हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बच्चे हमारी चिंताओं में कब शामिल होंगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/14/2007 01:51:00 AM

बाज़ार के दौर में बच्चों के भविष्य से जुडे़ कुछ सवालों को रेखांकित कर रही हैं संध्या.

15 नवंबर को अखबारों में बाल दिवस मनाये जाने की खबरें छपेंगी और यह मान लिया जायेगा कि समाज ने बच्चों को लेकर अपना दायित्व पूरा कर लिया. दशकों से मनाया जा रहा बाल दिवस एक बार फिर मना लिया जायेगा, एक और साल बीत जायेगा और बच्चे बाजार की अपेक्षाओं की कीमत चुकाते रहेंगे.

स्कूल जानेवाले अधिकतर बच्चों के लिए बाल दिवस का मतलब सिर्फ यह होता है कि इस दिन पढ़ाई नहीं होती, बच्चों को कुछ छोटे-बड़े उपहार दिये जाते हैं और कुछ स्कूल उन्हें घुमाने ले जाते हैं.
बाजार का गहरा प्रभाव समाज पर पड़ा है. बच्चे चूंकि इसी समाज का हिस्सा हैं, वे इस प्रभाव से अछूते नहीं हैं. आदमी को एक कमोडिटी बनाने की प्रक्रिया बचपन से ही शुरू हो जाती है. बच्चों को बाजार के ढांचे में बचपन से ही फ्रेम कर दिया जाता है. अब बच्चों को इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर या स्कॉलर बनने के सपने नहीं देखने दिये जाते, बल्कि उन पर बचपन से ही यह दबाव बनाया जाता है कि उन्हें पैसे कमाना है और इसी के लिए उन्हें कुछ बनना है. बच्चों से कभी नहीं पूछा जाता कि उन्हें क्या बनना है, उनकी अपेक्षाएं क्या हैं. बाजार, माता-पिता और टीचरों की अपेक्षाओं के दबाव में आकर बच्चों की अपेक्षाएं दब जाती हैं. इससे बच्चों की रचनात्मकता और उनकी जीवन के प्रति कलात्मकता खत्म हो जाती है. वे अपनी खुद की अपेक्षाएं भी नहीं रख पाते, वे बाज़ार की अपेक्षाओं पर ही चलते. बाजार ने उनके लिए ऐसी प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की नहीं, सबको पीछे छोड़ कर आगे निकलने की मानसिकता पैदा की जाती है.

बच्चों पर पढ़ाई का दबाव भी बहुत रहता है. परीक्षाओं की व्यवस्था ऐसी है कि जीवन का एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई करते ही बीत जाता है. इससे बच्चों में इनोवेटिव होने, कुछ नया कर-सोच पाने की क्षमता विकसित नहीं होने पाती. एक तो परीक्षाएं बहुत ली जाती हैं और दूसरे उनका जो पैटर्न होता है, उसमें प्रतिभा नहीं बल्कि स्मरण शक्ति देखी जाती है. इसके अलावा परीक्षा और फर्स्ट आने का दबाव बच्चों को मानसिक रूप से प्रभावित करता है. वे परीक्षाओं के आसपास प्राय: बीमार पड़ जाते हैं. मनोचिकित्सकों ने इसे एक्जामोफोबिया का नाम दिया है.

इस तथ्य को विशेषज्ञ बार-बार दोहराते हैं कि असल में यह शिक्षा तंत्र मैनेजर बना सकता है, विद्वान, स्कॉलर, फिलासफर, प्रोफेसर नहीं बना सकता. हर चीज जब खरीदने-बेचने की चीज हो जाती है तो उस पर इन्वेस्टमेंट भी इसी दृष्टि से किया जाता है कि मुनाफा अधिक-से-अधिक हो. बच्चों की परवरिश और शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था भी इसी तरह की जा रही है कि वे कमाऊ बन सकें न कि एक बेहतर इनसान बनें.
गत कुछ वर्षों में बाल मजदूरी पर काफी चर्चा हुई है. इसको लेकर कानून तक बना और लागू हुआ. मगर जो कुछ हमारे सामने है, उसे देखें तो लगता है कि ईमानदार प्रयास नहीं हुए हैं. इसका पता इस बात से भी लगता है कि 52 ऐसे मामले सामने आये हैं, जिनमें उन लोगों के घरों में बच्चे घरेलू नौकर के बतौर काम करते पाये गये, जिन्हें गार्जियन्स ऑफ लॉ कहा जाता है. इसके अलावा बाल मजदूरी पर पूरी बहस को एकांगी तरीके से उठाया जाता है और बाल मजदूरी रोकने के लिए बनाये गये कानूनों में उन बच्चों के लिए और उनके परिवारों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए, जो काम पर से हटाये जायेंगे, कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गयी है.

दुनिया के स्तर पर देखें तो विभिन्न देशों में जारी अमेरिकी सैन्य हमलों और प्रतिबंधों का सबसे अधिक खामियाजा बच्चे ही भुगतते हैं. इराक में युद्ध और प्रतिबंधों की वजह से पिछले डेढ़ दशक में भूख और बीमारी की वजह से पांच लाख से अधिक इराकी बच्चे मारे गये. सोमालिया और सूडान के बच्चों की दुर्दशा तो एक त्रासद परिघटना की तरह हमारे सामने है.

बाल दिवस के बारे में भी बच्चों का एक खास तबका ही अवगत है. स्कूल जानेवाले बच्चे एक खास तबके से आते हैं. यह वह तबका है जो स्कूल जाने का खर्च वहन कर सकता है. मगर जो बच्चे स्कूल भी नहीं जा पाते, जो बच्चे ट्रेनों और बसों में भीख मांगते हैं, सड़कों पर कूड़ा बीनते हैं, झाड़ू देते हैं, उनके लिए इस दिवस का क्या मतलब है? उनके लिए इसका कोई मतलब क्यों नहीं होना चाहिए? आखिर हम कब अपनी चिंता में उन बच्चों को और कुल मिला कर सभी बच्चों को शामिल करेंगे?

प्रभात खबर से साभार.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ बच्चे हमारी चिंताओं में कब शामिल होंगे ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें