हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

...तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/30/2007 12:07:00 AM

यह जश्न, यह गीत किसी को बहुत हैं...
जो कल तक हमारे लहू की खामोश नदी में
तैरने का अभ्यास करते थे.




बेदखली के लिए विनयपत्र
9 सितंबर, 1950 को पंजाब के तलवंडी में जन्मे
पाश ने देश को कई अविस्मरणीय कविताएं दीं. पाश ने समय पर जो लकीरें खींचीं वे आज भी हैं और हमारे समय के जख्मों को याद दिलाती हैं. आज जब भारत अपने ही नागरिकों के प्रति निरंतर असहिष्णु होता जा रहा है, अरुंधति राय के शब्दों में कहें तो-अपने ही लोगों को गुलाम बना चुका है, पाश की यह कविता हमें खरोंचती है. इसी के साथ यह देश की मनगढ़ंत परिभाषा देनेवालों और राष्ट्रीयता के अपने मापदंड तय करने वालों के खिलाफ़ है. हम इसे यहां इस देश और समाज को और अधिक असहिष्णु होने से बचाने की आर्त पुकार के बतौर प्रस्तुत कर रहे हैं.

भूल सुधार : मैंने खुद को इस वीभत्स कत्ल की साजिश में पाया की जगह पढें
मैंने खुद को इस कत्ल की साजिश में पाया

मायावती : स्वागत, पर कुछ सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/28/2007 11:51:00 PM

मायावती के चुन कर आने को कुछ लोगों ने बडी़ सामाजिक क्रांति भी माना है. हमारा यह मानना रहा है कि मायावती का जीतना भले अपने समय की एक अहम घटना हो, यह भारतीय समाज के जड़ता को तोड़ने का माध्यम नहीं बन सकता. इसके लिए सामाजिक और आर्थिक संबंधों में जो ज़रूरी आधार और बदलाव चाहिए, वे केवल चुनाव जीतने से किसी समुदाय के हाथों में आये नेतृत्व भर से संभव नहीं है. यह मायावती के बस में नहीं है. इसी के साथ मायावती के सत्ता में आने के बाद जो सवाल उभरे हैं उन पर सत्येंद्र रंजन की एक नज़र. आलेख प्रभात खबर में प्रकाशित.
सत्येंद्र रंजन

उत्तर प्रदेश में मायावती की जीत कई मायने में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अहम घटना है. मगर इससे ही जुड़ा हुआ और उतना ही अहम सवाल यह है कि क्या इतिहास ने मायावती को जो अवसर दिया है, क्या वे सचमुच खुद को उसके काबिल साबित कर पायेंगी? अगर मायावती ने दूरदृष्टि एवं न्यूनतम वैचारिक प्रतिबद्धता का परिचय दिया और उन ऊंचे आदर्शों को ध्यान में रखा जो बाबा साहेब आंबेडकर एवं बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के संघर्षों से पैदा हुए, तो उनकी मौजूदा उपलब्धि इतिहास में एक मील का पत्थर बन सकती है.
मायावती की उपलब्धि बेमिसाल है. यह पहला मौका है, जब दलित नेतृत्व में ऐसा सामाजिक-राजनीतिक गंठबंधन बना, जो अपने दम पर सत्ता में आने में कामयाब हुआ है. इस नेतृत्व और इस गंठबंधन में कई खामियां बतायी जा सकती हैं. मसलन कहा जा सकता है कि नेतृत्व निजी महत्त्वाकांक्षाओं व सत्ता लिप्सा से प्रेरित है और जो सामाजिक गंठबंधन बना, वह अवसरवादी है. इसके बावजूद इस घटना के राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्त्व की अनदेखी नहीं की जा सकती. बसपा ने दलितों की एकजुटता कड़ी मेहनत से हासिल की. चूंकि यह एकजुटता चुनावी सफलता के लिए काफी नहीं थी, इसलिए इसे एक नये सामाजिक समीकरण का हिस्सा बनाने के अलावा बसपा नेतृत्व के पास कोई और विकल्प नहीं था. हाल के चुनाव की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि ऐसा समीकरण बनाने में मायावती कामयाब रहीं. सबसे अहम बात यही है कि उन्होंने जो सामाजिक गंठबंधन बनाया, उसका नेतृत्व बिना किसी संदेह के उनके हाथ में रहा. सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई से जु़डे संगठनों में यह लंबे समय से बहस का मुद्दा रहा है कि जिसकी लड़ाई, उसका नेतृत्व कैसे स्थापित किया जाये. इन तबकों की वकालत करनेवाली कम्युनिस्ट पार्टियों, अब इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन चुके सोशलिस्ट आंदोलन और यहां तक कि नक्सली संगठनों में भी नेतृत्व मध्यवर्गीय और अधिकांश मौकों पर सवर्ण वर्ग का रहा है. यह बात कहने का मतलब इन पार्टियों या संगठनों के नेतृत्व की वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना कतई नहीं है, लेकिन ये सवाल खुद इनके भीतर उठते रहे हैं कि आखिर कैसे सबसे उत्पीड़ित समूहों के भीतर से नेतृत्व पैदा किया जाये? यह सवाल इसलिए अहम है कि सामाजिक और आर्थिक समता की लड़ाई तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक सबसे वंचित तबकों से उभरनेवाला नेतृत्व सबसे अगली कतार में नहीं आयेगा. इसी लिहाज से बसपा की उपलब्धियां बेमिसाल हैं. यह पार्टी एक दलित नेता ने खड़ी की और उन्होंने दलितों के भीतर अपने उत्तराधिकारी का चुनाव किया. उस उत्तराधिकारी ने राजसत्ता पर लोकतांत्रिक ढंग से कब्जे कर उनका सपना पूरा करने के लिए कारगर रणनीति बनायी और आज वे बिना किसी मेहरबानी के देश के सबसे बड़ी राज्य की मुख्यमंत्री हैं. एक अखबार में छपी एक खबर बताती है कि दलितों के लिए इस सफलता का क्या अर्थ है- जब उप्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने लगे और मायावती आगे निकलने लगीं तो उनके एक समर्थक ने शराब पीनी शुरू कर दी. बसपा के आगे बढ़ते हर कदम के साथ वह मायावती जिंदाबाद के नारे लगाता रहा और शराब पीता रहा. इसके पहले कि मायावती को पूरा बहुमत मिलने की खबर आती, हर्षोन्माद ने उस व्यक्ति की जान ले ली. क्या ऐसी खुशी आज किसी और पार्टी की जीत पर उसके किसी समर्थक को हो सकती है? ऐसा इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि मायावती की जीत के साथ करोड़ों दलितों का कोई आर्थिक या कारोबारी स्वार्थ नहीं जुड़ा हुआ है, बल्कि सदियों के शोषण से उनकी मुक्ति की उम्मीद जुड़ी हुई है. इसीलिए मायावती से उनकी ईमानदार भावनाएं जुड़ी हुई हैं. उनके लिए मायावती ऐसी प्रतीक हैं, जिसकी अहमियत समझना शायद किसी गैरदलित के लिए मुमकिन न हो. मायावती की देश की राजनीति में जो हैसियत बनी है, उसके साथ अब उन पर कुछ उतनी ही बड़ी जिम्मेदारियां भी आ गयी हैं. मायावती के सामने यक्ष प्रश्न यह है कि क्या वे अब भी अगर अपना फायदा हो तो किसी भी पार्टी के साथ जाने की रणनीति पर चलती रहेंगी? यूपी में उन्होंने इसके पहले जब तीन बार सरकार बनायी तो उन्होंने इसके लिए भाजपा से हाथ मिलाया. 2002 में भाजपा का समर्थन बरकरार रखने की कोशिश में वे गुजरात में नरेंद्र मोदी तक का प्रचार करने चली गयीं. इस तरह उन्होंने अपना और अपनी पार्टी का नाम उस पार्टी से जोड़ा, जो भारतीय राजनीति में सामाजिक रूढ़िवाद और दक्षिणपंथ की नुमाइंदगी करती है और अपने मूल चरित्र में समता एवं जनतंत्र के खिलाफ है. अगर बसपा कहती है कि उसने सिर्फ अल्पकालिक रणनीति के तहत भाजपा से हाथ मिलाया तो असल में उनका समर्थन करने के पीछे भाजपा का भी यही मकसद था. भाजपा और पूरे संघ परिवार की विचारधारा असल में मानवीय स्वतंत्रता को सीमित और नियंत्रित करने का उपक्रम है, और उसका मकसद समाज में जारी शोषण और गैर बराबरी को कायम रखना है. सवाल यह है कि इसका दलित आंदोलन के उद्देश्यों से क्या मेल हो सकता है? भारत में इस समय जब जनतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई आगे बढ़ रही है, उसी समय धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों की तरफ से देश की संवैधानिक व्यवस्था के लिए जोरदार चुनौतियां पैदा की जा रही हैं. हिंदू सांप्रदायिक-फासीवाद, इस्लामी आतंकवाद और सिख कट्टरपंथ के उग्र चेहरे हमारे सामने हैं. ऐसे में देश की सभी प्रगतिशील शक्तियों के सामने चुनौती है कि वे धर्मनिरपेक्षता को आस्था व न्यूनतम राष्ट्रीय सहमति का सवाल बनाये रखें. उत्तर प्रदेश में बसपा ने सवर्ण जातियों, खासकर ब्राह्मणों को अपनी राजनीतिक योजना का हिस्सा बनाकर नये सोच का परिचय दिया. उसने यह भी दिखाया है कि जब वह कोई नया सोच लेकर आती हैं तो उस पर अमल भी करती हैं, और उसकी बातों पर लोग भरोसा करते हैं. इसीलिए बसपा की जीत ने देश के प्रगतिशील खेमे में नयी उम्मीदें पैदा की हैं. बसपा की जीत का एक परिणाम यह भी हुआ कि भाजपा यूपी की राजनीति में लगभग अप्रासंगिक हो गयी. वह महज 120 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. यानी 280 से भी ज्यादा सीटों पर वह मुकाबले में भी नहीं रही. इससे दिल्ली की गद्दी पर उसका दावा कमजोर जरूर हुआ है. लेकिन उसकी वापसी आज भी मुमकिन है. इसलिए देश की प्रगतिशील शक्तियां बसपा से यह उम्मीद जरूर करेंगी कि जैसे उसने उत्तर प्रदेश में सामाजिक गठबंधन बनाया, वैसे ही वह राष्ट्रीय राजनीति में राजनीतिक गठबंधन बनाने की राजनीतिक बुद्धि और उदारता दिखाये. जाहिर है, वैचारिक आधार पर यह गठबंधन धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के साथ ही बन सकता है. यहां यह बात जरूर है कि ऐसे गठबंधन की सारी जिम्मेदारी मायावती पर नहीं है. इसके लिए कांग्रेस, यूपीए के बाकी दलों और वामपंथी पार्टियों को भी वैसी समझ और उदारता दिखानी होगी. अगर ये सभी दल भारत की इस ऐतिहासिक जरूरत को समझ सके, तो निश्चित रूप से देश को फिलहाल एक बड़े खतरे से बचाया जा सकता है. मायावती के सामने दूसरा बड़ा सवाल आर्थिक नीतियों का है. कांशीराम के जमाने में बसपा चुनाव घोषणापत्र जारी नहीं करती थी. कांशीराम का मानना था कि राजसत्ता पर कब्जे के बाद उनकी पार्टी बहुजन के हित में नीतियां बना लेगी. अब यह मकसद पूरा हो गया है. मायावती ने बहुजन से सर्वजन की यात्रा पूरी कर ली है और इस सफर से वे लखनऊ की गद्दी पर हैं. क्या अब भी उन्हें दलित आंदोलन के आर्थिक एजेंडे की जरूरत महसूस नहीं होती? बहरहाल, यह बात पूरे यकीन के साथ कही जा सकती है कि अब ऐसे एजेंडे की अनदेखी वो सिर्फ अपने नुकसान की कीमत पर ही कर सकती हैं. मायावती की जीत स्वागतयोग्य है. सिर्फ यह जीत ही उप्र के विकास की दिशा में एक बड़ा मुकाम है. लेकिन यह मायावती के लिए अंतिम मुकाम नहीं होना चाहिए. दोहराव के जोखिम के बावजूद यह कहने की जरूरत है कि उनके सामने अब चुनौती संवैधानिक जनतंत्र की रक्षा के लिए धर्मनिरपेक्ष ताकतों को मजबूत करने और दलित आंदोलन का आर्थिक एजेंडा पेश करने की है. अगर वे ऐसा नहीं कर सकीं तो वे एक बड़ा ऐतिहासिक मौका खो देंगी. यह उनके और भारतीय लोकतंत्र दोनों के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा.

सरस्वती, दुर्गा और द्रौपदी को नंगा कौन कर रहा है?

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/27/2007 11:47:00 PM

रविभूषण
अस्सी वर्षीय आलोचक नामवर सिंह, नब्बे वर्षीय विश्वप्रसिद्ध कलाकार मकबूल फिदा हुसैन और सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ोदरा के ललितकला संकाय के तेईस वर्षीय स्नातकोत्तर छात्र चंद्रमोहन श्री लक्ष्मनतुला भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत अभियुक्त हैं. भारत धर्म प्रधान देश है, पर यहां धार्मिक कट्टरता का इतिहास नया है. भूमंडलीकरण के दौर में यह धार्मिक कट्टरता बढ़ी है. हम मानवीय भावनाओं के आहत होने की चर्चा और चिंता नहीं करते; धार्मिक भावनाओं के आहत होने की बातें करते हैं. जबसे भाजपा चमकी है, धार्मिक भावनाओं के आहत होने के उदाहरण बढ़े हैं. भारत में इसलामी कट्टरता और हिंदू कट्टरता बढ़ती गयी है और सदाशयता-सहिष्णुता नष्ट हो रही है. भारतीय दंड संहिता की विविध धाराओं में वर्णित अपराधों की संख्या कम नहीं है. तो क्या नामवर, हुसैन और चंद्रमोहन सचमुच अपराधी अभियुक्त हैं?
नामवर आलोचक हैं और उन्हें पंत-साहित्य के एक बड़े भाग को कूड़ा कहने का अधिकार है. पिछले 20-30 वर्ष में देश में कूड़ा अधिक इकट्ठा हो गया है. साहित्य की भाषा में सिर्फ अभिधा प्रयोग नहीं होता. वहां लक्षणा और व्यंजना के लिए अधिक जगह है. कूड़ा का एक अर्थ फालतू है और पंत काव्य के मर्मज्ञ जानते हैं कि पंत का परवर्ती काव्य उल्लेखनीय नहीं रहा. आज बहुत कम ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जिन्हें कला, साहित्य व संस्कृति की गहरी समझ हो और वे उनमें वर्णित-चित्रित रंग-रेखा, ध्वनि, शब्द, वाक्य तथा उनके विविध आशय-अर्थ से अवगत हों. राजनीति जिस मुकाम पर पहुंच गयी है, वहां केवल छीना-झपटी, कुटिलता, धोखाधड़ी और फरेब है. कला-साहित्य-संस्कृति का दृश्य इससे भिन्न है. कवि-लेखक, संस्कृतिकर्मी और कलाकार जीवन की रक्षा ही नहीं कर रहे, उसे गति भी दे रहे हैं.
मकबूल फिदा हुसैन ने 1996 में सरस्वती, दुर्गा और द्रौपदी के नग्न चित्र बनाये थे. हिंदुत्व परिवार के सदस्यों ने इन चित्रों का विरोध किया. हुसैन के एक चित्र में सीता हनुमान की पूंछ पर बैठ रही थीं. 1998 में मुंबई के उनके घर में तोड़-फोड़ की गयी. इंदौर और राजकोट में उन पर आपराधिक मुकदमे दायर हुए. हरिद्वार की एक अदालत ने मुंबई में हुसैन की संपत्ति जब्त करने का आदेश भी दिया. हुसैन के चित्रों के गंभीर आशयों को समझना चाहिए. रंगों, रेखाओं, ध्वनियों और शब्दों से सबका संबंध और सरोकार नहीं है. यह जानने का प्रयत्न होना चाहिए कि एक बड़ा कलाकार एक विशेष समय में देवी-देवताओं के नग्न चित्र क्यों बना रहा है? क्या उसी ने नग्न चित्रों की रचना की है या नग्न चित्रों का अपना एक इतिहास भी है? हिंदू देवी-देवताओं की नग्न मूर्तियां भी हैं. क्या खजुराहो, कोणार्क जैसे मंदिरों की मूर्तियां तोड़ी जायेंगी? ऐसे पौराणिक साहित्य, जिसमें ऐसे वर्णन हैं, जला दिये जायेंगे? शिवलिंग को पूजनेवाली स्त्रियों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होगा? हुसैन के चित्रों के गहरे अभिप्राय हैं. क्या हमारे समय में सरस्वती, दुर्गा और द्रौपदी को नंगा करनेवाले नहीं हैं? क्या हम उनकी पहचान नहीं करेंगे? जिनके पास राजनीतिक सत्ता है और जो इस सत्ता के करीबी हैं, वे सब देवी-देवता के कार्यों से अलग उन्हें विकृत और नग्न करने में लगे हुए हैं. वे हमारे देश में हैं और हुसैन अपने देश से बाहर हैं - निर्वासित.
भाजपा सांसद मेनका गांधी ने विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को 12 मई 2007 को लिखे पत्र में आग्रह किया है कि वे भाजपा की गुजरात और महाराष्ट्र शाखाओं को उन कलाकारों के विरुद्ध अभियान बंद करने के लिए कहें, जिनकी कृतियां उन्हें पसंद नहीं हैं. कलाकार, कवि व लेखक सत्य के पक्षधर हैं और झूठ को सच बनाने की कला में दक्ष लोग सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते. लोकतंत्र में जिनकी आस्था नहीं है, वे अभिव्यक्ति के विविध माध्यमों को अपने मनोनुकूल बनाना चाहेंगे. भारत में फासीवादी शक्तियां कई हैं और इनके कार्य ध्वंसात्मक हैं. तेलुगुभाषी चंद्रमोहन सयाजीराव विश्वविद्यालय बड़ोदरा के विश्व प्रसिद्ध ललितकला संकाय के अंतिम वर्ष के छात्र हैं. मितभाषी, अपने कार्य के प्रति समर्पित, सहपाठियों के लिए प्रेरक और अनुशासित चंद्रमोहन गुजरात ललितकला अकादमी द्वारा पुरस्कृत हैं. चंद्रमोहन द्वारा बनाये गये चित्र उनकी परीक्षा के लिए थे. इन चित्रों पर उन्हें अंक प्राप्त होने थे. यह चित्र प्रदर्शनी परीक्षा से संबद्ध थी, खुली प्रदर्शनी नहीं थी. जिस चित्र प्रदर्शनी को कायदे से विश्वविद्यालय के अधिकारी भी नहीं देख सकते थे, उसे भाजपा के नीरज जैन के नेतृत्व में आये लोगों ने क्षतिग्रस्त किया. विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश कर चंद्रमोहन के साथ मारपीट करना अपराध था, पर गुजरात में अपराध का अर्थ दूसरा है. भाजपा तथा उसके अनुषंगी संगठनों से जुड़े सभी लोग वहां नैतिक हैं. पुलिस उनकी है. चंद्रमोहन को पुलिस ने भादंसं की धारा 153-ए के तहत गिरफ्तार किया. पांच दिन जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत मिली. पुलिस ने उपद्रवियों को नहीं, चंद्रमोहन को गिरफ्तार किया. कुलपति के कहने पर भी संकाय के अध्यक्ष (डीन) प्रोफेसर शिवजी पणिक्कर ने न तो प्रदर्शनी बंद की और न माफी मांगी. विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने यह प्रदर्शनी बंद करा दी. आरोप यह था कि इस प्रदर्शनी से हिंदुओं और ईसाइयों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं. भारतीय दंड संहिता में 153-ए और 295-ए ऐसी धाराएं हैं, जो धार्मिक भावनाओं के अपमान से जुड़ी हुई हैं. नामवर सिंह पर बनारस में राजनीति विज्ञान के अध्यापक कौशल किशोर मिश्र ने एक अदालत में नालिश की है. भारतीय दंड संहिता में उपर्युक्त धाराओं के अतिरिक्त कलाकारों, कवियों, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को परेशान करनेवाली अन्य कई धाराएं हैं.
इस मुद्दे पर भाजपा, उसके कार्यकर्ता और उसके सहयोगी, जो प्रोफेसर और कुलपति हैं, एकजुट हैं. यह एक चिंताजनक स्थिति है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए. सयाजीराव विवि के कुलपति ने विश्वविद्यालय की गरिमा घटायी है. संकाय के डीन पणिक्कर ने जहां प्रजातांत्रिक उसूलों और नियमों पर ध्यान दिया, वहां विश्वविद्यालय के अधिकारी उससे उदासीन ही नहीं, उसके विरुद्ध रहे. छात्रों ने जो विरोध-प्रदर्शनी लगायी, विश्वविद्यालय ने उसे बंद करा दिया. पणिक्कर ने अपने छात्रों के साथ परीक्षा संबंधी प्रदर्शनी का विरोध किया और विवि के अधिकारियों की आलोचना की. कुलपति ने उपद्रवियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. क्या कुलपति किसी राजनीतिक दल के एजेंट की तरह काम कर सकता है? सजा परीक्षार्थी की उत्तरपुस्तिका फाड़नेवालों को मिलनी चाहिए या परीक्षार्थी को? कुलपति ने एक कदम आगे बढ़ कर डीन को निलंबित कर दिया. रोमिला थापर और दीपक नैयर ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में कुलपति के कार्य को विश्वविद्यालय के अनुपयुक्त बताया है.
दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) में सयाजीराव विवि ने यूजीसी से 676.84 लाख रुपये प्राप्त किये हैं. यूजीसी विश्वविद्यालयों को राशि उनके अकादमिक विकास के लिए देती है. विश्वविद्यालय जैसे संस्थान राजनीतिक दलों और उनकी सरकारों के हित साधन के लिए नहीं हैं. परीक्षा को बाधित करना अपराध है और ऐसे अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए. सयाजीराव विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों ने यूजीसी को लिखा और अब मानव संसाधन मंत्रालय को यूजीसी की रिपोर्ट देखनी है.
भारतीय संस्कृति के स्वनियुक्त रक्षकों की संख्या बढ़ रही है. रचना-सृजन, सच बोलने और लिखने पर पाबंदियां लगायी जा रही हैं. कलाकार, लेखक, चित्रकार, फिल्मकार निशाने पर हैं. अगर अकादमिक संस्थाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला होता है, तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
नामवर, हुसैन और चंद्रमोहन- तीनों को अदालत के समक्ष उपस्थित होना है. जिन लोगों ने हुसैन की आंखें फोड़ने, हाथ काटने और सर कलम करने की धमकियां दीं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी. आज नामवर, हुसैन और चंद्रमोहन अभियुक्त हैं. कल दूसरे होंगे. यह सिलसिला थमनेवाला नहीं है. कला धर्म को क्षतिग्रस्त नहीं करती. धार्मिक मानक काल सापेक्ष हैं, जबकि कलाएं कालविहीन हैं. यह सार्थक और रचनात्मक अभिव्यक्तियों के विविध माध्यमों के लोगों के एकजुट होने का समय है.

प्रभात खबर से

हम सब एक टाइम बम पर बैठे हुए हैं : अरुंधति राय

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/27/2007 02:11:00 AM

मुकदमे की कानूनी जांच किये बिना आप किसी को फांसी कैसे दे सकते हैं?
अफ़ज़ल को अब तक फांसी नहीं पडी़ है और इसलिए यह बात दोहराने का हमारे लिए समय है, मगर ध्यान रहे कि वह सीमित ही है, कि उसके मुकदमे की फिर से जांच हो. संसद पर हमला और उसके बाद उसके आरोपितों के मामलों में कई अजीब घटनाएं घटी हैं इसलिए सारा मामला ही संदिग्ध हो जाता है. इस बातचीत में अरुंधति राय ने कई अहम सवाल उठाये हैं जो अब भी अनुत्तरित हैं. अफ़ज़ल का मुकदमा देश की न्यायपालिका के लिए एक कसौटी बन कर उभरा है और नागरिक समाज के सवाल अब भी न्यायपालिका ने नहीं दिये हैं. यह अनुवाद समयांतर के फ़रवरी अंक में प्रकाशित हुआ था. मगर इसमें मूल अंगरेज़ी से मिलाने पर कुछ त्रुटियां मिलीं जिनमें से कुछ सुधार दी गयी हैं. कुछ पंक्तियां मूल अंगरेज़ी से अनुवाद करते वक्त अनुवादक ने छोड़ दीं थीं, जिनमें से कुछ ज़रूरी पंक्तियों को इस प्रस्तुति में जोड़ दिया गया है. बाकी, जिनसे लगा कि कोई विशेष फ़र्क नहीं पड़ रहा है, उन्हें नहीं जोडा गया है.

अरूंधति रॉय से अमित सेनगुप्त की बातचीत

13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर पांच शस्त्रधारी लोगों ने हमला किया. कुछ लोगों का कहना है कि ये छह थे. पांच साल बीत गये. हम अभी तक यह नहीं जानते कि आखिर ये हमलावर कौन थे. नागरिक समाज का कहना है कि पुलिस ने कानून की धज्जियां उड़ा दीं. झूठे प्रमाण इकट्ठे किये और गलत बयानबाजी की. अफजल गुरु के बयान को गैर जिम्मेवार टीवी चैनलों ने खूब प्रचारित किया. फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने अफजल गुरु के गुनाह स्वीकार करने की घटना को खारिज कर दिया, जिसे सभी गैर जिम्मेवार टीवी चैनलों ने खूब प्रचारित-प्रसारित किया था, जो पुलिस की विशेष शाखा ने उन्हें मुहैया करायी थी. इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर एसएआर गिलानी को भी झूठी साजिश में फंसाया गया था, जिसकी वजह से वे फांसी के फंदे से बाल-बाल बचे. अरुंधति राय, समाजशास्त्री रजनी कोठारी सहित प्रसिद्ध नागरिकों द्वारा मृत्युदंड का विरोध भी किया गया था. गिलानी बरी हुए. अरुंधति रॉय कहती हैं कि आज तक उन पांच या छह हमलावरों के बारे में कोई नहीं जानता है. क्या यह सब अंदर की बात है? इस साक्षात्कार में अरुंधति राय से इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की गयी है. न तो कोई जानता है और न ही स्पष्ट रूप से सिद्ध कर सकता है, क्योंकि पुलिस, जांच एजेंसियां और मीडिया सब मिल कर इस पर प्रचार और झूठ का मुलम्मा चढ़ा रहे हैं. अब कसूरवार होने के सही सबूत न मिलने पर भी साजिश के तहत अफजल गुरु को फांसी की सजा सुना दी गयी है. न्यायालय में मुकदमे की जांच के समय उसकी ओर से कोई कानूनी प्रतिनिधि नहीं था. इसलिए मुकदमे की दोबारा न्यायिक जांच की मांग की जा रही है. तो दूसरी ओर भाजपा उसे फांसी दिलाने पर तुली हुई है. मुकदमे की कानूनी जांच किये बिना आप किसी को फांसी कैसे दे सकते हैं?

अरुंधति राय ने 12 दिसंबर को दिल्ली में खचाखच भरे एक आडिटोरियम में पेंगुइन द्वारा प्रकाशित एक नयी किताब 13 दिसंबर : ए रीडर. द स्ट्रेंज केस आफ़ द अटैक आन द इंडिया पार्लियामेंट का विमोचन किया. इस पुस्तक में विभिन्न विद्वानों पत्रकारों और वकीलों द्वारा लिखे गये 15 निबंध हैं, जिन्होंने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर संसद हमले के मुद्दे पर संदेहास्पद जांच और पक्षपातपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ गंभीर प्रश्न उठाये हैं. रीडर में अरुंधति राय द्वारा लिखा गया एक इंट्रोडक्शन है. लेखकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि संसद पर किये गये इस हमले से एक ओर पाकिस्तान से सैनिक मोरचाबंदी हुई वहीं उपमहाद्वीप में परमाणु युद्ध का खतरा हो गया. हजारों मासूमों की जानें गयीं और करोड़ों रुपये की बरबादी के बावजूद इस मामले की जांच की कोई आवश्यकता महसूस नहीं की गयी. राय ने 13 सवाल उठाये हैं जो अभी तक अनुत्तरित हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी है कि क्या बिना किसी ठोस सबूत और कानूनी प्रतिनिधित्व के अफजल को फांसी दे दी जायेगी?

क्या कट्टरवादी इसलामी आतंकवाद एक सच्चाई है या धोखा या फिर यह भारतीय व्यवस्था की प्रचार मशीनरी और जांच सूत्रों द्वारा बनायी गयी साजिश है?
यह न तो पूरी तरह झूठ है और न ही पूरा सच. राबर्ट पेप ने अपनी पुस्तक डाइंग टू विन में बताया है कि कैसे आत्मघाती दस्ते नवउपनिवेशवाद से लड़ने में कारगर रहे हैं. जिसे हम इसलामी आतंकवाद या इसलामी कट्टरवाद जैसे खतरे के रूप में चिह्रित करते हैं, उसका मुक्ति संघर्षों में काफी बड़ा योगदान है. मुक्ति संघर्ष में लोगों को एक सूत्र में पिरोने के लिए धर्म का सहारा लेना कोई नयी बात नहीं है. कट्टरवाद का दूसरा पहलू यह है कि जब लोग खुद को एक विशेष वर्ग या धर्म से जुड़ा मानते हैं तो वे अपने में ही सिमट जाते हैं. इसका तीसरा जटिल रूप यह है कि इसलामी कट्टरवाद अब इस रूप में बदनाम हो गया है कि वे कब्जे के लिए लड़ रहे हैं. और इसलिए वे हमलावर हैं. शुरू में फ़लस्तीन में हमास के साथ हो चुका है, जिससे फ़लस्तीन मुक्ति मोरचा (पीएलओ) जैसा धर्म निरपेक्ष संगठन भी बदनाम हो गया. कश्मीर में भी यही सब हो रहा है. क्योंकि अगर वे प्रतिरोध को कुछ पागल, सनकी लोगों के रूप में जो दुनिया को ध्वस्त करने पर उतारू हैं, चित्रित कर दें तो वे युद्ध का अधिकतर हिस्सा वे जीत चुके होंगे. जो कोई भी कश्मीर में इसलामी कट्टरता की बात करता है उसे देखना चाहिए कि वहां से ज्यादा बुरका मुंबई या पुरानी दिल्ली में महिलाएं पहनती हैं. आप ग्रामीण बिहार की महिलाओं को कश्मीर की महिलाओं से ज्यादा शोषित पायेंगे. लेकिन जहां पुलिस ओर सैन्य बल जितने ही क्रूर होंगे जनता भी वैसी होगी.

लश्कर-ए-तोइबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे इसलामी आतंकी संगठनों पर आपकी क्या राय है?
मैं उनके बारे में ज्यादा नहीं जानती लेकिन इतना कह सकती हूं कि कश्मीर में इन्हें कोई आतंकी संगठन के रूप में नहीं मानता. ज्यादातर लोग इसे आजादी के संघर्ष के लिए जरूरी मानते हैं. उनके बारे में दिल्ली के लोगों की सोच और कश्मीर के लोगों की सोच में काफी अंतर है.

अगर श्रीनगर में एक बम फटने से स्कूल जाते हुए बच्चे मर जाते हैं तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?
बहुत भयानक. लेकिन मुझे मीडिया/प्रेस रिपोर्टों को पढ़/देख कर यह नहीं मालूम होगा कि यह सब कौन करता है. वे मिलिटेंट हो सकते हैं मगर समान रूप से वे सुरक्षा बल, पुलिस, कोई धोखेबाज या सरेंडर किया हुआ मिलिटेंट जो पुलिस के लिए काम कर रहा हो, भी हो सकता है. यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है. सच बताना लोगों के लिए बहुत कठिन है. शायद उनसे सच उगलवाया भी नहीं जा सकता. कश्मीर ऐसी घाटी है जहां सैनिक हैं, मिलिटेंट हैं, हथियार है, गोला-बारूद है, जासूस, दोतरफा, एजेंट खुफिया एजेंसी, एनजीओ और बेहिसाब पैसा है. कुछ-से-कुछ होता रहता है वहां. सेना वहां अनाथालय और सिलाई केंद्र चला रही है. टीवी चैनल केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय का है. ऐसे में यह बताना कठिन है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है, कौन किसका इस्तेमाल कर रहा है. कभी-कभी लोग खुद भी यह नहीं जान पाते हैं कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं या उन्हें किसने लगा रखा है.

क्या आपको लगता है कि भारत में मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया गया है?
हां. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी तो अप्रत्यक्ष रूप से यही कहा गया है. (यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त समिति द्वारा तैयार की गयी है, जिसमें कहा गया है कि भारतीय मुसलमान देश का सबसे गरीब पिछड़ा, अशिक्षित और बदहाल समुदाय है, जिसे उच्च या मध्यमवर्गीय नौकरियों में प्रतिनिधित्व ही नहीं मिल पाया है.) गुजरात में जो हो रहा है, मानवता के खिलाफ अपराध है. भाजपा के नेतृत्व में 2002 में दक्षिणपंथी हिंदुओं द्वारा मुसलिम विरोधी नरसंहार में 2000 मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया. 1,50,000 को बेघर कर दिया गया. पुनर्वास के बजाय उन्हें पूरी तरह से उजाड़ दिया गया है और अब राज्य से भी बाहर भगाया जा रहा है. हमारी धर्मनिरपेक्ष सरकार भी चुप्पी लगाये हुए है, जिसमें वामपंथी भी शामिल हैं. 2002 की हिंसा तो सबने देखी, लेकिन यह अदृश्य फासीवादी हिंसा भी उतनी ही भयावह है. ऐसा लगता है कि मुसलमान के बारे में हम केवल यही बात करते हैं कि वह या तो पीडि़त है या आतंकवादी. मुझे लगता है कि हम सब एक टाइमबम के ऊपर बैठे हैं.

क्या आपको लगता है कि 13 दिसंबर का हमला कोई साजिश का हिस्सा तो नहीं?

यह इस पर निर्भर करता है कि अंदर क्या है और बाहर क्या है. मैं नहीं समझती कि हम यह कर सकते हैं. वास्तव में एक के ऊपर एक रखी परतों को खोल कर देखा जाये तो शुरू में ही सच्चाई साफ हो जाती है, जिसमें संसद, न्यायपालिका, मास मीडिया और जब निचली सतह पर कश्मीर में सुरक्षा तंत्र तक पहुंचते हैं तो एसटीएफ़, एसओजी आदि जासूसों, मुखबिरों, सरेंडर मिलिटेंटों आदि के साथ आपस में घुलमिल जाते हैं. ससंद पर हमले के मामले में भी यही खुलासा होना बाकी है. हम यह नहीं जानते हैं कि इसके पीछे कौन लोग थे. बस इतना जानते हैं कि अरेस्ट मेमो से छड़्छाड़ की गयी, जो भी कार्रवाई हुई, उसमें सबूतों और गवाहों को झूठ और दबाव का जामा पहनाया गया था और स्वीकारोक्तियां यातना के भीतर से निकलीं. क्यों? आप कोई रॉकेट वैज्ञानिक तो नहीं है कि अनुमान लगा लेंगे कि जब कोई झूठ बोलता है तो इसका मतलब है कि वह कुछ छिपा रहा है. वह क्या है है, यह हमें जानना है और इसे जानने का मुझे पूरा हक है.

अनुवाद : जितेंद्र कुमार

गुजरात बनता सारा देश

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/26/2007 12:53:00 AM

यह पोस्ट किसी ब्लागर की खुराफ़ात के कारण कल नारद पर दिख नहीं पायी. इसलिए इसे फिर से पोस्ट किया जा रहा है.

अपने समय के कई सवाल हमारे समय जवाब के इंतज़ार में हैं. क्या हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बंधक समय में यों ही रहते रहेंगे? क्या इस समय से निकलने का रास्ता नहीं? क्या सारा देश इसी तरह गुजरात में बदलता रहेगा और हम अपने दड़बों में सिकुडे़ सहमे बैठे रहेंगे? क्या इस गुजरात का मुकाबला करने का समय अब नहीं आ गया है? क्या इस देश की बहुप्रचारित आज़ादी का यही मतलब रह गया है कि भगवाधारी अपना मध्ययुगीन कचडा़ हम पर उंडे़लते रहें, पूरे देश को एक भयावह मोदीयुग में धकेलते रहें और देश का पूरा ढांचा उसके आगे दंडवत हो जाये? जैसा अपूर्वानंद जी ने सवाल उठाया है क्या आज गा़लिब होते, कबीर होते, मीरां होतीं तो हम उन्हें यों ही अदालतों में घसीटते और अदालतें यह तय करतीं कि गालिब कौन-सा दोहा लिखें और कौन जला दें, मीरां क्या गायें और क्या न गायें और गा़लिब की कौन-सी गज़ल आपत्तिजनक है? आप भले इससे इनकार करें, हम ठीक ऐसे ही दौर से गुज़र रहे हैं. और हमें अपने समय के इन सवालों से कतरा कर निकलने के बजाय उनसे जूझने की ज़रूरत है.

तर्क और तरकश

अपूर्वानंद

क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है?

भारतीय न्याय व्यवथा की आरंभिक इकाइयों की निगाह में नामवर सिंह, एमएफ हुसेन और चंद्रमोहन एक मायने में समान हैं. अलग-अलग जगहों पर निचली अदालतों ने तीनों को ही अलग-अलग मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 295ए के तहत मुकदमों में हाजिर होने का हुक्म सुनाया है. इन धाराओं का संबंध में ऐसे अपराध से है, जो विभिन्न समुदायों के बीच धर्म, नस्ल, जन्मस्थल, निवास, जाति या समुदाय के आधार पर शत्रुता पैदा करने और सौहार्द बिगाड़ने की नीयत से और किसी समुदाय के धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के लिए जान-बूझ कर द्वेषपूर्ण कृत्य के रूप में किया गया हो.
हुसेन पर कई शहरों की निचली अदालतों में इन धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज हुए और हर जगह से उन्हें अदालत में पेश होने का हुक्म सुनाया गया. ध्यान देने की बात यह है कि इन धाराओं में वर्णित अपराधों की सुनवाई प्रथम श्रेणी मजिस्टेट द्वारा की जानी होती है और ये गैर-जमानती हैं. पुलिस को मामले की तहकीकात करनी ही होगी. विधिवेत्ता राजीव धवन के अनुसार ऐसे मामले में पुलिस को गिरफ्तार करने का हक है, लेकिन जमानत देने का अधिकार नहीं है. हालांकि गिरफ्तारी की अवधि साठ दिनों की है, लेकिन धवन के मुताबिक उस व्यक्ति को दिमागी, शारीरिक और आत्मिक नुकसान हो ही चुका होता है. 2006 के पहले ऐसे मामलों में आगे बढ़ने के पहले राज्य की अनुमति जरूरी होती थी. पर 2006 में उच्च्तम न्यायालय ने पैस्टर राजू बनाम कर्नाटक राज्य के मुकदमे में कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस निर्णय को पलट दिया, जिसके हिसाब से तहकीकात के दौरान, पुलिस अभियुक्त को हिरासत में नहीं ले सकती. इसके चलते अब हुसेन हों या चंद्रमोहन या नामवर सिंह, गिरफ्तारी का खतरा तीनों पर है.
















जब-जब फ़ासीवाद समाज, कला और राजनीति को खरोंचने की कोशिश करता है, याद आती है पिकासो की गुएर्निका. यह आज भी गुजरातों और केसरिया फ़ासीवाद समेत सभी तरह के फ़ासीवाद के खिलाफ़ लडा़ई में हमारे लिए रोशनी की मीनार की तरह है.


हुसेन अब तक किसी मामले में गिरफ्तार नहीं हुए हैं, लेकिन पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली और मुंबई पुलिस को उनके खिलाफ मुनासिब कार्रवाई के आदेश देने के बाद यह खतरा उन पर बढ़ तो गया ही है. महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा के कला संकाय के अंतिम वर्ष के छात्र चंद्रमोहन को छह दिनों तक हिरासत में रहना पड़ा. नामवर सिंह को अभी बनारस के मजिस्ट्रेट ने अपने सामने हाजिर होने को कहा है.
नामवर सिंह ने पिछले दिनों बनारस में आयोजित किसी गोष्ठी में सुमित्रानंदन पंत की एक चौथाई रचनाओं को कूड़ा कहा, ऐसा बताते हैं. इससे पंत जी के समर्थकों या उपासकों की भावनाओं को चोट पहुंची. जख्म इतना गहरा था कि वे अदालत तक नामवर सिंह के खिलाफ गुहार लगाने पहुंच गये. जिन्होंने भी इस लायक समझा कि मामला दर्ज किया जाये, वे निश्चय ही आहत भावनाओं के प्रति सहानुभूतिशील होंगे. न्यायिक प्रावधानों का इतने हास्यास्पद ढंग से दुरुपयोग भारत में सभ्य विचार-विमर्श को किस तरह के झटके दे सकता है, इसका अनुमान संबंधित न्यायिक अधिकारियों को शायद नहीं है. अमर्त्य सेन भारत को तर्क करनेवालों की परंपरा का देश कहते हैं. उनकी इस गर्वपूर्ण उक्ति पर पिछले सालों में जिम्मेदारी की जगह से होनेवाले ऐसे फैसलों की वजह से निश्चय ही सवालिया निशान लग गया है. चंद्रमोहन पर हमले के बाद हमलावर द्वारा ही की गयी शिकायत के बाद उसे गिरफ्तार कर लेना अत्यंत ही गंभीर घटना थी.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने ठीक ही सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा को नोटिस जारी किया और पूरे मामले पर रिपोर्ट मांगी. कुछ लोग इसे केंद्रीय हस्तक्षेप के रूप में देखेंगे, लेकिन वडोदरा का मामला लितना कला और अभिव्यक्ति पर आक्रमण का नहीं था, उतना एक अकादेमिक संस्था का खुद को विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल जैसे आततायियों के सुपुर्द कर देने का था. प्रासंगिक प्रश्न यह है कि कला संकाय में होनेवाले इम्तहान में कौन-सा छात्र कौन-सी कृति प्रविष्टि के रूप में देने जा रहा है, यह खबर बाहर कैसे गयी? यह अधिकार क्या किसी को दिया जा सकता है कि वह परीक्षा कक्ष में घुस जाये? क्या इम्तहान में लिखे जाने या दिये जानेवाले उत्तरों पर परीक्षक के अलावा किसी को टिप्पणी करने का हक है? ये वे आरंभिक प्रश्न हैं जो चंद्रमोहन के मामले में संबंधित न्यायिक अधिकारी को पूछने चाहिए थे, पर शायद पूछे नहीं गये. हुसेन के मामले में भी मामला दर्ज करने के पहले यह पूछा जा सकता था कि क्या वे सार्वजनिक प्रचार सामग्री तैयार कर रहे थे. कलाकृतियों को क्या सार्वजनिक बयान या भाषण के बराबर का दर्जा दिया जाना उचित है? किसी निजी-संग्रह में या सीमित पहुंचवाली कला दीर्घा में लगी कलाकृति को क्या दो समुदायों के बीच विद्वेष भड़काने के उद्देश्य से प्रेरित बताना तर्कपूर्ण है?
नामवर सिंह के खिलाफ दर्ज मामला चंद्रमोहन या हुसेनवाले मामलों की श्रेणी का नहीं क्योंकि पहले दोनों ही प्रसंगों में संघ से जुड़े संगठन की योजना है, जबकि नामवर सिंह के प्रसंग में ऐसा नहीं है. लेकिन तीनों के ही सिलसिले में यह प्रश्न तो प्रसंगिक है ही: क्या हमारे देश में सार्वजनिक विचार-विमर्श या व्यक्तिगत रचनाशीलता के लिए स्थान घटता जा रहा है? क्या 21वीं सदी में गालिब का होना खतरनाक नहीं? क्या वे धर्म और धर्मोपदेशक की खिल्ली उड़ाने को स्वतंत्र होंगे? उसी प्रकार क्या प्रेमचंद या हरिशंकर परसाई का लेखन अबाधित रह पायेगा? मजाक उड़ाना, व्यंग्य करना कला और साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा रहा है. कलाकार अपनी ही मूर्ति बनाता और ढालना नहीं है, वह बने बनाये गये बुतों को ध्वस्त कर सकता है. अगर बुतपरस्ती वह करता है, तो बुतशिकन भी उसे होना ही होगा. पर क्या हमारे दौर में कला के क्या रचना के स्वभाव से अंतर्भूत बुतशिकनी की इजाजत है?

क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है? आखिरकार, दीपा मेहता अपनी फिल्म वाटर भारत में नहीं बना सकीं, हुसेन लंबे समय से भारत से निर्वासन में हैं, कला दीर्घाओं के मालिक गुजरात में ही नहीं, अन्यत्र भी कलाकारों को असुविधाजनक कलाकृतियां प्रदर्शित न करने की भद्र सलाह दे रहे हैं. जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी किताब पर अदालत द्वारा पाबंदी हटाये जाने के बाद भी शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के आक्रामक बयानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.
क्या तर्क वागीशों का यह देश मूर्खता के प्रदेश में बदल रहा है? 1857 के 150वें, भगत सिंह के 100वें और आजादी के 60वें साल में यह दुर्भाग्यपूर्ण प्रश्न हमारे सामने है.

अपूर्वानंद जी का यह आलेख जनसता के 23 मई के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ है. वहां से साभार.

वे अब किसके लिए आयेंगे ?

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/25/2007 01:29:00 AM

हम पहले भी बता चुके हैं, किस तरह देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबायी जा रही है. डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी के बाद छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के अध्यक्ष राजेंद्र सायल को भी गिरफ़्तार कर लिया गया है. बहुचर्चित शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड मामले में अदालत के फैसले पर टिप्पणी करने के आरोप में उनको आज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। लगभग नौ साल पहले की गई इस टिप्पणी पर जबलपुर हाईकोर्ट ने उन्हें छ: माह की सजा सुनाई थी। श्री सायल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील करने पर सजा की अवधि कम कर एक सप्ताह तय कर दी गई। विस्तार से जानें देशबंधु पर. यहां हम डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी पर देशबंधु में छपे अनिल चमड़िया के आलेख को पुनर्प्रस्तुत कर रहे हैं. हम इस मुद्दे को भी नामवर सिंह, चंद्रमोहन, हुसेन आदि मामलों से अलग कर के नहीं देख रहे.

डॉ. विनायक सेन का सिलसिला नहीं रूका तो...


अनिल चमड़िया
दिल्ली के प्रेस क्लब में पूर्व न्यायाधीश राजिन्दर सच्चर, वकील प्रशांत भूषण, लेखिका अरूंधति राय, जेपी आंदोलन के नेता अख्तर हुसैन, विधायक डॉ. सुनीलम और दूसरे कई लोग मीडिया वालों से यह अनुरोध कर रहे थे कि छत्तीसगढ़ में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी की सूचना छापने की कृपा करें। उन्हें चौदह मई को बिलासपुर में जन सुरक्षा विशेष कानून 2005 और गैर कानूनी गतिविधि रोधक कानून 1967 के तहत गिरफ्तार किया गया था। डॉ. विनायक सेन पहले दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में डॉक्टर थे। लेकिन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नेता शंकर गुहा नियोगी के आंदोलन के प्रभाव में आकर वे आदिवासियों के बीच वहां जाकर काम करने लगे। कामगारों द्वारा चलाए जाने वाला शहीद अस्पताल खड़ा किया। इन दिनों खासतौर से यह देखा जाता है कि मीडिया के पत्रकारों की मानसकिता कामगारों की तरह नहीं रही। वे अधिकारियों की तरह सोचते और हुक्म देते हैं। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के संबंध में भी उन्हाेंने पुलिस के आरोपों की तरफ से सोचना शुरू किया। इसीलिए उनके भीतर लोकतंत्र के मूल्य बोध को जगाने की कोशिश करनी पड़ रही है। एक व्यापारी पीयूष गुहा ने पुलिस द्वारा खुद को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखे जाने के दौरान यह बयान दिया है कि डॉ. विनायक सेन का माओवादियों से रिश्ता हैं। स्टिंग आपरेशन में फंसे छत्तीसगढ़ के एक सांसद संसद भवन में तो यह तक कह रहे थे कि उन्हें पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने बताया है कि उनके पास पक्के सबूत हैं। रायपुर जेल तक उड़ाने की योजना थी। इसीलिए एक बड़े नक्सलवादी को (संभवत: नारायण सन्याल) को वहां से बिलासपुर की जेल में भेज दिया गया है। पिछले पचास-साठ वर्षों में ऐसे न जाने कितने उदाहरण मिल सकते हैं जिसमें कि सरकार और पुलिस ने लोगों के लिए लड़ने वाले या लोकतंत्र के पक्ष में बोलने वालों के खिलाफ तरह-तरह के आरोपों में मुकदमें लादे हैं। कांग्रेस की सरकारों ने शासन के ढांचे को इस दिशा में मजबूत किया। इंदिरा गांधी तानाशाही तक पहुंच गईं। आपातकाल लगाया। देश के बडे-बड़े नेताओं को बड़ौदा डायनामाइट कांड में फंसाया था। सरकार अपने विरोधियों को पकड़वाने के बाद हमेशा ही कहती है कि उसके पास पुख्ता सबूत हैं। लेकिन इस देश में क्या कभी देश के किसी बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ पुख्ता सबूत साबित हो सकें?
यहां इस बात से ज्यादा चिंता हो रही है कि सरकारी मशीनरियां तेजी से फासीवाद की तरफ बढ़ रही हैं। आपातकाल लगा तो विरोध हुआ। न्यायपालिका ने घुटने टेके। लेकिन मीडिया के कम से कम एक हिस्से ने तो लड़ाई लड़ी। कई पत्रकार जेल गए। संसदीय राजनीतिक पाटयों से लेकर नक्सलवादियों तक ने तानाशाही के खिलाफ एकजुटता दिखाई। लेकिन आपातकाल के बाद सत्ता मशीनरी ने दमन के साथ-साथ उसके विरोध की ताकतों को तरह-तरह से अलग-थलग किया और अब अमेरिकी शासन शैली को स्वीकृति मिलने के बाद तो वह आक्रमकता की स्थिति में आ गई है। मीडिया की पूरी मानसिकता इस तरह से तैयार की जा रही है कि वह सरकारी मशीनरी की तरह सोचे। वह लोकतंत्र का कोई सवाल ही नहीं खड़ा करें। सरकारी नीतियों की वजह से संघर्ष की परिस्थितियां खड़ी हो तो वह नीतियों के बजाय संघर्ष को विकास विरोधी बताने की मुहिम में शामिल हो। संघर्षों को राष्ट्र विरोधी तक करार करने के तर्कों में मददगार हो। शासन व्यवस्था के पास एक बड़ा हथियार पहले ही मौजूद है। किसी संघर्ष को हिंसक बताकर उसे कानून एवं व्यवस्था के समस्या के रूप में खड़ी करे। वह शांति की एकतरफा जिम्मेदारी स्थापित करने में कामयाब होती रही है। इस गणतांत्रिक ढांचे में यह भी किया गया है कि राय और केन्द्र की नीतियों को एक रूप करने के तरीके खोजे गए। छत्तीसगढ़ की सरकार जब दमन करे तो केन्द्र सरकार कानून एवं व्यवस्था को राय का विषय बता दे और जब छत्तीसगढ़ में कानून एवं व्यवस्था के नाम पर दमन की कार्रवाइयां चलाने के लिए फौज की जरूरत हो तो केन्द्र सरकार उसे अपना राष्ट्रीय और संवैधानिक कर्तव्य बताए। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल से एक प्रतिनिधिमंडल मिला तो उन्होंने कहा कि ये छत्तीसगढ़ का मामला है और वे केवल सरकार को लिखकर पूछ सकते हैं। प्रतिनिधिमंडल चाहें तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायालय में जा सकता है। देश का गृहमंत्री किन मामलों में लाचार दिखने लगा है?
छत्तीसगढ़ एक ऐसा उदाहरण है जहां संसदीय लोकतंत्र में संस्थाओं के स्तर पर दिखने वाले भेद मिट गए हैं। छत्तीसगढ़ आदिवासियों के राय के रूप में अलग हुआ। आदिवासी विधायक बहुमत में चुनाव जीते लेकिन सरकार का नेतृत्व गैर आदिवासी करता है। भाजपा की सरकार है और सलवा-जुडूम कांग्रेस के नेतृत्व चलता में हैं। सलवा-जुडूम के जुर्मों के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग चुप है। न्यायालय में इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने वहां की स्थितियां बयान की है। अनुभव रहा है कि सत्ता मशीनरी जिस संघर्ष को राष्ट्र विरोधी, विकास विरोधी और हिंसक के रूप में स्थापित करने के तर्कों को समाज के मध्य वर्ग तक ले जाने में सफल हो जा रहा है तो उसके खिलाफ तमाम संस्थाओं की राय एक सी बन जाती है। सरकारी मशीनरियों को कौन सा एक आक्रमक विचार संचालित कर रहा है?
छत्तीसगढ़ में जन सुरक्षा विशेष कानून 2005 बना है, वह पोटा से भी ज्यादा दमनकारी है। लेकिन उसे लेकर कोई मतभेद छत्तीसगढ़ की दोनों सत्ताधारी पाटयों के बीच नहीं दिखा। दरअसल कांग्रेस और भाजपा की नीतियों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। कांग्रेस ने जो दमनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया है, भाजपा उसका इस्तेमाल ही नहीं करना चाहती है बल्कि उसे और मजबूत करना चाहती है। कांग्रेस ने टाडा लगाया तो भाजपा ने पोटा लगाया। पोटा खत्म किया तो राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर गैरकानूनी गतिविधि रोधक कानून 1967 में उसके प्रावधानों को जोड़ दिया गया। दोनों ही पाटयों का सामाजिक, आथक और राजनीतिक आधार एक है। कांग्रेस के जमाने में जिस तरह से दलितों और आदिवासियों को नक्सलवादी के नाम पर मारा गया है उसी तरह से भाजपा शासित रायों में भी मारा गया है। छत्तीसगढ़ में सलवा-जुडूम की ज्यादतियों को लेकर देश के उन बड़े अधिकारियों एवं न्यायाधीशों ने कई कई रिपोटर्ें पेश की हैं जो भारत सरकार के महत्वपूर्ण ओहदे पर रह चुके हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने वाले प्रोफेसर्स, पत्रकारों, वकीलों ने बताया कि कैसे छत्तीसगढ़ में आदिवासी मारे जा रहे हैं। अमेरिका ने कहा था कि जो हमारे साथ नहीं है वह आतंकवाद के साथ है। छत्तीसगढ़ में इसी वाक्य को दोहराया गया कि जो सलवा-जुडूम के साथ नहीं है वो माओवादियों के साथ है। जब राजनैतिक सत्ता इस तरह से आक्रमक हो जाए तो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है। यहां तो सरकार के साथ हां में हां नहीं मिलाने वाले सभी के सभी माओवादी माने जा सकते हैं। संसदीय लोकतंत्र का ढांचा इस तरह का समझा जाता रहा है कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों और मूल्यों पर हमलों पर अंकुश लगाने की गुंजाइश रहती है। लेकिन अनुभव बताता है कि पूरा ढांचा एकरूप हो चुका है। ऐसी स्थितियों के लिए ही मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। मीडिया भी जब सरकारी संस्थाओं की तरह सोचने लगे तो लोकतंत्र में लोग अपनी बात कहने के लिए कहां जा सकते हैं? जब लोकतंत्र ही नहीं बचेगा तो मीडिया अपनी ताकत को कैसे बचाकर रख सकेगा। लोकतंत्र एक सिद्धांत है और यह सोचना कि वह किसी मामले में तो लोकतंत्र की आवाज उठाएगा और किसी में नहीं तो वह गफलत में है। स्टार न्यूज के मुंबई दफ्तर पर हमले के बाद पिछले दिनों दिल्ली के प्रेस क्लब में हुई विरोध सभा में चंद ही लोग जमा हो सके।
लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए पिछले वर्षों में जो कुछ हासिल किया उस पर तेजी से हमले हो रहे है। लोकतंत्र के मूल्यों पर हमले के लिए राष्ट्रवाद और शांति की आड़ ली जाती है। सत्ता मशीनरी बराबर इस किस्म की दुविधा पैदा करने की कोशिश करती है। राष्ट्र चाहिए या लोकतंत्र? लेकिन जागरूकता इसी में सिद्ध होती है कि वह दो में से एक के चुनाव करने के प्रश्न के तरीके को ही ध्वस्त कर दे। राष्ट्र अपनी व्यवस्था के लिए जाना जाता है। राष्ट्र की जब व्यवस्था ही लोकतांत्रिक नहीं होगी तो उसका क्या अर्थ रह जाता है? लगातार शांतिपूर्ण संघर्षों की उपेक्षा जानबूझकर की जा रही है। उन बुद्धिजीवियों को ठिकाने लगाने का है जो जन संघर्षों के साथ रहते हैं। छत्तीसगढ़ भारतीय समाज व्यवस्था की भविष्य की नीति की जमीन तैयार कर रहा है। देश का बड़ा हिस्सा आदिवासियों जैसा ही होता जा रहा है। यह सोचना कि वहां आदिवासी मारे जा रहे हैं, ऐसा नहीं है। आदिवासी जैसे हालात में रहने वाले लोग मारे जा रहे हैं।

गुजरात बनता सारा देश

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/25/2007 12:52:00 AM















जब-जब फ़ासीवाद समाज, कला और राजनीति को खरोंचने की कोशिश करता है, याद आती है पिकासो की गुएर्निका. यह आज भी गुजरातों और केसरिया फ़ासीवाद समेत सभी तरह के फ़ासीवाद के खिलाफ़ लडा़ई में हमारे लिए रोशनी की मीनार की तरह है.


अपने समय के कई सवाल हमारे समय जवाब के इंतज़ार में हैं. क्या हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बंधक समय में यों ही रहते रहेंगे? क्या इस समय से निकलने का रास्ता नहीं? क्या सारा देश इसी तरह गुजरात में बदलता रहेगा और हम अपने दड़बों में सिकुडे़ सहमे बैठे रहेंगे? क्या इस गुजरात का मुकाबला करने का समय अब नहीं आ गया है? क्या इस देश की बहुप्रचारित आज़ादी का यही मतलब रह गया है कि भगवाधारी अपना मध्ययुगीन कचडा़ हम पर उंडे़लते रहें, पूरे देश को एक भयावह मोदीयुग में धकेलते रहें और देश का पूरा ढांचा उसके आगे दंडवत हो जाये? जैसा
अपूर्वानंद जी ने सवाल उठाया है क्या आज गा़लिब होते, कबीर होते, मीरां होतीं तो हम उन्हें यों ही अदालतों में घसीटते और अदालतें यह तय करतीं कि गालिब कौन-सा दोहा लिखें और कौन जला दें, मीरां क्या गायें और क्या न गायें और गा़लिब की कौन-सी गज़ल आपत्तिजनक है? आप भले इससे इनकार करें, हम ठीक ऐसे ही दौर से गुज़र रहे हैं. और हमें अपने समय के इन सवालों से कतरा कर निकलने के बजाय उनसे जूझने की ज़रूरत है.


तर्क और तरकश

अपूर्वानंद

क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है?

भारतीय न्याय व्यवथा की आरंभिक इकाइयों की निगाह में नामवर सिंह, एमएफ हुसेन और चंद्रमोहन एक मायने में समान हैं. अलग-अलग जगहों पर निचली अदालतों ने तीनों को ही अलग-अलग मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 295ए के तहत मुकदमों में हाजिर होने का हुक्म सुनाया है. इन धाराओं का संबंध में ऐसे अपराध से है, जो विभिन्न समुदायों के बीच धर्म, नस्ल, जन्मस्थल, निवास, जाति या समुदाय के आधार पर शत्रुता पैदा करने और सौहार्द बिगाड़ने की नीयत से और किसी समुदाय के धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के लिए जान-बूझ कर द्वेषपूर्ण कृत्य के रूप में किया गया हो.
हुसेन पर कई शहरों की निचली अदालतों में इन धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज हुए और हर जगह से उन्हें अदालत में पेश होने का हुक्म सुनाया गया. ध्यान देने की बात यह है कि इन धाराओं में वर्णित अपराधों की सुनवाई प्रथम श्रेणी मजिस्टेट द्वारा की जानी होती है और ये गैर-जमानती हैं. पुलिस को मामले की तहकीकात करनी ही होगी. विधिवेत्ता राजीव धवन के अनुसार ऐसे मामले में पुलिस को गिरफ्तार करने का हक है, लेकिन जमानत देने का अधिकार नहीं है. हालांकि गिरफ्तारी की अवधि साठ दिनों की है, लेकिन धवन के मुताबिक उस व्यक्ति को दिमागी, शारीरिक और आत्मिक नुकसान हो ही चुका होता है. 2006 के पहले ऐसे मामलों में आगे बढ़ने के पहले राज्य की अनुमति जरूरी होती थी. पर 2006 में उच्च्तम न्यायालय ने पैस्टर राजू बनाम कर्नाटक राज्य के मुकदमे में कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस निर्णय को पलट दिया, जिसके हिसाब से तहकीकात के दौरान, पुलिस अभियुक्त को हिरासत में नहीं ले सकती. इसके चलते अब हुसेन हों या चंद्रमोहन या नामवर सिंह, गिरफ्तारी का खतरा तीनों पर है.
हुसेन अब तक किसी मामले में गिरफ्तार नहीं हुए हैं, लेकिन पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली और मुंबई पुलिस को उनके खिलाफ मुनासिब कार्रवाई के आदेश देने के बाद यह खतरा उन पर बढ़ तो गया ही है. महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा के कला संकाय के अंतिम वर्ष के छात्र चंद्रमोहन को छह दिनों तक हिरासत में रहना पड़ा. नामवर सिंह को अभी बनारस के मजिस्ट्रेट ने अपने सामने हाजिर होने को कहा है.
नामवर सिंह ने पिछले दिनों बनारस में आयोजित किसी गोष्ठी में सुमित्रानंदन पंत की एक चौथाई रचनाओं को कूड़ा कहा, ऐसा बताते हैं. इससे पंत जी के समर्थकों या उपासकों की भावनाओं को चोट पहुंची. जख्म इतना गहरा था कि वे अदालत तक नामवर सिंह के खिलाफ गुहार लगाने पहुंच गये. जिन्होंने भी इस लायक समझा कि मामला दर्ज किया जाये, वे निश्चय ही आहत भावनाओं के प्रति सहानुभूतिशील होंगे. न्यायिक प्रावधानों का इतने हास्यास्पद ढंग से दुरुपयोग भारत में सभ्य विचार-विमर्श को किस तरह के झटके दे सकता है, इसका अनुमान संबंधित न्यायिक अधिकारियों को शायद नहीं है. अमर्त्य सेन भारत को तर्क करनेवालों की परंपरा का देश कहते हैं. उनकी इस गर्वपूर्ण उक्ति पर पिछले सालों में जिम्मेदारी की जगह से होनेवाले ऐसे फैसलों की वजह से निश्चय ही सवालिया निशान लग गया है. चंद्रमोहन पर हमले के बाद हमलावर द्वारा ही की गयी शिकायत के बाद उसे गिरफ्तार कर लेना अत्यंत ही गंभीर घटना थी.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने ठीक ही सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा को नोटिस जारी किया और पूरे मामले पर रिपोर्ट मांगी. कुछ लोग इसे केंद्रीय हस्तक्षेप के रूप में देखेंगे, लेकिन वडोदरा का मामला लितना कला और अभिव्यक्ति पर आक्रमण का नहीं था, उतना एक अकादेमिक संस्था का खुद को विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल जैसे आततायियों के सुपुर्द कर देने का था. प्रासंगिक प्रश्न यह है कि कला संकाय में होनेवाले इम्तहान में कौन-सा छात्र कौन-सी कृति प्रविष्टि के रूप में देने जा रहा है, यह खबर बाहर कैसे गयी? यह अधिकार क्या किसी को दिया जा सकता है कि वह परीक्षा कक्ष में घुस जाये? क्या इम्तहान में लिखे जाने या दिये जानेवाले उत्तरों पर परीक्षक के अलावा किसी को टिप्पणी करने का हक है? ये वे आरंभिक प्रश्न हैं जो चंद्रमोहन के मामले में संबंधित न्यायिक अधिकारी को पूछने चाहिए थे, पर शायद पूछे नहीं गये. हुसेन के मामले में भी मामला दर्ज करने के पहले यह पूछा जा सकता था कि क्या वे सार्वजनिक प्रचार सामग्री तैयार कर रहे थे. कलाकृतियों को क्या सार्वजनिक बयान या भाषण के बराबर का दर्जा दिया जाना उचित है? किसी निजी-संग्रह में या सीमित पहुंचवाली कला दीर्घा में लगी कलाकृति को क्या दो समुदायों के बीच विद्वेष भड़काने के उद्देश्य से प्रेरित बताना तर्कपूर्ण है?
नामवर सिंह के खिलाफ दर्ज मामला चंद्रमोहन या हुसेनवाले मामलों की श्रेणी का नहीं क्योंकि पहले दोनों ही प्रसंगों में संघ से जुड़े संगठन की योजना है, जबकि नामवर सिंह के प्रसंग में ऐसा नहीं है. लेकिन तीनों के ही सिलसिले में यह प्रश्न तो प्रसंगिक है ही: क्या हमारे देश में सार्वजनिक विचार-विमर्श या व्यक्तिगत रचनाशीलता के लिए स्थान घटता जा रहा है? क्या 21वीं सदी में गालिब का होना खतरनाक नहीं? क्या वे धर्म और धर्मोपदेशक की खिल्ली उड़ाने को स्वतंत्र होंगे? उसी प्रकार क्या प्रेमचंद या हरिशंकर परसाई का लेखन अबाधित रह पायेगा? मजाक उड़ाना, व्यंग्य करना कला और साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा रहा है. कलाकार अपनी ही मूर्ति बनाता और ढालना नहीं है, वह बने बनाये गये बुतों को ध्वस्त कर सकता है. अगर बुतपरस्ती वह करता है, तो बुतशिकन भी उसे होना ही होगा. पर क्या हमारे दौर में कला के क्या रचना के स्वभाव से अंतर्भूत बुतशिकनी की इजाजत है?

क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है? आखिरकार, दीपा मेहता अपनी फिल्म वाटर भारत में नहीं बना सकीं, हुसेन लंबे समय से भारत से निर्वासन में हैं, कला दीर्घाओं के मालिक गुजरात में ही नहीं, अन्यत्र भी कलाकारों को असुविधाजनक कलाकृतियां प्रदर्शित न करने की भद्र सलाह दे रहे हैं. जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी किताब पर अदालत द्वारा पाबंदी हटाये जाने के बाद भी शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के आक्रामक बयानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.
क्या तर्क वागीशों का यह देश मूर्खता के प्रदेश में बदल रहा है? 1857 के 150वें, भगत सिंह के 100वें और आजादी के 60वें साल में यह दुर्भाग्यपूर्ण प्रश्न हमारे सामने है.

अपूर्वानंद जी का यह आलेख जनसता के 23 मई के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ है. वहां से साभार.

आइए, हम अंधेरे समय से बाहर निकलें

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2007 11:22:00 PM

हम अंधेरे समय में रह रहे हैं. यहां बोलने, सोचने, लिखने, फ़िल्में बनाने और किसी के बारे में कोई राय व्यक्त करने पर भी लगभग अघोषित पाबंदी है. हमारे सामने एक तरफ़ छत्ती़सगढ़ की मिसाल है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को उग्रवादियों से सांठ-गांठ होने के एक बेहद ढीले-ढाले आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है तो दूसरी ओर नामवर सिंह जैसे वरिष्ठ आलोचक को इसलिए अदालत में तलब किया जाता है कि उन्होंने एक घटिया और अप्रासंगिक हो चुके कवि की असलियत बता दी. हम उसी देश में रह रहे हैं जहां पेंटरों को मनमाने तरीके से तबाह करने की हर कोशिश की जाती है और फ़िल्मों के लिए एक पूरे के पूरे राज्य के दरवाजे बंद कर दिये जाते हैं. हम नहीं जानते कि किसी एक देश में कब एक साथ इस तरह का आतंक कायम किया गया हो. और वह भी आज़ादी और लोकतंत्र की बहरी कर कर देनेवाली नारेबाजी के साथ. और ऐसे में घुघूती बासूती जी का आग्रह है कि हम जब इस अंधे समय के खिलाफ़ बोलें तो दुनिया के इतिहास के हर अंधे समय के खिलाफ़ भी बोलें. हम नहीं जानते कि कोई कैसे अंधे समय को अंधे समय से अलग कर सकता है. हम जब एक अंधेरे के खिलाफ़ बोलते हैं तो हमारी आवाज़ दुनिया की तमाम अंधेरी ताकतों और तारीख के तमाम स्याह पन्नों को खिलाफ़ भी होती है. और जब वे ऐसा कोई आग्रह करती हैं तो हमें उनकी नीयत पर संदेह करना चाहिए. हमें बहस के समकालीन मोर्चों को भोथडा़ होने से बचाना चाहिए. जारी बहस को आगे बढाते हुए नामवर सिंह-पंत मुद्दे और उसके संदर्भ में लेखकों की आज़ादी पर हम आज दो लेखको के विचार दे रहे हैं. इनमें से एक तो अरुंधति राय के हाल ही में आये एक इंटरव्यू का अंश है जो हाशिया पर भी प्रकाशित किया गया था. हम कल भी हाज़िर होंगे पटना के कुछ बडे लेखकों के साथ.

अरुंधति राय
एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सकता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध करते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन करने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था. हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार समेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं.

संतोष सहर भाकपा माले से जुडे़ और एक बेहद खामोश लेखक हैं. हंस, समकालीन जनमत, संप्रति पथ और फ़िलहाल जैसी पत्रिकाओं में छपने के बावजूद वे लिखने के मामले में बहुत सुस्त रहते हैं. वे जसम से जुडे़ रहे हैं.

संतोष सहर
नामवर सिंह ने सुमित्रानंदन पंत के बारे में जो टिप्पणी कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. ये बातें कहीं लिखित रूप में हों तब बात दूसरी है. क्योंकि ऐसा माना जा सकता है कि वे उनके विचार हैं. लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर ऐसा बोलना विवादों में रहने की मानसिकता को दरसाता है. जब उनसे पूछा जायेगा तो हो सकता है वे अपने कहे से मुकर जायें.
हिंदी साहित्य की अपनी एक लंबी परंपरा रही है. इसमें हर तरह की चीजें हैं. कुछ जनपक्षीय हैं तो कुछ क्रांतिकारी भी. किसी भी लेखक या साहित्यकार का निरंतर विकास होता ही है. इसलिए पहले लिखित साहित्य को कूड़ा
कहना कहीं से भी ठीक नहीं है. फिर चाहे वह पंत जी के संदर्भ में बात कही गयी हो या तुलसीदास के बारे में. हां कम या ज्यादा के पैमाने पर इसका मूल्यांकन किया जा सकता है.
सुमित्रानंदन पंत छायावाद के पहले लेखक माने जाते हैं और छायावाद का संबंध हिंदी साहित्य में प्रगतिशील साहित्य से बिलकुल स्पष्ट रूप सें जुड़ा हुआ है. छायावाद के चार स्तंभ कहे जाने में प्रसाद सबसे पहले पायदान पर आते हैं. यह भी सच है कि छायावाद की सबसे कमजोर कड़ी पंत जी ही माने जाते हैं. लेकि न इसका मतलब कहीं से भी यह नहीं निकाला जा सकता है कि उनका शुरुआती साहित्य कूड़ा था.
साहित्य में इन बातों पर बहस की जा सकती है. इसके जरिये सही विचारों को भी सामने लाया जा सकता है. अदालत का हस्तक्षेप इसमें सही जान नहीं पड़ता है. साहित्य की चीजों को साहित्य के अंदर ही सुलझा लेना चाहिए. बाहरी हस्तक्षेप बेमानी है. क्योंकि इससे कोई ठोस हल नहीं निकलेगा. आज जरूरत है साहित्य के सम्यक विवेचन की. नामवर सिंह की आदतों में शामिल है कि वे कहीं भी किसी विषय पर टिप्पणी कर देते हैं. साहित्य का मूल्यांकन करना तो उन्होंने लगभग छोड़ दिया है. वे खुद ही कहते हैं कि आजकल की कविता उनकी समझ से बाहर की चीज है. समकालीन कविताएं उन्हें रास नहीं आती हैं. इसलिए भी उन्होंने कविताओं के मूल्यांकन से अपना पल्ला झाड़ लिया है. मेरे कहने का मतलब है कि ऐसा कह कर उन्होंने खुद ही अपने लिए सीमाएं निर्धारित कर ली हैं. इसलिए अच्छा तो यही होगा कि वे अपनी सीमा में ही रहें और उल्टी-सीधी टिप्पणी से बचें.

हम एक असहिष्णु समाज का हिस्सा नहीं हो सकते

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2007 12:05:00 AM

आजकल देश में आप कुछ भी कहिए तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और न जाने दंड विधान की कितनी धाराओं का उल्लंघन हो जाता है. अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब एक कलाकार द्वारा बनायी गयी कुछ तसवीरों पर संघी गुंडों ने उत्पात मचाया था. अभी नामवर जी द्वारा पंत साहित्य और सदानंद शाही द्वारा तुलसी सहित्य में कूडा़ नज़र आने पर उसी तरह लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं जिस तरह गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम को दिखाये जाने पर भगवाधारियों की होती हैं. हमारे देश का नरेंद्र मोदीकरण बढ़ रहा है और ऐसी जगहें लगातार कम होती जा रही हैं जहां बैठ कर कोई कलाकार, फ़िल्मकार, लेखक अपना काम कर सके. और अदालतें इस मोदीकरण में एक अहम हिस्सेदार बन कर सामने आयी हैं, चाहे वह हुसैन का मामला हो या नामवर सिंह का. देखने में ये सभी मामले अलग-अलग भले लगें पर सभी जुडे़ हुए हैं. इस मुद्दे पर हाशिया पर रविभूषण जी का लेख आ चुका है. आगे पटना के कई लेखकों-पत्रकारों का नज़रिया हम सामने रखेंगे. आज हम कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बीबीसी के विनोद वर्मा का आलेख दे रहे हैं, सभार- (इस टिप्पणी के साथ कि विनोद जी को जिन दलों से बडी़ मासूम-सी उम्मीदें हैं, वे दल खुद ऐसी ही हरकतें करते रहे हैं, इसलिए हमें उनसे कोई उम्मीद नहीं है) यह बीबीसी हिंदी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. हमें इन मुद्दों पर बहस करनी ही होगी क्योंकि बकौल भाई अविनाश, 'हम एक असहिष्णु समाज के हिस्से नहीं हो सकते.'
अभिव्यक्ति की एकतरफ़ा स्वतंत्रता
विनोद वर्मा
वड़ोदरा के सुप्रसिद्ध कला संस्थान में जो विवाद खड़ा हुआ है उसने कई पुराने सवालों को कुरेद कर एक बार फिर सतह पर ला दिया है. इस सवाल ने पहले की ही तरह बुद्धिजीवियों, लेखकों, बड़े समाचार पत्रों और अन्य प्रगतिशील ताक़तों को एकसाथ ला दिया है. और कहना न होगा कि कट्टरपंथी ताक़तें हमेशा की तरह एकजुट हैं और सारे विरोधों को अनदेखा, अनसुना करते हुए वही कर रही हैं जो वे कहना-करना चाहती हैं.
इस बार का विवाद देवी-देवताओं के कथित अश्लील चित्र बनाने को लेकर शुरु हुआ. इसके बाद भारतीय संस्कृति के तथाकथित रखवालों ने वही सब किया जो वे करते आए हैं. पेंटिंग बनाने वाले छात्र को गिरफ़्तार कर लिया गया और कला विभाग के डीन को निलंबित कर दिया गया.
संयोग भर नहीं है कि विवाद गुजरात में हुआ. नरेंद्र मोदी शासित गुजरात में ऐसे विवादों और उसकी ऐसी परिणति पर अब किसी को आश्चर्य भी नहीं होता. आश्चर्य तो यह होता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहाँ सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग अलापते नहीं थकतीं, वहाँ यह यह सब होता है.
भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना जैसे कुछ संगठनों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपना एकाधिकार मान लिया है. पिछले कुछ बरसों में उन्होंने बार-बार इसे साबित भी किया है.
उनकी मर्ज़ी के बिना न कोई चित्रकार ऐसे चित्र बना सकता है जो उनको न जँचे. न कोई ऐसा नाटक कर सकता है जो उनको न रुचे.
कोई फ़िल्मकार फ़िल्म नहीं बना सकता. बना भी ले तो उसे प्रदर्शित नहीं कर सकता. जैसा कि गुजरात में 'परज़ानिया' फ़िल्म के साथ हुआ. एमएफ़ हुसैन जैसे देश के प्रतिष्ठित कलाकार के साथ पिछले कुछ सालों में जो कुछ घटा है वह भारत के सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक इतिहास में एक काला अध्याय है.
आश्चर्य नहीं होता जब मोदी सरकार के संरक्षण में यह सब होता है. उनका एजेंडा साफ़ है. आश्चर्य तब भी नहीं होता जब देश की समाजवादी पार्टियाँ चुप रहती हैं क्योंकि वे सत्ता पाने के लिए भाजपा के पहलू में ही बैठी हुई हैं. खजुराहो के मंदिर अपने समय के समाज की सहिष्णुता के प्रतीक हैं.आश्यर्च होता है जब वामपंथी दल और कांग्रेस पार्टी इस मामले में अपने प्रवक्ताओं के भरोसे काम चलाने की कोशिश करते हैं और ऐसी घटनाओं का विरोध केवल बयानों तक सीमित होकर रह जाता है.
आश्चर्य तब भी होता है जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का गृहमंत्रालय हुसैन की पेंटिंग्स को लेकर उन्हें नोटिस भेजता है और जवाबतलब करता है. कलाकारों को संयम की सलाह देना अपनी जगह सही है. दूसरों की भावनाओं को आहत न करने का मशविरा भी ठीक है. कलाकारों की स्वतंत्रता की भी सीमाएँ हैं.
लेकिन सलाह-मशविरे की जगह सबक सिखाने की इच्छा अपने आपमें घातक है. सवाल यह है कि क्या विरोध का वही एक रास्ता है जो विश्वहिंदू परिषद, शिवसेना और बजरंग दल के कार्यालयों में तय होता है?
यह ठीक है कि भारत में कलाकारों और साहित्यकारों को अपनी अपेक्षित जगह पाने के लिए अब संघर्ष करना पड़ता है और आख़िर में वे हाशिए पर ही नज़र आते हैं. लेकिन उन्हें धकेलकर हाशिए से भी बाहर कर देने की कोशिश अपने आपमें अश्लीलता है.
अच्छा ही है कि वात्सायन ने बीते ज़माने में कामसूत्र की रचना कर ली, चंदेलों ने एक हज़ार साल पहले खजुराहो के मंदिर बनवा दिए और राजा नरसिंहदेव ने तेरहवीं शताब्दी में कोणार्क में मिथुन मूर्तियाँ लगवाने की हिम्मत कर ली. अगर इन संगठनों को इतिहास में जाने की अनुमति हो तो वे वात्सायन का मुँह काला कर दें और चंदेलों को सरेआम फाँसी देकर खजुराहो के मंदिरों को तहस-नहस कर दें. वैसे जो कुछ ये कर रहे हैं वह भारत की सांस्कृतिक विरासत पर कालिख़ पोतने से कोई कम भी नहीं है.

जनता के अधिकारों का क्या हो?

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/21/2007 02:27:00 AM

छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन के प्रादेशिक महासचिव व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा विनायक सेन को छत्तीसगढ पुलिस ने पिछले दिनों यह कह कर गिरफ़्तार कर लिया कि उनके संबंध नक्सलियों से हैं. इसकी निंदा देश भर के जाने-माने लोगों ने की है जिनमें अरुंधति राय, प्रभाष जोशी, मेधा पाटकर, निर्मला देशपांडे आदि शामिल हैं. हम इसे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के कार्य को दायरों में समेटने और सरकार के लिए एक आरामदेह स्थिति कायम करने के कदम के रूप में देखते हैं. इसी सिलसिले में प्रस्तुत है रायपुर से प्रकाशित देशबंधु समाचार पत्र का संपादकीय, आभार के साथ.

जनाधिकार : संवाद की जरूरत
छत्तीसगढ़ सरकार फिलहाल इस खुशफहमी में रह सकती है कि डॉ. विनायक सेन को गिरफ्तार कर उसने कोई बड़ा तीर मार लिया है। लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि इस कदम से सरकार की साख में गिरावट ही आई है। नक्सल समस्या का समाधान खोजने में उसकी असफलता भी इस तरह से उजागर हो रही है। जून 2005 याने आज से ठीक दो साल पहिले छत्तीसगढ़ सरकार ने सलवा जुडूम अभियान प्रारंभ किया था। उसी शृंखला में उसने संदिग्ध ख्याति प्राप्त 'सुपरकॉप' केपीएस गिल को भी नक्सल विरोधी अभियान के लिए सलाहकार नियुक्त किया था। संघ परिवार से ताल्लुक रखने वाले रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों की सेवाएं भी राज्य ने ली थीं। लेकिन इन सबका क्या हुआ, यह सबके सामने है। सलवा जुडूम पूरी तरह विफल हो चुका है, और केपीएस गिल ही नहीं, उनके हॉकी मित्र तथा पूर्व मुख्य सचिव आरपी बगई भी सरकार को कोसते नहीं थक रहे हैं। अपने मनपसंद पत्रकारों को जांच कमेटी में शामिल करने के बाद भी एर्राबोर हत्याकांड की जांच अब तक कहीं नहीं पहुंच सकी है। इस बीच एक ओर नक्सली हिंसा की खबरें, दूसरी ओर फर्जी मुठभेड़ में निरीह व्यक्तियों को मार कर गड़ा देने की वारदातें और तीसरी तरफ नागा और मिजो बटालियनों के अत्याचार के प्रकरण आए दिन प्रकाश में आ रहे हैं। इसके बावजूद सरकार तथा पुलिस न तो गलतियां स्वीकार करने, न ही अपनी कार्यनीति में बदलाव लाने के लिए तैयार दिख रहे हैं। डॉ. विनायक सेन को गिरफ्तार कर सरकार ने अपनी एकांगी सोच का ही परिचय दिया है। डॉ. सेन छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन के प्रादेशिक महासचिव व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। एक सुयोग्य चिकित्सक के रूप में वे जनसामान्य को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिले, इस मिशन पर लगातार काम करते रहे हैं, फिर चाहे सेवाग्राम हो या दल्लीराजहरा का शहीद अस्पताल या बिलासपुर के गांवों में जनस्वास्थ्य अभियान। छत्तीसगढ़ में वे पिछले पच्चीस साल से मानव अधिकारों के लिए निरंतर काम करते रहे हैं। उनके विचारों से अथवा कार्यप्रणाली से किसी को असहमति हो सकती है, व्यवस्था व तंत्र को उनकी सक्रियता से तकलीफ भी पहुंच सकती है, लेकिन इस वजह से वे अपराधी नहीं हो जाते। देश के एक प्रमुख व प्रभावशाली मानव अधिकार संगठन के कार्यकर्ता होने के नाते वे नक्सलियों के संपर्क में हैं, इस आधार पर उन्हें अपराधी मान लेना एक पूर्वाग्रह ही कहा जा एगा। यह याद रखने की जरूरत है कि देश इस वक्त अभूतपूर्व सामाजिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। देश का कोई भी हिस्सा नहीं है जहां स्थापित व्यवस्था के विरुध्द जनता का गुस्सा न उबल रहा हो। सरकारों की विश्वसनीयता आज अपने निम्नतर स्तर पर है। कितनी सारी घटनाएं हाल में ही घटी हैं। ऐसे में संवेदी समाज की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। पीयूसीएल और पीयूडीआर ही नहीं अनेकानेक संगठन हैं जो सरकार और जनता के बीच हुक्मरानों और जनआकांक्षाओं के बीच पुल बनाने का काम कर रहे हैं। अगर गैर सरकारी स्तर पर संवाद कायम करने की, स्थितियों को समझने की, उनका विश्लेषण प्रस्तुत करने की और अंतत: समाधान सुझाने की कोशिशें न हों तो सरकार और जनता अपने ही विचारों तथा उनसे उपजे निर्णयों के कैदी होकर रह जाएंगे। इसका दुष्परिणाम एक गहरी और लंबी अराजकता में जाकर हो सकता है। राजाओं और तानाशाहों के खिलाफ दुनिया में बहुत सी लड़ाइयां हुई हैं, लेकिन निर्वाचित सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वे इतिहास से सबक लें और जनता की आवाज सुनें। छत्तीसगढ़ सरकार को अपना कदम वापस लेते हुए डॉ. सेन को अविलंब रिहा करने के साथ-साथ जनाधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया कायम रहने को भी सुनिश्चित करना चाहिए।

साथ में यह भी

सामाजिक कार्यकर्ता राज्यपाल व मुख्यमंत्री से मिलेंगे

विनायक सेन के समर्थन में, कविता श्रीवास्तव, हर्षमंदर, अजीत भट्टाचार्जी,
प्रभाष जोशी, अरुण खोटे शामिल होंगे।
रायपुर (छत्तीसगढ़‌)। पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी को लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मिलकर विरोध दर्ज कराने सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईएएस हर्षमंदर, पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव कविता श्रीवास्तव पहुंच चुके हैं। कल प्रख्यात पत्रकार अजीत भट्टाचार्जी और अरुण खोटे दलित मानवाधिकार के राष्ट्रीय सदस्य राजधानी पहुंच रहे हैं।
कल राज्यपाल से मिलने का समय संगठन को मिल गया है। बताया जाता है कि संगठन की ओर से कल 12 बजे का समय मुख्यमंत्री से मांगा गया है, जिसकी स्वीकृति बाकी है।
संगठन के राज्य ईकाई के अध्यक्ष राजेन्द्र सायल ने बताया कि कल गांधीवादी नेता निर्मला देशपांडे के भी पहुंचने की संभावना है। उन्होंने बताया कि डॉ. विनायक सेन के घर की तलाशी के बाद पुलिस का झूठ उजागर हो गया है। उनके घर में कोई सबूत हासिल नहीं कर पाई है। घर से जो किताबें और आलेख जब्त किए गए हैं, वे प्रतिबंधित नहीं हैं। नक्सली नेता नारायण सान्याल का जेल से लिखा पोस्टकार्ड बरामद किया गया है, जिसमें उन्होंने अपने स्वास्थ्य की जानकारी दी है। यह पत्र जेल के माध्यम से ही आया है। एक अन्य कैदी का पत्र डॉ. सेन को मिला था, जिसमें जेल की बदहाली का जिक्र है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारी कार्यकर्ता के घर ऐसी चीजें मिलना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि डॉ. सेन के खिलाफ जन सुरक्षा अधिनियम और गैर कानूनी गतिविधियां निरोधक कानून के तहत कार्रवाई की गई है। इस कानून को रद्द करने के लिए संगठन अपनी लड़ाई और तेज करेगा।
उन्होंने मांग की है कि पुलिस के पास इस बात का कोई सबूत होता भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं के तहत कार्रवाई करे।
देशबंधु की खबर, साभार

क्या पंत और तुलसी का तीन चौथाई काव्य कूड़ा है?

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/21/2007 12:28:00 AM

नामवर (वाचिक) आलोचक नामवर सिंह ने पंत काव्य को कूडा़ कहा और वहीं डा सदानंद शाही ने तुलसी साहित्य को भी ऐसा ही कुछ कहा. हम यह मानते हैं कि किसी लेखक को उसकी प्रतिबद्धता और अपने समय को उसके उथलपुथल के साथ दर्ज़ करने की काबिलियत ही उसे महान बनाती है. तुलसी और पंत में ये दोनों ही नहीं हैं. पंत, केवल कल्पना लोक के कवि हैं तो दूसरी ओर तुलसी समाज को रूढियों और सामंती मूल्यों से (ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी...आदि, आदि) लैस करते हैं. यही वजह है कि पंत अब चर्चा से बाहर रह्ते हैं और तुलसी धर्म की सीमा में कैद रह गये. किसी साहित्यिक रचना का धर्मग्रंथ बन जाना उसकी कमजोरी को दिखाता है. इसका मतलब है कि आप उस पर साहित्यिक कसौटियों के साथ विचार करने को स्वतंत्र नहीं रह जाते हैं. यह किसी विचार को धर्मविधान बना देने जैसा ही है. मगर हमारा यह भी मानना है कि किसी लेखक पर इस तरह का फ़ैसला देने का काम लिखित तौर पर होना चाहिए न कि वाचिक तौर पर. और नामवर सिंह जिस तरह हवा का रुख देख कर भाषा बदलते रहते हैं हम उसका भी समर्थन नहीं करते. वे एक समय में नेरुदा को लाल सलाम कहते हैं तो अगले ही पल सहारा राय को सहारा प्रणाम. मगर इसी के साथ हम उनपर हुए मुकदमों का भी विरोध करते हैं. रविभूषण का यह लेख प्रभात खबर में भी छप चुका है.
रविभूषण
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र, भारत कला भवन और बनारस के प्रेमचंद साहित्य संस्थान द्वारा आयोजित दो दिवसीय `महादेवी जन्मशती महोत्सव' (5-6 मई, 2007) में नामवर सिंह द्वारा सुमित्रानंदन पंत पर की गयी टिप्पणी बनारस और बनारस के बाहर आजकल चर्चा में है. संगोष्ठी महादेवी वर्मा : वेदना और विद्रोह पर केंद्रित थी.नामवर सिंह ने जयशंकर प्रसाद और निराला के बाद महादेवी को स्थान देते हुए पंत काव्य में तीन चौथाई कूड़ा होने की बात कही. उन्होंने महादेवी को पंत से बड़ा कवि घोषित किया. उनकी आपत्ति महादेवी को `वेदना और विद्रोह' में बांध देने और सीमित करने पर भी थी.

जिस महादेवी ने जीवन को `विरह का जलजात' कहा और वेदना में जन्म, करुणा में मिला आवास के द्वारा विरह, करुणा और वेदना को व्यापक अर्थों में ग्रहण किया था, उसे नामवर ने दुख के सीमित अर्थ में रख दिया. स्वयं महादेवी ने अपने निबंधों में `वेदना' पर जो विचार किया है, उसे देखने से यह स्पष्ट हो जायेगा कि महादेवी की वेदना सामान्य और सीमित नहीं थी. उसके दुख को निजी दुख समझना भी गलत है. इस संगोष्ठी में केदरनाथ सिंह, राजेंद्र कुमार, पीएन सिंह आदि ने जो बातें कहीं, उनकी ओर, और नामवर ने भारतीय कविता पर जो विचार किया, उसकी अनदेखी की गयी और यह टिप्पणी विशेष प्रमुख हो गयी कि पंत साहित्य का तीन चौथाई कूड़ा है. कूड़ा और कूड़ेदान किसी को प्रिय नहीं हैं. फालतू व महत्वहीन की तुलना में कूड़ा शब्द ज्यादा तीखा और बेधक है.
बनारस से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान ने इसे एक मुद्दा बना कर बनारस के कवियों, लेखकों, आलोचकों और प्राध्यापकों से नामवर की टिप्पणी पर प्रतिक्रियाएं छापीं. बच्च्न सिंह, चंद्रबली सिंह, ज्ञानेंद्रपति, चौथी राम यादव, पीएन सिंह, कुमार पंकज, अवधेश प्रधान, वाचस्पति, बलराज पांडेय, सदानंद शाही, सुरेंद्र प्रताप, चंद्रकला त्रिपाठी, श्रीप्रकाश शुक्ल आदि में से कुछ ने नामवर के कथन से सहमति प्रकट की और कुछ ने उनकी इस टिप्पणी की आलोचना की. बच्चन सिंह को कूड़ा शब्द के प्रयोग पर घोर आपत्ति है और पीएन सिंह इस शब्द को `मंचीय अभिव्यक्ति' कह कर इसे गंभीरता से न लेने की बात कहते हैं. ज्ञानेंद्रपति के अनुसार नामवर अवसरानुकूल बयान देते हैं.
हिंदी दैनिक अमर उजाला ने इस पर संपादकीय (आठ मई) भी लिखा. चंद्रबली सिंह ने नामवर के कथन में उनका दंभ देखा. एक समय चंद्रबली सिंह ने भी पंत की तीखी आलोचना की थी, पर उनके लेखन को कूड़ा नहीं कहा था.
अब अक्सर निजी बातचीत में नामवर के कथन को गंभीरता से न लेने की बात कही जाती है. नामवर सदैव गंभीर बातें नहीं करते, पर उनका कथन सदैव तथ्यहीन भी नहीं होता. कविता को वे खेल मानते हैं और अब आलोचना भी उनके लिए खेल है. वे कुशल खिलाड़ी हैं और करीब 60 वर्ष से हिंदी आलोचना के केंद्र में विद्यमान हैं. मीडिया में भी वे सदैव उपस्थित रहते हैं और उनके कथन पर टीका-टिप्पणी होती रहती है. कभी मृणाल पांडे ने नामवर को हिंदी का अमिताभ बच्चन कहा था और अब भाजपा के कुछ प्रबुद्ध उन्हें `हिंदी साहित्य का राखी सावंत' कह रहे हैं. स्पष्ट है, वैचारिकता व गंभीरता का लोप हो रहा है. दूसरों को आहत करना शिक्षित समुदाय का स्वभाव बन गया है.
पंत अपनी परवर्ती रचनाओं के प्रति आलोचकों के विचार से अवगत थे. उन्होंने कई स्थलों पर इस संबंध में लिखा है. नंद दुलारे वाजपेयी ने सर्वप्रथम छापावाद की `बृहत्रयी' प्रस्तुत की थी. महादेवी इस बृहत्रयी से बाहर थीं. बाद में एक लघुत्रयी भी बनायी गयी और उसमें महादेवी के साथ रामकुमार वर्मा और भगवती चरण वर्मा को शामिल किया गया. इसे कुछ लोगों ने `वर्मा-त्रयी' भी कहा. छायावाद को पंत कवि चतुष्टम तक ही सीमित नहीं रखते थे. भगवती चरण वर्मा और रामकुमार वर्मा के साथ उन्होंने छायावाद के षड्मुख व्यक्तित्व की चर्चा की है. महादेवी की काव्य-रचना प्रसाद, निराला, पंत के बाद आरंभ हुई. नीहार (1930) का प्रकाशन अनामिका, पल्लव और परिमल के प्रकाशन के बाद हुआ.
छायावादी कवियों में एक दूसरे के प्रति स्नेह व सम्मान का भाव था. महादेवी ने निराला, प्रसाद और पंत को `पथ के साथी' कहा है. तुलनात्मक आलोचना बहुत पहले मुरझा चुकी है. महादेवी वर्मा का सुमित्रानंदन पंत से परिचय धीरेंद्र वर्मा ने अपने विवाह के अवसर पर कराया था. वैसे महादेवी ने पंत को पहली बार हिंदू बोर्डिंग हाउस में हुए एक कवि-सम्मेलन में देखा था. महादेवी के अनुसार पंत के जीवन पर संघर्षों ने `अपनी रुक्षता और कठोरता का इतिहास' नहीं लिखा है. महादेवी की दृष्टि में पंत चिर सृजनशील कलाकार और नये प्रभात के अभिनंदन के लिए उन्मुख थे उन्होंने पंत की `अनंत सृजन संभावनाओं' की बात कही है. जिन कृतियों से आलोचक पंत में विचलन-फिसलन देखते हैं, महादेवी का ध्यान उधर भी गया था. पंत की ग्राम्या, युगवाणी आदि काव्य कृतियों के संबंध में महादेवी ने लिखा है, `उन्होंने अपनी सद्य: प्राप्त यथार्थ भूमि की संभावनाओं को स्वर-चित्रित करने का प्रयत्न किया है.'

पंत के सामने उनकी काव्य कृतियों का विरोध आरंभ हो चुका था. उस समय आज की तरह `कूड़ा' शब्द प्रयुक्त नहीं होता था. पंत ने स्वयं अपने विरोधी आलोचकों के दृष्टिकोण का उल्लेख किया है कि वे विचार और दर्शन को आत्मसात न कर, केवल उसके बौद्धिक प्रभावों को अपनी कृतियों में दुहराते हैं. लोकातयन के प्रकाशन (1965) के बाद इलाहाबाद में विवेचना की गोष्ठी में पंत की उपस्थिति में विजयदेव नारायण साही को जब `लोकायतन' की चर्चा में बोलने को कहा गया, तब उन्होंने खड़े होकर कहा था `यह कृति न मैंने पढ़ी है और न पढूंगा.' हल्ला मचा कि साही के कथन से पंत का `वध' हो गया. साही साही थे. उनकी आलोचना में गंभीरता थी. बाद में हो-हल्ला होने पर साही ने अपने कथन का उत्तरांश (और न पढ़ूंगा) वापस ले लिया था.
नामवर अपना कथन वापस नहीं लेंगे. वे तीन चौथाई का तर्क दे सकते हैं और संख्या भी गिना सकते हैं. विजयदेव नारायण साही ने लोकायतन पर ध्यान नहीं दिया. पर पंत को इसी पर सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला. साही इस पुरस्कार की आलोचना कर सकते थे. नामवर कैसे करेंगे? वे पुरस्कार देनेवालों में रहे हैं.
पंत ने लिखा है कि प्रसाद के आंसू के दूसरे संस्करण में उनकी कविता चांदनी की कुछ कल्पनाओं तथा बिंबों का समावेश है और निराला की यमुना में उनकी कविता स्वप्न व छाया आदि की `स्पष्ट अनुगूंज' है. फिर भी उनका कथन है, `हम यह प्रमाणित नहीं कर सकते कि हमने एक दूसरे का अनुगमन या अनुकरण किया है.' उन्होंने स्वीकारा है कि `मेरे तुम आती हो में महादेवी के जो तुम आ जाते एक बार का अप्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है.'
पंत ने छायावाद : पुनमूल्यांकन में महादेवी की बहुत प्रशंसा की है. उन्होंने महादेवी को `छायावाद के वसंत वन की सबसे मधुर, भाव-मुखर पिकी' कहा है. पंत ने शुक्लजी के शब्दों में `कूल की रूह सूंघनेवाले' आलोचकों की भी बात कही है.
कला और बूढ़ा चांद और चिदंबरा क्या पंत की `तीन चौथाई' में शामिल होनेवाली रचनाएं हैं? पहले पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और दूसरे पर भारतीय ज्ञानपीठ. पुरस्कार महत्वपूर्ण नहीं हैं, पर क्या नामवर इन पुरस्कारों को खारिज करेंगे? किसी कवि की सभी रचनाएं एक समान नहीं होतीं. खारिजी आलोचना का भी महत्व है, पर यह लिखित रूप में होनी चाहिए.
शांतिप्रिय द्विवेदी ने पंत पर एक मोटी पुस्तक ज्योति विहंग लिखी थी. द्विवेदी की जन्मशती बीत गयी. उन्हें किसी ने याद नहीं किया. तुलसीदास की भी सभी रचनाएं कविता की कसौटी पर खरी नहीं उतरेगी. पर नामवर की भाषा में उन रचनाओं को भी कूड़ा कहना, जैसा कि सदानंद शाही ने कहा है, उचित नहीं है. बनारस के अपने रंग और और ठाठ हैं. मस्ती और फिकरेबाजी है. नामवर सिंह और सदानंद शाही के खिलाफ लंका (बनारस) थाने में तहरीर दाखिल करना सस्ते किस्म की प्रचारप्रियता है. मगर फिलहाल यही हो रहा है. आलोचना का स्तर खुद आलोचक गिरा रहे हैं और आलम यह है कि हमारे समय में आलोचना से अधिक टिप्पणियां महत्वपूर्ण बन रही हैं.

एक मुलाकात लतिका रेणु से

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/19/2007 11:39:00 PM

एक ठुमरीधर्मा जीवन का अंतर्मार्ग
रेयाज-उल-हक

राजेंद्रनगर के ब्लॉक नंबर दो में पटना इंप्रूवमेंट ट्रस्ट का एक पुराना मकान. दूसरी मंजिल पर हरे रंग का एक दरवाजा. जंग लगा एक पुराना नेम प्लेट लगा है-
फणीश्वरनाथ रेणु .
एक झुर्रीदार चेहरेवाली औसत कद की एक बूढ़ी महिला दरवाजा खोलती हैं-लतिका रेणु. रेणु जी की पत्नी. मेरे साथ गये बांग्ला कवि विश्वजीत सेन को देख कर कुछ याद करने की कोशिश करती हैं. वे हमें अंदर ले जाती हैं.
कमरे में विधानचंद्र राय, नेहरू और रेणु जी की तसवीर. 1994 का एक पुराना कैलेंडर. किताबों और नटराज की प्रतिमा पर धूल जमी है. बाहर फोटो टंगे हैं-रेणु और उनके मित्रों के. घर में लगता है, रेणु का समय अब भी बचा हुआ है.
एक ओर कटी सब्जी का कटोरा रखा हुआ है-शायद वे सब्जी काट रही थीं. बातें शुरू होती हैं. वे रेणु जी पर प्राय: बात नहीं करना चाहतीं. अगर मेरे साथ विश्वजीत दा नहीं होते तो उनसे बात कर पाना मुश्किल था. पुराना परिचय है उनका. काफी कुछ दिया है इस महिला ने रेणु को. प्रकारांतर से हिंदी साहित्य को. हजारीबाग के सेंट कोलंबस कॉलेज के एक प्रोफेसर की बेटी लतिका जी इंटर करने के बाद पटना आयी थीं-नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए. फिर पटना की ही होकर रह गयीं. पटना मेडिकल कॉलेज में ही भेंट हुई फणीश्वरनाथ रेणु से. उनके फेफड़ों में तकलीफ थी. नेपाल में राणाशाही के खिलाफ संघर्ष में शामिल थे रेणु. एक बार वे गिर गये और पुलिस ने उनकी पीठ को अपने बूटों से रौंद डाला था. तब से खराब हो गये फेफ ड़े. खून की उल्टी तभी से शुरू हुई.
लतिका जी उन दिनों को याद करते हुए कभी उदास होती हैं, कभी हंसती हैं, वैसी हंसी जैसी
जुलूस की पवित्रा हंसती है. ट्रेनिंग खत्म होने के बाद पटना में ही गर्दनीबाग में चाइल्ड वेल्फेयर सेंटर में नियुक्ति हुई. छह माह बाद सब्जीबाग के सिफ्टन चाइल्ड वेल्फेयर सेंटर में आ गयीं. तब तक रेणु जी से उनकी शादी हो चुकी थी. रेणु जी ने उन्हें बताया नहीं कि उनकी एक पत्नी औराही हिंगना में भी हैं. शादी के काफी समय बाद जब वे पूर्णिया उनके घर गयीं तो पता चला. इस पर वे नाराज भी हुईं, पर मान गयीं.

इस रचना को देशबंधु पर भी पढें.

लतिका जी शादी से जुड़े इन प्रसंगों को याद नहीं करना चाहतीं. काफी कटु अनुभव हैं उनके. रेणु जी के पुत्र ने उनकी किताबों का उत्तराधिकार उनसे छीन लिया. वह यह फ्लैट भी ले लेना चाहता था, जिसमें अभी वे हैं और जिसे उन्होंने अपने पैसे से खरीदा था. रेणु जी ने इस फ्लैट के आधार पर 20000 रुपये कर्ज लिये थे बैंक से. बैंक ने कहा कि जो पैसे चुका देगा फ्लैट उसका. लतिका जी ने कैसे-कैसे वे पैसे चुकाये और फ्लैट हासिल किया.
वे भुला दी गयी हैं. अब उन किताबों पर उनका कोई अधिकार नहीं रहा, जिनकी रचना से लेकर प्रकाशन तक में उनका इतना योगदान रहा. मैला आंचल के पहले प्रकाशक ने प्रकाशन से हाथ खींच लिया, कहा कि पहले पूरा पैसा जमा करो. लतिका जी ने दो हजार दिये तब किताब छपी. नेपाल के बीपी कोइराला को किताब की पहली प्रति भेंट की गयी. उसका विमोचन सिफ्टन सेंटर में ही सुशीला कोइराला ने किया.

इसके बाद, जब उसे राजकमल प्रकाशन ने छापा तो उस पर देश भर में चर्चा होने लगी. लतिका जी बताती हैं कि रेणु दिन में कभी नहीं
लिखते, घूमते रहते और गपशप करते. हमेशा रात में लिखते, मुसहरी लगा कर. इसी में उनका हेल्थ खराब हुआ. लिख लेते तो कहते-सारा काम छोड़ कर सुनो. बीच में टोकाटाकी मंजूर नहीं थी उन्हें. कितना भी काम हो वे नहीं मानते. अगर कह दिया कि अभी काम है तो गुस्सा जाते, कहते हम नहीं बोलेंगे जाओ. फिर उस दिन खाना भी नहीं खाते. जब तीसरी कसम फिल्म बन रही थी तो रेणु मुंबई गये. उनकी बीमारी का टेलीग्राम पाकर वे अकेली मुंबई गयीं. मगर रेणु ठीक थे. वहां उन्होंने फिल्म का प्रेस शो देखा. तीसरी कसम पूरी हुई. लतिका जी ने पटना के वीणा सिनेमा में रेणु जी के साथ फ़िल्म देखी. उसके बाद कभी नहीं देखी तीसरी कसम.
रेणु के निधन के बाद उनके परिवारवालों से नाता लगभग टूट ही गया. उनकी एक बेटी कभी आ जाती है मिलने. गांववाली पत्नी भी पटना आती हैं तो आ जाती हैं मिलने, पर लगाव कभी नहीं हुआ. नर्सिंग का काम छोड़ने के बाद कई स्कूलों में पढ़ाती रही हैं. अब घर पर खाली हैं. आय का कोई जरिया नहीं है. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद 700 रुपये प्रतिमाह देता है, पर वह भी साल भर-छह महीने में कभी एक बार. पूछने पर कि इतने कम में कैसे काम चलता है, वे हंसने लगती हैं-चल ही जाता है.
अब वे कहीं आती-जाती नहीं हैं. किताबें पढ़ती रहती हैं, रेणु की भी. सबसे अधिक मैला आंचल पसंद है और उसका पात्र डॉ प्रशांत. अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में अनुदित रेणु की किताबें हैं लतिका जी के पास. खाली समय में बैठ कर उनको सहेजती हैं, जिल्दें लगाती हैं.
लतिका जी ने अपने जीवन के बेहतरीन साल रेणु को दिये. अब 80 पार की अपनी उम्र में वे न सिर्फ़ अकेली हैं, बल्कि लगभग शक्तिहीन भी. उनकी सुधि लेनेवाला कोई नहीं है. रेणु के पुराने मित्र भी अब नहीं आते.
एक ऐसी औरत के लिए जिसने हिंदी साहित्य की अमर कृतियों के लेखन और प्रकाशन में इतनी बड़ी भूमिका निभायी, सरकार के पास नियमित रूप से देने के लिए 700 रुपये तक नहीं हैं. हाल ही में
पटना फिल्म महोत्सव में तीसरी कसम दिखायी गयी. किसी ने लतिका जी को पूछा तक नहीं. शायद सब भूल चुके हैं उन्हें, वे सब जिन्होंने रेणु और उनके लेखन से अपना भविष्य बना लिया. एक लेखक और उसकी विरासत के लिए हमारे समाज में इतनी संवेदना भी नहीं बची है.

फ्रांस : सरकोजी की जीत का मतलब

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/18/2007 01:21:00 AM

हरि किशोर सिंह
फ़्रांस में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव पर पूरे विश्व की नजर थी. सिर्फ इसलिए नहीं कि फ्रांस के इतिहास में सत्ता के सर्वोच्च् पद पर पहली बार किसी महिला के स्थापित होने की संभावना थी, बल्कि इसलिए भी नजर थी कि फ्रांस इस दफा अनुदारपंथियों के चंगुल से छुटकारा पा सकेगा या नहीं. 1958 में पांचवें गणतंत्र के गठन के बाद फांसवां मित्तरां के अलावा कोई उदारवादी प्रगतिशील, समाजवादी नेता इस पद पर आसीन नहीं हो पाया था. मित्तरां के बाद बीते 12 वर्ष से इस पद पर अनुदार (कंजरवेटिव) जॉक शिराक का आधिपत्य रहा. वे तीसरी बार भी राष्ट्रपति बनने की इच्छा रखते थे. लेकिन इसके लिए पर्याप्त् माहौल के अभाव में उन्होंने गृह मंत्री सरकोजी के लिए मैदान खुला छोड़ दिया था. इस प्रकार निकोलस सरकोजी के लिए पूरे दक्षिणपंथ के समर्थन का खुला द्वार मिला, जिससे द्वितीय मतदान में उन्हें अपने समाजवादी प्रतिद्वंद्वी सेगल रोयाल को प्रभावशाली बहुमत से पराजित करने का अवसर मिल गया.
हंगेरियन पिता और ग्रीक-यहूदी मां के पुत्र 51 वर्षीय सरकोजी अपने दृढ़ विचार और अविलंब कार्रवाई के लिए प्रसिद्ध रहे हैं. जर्मन फासीवाद से आक्रांत उनके पिता 1941 में हंगरी से पलायन कर फ्रांस में आ बसे थे. लेकिन पुत्र सरकोजी आव्रजन के संबंध में कठोर नीति के लिए काफी मशहूर रहे हैं. पिछले वर्षोंा में पेरिस के उपनगर में नस्लभेद के प्रश्न पर हुए दंगों को भी उन्होंने गृह मंत्री की हैसियत से काफी कठोरता से नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त् की थी. इस कारण इन इलाकों में दंगे की आशंका से प्रशासन भयभीत था. इसलिए भारी संख्या में दंगा दमन दल और सेना की टुक़़डियों की भारी तैनाती की गयी थी. इस चुनाव में लगभग 85 फीसदी मतदाताआें ने हिस्सा लिया था और चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद पेरिस सहित फ्रांस के विभिन्न शहरों में जश्न के माहौल से स्पष्ट है कि निकोलस सरकोजी का राष्ट्रपति काल अपने दक्षिणपंथी रुझान के लिए प्रसिद्धि प्राप्त् करने के लिए सचेष्ट रहेगा. निकोलस सरकोजी फ्रांस की राष्ट्रीय अस्मिता की आव्रजक नीति में कठोरता, कर में छूट और सामाजिक सुरक्षा के मद में दी जाने वाली सुविधाआें में भारी कटौती, नयी कार्य संस्कृति और भारी भरकम फ्रांस की प्रशासकीय ढांचे में प्रभावशाली सुधार पर हर प्रकार के प्रयास के लिए पहल करने में जरा भी नहीं हिचकेंगे.
विदेश नीति के संदर्भ में यूरोपीय संगठन की एकता और अमेरिका से दोस्ताना संबंधों की प्रगाढ़ता होगी. साथ ही फ्रेंच भाषी उत्तरी और पश्चिमी अफ्रीकी देशों से गहरे आर्थिक संबंधों को ठोस रूप देने का भी उनका प्रयास रहेगा. विजय की घोषणा के बाद उन्होंने अपने संक्षिप्त् भाषण में वाशिंगटन के प्रति मित्रता का उद्गार व्यक्त करने में जरा भी कोताही नहीं की. उन्होंने स्पष्ट तौर पर घोषणा की कि अब अमेरिका फ्रांस को अपना एक विश्वसनीय दोस्त के रूप में देख सकेगा. उनका स्पष्ट संकेत राष्ट्रपति जॉक शिराक द्वारा इराक पर अमेरिकी आक्रमण के विरोध की ओर था. मगर उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग के प्रति अमेरिकी नेतृत्व से अपेक्षा के संबंध में भी अपनी भावना उजागर की है. स्पष्ट है कि अब फ्रांस पर्यावरण के संबंध में क्योटो घोषणा पत्र को लागू कराने में प्रयासरत रहेगा. फिर भी अंतरराष्ट्रीय मंचों विशेषतौर पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के स्तर पर फ्रांस जो स्वतंत्र रूप से निर्णय लिया करता था, अब अमेरिकी नीति से प्रभावित रहेगा.
विकासशील देशों के लिए निकोलस सरकोजी का राष्ट्रपति बनना बहुत शुभ नहीं कही जा सकता. भारत और चीन को व्यापारिक क्षेत्र में नयी व्यवस्था के अंतर्गत काफी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि चुनाव अभियान के दौरान निकोलस ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि विजय की स्थिति में उनकी सरकार चीन और भारत के माल के खिलाफ आयात कर में भारी वृद्धि कर अपने देश की उत्पादित वस्तुआें का बचाव करेंगे. उनका कहना है कि ये देश फ्रांस के बाजार में अपने देश की उत्पादित वस्तुआें को सस्ते दर पर निर्यात करते हैं, अत: फ्रांस सरकार को यह अधिकार है कि वह स्वदेशी माल की रक्षा में करे.
निश्चय ही यह विश्व व्यापार में खुलेपन के लिए एक स्पष्ट चुनौती होगी, जिसका भारत और चीन को संयुक्त रूप से सामना करना पड़ेगा. अत: भारत को नये राष्ट्रपति की रीति नीति के प्रति सावधानी बरतनी पड़ेगी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता के प्रति फ्रांस की पिछली सरकार काफी उत्साहित थी. अब देखना है कि नयी सरकार इस संबंध में क्या नीति अपनाती है. इसी प्रकार भारत की आणविक क्लब की सदस्यता का सवाल है, इस संदर्भ में जॉक शिराक भारत के एक अति उत्साही समर्थक माने जाते थे. देखना है कि नयी सरकार का इस संबंध में क्या रुख होता है.
निकोलस सरकोजी की चुनावी सफलता से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि जर्मनी के पिछले चुनाव में दक्षिणपंथियों की सफलता से अनुदारपंथियों की सफलता की जो शुरुआत हुई थी, वह अब फ्रांस की राजनीति में प्रभावशाली तौर पर अपनी जड़ें जमा चुकी है. शीघ्र ही ब्रिटेन में भी नेतृत्व परिवर्तन होनेवाला है. अभी तक जॉर्ज ब्राउन का 10, डाउनिंग स्ट्रीट में जाना तय माना जा रहा है. उनकी भी लेबर पार्टी में बहुत उदारवादी छवि नहीं है. ब्रिटेन में स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम ने कंजरवेटिव पार्टी को काफी प्रोत्साहित किया है. लेबर पार्टी की त्रासदी देखने लायक है. फिलहाल फ्रांस में संसदीय चुनाव अगले छह सप्तहों में होनेवाले हैं. अगर उन चुनावों में भी अनुदारपंथियों का बोलबाला रहा तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि जर्मनी से दक्षिणपंथी शुरुआत का असर यूरोपीय राजनीति पर और भी व्यापक होगा.
विरोध पक्ष की नेता सेगल रोयाल ने भी चुनाव में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी थी. इसलिए समाजवादियों में आयी हताशा स्वाभाविक है. इस चुनाव परिणाम ने वामपंथियों की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है. यूरोप में आयी समृद्धि के असर से वामपंथी विचारधारा के प्रति आम जनता के आकर्षण में कमी आयी है. इस दृष्टि से यूरोप के समाजवादियों के लिए वर्तमान परिस्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है. उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा के २१ वीं सदी की चुनौतियों के अनुकूल नीति अपनानी होगी.
मारग्रेट थैचर के नेतृत्व से लगातार विफलता पाने पर ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने अपने नये नेता टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में न्यू लेबर के सिद्धांत को अपना कर अरसे के बाद 10, डाउनिंग स्ट्रीट पर अपना आधिपत्य जमाया था. वे तीन बार आम चुनाव में लेबर पार्टी को सफलता की राह पर ले गये. परंतु इराक के संदर्भ में अमेरिकापरस्त नीति के कारण उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट आयी और पार्टी के अंदर उन पर पद त्याग करने का दबाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. उन्हें अपना पद छोड़ने की घोषणा करनी पड़ी और अब वे 5 जून को अपने पद से मुक्त हो रहे हैं. लेबर पार्टी के नये नेता चांसलर ऑफ एक्सचेकर जॉर्ज ब्राउन के लिए अपनी पार्टी की गिरती लोकप्रियता को न केवल विराम लगाना होगा, बल्कि उसे ब्रिटिश जनमानस में पुन: इस तरह प्रतिस्थापित करना होगा कि उसे फिर से शासन की पार्टी के तौर पर ब्रिटिश जनता के समक्ष पेश किया जा सके.
यूरोपीय समाजवादियों की इस त्रासदी और यूरोपीय जनता के रुझान से विकासशील देशों के जनतांत्रिक तत्वों को भी सबक लेना होगा. भारत जैसे देश में अभी 24 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने पर मजबूर हो रहे हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में गरीबी तथा जीवन यापन के लिए रोजगार के अवसर की कमी से उत्पन्न समस्याआें के समाधान में व्यवस्था की विफलता ने ही हिंसात्मक आंदोलन को जन्म दिया है. नेपाल में जनतांत्रिक, वामपंथी एवं माओवादी तत्वों का आपसी समझौता इस दिशा में आशा की एक किरण के तौर पर दिखायी पड़ रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि नेपाल में चल रहे प्रयास को सफलता मिलेगी. जहां तक फ्रांस की नयी सरकार का प्रश्न है, विकासशील दुनिया को इंतजार करना पड़ेगा कि वह अपने पत्ते किस प्रकार खोलता है.

लेखक पूर्व विदेश राज्यमंत्री हैं.
प्रभात खबर से साभार.

महाश्वेता देवी की एक ज़रूरी अपील : यह आप सभी के लिए है

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/17/2007 12:25:00 AM

प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी नंदीग्राम के शहीदों के नाम पर एक शहीद अस्पताल बनवाना चाहती हैं. इसके लिए उन्हें सभी संवेदनशील लोगों से मदद चाहिए. अगर आप डाक्टर या चिकित्सा सेवा से जुडे़/जुडी़ हैं तब और बेहतर है. इस सिलसिले में मुझे हाल ही में उनकी एक अपील मिली है जिसे मैं यहां डाल रहा हूं. अपील महाश्वेता देवी की हस्तलिपि में ही है. इसे (पीडीएफ़ में) डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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