हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सावधान : संघ जब सामाजिक समरसता की बात करे

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/28/2007 10:41:00 PM

यह साल गोलवलकर की जन्मशती के समापन का वर्ष है. इस अवसर पर संघ ने बडे़ कार्यक्रम किये, काफ़ी डींगें हांकी. ऐसे में उसने सामाजिक समरसता का डंका भी पीटा. इस अवसर पर झूठ के पुलंदे के रूप में एक फ़िल्म भी आयी-कर्मयोगी.

सुभाष गाताडे का यह लेख कुछ समय पहले आया था. थोडी़ देर हो गयी है पर संघ के खतरे को देखते हुए यह अब भी मौज़ूं है.
सामाजिक समरसता के संघी निहितार्थ
सुभाष गाताडे
वह साठ के दशक के उत्तरार्ध की बात है. महाराष्ट्र एक तरह के आंदोलन का प्रत्यक्षदर्शी बना था. वजह बना था `नवा काल' नामक मराठी अखबार में (एक जनवरी, 1969) राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर का छपा विवादास्पद साक्षात्कार, उसमें जिस बौद्धिक अंदाज में गोलवलकर ने मनुस्मृति को सही ठहराया था और छुआछूत पर टिकी वर्ण जाति को ईश्वरप्रदत्त घोषित किया था, वह बात लोगों को बेहद नागवार गुजरी थी.
अपने साक्षात्कार में गोलवलकर ने साफ -साफ कहा था कि ...`स्मृति ईश्वरनिर्मित है और उसमें बतायी गयी चातुर्वर्ण्य व्यवस्था भी ईश्वरनिर्मित है. किंबहुना वह ईश्वरनिर्मित होने के कारण ही उसमें तोड़-मरोड़ हो जाती है, तब भी हम चिंता नहीं करते. क्योंकि मनुष्य आज तोड़-मरोड़ करता भी है, तब जो ईश्वरनिर्मित योजना है, वह पुन:-पुन: प्रतिस्थापित होकर ही रहेगी'
अपने इस साक्षात्कार ने गोलवलकर ने जाति प्रथा की हिमायत करते हुए चंद बातें भी कही थीं, जैसे`...अपने धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था सहकारी पद्धति ही तो है. किंबहुना आज की भाषा में इसे गिल्ड कहा जाता है, और पहले जिसे जाति कहा गया उसका स्वरूप एक ही है... जन्म से प्राप्त होनेवाली चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में अनुचित कुछ भी नहीं है, किंतु इसमें लचीलापन रखना ही चाहिए और वैसा लचीलापन था भी. लचीलेपन से युक्त जन्म पर आधारित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था उचित ही है.'
अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस सूबे में औपनिवेशिक काल में ज्योतिबा तथा सावित्रीबाई फुले की अगुआई में `शेटजी' (सेठ-साहूकार) और भट जी (पुरोहित वर्ग) के खिलाफ प्रचंड सांस्कृतिक विद्रोह खड़ा हुआ था, जिस सूबे में 20वीं सदी में डॉ आंबेडकर जैसे उत्पीड़ितों के महान सपूत की अगुआई में विद्रोह को आगे बढ़ाया गया, वहां पर गोलवलकर के विचारों ने लोगों में किस किस्म के गुस्से को पैदा कि या होगा.
जिंदगी भर मनुस्मृति की बुनियाद पर शासन कायम करने के लिए लालायित, परंपरा और संस्कृति के नाम पर स्त्रियों को सीमित अधिकार देने के प्रस्ताव के भी विरोध, धार्मिक अल्पसंख्यकों को दोयम दरजे का नागरिक बनाने के लिए सदा प्रयासरत, संघ के इस द्वितीय सरसंघचालक का जन्मशती वर्ष है. उनके अनुयायियों ने यह तय किया है कि इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाये. साल भर चलनेवाले इन जन्मशती कार्यक्रमों की कें द्रीय विषयवस्तु `सामाजिक समरसता' तय की गयी है, जिसके तहत समूचे देश के पैमाने पर बैठकों, सेमिनारों एवं रैलियों का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें विशेष जोर दलित, आदिवासी जैसे वंचित तबकों पर है.
वे सभी जो राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के चिंतन एवं कार्यप्रणाली से परिचित हैं, वे अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह इस मुहिम के जरिये जनसाधारण के समक्ष गोलवलकर को `महान राष्ट्रनेता' ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक प्रेरणा से लैस साधु पुरुष घोषित किया जा रहा है. उनके तखल्लुस `गुरुजी' के साथ `श्री गुरुजी' जोड़ना इसी बात का परिचायक है ताकि कोई भी उनके विवादास्पद अतीत के बारे में कोई सवाल न उठा सके . कोई यह न पूछ सके कि वियतनाम पर अमेरिकी आक्रमण में किस बेशरमी के साथ गोलवलकर ने अमेरिकी आक्रांताओं की हौसलाअफ जाई की थी, कोई यह न पूछ सके कि बंटवारे के दिनों में दंगा फैलाने के आरोप में किस तरह वे पकड़े जानेवाले थे. या कोई यह न पूछ सके कि हिंदुस्तानी जनता जिन दिनों बरतानवी सामराजियों के खिलाफ व्यापक संग्राम में सन्नद्ध थी तब किस तरह गोलवलकर और उसके अनुयायी इस संग्राम से दूर संघ की शाखाओं में एकत्रित होकर अपनी कर्णकर्कश आवाज में `नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' का जाप कर रहे थे.
सोचने का प्रश्न यह उठता है कि क्या गोलवलकर की जन्मशती का यह अवसर उन सभी के लिए भी विशेष
कार्यभार उपस्थित करता है जो हिंदू राष्ट्र की उनकी परियोजनाओं से असहमत हैं या कि उनके मुखालिफ हैं और उसे देश तथा समाज की प्रगति में बाधक मानते हैं. इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि छिटपुट अखबारी टिप्पणियों या पत्रिकाओं के लेखों को छोड़ दें तो किसी भी सियासी-समाजी संगठन में, जो धर्मनिरपेक्षता की हामी भरता हो, यह प्रक्रिया नहीं चलती दिखी है कि वे इस बात को बेबाकी से समझने की कोशिश करें कि अपनी मानवद्रोही अंतर्वस्तु के बावजूद हिंदोस्तां की सरजमीन पर गोलवलकर की परियोजना की सफलता का क्या राज है. क्या यह सही नहीं कि 50 के दशक में राजनीति और समाज के हाशिये पर चला गया राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आज की तारीख में अपने तमाम आनुषंगिक संगठनों के ताने-बाने के जरिये हिंदुस्तान की सियासत और समाज में एक ऐसी स्थिति में पहुंचा है जहां से उसे आसानी से हटाया नहीं जा सकता.





देखें गुजरात में संघी उत्पात. यह फ़िल्म गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार की योजनाओं और उसके फ़ायदों पर है. राकेश शर्मा की फ़ाइनल साल्युशन.

एक बात जो इस संदर्भ में ध्यान रखी जानी चाहिए कि 2004 के आम चुनावों में भले ही भाजपा को शिकस्त मिली हो या खुद हिंदुत्व बिग्रेड की मुहिम फिलवक्त संकट के दौर से गुजर रही हो, लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि यहां हिंदुत्व के प्रकल्प के अमली शक्ल धारण क रने की स्थिति फिर उभर नहीं सकती. कई सूबों में अपने बलबूते तथा चंद सूबों में अन्य पार्टियों के साथ हिंदुत्व के फलसफे को माननेवाले हुकूमत कर रहे हैं. जहां पर वे बिना कि सी डर-भय के अपनी इस परियोजना पर अमल कर रहे हैं. राजस्थान हो, झारखंड हो या गुजरात हो या मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ हो, ये ऐसे प्रांत हैं जहां अपने-अपने तरीकों से हिंदुत्व की `प्रयोगशालाओं' के बनने का काम जोरों पर हैं. यह भी साफ तौर पर देखने में आ रहा है कि कें द्र में सहयोगियों के साथ सत्तासीन कांग्रेस सरकार धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपने समझौतापरस्त रवैये से या अपने क ई `नरम हिंदुवादी' क दमों से संघ-भाजपा परिवार को नया `स्पेस' प्रदान क रती दिख रही है. कांग्रेस से नाराज चल रहे चंद राजनीतिक दल जो इन दिनों भले ही कें द्र सरकार को समर्थन दे रहे हैं, अपने सियासी कारणों से भाजपा से पींगे बढ़ाते दिख रहे हैं, ऐसे समय में इस प्रकल्प के अहम सिद्धांतकार के महिमामंडन का जो सिलसिला जन्मशती पर चलेगा उसके बारे में खामोश कै से रहा जा सक ता है?
दूसरा मसला है हिंदुत्व की सामाजिक जड़ों की तलाश का, अर्थात अपने समाज के समाजशास्त्रीय अध्ययन का. अपनी आंखों के सामने ही हम इसी समाज के पढ़े-लिखे तबके के एक हिस्से को पाला बदलते तथा हिंदुत्व की परियोजना के साथ जुड़ते देख सकते हैं. बाबरी मसजिद के विध्वंस का आंदोलन हो, भाजपा द्वारा कें द्र में छह सालवाली हुकूमत हो या गुजरात के जनसंहार जैसी त्रासदी हो, इन सभी मामलों में हिंदू जनमत का एक अच्छा-खासा हिस्सा संघ की अगुआई में जारी `सोशल इंजीनियरिंग' के विशिष्ट प्रयोगों में शामिल होता दिखा है. इस पृष्ठभूमि में यह विचारणीय प्रश्न बन जाता है कि आखिर घृणा तथा द्वेष पर आधारित परियोजना में आम कहलानेवाले लोगों का एक हिस्सा क्यों साथ खड़ा होता है, या होता आया है. हमारी सभ्यता, संस्कृति के वे कौन से तत्व हैं जो हिंदुत्व के प्रचार-प्रसार के लिए मुफीद रहे हैं?
तीसरा मसला है कि लंबे समय तक हाशिये पर रह कर धीरे-धीरे अपने विचारों की स्वीकार्यता कायम करने में इस दक्षिणपंथी परियोजना को जो सफलता मिली उससे इस देश की सेक्युलर-जनतांत्रिक तथा वामपंथी ताकतें संगठन निर्माण के क्षेत्र में किस तरह का सबक ग्रहण कर सकती हैं. अर्थात क्या यह सही नहीं कि बरतानवी हुक्मरानों के खिलाफ संघर्ष से बनायी दूरी तथा गांधी हत्या के मामले में अपनी विवादास्पद भूमिका से संदेह के घेरे में रहते आये संघ ने 50 के दशक में शिक्षा से लेकर समाज के विभिन्न क्षेत्रों के संगठन निर्माण का जो उपक्रम शुरू कि या, उसने उसे अपने विस्तार में मदद पहुंचायी.
चौथा मसला फासीवाद के भविष्य से जुड़ा है. इसके लिए दूरगामी किस्म के अध्ययन की जरूरत पड़ेगी, ताकि जाना जा सके कि 21वीं सदी की इन पैड़ियों पर फासीवाद किन-किन रास्तों से आ सकता है तथा अपने मुल्क में उसकी क्या-क्या खासियतें हो सकती हैं? भारत जैसे तीसरी दुनिया के विशाल मुल्क में, जहां लोकतांत्रिक प्रणाली की जड़ें गहरी हो चुकी हैं, वहां पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए क्या वह चुनावों का रास्ता अख्तियार कर सकता है? प्रो एजाज अहमद का वक्तव्य हमें नहीं भूलना चाहिए कि हर देश को वैसा ही फासीवाद मिलता है जिसके लिए वह तैयार होता है.
हिंदोस्तां की सरजमीन पर गोलवलकरी परियोजना की `सफलता' जहां जनतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता के लिए चंद सवाल खड़े करती है, वहीं इस जन्मशती की तैयारियों में गोलवलकर को लेकर संघ परिवार में मौजूद दुविधा को भी देखा जा सकता है. साफ कर दें कि यह दुविधा गोलवलकरी प्रोजेक्ट की मानवद्रोही अंतर्वस्तु को लेक र नहीं है, वह उसके बाह्य रूप अर्थात `पैकेजिंग' को लेकर है. 21वीं सदी की इस बेला में अपने यूनिफार्म `लंबी मोहरीवाली खाकी निक्कर और सफेद शर्ट' पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर संघ के अगुआ इस बात को भी ठीक से समझते हैं कि जिस निर्लज्जता के साथ गोलवलकर ने नाजी प्रयोगों की प्रशंसा की थी, वह बात अब किसी को पचनेवाली नहीं है. 1938 में गोलवलकर द्वारा रचित `वी आर अवर नेशनहुड डिफाइंड' किताब के रचयिता का सेहरा किन्हीं बाबा राव सावरकर के माथे बांधने के प्रसंग में हम संघ की इसी कवायद को देख सकते हैं.
भले हिंदू एकता कायम क रने के सवाल पर गोलवलकर के बाद आनेवाले लोगों ने एक वैकल्पिक रास्ते का प्रयोग किया हो, लेकिन इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता कि अपने चिंतन, विश्वदृष्टिकोण के धरातल पर संघ के मौजूदा नेता गोलवलकर से किसी मायने में अलग हैं. गुजरात-2002 के प्रायोजित जनसंहार में हम इसकी झलक देख चुके हैं. दलित स्त्रियों, शूद्रों, अतिशूद्रों को अपने साथ जोड़ने में वे भले ही गोलवलकर से आगे निकल गये हों, लेकि न उनकी अपनी परियोजना में इन तबकों के वास्तविक सशक्तीकरण का कोई कार्यक्रम नहीं है. ये सभी उत्पीड़ित तबके उनकी निगाह में हिंदू राष्ट्र के `दुश्मनों' के खिलाफ लड़ने में प्यादे मात्र हैं.
यह अकारण नहीं कि गोलवलकर के जन्मशती कार्यक्रमों के कें द्रीय नारे के तौर पर `सामाजिक समरसता' को उन्होंने तय किया है, ताकि इसी बहाने गोलवलक र की मानवद्रोही परियोजना को नयी वैधता प्रदान की जा सके , जिसको साकार करने के लिए सभी प्रतिबद्ध हैं.
सुभाष गाताडे के एक लंबे लेख के प्रमुख अंश.

ठेके के दौर में मज़दूर आंदोलन : सब रस ले गयी पिंजडेवाली मुनिया

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/28/2007 12:25:00 AM

कुमार अनिल भाकपा माले लिबरेशन से जुडे़ रहे हैं. अभी प्रभात खबर में हैं. मई दिवस को देखते हुए आज के हालात में मज़दूर संगठनों पर उनकी चिंताएं इस लेख के माध्यम से सामने आयी हैं. आगे भी वे कुछ लिखेंगे इस मसले पर. हमारा इरादा आज के राजनीतिक-आर्थिक हालात में मज़दूर आंदोलन पर एक बहस चलाने का है. आइए आप भी इसमें हिस्सा लीजिए.

कब चेतेगा मजदूर वर्ग
कुमार अनिल
बड़ी अजीब स्थिति है. सीपीएम से जुड़ी सीटू पटना में इस बार अलग से मजदूर दिवस मनायेगी. पिछले क ई वर्षों से क म-से-क म पहली मई को सारी ट्रेड यूनियनें एक मंच पर आती रही हैं. इस बार मामला नंदीग्राम को लेकर उलझ गया. नंदीग्राम में कि सानों पर हुए दमन को जहां अन्य संगठन मुद्दा बनाना चाहते हैं, वहीं सीपीएम अपनी सरकार की आलोचना को तैयार नहीं है. वाम मोरचे में फूट पड़ गयी. एटक, यूटीयूसी(लेस), यूटीयूसी, ए टू व एचएमएस एक मंच पर होंगे व दूसरी ओर होगी सीटू . बहुत दिनों के बाद कि सानों के मुद्दे पर ट्रेड यूनियनों में बहस हुई.
आजादी के बाद से ही कि सानों व दूसरे तबकों के आंदोलनों से मजदूर वर्ग का आंदोलन कटता चला गया. आज मजदूर वर्ग का आंदोलन पूरी तरह अपनी ही मांगों में सिमट क र रह गया है. वेतन, बोनस, प्रोन्नति, भत्ता ही उसके लिए सब कुछ है. आंदोलन अपनी राष्ट्रीय भूमिका खोता चला गया.
एक समय ट्रेड यूनियन आंदोलन ने देश की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज क रायी थी. क म्युनिस्ट पार्टी के बनने से पहले 1921 में एटक के दूसरे अधिवेशन में 50 हजार से ज्यादा मजदूर झरिया में जुटे थे. अधिवेशन का पहला प्रस्ताव स्वराज के लिए था. जोरदार शब्दों में घोषणा की गयी कि स्वराज पाने का सही समय आ गया है. दूसरा प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय भाईचारे को लेकर था. सूखे व अकाल से पीड़ित रूसियों के प्रति संवेदना प्रकट की गयी. अधिवेशन ने देश के मजदूरों का आह्वान किया कि वे रूसी भाइयों के लिए अपना एक दिन का वेतन दान करें. साइमन कमीशन जब मुंबई पहुंचा तो 20 हजार मजदूरों ने सड़क पर उतर कर विरोध कि या.
कम्युनिस्ट पार्टी की उदासीनता के बावजूद नौ अगस्त, 1942 को जब महात्मा गांधी गिरफ्तार हुए, तो देश भर के मजदूरों ने हड़ताल की. 1946 के नौसैनिक हड़ताल के समर्थन में मजदूरों की हड़ताल को भला कौन भुला सकता है.
वैश्वीकरण के इस युग में इकाई, विभाग व संवर्ग में बंटे मजदूर वर्ग को न सिर्फ अपनी एकता बनानी होगी, वरन अपनी सामाजिक भूमिका को फिर से परिभाषित भी करना होगा.
बिहार में सेवा क्षेत्र के कर्मियों की बड़ी तादाद है. अब तब उन्होंने सैक ड़ों हड़तालें की हैं. उनका वेतनमान भी काफ़ी आक र्षक है, लेकिन उन्होंने कभी जनता से जुड़ने की कोशिश नहीं की. बीपीएल(गरीबी रेखा से नीचे रहनेवालों की सूची, जो तैयार हो रही है) में धांधली को लेकर बिहार के ग्रामीण गरीब आंदोलित हैं. उन्होंने अपने दम पर सरकार को पीछे धकेला. आज हर जिले में सरकारी महकमा सूची में सुधार के लिए रतजगा कर रहा है. नीतीश सरकार ने मामले की गंभीरता को समझा, पर मजदूर वर्ग की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी. पंचायत स्तर पर धांधली में सरकारी सेवकों के नाम धड़ल्ले से आ रहे हैं, पर किसी कर्मचारी संगठन ने अपने सहकर्मियों की घूसखोरी की प्रवृत्ति को मुद्दा नहीं बनाया. नरेगा(राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का बिहार में बुरा हाल है, पर इसे संगठित क्षेत्र के कर्मियों ने मुद्दा नहीं बनाया. बिहार में मजदूर वर्ग का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है. सबसे बड़ी संख्या खेत मजदूरों की है. निर्माण मजदूरों की भी बड़ी तादाद है. बिहार की आबादी के एक तिहाई इस हिस्से से मुंह मोड़ कर किसी आंदोलन का विकास नहीं हो सकता.
आज का दौर ठेके और निजीक रण का दौर है. ठेके पर शिक्षक, कर्मचारी और यहां तक की डॉक्टर-इंजीनियर
की भी बहाली हो रही है. मजदूर वर्ग के समक्ष यह बिल्कुल नयी परिस्थिति है. जब कुछ भी स्थायी न हो, तो मजदूरों को संगठित करना और भी मुश्किल है. ब्रिटेन व अमेरिका की ट्रेड यूनियनें विलय के लिए वार्ता चला रही हैं. भारत के ट्रेड यूनियन नेताओं को भी कुनबों की राजनीति से जल्दी ही बाहर आ जाना चाहिए.

क्या महाबली लौटेगा अपनी मांद में

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/28/2007 12:01:00 AM

एमजे अकबर के लिए अलग से कोई परिचय देने की ज़रूरत नहीं है. आजकल वे अंतररष्ट्रीय मुद्दों,कखासकर अमेरिकी नीतियों, पर लगातार लिख रहे हैं.अपने इस लेख में वे अमेरिका के इराक से लौटने को लेकर अमेरिका में चल रहे राजनीति की चर्चा कर रहे हैं. यह लेख प्रभात खबर में हाल ही में प्रकाशित हो चुका है. वहां से साभार.

पुनर्वापसी की ओर दुनिया
एमजे अकबर
शांति की बात करना क्या देशभक्ति है? अमेरिका आज बहस के इसी मुद्दे से गुजर रहा है. इराक में उसकी हार का निहितार्थ और जीत का अर्थ तलाशा जा रहा है. निश्चय ही युद्ध को सदैव देशभक्ति से जोड़ा गया है. किसी भी नेतृत्व के लिए एक हाथ में बंदूक और दूसरे हाथ में बिगुल जीत का ध्वज माना गया. जो जितना ज्यादा अपनी मातृभूमि का कर्ताधर्ता बनता जाता है, वह अपने लोगों को उतना ही अधिक कब्र की ओर धकेल सकता है. आतंक वादियों की देशभक्ति भी ऐसा ही मजबूत लबादा है, जो अपने पापों को ऐसे ही गैरजिम्मेदार तरीके से घालमेल कर बहाना-बनाना चाहते हैं.
इसी तरह आज कमांडर इन चीफ की महिमा की रक्षा करना भी देशभक्ति का तकाजा बन गया है. भले ही यह कोई बाध्यता नहीं है. राजनीतिज्ञ वोट की तलाश में शांति प्रयासों को युद्ध में तब्दील करने की मंशा रखते हैं. वजह यह कि शांति अस्पष्ट होती है, जबकि युद्ध में बल की प्रधानता दिखती है. यद्यपि आम धारणा यही है कि मतदाता शांति को ही पसंद करते हैं, पर सामान्य अनुभव हमें बताता है कि युद्ध के बाद मतदाता ज्यादा प्रभावित किये जा सकते हैं, जबकि डर की भावना को सर्वाधिक मुखर रू प में युद्ध के माध्यम से व्यक्त कि या जा सक ता है. भावनाओं और तर्क का यही वह शक्तिशाली समिश्रण है, जिसे बुश ने पिछले पांच वर्ष से बनाये रखा है. अमेरिकी चेतना में डर की भावना बुश के कारण नहीं, बल्कि 9/11 की घटना से पैदा हुई. इस पूरे मुद्दे को जॉर्ज बुश ने ब़डी होशियारी से भुनाया है. उन्होंने अमेरिकन एजेंडा के बजाय बुश बजेंडा को सर्वोपरि रखा. यही वह सामान्य कारण है, जिस बिना पर आफ गानिस्तान और इराक युद्ध के बीच अंतर तलाशा जा सकता है. ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौंपने से तालिबानियों के इनकार करने से अमेरिका को उस पर हमला क रने की वैधता मिल गयी, लेकिन सद्दाम हुसैन के खिलाफ युद्ध आतंकवाद के खिलाफ युद्ध जैसा नहीं माना जा सकता.
इराक युद्ध ने इस बात को बार-बार सिद्ध किया कि जॉर्ज बुश और उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने इस पूरे प्रकरण को उपहास का विषय बना दिया. इसके लिए तथ्यों को तोड़ मोड़ कर और अतिशयोक्ति पूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया. सद्दाम हुसैन पर लादेन का सहयोगी होने का झूठा आरोप थोपा गया. आतंक के खिलाफ युद्ध का मुहावरा लोगों में उत्सुकताका विषय बना दिया गया. एक अदृश्य आतंक की सत्ता के खिलाफ किस तरह लड़ा जाये, यह बात अचानक ही नहीं पैदा हुई. अपने शत्रुओं को निशाने पर लेने और व्हाइट हाउस को सशक्त बनाने के लिए इन बातों को जानबूझ कर हवा दी गयी. बुश से जो सबसे बड़ी गलती हुई वह यह थी कि अपने दुश्मनों को सजा देने की उनकी इच्छा इन सबके बावजूद एक अधूरा सपना ही रह गयी. उनकी आशाओं के विपरीत इराक में चरमपंथियों के उभार से यह बात सिद्ध हुई कि उनके लक्ष्य ने उन्हीं के लिए विध्वंसक परिणाम पैदा कि ये. वहां रोज हो रही हिंसक घटनाएं, सेना पर अतिरिक्त दबाव, बढ़ रहे वित्तीय खर्च और जनविरोध बताते हैं कि बुश और उनकी रिपब्लिक न पार्टी के लिए यह पूरा अभियान बहुत महंगा सिद्ध हुआ. फिर भी युद्ध को सही ठहराने की कोशिश से बुश की दृढ़ता का पता चलता है. हालांकि इसकी उपयोगिता खत्म हो गयी है, लेकि न इसका राजनीतिक फ़ायदा तो उठाया ही जा सकता है. अब बुश और डेमोक्रे ट्स के बीच बहस का मुद्दा यह है कि क्या इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की कोई समय सीमा तय होनी चाहिए? डेमोक्रे ट्स चाहते हैं कि अगले 18 महीनों के अंदर, यानी नया राष्ट्रपति चुने जाने से पूर्व सैनिकों की वापसी हो जानी चाहिए. लेकि न बुश का मानना है कि इसकी समय सीमा तय करने से वे युद्ध हार जायेंगे. वस्तुत: बुश की इन बातों से उनका खोखलापन ही उजागर होता है. वह अपनी नयी चरमपंथी पुनरुत्थान रणनीति के तहत इराक में शांति लाने के लिए अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं. ऐसी बातों से जॉर्ज बुश नाराज रिपब्लिक नों का समर्थन पा रहे हैं, क्योंकि इससे कहीं न क हीं एक समय सीमा बंधती है. यदि अक्तूबर-नवंबर माह तक यह रणनीति कारगर नहीं होती है, तो बुश अपनी नीतियों में बदलाव करेंगे. और इस बदलाव से एक प्रकार से इराक से मुक्ति मिल सकेगी. इस तरह डेमोक्रेट की अपेक्षा रिपब्लिक न बुश को और भी कम समय दे रहे हैं. वस्तुत: बुश के लफ्ज कुछ अलग हैं, जबकि अमेरिकी सेना और जनता इराक से मुक्ति चाहती है. पेंटागन ने स्वीकार किया है कि इधर सशस्त्र बलों पर बहुत दबाव रहा है, इस कारण इराक में सैनिकों की सामान्य ड्यूटी सुधार कर उसे 15 महीने कर दिया गया है. वियतनाम युद्ध के काल में भी यह समय सीमा अधिक तम 15 महीने ही थी. सेना का कहना है कि बहुत ऊ़चे वेतन पर पिछले वर्ष 80 हजार लोगों की भर्ती के बावजूद उसने 14 लाख सैनिकों की निर्धारित संख्या को बनाये रखा है. इस संख्या को सामान्य अवकाश का सूचक नहीं माना जा सकता. इससे इराक में सैनिकों की कमश: घटती संख्या का भी पता चलता है. युद्ध के समय अधिकतर युवा अपने बेहतर भविष्य, अधिक लाभ और मिलनेवाले ढेर पैसे की वजह से सेना में भर्ती हुए थे. कुछ डेमोक्रेट राजनीतिज्ञ पहले के मसौदे में बदलाव चाहते हैं, ताकि धनी बच्चें को युद्ध के मैदान में लाया जाये. उनका मानना है कि यदि जॉर्ज बुश की नीतियों के लिए अभिजात्य वर्ग अपने बच्चें को मरने के लिए भेजता है, तो इससे युद्ध बहुत जल्दी समाप्त होगा.
कोई नहीं जानता कि इसका परिणाम अमेरिका की किस पीढ़ी को भुगतना होगा. इस युद्ध की लागत 500 बिलियन डॉलर पार कर चुकी है. इसका सबसे बड़ा नुकसान वित्तीय मोर्चे पर हुआ है. युद्ध में बहाये जा रहे खून की कीमत बिगड़ते बैलेंस सीट के रूप में सामने आया है. इराक में उपयोग में आ रहे हेलिकॉप्टरों को सितंबर में नयी मशीनों द्वारा बदल दिया जायेगा. यह नया बेड़ा वी-22 विमानों का होगा, जो हेलिकॉप्टर की तुलना में अधिक गतिवाला और युद्धक किस्म का होगा. हालांकि चरमपंथियों के विरुद्ध इसकी उपयोगिता के बारे में काफी अनिश्चय की स्थिति है, पर इसकी लागत कम से कम प्रति विमान 20 बिलियन डॉलर तो है ही. इससे सामरिक उद्योगों को बहुत धनी होने का मौका जरूर मिल जायेगा.



देखें फ़ारेनहाइट 9.11. सितंबर 11, 2001 को ट्रेड सेंटर टावरों पर हमले की असली कहानी. इसी घटना को आधार बना कर अफ़गानिस्तान और इराक पर हमला किया गया.

अब अमेरिका की जनता को एहसास होने लगा है कि पैसे या सुंदर लफ्जों के छद्म से जमीनी युद्ध नहीं जीता जा सकता. बुश के लफ्जों के छद्म की रणनीति के बने रहने की सामान्य वजह यह है कि यहां युद्ध की कोई परिभाषा नहीं है. इसलिए हासिल किये गये निश्चित लक्ष्यों की बात भी नहीं की जाती. वास्तव में देखा जाये, तो इराक युद्ध के दोनों घोषित उद्देश्य पूरे हो चुके हैं. अब यह निश्चित हो चुका है कि वहां न तो सामूहिक विनाश के हथियार हैं और न ही सद्दाम हुसैन. इराक अगले सौ वर्ष तक उन्हें पाने की सामर्थ्य भी नहीं रखता है. अब सद्दाम मर चुके हैं और उनकी सत्ता नष्ट हो चुकी है. इसलिए अब अमेरिका और ब्रिटेन की सेना बगदाद में पुलिस मैन के रूप में क्यों बनी हुई है? यदि यही उनका मिशन है, तो यह असंभव मिशन है. इससे किसी भी दिन पता चलेगा कि अमेरिका और ब्रिटेन की मुख्य जगहों पर जवाबी हमला किया गया. जब तक इराकी धरती पर विदेशी सैन्य टुकड़ियां बनी रहेंगी, तब तक वहां से उग्रवाद को नहीं मिटाया जा सकता. जब कोई प्रशासन बिखरना शुरू होता है, तो केवल एक खंभा ही नहीं गिरता; विश्वास के क्षरण का प्रभाव पूरी संरचना पर पड़ता है. इस सरकार के सभी महत्वाकांक्षी लोग गलत कारणों से पहले पन्ने पर छाये हुए हैं. इस विजय के सूत्रधार कार्ल रावे यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि व्हाइट हाउस के अभिलेखागार से लाखों करोड़ों ई-मेल क्यों हटाये गये. इराक के मुख्य मस्तिष्क पॉल वोल्फोविट्ड अब विश्व बैंक के अध्यक्ष हैं. वह अभी अपने गर्ल फ्रेंड को बहुत ऊंचे वेतनमान पर नौकरी देने के मामले में अपने प्रभाव के दुरुपयोग मामले में सफाई दे रहे हैं. उन पर आरोप लगोनवालों का मानना है कि वह विश्व बैंक की परवाह नहीं करते. वास्तव में पॉल वोल्फोविट्ज, कार्ल रावे, डिक चेनी और जार्ज बुश विश्व बैंक की बहुत ज्यादा परवाह करते हैं. यदि वह किसी की परवाह नहीं करते तो शेष पूरे विश्व की. इस तरह दुनिया पुनर्वापसी की राह पर है.

अनुवादक - योगेंद्र/कमलेश

बंगाल में पोंगापंथ

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/27/2007 01:28:00 AM

वाकई देश में सीपीएम किस तरह से मार्क्स का नाम लेकर धार्मिक ब्रह्मणों और आर्थिक ब्राह्मणों (अमेरिकनों) के लिए लाल कालीन बिछाये हुए है, यह देखने लायक है. हंस के मार्च अंक से साभार
पलाश विश्वास

बंगाल के शरतचन्द्रीय बंकिमचन्द्रीय उपन्यासों से हिंदी जगत भली-भांति परिचित है, जहां कुलीन ब्राह्मण जमींदार परिवारों की गौरवगाथाएं लिपिबद्ध हैं. महाश्वेता देवी समेत आधुनिक बांग्ला गद्य साहित्य में स्त्राी अस्मिता व उसकी देहमुक्ति का विमर्श और आदिवासी जीवन यंत्राणा व संघर्षों की सशक्त प्रस्तुति के बावजूद दलितों की उपस्थिति नगण्य है. हिंदी, मराठी, पंजाबी, तमिल, कन्नड़ और तेलुगू भाषाओं की तरह बांग्ला में दलित साहित्य आंदोलन की कोई पहचान नहीं बन पाई है और न ही कोई महत्त्वपूर्ण दलित आत्मकथा सामने आई है, बेबी हाल्दार के आलोआंधारि जैसे अपवादों को छोड़कर. आलो आंधारि का भी हिंदी अनुवाद पहले छपा, मूल बांग्ला आत्मकथा बाद में आयी.
यह ब्राह्मणत्व का प्रबल प्रताप ही है कि १९४७ में भारत विभाजन के बाद हुए बहुसंख्य जनसंख्या स्थानांतरण के तहत पंजाब से आनेवाले दंगापीड़ितों को शरणार्थी मानकर उनके पुनर्वास को राष्ट्रीय दायित्व मानते हुए युद्धस्तर पर पुनर्वास का काम पूरा किया गया. जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरू और आधुनिक बंगाल के निर्माता तत्कालीन मुख्यमंत्राी विधानचंद्र राय ने पूर्वी बंगाल के दलित आंदोलन के आधार क्षेत्रा जैशोर, खुलना, फरीदपुर, बरिशाल से लेकर चटगांव, कलकत्तिया सवर्ण वर्चस्व और ब्राह्मणवादी एकाधिकार को चुनौती देने वाली कोई ताकत नहीं है. भारत भर में ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक पिछड़े वर्ग की जनसंख्या चालीस प्रतिशत से ज्य़ादा है. भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बाकी देश में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का जोरदार समर्थन करती है. मलाईदार तबके को प्रोन्नति से अलग रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में ओबीसी कोर ग्रुप की बैठक हुई जिसमें त्रिापुरा के समाज कल्याण मंत्राी कवि अनिल सरकार, जो माकपा की हैदराबाद कांग्रेस में गठित दलित सेल में बंगाल वाममोर्चा चेयरमैन विमान बसु के साथ महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं, शामिल हुए. पार्टी का दलित एजेंडा भी बसु और सरकार ने तय किया. इन्हीं अनिल सरकार ने उस बैठक में दलितों और पिछड़ों के आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमा ५० फ़ीसदी से बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की मांग उठाई, मलाईदार तबक़े को प्रोन्नति से अलग रखने के फ़ैसले की प्रतिक्रिया में उन्होंने सवर्ण मलाईदार तबकेश् को चिन्हित करके उन्हें भी प्रोन्नति के अवसरों से वंचित रखने की सिफ़ारिश की है. उनका दावा है कि त्रिापुरा में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों का आरक्षण लागू किया जा चुका है.
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में अभी तक पिछड़ी जातियों की पहचान का काम पूरा नहीं हुआ है, आरक्षण तो दूर. अनिल सरकार कहते हैं कि पचास फ़ीसद आरक्षण के बावजूद सिर्फ दस प्रतिशत नौकरियां ही दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को मिलती हैं, नब्बे फ़ीसदी नौकरियों पर सवर्ण काबिज़ हैं.
पश्चिम बंगाल में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को प्रोन्नति के अवसर तो सिरे से नहीं हैं. आरक्षित पदों पर रिक्तियां अनंत हैं पर योग्य प्रार्थी न मिलने की वजह दिखाकर अमूमन आरक्षित पदों को सामान्य बनाना आम है. गैर बंगाली नागरिकों को तो किसी भी क़ीमत पर जाति प्रमाण-पत्रा नहीं ही मिलता पर अब दलितों, आदिवासियों की संतानों को भी जाति प्रमाण-पत्रा जारी नहीं किए जाते.
सबसे सदमा पहुंचाने वाली बात यह है कि बाक़ी देश में जहां अखब़ार और मीडिया गैर-ब्राह्मणों की खब़रों को प्रमुखता देते हैं, वहीं बंगाल में ब्राह्मणवादी मीडिया और अखब़ार दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और शरणार्थियों के बारे में एक पंक्ति की खब़र तक नहीं छापते. जबकि कमज़ोर तबकेश् की आवाज़ उठाने वाली माकपा बंगाल में ३५ सालों से सत्ता में हैं.
पिछले दिनों सुभाष चक्रवर्ती के तारापीठ जाकर तारा मां की पूजा पर पार्टी पोलित ब्यूरो, केंद्रीय समिति, राज्य वाम मोर्चा से लेकर मीडिया में काफ़ी बवेला मचा. पार्टी, विचारधारा और धर्म पर वैचारिक बहस छिड़ गई. प्रतिक्रिया में सुभाष चक्रवर्ती ने कहा, 'पहले मैं हिंदू हूं और फिर ब्राह्मण`. वे दुर्गोत्सव में १२० पंडालों के संरक्षक थे. विवाद से चिढ़कर उन्होंने परिवहनकर्मियों को धूमधाम से विश्वकर्ता पूजा मनाने के निर्देश दिए. हक़ीक़त यह है कि सुभाष चक्रवर्ती और उनके चार भाइयों ने जनेऊ धारण नहीं किया. ब्राह्मण समाज ने आज़ादी से पहले उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था, वे एकमात्रा सवर्ण मंत्राी हैं जो दलितों का साथ देते हैं. पर वे अपनी पहचान और संस्कृति के यथार्थ पर जोर देते हैं. ज़मीनी जड़ें होने के कारण उनका जनाधार मजबूत है. सुभाष चक्रवर्ती के इस विवादास्पद बयान पर बंगाल में धर्म पर बहस तो छिड़ी, मनुस्मृति और उसके अभिशाप पर चर्चा तक नहीं हुई, चक्रवर्ती वाम आंदोलन के बंगाल, त्रिापुरा और केरल तक सिमट जाने की वजह भारतीय संस्कृति और लोक से अलगाव को मानते हैं.
बाक़ी भारत में दलित आंदोलन से अलगाव भी माकपा को राष्ट्रीय नहीं बनाती, यह पार्टी के हैदराबाद कांग्रेस में मानकर बाक़ायदा आज़ादी के इतने सालों बाद दलित एजेंडा भी पास किया गया पर अपने चरित्रा में आज भी माकपा और सारे वामपंथी दल दलित विरोधी हैं. इसीलिए दिनों दिन बंगाल में ब्राह्मणवाद की जडें मजबूत हो रही हैं. इसी हक़ीक़त की ओर बागी मंत्राी सुभाष चक्रवर्ती ने उंगली उठाई है. पूंजीवाद विकास के लिए अधाधुंध, ज़मीन अधिग्रहण के शिकार हो रहे हैं दलित पिछड़े आदिवासी और अल्पसंख्यक, पर इस मुद्दे पर तमाम हो हल्ले के बावजूद बंगाल में दलितों के अधिकार को लेकर लड़ने वाली कोई ताकत कहीं नहीं है.
इधर के वर्षों में बचे-खुचे दलित आंदोलन के तहत खा़सकर कोलकाता और आस-पास विवाह, श्राद्ध जैसे संस्कारों में ब्राह्मणों का बहिष्कार होने लगा है. श्राद्ध की बजाय स्मृति-सभाएं होने लगी है, कई बरस पहले यादवपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी करने वाले एक दलित ने अपढ़ पुरोहित से पिता का श्राद्ध कराने की बजाय कृष्णनगर के पास अपने गांव में स्मृति सभा का आयोजन किया तो पूरे इलाक़े में तनाव फैल गया.
ताजा घटना सुभाष चक्रवर्ती के ब्राह्मणत्व के विवाद के बाद की है.
सुंदरवन इलाक़े में दलितों-पिछड़ों की आबादी ज्य़ादा रही है. इसी इलाक़े में दक्षिण २४ परगना जिले के गोसाबा थाना अंतर्गत सातजेलिया लाक्स़बागान ग्लासखाली गांव के निवासी मदन मोहन मंडल स्थानीय लाक्सबागान प्राथमिक विद्यालय के अवैतनिक शिक्षक हैं. पर चूंकि उन्होंने पुरोहित बुलाकर पिता का श्राद्ध नहीं किया और न ही मृत्युभोज दिया इसलिए पिछले चार महीने से उनका सामाजिक बहिष्कार चल रहा हैं. वे अपवित्रा और अछूत हो गए हैं और पिछले चार महीने से वे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं.
मदनमोहन मंडल के इस स्कूल के विद्यार्थी ज्य़ादातर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के बच्चे हैं. बतौर शिक्षक छात्रा-छात्रााओं में मदनमोहन बाबू अत्यंत लोकप्रिय हैं, पर पवित्रा ब्राह्मणवाद के पुण्य प्रताप से शनि की दशा है उन पर. पिता की मृत्यु पर बंगाली रिवाज़ के मुताबिक सफ़ेद थान कपड़े नहीं पहने उन्होंने. हविष्य अन्न नहीं खाया. सामान्य भोजन किया. नंगे पांव नहीं चले. और न ही पुरोहित का विधान लिया या श्राद्ध कराया.
ब्राह्मणवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस दलित बहुल इलाक़े में, ब्राह्मणों ने नहीं, दलितों और पिछड़ों ने उनके स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी. प्रधानाचार्य शिवपद मंडल का कहना है, ''मदनमोहन बाबू सूतक (अशौच अवस्था में) में हैं. वे स्कूल आएंगे तो यह नन्हें बच्चों के लिए अशुभ होगा. मदनमोहन बाबू को फ़तवा जारी किया गया है कि ब्राह्मणों से विधान लेकर पुरोहित बुलाकर पहले पितृश्राद्ध कराएं, फिर स्कूल आएं.
मदनमोहन मंडल ने हार नहीं मानी और विद्यालय निरीक्षक की शरण में चले गए. उन्होंने लाक्सबागान के पड़ोसी गांव बनखाली प्राथमिक विद्यालय में अपना तबादला करवा लिया पर इस स्कूल में भी उनके प्रवेशाधिकार पर रोक लग गई.
इलाक़े के मातबर लाहिड़ीपुर ग्राम पंचायत के पूर्व सदस्य व वामपंथी आरएसपी के नेता श्रीकांत मंडल का सवाल है, ''जो व्यक्ति अपने पिता का श्राद्ध नहीं करता, वह बच्चों को क्या शिक्षा देगा.`` गौरतलब है कि सुंदरवन इलाके में माकपा के अलावा आरएसपी का असर ज्य़ादा है. अभिभावकों की ओर से कन्हाई सरदार का कहना है, ''जो शिक्षक गीता, शास्त्रा नहीं मानता, उसके यहां बच्चों को भेजने के बजाय उन्हें अपढ़ बनाए रखना ही बेहतर है.``
आखिऱकार अपने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ़ मदनमोहन मंडल गोसाबा थाना पहुंच गए, पर पुलिस ने रपट लिखने से मना कर दिया. मदनमोहन बाबू ने गोसाबा अंचल के विद्यालय निरीक्षक ब्रजेन मंडल से लिखित शिकायत की. ब्रजेन बाबू ने खुद शिक्षक संगठन के प्रतिनिधियों के साथ मौक़े पर गए, पर ब्राह्मणवादी कर्मकांड विरोधी शिक्षक का सामाजिक बहिष्कार खत़्म नहीं हुआ.
मदनमोहन मंडल आरएसपी के कृषक आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं. पर स्थानीय आरएसपी विधायक चित्तरंजन मंडल ने मदनमोहन बाबू के आचरण को 'अशोभनीय` करार दिया.
दक्षिण चौबीस परगना के वामपंथी शिक्षक संगठन के सभापति अशोक बंद्योपाध्याय का कहना है, ''अगर कोई संस्कार तोड़ना चाहे तो उनका स्वागत है, पर यह देखना होगा कि उसकी इस कार्रवाई को स्थानीय लोग किस रूप में लेते हैं.`` अशोक बाबू ने मदनमोहन मंडल के मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.
मदनमोहन बाबू अब भी स्कूल नहीं जा पाते, वे गोसाबा स्थित अपर विद्यालय निरीक्षक के दफ्त़र में हाज़िरी लगाकर अपनी नौकरी बचा रहे हैं. पर वे किसी क़ीमत पर पितृश्राद्ध के लिए तैयार नहीं हैं.
माकपा के बागी मंत्राी के ब्राह्मणत्व पर विचारधारा का हव्वा खड़ा करने वाले तमाम लोग परिदृश्य से गायब हैं.

संपर्क : द्वारा श्रीमती आरती राय, गोस्टोकानन, सोदपुर, कोलकाता-७००११०
फोन : ०३३-२५६५९५५१

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/27/2007 01:14:00 AM

ऐसे समय में, जब हिंदीब्लाग में घमसान मचा हुआ हो और निहायत सतही और निरर्थक बातों पर (वेब) पन्ने काले किये जा रहे हों, एक गंभीर और शोधपरक लेख देना खतरे से खाली नहीं है. खतरा इस बात का कि पाठक नहीं मिलेंगे. सारा ध्यान तो भड़काऊ चिट्ठों पर ही चला जाता है. फिर भी एक बात ज़रूर है कि जो बहस चल रही है वह इतिहास और तथ्यों की ही है. इसी संदर्भ में वैभव सिंह का लेख, तद्भव से साभार.

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान
(सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन)

वैभव सिंह

भारत में परम्परागत रूप से इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों के अभाव में पौराणिक मिथकीय कथाओं और शास्त्राों ने ही इतिहास की भूमिका का निर्वाह किया है। हिन्दू धर्म की कतिपय धर्मशास्त्राीय मान्यताओं जैसे अवतारवाद , वर्णधर्म और कर्मकाण्ड को सामाजिक आदर्श का दर्जा प्राप्त था और विभिन्न पौराणिक मिथकीय पात्रां एवं घटनाओं को इन्हीं सामाजिक आदर्शों की प्राप्ति या इनसे विचलित होने के आधार पर व्याख्यायित किया जाता था। धार्मिक मान्यताओं द्वारा अनुमोदित इन सामाजिक आदर्शों को विभिन्न रोचक कथाओं के जरिए वैधता दिलाने का काम पुराणों ने इतनी कुशलता के साथ किया कि इतिहास की जरूरत ही नहीं रह गयी।

18 वीं और 19 वीं सदी में एक आधुनिक अकादमिक विषय के रूप में इतिहास लेखन को मान्यता मिलनी प्रारम्भ हुई और पश्चिम के साथ साथ पूर्वी देशों में भी विभिन्न धमोर्ं, संस्कृतियों और समुदायों के इतिहास पर शोध करने का काम शुरू हुआ। एक ओर राजनीतिक सामाजिक स्थितियां बदलने से इतिहास लेखन की आवश्यकता का अनुभव किया गया तो दूसरी ओर इतिहास के निर्माण और व्याख्या के विभिन्न दृष्टिकोणों के जरिए विभिन्न समुदायों की राजनीतिक सामाजिक आकांक्षाओं को नया रूप मिलना आरम्भ हुआ।

19 वीं सदी में ही साम्राज्यवाद का भी अभूतपूर्व विस्तार हुआ और उसने मध्य एशिया व पूर्वी एशिया के अनेक पिछड़े देशों की अर्थव्यस्था को नियन्त्राण में लेने के लिए उन्हें राजनैतिक रूप से गुलाम बनाना आरम्भ कर दिया। इस साम्राज्यवाद ने निहित स्वाथोर्ं और व्यावहारिक जरूरतों के लिए इतिहास लेखन को भी अपना माध्यम बनाया। जब इतिहास लिखने का काम उन्होंने भारत में आरम्भ किया तब उन्होंने यहां के स्थानीय स्रोतों का भी पता लगाने की कोशिश की। प्रामाणिक इतिहास लेखन के स्थानीय स्रोतों के अभाव को देख कर तो वे भी आश्चर्य चकित हो गये। लोग अपने ही इतिहास की मौर्यकालीन और गुप्तकालीन घटनाओं एवं शासकों के नाम से अनभिज्ञ थे। इस स्थिति के बारे में 18 वीं सदी में भारत आने वाले एक यात्राी अमारी डी राएनकोर्ट ने अपनी किताब ÷ सोल ऑफ इण्डिया' में लिखा :

÷÷ आर्य भारत में कोई स्मृति नहीं क्योंकि उसका ध्यान शाश्वतता पर है, न कि समय पर... भारतीयों के लिए आध्यात्मिक वास्तविकता ÷ स्थान' है न कि समय, प्रकृति है न कि इतिहास।'' 1

यह भी एक अजीब विडम्बना थी कि इतिहास के प्रति अरुचि को हिन्दुओं की आध्यात्मिकता के प्रति अपवाद रूप से अत्याधिक रुचि के आधार पर व्याख्यायित किया गया। सीधे सीधे यह तर्क दिया गया कि दुनिया की अन्य सभ्यताओं व संस्कृतियों की तुलना में विशिष्ट रूप से लोकोत्तर जीवन और पारलौकिक विश्वासों पर उनके जीवन और समस्त बौद्धिक चिन्तन के केन्द्रित होने के कारण ही भारत में इतिहास लेखकों एवं इतिहास की प्रामाणिक रचनाओं का अभाव रहा है। यह एक कोरा सरलीकरण था और भारत में इतिहास के प्रति अरुचि के कारणों को सही ढंग से सामने रखने के स्थान पर उस समय आने वाले योरोपीय यात्रियों की भारत के सांस्कृतिक अतीत के सम्बन्ध में नासमझी को अधिक प्रकट करता है। कौटिल्य , वात्स्यायन, अश्वघोष और चार्वाक आदि की रचनाएं जिस देश में मौजूद रही हों वहां आध्यात्मिकता को उसका केन्द्रीय सांस्कृतिक मूल्य बताना यथार्थपरक दृष्टि का सूचक कम और राजनीतिक दृष्टि का सूचक ज्यादा था। हालांकि विलियम जोन्स के समय से ही भारत के बारे में इस साम्राज्यवादी निष्कर्ष का खण्डन भी होने लगा था कि पश्चिमी पुनर्जागरणकालीन मूल्यों के गर्भ से उपजी जिस आधुनिकता का संवाहक यूरोप है, उसके सामने भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा उपलब्धियां कहीं नहीं ठहरतीं। विलियम जोन्स ने भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों के रेखांकन के बहाने पश्चिमी पुनर्जागरण और एशियाई जड़ता की रूढ़ दृष्टियों पर आधारित द्वन्द्व के बारे में लिखा :

÷÷ हमें एशियाई लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, जिनकी प्रकृति, कला, आविष्कार से अपने विकास और लाभ के लिए अनेक महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते हैं।'' 2

इस तरह से 14-15 वीं सदी में विश्व भर में योरोपीय यात्रियों के फैलाव, आर्थिक राजनीतिक उपनिवेशों की स्थापना एवं साम्राज्यवादियों की स्थानीय संस्थाओं के अनुरूप प्रशासन चलाने की बाध्यता, इन सबके बीच 18 वीं सदी के अन्त और 19 वीं सदी में भारतीय इतिहास के निर्माण एवं व्याख्या का काम व्यापक रूप से आरम्भ हुआ। इस काम को अधिक व्यवस्थित और संस्थागत रूप से 1784 ई. में स्थापित रायल एशियाटिक सोसायटी के द्वारा शुरू किया गया। इसमें सिक्कों, अभिलेखों व प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों की खोज के बावजूद अधिक महत्व धर्मशास्त्र, साहित्य, भूगोल, संगीत और ज्योतिष की रचनाओं को दिया गया और उन्हीं के आधार पर ऐसी भारतीय सभ्यता के प्राचीन अतीत का निर्माण किया गया जो अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सके। इन साहित्यिक धार्मिक स्रोतों की व्याख्या करते हुए यह प्रश्न नहीं किया गया कि इन माध्यमों से अतीत की जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह समग्र समाज के यथार्थ को व्यक्त करती है या फिर किसी खास समूह की अभिरुचियों व सामाजिक गतिविधियों को। इस बारे में रोमिला थापर का मत है :

÷÷ प्राचीन समय के बचेखुचे साहित्यिक स्रोतों में ज्यादातर राजा, महत्वपूर्ण पुजारी वर्ग, मठों और सम्पन्न व्यापारियों की जिन्दगी का पता चलता है। इस प्रकार समाज के उच्च वर्ग के बारे में अधिक सूचनाएं मिलती हैं। इसके अलावा परम्परागत समाजों में शिक्षा प्रायः केवल अभिजन समूहों को ही मिल पाती है। इसलिए केवल वही अपनी गतिविधियों को साहित्य के माध्यम से व्यक्त कर पाते हैं। कालिदास के नाटक उदाहरण के तौर पर शासन और दरबार के अध्ययन की दृष्टि से शानदार ऐतिहासिक सामग्री हैं, लेकिन यह कहना कि इनमें पूरे भारतीय समाज का वर्णन है, अतीत की गलत तस्वीर बनाना है।'' 3

एक ओर विलियम जोन्स , चार्ल्स विलकिन्स, एच.एच. विलसन, मैक्समुलर, मारिज विण्टरनित्ज और रूडोल्फ रॉय आदि अंग्रेज और जर्मन प्राच्याविद वेदों, उपनिषदों और साहित्यिक कृतियों के आधार पर भारतीय अतीत पर मुग्ध होने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे थे, तो दूसरी ओर मिशनरियों ने अपने ढंग से भारत में औपनिवेशिक शासन को सही ठहराने के लिए भारतीय इतिहास के निर्माण और व्याख्या का काम किया। विलियम कैरे (1761-1834), अलेक्जेण्डर डफ (1806-1878), जॉन मुअर (1810-82) और चार्ल्स ग्राण्ट (1746-1823) ने भारत के इतिहास को अंधकारग्रस्त और हिन्दू धर्म को समस्त पाखण्ड और झूठ का पर्याय बताया। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक और ईसाइयत के प्रचारक थामस बैबिंजटन मैकाले (1800-59) ने अपने 1835 ईसवी के शिक्षा सम्बन्धी मिनट्स में यहां तक कहा कि ÷ भारत और अरब के सम्पूर्ण साहित्य का मुकाबला करने के लिए एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी ही काफी है।' यानी 19 वीं सदी में एक ओर प्राच्याविद थे, जो मुख्य रूप से प्राचीन कृतियों की खोज और उनके अनुवाद तैयार करके शेष विश्व को भारत की साहित्यिक और धार्मिक विशेषताओं से परिचित करा रहे थे, दूसरी ओर मिशनरी लेखक भारतीयों के अंधविश्वास, मूर्तिपूजा और बहुदेववाद की अवधारणा की आलोचना कर रहे थे, क्योंकि वे ईसाइयत की संसार की उत्पत्ति सम्बन्धी धारणा, ईश्वर के स्वरूप और उपासना पद्धति के अनुरूप नहीं थीं।

इतिहास के निर्माण और व्याख्या के इन प्रयत्नों से अलग अलग निष्कर्ष उभर कर सामने आये। प्राच्यविदों , मिशनरियों और जेम्स मिल जैसे उपयोगितावादियों ने भारतीय अतीत की रूढ़ छवियों के निर्माण में अपने अपने ढंग से योगदान दिया। ऐसे भारतीय समाज की छवि बनी जो हमेशा ही वेदों उपनिषदों वाले आध्यात्मिक चिन्तन में लीन रहता है या संस्कृत नाटकों की रचना में ही हर समय खोया रहता है। इस छवि के केन्द्र में ऐसे हिन्दू मनीषी उपस्थिति थे जो हर समय ब्रह्माण्ड की पहेलियों को सुलझाने के लिए पारलौकिक सत्ता से संवाद कायम करते रहने की चेष्टा करते रहते थे।

19 वीं सदी में ही जेम्स मिल की हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इण्डिया (1817), कर्नल टाड की एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान (1820), इलियट डाउसन की हिस्ट्री ऑफ इण्डिया ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस (1849) जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना हुई जिसने अतीत के बारे में दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। मिल ने समूचे भारतीय इतिहास का हिन्दू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में विभाजन कर इतिहास की साम्प्रदायिक व्याख्या की पृष्ठभूमि तैयार की। उनके ऐतिहासिक अध्ययन की विषयवस्तु एवं निष्कर्ष ठोस तथ्यों पर आधारित होने के स्थान पर सभ्यता के विकास और उपयोगितावाद से सम्बन्धित सामान्य अवधारणाओं पर निर्भर थे, जैसा कि उन्होंने खुद लिखा भीः

÷÷ अच्छी समझदारी रखने वाला कोई भी इंसान बिना इतिहास की प्रामाणिक जानकारी जुटाए प्राचीन ग्रन्थों एवं कृतियों को पढ़ कर लोगों की प्रवृत्तियों को जान सकता है।'' 4

मिल ने भारतीय अतीत की कटु आलोचना के आधार पर भारत के अंग्रेजों के हाथों पराधीन होने को तर्कसंगत साबित करने का प्रयास किया। इतिहासकार जे.एस. ग्रेवाल के शब्दों में:

÷÷ मिल ने हिन्दुओं को उनके अतीत या वर्तमान में सभ्य मानने से इंकार कर दिया।'' 5

उधर प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों और वैदिक सभ्यता को हिन्दू अतीत संस्कृति की धुरी बताने वाले विलियम जोन्स , मानियर विलियम्स और मैक्समुलर जैसे प्राच्यविदों ने हिन्दू स्वर्णकाल के रूप में ऐतिहासिक कालखण्ड की कल्पना की। उनके द्वारा समस्त विश्वासों और उपासना पद्धति के सभी पहलुओं को आत्मसात करने वाले हिन्दू धर्म की कल्पना की गयी और इस कल्पना के माध्यम से हिन्दू धर्म को भी ईसाइयत की तर्ज पर एक ऐतिहासिक रूप से विकसित धर्म के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। इन प्राच्यविदों में बुनियादी समानता के बावजूद कुछ दृष्टिकोण सम्बन्धी भेद भी थे। जैसे आरम्भिक प्राच्यविदों कोलब्रुक, विल्सन, प्रिन्सेप और टीएस बर्ट ने हिन्दू अतीत की ऐतिहासिकता के निर्धारण के लिए प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का सहारा लिया, साथ ही शोध के आधुनिक तरीकों जैसे अभिलेखों, सिक्कों, स्थापत्य आदि के संग्रह और अध्ययन पर भी बल दिया। प्रिन्सेप के योगदान के बारे में केजरीवाल का कहना हैः

÷÷ प्रिन्सेप ने भारत में पुरावशेषों और मुद्राओं के अध्ययन की नींव डाली और इस प्रक्रिया में प्राचीन भारत के कई प्रमुख शासकों और राजवंशों की खोज की।'' 6

आगे चल कर मैक्समुलर , अलब्रेख्त वेबर, विण्टरनित्ज और रूडोल्फ रॉय के रूप में प्राच्यवाद का जिस प्रकार से विकास हुआ, उसमें प्राच्यवाद पूरी तरह से वैदिक साहित्य, उपनिषदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों तक सीमित हो गया। इनमें अधिसंख्य प्राच्यविद जर्मनी और इंग्लैण्ड के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इण्डॉलोजी और संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते भी थे। जर्मन प्राच्यविदों के हाथों जिस प्रकार से वेदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों तक प्राच्यविद्या को सीमित करके भारतीय अतीत का अध्ययन हुआ, उसमें ठोस ऐतिहासिक जानकारियों का उतना महत्व नहीं रहा जितना अमूर्त गौरव और महानता को इन संस्कृत ग्रन्थों के माध्यम से स्थापित करने का। संस्कृत ग्रन्थों का इतनी गहराई से अध्ययन होने लगा कि जर्मन राष्ट्रवाद और योरोपीय सभ्यता की उच्चता की भावना रखने वाले जर्मन प्राच्यविद रूडोल्फ राय ने यहां तक कहा कि ÷ एक शिक्षित यूरोपियन भारत के ब्राह्मणों की तुलना में वेदों के सार को ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकता है।'7

हिन्दी नवजागरण के लेखक प्राच्यविद्या व उसकी इतिहास दृष्टि से गहराई से प्रभावित होने के कारण और कुछ ब्रिटिश उपनिवेशवाद से उपजी आत्महीनता के कारण वर्तमान को अस्वीकार्य मान कर उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे और अतीत या भविष्य को महत्वपूर्ण मान कर उसमें अपने आत्म गौरव की कल्पना करते थे। सुधीर चन्द्र ने उन्नीसवीं सदी के शिक्षित बुद्धिजीवियों और लेखकों के इसी अनुभव को ÷ उत्पीड़क वर्तमान से संघर्ष'7 का नाम दिया है। और लिखा

÷ वर्तमान की व्याख्या केवल अतीत अथवा भविष्य के सन्दर्भों के सहारे ही की जा सकती थी।' 8

इस समय अगर प्राच्यविदों ने ÷ आध्यात्मिक भारत' की एक आकर्षक और चमकदार तस्वीर खड़ी की तो, भारतीयों के प्रबुद्ध वर्ग ने भी न सिर्फ आध्यात्मिक अतीत बल्कि आध्यात्मिकता की भी नयी छवियां और परिभाषाएं गढ़ी। इसलिए आध्यात्मिकता की नयी व्याख्याओं और राष्ट्रवादी विवेचन के लिए उसे नये सन्दर्भों और अभिप्रायों से किस प्रकार जोड़ा गया, इसका अध्ययन भी कम रोचक नहीं होगा। यहां तक कि समूचा भक्तिकाल, जिसके साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक योगदान की काफी चर्चा होती है, वह भी बुरी तरह से विवादास्पद बना दिया गया। उस समय के एक महत्वपूर्ण लेखक बालकृष्ण भट्ट ने आध्यात्मिकता को भक्ति, आस्था, विश्वास और आत्मसमर्पण का विषय कम, देशभक्ति और मुल्की जोश का विषय अधिक बना डाला। उनके लेखन में हिन्दू आध्यात्मिकता का अतिशय उल्लेख ही नहीं बल्कि उसकी पुनर्परिभाषित व्याख्या भी महत्वपूर्ण हो गयी। उनके मुताबिक :

÷÷ आध्यात्मिक उन्नति ( स्पिरिचुअल प्रोग्रेस) और जातीयता ( नेशनैलिटी) या ( पॉलिटिक्स) मुल्की जोश साथ साथ चलते हैं।'' 9

हिन्दू आध्यात्मिकता की पुनर्व्याख्या की सबसे स्पष्ट मिसाल मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के विवेचन के सन्दर्भ में मिलती है। इस विवेचन में भक्ति आन्दोलन की सराहना और सख्त आलोचना दोनों ही एक साथ उपस्थित है। बालकृष्ण भट्ट के लिए भक्तिकाल की उपयोगिता अनुपयोगिता का प्रश्न मुस्लिम चुनौती का सामना करने से सीधे सीधे जुड़ गया था। इस दृष्टिकोण के कारण भट्ट जी ने मध्यकाल के भक्त कवियों का काफी कठोरता से विरोध किया और उन्हें हिन्दुओं को कमजोर करने का जिम्मेदार भी ठहराया। भक्त कवियों की कविताओं के आधार पर उनके मूल्यांकन के बजाय उनके राजनीतिक सन्दर्भों के आधार पर मूल्यांकन का तरीका अपनाया गया। भट्ट जी ने मीराबाई व सूरदास जैसे महान कवियों पर हिन्दू जाति के पौरुष पराक्रम को कमजोर करने का आरोप मढ़ दिया। उनके मुताबिक समूचा भक्तिकाल मुस्लिम चुनौती के समक्ष हिन्दुओं में ÷ मुल्की जोश' जगाने में नाकाम रहा। भक्त कवियों के गाये भजनों ने हिन्दुओं के पौरुष और बल को खत्म कर दिया। उन्होंने भक्त कवियों की इसी कमजोरी और नाकामी के विषय में लिखा :

÷÷ मीराबाई, सूरदास, कुम्भनदास, सनातन गोस्वामी आदि कितने महापुरुष जिनके बनाये भजन और पदों का कैसा असर है जिसे सुन कर चित्त आर्द्र हो जाता है। मुल्की जोश की कोई बात तो इन लोगों में भी न थी उसकी जड़ तो न जानिये कब से हिन्दू जाति के बीच से उखड़ गयी।'' 10

भक्तिकाल सम्बन्धी अपने विवेचन में भट्ट जी ने मुस्लिम शासन के राजनीतिक सन्दर्भों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया और वल्लभाचार्य व चैतन्य महाप्रभु के भक्ति स्वरूप की व्याख्या करने के स्थान पर तत्कालीन परिस्थितियों पर अधिक जोर देते हुए लिखा :

÷÷ ये लोग ऐसे समय में हुए जब देश का देश म्लेच्छाक्रान्त हो रहा था और मुसलमानों के अत्याचारों से नाकों में प्राण आ लगे थे। इससे आध्यात्मिकता पर इन्होंने बिलकुल जोर न दिया।'' 11

भक्तिकालीन सन्तों पर इल्जाम लगाना कि उन्होंने आध्यात्मिकता पर जोर नहीं दिया , अजीबोगरीब बात थी। जाहिर है कि भट्ट जी के मस्तिष्क में आध्यामिकता ईश्वरीय भक्ति व चिन्तन के बजाय लौकिक शक्ति व सम्पन्नता का पर्याय बन चुकी थी। मूल्यांकन की कसौटियां अगर काल्पनिक धारणाओं से निर्मित की जाती हैं तब वस्तुगत यथार्थ की व्याख्या भी वैज्ञानिक और वस्तुगत नहीं रह पाती। इतिहास के एक विशिष्ट चरण के आधार पर इतिहास की समूची प्रक्रिया के विषय में निष्कर्ष निकाले जाते हैं। भव्य और श्रेष्ठ की तुलना में पतन तथा विकार से भरे ऐतिहासिक युग, चरण तथा घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। बालकृष्ण भट्ट ने भी इतिहास की व्याख्या ऐसे नजरिये से की जो यह जानने और बताने के लिए अधिक उत्सुक था कि हिन्दुओं की शक्ति और आत्मगौरव में कब उन्नति हुई और कब गिरावट आयी। मध्यकाल में उन्होंने भक्ति भावना के विकास के साथ ही यह भी शिकायत कीः

÷÷ हमारी आध्यात्मिक उन्नति के सुधार पर किसी की दृष्टि न गयी।'' 12

इसके अतिरिक्त आध्यात्मिकता पर बिल्कुल जोर न देने के कारण भक्त कवियों व आचायोर्ं की निन्दा करते हुए लिखा :

÷÷ ऋषि प्रणीत प्रणाली को हाल के इन आचार्यों ने सब भांति तहस नहस कर डाला।'' 13

जाहिर है कि बालकृष्ण भट्ट ने भक्ति और अध्यात्म के मध्य अपनी मर्जी से एक विभाजन खड़ा कर दिया था। उनके अनुसार भक्ति का सम्बन्ध रसीली और हृदयग्रहिणी प्रवृत्तियों , विमलचित्त अकुटिल भाव और सेवक सेव्य भाव से है जबकि अध्यात्म का सम्बन्ध ज्ञान, कुशाग्र बुद्धि और अन्ततः जातीयता ( नेशनैलिटी) से होता है। इसी आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला :

÷÷ भक्ति ऐसी रसीली और हृदयग्रहिणी हुई कि इसका सहारा पाय लोग रूखे ज्ञान को अवज्ञा और अनादर की दृष्टि से देखने लगे और साथ ही जातीयता नेशनैलिटी को भी विदाई देने लगे जिसके रफूचक्कर हो जाने से भारतीय प्रजा में इतनी कमजोरी आ गयी कि पश्चिमी देशों से यवन तथा तुरुक और मुसलमानों के यहां आने का साहस हुआ।'' 14

भक्तिकाल की यह पूर्वग्रहपूर्ण आलोचना आज शायद ही किसी को स्वीकार हो। लेकिन कमाल की बात है कि रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद दिवेदी तक के भक्तिकाल सम्बन्धी मतों का बारीक विवेचन करने वाली हिन्दी आलोचना बालकृष्ण भट्ट की भक्तिकाल से जुड़ी धारणाओं पर ध्यान नहीं दे सकी। हकीकत यह है कि अध्यात्म और जातीयता का यह सम्बन्ध धर्म और राजनीति के सम्बन्धों की वकालत करता था। हिन्दी का समूचा नवजागरणकालीन चिन्तन कुरीतियों और आडम्बरों को समाप्त करने की दृष्टि से हिन्दू धर्म की आन्तरिक संरचना में सुधार की बात तो कहता था , लेकिन हिन्दुओं की सांस्कृतिक धार्मिक अस्मिता का उपयोग किये बगैर हिन्दुओं के राजनीतिक पुनरुत्थान को असम्भव मानता था। भक्ति आन्दोलन में चूंकि राजनीतिक ढांचे को धार्मिक संस्थाओं व विचारों से नियन्त्रित करने का स्पष्ट सरोकार नहीं मिलता, इसलिए भट्ट जी जैसे लेखकों ने उसकी आलोचना की। यह आलोचना इस कल्पना से प्रेरित थी कि प्राचीनकाल में धर्म और अध्यात्म राजनीति से विलग नहीं हुए थे इसलिए हिन्दू जाति के शौर्य, मानसिक शक्ति और वीर्य जैसे गुण भी बने रहे और जातीयता का भावबोध भी।

सांस्कृतिक शुद्धता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पक्ष में आह्मवान केवल हिन्दू लेखकों की ओर से ही नहीं बल्कि अठारवीं और उन्नीसवीं सदी के मुस्लिम लेखकों की ओर से भी किया जाता रहा था। शाहवली उल्लाह (17.3-62), शाह अब्दुल अजीज (1764-1824), सैय्यद अहमद शाहिद (1786-1831) मौलाना इनायत अली (1794-1858) और अल्ताफ हुसैन हाली (1831-1914) ने मुस्लिम धर्म संस्कृति के लुटे हुए गौरव और राजनीतिक सत्ता के छिन्न भिन्न हो जाने के विषय में शोकपूर्ण ढंग से वर्णन किया। शाह वली उल्लाह ने अपनी किताब वसीयतनामा में लिखाः

÷÷ हम यहां के लिए अजनबी हैं। हमारे पूर्वज यहां रहने के लिए बाहर से आये। हमारे लिए अरब होना और अरब भाषा का इस्तेमाल करना सबसे अधिक गौरव की बात है।'' 15

मुस्लिम पुनरुत्थान और विशुद्ध मुस्लिम संस्कृति के निर्माण के सबसे प्रसिद्ध प्रवक्ता अल्ताफ हुसैन हाली ने 1879 ई. में छपे संग्रह मुसद्दस ए हाली में इस्लाम के उत्थान और पतन को अपनी कविताओं के माध्यम से उभारा। इसमें इस्लाम के पतन की दशा का चित्रण इस प्रकार से किया गयाः

÷÷ न हमारी धमनियों में, न खून में, न हमारी ख्वाहिशों में और न खोज में, हमारे दिल जबान और लफ्जों में, हमारी आदतों, तबियत जेहन और रवायतों में अब वह ऊंचाई नहीं मिलती। गर वह है भी तो महज इत्तिफाक है।'' 16

लेकिन इस्लाम के पतन का जिक्र और सांस्कृतिक शुद्धता का पक्ष लेते हुए भी शाह वली उल्लाह से लेकर हाली तक , सभी ने किसी न किसी हद तक इस्लाम में तर्क और आधुनिक ज्ञानविज्ञान के प्रवेश को जरूरी माना। अल्ताफ हुसैन हाली तो सर सैय्यद अहमद खान (1811-98) के इस्लाम को आधुनिक शिक्षा और ज्ञान विज्ञान के नजदीक लाने के प्रयासों के पूरी तरह से कायल थे और

÷÷ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने इस्लाम के पुनर्जागरण के लिए सैय्यद अहमद खान के रास्ते पर चलने की सलाह दी।'' 17

पर इन सारे प्रयासों के बावजूद अन्ततः इस्लाम की राजनीतिक ताकत और मजहबी पहचान ही उनके लिए प्रमुख थी जो हिन्दू पुनरुत्थान की चेतना से टकराती थी। 1867 ईसवी में देवबन्द में मोहम्मद वासिम नानौवती और शेख अहमद गंगोही द्वारा स्थापित संस्था ने इस्लामिक मतों का और जोर शोर से प्रचार किया। ऐसे ही दौर में उलेमाओं के द्वारा हिन्दू सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त और कुरान का विशुद्ध रूप से पालन करने वाली मुस्लिम अस्मिता के निर्माण की चेष्टा हुई। साम्प्रदायिकता के उदय और साम्प्रदायिक प्रतीकों के निर्माण की चेष्टाओं में किसी भी धर्म मजहब के भद्र वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। 19 वीं सदी में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही धर्मों के भद्रवर्ग धार्मिक प्रतीकों के गठन की कोशिशें कर रहे थे। बंगाल और महाराष्ट्र में भी इस समय हिन्दी क्षेत्र की तरह कई सवालों का साम्प्रदायिकीकरण किया गया था। जैसे बंगाल में हिन्दू भूस्वामी और मुस्लिम काश्तकारों के बीच के आर्थिक विभाजन को साम्प्रदायिक संघर्ष की शक्ल देने के लिए इस्तेमाल किया गया। विपिन चन्द्रा के अनुसार 1773 ईसवी के स्थायी बन्दोबस्त के फलस्वरूप बंगाल में पुराने हिन्दू और मुसलमान जमींदारों के परिवार विस्थापित हुए और उनकी जगह नये हिन्दू व्यावसायिक वर्ग का उदय हुआ। गांवों की जमीन पर कब्जा जमाये बैठे इस व्यापारिक साहूकार वर्ग से जब गरीब मुसलमानों का टकराव हुआ तो इसमें ÷ इन्होंने सामूहिक संघर्षों में अपने सह धर्मावलम्बियों को शरीक करने के लिए साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल किया।'18 पर अन्य प्रान्तों की तुलना में इस समय पश्चिमोत्तर प्रान्त में हिन्दू मुस्लिम सम्बन्ध सामाजिक आर्थिक धरातल पर किस तरह से अलग थे, इसका वर्णन पॉल ब्रास ने किया है। उन्होंने संयुक्त प्रान्त में 19 वीं सदी में पनपने वाली मुस्लिम साम्प्रदायिकता के सामजिक कारणों का विस्तार से अध्ययन करते हुए इन मतों को गलत ठहराया है कि 1857 ईसवी के विद्रोह के बाद अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार, हिन्दुओं द्वारा अंग्रेजी शासन का अधिक कुशलतापूर्वक इस्तेमाल, मुस्लिमों का पारम्परिक पिछड़ापन या हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों की बदहाली जैसे कारण मुस्लिम साम्प्रदायिकता के उदय के जिम्मेदार बने। मुस्लिम पिछड़ेपन को इस समय की मुस्लिम साम्प्रदायिकता से जोड़ने के मिथ का खण्डन करने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरियों और प्रशासन में मुसलमानों की संख्या प्रस्तुत करने के लिए आंकड़े प्रस्तुत किये और लिखा :

÷÷ मुसलमानों के पिछड़ेपन का तर्क और धारणा संयुक्त प्रान्त पर लागू नहीं होती।'' 19

अपने मत के पक्ष में आंकड़े पेश करते हुए उन्होंने लिखा है :

÷÷ अवध और पश्मिोत्तर प्रान्त की सरकार के द्वारा मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में स्थित पर की गयी टिप्पणियों से जाहिर होता है कि सरकारी दफ्तरों में मुसलमानों की कम संख्या होने की बात गलत है, बल्कि सरकार के आधिकारिक सचिव के मुताबिक उन्हें अपनी जनसंख्या के अनुपात से अधिक नौकरियां मिली हुई थीं। रिपोर्ट से पता चलता है सरकार के कुल 54,130 देसी अधिकारियों में 35,302 हिन्दू और 18,828 मुसलमान यानी 65.22 फीसदी हिन्दू और 34.78 फीसदी मुसलमान थे। जबकि कुल जनसंख्या में हिन्दुओं और मुसलमानों का अनुपात 86.75 फीसदी और 13.25 फीसदी था।'' 20

इसी तरह सबसे ऊंची तनख्वाहों वाली और सम्मानजनक नौकरियां जैसे डिप्टी कलेक्टर और तहसीलदार की नौकरियों के मामले में भी मुसलमान हिन्दुओं से कहीं अधिक आगे थे। पॉल ब्रास के मुताबिक मुसलमानों खासकर उच्च तथा मध्यवर्गीय मुसलमानों की दशा उपरोक्त आंकड़ों के आलोक में ऐसी नहीं थी कि यह मान लिया जाए कि वे सामाजिक पिछड़ेपन की प्रतिक्रिया में हिन्दुओं से अलगाव का रास्ता अख्तियार कर रहे थे। बल्कि फारसी की ओर झुकी उर्दू की मांग , अलीगढ़ आन्दोलन और मुस्लिम लीग जैसे संगठनों की स्थापना ÷ मुसलमानों के अपेक्षाकृत सम्पन्न तबके द्वारा राजनीतिक वर्चस्व को बरकरार रखने'21 को कोशिशों का परिणाम थी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं का विकास हो रहा था साथ ही विविध वैचारिक प्रवृत्तियों का भी उदय हो रहा था। यह समय था जब हिन्दी क्षेत्र के साथ साथ भारत के बंगाल और महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों में भी राष्ट्रीय एकीकरण , प्रशासनिक विकास, व्यापारिक पूंजी के विस्तार ओर शैक्षिक विकास के फलस्वरूप एक राष्ट्रीय चेतना उभरने लगी थी। यह राष्ट्रीय चेतना भारत की व्यापक पहचान को अपने भीतर समाये रखने के साथ ही एक जातीयता के बोध को भी सुरक्षित रखने और उसे व्यक्त करने का प्रयास कर रही थी। चूंकि किसी राष्ट्रीय चेतना को विकसित होने के लिए राष्ट्रीय गौरव के विगत यथार्थ की स्मृतियों की आवश्यकता होती है, इसलिए उसमें अपने इतिहास के तलाश की कोशिशें भी साफ साफ मौजूद होती हैं। हिन्दी लेखन में भी ऐतिहासिक गौरव के स्मरण के बहाने ही इतिहास के निर्माण और राजनीतिक उद्देश्यों को साधने वाली उपयोगी व्याख्याओं पर ध्यान दिया जाना आरम्भ हुआ। इस प्रक्रिया में अनेक प्रवृत्तियां सामने आयीं। पहली प्रवृत्ति में बड़ी ही गहराई और आस्थापरक रूप से यह मान लिया गया कि मध्यकाल में मुसलमानी आतंक और वर्तमान में औपनिवेशिक दमन के नीचे पिस रहे भारत की तुलना में प्राचीन काल में देश अत्यन्त सुसमृद्ध और उच्च संस्कृति वाला था। दूसरी कि अपने ही ऐतिहासिक गौरव से हिन्दुओं के अनभिज्ञ रह जाने की वजह ये है कि उन्होंने अपना इतिहास खुद लिखने की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। अपने निबन्ध ÷ बादशाह दर्पण' में भारतेन्दु किसी समय पूरे भारत को ÷ सारी पृथ्वी का मुकुटमणि' मानते थे और आशा जता रहे थे कि ÷ कोई माई का लाल ऐसा होगा जो बहुत सा परिश्रम स्वीकार करके एक बेर अपने ÷ बाप दादों' का पूरा इतिहास लिख कर उनकी कीर्ति चिरस्थायी करेगा।' भारतेन्दु ने कश्मीरकुसुम, महाराष्ट्र देश का इतिहास, बूंदी का राजवंश, अगरवालों की उत्पत्ति, बादशाह दर्पण, उदयपुरोदय, पुरावृत्त संग्रह और चरितावली जैसी अनेक ऐतिहासिक रचनाएं लिखीं और हिन्दी में शिवप्रसाद सितारे हिन्द के बाद इतिहास के ज्ञान को बौद्धिक चेतना का अंग बनाने की दृष्टि में महत्वपूर्ण कार्य किया।

भारतेन्दु और उनके सहयोगी जिस समय हिन्दी लेखन के माध्यम से एक विशिष्ट इतिहास चेतना को हिन्दू राष्ट्रवाद के लिए इस्तेमाल कर रहे थे , उस समय प्राच्यविद्या का इतिहास दृष्टि के रूप में गहरा प्रभाव बुद्धिजीवियों की चेतना को मथ रहा था। बौद्धिक जिज्ञासा के साथ साथ प्राच्यविद्या को बढ़ावा देने वाले विद्वान ईसाइयत पर केन्द्रित पश्चिमी सभ्यता और वैदिक पौराणिक संस्कृति पर केन्द्रित हिन्दू संस्कृति की समानता पर जोर दे रहे थे। इस समानता पर जोर देते समय दो चीजें एक साथ सामने आयीं। पहली यह कि इस बात का श्रेय प्राच्यविदों ने स्वयं अपने को प्रदान किया कि उन्होंने ऐसी संस्कृति की विगत महानता को खोजा है जिससे यूरोपवासी तो क्या स्वयं उसी देश के लोग परिचित नहीं थे। दूसरी यह कि उन्होंने उस विगत सांस्कृतिक महानता से यूरोपियनों का परिचय कराते समय उसकी इस ढंग से व्याख्या की कि ईसाइयत के सिद्धान्तों के अभ्यस्त यूरोपियन लोग उसे आसानी से समझ सकें। यूरोप में ईसाइयत की धार्मिक अवधारणा में बहुदेववाद, अवतार पूजा और उपास्य की लौकिक लीलाओं का स्थान नहीं था और आरम्भ में यही मान्यताएं प्राच्यविदों के लिए कौतूहल का विषय बनीं। भारतेन्दुयुगीन लेखकों ने हिन्दुओं के प्राचीन गौरव और उनके मध्यकाल में मुसलमानों के द्वारा होने वाले दमन की स्मृतियों के जरिए एक सुसंगत हिन्दू धार्मिक समुदाय के निर्माण का प्रयत्न किया और इस काम में प्राचीनकाल के सम्बन्ध में प्राच्यविदों की इतिहास दृष्टि की सबसे अधिक मदद मिली। प्राच्यविदों ने एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं को कसौटी बना कर एक ओर हिन्दू धार्मिक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों की व्याख्या की, तो दूसरी ओर हिन्दी नवजागरण के लेखकों ने भी इतिहास के विवरण देकर हिन्दुओं के आन्तरिक भेदभाव को उनकी कमजोरी बताया और एकजुटता के राजनीतिक लक्ष्य को अपनाने पर बल दिया गया। प्राच्यविदों के द्वारा इतिहास के निर्माण एवं ऐतिहासिक अध्ययन के लिए प्रयुक्त कसौटियों के बारे में रोमिला थापर के मत को ही लें:

÷÷ प्राच्यविद्या ने धार्मिक विश्वासों तथा कर्मकाण्डों को हिन्दू धर्म नाम के एक सुसंगत धर्म तथा एक तर्कसंगत विश्वास से बांधने की जो कोशिश की वे सब सभी धर्मों के नजरिये से की गयी थी, क्योंकि प्राच्यविद्या उन्हीं से ज्यादा परिचित थी। उन्नीसवीं सदी तथा बीसवीं सदी के आरम्भ के सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलनों पर इन विचारों का किसी न किसी रूप में प्रभाव अवश्य पड़ा था। हिन्दू धर्म की आज की अनेक प्रस्तुतियां उसे, कुछ कुछ अस्पष्ट रूप से समझे गये, किसी सामी धर्म के समानान्तर मान कर चलने से ही निकली हैं। लेकिन यह तस्वीर घरेलू स्रोतों से निकलने वाली तस्वीर से बहुत भिन्न है।'' 22

अपने उन्नीसवीं सदी के अध्ययन में वसुधा डालमिया ने राजेन्द्रलाल मित्र और आर.जी. भण्डारकर जैसे विद्वानों द्वारा प्राच्यविदों की धारणाओं को थोड़े फेरबदल के साथ अपनाये जाने और उनसे हिन्दू आत्मबोध का पुनर्निमाण होने की परिस्थितियों का जिक्र किया है। ब्रिटिश अधिकारी जैसे ग्रियर्सन व ग्रीव्ज द्वारा ईसाईयत और हिन्दू धर्म की तुलना को उन्होंने ईसाईयत के खिलाफ हिन्दू प्रतिरोध की धार को कुन्द करने की राजनीति के रूप में भी देखा है। वसुधा का महत्वपूर्ण योगदान ये है कि उन्होंने भारतेन्दु और उनके समकालीन लेखकों द्वारा हिन्दू धर्म में वैष्णव मत को महत्व देने और हिन्दू उपास्यों की प्राचीन यूरोपीय देवी देवताओं से तुलना करने के प्रयासों के प्राच्यविदीय स्रोतों की गहराई से पड़ताल की है। इसके लिए 1808 ईसवी में फ्रैडरिख श्लेगल द्वारा विष्णु को सूर्य का पर्यायवाची बताते हुए वैदिक एकेश्वरवाद पर बल देने, 1868 ईसवी में अलब्रेख्त वेबर द्वारा कृष्ण के मिथक का ईसाइयत से सम्बन्ध स्थापित करने, 1852 ईसवी में एफएस ग्राव्जे द्वारा बल्लभ सम्प्रदाय की गतिविधियों की ईसाई धर्म से समानता तलाशने और मानियर विलियन्स के द्वारा बहुदेववाद के भीतर छिपी समस्त ईश्वरों की एकता का सिद्धान्त प्रतिपादित करने का वसुधा डालमिया ने हवाला दिया हैः

÷÷ व्यक्तिगत ईश्वर में विश्वास को धर्म की अनिवार्य विशेषता के रूप में देखा गया। उपनिषदों एवं अद्वैत वेदान्त में मौजूद अवैयक्तिक ईश्वर की धारणा को दर्शन के रूप में समझा गया। फिर वैष्णववाद को भारत के एकेश्वरवादी धर्म के रूप में पहचाना गया क्योंकि वह व्यक्तिगत ईश्वर की धारणा पर आधारित था और विष्णु या उनके अवतार कृष्ण के रूप में व्यक्तिगत उपास्य की भक्ति या पूजा पर केन्द्रित था''23

प्राच्यविदों की इतिहास दृष्टि ने भारतेन्दु को किस गहराई से प्रभावित किया , इसे भारतेन्दु के ÷ वैष्णवता और भारतवर्ष' और ÷ इशूखृष्ट वा ईशकृष्ण' जैसे लेखों में देखा जा सकता है। भारतेन्दु ने अपने नाटक ÷ भारत जननी' में भारत माता की सेवा कर रहे प्राच्यविदों के योगदान को स्वीकार करते हुए ही लिखा है,

÷÷ माता! तुमने क्या ग्लैडस्टन फासेट व मानियर विलियन्स इत्यादि महात्माओं का नाम नहीं सुना! ये लोग तो अभागे भारत सन्तानों के शोकनिवारण के हेतु तन मन सब अर्पण कर चुके हैं और रात दिन उसी का प्रयत्न किया करते हैं।'' 24

अनन्त अन्धविश्वासों , कर्मकान्डों और सामाजिक वर्जनाओं के पक्ष की अवहेलना करके हिन्दू धर्म को विगत गौरव याद दिलाने में प्राच्यविदों ने अपनी भूमिका निभायी और साथ ही ईसाई धार्मिक सिद्धान्तों से उसके कुछ पहलुओं की तुलना कर हिन्दुओं और अंग्रेजों की धार्मिक निष्ठाओं में समानता होने के एक व्यापक भ्रम का सृजन किया।

समाज के किसी वर्ग या समूह को जब उन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जिनमें राष्ट्र के गठन और उसकी पहचान के निर्धारण के प्रश्न केन्द्र में हों तो उन्हें ( वर्ग या समूह को) पीछे पलट कर अपने इतिहास को खंगालने और उसे पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता का भी अनुभव होता है। इतिहास की खोज का अर्थ यह नहीं होता कि कोई सच्चा, तटस्थ अथवा वस्तुनिष्ठ इतिहास खोज लिया जाएगा और उसे राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता और उससे सन्बन्धित चुनौतियां जिस प्रकार इतिहास के एक खास दौर में पैदा होती हैं उसी प्रकार इतिहास निर्माण के प्रयत्न भी किसी खास वर्ग, समूह या जाति की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसी विशेष कालखण्ड में आरम्भ किये जाते हैं। उन्नीसवीं सदी में देश के विभिन्न क्षेत्रों में इतिहास के शोध के प्रयत्न जारी थे और इतिहास के विभिन्न चरणों की व्याख्या हिन्दू राष्ट्रीयता के गठन व उसे ऐतिहासिक वैधता दिलाने के लिए की जा रही थी।

भारत में आधुनिक अथोर्ं में राष्ट्र की अवधारणा का विकास 19 वीं सदी के आरम्भ में होना आरम्भ हुआ जब अंग्रेजों ने उद्योग व्यापार और प्रशासन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने विराट तन्त्र का निर्माण किया। भारत में इससे पहले भी बाहर से आये लोगों ने यहां राजनीतिक, प्रभुत्व स्थापित किया था, पर उस समय भी देश का राजनीतिक एकीकरण का काम पूरा न हो पाने के कारण लोग देश के विभिन्न भूभागों, राजाओं, छोटे बड़े सामन्तों और जमींदारों के बीच बंटे रहे। पहले के आक्रमणों और भारत में अंग्रेजों के आगमन के बीच में फर्क के बारे में मार्क्स ने अपने भारत सम्बन्धी लेखों में लिखाः

÷÷ अरब, तुर्क, तातार, मुगल जिन्होंने एक के बाद एक हिन्दुस्तान पर चढ़ाई की, खुद बहुत जल्द हिन्दुस्तानी बन गये। इतिहास के एक शाश्वत नियम के अनुसार बर्बर विजेताओं को उनकी प्रजा की ऊंची सभ्यता ने जीत लिया। अंग्रेज पहले विजेता थे जिनकी सभ्यता हिन्दुस्तानियों से ऊंची थी और इसलिए जिन तक हिन्दुस्तानी सभ्यता की पहुंच न थी।'' 25

अंग्रेजों के अधीन जब राष्ट्र निर्माण की कोशिशें शुरू हुईं तब जिस चीज की सबसे अधिक आवश्यकता पड़ी वह थी राष्ट्र निर्माण के प्रतीकों की आवश्यकता। चूंकि राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना 19 वीं सदी में किसी धर्मनिरपेक्ष अथवा वर्गीय एकता के दायरे में न रह कर एक मुस्लिम विरोधी और हिन्दूवादी दृष्टि से प्रभावित होने के लिए बाध्य हो गयी थी इसीलिए हिन्दू स्वाभिमान व शौर्य के प्रतीकों का इस काल में सावधानी से चुनाव किया गया और उनके अपने राजनीतिक सामाजिक सन्दर्भों से मुक्त करके उन्हें समूचे देश की प्रतीकात्मक संघर्ष और विजय में बदल दिया गया। प्रतीकों के इस चयन में प्राचीन और मध्यकाल दोनों कालों के मिथकीय चमत्कार और ऐतिहासिक वीरता का परिचय देने वाले प्रतीकों को विभिन्न विधाओं में रचित साहित्य के माध्यम से याद किया गया। 1882 ई. में रचित कवित विजयिनी विजय वैजयन्ती में भारतेन्दु ने ऐतिहासिक गौरत्व को तब याद किया जब इस वर्ष भारतीय सेना ब्रिटिश सरकार की ओर से लड़ती हुई मिस्र की जीतने में कामयाब रही। 22 सितम्बर 1882 को शाम छह बजे बनारस के टाउन हाल में इस जीत का स्वागत करने के लिए एक सभा हुई थी जिसमें भारतेन्दु ने अपनी ÷ विजयिनी विजय वैजयन्ती' का पाठ किया था।

इसमें भारत के अतीत की तुलना में उसकी वर्तमान हीन दशा पर क्षोभ व्यक्त किया गया। एक ओर अर्जुन , भीम, कर्ण, नकुल सहदेव, पुरु, रघु और परशुराम आदि मिथकों का भाववेगपूर्ण स्मरण किया, दूसरी ओर मध्यकालीन नायकों पृथ्वीराज और हम्मीर जैसे चरित्रों का स्मरण किया। इसके अलावा हिन्दी नवजागरण के लेखन में प्रतीकों के निर्माण की प्रक्रिया केवल ऐतिहासिक मिथकीय चरित्रों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि इसका दायरा वृहद समाज में भावात्मक उत्तेजना भरने की दृष्टि से अन्य विषयों जैसे भाषा, धर्म, गाय और स्त्री तक भी फैल गया।

हिन्दी भाषा कैसे उर्दू का विरोध करती हुई और उसके प्रभाव से अपने को मुक्त करके हिन्दू अस्मिता के प्रतीक में ढाली गयी इसका सबसे सटीक उदाहरण 1892 में प्रतापनारायण मिश्र द्वारा ÷ ब्राह्मण पत्र' के विदाई अंक में दिया गया ÷ हिन्दू हिन्दी हिन्दुस्तान' का मंत्र था। इसके अलावा उन्होंने अपने लेख ÷ नागरी महिमा की एक चीज' में अगर नागरी को ÷ सब गुण का छोटा सागर' और संस्कृत को ÷ ईश्वर की महिमा' या ÷ ऋषियों की उदार बुद्धि का अंश' के रूप में याद किया तो उर्दू बीबी की पूंजी में उर्दू को ऐसी भाषा में रूप में याद जिसे ÷ जन्म भर पढ़ा कीजिए, तेली के बैल की तरह एक ही जगह घूमते रहोगे।'26 इसी प्रकार इस समय के गोरखपुर के एक अन्य लेखक सोहन प्रसाद मुदर्रिस ने ÷ हिन्दी और उर्दू की लड़ाई' नामक पद्य नाटक लिख कर हिन्दी उर्दू के बीच की कट्टर दुश्मनी को सामने रखा। इसमें उर्दू एक पात्र है और हिन्दी एक अन्य पात्र। उर्दू अपनी उपयोगिता यह कह कर साबित करने की कोशिश कर रही है कि उसकी वजह से लोगों को तहसीलदार जैसी नौकरियां मिल सकती हैं। वह कहती हैं:

÷ पढ़ब जो उर्दू प्रेम से होइब तहसिलदार।' 27

उधर हिन्दी का तर्क है कि उर्दू हत्यारिन और नीच जाति की है और आर्यों के हाथ में ताकत न रह जाने से वह सिर पर चढ़ गयी है। उर्दू के लिए नफरत को बयां करते हुए हिन्दी कहती है :

÷ आर्य राज है आज नहिं देतौ मुंह पर थूक।' 28

इस पद्य नाटक में उर्दू को इस सीमा तक मुस्लिम अस्मिता का अंग बताया गया कि उर्दू सीखने पढ़ने का मतलब ही मुस्लिम धार्मिक संस्कृति को अपनाना हो गया।

18 अप्रैल 1900 ई. तत्कालीन लेफ्टिनेण्ट गवर्नर सर एण्टनी मैकडॉनल के आदेश के तहत प्रान्तीय स्तर पर सरकारी दफ्तरों और अदालतों में फारसी के साथ नागरी लिपि में कामकाज को मंजूरी दे दी गयी। इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ और 23 मई 1900 ई. में भारतमित्र में छपे अपने लेख में बालमुकुन्द गुप्त ने इस मौके पर हिन्दुओं खासकर नागरीप्रचारिणी सभा के लोगों द्वारा झूठमूठ के आनन्द में उन्मत्त होने की जगह उन्हें संयम रखने की सलाह दी। लेकिन बालमुकुन्द ने केवल मुसलमानों के अखबारों को इस बात का दोषी ठहराया कि वे भाषा के मुद्दे को ÷ महजबी रंग में रंगकर इसे हिन्दू उर्दू की लड़ाई बता रहे हैं।'29 इसके अतिरिक्त यह सीख केवल मुसलमानों के लिए ही थी कि उन्हें:

÷ यह जानना चाहिए कि जिस भाषा को वे उर्दू कह रहे हैं, वह हिन्दी से अलग नहीं है। उर्दू के आदि कवियों ने उस भाषा को हिन्दवी कह कर पुकारा है।' 30

बालमुकुन्द ने मुस्लिम लेखकों पर तो उर्दू के साम्प्रदायिकीकरण का इल्जाम मढ़ दिया , पर खुद हिन्दी लेखकों को भी ठीक यही सलाह दी जा सकती थी हिन्दी भाषा और लिपि के सवाल को हिन्दू मुसलमान झगड़े के रूप में पेश करना अतार्किक प्रयास है।

इस दौरान गाय के संरक्षण और उससे हिन्दू पहचान के जुड़ाव पर भी कई तीखीं बहसें और विवाद उठ खड़े हुए। मसलन , शिवप्रसाद सितारेहिन्द ने अपनी काफी आधुनिक व वैज्ञानिक तरीके से लिखी किताब ÷ इतिहासतिमिरनाशक' में प्राचीन वैदिक समाज में गोमांस खाने और यज्ञ में पशुओं की बलि देने से सम्बन्धित इतिहास के विवादास्पद विषय को गम्भीरता से उठाया, लेकिन पतली तनी पर नटचाल की तरह उन्होंने कई तरह के सन्तुलन साधने की कोशिशें कीं। प्राचीन काल में गोमांस सेवन के बारे में वे लिखते हैं, ÷ ब्राम्हण यज्ञ में बलि देकर स्वच्छन्दता से गोमांस भक्षण करते थे।'

जब उन्हें लगता है कि यह कथन हिन्दू धार्मिक आस्थाओं के प्रतिकूल है और काफी चुभने वाला हो सकता है , तो आगे यह भी जोड़ देते हैं ÷ फिर वह उस गौ को जिला भी देते थे।' यानी वैदिक युग के ब्राह्मण पहले तो गाय को मार कर खा लेते थे और बाद में गाय से जुड़ी धार्मिक आस्थाओं के कारण उसे फिर से जिन्दा भी कर देते थे। ब्राह्मणों की मौज हो गयी और गाय भी बच गयी। अपने ही तर्कपूर्ण चिन्तन से घबरा कर पीछे हटने और फिर हवा में हाथ पैर मारने से शायद ऐसी ही हास्यास्पद बातों का जन्म होता है। यही नहीं, जब शिवप्रसाद को लगता है कि इससे भी काम नहीं चल रहा तो यह लिखने के लिए मजबूर हो जाते हैं :

÷÷ वह ऐसी अथवा इतनी गायें उसके वास्ते कभी न लेते होंगे जिससे खेतीबारी इत्यादि का हर्जाना हो और कौन जाने ऐसी ही लेते हों जो न दूध देने के काम की हों न बच्चा जनने के काम की।'' 31

इस तरह शिवप्रसाद इतिहासतिमिरनाशक में एक ओर बौद्वों की तुलना में ब्राह्मणों के पाखण्ड की हंसी उड़ाते हैं , दूसरी ओर गोमांस भक्षण जैसे मुद्दे पर खुल कर उनका बचाव करते नजर आते हैं।

आर्यों के मूल स्थान का सवाल शिवप्रसाद के समय भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन चुका था और शिवप्रसाद ने इस विषय पर भी बड़ा ही नपातुला दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने आर्य आक्रमण की अवधारणा का सामना बड़ी ही बुद्धिमानी से करने के लिए एक नया सिद्धान्त गढ़ दिया। वह यह कि भारत में सरस्वती नदी के तट पर स्थित पंजाब , सिन्धु के इलाके और ईरान देश, दोनों ही आर्यों के मूल स्थान रहे हैं। भारत के प्राचीन आर्यों के बारे में उन्होंने लिखाः

÷÷ ये हिन्दू आर्य लोग उस समय सुख चैन से सारस्वत देश में अर्थात सरस्वती के किनारे पंजाब और उसके आसपास निवास करते थे। ज्यों ज्यों सन्तान बढ़ते गये पूर्व की ओर फैलने लगे और भारी भारी जंगलों में आग लगा कर जैसा कि अब उत्तरी अमेरिका में करते हैं रास्ते निकाले। यहां तक कि जमुना और गंगा पार होकर कोशल और मिथिला अर्थात अवध और उसके समीपी इलाकों में चले आये पश्चिमोत्तर हम लोगों का मूल स्थान होने में किसी तरह का सन्देह नहीं पाया जाता है।'' 32

इसी प्रकार ईरान को भी आर्यों का उद्भव स्थल दिखाने के लिए लिखा :

÷÷ पारस देश वाले भी आर्य थे वरन इसी कारण उस देश को अब भी ईरान कहते हैं। यूनान वाले उसे अरिआन पुकारते थे।'' 33

जाहिर है कि पूर्वी एशिया के बारे में अठारवीं सदी में यूरोप में विकसित आर्य आक्रमण की धारणा से निपटने के लिए शिवप्रसाद ने खास तरीका ईजाद किया था। उन्होंने एक साथ आर्यों के दो मूल स्थान खोज निकाले। ईरान के अलावा सरस्वती तट पर बसा पंजाब क्षेत्र भी आर्यों की जन्मस्थली बन गया। बिना लाठी तोड़े सांप मार देने का यह अद्भुत उदाहरण था। एक समय बाल गंगाधर तिलक ने भी आर्यों की जन्मस्थली उत्तरी धु्रव मानी थी। बाद में जब आर्यों के मूल स्थान को लेकर तीखी बहसें हुईं तो एक संघ विचारक विष्णुकान्त शास्त्री ने यह कह कर अपनी ही हंसी उड़वायी थी कि उत्तरी धु्रव पहले भारत का ही अंग था और वह बाद में खिसक कर दूर चला गया , जबकि आर्य यहीं रह गये।

इसी प्रकार गोकुशी के मुद्दे को भी हिन्दुओं की आस्था और परम्परागत धर्म पर प्रहार के रूप में उछाला गया। 1877 ई. में जब दिल्ली दरबार हुआ तब भारतेन्दु ने गोरक्षा के मुद्दे की अहमियत देते हुए इसके पक्ष में 60 हजार लोगों के दस्तखत वाला एक मेमोरियल सरकार को दिया। साहित्यिक स्तर पर भारतेन्दु की किताब गोमहिमा (1881), अम्बिकादत्त का नाटक ÷ गोसंकट' (1882) और प्रताप नारायण मिश्र का लेख आलमे तस्वीर इत्यादि कृतियां यह दिखाती हैं कि राष्ट्रनिर्माण की कल्पना पूरी तरह से आधुनिक, समावेशी ओर धर्मनिरपेक्ष नहीं हुई थी और राजनीतिक वर्चस्व के लिए कई बार धार्मिक आस्थाओं को पूरे राष्ट्र के जटिल प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करने की भी चेष्टा की जाती थी। गोरक्षा के प्रश्न को उभार कर हिन्दुओं के निर्दयी स्वभाव के मुसलमानों के आगे निरीहता को प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती थी। अम्बिका दत्त व्यास के नाटक ÷ गो संकट' में लाला गोबरधन दास नामक पात्र सारे मुसलमानों को गोकुशी का अपराधी ठहराते हुए कहता है :

÷ हम लोगों की तो यह भलमनसी कि निज मन्दिरों के पास इनको मस्जिद बना लेने दें, रात दिन बड़े मियां बड़े मियां कह कर बातें करते हैं, और इनके यह कर्म कि हम लोगों की माता सदृश गौ को...। 34

÷ गो महिमा' में भारतेन्दु ने गाय की पौराणिक शास्त्रीय महिमा का बखान करने के लिए इसमें प्राचीन पुराणों और अन्य हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में गाय के बारे में वर्णित श्लोकों के हिन्दी अनुवाद का संग्रह किया। बाइस पृष्ठों की इस किताब के अन्त में किताब छपाने के मकसद को स्पष्ट करते हुए लिखा :

÷÷ उसी आर्यतेजोमय रक्त को सतेज करने ही को यह संग्रह प्रकाशित होता है।'' 35

उधर प्रताप नारायण मिश्र ने गौ माता की महिमा की तारीफ करते हुए उसे ÷ पूज्य ब्राह्मण के नाम से भी पहले स्मरण की जाने वाली'36 कहा और लिखा कि ÷ पवित्रता यह कि उनका मल मूत्र तलक खाया जाता है।'37 गाय से जुड़े हिन्दू धार्मिक विश्वासों की चर्चा करने के साथ ही प्रतापनारायण ने उनके व्यावहारिक उपयोग पर भी बल दिया। उन्होंने अफसोस जाहिर किया कि लोग आतिशबाजी और अदालतों में सैकड़ों रुपया फूंक देते हैं पर ÷ गऊ माता के नाम पर कुछ भी नहीं निकलेगा।'38

प्राचीन हिन्दू कथा नायकों का स्मरण कविताओं में ही हुआ है जबकि मध्यकालीन हिन्दू राजाओं के कृत्यों को प्रेरणास्रोत की तरह प्रस्तुत करने के लिए उन पर बड़े बड़े नाटक , जीवनियां और लेख लिखे गये। इन महान पराक्रमी और आर्य धर्म के रक्षक हिन्दू राजाओं के चरित्र चित्रण का यह लाभ भी था कि इन्हीं के माध्यम से गाय, ब्राह्मण, स्त्री रक्षा और धर्म जैसे विषयों को ऐतिहासिकता का आवरण प्रदान कर दिया जाता था। यहां तक कि सभी ऐतिहासिक राजाओं की गाय ब्राह्मण रक्षक और स्त्री रक्षा के आधार पर ही प्रशंसा की जाती थी। भारतेन्दु के ÷ नीलदेवी' नाटक में राजा सूर्यदेव और उसकी रानी नीलदेवी के मुस्लिम शासकों से संघर्ष को कथानक का आधार बनाया गया। राधाकृष्ण दास ने महाराणा प्रताप सिंह और पद्मावती नाटकों में मध्यकाल की ऐतिहासिक वस्तुस्थिति की अभिव्यक्ति के बहाने मुसलमानों की कट्टर और खलनायक छवि को उभारा। भारतेन्दु जैसे अपने व्यक्तित्व और सामाजिक गतिविधियों के मामले में अन्य लेखकों के लिए मार्गदर्शक थे उसी प्रकार राधाकृष्णदास ने 1883 के अपने नाटक ÷ महारानी पद्मावती' में इस प्रेरणा को इस तरह से स्वीकार कियाः

÷÷ पूज्यपाद भाई साहब बाबू हरिशचन्द्र जी भारतेन्दु ने जब नीलदेवी लिखा, मुझसे आज्ञा किया कि भारतवर्ष में अब ऐसे ही नाटकों की विशेष आवश्यकता है जो आर्य सन्तानों को अपने पूर्व पुरुषों का गौरव स्मरण करावे अतएव तुम कोई नाटक इस चाल का लिखो।'' 39

पूर्व पुरुषों के गौरव का स्मरण कराने का अर्थ था पूर्व पुरुषों का केवल ऐसे संघर्ष में लिप्त दिखना जिसका मकसद मुस्लिमों के हाथों अपनी खोयी हुई सत्ता को पुनः वापस पाना हो। मध्यकाल के हिन्दू राजाओं के चरित्र के वर्णन के माध्यम से यह भी साबित किया जाता था कि जिन परिस्थितियों के बीच उन्होंने हिन्दू धर्म और आस्था की रक्षा के लिए मुसलमानों से डट कर लोहा लिया वर्तमान में हूबहू नहीं तो कम से अनेक प्रवृत्तियों के असर के रूप में उनकी निरन्तरता बनी हुई है।

इस समय पृथ्वीराज , महाराणा प्रताप, शिवाजी, रत्नसेन, पद्मावती, हम्मीर समेत कई ऐतिहासिक एवं कल्पित हिन्दू राजाओं को हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के आदर्श प्रतीकों के रूप में खड़ा किया गया। यह मिथ्याभास भी खड़ा किया जाता था कि हिन्दू शौर्य अस्मिता के मध्यकालीन प्रतीक मुसलमानों से हिन्दू धर्म व हिन्दू राज की रक्षा के संघर्ष में अकेले नहीं थे, बल्कि समस्त हिन्दू प्रजा उनके लिए एकजुट हो गयी थी। जबकि सच ये था कि परम्परागत वर्णव्यवस्था ने पहले से ही इतना आन्तरिक विखण्डन और विभाजन कर रखा था कि किसी आक्रमणकारी के खिलाफ हिन्दू साम्राज्य की रक्षा करने के लिए उनकी एकजुटता की बात करना हवाई कल्पना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।

भारतेन्दु , प्रतापनारायण, राधाकृष्णदास और राधाचरण गोस्वामी आदि ने मध्यकालीन हठी लोभी और दुष्ट मुसलमानों की तुलना में हिन्दू नायकों की वीरता व उदारतापूर्ण चरित्र के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश की कि हिन्दुओं के लिए राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित होना कोई नयी बात नहीं, बल्कि अत्यन्त प्राचीन और मध्यकाल में भी इनके भीतर राष्ट्रीय भावनाएं उपस्थित थीं।

विपिन चन्द्रा ने इस प्रक्रिया को बौद्धिकों और लेखकों की ऐसी विवशता के रूप में देखा है जिसमें वे ब्रिटिश राज्य के प्रति अधिक आलोचनात्मक हुए बगैर अपनी देशभक्तिपूर्ण भावनाओं को अभिव्यक्त करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने 1857 ई. के गदर के बहादुरशाह, नाना साहेब, रानी झांसी, तात्या टोपे और कुंवर सिंह जैसे चरित्रों के स्थान पर मध्यकालीन हिन्दू राजाओं को राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वाधीनता के नायक के रूप में प्रस्तुत किया। विपिन चन्द्रा लिखते हैं :

÷÷ नायकों के निर्माण के मामले में ब्रिटिश अधिकारियों के रवैये ने खासी महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। सच्चे राष्ट्रवाद या साम्राज्यवाद विरोध की किसी अभिव्यक्ति पर त्यौरियां चढ़ाते उन्हें ऐसे व्यक्तियों के महिमामण्डन से खास चिढ़ थी जिन्होंने उनके शासन का विरोध किया होता। जबकि फूट डालो और राज करो की नीति के अनुरूप वे छद्म राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन देते।'' 40

ब्रिटिश अधिकारियों की नाराजगी और 1857 के गदर के प्रति अपने वर्गीय रवैये के कारण हिन्दी नवजागरण के रचनाकारों ने भी गदर के नायकों की छवि और कारनामों को राष्ट्रनिर्माण का प्रतीक बनने के अनुपयुक्त माना और इसके लिए मध्यकाल के हिन्दू राजाओं व रानियों से जुड़ी ऐतिहासिक कथाओं में अनेक काल्पनिक सामग्री ठूंस कर उसके जरिए हिन्दू जनभावनाओं को उकसाने का प्रयास किया। इन प्रतीकों के महिमा मण्डन के पीछे वास्तविक उद्देश्य मुसलमानों के किसी भी विनाशकारी सम्पर्क से अछूती एक पृथक हिन्दू ब्राह्मणवादी संस्कृति के मिथक का निर्माण करना भी था। लेकिन क्या धार्मिक विभाजन के आधार पर संस्कृतियों के विभाजन की चेष्टाएं यथार्थ का खुला उल्लंघन और अवहेलना नहीं करती थीं। प्रेमचन्द ने 15 जनवरी 1934 के ÷ माधुरी' के अंक में ÷ साम्प्रदायिकता और संस्कृति' नामक लेख लिखा था जिसमें विस्तार से और सोदाहरण इस बात का उल्लेख किया था कि भाषा, पहनावे, खानपान, संगीत, चित्रकला जैसी चीजों के आधार हिन्दुओं और मुसलमानों के मध्य इतनी अधिक समानता है कि उन्हें दो पृथक सांस्कृतिक समुदायों के रूप में देखना यथार्थ विरोधी बातहै।

मध्यकाल से राष्ट्रनिर्माण के प्रतीकों का चयन अपने भीतर एक सकारात्मक पहलू भी छिपाये हुए था। इसके माध्यम से साम्राज्यवाद के इस अहंकार को तो तोड़ा ही जा सकता था कि भारत के लोग स्वशासन के सर्वथा अयोग्य हैं और उनकी सर्वमुखी प्रगति केवल तब ही सम्भव है जब वे ब्रिटिश राज की अधीनता को स्वीकार कर लें। आगे चल कर साम्राज्यवाद का राजनीतिक और विचारधारात्मक स्तर पर सामना करने के लिए अनेक राष्ट्रवादियों ने जैसे आरसी दत्त , केपी जायसवाल और पीएन बनर्जी ने इतिहास के गौरवशाली प्रतीकों का प्रयोग किया। प्राचीन मिथकों और प्रतीकों का प्रयोग उस अवस्था में अधिक कुशलता से हो सकता है जब राष्ट्रवाद के मकसद से साम्राज्यवाद के विरोध का संघर्ष काफी तेज हो गया हो। पर उन्नीसवीं सदी में हिन्दी बौद्धिकों में राष्ट्रीय चेतना में साम्राज्यवाद के विरोध के स्थान पर मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं अधिक महत्वपूर्ण हुईं और राष्ट्रीयता के हिन्दू प्रतीकों के बल पर आधुनिक काल में ही नहीं बल्कि मध्यकाल में भी हिन्दू और मुसलमान दो पृथक राष्ट्रों की कल्पना को अधिक आवेग और गम्भीरता से उभारा गया।

भारत में अन्य देशों की भांति ही राष्ट्र निर्माण की अपनी ही एक प्रक्रिया और विशिष्टता थी , जो औपनिवेशिक शासन के अधीन जारी थी। व्यापार विनिमय और पूंजीवादी क्रान्ति की देशव्यापी प्रक्रिया के फलस्वरूप सबसे पहले इंग्लैड में राष्ट्रवाद का विकास हुआ और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का भी उदय हुआ।41 राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास के साथ कैथोलिक चर्च और उसके द्वारा समर्थित सामन्ती ढांचे की शक्ति का विघटन भी आरम्भ हुआ। लेकिन भारत में राष्ट्रीय चेतना के विकास की प्रक्रिया भिन्न थी क्योंकि यहां खुद ब्रिटेन के औपनिवेशिक हितों के लिए व्यापार, तकनीक और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास के मार्ग को अपनाया गया। इसलिए यहां राष्ट्रीय चेतना के विकास के लिए दो प्रक्रियाएं समानान्तर रूप से चलीं। एक ओर यूरोप के आधुनिक सुधारवादी विचारों का लाभ उठा कर अपनी धर्म संस्कृति के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाया गया तो दूसरी ओर नये संगठित हो रहे मध्यवर्ग ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और आधुनिक शिक्षा का लाभ उठाते हुए उपनिवेशवाद द्वारा पैदा वैचारिक चुनौतियों का सामना करने का प्रयास किया। इसी प्रक्रिया में ÷ राष्ट्र' और ÷ इतिहास' के सम्बन्धों को नये ढंग से उठाया गया और इतिहास राष्ट्रीय अस्मिता को पुनर्परिभाषित करने का माध्यम बन गया। हिन्दी लेखन में भी ÷ राष्ट्र' और ÷ इतिहास' के सम्बन्धों की व्याख्याएं प्राचीन गौरवपूर्ण प्रतीकों के माध्यम से सामने आयीं। इन प्रतीकों का चयन हिन्दू विशिष्टता पर जोर देने के लिए किया गया। लुप्त मिथकीय स्वर्ण युग की स्मृति और हिन्दू संघर्ष दोनों को उभारने के लिए मुख्यतः तीन कारणों से प्रतीकों का सहारा लिया। पहला इस कारण से कि भारतेन्दु और उनके सहयोगी लेखक स्वयं भी अपने लेखन के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का विस्तार कर रहे थे और अपनी उच्च जातीय हिन्दू विश्व दृष्टि के कारण प्राचीन और मध्यकालीन हिन्दू राजाओं का राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में प्रयोग कर रहे थे। दूसरा कारण यह कि 1857 ई. के गदर के बाद हिन्दू मुस्लिम अलगाव की परिस्थितियां नये ढंग से तैयार हुईं। 1857 के विद्रोह को बलवे का नाम देते हुए प्रताप नारायण मिश्र ने ÷ हम राजभक्त हैं' निबन्ध में लिखाः

÷÷ वह अपराध प्रजा का था, किसी प्रतिष्ठित हिन्दू मुसलमान का दोष न था, केवल थोड़े से अदूरदर्शी लोगों के कारण हमारे भारतीय नेशन मात्र को कलंक लगाना बुद्धिमत्ता से दूर है।'' 42

यहां ÷ प्रतिष्ठित हिन्दू मुसलमान' शब्द का प्रयोग ध्यान देने योग्य है क्योंकि यह एक ओर विद्रोह के प्रति शिक्षित एवं उच्च जाति के हिन्दू मुसलमानों के दृष्टिकोण को प्रकट करता है वहीं यह भी पता चलता है कि विद्रोह से साम्प्रदायिक एकता की प्रेरणा लेने के स्थान पर प्रतिष्ठित हिन्दू मुसलमानों द्वारा अपने हितों को अलग अलग कर देखने और कुछ सीमा तक एक दूसरे के विरोध में देखने की प्रवृत्ति गहराती जा रही थी। इस निरन्तर गहराती प्रवृत्ति के कारण हिन्दी लेखन के माध्यम से देश पर हिन्दुओं का प्राचीन अधिकार और स्वाभाविक दावा प्रस्तुत करने के लिए ऐतिहासिक पौराणिक रचनाएं लिखी जाने लगीं। एक नये किस्म का इतिहास बोध हिन्दू सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से स्थापित किया जा रहा था जो यह तर्क देता था कि बेगुनाह हिन्दुओं के कत्लेआम से पूरा मध्यकालीन इतिहास रक्तरंजित है जबकि प्राचीन सभ्यताओं ÷ मिस्र, यूनान, रोम आदि देश की प्राचीनता भारत के समकक्ष है, सभी ने सभ्यता और उन्नति का अंकुर यहीं से ले ले अपनी अपनी भूमि में लगाया।'43

हिन्दू प्रतीकों के प्रयोग का तीसरा प्रमुख कारण प्राच्यविदों के प्रभाव से पैदा हुआ जिन्होंने अपने शोधकार्यों के माध्यम से प्राचीन आध्यात्मिक गौरव की सुसंगत अवधारणा निर्मित की। इसके असर से हिन्दी लेखन में भी हिन्दू प्रतीकों को धार्मिक आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध दिखाया गया। भारतेन्दु का नीलदेवी , प्रतापनारायण मिश्र का हठी हमीर, राधाचरण गोस्वामी के नाटक अमर सिंह राठौर और राधाकृष्णदास के महाराणा प्रताप सिंह एवं पद्मावती जैसे नाटकों के मुख्य पात्र मुख्य रूप से हिन्दू धार्मिक आध्यात्मिक लक्ष्यों के लिए संघर्षरत दिखाये। यह साबित करने का प्रयास किया गया कि हिन्दू चरित्रों का जीवन और उनके निर्णय धर्म और उससे सम्बन्धित विभिन्न चिन्ताओं से प्रभावित होता है। हिन्दू चरित्रों की व्याख्या धार्मिक प्रभाव के आधार पर करने की इसी पद्धति के बारे में असगर अली इंजीनियर ने लिखाः

÷÷ साम्प्रदायिक इतिहासकार यह पूर्व मान्यता लेकर चलते हैं कि मानव व्यवहार मुख्यतः धार्मिक विश्वासों से प्रेरित होता है। यह एक पूर्णतया गलत धारणा है। वास्तव में एक सामान्य व्यक्ति का व्यवहार विभिन्न जटिल कारणों से प्रभावित होता है। मानव व्यवहार के निर्धारण में निजी हितों और सांस्कृतिक प्रभाव का भी कम महत्वपूर्ण योगदान नहीं होता शासकों के मामले में तो और अधिक जिन्हें अनेक परस्पर विरोधी हितों का आपस में सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है।'' 44

सच यह है कि हिन्दू राजपूत राजाओं और शिवाजी जैसे मराठा शासकों को प्रतीक बना कर हिन्दू राष्ट्र के जिस मुस्लिम राष्ट्र के साथ टकराव की कल्पना की गयी थी वह ऐतिहासिक सच एवं निष्कर्षों से एकदम उलट था। सत्ता व राजनीतिक स्वार्थ के लिए हिन्दू शासकों ने हिन्दुओं और मुस्लिम शासकों ने मुसलमानों पर जुल्म ढाने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। बाबर ने इब्राहीम लोदी के साथ युद्ध करके दिल्ली पर कब्जा किया। बाबर के मरने के बाद जब हुमांयू गद्दी पर बैठा तो उसको पहली चुनौती किसी हिन्दू शासक से नहीं बल्कि शेरशाह सूरी से मिली। इसी प्रकार हल्दीघाटी की लड़ाई में अकबर की सेना का नेतृत्व राजा मानसिंह और महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व एक पठान मुस्लिम हकीम खां सूर के हाथ में था। इस प्रकार शिवाजी को भी एक हिन्दू राष्ट्र के निर्माण का प्रतीक बनाया जाता है। इतिहास के तथ्य कुछ और ही बयां करते हैं। औरंगजेब ने शिवाजी को पकड़ने और उनके विरुद्ध षडयन्त्र करने का कार्यभार और किसी को नहीं बल्कि आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह को सौंपा जिन्होंने जेम्स टॉड के इतिहास के अनुसार ही ÷ सभी प्रकार से मुगल साम्राज्य की सहायता की। बादशाह के प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए अनेक अवसरों पर उसने अद्भुत कार्य किये।'45

खुद शिवाजी का निजी अंगरक्षक कोई हिन्दू नहीं बल्कि एक मुसलमान सिद्दी अब्राहम था। इसके विपरीत जब औरंगजेब ने शिवाजी को पकड़ा , तब एक हिन्दू राज्य सामन्त जसवंत सिंह ने शिवाजी की हत्या कर देने के लिए औरंगजेब को उकसाया था। सारांश यह कि सामन्ती सत्ता और मध्यकालीन राजनीतिक ढांचे वाले समाजों के राजनीतिक संघर्ष इतने जटिल हैं कि उन्हें केवल हिन्दू मुस्लिम द्वन्द्व के रूप में पेश करना एक जटिल समस्या का आसान हल तलाशने जैसी बात है। ऐतिहासिक चरित्रों के ऐतिहासिक सन्दर्भों को ठीक से समझा जाए तो यह साफ नजर आता है कि ये हिन्दू प्रतीक स्वयम्भूं और शाश्वत रूप में नहीं बल्कि समकालीन राजनीतिक आवश्यकताओं की निर्मिति अधिक थे। पर प्रश्न यह है कि जब मुस्लिम प्रभावों एवं प्रलोभन से मुक्त विशुद्ध हिन्दू सांस्कृतिक प्रतीक निर्मित किये जा रहे थे तब क्या हिन्दुओं मुसलमानों के साझे प्रतीक बनने की भी सम्भावना थी? खासकर ऐसे दौर में जब भारतेन्दु हिन्दू मुसलमानों की एकता की व्यावहारिक जरूरत को समझ कर कहते थेः

÷÷ यह समय इन झगड़ों का नहीं। हिन्दू जैन मुसलमान सब आपस में मिलिए।'' 46

या प्रतापनारायण मिश्र लिखते हैं :

÷÷ हिन्दू मुसलमान भारत माता के दो हाथ हैं।'' 47

बाबू बालमुकुन्द ने भी बंगविच्छेद पर ÷ स्वदेशी आन्दोलन' शीर्षक कविता में लिखाः

÷÷ आंगन में दीवार बनायी, अलग किये भाई से भाई

भाई से किये भाई दूर , बिना विचारे बिना कसूर।'' 48

हिन्दी लेखन में हिन्दू मुस्लिम एकता की जरूरत के बारे में एक सामाजिक राजनीतिक चेतना की झलक तो मिलती है लेकिन प्राचीन और मध्यकाल दोनों के बारे में इतिहास का हिन्दूवादी विमर्श इतना स्वीकृत हो गया था कि यह चेतना हिन्दुओं व मुसलमानों के साझे व सुव्यवस्थित प्रतीक निर्मित करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकी। भारतेन्दु ने 1884 ई. में ÷ पंच पवित्रात्मा' शीर्षक से लिखित पुस्तक में महात्मा मुहम्मद, आदरणीय अली, उनकी बीवी फातिमा, इमाम हसन और इमाम हुसैन की जीवनियां लिख अपने ज्ञान और उदारता का परिचय तो दिया पर हिन्दुओं मुसलमानों के साझे इतिहास और ऐतिहासिक रिश्ते पर कुछ विशेष नहीं लिखा।

इस सम्बन्ध में 19 वीं सदी के रचनाकारों की मध्यकालीन मुगल शासक अकबर के बारे में सोच समझ का अध्ययन भी काफी रोचक हो सकता है। अकबर को सभी धर्मों के बीच एकता स्थापित करने और हिन्दुओं के प्रति उदार व सहिष्णुतावादी नीतियों को अपनाने वाले मुगल शासक के रूप में याद किया जाता है। 19 वीं सदी में कई स्तरों पर मध्यकाल के बारे में नकारात्मक स्मृतियां गढ़ने का काम चल रहा था और अकबर का चरित्र इस काम में खासी उलझन पैदा करता था। इस वजह से इस दौर के साहित्य में कई बार आवेश में आकर लेखकों ने अकबर की धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु और उदार शासक की छवि तोड़ने की भरपूर कोशिश की। खुद भारतेन्दु का लेखन इस बारे मे भयंकर अंतविरोधों से भरा हुआ है। अपनी बालबोधिनी पत्रिका में 1876 ई. में प्रकाशित कविता श्री राजकुमार शुभागमन वर्णन में भारतेन्दु ने विक्रम, कालिदास, भोज, व्यास और युधिष्ठिर की श्रेणी में ही अकबर को याद किया था और लिखाः ÷ जदपि विक्रम अकबरहू कालिदास हूं नाहिं, जदपि न सो विद्यादि गुन भारतवासी माहिं।'

पर आगे चल कर 1884 में लिखी रचना ÷ बादशाह दर्पण' में उन्होंने अकबर को मुहम्मद, महमूद, अलाउद्दीन और औरंगजेब की कतार में रख कर उसे ÷ हिन्दू मुसलमान में खाना पीना, ब्याह शादी चलाने की कोशिश करने वाला ÷ बुद्धिमान' शत्रु कहा। वे लिखते हैं :

÷÷ प्यारे भोले भाले हिन्दू भाइयो! अकबर का नाम सुन कर आप चौंकिए मत। यह ऐसा बुद्धिमान शत्रु था उसकी बुद्धिबल से आज तक आप लोग उसको मित्र समझते थे। किन्तु ऐसा नहीं है। उसकी नीति अंग्रेजों की भाति गूढ़ थी। मूर्ख औरंगजेब उसको समझा नहीं, नहीं तो आज दिन हिन्दुस्तान मुसलमान होता। हिन्दू मुसलमानों में खाना पीना, शादी कभी चल गयी होती। अंग्रेजों को भी जो बात नहीं सूझी, वह इसको सूझी।'' 49

यानी अकबर की उदारता और सहिष्णुता को भी विवादास्पद बनाने के लिए भारतेन्दु ने भरपूर कोशिश की और औरंगजेब व अंग्रेजी शासन की तुलना में उसे हिन्दुओं का ज्यादा खतरनाक शत्रु साबित कर दिया। भारतेन्दु ने ऐतिहासिक कथाओं और घटनाओं के आधार पर नाटक , कविताएं और कुछ निबन्ध लिखने के साथ ही पुरातात्विक महत्व की चीजों और सामग्रियों का संकलन भी किया। अपने पुरावृत संग्रह में उन्होंने अकबर और औरंगजेब को लिखे पत्रों का भी संकलन किया है। ÷ बादशाह दर्पण' में भारतेन्दु ने अकबर की उदारता के पीछे काम कर रही हिन्दू विरोधी राजनीति का खुले तौर पर उल्लेख किया था, पर इससे लगभग दस साल पहले भारतेन्दु प्रमाणों के साथ यह बताने की चेष्टा कर रहे थे कि अकबर और औरंगजेब के चरित्र में जमीन आसमान का अन्तर है। उन्होंने जिस राजा रामदास कछवाहे की बनायी टीका के कुछ अंशों का 1874 ई. में उद्धरण दिया था उसके मुताबिक अकबर ऐसा व्यक्ति थाः÷ जिसने वेद गऊ द्विज और धर्म की रक्षा को सगुण शरीर धारण किया है।' ष्50

भारतेन्दु ने भी अपनी ओर से अकबर की तारीफ इस तरह से की हैः

÷÷ उसने गोवध बन्द कर दिया यह कवि परम्परा द्वारा जो श्रुत था अब प्रमाण भी मिल गया। हिन्दू शास्त्रों को वह सुना करता था.. विशेष बात यह जानी गयी कि वह गंगाजल छोड़ कर और पानी नहीं पीता
था।.. इसी से उसको परमेश्वर का अवतार कहने में हिन्दुओं ने संकोच नहीं किया।'' 51

लेकिन अगले दस वर्षों में , बादशाहदर्पण लिखने के समय तक, भारतेन्दु का अपने ही इस सपाट निष्कर्ष पर विश्वास और गहरा होता चला गया कि मध्यकाल सभी मुसलमानों के लिए स्वर्णकाल और सभी हिन्दुओं के लिए संकटकाल था और अकबर हिन्दुओं का नुकसान करने वाला धूर्त शासक था।

भारतेन्दु के फुफेरे भाई राधाकृष्णदास ने तो अपने नाटक महाराणा प्रतापसिंह नाटक में अकबर को भारत को ÷ हिन्दुओं का मुल्क' मानने वाले और ÷ गुलबदनों की चाह में पागल' रहने वाले कायर और दगाबाज मुस्लिम शासक के रूप में पेश कर अकबर के बारे में भारतेन्दु के दृष्टिकोण को ही आगे बढ़ाया। नाटक की विशेषता कहें या रचनाकार की दृष्टि की विडम्बना कि इसमें अकबर जैसे चरित्रों को भी हिन्दू स्त्रियों पर बुरी निगाह रखने वाले सत्ता लोलुप व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया। एक स्थान पर अकबर को इस प्रकार स्वगत चिन्तन करते दिखाया जाता हैः

÷÷ इन गुलबदन की चाह ने तो मुझे पागल ही बना दिया। कितनी देर से कितने कामों का हर्ज करके बावला सा यहां घूम रहा हूं मगर अब तक सिवाय हसरत के कुछ हाथ न आया।'' 52

नाटक में अकबर को एक कामुक चरित्र का व्यक्ति और अपने पृथ्वीराज नामक दरबारी सरदार की रानी के साथ जोर जबरदस्ती करते भी दिखाया गया। हिन्दुओं के मन में मध्यकाल के प्रति विरक्ति और कटु स्मृतियां पैदा करने के प्रयास इस सीमा तक आगे बढ़ गये थे कि मुस्लिम सहिष्णुता व उदारता का एक भी प्रतीक अब राधाकृष्णदास जैसे हिन्दी नवजागरण के लेखकों को स्वीकार नहीं हो सकता था।

इसी प्रकार प्रेमघन ने प्रयाग से निकलने वाले पत्र ÷ इण्डियन प्यूपल' के द्वारा अकबर का वार्षिकोत्सव मनाने के प्रस्ताव का जिस जोरशोर से विरोध किया उससे पता चलता है कि ऐतिहासिक प्रतीकों के चयन में उन प्रतीकों की ऐतिहासिक भूमिकाओं की जगह उनकी धार्मिक निष्ठाएं कितनी महत्वपूर्ण बन जाती थीं।

इण्डियन प्यूपल ने मुगल सम्राट अकबर का वार्षिकोत्सव ठीक उसी तर्ज पर मनाने की वकालत की थी जैसे शिवाजी का महाराष्ट्र में मनाया जाता था। लेकिन भारतमित्र और बम्बई से प्रकाशित ÷ वेंकटेश्वर समाचार पत्र' जैसे पत्रों ने अकबर का वार्षिकोत्सव मनाये जाने के किसी भी प्रस्ताव को हिन्दू द्वेष और घृणा में जोड़ दिया। प्रेमघन, जो स्वयं इस प्रस्ताव के निन्दकों में अग्रणी थे, यह सुझाव दिया कि अकबर के स्थान पर महाराणा प्रताप का वार्षिकोत्सव मनाया जाना चाहिए। उन्होंने लिखाः

÷÷ हम अपने इन दोनों सहयोगियों से ( भारत मित्र और वेंकटेश्वर समाचार) इस अंश में सहमत हैं कि भावदार्य्य कुल कमल दिवाकर हिन्दू पति बादशाह महाराणा उदय पुराधीश वीरवर प्रताप सिंह के वार्षिकोत्सव रूप में वीरपूजा की जाए और उनकी अति उज्वल कीर्ति का आर्य सन्तानों को स्मरण कराने का शुभ अवसर दिया जाए।'' 53

यह जातीय गौरव हिन्दू धर्म के ऐतिहासिक गौरव की पुनर्स्थापना के लक्ष्य से जोड़ दिया गया और अन्य धार्मिक मतों के समानान्तर हिन्दू धार्मिक विश्वासों को इस तरह पेश किया गया जैसे भारत के सारे हिन्दू अपनी बाकी दुख तकलीफें भूल कर धार्मिक अधिकारों को पाने के लिए छटपटा रहे हैं। मुसलमान शासकों को कामी और औरतबाज के रूप में पेश करना उस समय आम बात थी और शिवप्रसाद ने भी ठीक इसी आधार पर अकबर का भी खलनायकीकरण किया। इतिहास तिमिरनाशक के पहले खण्ड में उन्होंने अकबर के राजनीतिक जीवन के बारे में दस पृष्ठों (49-58) और तीसरे खंड में उसकी शासन व्यवस्था का सात पृष्ठों में (108-114) वर्णन किया है। उन्होंने सुन्दर स्त्रियों को अपने हरम में डालने की अकबर की आदत का मध्यकालीन इतिहासकार अब्दुल कादिर बदांयुनी के हवाले से लिखाः

÷÷ अकबर सरीखे बादशाह को देखो कि अब्दुल वासिअ से उसकी मनकूहा स्त्री छीन कर अपने हरम में डाल ली। जब अकबर की नजर पड़ी उसके शौहर अब्दुल वासिअ से कहला भेजा कि तुम अपनी मनकूहा को तिलाक देकर फौरन छोड़ दो। बेचारे ने अपनी स्त्री को तिलाक देकर फौरन छोड़ दिया।'' 54

पर अपवाद स्वरूप इस घटना का उल्लेख करने के बावजूद शिवप्रसाद द्वारा अकबर के शासनकाल की सराहना ही की गयी। शिवप्रसाद ने मध्यकाल को हिन्दुओं को लौन्डी गुलाम बनाए जाने , मन्दिर मूतोर्ं को तोड़ने और उन्हें जबरन मुसलमान बनाये जाने के काल के रूप में याद किया लेकिन अकबर का जिक्र आने पर उसकी अनेक विशेषताओं को सामने रखने में संकोच नहीं किया। अकबर के दयालु और नेक स्वभाव के बारे में बताने के लिए अनेक कहानियों के उदाहरण दिये हैं और लिखा है :

÷÷ जिजया का महसूल उसने एककलम मौकूफ कर दिया क्योंकि हिन्दू और मुसलमान उसके नजदीक बराबर थे। यात्रियों से महसूल लेना भी बिलकुल बन्द कर दिया। .. लड़ाई के कैदियों को लौण्डी गुलाम बनाने का दस्तूर बिलकुल उठा दिया।'' 55

शिवप्रसाद ने अकबर के राजकाज की प्रशंसा इस आधार पर की है क्योंकि उसके समय में हिन्दुओं को ऊंचे ओहदे और इज्जत मिलती थी। टोडरमल को जब दीवान बनाया गया तब उस समय की घटना के बारे में शिवप्रसाद ने लिखा :

÷÷ मुसलमानों ने ऐसा उजर किया है कि हिन्दू को ऐसा उहदा न देना चाहिए अकबर ने पूछा तुम्हारी जमीदारियों का इन्तिजाम कौन करता है जवाब दिया, हिन्दू। अकबर ने कहा बस मुझे भी अपनी जमीन का इन्तिजाम अपने तौर पर करने दो थोड़े ही अर्से में बिलकुल दफ्तर और मुंशीखाना हिन्दुओं के हाथ में आ गया।'' 56

लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि मध्यकाल का वर्णन करते समय अकबर की प्रशंसा से इतिहास को हिन्दू हितों और हिन्दू संघर्ष के रूप में देखने का दृष्टिकोण और मजबूत होता था। अकबर के चरित्र को सामने रख कर ही शेष मध्यकाल में सपाट ढंग से हिन्दू विरोधी घटनाओं का हवाला देना और आसान हो जाता था। अकबर जैसे सहिष्णु और उदार शासक की प्रशंसा से समन्वयवादी दृष्टि नहीं बल्कि इतिहास की साम्प्रदायिक दृष्टि ही और मजबूत होती है।

प्रतापनारायण मिश्र ने जरूर वाजिद अली शाह की मृत्यु पर उनकी प्रशंसा में लिखा :

÷÷ तुमने अपनी प्रभुता के समय हिन्दू मुसलमान दोनों को अपनी प्यारी प्रजा समझा है। यह तुम्हारा एक गुण है कि तुममें सचमुच के सहस्त्र दोष होते तो भस्म कर देता।'' 57

पर वाजिद अली शाह हिन्दी नवजागरण के लेखकों के इतने समकालीन थे कि यह कयास भी नहीं लगाया जा सकता कि उनकी प्रशंसा उन्हें किसी साझे ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में देखने की योजना का हिस्सा थी। प्रतापनारायण मिश्र समेत सभी रचनाकारों की अन्य रचनाओं में भारतीयता को हिन्दू धार्मिक पहचान से जोड़ कर देखने वाली इतिहास दृष्टि इतनी स्पष्ट है कि हिन्दू मुसलमानों के साझे ऐतिहासिक प्रतीक के प्रयास को गम्भीरता से लेने की सम्भावनाएं वहां दूर दूर तक नदारद हैं।

प्रतीकों के माध्यम से राष्ट्र के आख्यान के निर्माण व संघर्ष की साफ झलक शिवप्रसाद सितारेहिन्द की किताब इतिहास तिमिरनाशक में प्रस्तुत मुस्लिमों व 1857 ई. के गदर सम्बन्धी दृष्टिकोण के विरोध के रूप में दिख जाती हैं। इस विरोध को नेतृत्व प्रदान किया पश्चिमोत्तर प्रान्त में उन्हीं के प्रतिद्वन्द्वी सर सैय्यद अहमद खां ने। इस पूरे प्रकरण की जानकारी एवरिल ए पावेल के लेख ÷ हिस्ट्री टेक्स्ट बुक एण्ड द ट्रान्समिशन ऑफ द प्रीकोलोनियल पास्ट इन नार्थ वेस्टर्न इण्डिया इन द 1860 एण्ड 1870' से मिलती है। एवरिल पावेल लिखते हैं:

÷÷ जहां हिन्दी पुस्तक के पहले खण्ड पर कोई टिप्पणी नहीं हुई वहीं इसके शिवप्रसाद कृत उर्दू अनुवाद और मैथ्यू कैम्पसन द्वारा कृत अंगे्रजी अनुवादों ने सैय्यद अहमद खान के नेतृत्व में मुस्लिम प्रवक्ताओं को भड़का दिया। उनकी आपत्तियां उसी समय स्थापित होने वाले अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गैजेट में व्यक्त हुईं। इस पत्रिका के मालिक और सम्पादक दोनों ही सैय्यद अहमद थे।'' 58

गौरतलब है कि मैथ्यू कैम्पसन 1856 ईसवी में पश्चिमोत्तर प्रान्त में शिक्षा विभाग के डायरेक्टर ( डीपीआई) नियुक्त हुए थे और उन्होंने इतिहास तिमिरनाशक के पहले हिस्से का अंग्रेजी अनुवाद करने के अलावा इस किताब की काफी बड़ाई की थी। सैय्यद अहमद खान के द्वारा इतिहास तिमिरनाशक पर यह आक्षेप लगाया गया कि यह किताब हिन्दू दृष्टिकोण से लिखी गयी है और मुसलमानों को आहत करना इसका पहला मकसद है। पुस्तक के पहले खण्ड के अंग्रेजी अनुवाद के बाद इतिहास तिमिरनाशक की आलोचना करते हुए एक लेख अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गैजेट में छपा। इस लेख के लेखक का नाम नहीं छपा और इसमें लिखा गया था :

÷÷ इसके साथ समस्या यह है कि यह हिन्दू के द्वारा लिखी गयी किताब है जो न केवल हिन्दू रुझान को दर्शाती है बल्कि इसमें अनेक ऐसे विवरण हैं जिनसे मुसलमानों की भावनाएं आहत होती हैं। लेकिन इसके लेखक का इरादा कुछ भी रहा हो किताब के बुनियादी स्वर में इस्लाम के प्रति एक तल्खी की भावना हर जगह मिलती है।'' 59

यह लेख 1867 ई. में प्रकाशित हुआ और 1872-73 ई. तक इस किताब पर अनेक तरह की आपत्तियां उठायी जाती रहीं। यह आपत्तियां मुख्यतः तीन विषयों पर केन्द्रित थीं। पहली, 1857 ई. के गदर को केवल मुसलमानों द्वारा अंजाम दिया जाना बताना। दूसरी, मुसलमानों के सिखों के साथ संघर्ष के वर्णन में मुसलमानों द्वारा ढाये अत्याचारों को बढ़ाचढ़ा कर दिखाना। तीसरी, सुलतान मुबारक शाह और मुहम्मद शाह जैसे कुछ शासकों को बेहद अय्याश और विलासी दिखाना।

इन आपत्तियों के असर से ही इतिहासेतिमिरनाशक में कई तरह के बदलाव किये जाते रहे। जैसे कि 1869 ईसवी के इतिहास तिमिरनाशक के अंग्रेजी अनुवाद के संस्करण से वे वाक्य हटा दिये गये जो केवल मुसलमानों को गदर का जिम्मेदार बताते थे। पर इससे भी विवाद शान्त नहीं हुआ और पश्चिमोत्तर प्रान्त के तत्कालीन लेफ्टिनेण्ट गवर्नर विलियम म्युअर से होता हुआ वायसराय की काउन्सिल तक जा पहुंचा। अगस्त 1872 ईसवी में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गयी जिसमें इतिहास तिमिरनाशक के बारे में सर सैय्यद अहमद के मन में जो शिकायतें थी सभी का उल्लेख किया गया। किताब में मुस्लिम राजाओं को सिख विरोधी अत्याचारों में लिप्त दिखाने और उन्हें बेहद अय्याश और कामुक बना कर पेश करने पर सैय्यद अहमद को मुख्य रूप से ऐतराज था और उन्होंने इस शिकायत का विशेष तौर पर उल्लेख किया। इन सारी शिकायतों से मैथ्यू कैम्पसन सहमत नहीं थे और उन्होंने शिक्षा विभाग के डायरेक्टर के नाते विभाग के लिए तैयार मेमोरेण्डम में लिखा :

÷÷ नये तथ्यों के प्रकाशन पर नाराजगी जाहिर करना बचकानापन नहीं तो और क्या है। इन घटनाओं के बारे में तो मिस्टर एल्फिनस्टोन और सर एच इलियट ने भी अपने मुस्लिम संग्रहों में विस्तार से लिखा है।''60

अब यह देखा जाए कि सिख नेता बंग के ऊपर फर्रुखसियार के अत्याचारों का विवरण किस प्रकार दिया गया था जिसने सैय्यद अहमद को नाराज कर दिया। शिवप्रसाद ने इतिहास तिमिरनाशक के पहले खण्ड में 1713 ईसवी में दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले मुगल शासक फर्रूखसियार द्वारा सिखों के साथ वहिशियाना सुलूक के बारे में बतायाः

÷÷ सिखों ने फिर सिर उठाया, लेकिन बादशाही फौजों ने उन्हें फिर जा दबोचा। बन्दे गुरू को 740 आदमियों के साथ पकड़ कर दिल्ली भेज दिया गया। बन्दे को ताश का जामा पहना कर लोहे के पिंजरे में बन्द कर दिया गया। उसके गिर्द भालों पर उसके साथियों के सिर थे। एक बिल्ली उसने पाली थी उसे भी मारकर एक भाले से लटका दिया गया। जल्लाद नंगी तलवार लेकर सामने खड़ा था। उसने बालक लड़के को देकर कहा कि तू ही अपने हाथ से मार डाल और जब उसने इनकार किया तो जल्लाद ने उसी के सामने उस बेचारे बेगुनाह बच्चे को जिबह कर उसका कलेजा उसके बाप के ऊपर फेंका और फिर गर्म चिमटों से नोच नोचकर उसे भी टुकड़ा टुकड़ा कर डाला।'' 61

सिखों के खिलाफ मुस्लिम राजा के इस बर्बरतापूर्ण कृत्य के वर्णन पर सैय्यद अहमद ने ऐतराज जताते हुए कहा कि इसमें इस्लाम के प्रति नफरत की भावना का परिचय मिलता है। 1872 ईसवी में दर्ज कराये गये ऐतराज में उन्होंने चौदहवीं सदी के मुस्लिम शासक मुबारक शाह और 18 वीं सदी के शासक मुहम्मद शाह की अय्याशियों की अतिरंजित तस्वीरों को भी हिन्दू इतिहासकार का पूर्वग्रह माना था। मुहम्मद शाह के बारे में शिवप्रसाद ने इतिहास तिमिरनाशक के पहले खण्ड में कहा था :

÷÷ हमारे पास उस वक्त के एक मेले की तस्वीर मौजूद है उसी को देखना मुहम्मदशाह का सारा जमाना देख लेना है। वह उस मेले की तस्वीर है जो मुहम्मद शाह ने महादेव का किया था। वाजिद अलीशाह के जोगी जोगन वाले उस मेले का भला उसके साम्हने क्या रुतबा था। उसमें नंगे मर्द और नंगी औरतें इस तरह बनायी हैं कि हर्गिज नहीं बयान कर सकते शर्म दामनगीर है।'' 62

इसी प्रकार 1317 ईसवी में शासक बनने वाले अलाउद्दीन के लड़के मुबारकशाह की विलासिता के बारे में शिवप्रसाद ने लिखा था :

÷÷ जब मुलक में दबदबा जमा बादशाह बिलकुल ऐश में डूब गया। रात दिन नशे में चूर रहता। जनानी पोशाक पहन कर अमीरो के घर नाचने को जाता। जिन ऐबो को आदमी छिपाता है वह उनको खूब जाहिर करने की कोशिश करता। कसबियो को बुलवा कर दरबार में अपने बड़े बड़े अमीरो की बराबर बिठलाता कभी कभी नंगा मादरजाद बाहर निकल जाता।'' 63

मुस्लिम राजाओं को इस तरह से पेश करने से नाराज सैय्यद अहमद की आपत्तियों के क्या नतीजे निकले इसका पता भी एवरिल पावेल के लेख से चलता हैं पश्चिमोत्तर प्रान्त के तत्कालीन लेफ्टिनेण्ट गर्वनर जनरल विलियम म्यूअर ने शिवप्रसाद और उनकी किताब के अंग्रेजी में अनुवादक कैम्पसन का खुल कर पक्ष लिया। पावेल ने लिखा है :

÷÷ हालांकि ÷ म्यूअर कुछेक भाषिक सांस्कृतिक मुद्दों पर शिवप्रसाद से असहमत थे लेकिन इस अवसर पर शिवप्रसाद और कैम्पसन के पक्ष में थे। वे शिवप्रसाद का पक्ष लेने के बावजूद सैय्यद अहमद को नाराज न करने की कोशिशों को भी सही ठहराते थे।'' 64

वायसराय की काउन्सिल ने भी सैय्यद अहमद की शिकायतों को गम्भीरता से नहीं लिया और इतिहास तिमिरनाशक में केवल हल्केफुल्के सुधार की सलाह देकर इस पूरे मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया। सर सैय्यद को भी लगा कि इतिहास तिमिरनाशक को वह पूरी तरह से प्रतिबन्धित भले न करा सके हों लेकिन इसके कुछ हिस्सों में सुधार की सरकारी सिफारिश ने उनके ही पक्ष को सही ठहराया है। इस वजह से उन्होंने बाद में स्वयं भी इस विवाद से अपने को अलग कर लिया।

इस प्रकार 19 वीं सदी के अन्तिम चार दशकों में लिखी गयी हिन्दी रचनाओं में इतिहास को प्रमुख विषय के रूप में स्थापित किया गया। उपनिवेशवाद द्वारा खड़ी की जा रही चुनौती का सामना करने के लिए इतिहास की व्याख्याओं का सहारा लिया गया। इतिहास लेखन के क्षेत्र में अपने प्रयासों और प्राच्यविद्या की प्रेरणा से गढ़े गये दर्पण में अपना आत्मगौरव से भरा चेहरा देखने की कोशिश की गयी। व्यापक भारतीयता की एक धारणा भी इस समय पनपती दिखी लेकिन इसे कमजोर कर देने वाली इतिहास दृष्टि भी बंगाल से लेकर हिन्दी क्षेत्र तक बड़े पैमाने पर विकसित हुई। एक ओर सभी धर्म मजहब के और जातिगत भेदभाव को भुला कर एकजुट होने की जरूरत पर बल दिया गया तो दूसरी ओर जानबूझ कर इतिहास के नाम पर उन मुद्दों को उछाला गया जिनसे कटुताएं ही पैदा हो सकती थीं।

सन्दर्भ

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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