हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नये साल की प्रतीक्षा में

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/31/2007 11:35:00 PM

2008 की एक जनवरी की सुबह आम सुबहों से कुछ अलग
नहीं होगी, सिवाय इसके कि दुनिया भर में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर बदल दिये गये
होंगे और हम सफहों पर तारीख डालते वक्त जनवरी से शुरुआत करेंगे, एक बार फिर.समय की
अपनी गति में यों तो वह दिन भी आम दिनों जैसा ही होगा, फिर भी उस दिन दुनिया की
आबादी का एक हिस्सा जश्न में डूबा होगा. मगर वह दिन उन करोडों गरीब और वंचित लोगों
के कोई भी नयापन लिये हुए नहीं होगा, जिनके लिए नयेपन की सबसे ज्यादा जरूरत है.
उनके लिए उस दिन कुछ भी बदला हुआ नहीं होगा, जिन्हें बदलाव की-इस शब्द के वास्तविक
अर्थों में-सबसे अधिक आकांक्षा है. खुशी उन तक रिसते हुए भी नहीं पहुंचेगी.युद्ध
अपनी हत्यारी मंथर गति से चलते रहेंगे और हत्याओं को कानूनी जामा पहनातेरहेंगे.
विशाल युद्धपोतों पर सैनिक नये साल की खुमारी के बीच युद्धक सामग्री को नयी
मोरचेबंदी के लिए साफ करेंगे. दुनियाभर में फैले भूमंडलीकृत बंदीगृहों्व में लोग
अपने जीवन का एक और यातनापूर्ण दिन गुजार रहे होंगे. इराक और अफगानिस्तान के लोग एक
और दिन खून और बारूद के बीच काटेंगे. फलस्तीन के बच्चों के लिए एक और दोपहर भयंकर
खौफ के बीच गुजरेगी. छत्तीसगढ में अपनी जमीन से उजाड दिये गये आदिवासियों के लिए एक
और दिन सडकों के किनारे बने अस्थाई घरों को अब अपना गांव-घर मानते हुए बीतेगा.
नंदीग्राम के लोगों के लिए अपने मारे गये परिजनों के बगैर एक और शाम ढलेगी. बिकी और
बेची जा रही नदियों में हजारों लीटर और पानी बह चुका होगा. दुनिया के करोडों
वंचितों के लिए भूख, जलालत, निर्धनता और गुलामी की कालिख से भरा एक और सूरज आसमान
पर चमकेगा. अन्याय, उत्पीडन, निरंतर विनाश और अपमान से भरा एक और दिन.एक और
दिन...जिसमें वही गलतबयानी से भरे नेताओं के भाषण होंगे, झूठे वादे होंगे. अदालतें
एक बार फिर न्याय का ढोंग करने के लिए बैठेंगी. स्कूलों में बच्चों का बचपन बाजार
के नाम गिरवी रखा जायेगा. महिलाएं या तो बाजार की धुन पर थिरकेंगीं या बाजार द्वारा
कै कर दी जायेंगी. युवक कुंठा और हताशा की खोह में धकेल दिये जायेंगे.हमारे नाम पर,
हमारे दिये गये टैक्सों से हमारे जैसे ही सपने देखनेवाले हमारी ही तरह के लोग, जो
हमसे कुछ हजार या कुछ सौ किमी दूर होंगे, किसी आधुनिक स्वचालित हथियार से मार दिये
जायेंगे, उनके घर ढहा दिये जायेंगे या उन्हें पकड कर कैदखानों में यातनाएं दी
जायेंगी और उनके सपने कुचल दिये जायेंगे. उनके बीच किसी भी देश की सीमा हो या न हो,
कुछ फर्क नहीं पडता-यह भूमंडलीकृत हत्याओं का दौर है. जब दुनिया के विभिन्न इलाकों
में नये साल की खुशियों से लोग सराबोर हो रहे होंगे, आजादी और भलाई की खूबसूरत
बातें हो रही होंगी-झूठी मुठभेडें, हिरासती मौतें, नृशंस हत्याएं अपनी जगह पर बनी
हुई होंगी. दवाओं और अनाज के अभाव में मौतें, बाढ, सूखे, बीमारियां, सामंती रूढियों
के शिकार लोग-हम जिन्हें किसी श्रेणी में नहीं रखते, वे सब समय के चक्के तल क्रूरता
से पीस दिये जायेंगे और सबसे भयावह बात यह है कि हम उन्हें भुला देने, नजरअंदाज कर
देने को बाध्य होंगे. निजी उपलब्धियां और चकाचौंध कर देनेवाले आंकडे हर तरह की
असहमत आवाज को दबा देने के लिए काफी होंगे.लेकिन लोगों के लिए उम्मीद कभी खत्म नहीं
होगी. उसका तारीखों और कैलेंडरों के बदलने से कोई ताल्लुक नहीं. उम्मीद हर सुबह,
उगते सूरज के साथ और हर शाम-गहराती रात के साथ बनी रहती है. धरती पर शांति और आजादी
की कामना करनेवालों के लिए कोई साल कभी खत्म नहीं होता और कोई नया साल इस तरह नहीं
आता कि पुराना कुछ भी बचा न रह गया हो. लोग-जनता-और उनके सपने, उनकी लडाइयां अंततः
विजयी रहेंगी. हमें उस नये साल की प्रतीक्षा है.

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  1. 5 टिप्पणियां: Responses to “ नये साल की प्रतीक्षा में ”

  2. By barb michelen on January 2, 2008 at 2:59 AM

    Hello I just entered before I have to leave to the airport, it's been very nice to meet you, if you want here is the site I told you about where I type some stuff and make good money (I work from home): here it is

  3. By manjula on January 3, 2008 at 1:56 PM

    Its very true Reyazulji, very true.

  4. By amrit on January 5, 2008 at 11:10 PM

    such hai.dar-asal hamne barood ki gandh ko hi oxygen maan liya hai.tabhi bhram ka awaran odhe hum har sal kahte hain happy new year.
    is article ke liye dhanyawad

  5. By नीलाभ on January 6, 2008 at 8:12 PM

    नए साल पर आपने हाशिये पर धकेले गए लोगों की याद दिलाई ; अच्छा लगा . पर एक सवाल जिसने हमेशा मेरे जेहन को मथा है कि अमन और इन्साफपसंद लोग हमेशा -अंततः विजयी होंगे - का इस्तेमाल क्यूँ करते हैं ?!!! हम जीत रहे हैं हर लम्बी लड़ाई और नई चुनौतियों के लिए भी डटकर खड़े हैं अगर ऐसा न होता तो मस्जिद में अजान नही होती और मन्दिर का दर सूना होता.....पुराने संघर्षों की हार-जीत से सीखते हुए हर नया साल एक नए अवसर का एहसास कराता है इस अर्थ में एक जनवरी की सुबह मेरे लिए जरूर अलग है....

  6. By Dr.Rupesh Shrivastava on January 23, 2008 at 2:54 PM

    अंतःर्स्पशी भाव हैं लेकिन बदलाव के प्रयास करने होंगे । रियाज़ भाई हाशिये का फैलाव बढ़ा कर मुख्य पत्र तक लाकर पूरे पन्ने पर छा जाना है । तब आत्मा को शान्ति मिलेगी ।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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