भरा जा सकता. जब पेट बड़ा हो तो धंधा भी बड़ा होना चाहिए. उसके इस काम से न गुजरात बदनाम हुआ और न अस्मिता को चोट पहुंची. आरएसएस पर डॉक्युमेंट्री फिल्मों के बनने से ही खतरे में आती है. सोचिए, इस सांसद के लिए यह नारा कितना जरूरी है. यह अंदर की बात है पुलिस हमारे साथ है. दूसरा मामला पुलिस अधिकारों का है. ये उसी तरह के अधिकार हैं जिनके बारे में पाकिस्तान के मशहूर शायर अहमद फराज ने बांग्लादेश में पाकिस्तानी फौज के दमन को देख कर लिखा था, पेशेवर कातिलो तुम सिपाही नहीं. यही सारे हथियार बांग्लादेशी आवाम पर पाकिस्तानी फ़ौजी सरकार ने इस्तमाल किये थे. प्रोपेगंडे की खाद से जब जमीन तैयार हो जाती है तो दुश्मन के सारे अधिकार छीन लिये जाते हैं. उसे इनसान से नीचे का दर्जा दे दिया जाता है और उससे जीने का हक भी छीना जा सकता है. मीडिया हमें बताता है कि सोहराबुद्दीन एक मुजरिम था, तो या कानून और संविधान किसी को यह इजाजत देता है कि एक मुजरित को चलती बस में से उतारो और उस पर आंतकवादी होने का इलजाम लगाओ, कहो कि वह मोदी को मारने आया था और फिर उस को बर्बरता से एक फार्म हाउस में ले जा कर कत्ल कर दो. चलो मान लिया कि संगमरमर के व्यापारियों ने वंजारा को इस काम के लिए सुपारी नहीं दी थीं. मगर क्या उसकी पत्नी कौसर बी के साथ दुष्कर्म करना भी देशप्रेम और संविधान की रखा करना माना जायेगा. प्रेस ने हमें बताया कि उसकी पत्नी की यह दूसरी शादी थी, यानी वह चरित्रहीन थी. मान लिया वंजारा जी, तूम चरित्रवान हो इसलिए चरित्रहीन औरत के साथ दुष्कर्म करना तुम्हारा हक है, उसकी देह को जला कर उसकी हड्डियों को जलाना तुम्हारा हक है. आखिर वह एक चरित्रहीन मुसलमान थी, और यह सब तुम 2002 में कर चुके थे. एक महिला क्या सैकड़ों के साथ दुष्कर्म किया था, वे सब मुसलमान थीं, पर वह तीसरा कौन था जिसके नाम लेने से मीडिया भी कतरा रहा है. तुलसी राम प्रजापति, वह हिंदू था या मुसलमान, जो भी था एक भारतीय नागरिक था,उसके भी कुछ अधिकार थे. उसे भी तुम फार्म हाउस ले गये और कत्ल कर दिया. मीडिया नहीं बतायेगा कि किस तरह ये अधिकारी प्रमोशन की सीड़ियां चढ़े, किस तरह कार और घर खरीदने के लिए इन अधिकारियों को धन उपलब्ध करवाया गया, किस तरह उन्होंने मोदी को खुश करने के लिए एक-दो नहीं बल्कि दसियों लोगों को आंतकवादी कह कर एनकाउंटर में मार दिया. और ज्यादातर लोगों ने मान भी लिया कि वे आंतकवादी थे. मीडिया ने मनगढंत कहानियां खूब मसाला लगा कर छापीं.
फासीवादियों के लिए एक परेशानी यह भी थी कि गुजरात नरसंहार के बाद मुसलमानों ने बदला लेने की कोई कोशिश नहीं की. कर भी नहीं सकते थे. मगर मोदी और विहिप के गुंडों ने गुजराती अवाम को यही कह कर डराया था कि अगर हमारी सरकार नहीं बनाओगे तो तुम पर हमले होंगे. इसे साबित करना जरूरी था.
तीसरा मामला और भी संगीन है. एक गरीब घर का लड़का बड़ौदा की मशहूर एमएस यूनिवर्सिटी के आर्ट डिपार्टमेंट में एडमिशन लेता है. वह अपने इम्तिहान के लिए चित्र बनाता है. अचानक विहिप-भाजपा के गुंडे अंदर घुस आते हैं, चंद्रमोहन और दो छात्रों को बुरी तरह पीटते हैं. पुलिस आकर तीनों छात्रों को गिरफ्तार करती है. दो को छोड़ देती है और चंद्रमोहन को पांच दिन जेल में रहना पड़ता है. न्यायालय उसे पांच दिन तक जमानत नहीं देता. इलजाम-उसने ऐसे चित्र बनाये जिन्होंने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचायी. कार्यकारी डीन और वीसी, आरएसएस के करीबी हैं. इसमें कई प्रश्न हैं जो पूछे ही नहीं गये. इन गुंडों को किस ने बताया कि कु छ चित्र हैं जिन पर हमला किया जा सकता है. क्या किसी को भी यूनिवर्सिटी में घुस कर मारपीट करने की आजादी होनी चाहिए, हां शायद गुजरात में है, अगर वे विहिप के कार्यकर्ता हैं तो, अगर वे दरगाह तोड़ने में सक्रिय रहे हों तो, और दंगे करवाने मं माहिर हों तो.
क्या वीसी को छात्रों और अध्यापकों पर हमला करनेवालों के खिलाफ एफआइआर करनी चाहिए? ऐसा कैसे हो सकता है, अगर वीसी आरएसएस का हो और हमला करनेवाले विहिप के हों. इसका फैसला कौन करेगा कि चित्र अच्छा है या बुरा. अध्यापक या विहिप? गुजरात में हर फैसले का हक बस विहिप को है. मुद्दे बहुत सारे हैं और इन में हम उलझे रह सकते हैं. समझने की बात यह है कि चंद्रमोहन पर हमला एक नये दुश्मन की तलाश है. कल अगर फासीवादी सोच के विस्तार के लिए खजुराहो ध्वस्त करने की अवश्यकता होगी तो विहिप उससे भी नहीं कतरायेगी. वह मसजिदों और दरगाहों पर पहले ही हाथ साफ कर चुकी है.
गुजराज की जनता को ही नहीं पूरे देश के अवाम को समझना होगा कि अगर यही हाल रहा तो जो वंजारा से बच जायेगा वह प्रवीन जैन के हाथ लगेगा. एक सीमा के बाद दुश्मन का हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई होना अर्थहीन हो जाता है, नहीं कहा जा सकता कि कब किसे दुश्मन ठहरा दिया जायेगा. हम सब फासीवादी निशाने पर हैं, कोई सुरक्षित नहीं.

...मगर यह शर्मनाक है नारद जी

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/18/2007 12:23:00 AM

नारद जी
हमारा आपसे यह पहला सार्वजनिक संवाद है.
आपने बाजार को नारद पर से हटा दिया (पोस्ट करने तक वह फिर से जोडा नहीं गया था) और चूंकि आप नारद को चलाते हैं आप ने इस अधिकार का प्रयोग किया कि आप जिस को चाहेंगे वही नारद पर दिखेगा.
बेशक यह आपका अधिकार है. हमें उससे असमति नहीं. मगर आप फिर भी गलती पर हैं. आप एक कमजोर जमीन पर हैं.
ऐसे समय में जब देश भर में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस चली हो, और हर सत्ता प्रतिष्ठान की तरफ़ से यह कोशिश की जा रही हो कि असहमति के हर स्वर को दबा दिया जाये आपने अपने समय का एक बदतरीन और शर्मनाक उदाहरण प्रस्तुत किया है.
हम नहीं समझ पा रहे हैं कि आपका यह कदम अंततः भाजपा, संघ परिवार, विहिप और बजरंग दल जैसी गुंडावाहिनियों के उन कदमों से अलग कैसे है जो पूरे देश को बर्बर युग में धकेल देना चाहते हैं. वे देश और संस्कृति की रक्षा के नाम पर युवक-युवतियों पर हमले करते हैं, वे वाटर जैसी फ़िल्म को शूट नहीं होने देते और परज़ानिया, फ़ाइनल साल्युशन जैसी फ़िल्मों को नहीं दिखाने देते. वे यह चाहते हैं कि फ़िल्मकार उनकी मरजी से फ़िल्में बनायें, उनकी मरजी से किताबें लिखी जायें, लोग उनकी मरज़ी से ही सोचें, बोलें. वे पेंटिंग्स को जलाते हैं और कलाकारों को मारते-पीट्ते हैं. मुझे नहीं समझ में आता कि आप उनसे खुद को कैसे असहमत पायेंगे.
आपका यह कदम उन कट्टरपंथी मध्ययुगीन मुल्लाओं से कैसे अलग है जो कलाकारों, औरतों, लेखकों, फ़िल्मकारों की आज़ादी से खौफ़ खाते हैं और उनके खिलाफ़ फ़तवे देते हैं? वे हर तरह की असहमतियों को दबा देना चाहते हैं.
देश में सरकारों को निहत्थे डाक्टरों और कवियों से डर लगने लगा है- वे उन्हें पकड़ कर जेलों में बंद कर रही हैं. उनको चुप करा देना, बोलने के उनके मंच उनसे छीन लेना- यही तो है उनकी मंशा. बहुत दुख होता है जब आपकी मंशा भी इसी से मिलती जुलती दिखती है.
आपने बाजार को हटाया, इसके लिए आपके द्वारा दी जा रही तमाम दलीलें बेमतलब हैं क्योंकि आपकी असली मंशा आपके और दूसरों के ब्लाग पर आपकी (और आपकी टीम से जुडे़ लोगों की) टिप्पणियों से जाहिर है. वैसे अगर भाषा ही ब्लाग को नारद से हटाने के लिए एक वजह है तो अनेक ऐसे संघी ब्लाग हैं जिन पर इससे भी गंदी भाषा प्रयोग में लायी जाती है. इसके अलावा अपमानजनक भाषा तो आपके अनेक मान्यवर लोग प्रयोग में लाते रहे हैं. 'मान्यवर' संजय बेंगानी जी खुद एक बार कह चुके हैं- संभल जाओ अविनाश यह किस तरह की सभ्य भाषा है, क्या बतायेंगे? और क्या आप संसद की तरह कोई कोष बना रहे हैं भाषा का जिसमें असभ्य भाषा के बारे में साफ़-साफ़ लिखा हुआ होगा? और अगर नहीं तो फिर यह तय करने का आपका मानक क्या है कि किसी की भाषा आपत्तिजनक है?
आपको समझना होगा कि आप लाठी लेकर बैठे हुए स्वयंभू पहरुए नहीं हैं जो यह तय करे कि कौन क्या लिख-बोल रहा है. आप फ़ीड एकत्रक हैं, जैसा आप खुद कहते हैं, न कि सेंसर बोर्ड या ऐसा ही कुछ.
अगर आप ऐसे ही करते रहेंगे तो अपनी प्रासंगिकता खो देंगे. नये लोग आयेंगे और आप बाहर कर दिये जायेंगे. लोग खुद आपको 'बैन' कर देंगे. प्रक्रिया शुरू हो ही चुकी है. (रवि रतलामी जी ने अपने ब्लाग पर बताया है इस बारे में) बेशक हिंदी ब्लाग को आपका बडा़ योगदान है, मगर आपके ऐसे सभी कदम काले अध्याय की तरह याद किये जायेंगे.
अंत में हम कहेंगे कि बाज़ार ने जो कुछ भी लिखा-कहा हम उससे शत-प्रतिशत सहमत हैं. आप हमें भी सजा दे सकते हैं.

अगर आपको बांझी याद हो तो पढें, न हो तो जरूर पढें

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/10/2007 11:54:00 PM

एक और बांझी
देश का पूरा तंत्र जिस तरह अंतरराष्ट्रीय महाजनों और युद्धक शक्तियों के महागंठबांधन के आगे दंडवत है उसी तरह देश के समाज में भी तंत्र और देसी महाजनों का आतंक दिनों-दिन बढ़ रहा है. मगर इसके खिलाफ़ जो आवाज़ उठती है उसे भर मुट्ठी दबाने के भी प्रयास होते है, हो रहे हैं. यह आलेख बिहार में समाजवादी आंदोलन से जुडे़ रहे, और बिहार विधान परिषद के सभापति रह चुके उर्दू लेखक-राजनेता जाबिर हुसेन की डायरी, जो आगे हैं (2004 में प्रकाशित) से लिया गया है. क्या आप इसके इशारों को समझ रहे हैं?

जाबिर हुसेन
जिन लोगों को 1985 का बांझी संहार याद होगा, वो शायद यह भी नहीं भूले होंगे कि इस संहार में बांझी के महाजनों ने आठ संथालों तथा पुलिस ने सात संथालों की निर्मम हत्या की थी. इनमें पूर्व सांसद फादर मुर्मू भी थे. केवल आदिवासी जगत में ही नहीं, पूरे देश में इस नरसंहार की तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी. विभिन्न जन एवं मानवाधिकार संगठनों के दबाव पर राज्य सरकार ने एक जांच आयोग गठित किया था. आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश कर दी थी, जिसमें पुलिस द्वारा संपन्न इस जघन्य हत्याकांड को उचित ठहराया गया था. कुछ राजनीतिक अपवादों को छोड़ दें, तो समूचे राज्य ने जैसे आयोग के इस निष्कर्ष को स्वीकार कर लिया था. मानवाधिकार संगठनों के प्रतिनिधि भी आयोग की इस रिपोर्ट को अपने अस्तित्व की कसौटी मान कर कोई ठोस कार्यक्रम नहीं बना सके. सबसे दुखद यह रहा कि आयोग की रिपोर्ट को न्याय की मर्यादा के संदर्भ में देखा गया. यह दलील भी दी गयी कि आयोग की रिपोर्ट को प्रतिकार का विषय बनाने से न्याय व्यवस्था की मानहानि होगी. यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक दलील है. इस दलील से यह विश्वास जन्म लेता है कि न्याय व्यवस्था से जुड़ी संस्थाएं चाहे जितनी जनविरोधी व्यवस्थाएं स्थापित करें, उन्हें चुनौती देने की बात नहीं सोची जा सकती. यही कारण है, बांझी आयोग के गर्भ से जन्मी अवहेलना किसी जन आंदोलन का आधार नहीं बन पायी. मैं उन लोगों में हूं, जो मानते हैं कि बांझी आयोग की रिपोर्ट ने राज्य की सीमा में जनविरोध का एक अश्लील उदाहरण प्रस्तुत किया है. इसने अन्याय पर टिकी एक सामाजिक व्यवस्था के पक्ष में पांडित्यपूर्ण दलीलों का सहारा लेकर जनता के साथ घोर विश्वासघात किया है. यह रिपोर्ट दरअसल बाद की कई न्यायिक व्यवस्थाओं की नींव बन गयी है. मैं पड़रिया के संदर्भ में दिये गये न्यायिक फैसले को भी इसी रोशनी में देखने को मजबूर हूं. इतने दिन बीत जाने पर भी मैं बांझी के नरसंहार और बांझी आयोग की रिपोर्ट का जिक्र आखिर क्यों कर रहा हूं. इसलिए कि बांझी की घटना अपने इलाके की आखिरी घटना नहीं थी. इस घटना और इसके बाद समूचे राज्य की चुप्पी ने संथाल इलाकों में महाजनी व्यवस्था के किले की दीवारों को और भी मजबूत कर दिया है. उनके हौसले और भी ऊंचे हो गये है. उन्होंने मान लिया है कि राज्य की सत्ता नौ फ़ीसद उनकी पीठ पर है. ओर वो आजादी से जो चाहें कर सकते हैं. महाजनों की इसी निश्चिंतता ने पिछले महीने दो पहाड़िया जवानों और एक संथाल दंपत्ति को मौत के घाट उतार दिया. मुमकिन है, अखबारों में इस घटना की चर्चा तक नहीं छप पायी हो. चुनाव और सांप्रदायिक दंगों की धुंध में ऐसी घटना का प्रकाश में नहीं आना कोई आश्चर्य की बात नहीं. मैं स्वयं इस हत्याकांड के तथ्यों से अनभिज्ञ रह जाता, अगर मुझे बांझी इलाके के 60-70 गांवों में भूमि स्तर पर कार्यरत फादर थॉमस कावला का एक परिपत्र नहीं मिलता. इस परिपत्र ने ही मुझे तथ्यों की छानबीन के लिए प्रेरित किया. मेरी फादर थॉमस कावला से मुलाकात नहीं हो पायी. वो संभवत: बांझी से बाहर रह रहे हैं. मगर मैंने समान रूप से पहाड़िया लोगों और संथालों के बीच फादर कावला की लोकप्रियता के किस्से सुने. बांझी हत्याकांड के बाद से ही फादर कावला लगातार इस क्षेत्र में कार्यरत हैं. उन्होंने महाजनों द्वारा स्थानीय गरीब संथालों के शोषण और लूट के रास्ते बंद करने की दिशा में अभूतपूर्व साहस और लगन के साथ काम किया है. संथालों की एक रजिस्टर्ड समिति द्वारा फादर कावला ने सस्ते दाम पर सामान की लूट प्रथा का एक प्रकार से अंत ही कर दिया है. इलाके भर के गरीब संथालों को फादर कावला के प्रयासों में अपनी सामाजिक -आर्थिक जिंदगी बदलने की संभावना दिख रही है. उनके मन में आशा की एक हल्की मगर ठोस किरण जग गयी है. इन हालात में, संथाल गांवों के गरीब लोगों पर से महाजनी ठेकेदारों का भरोसा उठ जाना एक स्वाभाविक परिणाम है. वो उन्हें अपना शत्रु मानने लगे हैं. और उनसे निपटने की तैयारी भी कर रहे हैं. उस रात बांझी में जो घटना घटी, वो दरअसल महाजन-पुलिस गठजोड़ की इसी तैयारी का नतीजा है. उस रात बांझी और उससे सटे सबाया गांव में अलग-अलग देवी पूजा और सिद्ध-कानू मेला का आयोजन था. दूर-दराज के लोग इसमें भाग लेने आये थे. देव पहाड़ गांव के पहाड़िया और केंदुआ गांव के मोंगोल मुर्मू तथा उसकी औरत देवमाई भी इस मेले में भाग लेने आयी थी. बांझी बाजार के महाजनों को इस बात से तकलीफ पहुंची कि बांझी के मेले में सबाया के मेले में कम भीड़ जुटी. इलाके की संथाल आबादी पर से अपने घटते प्रभाव के कारणों को समझे बिना वो उनके खिलाफ हिंसक रवैया अपनाने को तत्पर हो गये. दूसरे दिन गांव के गड़ेरियों को दो पहाड़िया और दो संथालों की लाशें मिलीं. इस बात के एक से ज्यादा प्रमाण मौजूद हैं कि संथालों की हत्या के बाद बांझी नरसंहार के एक प्रमुख नायक ने गांव के संथालों को पैसों और शराब का प्रलोभन देकर यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि हत्या के पीछे स्वयं फादर कावला और संथाल समिति का हाथ है. यह और बात है कि महाजनी दिमाग की यह साजिश फादर कावला के व्यापक जनाधार के आगे टिक नहीं पायी. इलाके भर के संथालों को इस बात का आश्चर्य है कि बांझी और इसके आस-पास जो तत्व अपने-आपको राजनीतिक मानते हैं, वो पूरे तौर पर महाजन ठेकेदारों की जंगल और खाद्य लूट के हिस्सेदार हैं. इनमें आदिवासी और संथाल मूल के राजनीतिज्ञ भी शामिल हैं. कोई भी पार्टी इस आरोप से बरी नजर नहीं आती. इस बात की आशंका है कि बिहार के सांप्रदायिक दंगों की भट्टी में बांझी और इसके आसपास असंतोष की जो नहर फैल रही है, उसे इतनी असानी से दबा सकना मुमकि न नहीं. रोज-रोज इस असंतोष की जड़ें गहरी होती जा रही हैं, क्यॊंकि यह असंतोष किसी आयातित विचारधारा की देन नहीं. इसका संबंध संथालों की धरती से है. संथालों की धरती, जहां महाजनों के शोषण के मुकाबले संथालों का संघर्ष एक नया आकार ले रहा है.

गरीबी नहीं, मिटायी जा रही गरीबों की पहचान

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/09/2007 12:59:00 AM

एक साम्राज्य की विश्वस्त और दलाल सरकार किस तरह काम करती है, यह देखने के लिए हमें किसी लेख की ज़रूरत बिलकुल नहीं है. हम उसे देखते हैं अपने सामने और अपने साथ होता हुआ...मगर हम यह मानते हैं कि घटनाएं दर्ज हों तो सनद के लिए एक चीज़ हो जाती है. इसी के तौर पर यह आलेख.
सचिन कुमार जैन

सिकरोदा गांव मुरैना जिले के पहाड़गढ़ ब्लॉक में स्थित है. बीपीएल सर्वेक्षण में गांव में कोई भी बंधुआ मजदूर नहीं पाया गया. जब मार्च 2004 में एक शोध दल गांव में पहुंचा तो कई लोगों ने बताया कि वे बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे हैं. अधिकारियों ने इस सूचना को गलत ठहराया. बाद में जुलाई, 2004 को हमने अखबारों में पढ़ा कि गांव से 20 बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया गया. मध्यप्रदेश के 22 लाख परिवारों के लिए गरीबी रेखा एक ऐसी रेखा है जो गरीब परिवारों के ऊपर से और अमीर परिवारों के नीचे से निकलती है. सर्वेक्षण प्रक्रिया ने लोक अधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है. सरकार ने आदेश जारी किया था कि ऐसे परिवार जिन्हें भरपेट खाना नहीं मिलता या जो बंधुआ मजदूर हैं, उन्हें गरीब माना जाये, पर ऐसा हुआ नहीं. क्योंकि सर्वेक्षणकर्ताओं ने या तो अंदरूनी और दुर्गम गांवों तक जाने की तकलीफ ही नहीं उठायी या फिर किसी संपन्न परिवार के आंगन में बैठ कर पूरे गांव के फार्म भर लिये. इस कारण कई वास्तविक परिवार गरीबी रेखा सूची में आने से वंचित रह गये. बाद में सरकार ने व्यवस्था दी कि ऐसे वंचित परिवार अपने नाम का दावा पेश करें या किसी दूसरे नाम पर आपत्ति करके कटवायें. गलती सरकारी अमले ने की परंतु गांव में संपन्न व्यक्तियों से दुश्मनी और झगड़ा मोल लेने की सजा गरीब परिवारों को दे दी गयी. इसके बावजूद मध्यप्रदेश में 11.42 लाख लोगों ने दावे पेश किये. सरकार को मानना पड़ा कि मानकों के अनुसार 44.77 लाख परिवारों की इस सूची में 8.71 लाख और लोगों के नाम होने चाहिए. यानी 25 फीसदी नाम गलत दर्ज हुए. जन संगठनों के एक अध्ययन के मुताबिक मात्र 37 प्रतिशत लोगों ने ही दावे पेश किये. यानी 25 लाख से ज्यादा परिवार इस लापरवाही के शिकार हुए हैं. भारत सरकार की नीतिगत प्रक्रिया के तहत राज्य सरकारें अपने क्षेत्र में रहनेवाले गरीब परिवारों की पहचान का काम करती है. राज्य सरकार को गरीबी स्तर मापने और उसके अनुरूप विकास योजनायें चलाने का अधिकार नहीं है. केन्द्र सरकार भी वि व बैंक जैसे अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के दिशा-निर्देश के अनुसार यह तय करती है. जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन केवल उन परिवारों के लिये किया जाता है जो सरकार की परिभाषा के अनुरूप गरीबी की परिभाषा पर खरे उतरते हैं. लेकिन पिछले दस सालों में सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पायी कि समाज के सभी गरीब परिवारों की पहचान मानवीय और न्यायपूर्ण तरीके से की जा सके. 1997-98 के सर्वेक्षण में देश के हर गांव में यह समानता जरूर पाई गई कि सरकार के मुलाजिमों ने गांव के भूस्वामियों, ट्रेक्टर मालिकों, भवन मालिकों और सत्ता सम्पन्न परिवारों के नाम गरीबों की सूची में सबसे ऊपर रखे. चूंकि सरकार यह पहले से ही तय कर देती है कि एक निश्चि सीमा में ही परिवारों की पहचान करनी है, अत: वास्तविक गरीब परिवार इस सूची में शामिल ही नहीं हो पाये. इसके ठीक पांच साल बाद सरकार ने घोषणा की कि देश में गरीबी रेखा में दस फीसदी और मध्यप्रदेश में साढ़े पांच फीसदी की कमी आयी है. जबकि खुद भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (तीन) के आंकड़े गरीबी कम होने के सरकार के दावे को झुठलाते हैं. इसके अनुसार पिछले आठ साल (1998-06) में मध्यप्रदेश में खून की कमी की शिकार महिलाओं की संख्या 48 प्रतिशत से बढ़ कर 58 प्रतिशत हो गयी. एनीमिया के शिकार बच्चों की संख्या 71.3 प्रतिशत से बढ़ कर 82.6 प्रतिशत हो गयी है. आज भी केवल 14.9 प्रतिशत नवजात बच्चों को ही जन्म के तत्काल बाद मां का दूध नसीब हो रहा है. अगर गरीबी कम हुई है तो फिर कुपोषण और एनीमिया में वृद्धि कैसे हुई? सबसे तकलीफदेह बात यह है कि आज भी स्वास्थ्य का मुद्दा मानव विकास का सूचक नहीं बन पाया है. राज्य सरकार ने भी गरीबी रेखा सर्वेक्षण के सूचकों में इसे शामिल नहीं किया है. जबकि राज्य में स्वास्थ्य के ऊपर खर्च होने वाले 100 में से 75 रूपये, हर व्यक्ति को अपनी जमा पूंजी या आय में से खर्च करने पड़ते हैं. सरकार केवल 25 रूपये का भार वहन करती है और वह भी अनुत्पादक मदों में ही खर्च होता है. सूचकों में घरों में शौचालय को शामिल न करने से चार फीसद गरीबी का स्तर सीधे प्रभावित हुआ है. सर्वोच्च न्यायालय में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज द्वारा दायर जनहित याचिका में न्यायालय ने माना कि बहुत से गरीब परिवारों को गरीबी रेखा सूची में शामिल नहीं किया गया है. न्यायालय ने निर्देश भी दिया कि जितने भी वृद्ध, विकलांग, गर्भवती महिलायें और पिछड़ी हुई आदिम जनजाति के परिवारों केे नाम गरीबी रेखा सूची में नहीं हैं, उन्हें अतिगरीबी की अन्त्योदय अन्न योजना का लाभ दिया जाये. यह दरसाता है कि सबसे वंचित और बहिष्कृत परिवार सरकार की नजरों से उपेक्षित हैं. राज्य ने जब इन परिवारों को योजना का लाभ देना शुरू किया गया तो अन्त्योदय अन्न योजना के हितग्राहियों की संख्या 5 लाख से बढ़ कर 15.81 लाख हो गयी. यानी 11 लाख परिवार अति गरीब होते हुए भी गरीबी रेखा सुची में नहीं हैं. दावा-आपत्ति करने वालों और सर्वोच्च न्यायालय से इंसाफ पाये पारिवारों को जोड़ें तो पता चलता है कि लगभग 22 लाख परिवार गरीब होने के बावजूद पहचान से वंचित हैं. खुद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 20 दिसम्बर 2006 को भारतीय विपणन विकास केन्द्र के कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि भले ही भारत सरकार राज्य में 37 प्रतिशत लोगों को ही गरीब मानती है पर उनकी संख्या 60 प्रतिशत से ज्यादा है. बतौर मुख्यमंत्री वह यह जानते हैं कि गरीबी के मानकीकरण, पहचान की प्रक्रिया और व्यवस्था की गैर जवाबदेहिता के चलते समाज के एक बड़े तबके की जिन्दगी धीमी मौत में तब्दील हो रही है. फिर क्या राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह भारत सरकार की अमानवीय वैज्ञानिक अवधारणाओं का विरोध करे? यह इस बात का प्रमाण है कि किस तरह नीतियों और राजनैतिक मंशा के अभाव के चलते समाज में नित नये सामाजिक-आर्थिक रूप से बहिष्कृत वर्ग पैदा हो रहा है. इससे साफ जाहिर है कि बाजारवादी व्यवस्था की समर्थक सरकार का ध्यान गरीबी नहीं बल्कि गरीबों की पहचान मिटाने पर है. (चरखा)

(तसवीर नेट से ली गयी हैं)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें